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Jun 1, 2026

उदंती.com, जून -2026

वर्ष - 18, अंक - 11

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

                                      - बशीर बद्र

 अनकहीः वर्तमान की धूप और भविष्य के बादल  - डॉ. रत्ना वर्मा

  प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता - पंकज चतुर्वेदी 

 मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर  - प्रमोद भार्गव

 विज्ञानः जलवायु संकट से निपटने, पेड़ व तकनीक दोनों जरूरी 

 तापमानः जम्मू-कश्‍मीर की वादियों पर  हीटवेव का प्रकोप - अजय मोहन

 कविताः गर्मी सबको सता रही है  - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

 संस्मरणः उसकी ख़ुशी ! - निर्देश निधि

 लघुकथाः हाथी के दाँत - विष्णु नागर

 स्मृति शेषः नर्मदा लड़ाई के साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे 

 कविताः पीछे मुड़कर देखा जो मैंने - रमेश बिल्लौरे

 किताबेंः साहित्य का सुहाना सफ़र  - रमेश कुमार सोनी

 लघुकथा- पहली बार - रामकुमार आत्रेय

 कहानीः साँप का शाप - हरी राम यादव

 कविताः बालिका वधू - अनीता सैनी

 व्यंग्यः शासक हाथी और शोषित कुत्ता - डॉ. जेन्नी शबनम

स्वास्थ्यः देखभाल के नाम पर त्वचा खराब तो नहीं कर रहे? - प्रतिका गुप्ता

योग दिवसः योग से ही होगा कल्याण - जैस्मिन जोविअल

लघुकथाः  तिल - हरि मृदुल

योग दिवसः शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का उत्सव - डॉ. योगिता जोशी

दो कविताएँः 1.दक्षिण यात्रा के पूर्व , 2. अंतर्यात्रा - सत्या शर्मा ‘कीर्ति’


अनकहीः वर्तमान की धूप और भविष्य के बादल

- डॉ.  रत्ना वर्मा 

 जून का महीना आते ही हम सभी आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखने लगते हैं कि काश, बस एक बार अच्छी बारिश हो जाए, ताकि इस झुलसाने वाली गर्मी और लू से राहत मिले। गर्मी में राहत की चाह रखना बहुत स्वाभाविक है; लेकिन यह भी सच है कि हम हमेशा जो नहीं है उसकी चाहत में इतने व्याकुल रहते हैं कि, जो सामने है उसकी खूबी को देखना भूल जाते हैं। आज जून की इस चिलचिलाती धूप में हम जुलाई-अगस्त की बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं।  लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जैसे ही बारिश आएगी, वे सब जो आज पानी की एक बूँद के लिए तरस रहे हैं, कल जलभराव, रास्तों के कीचड़, सीलन और उमस को कोसने लगेंगे। तब हर कोई कहेगा कि इससे तो जून की सूखी गर्मी ही भली थी!

वैसे, ध्यान से देखें तो आज ये मौसम भी अपने पुराने और स्वाभाविक चक्र में कहाँ रहे? चाहे यह रिकॉर्ड तोड़ती भीषण गर्मी हो, प्रलय जैसी बाढ़ लाने वाली भारी बारिश हो या हाड़ कँपाने वाली कड़ाके की ठंड- यह सब प्रकृति का बदला हुआ रूप है, जो हमें चेतावनी दे रहा है। असल में तरक्की के नाम पर और 'अंधाधुंध विकास' के मुखौटे के पीछे जो बर्बादी हमने खुद अपने हाथों की है, हमारी उसी लालच और गलतियों के कारण ही यह मौसम चक्र बुरी तरह टूट रहा है। हम कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं, जंगलों को काटकर सड़कें बिछा रहे हैं, नदियों का दम घोंट रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि मौसम हमें अपनी ठंडी छाँव दे। यह भला कैसे संभव है? अपनी ही धरती को भीतर तक झुलसा कर हम सुखद और शांत मौसम की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में हमें ये सारे मौसम अपने सही चक्र में चले और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ इनका स्वागत आनंद मनाते हुए कर सकें, तो  पहले हमें  अपनी धरती को, प्रकृति को सिर्फ भुनाना बंद करना होगा। 

  दरअसल हम कभी उस पल को जीना ही नहीं सीखते जो हमारे हाथ में है। यही वजह है कि हम बहुत तेज दौड़कर सबकुछ बहुत जल्दी पा लेना चाहते हैं और यही छटपटाहट आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का सच बन चुकी है- जब हम बच्चे होते हैं तो हमें बड़े होने की जल्दी रहती है कि कब स्कूल की बंदिशें, होमवर्क का बोझ और बड़ों की डाँट-डपट खत्म हो और आज़ादी का आसमान मिले। फिर जब पढ़ाई के उस सुनहरे दौर से बाहर निकलते हैं, तो दिन-रात एक ही धुन सवार हो जाती है कि कब एक अच्छी- सी नौकरी मिल जाए, खूब पैसा कमाएँ, अपनी मनमर्जी से जीवन जिएँ,  समाज में रुतबा बन जाए। इसके बाद जब नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों का वह मनचाहा मुकाम मिल जाता है, तब हम उस पल का आनंद लेने के बजाय फिर अतीत की ओर मुड़कर देखने लगते हैं कि हमारा वह बेफिक्री वाला बचपन ही सबसे अच्छा था, जहाँ न कोई ईएमआई का तनाव था और न ही कोई जिम्मेदारी। कहने का तात्पर्य यही है कि हम हमेशा अगले पड़ाव की अंधी तलाश में वर्तमान को अधूरा छोड़ते चले जा रहे हैं। 

इस निरंतर आगे भागने और जो हाथ में है उसे कमतर आँकने की आदत ने हमें भीतर से बहुत अधीर, असंतुष्ट और रोबोट जैसा बना दिया है। हमने जिंदगी को एक मशीन समझ लिया है, जहाँ बस चौबीसों घंटे बिना रुके, बिना सोचे-समझे किसी अनजानी रेस के पीछे भागते चले जाना है। जबकि यह सनातन सत्य है कि जीवन जीने की अपनी एक बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। जैसे प्रकृति किसी बीज को रातों-रात पेड़ बनाकर फल देने के लिए मजबूर नहीं करती, वह उसे हर मौसम को सहने और धीरे-धीरे पनपने का समय देती है, वैसे ही हमें भी अपनी उम्र के हर पड़ाव को, उसकी हर खूबी और कमी के साथ स्वीकार करते हुए सहजता से पार करते चले जाना चाहिए। लेकिन आज का इंसान अपनी इस सहजता को भूलकर दूसरों के साथ एक ऐसी आत्मघाती होड़ में शामिल हो गया है, जिसकी न तो कोई मंजिल है और न ही कोई अंत। पड़ोसी की गाड़ी, सहकर्मी का प्रमोशन या सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली चमक देखकर हम अपने आज के सुकून को दांव पर लगा देते हैं।

प्रकृति का अपना एक अटूट नियम है। जून की यह तपिश और लू भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जितनी जुलाई की रिमझिम बौछारें। यह धूप सिर्फ हमारे बदन को नहीं तपाती, बल्कि खेतों में खड़ी फसलों को पकाने, मिट्टी के भीतर के हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने और पूरी पृथ्वी के जल-चक्र को संतुलित रखने के लिए बेहद आवश्यक है। यदि जून में यह प्रचंड गर्मी नहीं पड़ेगी, तो समुद्र का पानी भाप बनकर आसमान में नहीं जाएगा और अगर भाप नहीं बनेगी तो सावन के बादल कहाँ से आएँगे? ठीक इसी तरह, जिंदगी के संघर्ष, कठिनाइयाँ और हमारे हिस्से में आई जिम्मेदारियों की धूप भी हमें भीतर से तपाकर परिपक्व बनाती है। अगर हम इस धूप की तपन को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर लें, तो इसके बाद मिलने वाली सफलता या सुख का आनंद अपने आप दोगुना हो जाएगा।

दरअसल भविष्य के सुंदर और काल्पनिक ख्वाब बुनने में हम इतने मशगूल रहते हैं कि आज के यथार्थ की धूप को सहने का हौसला और धीरज खो देते हैं। जो बीत गया वह सिर्फ यादें हैं, उन पर हमारा कोई वश नहीं है। जो आने वाला है वह केवल एक अनिश्चित संभावना है, जिसके बारे में हम सिर्फ कयास लगा सकते हैं। लेकिन जो पल, जो दिन और जो रिश्ते इस समय हमारे ठीक सामने मौजूद हैं, वही हमारा वास्तविक जीवन है। तो जब तक हम हर स्थिति और हर मौसम के साथ सामंजस्य बिठाना नहीं सीखेंगे, तब तक हम चाहे मनचाही बरसात पा लें या जीवन का कोई बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लें, हमारे मन के किसी कोने में एक छटपटाहट हमेशा बनी रहेगी। और यह छटपटाहट तभी दूर होगी जब हम कहीं पहुँचने की हड़बड़ी छोड़कर, इस सुंदर सफर की खिड़की से बाहर देखते हुए आज पर ठहरकर खुलकर सांस लेना नहीं सीख जाएँगे। जिंदगी कल नहीं, बल्कि इसी वक्त, इसी पल में है। 

प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता

 - पंकज चतुर्वेदी

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

भारत में मौसम का बदलता मिजाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं; लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है।

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे।

बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ तापमान अब नियमित रूप से 48°C के स्तर को छूने लगा है। यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।

इस मानव-निर्मित गर्मी की सबसे प्रत्यक्ष और क्रूर मार उन मजदूरों और सड़क किनारे काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ती है, जो इस ढाँचे का निर्माण कर रहे हैं। भारत के करोड़ों निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और गिग-इकोनॉमी के कर्मचारी इस गर्मी को केवल एक आँकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक शारीरिक हमले के रूप में महसूस करते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गर्मी के कारण भारत को 2030 तक अपने कुल कामकाजी घंटों का 5.8% हिस्सा खोना पड़ सकता है, जो लगभग 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है।

बांदा जैसे शहरों में, कंक्रीट और कोलतार की सड़कें गर्मी को सोखकर रात में भी उसे वापस छोड़ती हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव पैदा होता है और स्थानीय तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 5°C से 7°C तक अधिक बना रहता है।

नीतिगत स्तर पर मजदूरों के लिए ‘छाया का अधिकार’ या लू के दौरान काम के घंटों में बदलाव जैसे नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जो हमारे विकास के उस अंधेपन को दर्शाते हैं जहाँ श्रम को एक जैविक इकाई के बजाय केवल एक मशीन समझा जाता है।

गर्मी का यह घातक रूप हमारी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। ‘थर्मल शॉक’ के कारण गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के दाने दूध भरने की अवस्था में ही सूख रहे हैं, जिससे पैदावार में 15% से 25% तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ जमीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियाँ सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं।

इसी तरह, जंगलों के विखंडन और अवैध खनन ने वन्यजीवों के लिए भोजन  का संकट पैदा कर दिया है। छतरपुर और पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में, खनन के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर आना 40% तक बढ़ गया है। यह केवल मानव-पशु संघर्ष नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिक सुरक्षा चक्र का टूटना है जो इंसानों और जानवरों को एक साथ सुरक्षित रखता था।

वर्तमान ‘हीट एक्शन प्लान’ (एच ए पी) की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे केवल शहरों में मौतों को रोकने पर केंद्रित हैं, जबकि जमीन, जल और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहाँ मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्यजीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए।

हमें केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी से ऊपर उठकर बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाबों जैसे पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। ये तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी को ठंडा रखने के विकेंद्रीकृत साधन थे।

नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि राजमार्गों के लिए काटे गए पेड़ केवल लकड़ी नहीं थे, बल्कि वे उस सूक्ष्म-जलवायु का हिस्सा थे जो फसलों को झुलसने से बचाती थी।

हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है।

आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है। भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। तभी हम इस मानव-निर्मित भट्टी से बाहर निकल पाएँगे और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी धरती दे पाएँगे जो केवल झुलसती नहीं, बल्कि जीवन भी प्रदान करती है। (Indiaclimatechange.com)

मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर

  - प्रमोद भार्गव

देश के ज्यादातर भूभाग पर अँगड़ाई लेता पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र समेत समूचा मध्य व उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। 25 मई को सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही नौतपा शुरू हो गया था, हालांकि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार धरती का अधिक तपना अच्छी बारिश का संकेत है। मौसम विभाग भी नौतपा में भीषण गर्मी बता रहा है। सनातन पंचांग में उल्लेख मिलता है की इन नौ-दिनों में एक ऐसा समय भी आता है जब सूर्य अपनी सबसे तीव्र ऊर्जा के साथ पृथ्वी पर प्रभाव डालता है। फलतः गर्मी चरम पर पहुँच जाती है। 

   इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिकों की मानें तो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक ताकतवर महा-अलनीनो आकर ले रहा है। यह 1877 के बाद सबसे विध्वंसकारी मौसमी आपदा साबित हो सकता है। इसका सीधा असर भारत में देखने को मिल सकता है। क्योंकि अल-नीनो भारत की जीवन रेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को भी प्रभावित कर सकता है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर ऊष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मँडरा रहा है।

 इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को ऊष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। इस समय बर्तन के एक ढक्कन की तरह गर्म हवा ऊष्मा को नीचे धरती की तरफ दबाए रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है। गर्मी की इस प्रचंड स्थिति को ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताया जा रहा है।   

     इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आधे भारत में बढ़ा तापमान  लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहाँ तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पाँच दिन तक यही स्थिति यथावत् बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आँकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएँ आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।

       धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधष्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पीयूष ग्रंथि के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतःस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में हाइपरपीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।

   बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निष्क्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियाँ जानलेवा होती हैं। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियाँ काम नहीं करती हैं; क्योंकि ये दवाएँ दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।

       हवाएँ गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पाँचवाँ तत्त्व यूँ ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्त्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवतः आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा, तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे ब्रह्म तत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है; क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देश भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा, वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहाँ खेत बंजर हो जाएँगे। पालतू मावेशी और वन्य जीव गर्मी से तड़प-तड़पकर प्राण छोड़ने लग जाएँगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा।

       संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आँधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखी के फटने की हैरतअंगेज घटनाएँ भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द-गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

अलनीनो की चपेट में मौसम

 जून के आरंभ में यदि समुद्र तट का तापमान बढ़कर 0.50 डिग्री हो जाता है और यह वृद्धि आगे भी बनी रहती है तो मौसम पर अल-नीनो का प्रभाव दिखाई देने लगता है।  भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पास अलनीनो के हालात बनना शुरु हो गए हैं। धीरे-धीरे समूचे दक्षिणी गोलार्द्ध को अपनी चपेट में लेने की ओर अग्रसर है । असल में उष्णकटिबंधीय प्रशांत और भूमध्यीय क्षेत्र के सागर में यदि तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है तो इससे उत्पन्न होने वाली समुद्री घटना को ही ‘अलनीनो’ या ’एल-नीनो’ प्रभाव कहा जाता है। यह घटना दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतर से घटित होती है।  नतीजतन समुद्र के सतही जल का तापमान सामान्य  से अधिक हो जाता है और अल-निनो वजूद में आ जाता है। एल निनो स्पेनिश भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘उत्पाती छोटा बालक’। अलनीनो का एक प्रभाव यह भी होता है कि वर्षा के क्षेत्रों में परस्पर परिवर्तन जैसे हालात दिखाई देते हैं। मसलन ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होती है। कम वर्षा अथवा अल-नीनो की चपेट में आए मानसून के कारण खेती योग्य कुल कृषि भूमि का 60 फीसदी हिस्सा सूखे के प्रभाव में आ जाता है। इस संकट का कहर किसानों और कृषि पर केंद्रित जनसमुदायों को झेलना होता है। यहाँ यह  भी ध्यान रखने की जरुरत है कि बीते 111 सालों के भीतर जो 20 भयानक सूखे पड़े हैं, उनकी पृष्ठभूमि में अल-नीनो का प्रभाव ही रहा है। 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.), मो. 09425488224-9981061100

विज्ञानः जलवायु संकट से निपटने में पेड़ व तकनीक दोनों जरूरी

 जैसे-जैसे कंपनियाँ और सरकारें जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास बढ़ा रही हैं, यह सवाल उठ रहा है कि हवा
से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का सबसे सही तरीका क्या है? पेड़ लगाने जैसे प्राकृतिक उपाय या मशीनों से कार्बन कैप्चर वाली तकनीक? इस पर नियम तय किए जा रहे हैं; लेकिन अभी भी यह साफ नहीं है कि किसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल, ‘प्रकृति बनाम तकनीक’ का विवाद सही नहीं है। ज़रूरी यह है कि हम समझें कि कौन सा तरीका कैसे काम करता है, कब उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और वह किस समस्या का समाधान करता है। अगर इन दोनों को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा जाएगा, तो जरूरी कदम उठाने में देरी हो सकती है।

कम समयावधि में, पेड़ लगाना और मिट्टी में कार्बन वृद्धि जैसे प्राकृतिक उपाय बहुत काम के होते हैं। इन्हें जल्दी लागू किया जा सकता है और ये अगले 20 सालों में हवा से कार्बन कम करने में मदद करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सबसे अहम समय है। भले ही यह कार्बन हमेशा के लिए न रुके, लेकिन जल्दी किया गया यह काम भी काफी फायदा देता है।

मध्य समयावधि में, कुछ उद्योग - जैसे हवाई यात्रा और बड़ी फैक्टरी - पूरी तरह प्रदूषण कम नहीं कर पाते। ऐसे में कार्बन हटाना ज़रूरी हो जाता है। यहाँ ऐसे तरीके ज़्यादा काम के हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक कैप्चर रख सकें, जैसे ज़मीन के अंदर स्टोर करना या उसे ठोस रूप में बदल देना; ताकि वह लंबे समय तक हवा में वापस न जाए।

दीर्घ समयावधि में, कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए सैकड़ों साल तक लगातार प्रयास करने होंगे। यह काम किसी एक तरीके से नहीं हो सकता, बल्कि सभी उपलब्ध उपायों को साथ मिलाकर अपनाना पड़ेगा।

हालाँकि, अलग-अलग अवधि के ये लक्ष्य जुड़े हुए जरूर हैं; लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इन्हें गड्डमड्ड करने से नीतियाँ बनाने और निवेश करने में उलझन पैदा होती है; इसलिए जरूरत है दोनों के  संतुलित इस्तेमाल की, तभी जलवायु परिवर्तन से सही तरीके से निपटा जा सकता है। बहरहाल, लंबे समय से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने के लिए तकनीक का उपयोग करने से हटकर एक संतुलित दृष्टिकोण पर चर्चा होने लगी है। (स्रोत फीचर्स) 

तापमानः जम्मू-कश्‍मीर की वादियों पर हीटवेव का प्रकोप

  -  अजय मोहन

जम्मू-कश्‍मीर में जो तपिश जून के मध्‍य में आनी थी, वो मई में ही आ चुकी है। जून की सोच कर लोगों में अभी से भय है। ऊपर से बढ़ती गर्मी के कारण यहाँ के तमाम झरनों और अन्य जल स्रोतों अभी से संकट मँडराने लगा है।

वर्ष 2026 में गर्मी का यह मौसम एक के बाद एक रिकार्ड तोड़ रहा है। पहले अप्रैल में हीटवेव की घटनाओं का चढ़ता ग्राफ और फिर मई महीने में तमाम शहरों में तापमान 45 के पार पहुँचा। बढ़ती गर्मी का असर अब जम्मू-कश्‍मीर की वादियों तक पहुँच गया है। 20 मई को श्रीनगर में 30.7 डिग्री और जम्मू में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ। दोनों ही शहर धीरे-धीरे अपने ऑल टाइम हाई तापमान की ओर बढ़ते दिखाई दिए। श्रीनगर और जम्मू के साथ-साथ राज्य के 9 जिलों में हीटवेव का प्रकोप जारी है।

इस बढ़ते तापमान ने केवल जन-जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि घाटी में बहने वाले झरनों और पीने के पानी पर चिंता बढ़ा दी है।  

जम्मू-कश्‍मीर के विभिन्न जिलों में 10 साल का तापमान रिकॉर्ड 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल मई में सबसे अधिक 30.7 डिग्री तापमान दर्ज हुआ। जबकि मई 2025 में 34.4°C दर्ज किया गया था। पिछले वर्ष मई का महीना बीते 10 वर्षों में सबसे गर्म था। हालाकि श्रीनगर में मई माह में सबसे अधिक तापमान 1968 में दर्ज हुआ था। तब यहाँ पारा 36.4 डिग्री पहुँच गया था। 

2016-2024 के बीच दर्ज सभी अधिकतम तापमानों से अधिक है। इससे पहले पिछले दशक में सबसे अधिक तापमान 32.7°C (2024) और 31.9°C (2016) रहा था। चिंताजनक बात यह है कि श्रीनगर का मई माह का दीर्घकालिक औसत अधिकतम तापमान (24.7°C) से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है।

श्रीनगर के निवासी व वरिष्‍ठ पत्रकार वाहिद भट्ट ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि आम तौर पर इतनी गर्मी जून के मध्‍य में पड़ती है। यहाँ के लोगों को इतनी गर्मी सहने की आदत नहीं है इसलिए लोग परेशान हैं। बीते एक सप्ताह में तो केवल दिन नहीं बल्कि रातें भी गर्म थीं। कल बहुत अधिक गर्मी के बाद जब बारिश हुई तो अचानक ह्यूमिडिटी बढ़ गई और पसीने वाली गर्मी शुरू हो गई। 

घाटी के अन्य शहरों में भी बढ़ा पारा

मौसम विभाग के अनुसार जब किसी पहाड़ी क्षेत्र का तापमान 30 डिग्री के पार पहुँच जाता है तब वहाँ हीटवेव दर्ज कर ली जाती है। श्रीनगर क्षेत्र के अन्य केंद्रों की बात करें तो काज़ीगुंड (अनंतनाग जिले में मौसम का स्टेशन) और पुलवामा जिले में स्थित कोनीबल में पारा 30 डिग्री के पार जा चुका है। वहीं कुपवाड़ा (28.3) और कोकेरनाग (29.2) हीटवेव के करीब पहुँच चुके हैं। कोकेरनाग अनंतनाग जिले में स्थित एक स्टेशन है।  

वहीं जम्मू संभाग में सभी केंद्र हीटवेव की न्यूनतम सीमा को पार कर चुके हैं। जम्मू में 42 डिग्री, बनिहाल (रामबन) में 31, बटोटे में 30.6, रियासी जिले के कटरा में 39 डिग्री, भदरवाह में 30.4 और कठुआ में 43.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ।   

 2016 से 2025 में अधिकतम और न्यूनतम तापमान 

यदि पिछले दस वर्षों के आँकड़ों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कश्मीर घाटी के अधिकांश स्टेशनों में मई के अधिकतम तापमान 30°C से ऊपर पहुँचने लगे हैं। अधिकांश जगहों का तापमान सामान्य से 5 डिग्री अधिक है। पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों, जैसे पहलगाम, गुलमर्ग और बनिहाल में भी तापमान लगातार ऊँचे स्तर छू रहा है। कई स्थानों पर तापमान अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड के करीब पहुँच चुका है। सामान्य अधिकतम तापमान और वास्तविक तापमान के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है।

जम्मू-कश्‍मीर में बढ़ती गर्मी के संभावित प्रभाव

जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के हालिया तापमान आँकड़े इसके स्पष्‍ट सबूत हैं। इनके प्रभाव इस प्रकार हैं- 

• ग्लेशियरों और हिमनदों पर दबाव बर्फ के तेजी से पिघलने की संभावना बढ़ेगी। शुरुआती महीनों में नदियों में अधिक जल प्रवाह और बाद में जल उपलब्धता में कमी आ सकती है। 

• बढ़ते तापमान की वजह से झेलम और चिनाब बेसिन के जल चक्र पर असर पड़ सकता है।

• बागवानी और कृषि की बात करें तो सेब, चेरी, अखरोट और खुबानी जैसी फसलों को आवश्यक "चिलिंग आवर्स" कम मिल सकते हैं। फलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

• समय से पहले फूल आने और बाद में मौसम की मार से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

• झरनों और छोटे जल स्रोतों का प्रवाह घट सकता है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है।

• ऊँचाई वाले क्षेत्रों की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के आवास बदल सकते हैं। कुछ प्रजातियों को और ऊँचे इलाकों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।

झरनों और पेयजल स्रोतों पर बढ़ता संकट

जम्मू-कश्मीर में 6,553 गाँव हैं जहाँ 3,300 से अधिक मीठे पानी के झरने व जलधाराएँ हैं। अधिकांश गाँव पीने के पानी के लिए इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन बीते दो दशकों में आधी से अधिक जलधाराएँ या तो सूख चुकी हैं या फिर छोटी हो गई हैं। 

इस बारे में वाहिद भट्ट ने बताया कि दूर-दराज़ के गाँवों में जलधाराएँ तेजी से प्रभावित हो रही हैं। श्रीनगर के मनगुंड गाँव का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा, “मैं हाल ही में मनगुंड गाँव गया था। वहाँ लोगों से बातचीत में पता चला कि तीन स्प्रिंग ऐक्टिव थे, अब एक ही एक्टिव है। इसमें भी पानी बहुत कम है। जो धाराएँ सूख भी जाती थीं, वहाँ पहले अप्रैल के मध्‍य में पानी आना शुरू हो जाता था; लेकिन अब मई में भी पानी नहीं है।”

रीचार्ज नहीं हो पा रहे भूजल के स्रोत 

जम्मू-कश्मीर में हजारों गाँवों की पेयजल व्यवस्था प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों में कई झरनों के जल प्रवाह में कमी दर्ज की गई है। बढ़ता तापमान इस समस्या को और गंभीर बना सकता है। सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में तेज बर्फ पिघलने से भूजल पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज प्रभावित होता है।

ऊँचे तापमान के कारण मिट्टी से वाष्पीकरण बढ़ता है, जिससे झरनों को पोषित करने वाली भूमिगत नमी कम हो जाती है। कई मौसमी झरने समय से पहले सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहरा सकता है। डायलॉग अर्थ में प्रकाशित एक अध्‍ययन के अनुसार कश्‍मीर निरंतर गर्म हो रहा है, जिसकी वजह से यहाँ के जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं। 1980 से लेकर अब तक राज्य के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के बाद से गर्मी के दिन पहले से अधिक गर्म हुए हैं। 

अध्‍ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है और बीते दो दशकों में  ग्लेशियर 15 प्रतिशत तक सिकुड़ गए हैं। इस वजह से गर्मी का मौसम आते ही प्राकृतिक झरने तेज़ गति से सूख जाते हैं।

हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कैसे पड़ रहा है बढ़ते तापमान का असर?

लखनऊ के जय नारायण पीजी कॉलेज में प्रोफेसर व इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी के काउंसिलर डॉ. चांटिया ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि चूँकि सभी नदियों का प्रमुख स्रोत भूजल होता है और तापमान बढ़ने की वजह से भूजल रिचार्ज धीमा पड़ जाता है और इसके कारण आने वाले समय में हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों का प्रवाह कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जब- जब नदियों के प्रवाह में कमी आती है, तब- तब उसका असर उसके तटों पर बसी मानव सभ्‍यता पर पड़ता है। 

जम्मू-कश्‍मीर में रह रहे लोगों पर कैसे होगा बढ़ते तापमान का असर?

डॉ. आलोक चांटिया एक मानवशास्त्री हैं। उन्होंने बताया कि तापमान का सीधा असर मनुष्‍य के शरीरिक और मा‍नसिक व्यवहार पर भी पड़ता है। आम तौर पर जो लोग मैदानी इलाकों में रहते हैं, उनका शरीर अधिक तापमान को कुछ हद तक झेलने में सक्षम होता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 30 से 40 डिग्री का तापमान असहनीय हो जाता है। शरीर का अंतरिक तापमान जो 37 डिग्री सेल्सियस रहता है वे शरीर की थर्मोस्‍टेट के कारण संतुलित रहता है, लेकिन हीटवेव के कारण जो गलन ऊष्‍म बढ़ती है उसकी तपिश के कारण डीहाइड्रेशन की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है जिससे शरीर में पानी की न्यूनतम क्षमता को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में स्‍वास्थ्‍य संबंधी परेशानियाँ बढ़ सकती हैं। (इंडिया वाटर पोर्टल)

कविताः गर्मी सबको सता रही है

  - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

आसमान से आग बरसती

तपिश धरा को जला रही है,

आकुल-व्याकुल जड़-चेतन सब

गर्मी सबको सता रही है।

 

बिजली पानी के संकट से

महानगर तक जूझ रहे हैं,

जननायक महलों में बैठे

नई पहेली बूझ रहे हैं,

उनके तरण ताल के अंदर

एक जलपरी नहा रही है।

 

नहीं मिलेगी चाय किसी को

भाभी शरबत बना रही हैं,

दोपहरी में अम्मा सबको

पना आम का पिला रही हैं,

प्यासी गौरैया आँगन में

फुदक-फुदक फड़फड़ा रही है।


जेठमास में सूरज दादा

दादागीरी दिखा रहे हैं,

जो भी दिखे सामने उस पर

लू के हंटर चला रहे हैं,

दादी जी लू से बचने के 

सौ-सौ नुस्खे बता रही हैं।

  

बजा-बजा घंटी गलियों में

अनवर कुल्फी बेच रहा है,

माथे पर बह रहा पसीना

बार-बार वह पोंछ रहा है,

लिये एक कुल्फी मजदूरिन

दो बच्चों को चटा रही है।

 

नए आँकड़े तापमान के

रोज- रोज चढ़ते जाते हैं,

ए सी में बैठे साहब जी

चिंतित बहुत नजर आते हैं,

गर्मी में बाहर मत निकलो

टी वी एंकर बता रही है।

संस्मरणः उसकी ख़ुशी !

  - निर्देश निधि 

उसके पिता, डॉक्टर साहब यानी मेरे पति के बहुत पुराने मरीज़ थे। हमारे घर में होने वाले राज - मिस्त्री के सब काम भी वे ही करते । उनकी सात - आठ औलादों में से वह सबसे छोटा और ऊधमी था । उसके दूसरे भाई भी पढ़े - लिखे नहीं थे। पर उन सबको हाथ की कारीगरी आती थी । उसके पिता चिंतित थे: क्योंकि उसे हाथ की कारीगरी में भी रुचि नहीं थी। डॉक्टर साहब ने उन्हें समझाया कि चिंता न करें, अगर वह नहीं भी पढ़ा - लिखा तो अपने भाइयों की तरह एक दिन हाथ की कारीगरी तो कम से कम सीख ही जाएगा । पर उसके पिता उसे पढ़ा - लिखा कर सभ्य बनाना चाहते थे अतः डॉक्टर साहब से ही ज़िद करने लगे कि उसे अपने घर रख लें, ताकि वह कुछ सीख जाए, आदमी बन जाए । उनका मानना था कि हमारे घर रह कर उसकी उद्दंडता भी कम हो जाएगी और हमारे बेटे वरुण को देख - देख कर वह सभ्य और पढ़ने - लिखने वाला बन जाएगा। डॉक्टर साहब के अनुसार उसके पिता भले आदमी थे और उनके बहुत पुराने मरीज़ भी । कई बार मरीजों से डॉक्टर का रिश्ता बहुत घनिष्ठ और विश्वास का बन जाता है, अक्सर डॉक्टर साहब का रिश्ता भी ऐसा ही विश्वसनीय होता, अपने मरीजों के साथ । डॉक्टर साहब की सादगी, उस विश्वास में अपनत्व का रस और घोल देती और बहुत सारे मरीज़ उनके बिल्कुल आत्मीय बन जाते । उसके पिता भी डॉक्टर साहब के उन आत्मीयों में से एक थे। अतः डॉक्टर साहब को उनके बेटे को अपने घर रख लेने की ज़िद माननी पड़ी । करीब बारह – तेरह बरस का कुछ - कुछ पक्के रंग का, बड़ी - बड़ी आँखों वाला वह चपल लड़का हमारे घर रहने आ गया। पढ़ाने – लिखाने का सारा सामान डॉक्टर साहब खुद लेकर आए । वह खूब चंचल- सा हमारे घर में यहाँ से वहाँ उछलता - कूदता फिरता, उसने हमारे घर आकर एक दिन की भी तो औपचारिकता नहीं दिखाई थी । उसके आने से घर में थोड़ी चहल - पहल तो बढ़ ही गई, हम सबका भी मन बन गया कि वह हमारे घर से पढ़ – लिखकर ही जाए। पर दिमाग तेज़ होने के बावजूद वह पढ़ाई - लिखाई की बातें बहुत जल्दी सीख नहीं पाता था । शायद उसका दिमाग कहीं और ही चलता था । पर कहाँ ? यह खोज नहीं पाए हम और उसे उसकी मंथर गति से ही सही, पर पढ़ाते रहे । वह गाना खूब सुरीला गाता था । हँसता - बोलता खूब, हँसी - मज़ाक में वह अक्सर अपनी सीमा भूल जाता। खैर हम उसे बच्चा समझकर कभी माफ कर देते, पर कभी - कभी टोकना, समझाना भी पड़ जाता। जो भी हो: पर यह तो निश्चित हो गया कि वह पढ़ - लिखकर समझदार और बड़ा होने तक हमारे घर में ही रहेगा । इसी बीच वरुण को आई आई टी मे प्रवेश की कोचिंग दिलाने के लिए मुझे उसके साथ दिल्ली जाकर रहना पड़ा । डॉक्टर साहेब को अब अकेले रहना था: अतः अब उसका घर में होना मुझे सार्थक लगने लगा । खाना बनाने वाली दोनों का खाना बना जाती और वह डॉक्टर साहेब को खाना लगाकर दे देता, पानी वगैहरा पिला देता और रात में अपनी छोटी- सी पलकी उन्हीं के बेडरूम में डाल लेता और सो रहता। अपनी अनुपस्थिति में उसका घर पर होना मुझे आश्वस्त करता कि डॉक्टर साहब अकेले नहीं हैं । कोई उनके साथ है और मेरी चिंता उन्हें लेकर थोड़ी कम हो जाती । जब कभी वरुण की छुट्टी में हम दोनों यानी वरुण और मैं दिल्ली से आते तो वह बहुत खुश होता । अपने आने पर उसकी वह खुशी मुझे बहुत अच्छी लगती। खुशी तो वैसे भी खुश होने की ही बात होती है। अतः जब भी वह खुश होता, मुझे और भी प्यारा लगता । जब हम घर आते तो वह एक - दो दिन के लिए अपने घर भी जाता, मैं उसे भेज देती, ताकि वह अपनी माँ-पिता और अपने दर्जन भर बहन - भाइयों मिल आए  । 

उस बार भी वह अपने घर गया था, सिर्फ एक दिन के लिए। अब उसका मन अपने घर में लगता नहीं था। अगले दिन वह सुबह नौ - साढ़े नौ बजे ही वापस आ गया था । उस दिन उसके चेहरे की रंगत ही कुछ अलग थी । बहुत - बहुत - बहुत ही खुश लग रहा था, उस दिन वह । मैंने सोचा अपने घर गया था, परिवार से मिलने की खुशी तो होती ही है अलग, वही उसके चेहरे को इतना प्रफुल्लित दिखा रही है। वह लगातार कोई गाना गुनगुना रहा था। मैंने पराठा बनाते - बनाते उससे यूँ  ही पूछ लिया, “आज तो तू बहुत खुश लग रहा है क्या बात है ?“ इस पर वह मेरा वाक्य खत्म होते ही उछलकर चलता हुआ चुटकी बजाकर बोला, “हाँ आंटी जी, आज मैं बहुत खुश हूँ”, मैंने यूँ ही काम करते - करते सामान्य भाव से कहा,  “हाँ खुश तो होना ही हुआ अपने घर जो गया था । माँ – बाबा, बहन भाइयों से मिलकर जो आया है ।’’ 

वह बोला,  “अरे नहीं आंटी जी इसमें खुश होने वाली कौन सी बात है, वे कहाँ जा रहे, वे सब तो हैं ही ।’’

मैंने उसी लापरवाही से फिर पूछ लिया, “तो तू ही बता भाई,आज ऐसी कौन सी नई बात हो गई जो तुझे इतना खुश कर गई ।’’

 इस पर वह मेरे बिलकुल पास आकर बोला, “आंटी जी आज मैंने एक रिक्शा वाले का खून होते देखा ।’’ 

“क्या ?” बस यही निकल पाया मेरे मुँह से और मैं तवे पर पराठा यूँ ही छोडकर उसकी तरफ घूम गई। मेरे हाथ पाँव जड़ हो गए, लगा जैसे मेरे दिल पर किसी ने बहुत ज़ोर से हथौड़ा दे मारा था, दिमाग बिजली के करंट से झनझना उठा था जैसे । मेरे “क्या” के उत्तर में उसने अपनी बड़ी - बड़ी भूरी आँखों में कुछ अधिक ही चमक भरकर वही शब्द दौहराए, “हाँ आंटी जी आज मैंने एक रिक्शा वाले का खून होते देखा ।’’ 

मैं सन्न रह गई थी । कुछ कहते नहीं बना मैं बस उसकी तरफ देखे जा रही थी। तवे पर पड़े पराठे का ध्यान ही नहीं था मुझे । वह खुद ही बोला आंटी जी पराठा जल गया आपका। मैंने खुद को थोड़ा सँभाला, ताकि वह मुझे डरा हुआ न समझे और उससे स्वतः थोड़ी कड़ी हो गई आवाज़ में पूछा, “तुझे डर नहीं लगा खून होता देखकर ?” 

इस पर जो वह बोला उसने तो मेरे पैरों तले की ज़मीन ही हिला दी।  “आज मैंने आदमी का खून होते पहली बार देखा, पर डर किस बात का आंटी जी मुझे तो खून होता देखकर बहुत मजा आया, बहुत खुशी हुई ।’’

“आदमी का ख़ून होते देख कर तुझे मज़ा आया ?” मैं लगभग चीख़ पड़ी । पर मैं किस पर चीख रही थी भला, जिसे ख़ून  देखकर मज़ा आया था । यह सोचकर मैं चुप हो गई; पर उस बारह - तेरह बरस के बच्चे की उपस्थिति मुझमें अजीब- सा भय भर रही थी । वह और भी भयावह शब्द बोला, “ ख़ून तो ख़ून होता है आंटी जी, चाहे आदमी का हो या बकरे का ।’’ इस बार मैं उसे कुछ नहीं कह सकी थी । मैंने अपने डर से भरे शब्द “क्या?’, को भी अपने भीतर ही निगल लिया था, बस उसकी तरफ अपलक देखती रही थी । उसकी जिन आँखों में मुझे खुशी बहुत प्यारी लगती थी, आज उन्हीं आँखों में मुझे खुशी के रूप में भयानक क्रूरता खड़ी साफ़ दीख रही थी । सच कहूँ, तो बहुत देर तक देखती भी नहीं रह सकी थी मैं तो उसे । वह मेरी मनःस्थिति तो क्या ही समझ सका होगा ख़ैर। वह मुस्कुराया और गुनगुनाते हुए गर्दन को झटका देकर पीछे मुड़ गया और कूदता हुआ वरुण के रूम की तरफ चला। “नहीं, वहाँ मत जा….“  तीखी हो आई आवाज़ में चिंता से भरा हुआ यह वाक्य मेरे मुँह से अनायास ही निकला । उससे किस कदर भयभीत हुई थी मैं उस दिन कि अपने बेटे पर उसका साया भी तो नहीं पड़ने देना चाहती थी । उससे भयभीत होने का कारण सिर्फ वह दिन नहीं था; बल्कि आने वाला कल था, भविष्य था उसका, जिससे मुझे भय लग रहा था । यह सोचकर भयभीत हुई थी मैं कि वह डॉक्टर साहब के साथ, उनके कमरे में सोता था । क्या पता उसे कब ख़ुश होने का मन करने लगता, कब उसे “मज़ा” लेने की तलब हो आती । पर उसने कोई अपराध नहीं किया था कोई सबूत नहीं था मेरे पास । बेशक उसने अपराध नहीं किया था; पर यह घटना अपराध का प्रिल्यूड तो अवश्य ही कही जा सकती थी । तो क्या उसे अपराध करने देने के लिए समाज में छोड़ दिया था मैंने ? और मैं कर भी क्या सकती थी, वह कोई अपराधी तो साबित हुआ नहीं था । भविष्य में कोई अपराध करेगा, इसकी तो कोई गारंटी नहीं होती, अगर हाँ भी तो भविष्य में किए जाने वाले अपराध की तो कोई सज़ा वर्तमान में नहीं होती, इसके सिवा जो मैंने उसे दे दी थी । हमेशा उसकी खुशी में मुझे खुशी दिखाई देती थी पर उस दिन मुझे उसकी खुशी में एक भय, अजीब- सी कसमसाहट, उकताहट और बेचैनी महसूस हो रही थी । मैं जैसे उसे अपने घर में देखना ही नहीं चाहती थी, जैसे मैं उसे खुश होते देखना ही नहीं चाहती थी, उसकी उस दिन की ख़ुशी का कारण मुझे विचलित किए दे रहा था । उसके द्वारा सब ख़ून एक जैसे बताया जाना भयभीत कर रहा था । असल में तो सब ख़ून होते ही हैं एक जैसे; परंतु फिर भी अपने स्वार्थ के लिए आदमी ने, ख़ुद का ख़ून सबसे अलग मान लिया है,श्रेष्ठ मान लिया है। 

अगले ही दिन मुझे डॉक्टर साहब को अकेले छोड़कर वरुण के साथ दिल्ली चले जाना था । मेरे बेटे के भविष्य का प्रश्न था, पति की सुरक्षा का प्रश्न था, अतः उसे सुधारने का जिम्मा यानी उसमें संवेदनशीलता जगाने का जिम्मा मुझे मूर्खतापूर्ण ही लगा था । वह मेरे लिए ना तो संभव था, ना ही उसकी कोई तुक थी, फिर मुझे तो दिल्ली चले जाना था, उसे दिन भर घर पर अकेले ही रहना था । अकेले में या डॉक्टर साहब के साथ उसका खुश होने का मन हो जाता तो...? मैं इस कल्पना से भी काँप उठी थी । 

डॉक्टर साहब को खाना लगकर दे देने या पानी पिला देने के बदले में हमने उसे पढ़ाने – लिखाने, खाना - पानी, कपड़े – लत्ते, जूते - चप्पल आदि देने के अतिरिक्त उसकी थोड़ी पगार भी रखी थी, जिसे वह एक साल में लेने वाला था इकट्ठी । जिसे उसने बैंक में पिता के खाते में डालने से साफ इंकार कर दिया था, जिसे खर्च करने का पूरा प्लान था उसके पास । पर अब उसे पगार देने के लिए एक साल की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी । मुझे सब निपटाना था तभी के तभी, अपने दिल्ली जाने से पहले ।  

मैंने निर्णय ले लिया था । डॉक्टर साहब दोपहर लंच ब्रेक में आए, तो मैंने यह घटना बताकर साथ ही अपना निर्णय भी उन्हें बता दिया था। कि उसे जाना होगा आज के आज । डॉक्टर साहब उसे समझाना चाहते थे; पर मुझे उस पर तनिक भी विश्वास नहीं था । बारह - तेरह बरस की आयु में जिसके मन में इस कदर क्रूरता भरी थी कि उसे किसी मनुष्य की हत्या होते देखकर इतनी ख़ुशी हुई थी कि छिपाए नहीं छिप रही थी, वह समझ भी कैसे सकता था, यह मेरी समझ के बाहर था । इसे डॉक्टर साहब का अति उदार मन ही समझ सकता होगा ; परंतु अगर उसे अपने साथ ना रखकर हमारे साथ छोड़ना होता, तब सम्भवतः उनका मन भी उतना उदार ना हो पाता । वह ऊपरी भाव थोड़े ही थे उसके, उनकी जड़ें तो उसकी नीव तक रही होंगी । डॉक्टर साहब को उसके नेकदिल पिता का ध्यान आया कि जब वे पूछेंगे, तो मैं क्या कहूँगा कि इसे घर में क्यों नहीं रख सकता । तो मैंने उनसे यही कहा कि कह देना दिन भर अकेला बच्चा यहाँ भी बिगड़ ही जाएगा । वे फिर भी एक बार सोच लेने के लिए कहने लगे; पर मैंने उनकी एक नहीं सुनी । उसके नेक पिता की नेकी मैं उसमें नहीं देख सकती थी । उसी दोपहर उसके सारे पैसे दिये, उसका सारा सामान एक बड़े थैले में भरवाया और पूछा- ‘’कुछ और भी चाहिए ?’’ जिस पर उसने मोहम्मद रफी के गानों की कुछ सी डी भर माँगीं । मैंने उससे कहा कि जो उसे पसंद हों, वह ले ले । उससे कहा कि वह अपने घर जाए अब, हमारे घर में उसकी ज़रूरत नहीं है । उसकी पढ़ाई में वहीं मदद कर दिया करेंगे । यह तो उसने सोचा नहीं था, घर जाने के नाम पर वह हतप्रभ सा खड़ा रह गया । अब हमारे घर का ऐशो – आराम उसे नहीं मिलने वाला था । आठ दस बहन – भाइयों में बँट – बुँटकर मिलने वाले खाने की जगह, बिना कुछ किए जो भर पेट और स्वादिष्ट भोजन उसे हमारे घर में मिल रहा था, अब वह नहीं मिलने वाला था। बढ़िया साबुन, बढ़िया शैंपू अब अतीत होने वाले थे  । थोड़ा – बहुत पढ़ने के बाद, सारा दिन घर पर खाली पड़ा रहता था वह, कभी म्यूज़िक सिस्टम पर गाने सुनता, कभी टी वी पर पिक्चर देखता । सारा दिन का धमाल था उसका तो । ऊपर से डॉक्टर साहब खाने – पीने के खूब शौकीन, तो खूब मिठाई और फल लाते, खुद भी खाते उसे भी खूब खिलाते, आख़िर उनके पुराने और प्रिय मरीज का बेटा जो था। अब वह सब मौज भी नहीं होने वाली थी। चिलचिलाती गर्मियों में एयर कंडीशनर की शीतलता भी अब नसीब नहीं होने वाली थी । सो कई बार बोला- “पर क्यों आंटी, क्या हुआ ? क्या हो गया आंटी ? मुझे तो बड़े होने तक यहीं रहना था आपके घर में।” 

उसके उत्तर में मेरे मुँह से अनायास ही निकला था, “पर तू तो बड़ा हो भी गया ।” उसने जाते वक्त काफ़ी उदास होकर मुझे नमस्ते की थी;  पर विडम्बना तो यह रही कि मैं उसे ‘खुश’ रहने का आशीष भी नहीं दे सकी। 

लघुकथाः हाथी के दाँत

- विष्णु नागर

हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और, लेकिन बच्चों को उसके खिलौने के दाँत प्रिय थे, क्योंकि वे सुंदर थे। बड़ों को भी वे प्रिय थे, क्योंकि कीमती थे। एक बार बच्चे हाथी के पास गए। उन्होंने कहा, ‘‘हाथी दादा, हाथी दादा, अपने दाँत हमें दे दो।’’

हाथी ने कहा, ‘‘खाने के तो दे नहीं सकता। दिखाने के चाहो तो ले लो।’’

‘‘हाँ–हाँ, हमें दिखाने के ही चाहिए। बड़े सुंदर हैं। हम इनसे खेलेंगे।’’ बच्चों ने एक स्वर से कहा।

‘‘लेकिन बड़े तुम्हें खेलने देंगे?’’ हाथी ने कहा।

बच्चों ने कहा, ‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं? बड़ों को हमारे खेलने से कोई एतराज नहीं है। वे तो बस इतना चाहते हैं कि हम खतरनाक चीजों से न खेलें।’’

हाथी ने व्यंग्य से मुस्कराकर कहा, ‘‘ये भी खतरनाक हैं।’’

‘‘नहीं, आप झूठ बोलते हैं। खतरनाक नहीं है।’’ बच्चों ने उत्तर दिया। 

हाथी ने कुछ सोचकर कहा, ‘‘अच्छा चलो, ले जाओ मेरे दाँत। बड़े जब मेरे दाँत माँगें तो कहना, हाथी से सावधान, हाथी की पूँछ भले ही छोटी हो, उसके पाँव बहुत भारी होते हैं। वे आदमी को कुचल सकते हैं। फिर भी वे माँगें दाँत तो कहना, सावधान, हाथी को अपने दिखाने के दाँतों से भी उतना ही प्यार होता है, जितना खाने के दाँतों से, और हाथी दूर भी नहीं है। यहीं–कहीं है।’’

बच्चे घर आए। हाथी के दाँत लाए। बड़ों ने देखे। बड़े बच्चों के लिए बड़े–बड़े तोहफे, सुंदर–सुंदर खिलौने लाए। उन्हें सैर के लिए ले गए। बच्चे हाथी के दाँतों को भूल गए। बड़े गुपचुप उन्हें ले गए और उन्होंने अपना काम कर लिया।

उधर हाथी बहुत खुश रहा करता कि बच्चे उसके दाँतों से खेल रहे होंगे। और एक दिन, जब वह बच्चों की खुशी का अंदाजा लेने आया, तो बच्चे बड़े हो चुके थे।

स्मृति शेषः नर्मदा लड़ाई के साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे

 नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ लेखक, शोधकर्ता और पर्यावरण चिंतक रमेश बिल्लौरे का रविवार 10 मई
के दिन दोपहर इंदौर में निधन हो गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने उन्हें नर्मदा संघर्ष का ‘चलता-फिरता दस्तावेज’, ‘घुमक्कड़ बुद्धिजीवी’ और ‘नर्मदा का सच्चा पुत्र’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

रमेश बिल्लौरे नर्मदा घाटी के सवालों पर उस दौर से काम कर रहे थे, जब नर्मदा बचाओ आंदोलन औपचारिक रूप से आकार भी नहीं ले पाया था। बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों को लेकर उन्होंने शुरुआती दौर में ही गंभीर अध्ययन शुरू कर दिया था और लगातार सवाल उठाए। बाद में यही चिंतन नर्मदा संघर्ष की वैचारिक ज़मीन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

बांधों की राजनीति और विकास के मॉडल पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत मानी जाती है पुस्तक डेमिंग दी नर्मदा: इंडियाज़ ग्रेटेस्‍ट प्‍लांड डिसास्‍टर जिसे उन्होंने पर्यावरण चिंतक क्‍लॉड अल्‍वारिस के साथ मिलकर तैयार किया था। 1988 में प्रकाशित यह अध्ययन नर्मदा परियोजना की शुरुआती तथ्यपरक आलोचनाओं में गिना जाता है। इसे नर्मदा आंदोलन के शुरुआती दस्तावेज़ों में एक महत्त्वपूर्ण कृति माना गया है। 

रमेश बिल्लौरे का नर्मदा से रिश्ता केवल विचार या आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह जीवन का रिश्ता था। नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथी बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नर्मदा घाटी, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण न्याय और जनसंघर्षों के सवालों को समर्पित कर दी।

वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे; वे अनेक विषयों के गंभीर अध्येता, लेखक और संवेदनशील साहित्यकर्मी भी थे। बांधों, विकास और विस्थापन पर उन्होंने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे। सामाजिक प्रश्नों के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, लोकजीवन और राजनीति पर भी उनकी पकड़ थी।

रमेश बिल्लौरे की पहचान एक घुमक्कड़, आत्मीय और बेहद जीवंत इंसान के रूप में थी। उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था—दोस्तों के घर, आंदोलन के मोर्चे, गांवों की चौपालें और संघर्ष के मैदान ही उनका घर थे। वे छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं और जीवन के अनुभवों को इतने रोचक अंदाज़ में सुनाते थे कि कठिन संघर्षों के बीच भी हंसी और ऊर्जा का माहौल बन जाता था। (स्रोत फीचर्स)

कविताः पीछे मुड़कर देखा जो मैंने

 - रमेश बिल्लौरे

फुरसत के समय

पीछे मुड़कर जो देखा

हुआ अवाक्

देख वह राह

चला जिस पर

हुआ विस्मय

देख उन मोड़ों को

मुड़ा जिन पर

लगा जैसे मैं देख रहा जो

पीछे मुड़ वो मेरी नहीं

किसी और की थी जिन्दगी

जो बीत गयी

जिसमें सब कुछ

अनियोजित

अव्यवस्थित

अनिश्चित!

हर बार जब मैं चौराहे पर ठहरा

तय करने के लिए कि

आगे जाना किधर

जाने-अनजाने

मैंने वही राह ली जो औरों ने नहीं ली

जो थी अपरिचित

मगर मुझे जरा भी 

नहीं हुआ अफ़सोस इस पर

आखिर अनजानी ही सही

मैं पहुँचा वहीं

जहाँ मुझे जाना था

और देख पाया तो

 कुल मिलाकर खूबसूरत ही रहा सफ़र!

(29 सितंबर 2005)


किताबेंः साहित्य का सुहाना सफ़र

  - रमेश कुमार सोनी

पुस्तकः मैं सफ़र में हूँ (साहित्यिक विमर्श), लेखक - रामे
श्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य- 400/-₹,   पृष्ठ-152, ISBN:978-93-6423-487-0,अयन प्रकाशन-दिल्ली 2026

भूमिका में रचनाकार की संवेदनात्मक अनुभूतियों की झलक होती है, जिसके द्वारा पाठक यह तय करता है कि वह उस साहित्य में प्रवेश करे या नहीं। यह किसी की साहित्यिक प्रतिभा का प्रोत्साहन है, इसके द्वारा लेखक अपनी रचनात्मकता को परखता भी है। इसी के द्वारा कोई पाठक, रचनाकार के दृष्टिकोण से परिचित होकर अपना तादात्म्य स्थापित करता है। 

 समीक्षा/ आलोचना किसी साहित्य विधा का मूलतः वह विस्तृत अवलोकन है, जो रचना का सूक्ष्मता से आकलन करते हुए उसकी अच्छाइयों से पाठकों को अवगत कराता है एवं कमियों की सलाह देता है। 

 यह विधा चुनौतीपूर्ण है। इसमें भिन्न समयावधि में कई साहित्यकारों के अंतःकरण को बाँचना होता है। सावधानी ये रखनी होती है कि हमारे शब्द रचना के साथ न्याय करें। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एक ऐसे वरिष्ठ साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जो एक नियत समय में इतने सारे रचनाकारों के साथ चल पाने में सफल हुए हैं। 

 भूमिकाओं/समीक्षाओं के पृथक् संग्रह इन दिनों प्रकाशित हो रहे हैं जिनका स्वागत किया जाना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ को किसी विधा विशेष की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। जिसने जब भी मार्गदर्शन लिया, उसे प्रोत्साहन मिला है। आपका इससे पूर्व अलग-अलग विधाओं के अनेक संग्रह/संकलन प्रकाशित हो चुके हैं एवं अनेकों का संपादन भी किया है।

‘मैं सफ़र में हूँ’ में 22 भूमिकाएँ, 06 समीक्षाएँ एवं एक साक्षात्कार तथा एक अभिमत सम्मिलित हैं। आपने एक प्रख्यात साहित्यकार होने के नाते इसके माध्यम से रचनाकर्म में चक्रव्यूह की तरह प्रवेश, परिचय एवं परख को स्पष्टता के साथ रेखांकित किए हैं। विविध विधाओं में एक साथ जीना और उनके साथ न्याय कर पाना भी एक बड़ी बात है। 

 इसमें साहित्य की विविध विधाओं उसकी शैली और समकालीनता पर आपके विचार मूल्यवान् हैं। इन विधा में शामिल हैं- लघुकथा, कहानी, लोककथा, हाइकु, ललित निबंध, कविता संग्रह, बाल कहानी, व्यंग्य, हास्य-व्यंग्य, हाइकु, रामचरित मानस-धर्म/जीवन बोध ग्रन्थ, यात्रा-संस्मरण, पत्र लेखन, अभिमत एवं शौर्य-गाथा संस्मरण। 

इस विमर्श की लेखकीय पंक्ति के अनुसार-     

   ‘....रचना-कर्म स्वतः स्फूर्त होता है; अतः उसका अंतिम लक्ष्य कुछ नहीं होता, मेरा भी कुछ नहीं है।’ (7) 

 ‘....संवेदना शून्य हृदय से केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता…।’ (11) 

‘....कथ्य को सपाटबयानी में प्रस्तुत न करके सांकेतिक रूप से प्रस्तुत करना कठिन है। यह काठिन्य ही उसका सौंदर्य है….। ’ (29)

‘...लेखक को जनमानस की पीड़ा परखनी होगी, उसे वाणी देनी होगी।  लेखक का 'व्यक्तिगत' अगर रचना में भी सिर्फ 'व्यक्तिगत' बना रहता है, तो वह कुण्ठा और आरोप से ऊपर नहीं उठ सकता। व्यक्ति का विस्तार समाजगत होना चाहिए, तभी उसकी सार्थकता है। 'व्यक्ति' तक सीमित रहकर कोई अनुभूति रचना का रूप धारण नहीं कर सकती।’(33) 

‘....भाव, विचार, कल्पना एवं चिन्तन को मूर्त रूप देने के लिए चित्रकार और कवि को पहले उसे मानस पटल पर जीवन्त करना होता है।…’(36)

‘....सक्षम भाषा होने पर ही दूसरे व्यक्तियों से संवेदना साझी की जा सकती है। यहाँ पर वह व्यक्ति भी विशिष्ट है, जो दूसरों के अनुभव को उसी स्तर पर अनुभव करता है। अच्छा रचनाकार वह है, जो अपने अनुभव-संसार को सामान्यीकृत करके एक बड़े वर्ग तक सम्प्रेषित करता है। सामान्यवर्ग तक अपनी अनुभूति सम्प्रेषित करना भी एक कौशल है।..’(41)

‘.....रचनाकार को समझने के लिए उसके अनुभव-जगत तक पहुँचना आवश्यक है। सीमित अनुभव और संकीर्ण चिंतन से इनकी रचनाओं के केंद्रीय भाव तक पहुँचना कठिन है। …’ (46)

 ‘.... यह अनुभूतिपरक सम्प्रेषण है। इतनी संयमित शब्दावली में अर्थ का संधान कठिन है। दरिद्र भाषा, सपाट और उथला चिन्तन, उलझी अनुभूतियाँ एवं मृतप्राय कल्पनाएँ किसी भी विधा के लिए संजीवनी नहीं बन सकती। …’ (82)

 इस तरह के विधात्मक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रत्येक साहित्यकार को पढ़ना एवं अपनाना चाहिए जिसे आपने दिया है। आपकी साहित्यिक यात्रा  का यह संग्रह पाठकों को एक साथ बहुत सी विधाओं की जानकारी उपलब्ध कराने में सफल है। यह स्पष्ट है कि साहित्यकार होने की अनिवार्य शर्त है, उसमें संवेदनशीलता एवं मानवीयता होनी चाहिए। 

आपके इस साहित्यिक यात्रा का सफ़र सुहाना रहे, नवलेखकों को आपका आशीर्वाद/स्नेह प्राप्त होता रहे यही मेरी शुभकामनाएँ हैं। 

इस साहित्यिक विमर्श के लिए-हार्दिक बधाई।

लघुकथाः पहली बार

- रामकुमार आत्रेय

चिड़िया ने देखा कि बाज अपने पंख फैलाए, गोली–की–सी तेजी से उसी की ओर उड़ा चला आ रहा है। दो–चार क्षणों में ही वह उसे अपने पंजों में दबोचकर अपना भोजन बना डालेगा। अचानक उसके मन में आया कि उसे बाज का भोजन बनना ही है, तो फिर क्यों न वह उसका मुकाबला करती हुई भोजन बने। उसके खुद को बचाने के लिए विपरीत दिशा में उड़ने की अपेक्षा सीधे बाज की ओर उड़ना शुरू किया, मानों वह सीधे उसी से जा टकराएगी। उसने अपनी चोंच आगे को निकाली हुई थी। बाज ने ज्यों ही चिड़िया को गोली–की–सी तेजी से अपनी ओर झपटते देखा, तो पहली बार, क्षण भर के लिए उसे अपने दिल में एक कँपकँपी–सी महसूस हुई।

अप्रत्याशित खतरे की आशंका से वशीभूत बाज ने न चाहते हुए भी अपना रास्ता बदल लिया और दूर कहीं उड़ गया। चिड़िया ने जब बाज को किसी कायर की तरह भागते हुए देखा, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने मन ही मन निश्चय किया कि बाज से बच निकलने का यह अनोखा तरीका बाकी सभी चिड़ियों को भी बतलाएगी; इसीलिए वह दूर उड़ती चिड़ियों के झुंड की ओर उड़ चली।

कहानीः साँप का श्राप

  - हरी राम यादव 

गर्मियों का मौसम था, उमस खूब हो रही थी। मैं जल्दी जाने के चक्कर में सड़क को छोड़कर पगडंडी से होकर जा रहा था। सहसा मेरा ध्यान पगडंडी की दाहिनी ओर छोटी-छोटी कटी हुई झाड़ियों की ओर गया। मैंने देखा एक साँप अपने परिवार के साथ कटी हुई झाड़ियों के पास बैठा कुछ बातें कर रहा था। मैं वहीं रुककर उनकी बातें सुनने लगा। साँप काफी बुजुर्ग तथा अनुभवी लग रहा था। वह अपने बच्चों से कह रहा था कि अब मनुष्यों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। वे अब पहले जैसे नहीं रहे। हमारे जवानी के दिनों में इंसान इतना बलवान और निडर होता था कि फर्लांग भर खदेड़कर हमें पूँछ से ऐसे पकड़ लेता था, जैसे कि कोई मूली हो।

अब तो इंसान के बच्चों के पास वह ताकत कहाँ है? वे कीटनाशकों से सनी हुई सब्जियाँ लेकर आते हैं, जिन्हें खाकर वे बीमार और कमजोर हो रहे हैं। तुम्हें खदेड़कर पूँछ से पकड़ने और मारने की ताकत उनमें अब कहाँ है? चार कदम दौड़ने पर उनकी साँसें मेले में बिकने वाले गुब्बारे की तरह फूल जाती हैं। उनके मुँह से लोहार की धौंकनी की तरह आवाज़ निकलने लगती है। उनके पास तो अब लाठी-डंडा भी नहीं है। जंगल तो वे खुद काट चुके हैं। लाठी-डंडा कहाँ से लाएँगे? वे तो अब खुद बेचारे हैं। उनके पास तो अब हथियार के रूप में केवल राजनीतिक दलों का झंडा है। वह हड़ताल, धरना, प्रदर्शन भी नहीं कर सकते, उस पर भी देश और प्रदेशों की सरकारों ने रोक लगा दी है।

इंसानों के बच्चों को अब दूध, दही, घी भी नहीं मिल रहा है। दूध देने वाली गाय और भैंसें तो बीते ज़माने की बात हो गई हैं। उन बेचारियों की भी शामत आ गई है। मांस के कारोबारी उन्हें काट-काटकर दूसरे देशों में भेजकर मोटा माल कमा रहे हैं। जिन इक्के-दुक्के लोगों ने पाल भी रखा है, वे लोग एकदम भोर में दूध को बाज़ार में बेच आते हैं। बच्चों को पता ही नहीं चलता कि दूध कहाँ गया। अब तो इंसानों की माताएँ भी अपने बच्चों को दूध नहीं पिलातीं। अब तो इंसानों का यह डॉयलाग— "माँ का दूध पिया है तो सामने आओ, नहीं तो जाकर आँचल में छुप जाओ" भी झूठा हो गया है। न तो उन बेचारों को माँ का दूध पीने को मिल रहा है और न ही अब आँचल में छुपने की जगह रही। उनकी माताओं ने साड़ी पहनना छोड़ दिया है। और तो और अब उनकी आधुनिक मम्मियाँ 'छठी का दूध' भी नहीं पिलातीं, जिससे कि उन्हें कोई समस्या होने पर दूध की याद आए। बेचारों के बच्चे तो अब पाउडर से बना दूध पी रहे हैं। उस दूध को भी न जाने मुनाफाखोरों ने क्या-क्या मिलाकर बनाया होगा। माँ का दूध और आँचल दोनों भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति से दूर चले गए हैं।

जिस तरह से इंसानों ने जंगल तथा पेड़-पौधों को काटकर हमारे रहवास को छीना है, हमारी पुश्तैनी बिलों के ऊपर अपने लिए मकान बना रहे हैं, वह हमारी जाति को ललकार रहे हैं। हमारी श्रृंखला को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। वे प्रकृति की श्रृंखला को भूल चुके हैं। उन्हें यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि सभी जीवधारी एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। यदि हम नहीं रहे तो खतरा मनुष्यों के ऊपर भी बढ़ेगा। हमारी बिरादरी फसलों तथा इंसानों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट-पतंगों को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती है, जिससे उनकी फसलों की सुरक्षा होती है। हम हर हाल में उनसे मित्रता रखना चाहते हैं, लेकिन इंसान इस बात को समझ नहीं रहा है। वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है।

उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि ईश्वर ने हमें ऐसी आँखें दी हैं, जिससे हम किसी भी तस्वीर को उनमें कैद करके रख सकें; लेकिन हम ऐसा कम ही करते हैं। हम ऐसा तभी करते हैं जब कोई हमारे परिवार को नुकसान पहुँचाता है, हमारे ही सामने हमारे परिवार के सदस्य को बेरहमी से पीट-पीटकर मार देता है। इंसानों! मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपके परिवार को कोई नुकसान पहुँचाता है तो उसे आप माफ़ कर देते हो? आपको तो विधाता ने बुद्धि दी है, हम साँपों को तो उससे दूर रखा है।

हम तो एक दोस्त के नाते इंसानों को देखते ही उनसे दूर रहने की कोशिश करते हैं कि कहीं वे हमसे डर न जाएँ। हमारे साथ तो प्रकृति ने भी क्रूर मजाक किया है, उसने हमें कान नहीं दिए हैं। हम तो केवल धरती के स्पर्श से अनुभव करके अपना काम चला रहे हैं, लेकिन इंसान को तो प्रकृति ने आँख, नाक, कान सब कुछ दिया है। तब भी वह अंधे की तरह हमारे ऊपर पैर रख देता है। बहरे की तरह उसको हमारी आवाज़ सुनाई नहीं देती है, जबकि आहट पाते ही हम लोग आवाज़ करते हैं। यदि हम अपने बचाव में मनुष्य को काट लेते हैं तो इसमें हमारी क्या गलती है? गलती तो इंसान की है न, कि उसके पास आँख, नाक, कान सब कुछ होते हुए भी हमारे ऊपर पैर रख रहा है।

मैं उन्हें यह शाप देता हूँ कि जिस तरह से उनसे उनकी माँ का आँचल छिन गया, जिस तरह से उनसे उनकी माँ का दूध छिन गया और जिस तरह से पेड़-पौधों के अभाव में उनसे उनकी साँसें छिन रही हैं, वैसे ही उनसे उनका हर आश्रय छिन जाए। उनको आश्रय देने वाले उनके बच्चों को नौकरी मिल जाए और वे दूसरों के नौकर होकर उनसे दूर चले जाएँ। उनके बच्चों को दूसरे का मकान किराए पर लेकर रहना पड़े जिससे उन्हें यह एहसास हो कि अपना घर छूटने का दर्द क्या होता है। बुड्ढे इंसानों को आश्रयहीन होकर वृद्धाश्रम में रहना पड़े। मैं उन्हें कवि घाघ की वे पंक्तियाँ याद दिलाता हूँ, जिनमें इसी तथ्य को ध्यान में रखकर उन्होंने नौकरी को सबसे खराब बताया था— "उत्तम खेती, मध्यम बान। निषिद्ध चाकरी, भीख निदान।"

मेरे बच्चों, इंसान इतनी आसानी से समझने वाला नहीं है। मैं उन्हें गोस्वामी तुलसीदास की लिखी हुई रामचरितमानस की उस चौपाई को याद दिलाना चाहता हूँ, जिसमें उन्होंने पराधीनता को सबसे बड़ा दुख कहा है— ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’। उनको तब पता चलेगा कि अपना रहवास छिनने का दर्द क्या होता है, जब उनके घर में कोई रहने वाला नहीं होगा। तब मेरे बच्चों! उनके बनाए घरों पर तुम्हारा कब्ज़ा होगा। तुम लोग उनके महँगे पलंग, मुलायम बिस्तर तथा बड़े-बड़े सोफ़ों के स्वामी होगे। उन घरों में खूब उछलना-कूदना, हर जगह घूमना-फिरना। यह इंसानों को मेरा शाप तथा बच्चों तुम्हें मेरा आशीर्वाद है।

बुजुर्ग साँप की बातें सुनकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं और मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि वह बूढ़ा साँप तो ठीक ही कह रहा है। हम उनका रहवास छीन रहे हैं। आखिर वे बेचारे कहाँ जाएँ? हमारे बच्चों को नौकरी मिलने पर हम बेइंतहा खुश होते हैं। आखिर हम यह क्यों नहीं सोचते कि हमारा बच्चा हमसे दूर जा रहा है। इसकी कीमत दोनों को तड़पकर चुकानी पड़ेगी। हमसे भला और समझदार तो वह साँप है जो कि एक बुद्धिहीन जीव है। हम तो उस बेचारे को साँप कहते हैं जबकि मनुष्य तो उससे ज्यादा जहरीला साँप है। दूसरे के प्रति अपने मन में ईर्ष्या का जहर लिए घूमता रहता है। मौका मिलते ही बदला चुका लेता है। कम से कम साँप तो ऐसा नहीं करते हैं। हम पेड़-पौधों को काटकर अपनी ही साँसों को कम कर रहे हैं। आइए हम सब मिलकर साँप द्वारा दी गई सीख पर अमल करें तथा पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव को उसका अधिकार दें। एक बुद्धिजीवी प्राणी होने के कारण यह हमारा नैतिक दायित्व भी है।

कविताः बालिका वधू

  - अनीता सैनी

बालिका वधू  -

एक पात्र नहीं है,

न ही

सफेद पंखों वाली मासूम परी है।

जिसके पंख काट दिए जाते हैं,

हाथ की छड़ी छीन ली जाती है।

तब उसका जादू

घर की चारदीवारी में नहीं चलता,

और सिर पर रखा पानी का मटका

हाथों से बार-बार गिर जाता है।

कभी चूल्हे की रोटी जल जाती है,

और

जली रोटी उसे आत्मग्लानि से भर देती है।

 

वह भी नहीं,

जिसमें पूरा परिवार

पच्चीस-तीस वर्ष की युवती ढूँढता है।

और वह भी नहीं,

जिसके

पायल-बिछुआ चुभने पर

माँ के सामने बच्ची की तरह

बिलख-बिलखकर रोती है।

वह तो कतई नहीं,

जिसने घूँघट न निकालने की ज़िद में

सप्ताहभर खाने का मुँह न देखा हो।

 

यह एक  गाँठ है,

पुरुष के अहं की गाँठ,

जिसे एक स्त्री ताउम्र गूंथती है-

रूप-रंग, हाव-भाव, स्वभाव

और चरित्र की जड़ी-बूटियों से।

 

और एक दिन पुरुष इसे

खोलने की जद्दोजहद में अंधा हो जाता है।

इतना अंधा कि वह

अंधेपन में कई-कई ग्रंथ रच देता है।

और समय इन्हें

समझ न पाने की पीड़ा से जूझता है।

व्यंग्यः शासक हाथी और शोषित कुत्ता

  - डॉ. जेन्नी शबनम

एक कहावत है- ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’’। इसका अर्थ है आलोचना, निन्दा, द्वेष या बुराई की परवाह किए बिना अच्छे कार्य करते रहना या सही राह पर चलते रहना। इसका सन्देश अत्यन्त सकारात्मक है, जो हर किसी के लिए उचित, सार्थक एवं अनुकरणीय है। हम सभी के जीवन में ऐसा होता है जब आप सही हों फिर भी आपकी अत्यधिक आलोचना होती है। अक्सर आलोचना से घबराकर या डरकर कुछ लोग निष्क्रिय हो जाते हैं या चुप बैठ जाते हैं। कुछ लोग अनुचित राह पकड़ लेते हैं और ‘हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’ कहावत को चरितार्थ करते हैं। वे बिना किसी परवाह के अनुचित कार्य करते रहेंगे, न अपने सम्मान की चिन्ता न दूसरे की असुविधा की फ़िक्र। बस अपना हित साधना है, पूरी दुनिया जाए भाड़ में।   

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखें तो राजनीतिक परिस्थितियों पर यह कहावत नकारात्मक रूप से सटीक बैठती है। कुछ नेता स्वयं को हाथी मानकर अति मनमानी करते हैं, अति निर्लज्जता से सारे ग़लत काम करते हैं, असंवेदनशीलता की सारी हदें लाँघ जाते हैं, बेशर्मी से दाँव-पेंच लगाकर बाज़ी चलते हैं। उन्हें न अपनी आलोचना की फ़िक्र है, न अपने कुकृत्यों पर शर्मिन्दगी। पद, पैसा और लालच के सामने उन्हें किसी चीज़ की परवाह नहीं। 

इस सन्दर्भ में सोचें, तो हम आम जनता कुत्ते की तरह हैं, जो हर अनुचित पर लगातार भौंक रहे हैं और सदियों से भौंकते जा रहे हैं। न किसी को हमारी परवाह है, न कोई हमारी बात सुनता है; फिर भी हम भौंकते रहते हैं। ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद करते रहते हैं। हमारे अधिनायक, बादशाह, शासक, नेता, आका, सत्ताधीश बिगड़ैल हाथी की तरह सत्ता हथियाने के लिए भाग रहे हैं और हम जैसे भौंकते कुत्तों को रौंदते जा रहे हैं। वे हाथी हैं, अपने हाथी होने पर उन्हें घमण्ड है और इस अभिमान में पाँव के नीचे आने वाले कुत्तों को रौंदना उनका कर्त्तव्य; क्योंकि ऐसे कुत्ते उनकी राह में बाधा डालने के लिए खड़े हैं।  

भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अन्याय, अत्याचार, तानाशाही, निरंकुशता आदि के ख़िलाफ़ हम कितना भी भौंके, कोई सुनवाई नहीं है। नेताओं को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन्हें अपने फ़ायदे के लिए जो सही लगता है वे करते हैं; वे हाथी जो ठहरे। आम जनता तो कुत्ता है, भौंके, भौंकता रहे। जिधर रोटी मिलेगी दुम हिलाते हुए कुछ कुत्ता हाथी के पीछे चला जाएगा। कुछ कुत्ता हमेशा की तरह भौंक-भौंककर जनता को जगाएगा, ताकि वे अपना अधिकार जानें और सही के लिए भौंकने में साथ दें। 

जब-जब चुनाव आएगा तब-तब हाथी होश में आएगा और गिरगिट-सा रंग बदलते हुए अपनी चाल थोड़ी धीमी करेगा। बाज़ार से गुज़रते हुए रोटी का टुकड़ा फेंकता जाएगा, थोड़ा पुचकारेगा, थोड़ा दया दिखाएगा; जो झाँसे में न आया उसे पाँव तले कुचल देगा। यों भी पेट और वोट का रिश्ता बहुत पुराना है। पाँच साल जनता कुत्ते की तरह भौंकता है और नेता हाथी की तरह मदमस्त चलता रहता है।

समाज में हर तरह के लोग होते हैं, जो हर कार्य का आकलन, अवलोकन और निष्पादन अपने सोच-विचार से करते हैं। हमारी सोच को शिक्षा, धर्म और संस्कृति सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जाने कब आएगा वह दिन जब न कोई शासक होग़ा न कोई शोषित। सभी की सोच पर से धर्म और जाति का पर्दा उठेगा और जनहित को ध्यान में रखकर इंसानियत वाले समाज का निर्माण होगा।  

शासक हाथी और शोषित कुत्ता, खेल जारी है... हाथी अपने मद में चूर जा रहा है और कुत्ते भौंक रहे हैं। हाथी सदा सही होता है और कुत्ता सदा बेवकूफ़! सन्दर्भ भले उलट गया पर कहावत सही है- ‘ हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार।’’

स्वास्थ्यः देखभाल के नाम पर त्वचा खराब तो नहीं कर रहे?

  -  प्रतिका गुप्ता

आजकल लोग अपनी त्वचा का कुछ ज़्यादा ही ख्याल रख रहे हैं। त्वचा का ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन यह जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि जितने और जिन तरीकों से आप त्वचा की देखभाल कर रहे हैं वास्तव में वे कहीं आपकी त्वचा के लिए हानिकारक तो नहीं।

सोशल मीडिया से मुतासिर होकर लोग अपनी त्वचा की देखभाल के लिए रोज़ाना जाने क्या-क्या करते हैं। लोग क्लींज़र, फेसवॉश, टोनर, सीरम, तरह-तरह के विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट क्रीम, मॉइश्चराइज़र, सनस्क्रीन... वगैरह-वगैरह बाज़ार के उत्पाद तो लगाते ही हैं, साथ ही उनके द्वारा अपनाए जाने वाले घरेलू उबटनों और उपायों का भी अंत नहीं है। इसमें भी आँखों के लिए अलग, गले व गरदन के लिए अलग, हाथ-पैरों और बाहों के लिए अलग-अलग उत्पाद और देखभाल के तरीके सोशल मीडिया पर खूब छाए हैं। और सिर्फ बड़े ही नहीं, बच्चे भी सोशल मीडिया के प्रभाव क्षेत्र में हैं। 

त्वचा रोग विशेषज्ञ रजनी कट्टा बताती हैं कि उन्होंने पिछले पाँच सालों में देखा है कि त्वचा की देखभाल के तरीके दिन-ब-दिन पेचीदा और कई-कई स्टेप्स वाले हो गए हैं। कोई-कोई मामलों में तो ये रोज़ाना 12-12 स्टेप्स तक जाते हैं। और लोग इनमें अधिकतर ऐसे उत्पाद लगा रहे होते हैं जिनके बारे में उन्होंने बस सोशल मीडिया पर देखा होता है, इनके बारे में कहीं कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं होती। लेकिन क्या वाकई इतने उत्पाद और इतने स्टेप्स ज़रूरी हैं?

यदि आप किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ से यह सवाल पूछेंगे तो उनका जवाब होगा - सामान्यत: नहीं। त्वचा विशेषज्ञ कहते हैं कि चेहरे या त्वचा को अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़र लगाना और (सनस्क्रीन या किसी अन्य तरीके से) धूप से बचाना स्वस्थ त्वचा के लिए पर्याप्त है; लेकिन साथ में स्वस्थ और नियमित जीवनशैली और पोषणयुक्त भोजन बहुत ज़रूरी है। विशेषज्ञ कहते हैं, अधिक (और गलत) उत्पाद और देखभाल के गलत तरीके त्वचा को अस्वस्थ और बेजान बना सकते हैं। कट्टा का कहना है कि अक्सर सोशल मीडिया पर बताए जाने वाले उत्पादों और उनके फायदों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। और सबसे बड़ी बात तो यह कि लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि वे ऐसे प्रोडक्ट लगा रहे हैं जो वास्तव में त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं।

दरअसल, आजकल दुनिया भर में त्वचा की देखभाल (स्किनकेयर) के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा दिलचस्पी दिख रही है। टिकटॉक, इंस्टा, यूट्यूब-शॉर्ट्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों में जवां दिखने और चमकदार त्वचा पाने की चाहत बढ़ा रहे हैं, और फिर इसे पाने के लिए वे इसके उपाय और उत्पाद भी बता रहे हैं। लोगों में जवाँ दिखने की चाहत का आलम इस आँकड़े से समझा जा सकता है कि #SkinTok जैसे हैशटैग को हर महीने एक अरब से ज़्यादा बार देखा जाता है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक यह इंडस्ट्री दुनिया भर में 200 अरब डॉलर से ज़्यादा का कारोबार करेगी।

त्वचा की बनावट

विशेषज्ञों की सुनें तो उनका कहना है कि स्वस्थ त्वचा का मतलब सिर्फ निखरी और दमकती त्वचा नहीं है बल्कि इससे परे है। स्वस्थ त्वचा आपके संपूर्ण स्वास्थ्य को दुरुस्त रखती है। तो स्वस्थ त्वचा का मतलब क्या? इसे समझने के लिए हम त्वचा, उसकी बनावट और भूमिका के बारे में समझते हैं।

त्वचा शरीर का सुरक्षा कवच है, जो बाहरी रोगाणुओं, रसायनों और पराबैंगनी विकिरण (UV) एवं अन्य खतरों को शरीर में प्रवेश नहीं करने देता। त्वचा मुख्यत: तीन परतों से बनी होती है: हाइपोडर्मिस (सबसे निचली परत), डर्मिस (मध्य परत) और एपिडर्मिस (सबसे बाहरी परत)। एपिडर्मिस में लगातार कोशिकाएँ मरती रहती हैं और इनके बदले नई त्वचा कोशिकाएँ बनती हैं: रोज़ाना लगभग 40,000 कोशिकाएँ मिटती-बनती हैं।

एपिडर्मिस में भी कई परतें होती हैं। इसकी सबसे बाहरी परत है स्ट्रैटम कॉर्नियम, जिसे आम तौर पर ‘स्किन बैरियर (त्वचा अवरोध)’ कहा जाता है। यह केरेटिन-युक्त चपटी, मृत कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) से बनी होती हैं, जो मज़बूत और जलरोधी होती हैं। कॉर्नियोसाइट्स के चारों ओर ‘सेरामाइड्स’ नामक लिपिड्स होते हैं, जो नमी को अंदर रोके रखते हैं और बाहरी हमलावरों को त्वचा के अंदर आने से रोकते हैं। और इसके ऊपर होती है वसा अम्लों, अमीनो अम्ल और तेल की परत, जिसे एसिड मेंटल कहते हैं। यहाँ त्वचा के लिए फायदेमंद सूक्ष्मजीव पनपते हैं। यानी त्वचा किसी निर्जीव ढाल समान नहीं है, बल्कि वह एक फलता-फूलता इकोसिस्टम है जिसमें भौतिक, रासायनिक, सूक्ष्मजीवीय और प्रतिरक्षा क्रियाएँ चलती रहती हैं।

त्वचा जटिल चीज़ों का एक तंत्र ज़रूर है, लेकिन है बहुत नाज़ुक है। लापरवाहियाँ इसे आसानी से तबाह कर सकती है। उदाहरण के लिए, झुर्रियाँ कम करने वाली और मुँहासों के दाग-धब्बे हटाने के लिए की जाने वाली कुछ प्रचलित कॉस्मेटिक प्रक्रियाएँ (जैसे, केमिकल पील्स, जिसमें त्वचा की परत हटाई जाती है) अगर गलत तरीके से या बहुत ज़्यादा बार की जाएँ तो ये त्वचा अवरोध (स्किन बेरियर) को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती हैं और त्वचा को अतिसंवेदी बना सकती हैं। हालांकि, त्वचा खुद को ठीक कर सकती है, लेकिन कुछ उपचार इस क्षमता को भी खत्म कर सकते हैं। अस्वस्थ त्वचा अवरोध के लक्षण हैं त्वचा में रूखापन, खुजली, लाल चकते, मुँहासे और संक्रमण।

फिर, त्वचा अवरोध की क्षति न सिर्फ त्वचा को अस्वस्थ करती है बल्कि अधिक गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है - जैसे एटोपिक डर्मेटाइटिस, सोरायसिस और एलर्जी जैसी समस्याएँ। अस्वस्थ त्वचा स्टैफिलोकॉकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया का त्वचा में प्रवेश करना आसान बना सकती है। स्टैफिलोकॉकस ऑरियस एक ऐसा बैक्टीरिया है जो फोड़े-फुंसी और रक्त संक्रमण पैदा करता है। 

आम तौर पर लोग तीक्ष्ण साबुन, डिटर्जेंट और एस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल करते हैं। यह आम गलती शरीर के ऊतकों की नमी खत्म कर देती है। त्वचा से अतिरक्त तेल, मेकअप और मुँहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया हटाने के लिए लोग अल्कोहल और विच हेज़ल युक्त उत्पाद (जैसे मेकअप रिमूवर) इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये उत्पाद त्वचा से वे नैसर्गिक तेल भी हटा देते हैं जो स्किन बैरियर को सलामत रखते हैं। बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाना भी त्वचा अवरोध को क्षति पहुँचा सकता है। अगर पानी इतना गर्म है कि उससे बर्तनों का तेल आसानी साफ हो जाता है, तो ज़ाहिर है, इतना गर्म पानी त्वचा के प्राकृतिक तेलों को भी हटा देगा। नतीजतन, त्वचा को नुकसान होगा।

एसिड मेंटल की परत त्वचा पर स्वस्थ सूक्ष्मजीवों को पनपने के लिए ज़रूरी स्थितियाँ बनाती है। यदि त्वचा साफ करने के लिए सख्त और तीक्ष्ण उत्पाद उपयोग करते हैं तो ये त्वचा का pH स्तर बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि त्वचा पर फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की कमी हो जाती है और नुकसानदेह सूक्ष्मजीव पनपने लगते हैं।

आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी स्किन-केयर उत्पाद अपना रहे हैं। नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पीटर लियो कहते हैं कि बच्चों की त्वचा कोमल होती है। अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़ करना और सनस्क्रीन लगाना ही उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित है। बड़ों के लिए बने अन्य तमाम उत्पाद बच्चों की त्वचा पर बहुत बुरा असर डाल सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि दिन में दो बार किसी सौम्य साबुन/फेसवॉश से चेहरा धोकर मॉइश्चराइज़र लगाना चाहिए। और, यदि दिन का समय है तो, सनस्क्रीन लगाना चाहिए और त्वचा को धूप से बचाने के लिए ढककर रखना चाहिए (कपड़े, टोपी या छाते से)।

धूप से बचाव

नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टीट्यूट की त्वचा विशेषज्ञ एल्समीक प्लास्मीइर बताती है कि लंबे समय तक त्वचा का सीधे और बहुत ज़्यादा अल्ट्रावॉयलेट (पराबैंगनी) विकिरण के संपर्क में रहना खतरनाक है, चाहे वह संपर्क सीधे धूप के ज़रिए हो या टैनिंग बेड के ज़रिए। अल्ट्रावॉयलेट विकिरण मेलेनोमा का मुख्य कारण है। मेलेनोमा एक तरह का त्वचा कैंसर है जो सबसे घातक कैंसरों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2022 में लगभग 60,000 लोगों की मृत्यु मेलेनोमा से हुई थी।

दरअसल, भारत में तो नही; लेकिन, कुछ देशों में त्वचा को टैन करने का बहुत चलन है। लोग घंटों-घंटों समुद्र किनारे धूप सेंकते रहते हैं और त्वचा को टैन करते हैं। पृथ्वी तक पहुँचने वाली धूप में अल्ट्रावॉयलेट किरणें भी होती हैं; मुख्यत: दो प्रकार की अल्ट्रावॉयलेट विकिरण (UV) हम तक पहुँचते हैं, UVA और UVB। ये दोनों त्वचा को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। UVA विकिरण ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करती हैं और कोलाजेन तथा इलास्टिन को तोड़कर त्वचा की डर्मिस को नुकसान पहुँचाते हैं। कोलाजेन और इलास्टिन ऐसे प्रोटीन हैं जो ऊतकों को आकार और लचीलापन देते हैं। और, UVB विकिरण केवल एपिडर्मिस तक पहुँचता है, लेकिन यह त्वचा को झुलसाता (सनबर्न) है और डीएनए को क्षति पहुँचाता है, जिससे त्वचा का कैंसर हो सकता है। इसके अलावा, दोनों प्रकार के UV विकिरण एक ऐसे प्रोटीन को बाधित करते हैं जो त्वचा की सुरक्षा परत में कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) को आपस में जोड़े रखते हैं। नतीजतन, कॉर्नियोसाइट्स के आपसी जोड़ कमज़ोर हो जाते हैं, और त्वचा की सुरक्षा परत कमज़ोर पड़ जाती है।

कई लोग जो टैनिंग चाहते हैं, वे टैनिंग बेड निर्माता कंपनियों के झूठे दावों के झाँसे में आ जाते हैं। कंपनियों का दावा रहता है कि टैनिंग बेड धूप की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि वे डीएनए को नुकसान पहुँचाने वाले UVB विकिरण की तुलना में UVA विकिरण अधिक उत्सर्जित करते हैं। लेकिन नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पेद्राम गेरामी कहते हैं कि ये दावे अक्सर गलत साबित होते हैं। टैनिंग बेड से उत्सर्जित UVA की मात्रा धूप से मिलने वाले UVA की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज़्यादा होती है। 

गेरामी आगे बताते हैं कि जो लोग इनडोर टैनिंग बेड का इस्तेमाल करते हैं, उनमें मेलेनोमा होने की संभावना तीन गुना ज़्यादा पाई गई है। और तो और, टैनिंग बेड इस्तेमाल करने वालों के शरीर के उन हिस्सों में भी मेलेनोमा देखा गया जहाँ आम तौर पर धूप से कम नुकसान पहुँचता है, जैसे जांघों पर। WHO ने टैनिंग बेड को एस्बेस्टस और सिगरेट जितना हानिकारक बताया है और इसे कैंसर-कारी श्रेणी में रखा है।

लंबे समय तक किए गए कई क्लीनिकल ट्रायल से यह पता चला है कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल करने से स्किन कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है। WHO लोगों को सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) 30 या उससे ज़्यादा वाले ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन (जो दोनों तरह की UV किरणों को रोकती है) इस्तेमाल करने की सलाह देता है। लेकिन सनस्क्रीन लगा लेने का मतलब यह नहीं कि अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, और कितना भी धूप के संपर्क में रह सकते हैं। शरीर को अच्छी तरह से ढकने वाले कपड़े, छतरी या छायादार टोपी का इस्तेमाल और सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच (जब सूरज सबसे तेज़ होता है) धूप में जाने से बचना भी ज़रूरी है। यह उपाय अपनाना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि सनस्क्रीन की क्वालिटी में काफी अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में कई लोकप्रिय सनस्क्रीन को मार्च में बाज़ार से इसलिए हटा दिया गया था क्योंकि ड्रग रेगुलेटर टेस्ट में पता चला था कि उनके बेस फॉर्मूलेशन में गड़बड़ियों के चलते उनमें SPF दावे से काफी कम था।

वैसे, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सनस्क्रीन के बारे में बहुत सारी गलत जानकारियाँ भी फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सनस्क्रीन से स्किन कैंसर और विटामिन-डी की कमी होती है, जबकि वास्तविकता इसकी उलट है। ऐसी गलत बातें अक्सर उन लोगों को निशाना बनाती हैं, जो कभी त्वचा विशेषज्ञ के पास गए ही नहीं हैं। बल्कि सोशल मीडिया ने स्किनकेयर के नए-नए चलन चलाएँ हैं - जैसे मॉइश्चराइज़र की जगह बीफ टैलो (जानवर की चर्बी) लगाना, रीजुरेन, ग्लास स्किन मास्क लगाना, रेड-लाइट थेरपी लेना, वगैरह-वगैरह। 

लियो कहते हैं बाज़ार में हज़ारों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं जो उनमें मौजूद तरह-तरह के केमिकल का नाम लेकर दावा करते हैं कि वे आपकी त्वचा को जवां बनाए रखने और त्वचा को पहुँचे नुकसान को ठीक करते हैं। लेकिन उत्पादों में मौजूद तत्वों के पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण होने ज़रूरी हैं। 

जैसे, मॉइश्चराइज़र के बारे में कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि वे त्वचा की देखभाल करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि एक सामान्य और संतुलित मॉइश्चराइज़र त्वचा अवरोध की हर परत में नमी बरकरार रखता है और उसे ठीक करने में मदद करता है। सबसे असरदार मॉइश्चराइज़र में तीन मुख्य अवयव होते हैं - इमोलिएंट्स, ह्यूमेक्टेंट्स और ऑक्लूसिव्स। इमोलिएंट्स, जैसे तेल, जो  त्वचा को नर्म व मुलायम बनाते हैं और त्वचा कोशिकाओं तथा लिपिड्स के बीच की खाली जगहों को भरकर पानी की कमी को दूर करते हैं। हाइलूरोनिक एसिड जैसे ह्यूमेक्टेंट्स बाहर की हवा या डर्मिस से नमी खींचकर त्वचा की ऊपरी परत तक पहुँचाते हैं। और, पेट्रोलियम जेली जैसे ऑक्लूसिव्स त्वचा के ऊपर एक सुरक्षा कवच बना देते हैं जो नमी को बाहर जाने से रोकते हैं।

इसके अलावा मॉइश्चराइज़र में रेटिनॉइड्स, एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। रेटिनॉइड्स (विटामिन-ए से बने यौगिकों का एक समूह) कोशिकाओं के बनने और कोलाजेन के बनने को तेज़ करते हैं, जिससे झुर्रियाँ और काले धब्बे कम होते हैं, मुँहासों को थामते हैं। विटामिन-सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स ‘मुक्त मूलकों (फ्री रेडिकल्स)’ के प्रवेश को रोकते हैं, जो लिपिड्स, डीएनए और प्रोटीन्स को क्षति पहुँचाते हैं।

नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ ज्यूसेपे वालाकी का कहना है कि आप कितना भी बढ़िया मॉइश्चराइज़र लगा लें, लेकिन यदि आपकी जीवनशैली और खान-पान अस्त-व्यस्त और अस्वस्थ है, तो वे भी आपकी त्वचा को स्वस्थ नहीं रख सकते और आपके अस्त-व्यस्तता के बुरे असर को बेअसर नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, धूम्रपान करने से कोलाजेन और इलास्टिन कमज़ोर पड़ जाते हैं, और त्वचा तक पोषक तत्व पहुँचाने वाला रक्त प्रवाह भी मंद पड़ जाता है। 

इसके अलावा त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है - पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना, जिसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, अमीनो एसिड्स और फैट्स शामिल हों। विशेषज्ञ कहते हैं कि त्वचा हमारे शरीर का आईना है, इसे देखकर पता चल सकता है कि आपके शरीर में किस पोषक तत्व की कमी है। इस बात के भी प्रमाण मिल रहे हैं कि त्वचा और पेट का आपस में बहुत गहरा सम्बंध है। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि पेट के सूक्ष्मजीव संसार में बदलाव करने से त्वचा के लक्षण भी बदल जाते हैं। 

इसलिए यदि आप अपनी त्वचा वाकई स्वस्थ रखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया के झाँसे या दुनिया के चलन में न आएँ। और इन बातों का ख्याल रखें; अपनी दिनचर्या सही रखें; अच्छा भोजन खाएँ; सौम्य साबुन या फेसवॉश से त्वचा धोएँ; मॉइश्चराइज़र लगाएँ; दिन के समय सनस्क्रीन लगाएँ; और बाहर निकलते वक्त छाता, टोपी या कपड़े से शरीर को ढककर रखें। ध्यान रहे, सोशल मीडिया से लेकर उत्पाद निर्माताओं को आपकी सेहत की बजाय पैसा बनाने की चिंता अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)