मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Jun 1, 2026

संस्मरणः उसकी ख़ुशी !

  - निर्देश निधि 

उसके पिता, डॉक्टर साहब यानी मेरे पति के बहुत पुराने मरीज़ थे। हमारे घर में होने वाले राज - मिस्त्री के सब काम भी वे ही करते । उनकी सात - आठ औलादों में से वह सबसे छोटा और ऊधमी था । उसके दूसरे भाई भी पढ़े - लिखे नहीं थे। पर उन सबको हाथ की कारीगरी आती थी । उसके पिता चिंतित थे: क्योंकि उसे हाथ की कारीगरी में भी रुचि नहीं थी। डॉक्टर साहब ने उन्हें समझाया कि चिंता न करें, अगर वह नहीं भी पढ़ा - लिखा तो अपने भाइयों की तरह एक दिन हाथ की कारीगरी तो कम से कम सीख ही जाएगा । पर उसके पिता उसे पढ़ा - लिखा कर सभ्य बनाना चाहते थे अतः डॉक्टर साहब से ही ज़िद करने लगे कि उसे अपने घर रख लें, ताकि वह कुछ सीख जाए, आदमी बन जाए । उनका मानना था कि हमारे घर रह कर उसकी उद्दंडता भी कम हो जाएगी और हमारे बेटे वरुण को देख - देख कर वह सभ्य और पढ़ने - लिखने वाला बन जाएगा। डॉक्टर साहब के अनुसार उसके पिता भले आदमी थे और उनके बहुत पुराने मरीज़ भी । कई बार मरीजों से डॉक्टर का रिश्ता बहुत घनिष्ठ और विश्वास का बन जाता है, अक्सर डॉक्टर साहब का रिश्ता भी ऐसा ही विश्वसनीय होता, अपने मरीजों के साथ । डॉक्टर साहब की सादगी, उस विश्वास में अपनत्व का रस और घोल देती और बहुत सारे मरीज़ उनके बिल्कुल आत्मीय बन जाते । उसके पिता भी डॉक्टर साहब के उन आत्मीयों में से एक थे। अतः डॉक्टर साहब को उनके बेटे को अपने घर रख लेने की ज़िद माननी पड़ी । करीब बारह – तेरह बरस का कुछ - कुछ पक्के रंग का, बड़ी - बड़ी आँखों वाला वह चपल लड़का हमारे घर रहने आ गया। पढ़ाने – लिखाने का सारा सामान डॉक्टर साहब खुद लेकर आए । वह खूब चंचल- सा हमारे घर में यहाँ से वहाँ उछलता - कूदता फिरता, उसने हमारे घर आकर एक दिन की भी तो औपचारिकता नहीं दिखाई थी । उसके आने से घर में थोड़ी चहल - पहल तो बढ़ ही गई, हम सबका भी मन बन गया कि वह हमारे घर से पढ़ – लिखकर ही जाए। पर दिमाग तेज़ होने के बावजूद वह पढ़ाई - लिखाई की बातें बहुत जल्दी सीख नहीं पाता था । शायद उसका दिमाग कहीं और ही चलता था । पर कहाँ ? यह खोज नहीं पाए हम और उसे उसकी मंथर गति से ही सही, पर पढ़ाते रहे । वह गाना खूब सुरीला गाता था । हँसता - बोलता खूब, हँसी - मज़ाक में वह अक्सर अपनी सीमा भूल जाता। खैर हम उसे बच्चा समझकर कभी माफ कर देते, पर कभी - कभी टोकना, समझाना भी पड़ जाता। जो भी हो: पर यह तो निश्चित हो गया कि वह पढ़ - लिखकर समझदार और बड़ा होने तक हमारे घर में ही रहेगा । इसी बीच वरुण को आई आई टी मे प्रवेश की कोचिंग दिलाने के लिए मुझे उसके साथ दिल्ली जाकर रहना पड़ा । डॉक्टर साहेब को अब अकेले रहना था: अतः अब उसका घर में होना मुझे सार्थक लगने लगा । खाना बनाने वाली दोनों का खाना बना जाती और वह डॉक्टर साहेब को खाना लगाकर दे देता, पानी वगैहरा पिला देता और रात में अपनी छोटी- सी पलकी उन्हीं के बेडरूम में डाल लेता और सो रहता। अपनी अनुपस्थिति में उसका घर पर होना मुझे आश्वस्त करता कि डॉक्टर साहब अकेले नहीं हैं । कोई उनके साथ है और मेरी चिंता उन्हें लेकर थोड़ी कम हो जाती । जब कभी वरुण की छुट्टी में हम दोनों यानी वरुण और मैं दिल्ली से आते तो वह बहुत खुश होता । अपने आने पर उसकी वह खुशी मुझे बहुत अच्छी लगती। खुशी तो वैसे भी खुश होने की ही बात होती है। अतः जब भी वह खुश होता, मुझे और भी प्यारा लगता । जब हम घर आते तो वह एक - दो दिन के लिए अपने घर भी जाता, मैं उसे भेज देती, ताकि वह अपनी माँ-पिता और अपने दर्जन भर बहन - भाइयों मिल आए  । 

उस बार भी वह अपने घर गया था, सिर्फ एक दिन के लिए। अब उसका मन अपने घर में लगता नहीं था। अगले दिन वह सुबह नौ - साढ़े नौ बजे ही वापस आ गया था । उस दिन उसके चेहरे की रंगत ही कुछ अलग थी । बहुत - बहुत - बहुत ही खुश लग रहा था, उस दिन वह । मैंने सोचा अपने घर गया था, परिवार से मिलने की खुशी तो होती ही है अलग, वही उसके चेहरे को इतना प्रफुल्लित दिखा रही है। वह लगातार कोई गाना गुनगुना रहा था। मैंने पराठा बनाते - बनाते उससे यूँ  ही पूछ लिया, “आज तो तू बहुत खुश लग रहा है क्या बात है ?“ इस पर वह मेरा वाक्य खत्म होते ही उछलकर चलता हुआ चुटकी बजाकर बोला, “हाँ आंटी जी, आज मैं बहुत खुश हूँ”, मैंने यूँ ही काम करते - करते सामान्य भाव से कहा,  “हाँ खुश तो होना ही हुआ अपने घर जो गया था । माँ – बाबा, बहन भाइयों से मिलकर जो आया है ।’’ 

वह बोला,  “अरे नहीं आंटी जी इसमें खुश होने वाली कौन सी बात है, वे कहाँ जा रहे, वे सब तो हैं ही ।’’

मैंने उसी लापरवाही से फिर पूछ लिया, “तो तू ही बता भाई,आज ऐसी कौन सी नई बात हो गई जो तुझे इतना खुश कर गई ।’’

 इस पर वह मेरे बिलकुल पास आकर बोला, “आंटी जी आज मैंने एक रिक्शा वाले का खून होते देखा ।’’ 

“क्या ?” बस यही निकल पाया मेरे मुँह से और मैं तवे पर पराठा यूँ ही छोडकर उसकी तरफ घूम गई। मेरे हाथ पाँव जड़ हो गए, लगा जैसे मेरे दिल पर किसी ने बहुत ज़ोर से हथौड़ा दे मारा था, दिमाग बिजली के करंट से झनझना उठा था जैसे । मेरे “क्या” के उत्तर में उसने अपनी बड़ी - बड़ी भूरी आँखों में कुछ अधिक ही चमक भरकर वही शब्द दौहराए, “हाँ आंटी जी आज मैंने एक रिक्शा वाले का खून होते देखा ।’’ 

मैं सन्न रह गई थी । कुछ कहते नहीं बना मैं बस उसकी तरफ देखे जा रही थी। तवे पर पड़े पराठे का ध्यान ही नहीं था मुझे । वह खुद ही बोला आंटी जी पराठा जल गया आपका। मैंने खुद को थोड़ा सँभाला, ताकि वह मुझे डरा हुआ न समझे और उससे स्वतः थोड़ी कड़ी हो गई आवाज़ में पूछा, “तुझे डर नहीं लगा खून होता देखकर ?” 

इस पर जो वह बोला उसने तो मेरे पैरों तले की ज़मीन ही हिला दी।  “आज मैंने आदमी का खून होते पहली बार देखा, पर डर किस बात का आंटी जी मुझे तो खून होता देखकर बहुत मजा आया, बहुत खुशी हुई ।’’

“आदमी का ख़ून होते देख कर तुझे मज़ा आया ?” मैं लगभग चीख़ पड़ी । पर मैं किस पर चीख रही थी भला, जिसे ख़ून  देखकर मज़ा आया था । यह सोचकर मैं चुप हो गई; पर उस बारह - तेरह बरस के बच्चे की उपस्थिति मुझमें अजीब- सा भय भर रही थी । वह और भी भयावह शब्द बोला, “ ख़ून तो ख़ून होता है आंटी जी, चाहे आदमी का हो या बकरे का ।’’ इस बार मैं उसे कुछ नहीं कह सकी थी । मैंने अपने डर से भरे शब्द “क्या?’, को भी अपने भीतर ही निगल लिया था, बस उसकी तरफ अपलक देखती रही थी । उसकी जिन आँखों में मुझे खुशी बहुत प्यारी लगती थी, आज उन्हीं आँखों में मुझे खुशी के रूप में भयानक क्रूरता खड़ी साफ़ दीख रही थी । सच कहूँ, तो बहुत देर तक देखती भी नहीं रह सकी थी मैं तो उसे । वह मेरी मनःस्थिति तो क्या ही समझ सका होगा ख़ैर। वह मुस्कुराया और गुनगुनाते हुए गर्दन को झटका देकर पीछे मुड़ गया और कूदता हुआ वरुण के रूम की तरफ चला। “नहीं, वहाँ मत जा….“  तीखी हो आई आवाज़ में चिंता से भरा हुआ यह वाक्य मेरे मुँह से अनायास ही निकला । उससे किस कदर भयभीत हुई थी मैं उस दिन कि अपने बेटे पर उसका साया भी तो नहीं पड़ने देना चाहती थी । उससे भयभीत होने का कारण सिर्फ वह दिन नहीं था; बल्कि आने वाला कल था, भविष्य था उसका, जिससे मुझे भय लग रहा था । यह सोचकर भयभीत हुई थी मैं कि वह डॉक्टर साहब के साथ, उनके कमरे में सोता था । क्या पता उसे कब ख़ुश होने का मन करने लगता, कब उसे “मज़ा” लेने की तलब हो आती । पर उसने कोई अपराध नहीं किया था कोई सबूत नहीं था मेरे पास । बेशक उसने अपराध नहीं किया था; पर यह घटना अपराध का प्रिल्यूड तो अवश्य ही कही जा सकती थी । तो क्या उसे अपराध करने देने के लिए समाज में छोड़ दिया था मैंने ? और मैं कर भी क्या सकती थी, वह कोई अपराधी तो साबित हुआ नहीं था । भविष्य में कोई अपराध करेगा, इसकी तो कोई गारंटी नहीं होती, अगर हाँ भी तो भविष्य में किए जाने वाले अपराध की तो कोई सज़ा वर्तमान में नहीं होती, इसके सिवा जो मैंने उसे दे दी थी । हमेशा उसकी खुशी में मुझे खुशी दिखाई देती थी पर उस दिन मुझे उसकी खुशी में एक भय, अजीब- सी कसमसाहट, उकताहट और बेचैनी महसूस हो रही थी । मैं जैसे उसे अपने घर में देखना ही नहीं चाहती थी, जैसे मैं उसे खुश होते देखना ही नहीं चाहती थी, उसकी उस दिन की ख़ुशी का कारण मुझे विचलित किए दे रहा था । उसके द्वारा सब ख़ून एक जैसे बताया जाना भयभीत कर रहा था । असल में तो सब ख़ून होते ही हैं एक जैसे; परंतु फिर भी अपने स्वार्थ के लिए आदमी ने, ख़ुद का ख़ून सबसे अलग मान लिया है,श्रेष्ठ मान लिया है। 

अगले ही दिन मुझे डॉक्टर साहब को अकेले छोड़कर वरुण के साथ दिल्ली चले जाना था । मेरे बेटे के भविष्य का प्रश्न था, पति की सुरक्षा का प्रश्न था, अतः उसे सुधारने का जिम्मा यानी उसमें संवेदनशीलता जगाने का जिम्मा मुझे मूर्खतापूर्ण ही लगा था । वह मेरे लिए ना तो संभव था, ना ही उसकी कोई तुक थी, फिर मुझे तो दिल्ली चले जाना था, उसे दिन भर घर पर अकेले ही रहना था । अकेले में या डॉक्टर साहब के साथ उसका खुश होने का मन हो जाता तो...? मैं इस कल्पना से भी काँप उठी थी । 

डॉक्टर साहब को खाना लगकर दे देने या पानी पिला देने के बदले में हमने उसे पढ़ाने – लिखाने, खाना - पानी, कपड़े – लत्ते, जूते - चप्पल आदि देने के अतिरिक्त उसकी थोड़ी पगार भी रखी थी, जिसे वह एक साल में लेने वाला था इकट्ठी । जिसे उसने बैंक में पिता के खाते में डालने से साफ इंकार कर दिया था, जिसे खर्च करने का पूरा प्लान था उसके पास । पर अब उसे पगार देने के लिए एक साल की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी । मुझे सब निपटाना था तभी के तभी, अपने दिल्ली जाने से पहले ।  

मैंने निर्णय ले लिया था । डॉक्टर साहब दोपहर लंच ब्रेक में आए, तो मैंने यह घटना बताकर साथ ही अपना निर्णय भी उन्हें बता दिया था। कि उसे जाना होगा आज के आज । डॉक्टर साहब उसे समझाना चाहते थे; पर मुझे उस पर तनिक भी विश्वास नहीं था । बारह - तेरह बरस की आयु में जिसके मन में इस कदर क्रूरता भरी थी कि उसे किसी मनुष्य की हत्या होते देखकर इतनी ख़ुशी हुई थी कि छिपाए नहीं छिप रही थी, वह समझ भी कैसे सकता था, यह मेरी समझ के बाहर था । इसे डॉक्टर साहब का अति उदार मन ही समझ सकता होगा ; परंतु अगर उसे अपने साथ ना रखकर हमारे साथ छोड़ना होता, तब सम्भवतः उनका मन भी उतना उदार ना हो पाता । वह ऊपरी भाव थोड़े ही थे उसके, उनकी जड़ें तो उसकी नीव तक रही होंगी । डॉक्टर साहब को उसके नेकदिल पिता का ध्यान आया कि जब वे पूछेंगे, तो मैं क्या कहूँगा कि इसे घर में क्यों नहीं रख सकता । तो मैंने उनसे यही कहा कि कह देना दिन भर अकेला बच्चा यहाँ भी बिगड़ ही जाएगा । वे फिर भी एक बार सोच लेने के लिए कहने लगे; पर मैंने उनकी एक नहीं सुनी । उसके नेक पिता की नेकी मैं उसमें नहीं देख सकती थी । उसी दोपहर उसके सारे पैसे दिये, उसका सारा सामान एक बड़े थैले में भरवाया और पूछा- ‘’कुछ और भी चाहिए ?’’ जिस पर उसने मोहम्मद रफी के गानों की कुछ सी डी भर माँगीं । मैंने उससे कहा कि जो उसे पसंद हों, वह ले ले । उससे कहा कि वह अपने घर जाए अब, हमारे घर में उसकी ज़रूरत नहीं है । उसकी पढ़ाई में वहीं मदद कर दिया करेंगे । यह तो उसने सोचा नहीं था, घर जाने के नाम पर वह हतप्रभ सा खड़ा रह गया । अब हमारे घर का ऐशो – आराम उसे नहीं मिलने वाला था । आठ दस बहन – भाइयों में बँट – बुँटकर मिलने वाले खाने की जगह, बिना कुछ किए जो भर पेट और स्वादिष्ट भोजन उसे हमारे घर में मिल रहा था, अब वह नहीं मिलने वाला था। बढ़िया साबुन, बढ़िया शैंपू अब अतीत होने वाले थे  । थोड़ा – बहुत पढ़ने के बाद, सारा दिन घर पर खाली पड़ा रहता था वह, कभी म्यूज़िक सिस्टम पर गाने सुनता, कभी टी वी पर पिक्चर देखता । सारा दिन का धमाल था उसका तो । ऊपर से डॉक्टर साहब खाने – पीने के खूब शौकीन, तो खूब मिठाई और फल लाते, खुद भी खाते उसे भी खूब खिलाते, आख़िर उनके पुराने और प्रिय मरीज का बेटा जो था। अब वह सब मौज भी नहीं होने वाली थी। चिलचिलाती गर्मियों में एयर कंडीशनर की शीतलता भी अब नसीब नहीं होने वाली थी । सो कई बार बोला- “पर क्यों आंटी, क्या हुआ ? क्या हो गया आंटी ? मुझे तो बड़े होने तक यहीं रहना था आपके घर में।” 

उसके उत्तर में मेरे मुँह से अनायास ही निकला था, “पर तू तो बड़ा हो भी गया ।” उसने जाते वक्त काफ़ी उदास होकर मुझे नमस्ते की थी;  पर विडम्बना तो यह रही कि मैं उसे ‘खुश’ रहने का आशीष भी नहीं दे सकी। 

No comments:

Post a Comment