आसमान से आग बरसती
तपिश धरा को जला रही है,
आकुल-व्याकुल जड़-चेतन सब
गर्मी सबको सता रही है।
बिजली पानी के संकट से
महानगर तक जूझ रहे हैं,
जननायक महलों में बैठे
नई पहेली बूझ रहे हैं,
उनके तरण ताल के अंदर
एक जलपरी नहा रही है।
नहीं मिलेगी चाय किसी को
भाभी शरबत बना रही हैं,
दोपहरी में अम्मा सबको
पना आम का पिला रही हैं,
प्यासी गौरैया आँगन में
फुदक-फुदक फड़फड़ा रही है।
दादागीरी दिखा रहे हैं,
जो भी दिखे सामने उस पर
लू के हंटर चला रहे हैं,
दादी जी लू से बचने के
सौ-सौ नुस्खे बता रही हैं।
बजा-बजा घंटी गलियों में
अनवर कुल्फी बेच रहा है,
माथे पर बह रहा पसीना
बार-बार वह पोंछ रहा है,
लिये एक कुल्फी मजदूरिन
दो बच्चों को चटा रही है।
नए आँकड़े तापमान के
रोज- रोज चढ़ते जाते हैं,
ए सी में बैठे साहब जी
चिंतित बहुत नजर आते हैं,
गर्मी में बाहर मत निकलो
टी वी एंकर बता रही है।


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