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Oct 1, 2026

किताबेंः रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना का रेखांकन

  - डॉ. सुरंगमा यादव

पुस्तकः सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, पृष्ठ - 192, मूल्य - 550/- , प्रकाशन - अयन प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059

साहित्य जगत से लेकर सिनेमा कला या कोई अन्य रचनात्मक क्षेत्र क्यों न हो समीक्षक की भूमिका निर्विवाद है । समीक्षक किसी रचना के गुण-दोषों का विश्लेषण मात्र नहीं करता है, बल्कि वह  समीक्ष्य  रचना  की उपयोगिता या  श्रेष्ठता को विभिन्न पहलुओं से जाँच - परखकर पाठक के समक्ष रखता है, ताकि पाठक दिन-  प्रतिदिन प्रकाशित हो रही अनगिनत पुस्तकों में से अपनी रुचि के अनुसार   गुणवत्तापूर्ण सामग्री का चयन कर सके।   एक तटस्थ और गंभीर  समीक्षक केवल पाठकों की ही सहायता नहीं करता, अपितु रचनाकार का मार्ग भी प्रशस्त करता है। वह  रचना के कमजोर पक्षों को उजागर  करके रचना  प्रक्रिया का परिष्कार  करता है तथा खूबियों का उल्लेख करके उसका मनोबल भी  बढ़ाता  है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव जी  की पुस्तक  ‘सृजन दृष्टि’  समकालीन  साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन पर आधारित है ।  शिवजी श्रीवास्तव जी  बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ आप  गद्य और पद्य  में समान रूप से  लेखन कार्य कर रहे  है। ‘अखिल भारतीय कृष्ण प्रताप  स्मृति कहानी प्रतियोगिता’ में लगातार तीन बार एवं रेडियो नाट्य लेखन प्रतियोगिता में भी आप विजेता रहे हैं ।  भारतीय एवं जापानी काव्य शैलियों में   आप समान रूप से भावपूर्ण सृजन कर रहे हैं यथा - हाइकु, ताँका, क्षणिका, कविता, ग़ज़ल, संस्मरण ,नाटक एवं नवगीत। जीवनी विधा में लिखी आपकी पुस्तक ‘क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर’ वर्ष 2025 में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण कृति है।  पटकथा लेखन  एवं सम्पादन कार्य भी आपने किया है । एक संवेदनशील रचनाकार होने के साथ- साथ आप  सहृदय पाठक  और कुशल समीक्षक भी हैं। आपने अपनी इस पुस्तक में विभिन्न विधाओं की 33 पुस्तकों का तटस्थ मूल्यांकन किया है, समय- समय पर प्रकाशित इन पुस्तकों का अध्ययन और उनकी सारगर्भित समीक्षा करके उन्हें एक पुस्तक के रूप में संकलित करना श्रम साध्य कार्य  है।

शिवजी श्रीवास्तव  जी के समीक्षक रूप के विषय में डॉ. कुँवर दिनेश सिंह ने  फ्लैप पर लिखा है, “समीक्षक के रूप में  श्रीवास्तव जी की एक विशेषता यह  है कि वे  समकालीन  विमर्शों और काव्यशास्त्र के सिद्धांतों का उपयोग तो  करते हैं ;किंतु उनकी समीक्षा कदापि उन विमर्शों व सिद्धांतों से बोझल  नहीं होती। वे किसी ‘विचार’ या ‘वाद’ से प्रतिबद्ध होकर आग्रही दृष्टि  से किसी कृति का मूल्यांकन  नहीं करते।” वास्तव में एक सच्चे समीक्षक का महत्त्व उसकी निरपेक्ष दृष्टि  एवं  नीर-क्षीर विवेक में निहित होता है । शिवजी श्रीवास्तव जी की समीक्षाएँ   रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना को रेखांकित  करने पर  बल देती  हैं ।

आपने प्रत्येक समीक्ष्य कृति में व्यक्त भावों और विचारों के आधार पर अत्यंत सटीक शीर्षक के साथ कृति  को आलोचना के मापदंडों पर परखा है। ‘सृजन दृष्टि’ की समीक्षा करना वास्तव में समीक्षा की समीक्षा करना है। इस पुस्तक में शिवजी श्रीवास्तव जी ने जिन कृतियों को सम्मिलित  किया  है उनमें एक जीवनी, दो उपन्यास, तीन समालोचना, सात काव्य कृतियाँ, एक सेदोका कृति, पाँच हाइकु कृति, एक तांका, सेदोका एवं चोका संग्रह, छः कहानी संग्रह, एक नवगीत संग्रह,दो गज़ल संग्रह,एक छंद   संबंधी कृति, तीन संपादित कृतियाँ । इनमें सबसे अधिक संख्या क्रमशः काव्य कृतियों एवं कहानी  संग्रहों की है । इस पुस्तक में सम्मिलित कृतियाँ हैं- जीवनी-  मेरे भगत सिंह, लेखक- पंकज चतुर्वेदी, उपन्यास - क्रांतिवीर मदारी पासी- ब्रजमोहन, अंगूठे पर वसीयत- डॉ. शोभनाथ शुक्ल,  समालोचना- लघुकथा- लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य-रामेश्वर कांबोज हिमांशु, निकष – डॉ. स्मृति शुक्ल, विभाजन की त्रासदी- मुनीश त्रिपाठी, काव्य संग्रह- लम्हों का सफर- डॉ. जेन्नी शबनम, तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ- डॉ. लालित्य ललित, घुंघरी- डॉ. कविता भट्ट, तुम सर्दी की धूप- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, आलोक के क्षणों में - डॉ.  कुंवर दिनेश सिंह, एक यात्रा ऐसी भी- कैलाश नाथ खंडेलवाल, नहीं रहना मुझे पिंजर बद्ध - शिप्रा मिश्रा, सेदोका संग्रह- मन मल्हार गाए - सुदर्शन रत्नाकर , हाइकु  संग्रह- बंद कर लो द्वार- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वर्ण सितारे- ऋता  शेखर मधु, खिले हैं शब्द- डॉ.  आशा पांडेय, प्रवासी मन- डॉ. जेन्नी शबनम, झील दर्पण- पुष्पा मेहरा, ताँका, सेदोका एवं चोका संग्रह- तीसरा पहर- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कहानी संग्रह- जब तक जिंदा हैं – डॉ.  कुँवर दिनेश सिंह, पिंजड़ा- डॉ. पूरन सिंह, सफेद गुलाब- हरपाल सिंह अरूष, दहलीज के उस पार -अरुण कमल, सपनों के ढ़ाई आखर -रश्मि शर्मा, दोष इसका था- सुदर्शन रत्नाकर, नवगीत- संग्रह-  रोटी का अनुलोम विलोम- श्री शिवानंद सिंह, गज़ल संग्रह- सोच का मौसम गर्म है- हरेराम समीप, भूल बैठा हूँ जिसे- विज्ञान व्रत,काव्यशास्त्र - छंद विधान एवं सृजन रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

संपादित संग्रह- भावनाओं के घरौंदे (काव्य संग्रह ) -सं. डॉ. कुँवर दिनेश सिंह, स्वर्ण शिखर (हाइकु  संग्रह) सं. रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं  डॉ. हरदीप कौर संधु , स्त्री- पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ- सं.  सुकेश साहनी

सृजन दृष्टि में संकलित  पुस्तकों की समीक्षाएँ पाठकों के मन में पुस्तक पढ़ने की रुचि जागृत करती हैं; क्योंकि इनका शीर्षक आकर्षक है । इन पुस्तकों की समीक्षा में समीक्षक ने किसी काव्यशास्त्रीय सिद्धांत अथवा ‘वाद’ को अनिवार्य रूप से आधार नहीं बनाया है, बल्कि आवश्यकतानुसार उनका उपयोग किया है।  समीक्षक एक तटस्थ द्रष्टा  होता है और साक्षी की भाँति कृति से प्राप्त अनुभव को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से जोड़ कर पाठक के समक्ष रखता है। कभी-कभी समीक्षक की पैनी दृष्टि ऐसे -ऐसे तथ्यों एवं भावों को ढूँढ़ लाती है, जिन पर  शायद लिखते समय रचनाकार ने ध्यान भी न दिया हो । समीक्षक  यदि पूरी तरह  रचनाकार की सृजन दृष्टि एवं भावभूमि पर उतर कर समीक्षा करेगा, तो कई पक्ष अनछुए रह जाएँगे; इसीलिए शिवजी श्रीवास्तव जी ने एक सहृदय पाठक की  भाँति लेखक के भाव-जगत और संवेदना को गहराई से आत्मसात करते हुए पूर्वाग्रहों, से मुक्त होकर केवल कृति का  गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन किया है । कृति की मूल आत्मा, शिल्पविधान, भाषाई बारीकियों और अंतर्निहित संदेशों को आपने गहराई से परखा है। समीक्षा में उठाए गए बिंदुओं को आपने सोदाहरण प्रस्तुत किया है। शिव जी श्रीवास्तवजी ने समीक्ष्य कृति को समकालीन  सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में रखकर भी उसकी प्रासंगिकता की परख की  है तथा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक सत्यों को भी उद्घाटित किया है, ‘बंद कर लो द्वार’ की समीक्षा में हम बखूबी  देख सकते हैं । ‘सृजन दृष्टि’ में  विभिन्न पुस्तकों पर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी दी  हैं, उदाहरणार्थ -

‘मेरे भगत सिंह’ निस्संदेह भगत सिंह के जीवन पर लिखी  एक ऐसी अमूल्य  कृति है, जो भगत सिंह के जीवन के लगभग समस्त अध्याय को खोलती है ....हर क्रांति चेता देश भक्त के लिए ये एक अनिवार्य और पठनीय कृति  है.। इसे पढ़ने के पश्चात महान क्रांतिकारी के जीवन से समग्र रूप से साक्षात्कार किया जा सकता है। ‘लम्हों का सफर’ सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है।  एक- एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ  हैं, कहीं दर्द है, कहीं प्रेम है, कहीं नारी नियति के चित्र हैं, कहीं उलहाने हैं, कहीं दायित्वबोध है, तो कहीं घनीभूत पीड़ा की चरमावस्था  है । ‘मन मल्हार गाए’  के समस्त सेदोंका भावपूर्ण मनःस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाले सरस सेदोका हैं ।  विषय कोई भी हो कवयित्री का संवेदनशील मन प्रत्येक सेदोका के पीछे से झाँकता है। ‘तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ’ डॉ. लालित्य ललित जी की कविताएँ  सर्वथा अलग ढंग की कविताएँ  होती हैं।  वे साधारण शब्दों में असाधारण रचते हैं। लालित्य जी किसी ‘वाद’ या ‘घेरे’ के कवि  नहीं हैं । उनकी प्रतिबद्धताएँ  जीवन के प्रति है, उनकी कविताएँ जीवन में आनंद खोजने की कविताएँ  हैं । ‘बंद कर लो द्वार’ अभिनव कल्पनाओं और बिंबों से संयुक्त 662 हाइकु का संग्रह है... कवि की चेतना लोक जीवन की ही चेतना होती है। कवि  का जो कुछ निजी होता है, वह लोक का ही सुख- दुःख होता है, इस दृष्टि से यह संग्रह लोक जीवन के सुख- दुःखों की अभिव्यक्ति के हाइकु का संग्रह है... इसमें भारतीय काव्यशास्त्र के समस्त गुण विद्यमान हैं। ‘जब तक जिंदा हैं’  बेजोड़ शिल्प एवं अनूठे कथ्य  वाली समस्त कहानियाँ  रोचक एवं कथा रस से परिपूर्ण हैं। ‘क्रांतिवीर मदारी पासी’ मदारी पासी के ‘ऐका आंदोलन’ को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास में रोचकता और पठनीयता के साथ ही इतिहास को भी सुरक्षित रखा गया है।

समीक्षा  की सीमा को देखते हुए  हर  पुस्तक के विषय में यहाँ उल्लेख करना संभव नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात पाठकों की अच्छे साहित्य की तलाश काफी हद तक पूरी हो जाएगी; क्योंकि 33 पुस्तकों की गहन समीक्षा करके शिव जी श्रीवास्तव जी ने यह कार्य सुगम कर दिया है।

May 1, 2026

किताबेंः युवा क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति

  - प्रो. सुरंगमा यादव 

पुस्तक : मेरे भगत सिंह : लेखक- पंकज चतुर्वेदी, संस्करण:प्रथम 2026, पृष्ठ:324, मूल्य: रु 350 , प्रकाशकः पेंगुएन स्वदेश, पेंगुएन रैंडम हाउस, इण्डिया,प्रा . लि . चौथी मंज़िल,कैपिटल टॉवर,-1एमजी रोड गुरुग्राम, हरियाणा-122002

भगत सिंह  एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ उच्चकोटि के दूरदर्शी विचारक भी हैं। यह बात और है  कि उनके जीवन काल में उनके विचार, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की भाँति  प्रचार न पा सके । यदि जिंदगी ने उन्हें मौका  दिया होता तो, आजादी की  लड़ाई की भाँति  स्वतंत्र भारत में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती।  उन्हें महज़ 'असेंबली बम कांड' या 'सांडर्स वध' के अभियुक्त के रूप में देखना उनके विशाल व्यक्तित्व को  संकुचित करने जैसा है। वे एक ऐसे नायक थे, जिनसे अंग्रेज सरकार  इस कदर  भयभीत थी कि उनकी शहादत के बाद भी जन- आक्रोश के डर से उनके पार्थिव शरीर को रात के अँधेरे में जला दिया गया। जो क्रांतिकारी जीते जी साम्राज्यवाद के लिए चुनौती बना रहा, उसका शव भी फिरंगियों के मन में भय पैदा कर रहा था।

भगत सिंह केवल सशस्त्र क्रांति के पक्षधर नहीं थे, बल्कि एक प्रखर वैचारिक योद्धा भी थे। उनका लक्ष्य केवल  देश को आजाद कराना मात्र नहीं था,  बल्कि उससे भी कहीं  आगे, स्वतंत्र भारत की तस्वीर कैसी होनी चाहिए,   इसका  पूरा खाका उनके दिमाग में स्पष्ट था।  वे एक ऐसे समाजवादी गणराज्य का स्वप्न देखते थे,  जहाँ शोषण का कोई स्थान न हो और प्रत्येक नागरिक की हिस्सेदारी समान हो। यही कारण था कि उन्होंने अपने संगठन का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) रखा।  उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल चेतना  और शक्ति आरंभ से ही  थी, उनकी सबसे प्रिय पुस्तक कार्लाइल की लिखी 'क्राई फॉर जस्टिस' थी। वे  विवाह को क्रांति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तथा क्रांति को ही धर्म मानने वाले थे ।   

‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक के लेखक पंकज चतुर्वेदी, जो  मूल रूप से पत्रकार हैं, ‘जवाहर  लाल हाजिर हों’ के साथ- साथ आपने कई  चर्चित पुस्तकें  लिखी हैं  और कई प्रतिष्ठित सम्मानों से आपको सम्मानित किया गया है। 

 ‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक का शीर्षक जितनी आत्मीयता से भरा हुआ है, लेखक ने उतने ही मनोयोग से इस पुस्तक की रचना की है।  यह पुस्तक भगत सिंह के संपूर्ण व्यक्तित्व और विचारों को प्रामाणिक ढंग से हमारे सामने रखती है,  क्योंकि इसमें भगत सिंह से सीधे जुड़े लोगों के विचार और उनके संस्मरणों को आधार बनाया गया है। यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है तथा प्रत्येक खंड अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि प्रत्येक खंड  भगत सिंह के विचारों व  व्यक्तित्व के   उन  पहलुओं को उजागर करता है, जो बहुत कम लोगों तक सीमित थे। यह कृति केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भगत सिंह के मानवीय और वैचारिक पक्षों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

पूत के पाँव पालने में, कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी,राजनेता,मीडिया और विमर्श- इन चार खंडों में भगत सिंह के छोटे -से जीवनकाल  के वृहत् अध्यायों को समेटने का सफल प्रयास किया गया है। 

    प्रथम खंड में भगत सिंह के निकटस्थ जनों के संस्मरण है, जो पाठक को भगत सिंह से आत्मीय जुड़ाव की अनुभूति कराते हैं तथा भगत सिंह के व्यक्तित्व व  विचारों के उन पक्षों को अनावृत करते हैं, जो भगत सिंह को एक क्रांतिकारी की चर्चित भूमिका से अलग वैचारिक योद्धा तथा एक ऐसे नौजवान के रूप में हमारे सामने लाते हैं ,जो कि जीवन के उल्लास से पूर्ण है, दिल खोलकर हँसता है,  रोता है, दिल्लगी करता है, वाकपटु है, उदार है और प्रेम के भावों से परिपूर्ण है; परंतु कर्तव्य पथ का पथिक है। ये संस्मरण लाहौर नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल छबीलदास की पुत्री सुश्री मनोरमा दीवान के हैं, जहाँ भगत सिंह ने 1923 में प्रवेश लिया।  लाहौर स्थित द्वारिकादास पुस्तकालय में लाइब्रेरियन राजाराम शास्त्री, प्रो. जगमोहन सिंह द्वारा भगत सिंह की पूजनीय माँ श्रीमती विद्यावती जी का 1975 में लिये गए  साक्षात्कार के रूप में तथा उनके छोटे भाई कुलतार सिंह की बेटी सुश्री वीरेन्द्र सिंधु के माध्यम से प्रस्तुत हुए हैं। बेहद सहज- सरल भाषा में ये  पर्त दर पर्त खुलते हुए पाठक के सामने एक  ऐसे भगत सिंह को खड़ा करते हैं, जो जाँबाज तो है ही, संवेदनाओं व भावनाओं से भरा हुआ भी है। हमेशा हँसते रहने वाले भगत सिंह अपनी माँ से कहा करते थे, ‘बेबे तुम परेशान न हुआ करो।  तुम्हारे लिए एक  अनोखी दुल्हन ब्याहकर लाऊँगा’, भगत सिंह का आशय  हिंदुस्तानी की आजादी से था। राजाराम शास्त्री के अनुसार अदालत में भगत सिंह को हँसते  देखकर मजिस्ट्रेट के टोकने पर भगत सिंह, सिंह की तरह गरजते हुए कहते हैं, “मजिस्ट्रेट महोदय,इस समय  आपको मेरा हँसना अच्छा नहीं लगता; पर उस दिन आप क्या करेंगे, जिस  दिन मैं  फाँसी के तख्त पर भी हँसूँगा और इंकलाब  जिंदाबाद चिल्लाऊँगा?”

 खंड दो ‘कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी’ के अंतर्गत क्रांतिकारी शिव वर्मा की भगत सिंह के साथ पहली मुलाकात से लेकर शहादत के कुछ समय पूर्व हुई मुलाकात का विवरण  तथा उनसे कहे गए शब्दों को पढ़कर मन भावुकता और गर्व से भर उठता है कि जानें किस मिट्टी के बने थे ये लोग, जिनके मन में शहादत की होड़ लगी हुई थी। ‘सांडर्स वध’ के बाद भगत सिंह की पत्नी का स्वांग रचकर उन्हें लाहौर से  सुरक्षित निकालने वाली दुर्गा भाभी का योगदान और चंद्रशेखर आजाद का संदेश  लेकर  गांधी जी से उनकी  वह ऐतिहासिक मुलाकात, जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों की फाँसी रुकवाने का प्रयास किया, इस खंड का मुख्य आकर्षण है।

  अजय कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त, भगवान दास माहौर, विजय कुमार सिन्हा और यशपाल जैसे  क्रांतिकारी साथियों की  दृष्टि से भगत सिंह का चित्रण इस पुस्तक को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की श्रेणी में खड़ा करते हैं।

     तीसरा खंड ‘राजनेता’ शीर्षक से है जिसमें सुभाष चन्द्र बोस द्वारा  महात्मा गाँधी से आग्रह करना, शहादत के बाद महात्मा गाँधी, मोहम्मद अली जिन्ना, ई.एम.एस.  नंबूदरीपाद, महामना  आदि के  विचार यह सिद्ध करते हैं कि भगत सिंह आजादी की लड़ाई में कितना महत्त्वपूर्ण थे तथा उनकी शहादत से स्वाधीनता आंदोलन को गति मिली है। यह खंड भगत सिंह तथा साथियों की फाँसी के संबंध में महात्मा गाँधी पर उठने वाले प्रश्न चिह्नों  के काफी हद तक  उत्तर तलाशते हुए  महात्मा गाँधी की भूमिका को रेखांकित भी करती है। 

 अंतिम खंड ‘मीडिया और विमर्श’ में भगत सिंह की शहादत के पश्चात्  ब्रिटिश और भारतीय मीडिया की टिप्पणियाँ  हैं, जो ये बताती हैं कि किस तरह पूरी दुनिया में भगत सिंह की शहादत से क्रिया- प्रतिक्रिया हुई। भारत में  शोक की लहर दौड़ गई, जनाक्रोश की आँच  ब्रिटिश संसद तक पहुँची। 

यह पुस्तक इसलिए भी  महत्त्वपूर्ण है ; क्योंकि ये केवल  शहादत तक ही सीमित नहीं है ; बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद तत्कालीन  नेताओं ने फाँसी की सजा  रुकवाने के लिए क्या प्रयास किए,  इसका ब्यौरा भी प्रस्तुत करती है। 

 वास्तव में उपर्युक्त  चारों खंडों में विभिन्न लोगों के जो विचार, संस्मरण अब तक  बिखरे हुए रूप में  हमें प्राप्त होते थे, इस पुस्तक में उन सभी को लेखक ने  एक शोधार्थी की भाँति  एकत्र करके  पुस्तक का रूप प्रदान किया है तथा मूल कथ्य  के प्रति पूर्ण सतर्कता एवं सावधानी बरती है। 

 इस पुस्तक में अनेक दुर्लभ चित्र हैं, जिन्हें देखकर रोमांच हो उठता है तथा पुस्तक और भी प्रामाणिक बन जाती  हैं। भगत सिंह के जीवन संघर्ष, उनके विचारों की गहराई, सोच की ऊँचाई और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से करने के कारण यह पुस्तक सार्वकालिक प्रासंगिक व पठनीय  है।

Mar 1, 2026

आलेखः ऑनलाइन गेमिंग एक मकड़जाल

 - डॉ. सुरंगमा यादव 

अभी कुछ माह पहले की एक घटना मन को आज भी आंदोलित  कर रही है, लखनऊ में ऑनलाइन गेम के जाल में फँसकर एक 13 वर्षीय किशोर ने, जो कि कक्षा छह का छात्र था, आत्महत्या कर ली। कारण वह 14 लाख  रुपये गेम में हार गया था। ये 14 लाख रुपये की बड़ी रकम  उसके पिता ने मकान बनवाने के लिए खेत बेचकर जमा की थी, जैसे ही किशोर को यह पता चला कि  पैसे गायब होने की जानकारी पिता को हो गई है, उसने डर के कारण फाँसी लगा ली। फ्री फायर बैटल रॉयल शैली का गेम है। बच्चे गेम में पसंद की चीजें खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं और लाखों गँवा देते हैं। 

   वर्ष 2022 से  सरकार ने इसे बैन  कर रखा है; लेकिन अभी भी यह चल रहा है । ऑनलाइन गेमिंग में पैसा लगाकर और भी  बहुत से लोग जान- माल का नुकसान उठा चुके  हैं। किशोर ही नहीं, बड़े भी इसकी लत में पड़ रहे हैं ।  छोटी कक्षाओं से लेकर दसवीं -बारहवीं, प्रतियोगी छात्र यहाँ तक की नौकरी पेशे वाले भी इसकी गिरफ्त में आकर आत्महत्या कर चुके हैं । यह किसी एक शहर की बात नहीं, पूरे देश में ऐसी घटनाएँ  हो रही हैं। पिछले दिनों झांसी में आठवीं में पढ़ने वाले  इकलौते बेटे की ऑनलाइन गेमिंग की लत से परेशान होकर माँ ने खुदकुशी कर ली, बेटा दोस्तों के साथ पबजी खेलता था। ऐसी घटनाएँ कितनी भयावह हैं ।ऑनलाइन गेमिंग की लत परिवार पर कहर बनकर टूट रही है। टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग के दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में सामने आ रहे हैं, जिसमें से एक ऑनलाइन गेम की लत भी है।

 आज कम  उम्र में ही बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि मिल जाते हैं, जो उन्हें पढ़ाई के एक सहायक उपकरण के रूप में दिए जाते हैं लेकिन वे इनका दुरुपयोग करने लगते हैं। बच्चों के अपने कमरे हैं, अपनी प्राइवेसी है। डिवाइस में पासवर्ड लगा कर रखते हैं, ऐप हाइड भी कर देते हैं, अलग विंडो बना लेते हैं। बच्चे मोबाइल व लैपटॉप में एक साथ कई ऐप खोलकर रखते हैं, किसी की आहट पाते ही झट से उसे बदल देते हैं। ज्यादा पूछताछ करने पर बच्चे क्रोधित होकर चीखते- चिल्लाते हैं, तथा कई प्रकार के आरोप -प्रत्यारोप माता- पिता पर ही लगाने लगते हैं। कमरे में माता -पिता की उपस्थिति असहज करती है। बच्चे टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट बन रहे हैं, ये अच्छी बात है; परंतु वे इसका गलत इस्तेमाल करके अपने लिए ही नहीं अपने घर- परिवार के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। सीधे -सादे  माता -पिता समझ नहीं पाते हैं; क्योंकि  वे टेक्नोलॉजी के इतने जानकार भी नहीं हैं।

ये तो एक -दो खेलों का जिक्र था, ऐसे ही कितने ही खेल हैं जो बर्बादी के कारण बन रहे हैं। पैसे कमाने का लालच भी एक बहुत बड़ा कारण है ऑनलाइन गेमिंग का। इनमें से कई खेलों का विज्ञापन चर्चित चेहरे भी करते हैं, विज्ञापन के अंत में एक चेतावनी की औपचारिकता भी रहती है कि अपने जोखिम पर खेलें इसकी लत भी लग सकती है; परंतु खेलने वाले इस पर ध्यान नहीं देते हैं। सबसे पहले इन विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए।

 सूचना, मनोरंजन व पढ़ाई में सहायक मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि घरों में कलह का एक नया कारण बन बन चुके हैं। फ़ोन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों को आक्रामक बना रहा है। किशोर ही नहीं, किशोरियाँ भी इस हद तक आक्रामक हो रही हैं कि  परेशान अभिभावक राज्य महिला आयोग की जन- सुनवाई में परामर्श के लिए पहुँच रहे हैं।

   आयोग की सदस्य मीनाक्षी भराला के अनुसार, “विभिन्न जिलों में होने वाली जन- सुनवाई में हर बार तीन -चार मामले ऐसे सामने आ रहे हैं, जिनमें माताएँ अपनी बेटियों के फोन अधिक इस्तेमाल करने से परेशान होकर मदद माँगने आती हैं। कई मामलों में नाबालिग बेटी को फोन चलाने से रोकने पर माँ पर हाथ उठाने या  हिंसक व्यवहार तक कर रही हैं (अमर उजाला 13-11-2025)।”

आयोग के अनुसार ही एक माँ ने जब अपनी बेटी को फ़ोन चलाने से रोका, तो उसने नाखून से उसका मुंह नोच लिया। संवेदनहीनता इस हद तक कि माँ  रोती रही और बेटी हँसती रही। आज एक डायलॉग जो अकसर बच्चे अपने माता- पिता से बोलते नजर आते हैं- ये उनकी ज़िन्दगी है, वह जैसा चाहें वैसा जिएँगे ये कोई और तय  नहीं करेगा।  आज फ़ोन के अधिक इस्तेमाल से बच्चे आक्रामक हो रहे हैं, वे चिड़चिड़े व झगड़ालू  हो रहे हैं। छोटी -छोटी बातों पर चीखते- चिल्लाते हैं तथा अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। बच्चों के मन की असंतुष्टि दिन- प्रतिदिन उनकी माँगों में बढ़ोतरी कर रही है तथा माता- पिता के साथ टकराव का कारण बन रही है। घर के सदस्य होटल की तरह अपने – अपने  कमरों तक सीमित हो गए हैं। बच्चा अपने कमरे में बैठकर कौन- सा गेम खेलता है, किससे  बात करता है, क्या चीज़ देखता है, यह समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है। बच्चे अपनी उलझनों को माता- पिता या घर के किसी अन्य सदस्य से बताना आवश्यक नहीं समझते। आज के बच्चे बड़ों को ये मान बैठे हैं कि उन्हें आज के समय का चलन नहीं पता है। उन्हें  लगता है कि यह न जाने किस युग की बात कर रहे हैं । डिजिटल दुनिया से ज्यादा जुड़ाव उन्हें वास्तविक जीवन से दूर करता जा  रहा है। आधुनिक माँएँ तो खुद ही बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप के आकर्षण में उलझा रही है । छोटे- छोटे बच्चों को कार्टून दिखाकर खाना खिलाया जा रहा है। धीरे- धीरे ये बच्चों की आदत बन जाती है कि जब तक वे कार्टून नहीं देखेंगे, तब तक खाना नहीं खाएँगे । थोड़ा बड़ा होने पर बच्चा खुद ही मोबाइल में कार्टून देखने लगता है। पहले उन्हें कुछ समय के लिए मोबाइल दिया जाता है, धीरे- धीरे उस समय को बच्चे थोड़ा और थोड़ा करके बढ़ा लेते हैं और इस तरह से बच्चे में मोबाइल देखने की आदत पड़ जाती है। बच्चों में यह लत भयावह रूप धारण न कर ले, इसके लिए हमें समय रहते सचेत होना पड़ेगा तथा बड़े बच्चों को धीरे- धीरे समझाकर या आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाकर इस लत  से छुटकारा दिलाना होगा।

Aug 1, 2025

हाइबनःनदी का दर्द

  - डॉ. सुरंगमा यादव

बदरीनाथ धाम के लिए हम सब बदायूँ से सुबह सात बजे निजी वाहन से निकले। हल्द्वानी तक तो पहाड़ी और मैदानी रास्तों में अधिक अंतर पता न चला; परन्तु उसके बाद हम जैसे -जैसे ऊपर चढ़ते गए, पहाड़ काटकर बनाए  गए गोल घुमावदार रास्ते रोमांच मिश्रित भय की अनुभूति कराने लगे। जब गाड़ी ओवरटेक होती, तो नीचे गहरी खाई देखकर जान ही सूख जाती। पहाड़ों से बहते हुए झरने दुग्ध की धवल धार से प्रतीत हो रहे थे। मन में सहसा प्रश्न  उठा, अपने  अंतस्तल से निर्मल, शीतल, शुद्ध जलधार प्रवाहित करने वाले पहाड़ों को कठोर क्यों कहते हैं? दूर तक फैले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बहते हुए झरनों की पतली धार आँसुओं की सूखी रेखा-सी  प्रतीत हो रहे थे। शायद अपनी ऊँचाई  के कारण एकाकी पहाड़ स्वयं को ही अपना सुख-दुःख सुनाकर हँसते-रोते रहते हैं।  जागेश्वर जी पहुँचते- पहुँचते अँधेरा हो गया। ड्राइवर ने रात्रि में आगे चलने से मना किया, तो हम लोग रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए। प्रातः हमने अपनी यात्रा पुनः शुरू की।  दोपहर होते- होते हम उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बदरीनाथ धाम पहुँच गए। अलकनंदा  का जल हल्का हरा रंग लिये हुए इतनी तीव्र गर्जना और वेग के साथ बह रहा था, मानो पहाड़ रूपी पिता के घर से विदा लेते समय मन में भावनाओं का रेला उमड़ पड़ा हो। जल इतना निर्मल कि उसमें पड़े हुए पत्थर भी साफ नजर आ रहे थे। यही पहाड़ी नदियाँ सागर से मिलने की आतुरता में अपने मैदानी सफर में कितनी मलिन हो जाती हैं!

सागर दूर

मैदानों संग नदी

हुई बेनूर।


Jun 1, 2025

कविताः रणभेरी

  -  डॉ. सुरंगमा यादव


पल में क्या से क्या हो गया, समझ नहीं ये कुछ आया

खुशी रुदन में बदल गई थी, खूनी मंजर था छाया।

 


अभी सजा सिंदूर माँग में, मेंहदी का रंग गहराया

खुशियाँ सारी ढेर कर गया क्षण में आतंकी साया।

कायरता भी शर्मसार है, ऐसा कत्लेआम किया

सिंदूरी सपनों को पल में, अरथी पर है सुला दिया।

 

माँ का सूना आँचल कहता, लाल कहाँ तुम चले गए

वापस आए नहीं दुबारा किस पापी से छले गए ।

नाम धर्म का लेकर अपने धर्म को भी वे  लजाते हैं ।

खाने के लाले  हैं घर में, खैरात माँग इतराते हैं।

 

धर्म नहीं है उनको प्यारा, नफ़रत, हिंसा प्यारी हैं।

अपनी कौमों के माथे पर लिखते वे गद्दारी हैं ।

दहशतगर्दी फैलाना ही, धर्म जिन्होंने माना है

इंसानी जानों की कीमत, उनको क्या समझाना है।

 

शृगालों ने खुद ही आकर शेरों को ललकारा है।

उनका दण्डित करना ही अब पहला धर्म हमारा है।

प्रेम- अहिंसा धर्म हमारा, तब तक हमें सुहाता है

शत्रु हमारी ओर न जब तक  अपनी आँख उठाता है ।

 

दुष्ट- दलन के लिए कृष्ण को चक्र चलाना पड़ता है

मर्यादा पुरुषोत्तम को भी धनुष उठाना पड़ता है।

जिसको प्रेम- शांति की भाषा, अब तक  कभी नहीं भाई

उसे शस्त्र की भाषा  में  समझाने की अब बेला आई ।

 

जिसे ‘सीजफायर’ में भी बस ‘फायर’ याद ही रहता है

उसके इरादे ‘सीज़’ करें हम, बच्चा-  बच्चा कहता है।

धोखे का ही रक्त रगों में जिसकी बहता रहता है

उसकी क्रूर कुचालों की इतिहास सच्चाई कहता है।

 

सेना की रणभेरी ने अब ऐसा राग सुनाया है

दहशत फैलाने वाला ही, खुद दहशत में आया है ।

केवल ये ‘सिंदूर’ नहीं है, शिव का ताण्डव नर्तन है

वे भी बचा नहीं पाएँगे, जिनका मिला समर्थन है ।


Apr 1, 2025

कविताः इति आई !





- डॉ. सुरंगमा यादव

दीमकों ने खाई

सी नहीं पाई

पुरानी किताब

बड़े-बड़े जिल्दसाजों की

कला भी काम न आई

सहेजा बहुत

 सचेत हाथों ने

पीले पन्नों की टूटन

पर रुक न पाई

बेमन विसर्जन की बेला

अब लगता आई

हा! इति आई।

Dec 1, 2024

कविताः उठो स्त्रियो!

  - डॉ. सुरंगमा यादव


हे ईश्वर!

विधवा स्त्रियाँ

तय कर रहीं तुम्हारी

जवाबदेहियाँ

पूजा तुम्हारी

कितने व्रत -उपवास

आए तुम्हें न रास

जिसके लिए माँगती रहीं दुआ

तुमने उसी से कर दिया जुदा

क्या तुम भी ग्रस्त हो?

समाज की रूढ़ियों से

पुरुष प्रधान

तुमने भी लिया मान

यह कैसा तरीका?

मृत्यु में भी उसे ही

दी तुमने वरीयता

विधुर होने की पीड़ा से

पुरुष बच जाता है तुम्हारी क्रीड़ा से

कोमल हृदया स्त्री पर

डाल देते हो पीड़ा गुरुतर

अनंत पथ पर पुरुष अग्रगामी

स्त्री पर आयी जैसे सुनामी

वैधव्य का दंश झेलती

मृतप्राय हो जाती हैं

विधवा स्त्रियाँ

एक स्त्री सिर्फ पति ही नहीं खोती

उसके साथ खो देती है

सारी खुशियाँ तीज- त्योहार

साज-सिंगार!

उसके हृदय की चीत्कार

तुम्हें कोसती है बार- बार

क्यों नहीं हर लिये तुमने उसके प्राण!

क्यों किया पति को निष्प्राण

विधवाओं की लंबी कतारें

लगाती हैं तुमसे न्याय की गुहारें

क्योंकि तुम्हें ही पूजा था

और तुम्हीं ने उपेक्षिता बनाकर

टाँग दिया हाशिए पर

वैधव्य को महसूस कराने की

कैसे ये रीति-रिवाज

उतारा जाता है जब उसका साज-सिंगार

उमड़ता है दु:ख का पारावार

जिन बच्चों को पाला -पोसा

जिन रिश्तों को सँजोया-सँवारा

उनकी ही नजरों में आ गया फर्क-सा

जाए कहाँ? किसको सुनाए?

खुलकर बेचारी रो भी न पाए

सवाल बड़ा है?

हमेशा ही स्त्रियाँ

क्यों पाती हैं उधार की खुशियाँ

कभी सुहाग चिह्न लादें

कभी वे उतारें

बन जाती है एक स्त्री

चलता -फिरता प्रमाणपत्र

पति के जीवन अथवा मृत्यु का

पाँवों में अपने बेड़ियाँ कसके बाँधें

क्यों सहे वे ये सब?

क्यों जिएँ सूना जीवन

मृत्यु से पहले मृत्यु का वरण

साँसों का रिदम टूटना तय है

कोई आगे तो कोई पीछे गया है

प्यार लेकिन कभी भी मरता नहीं है

कल मूर्त्त था आज अमूर्त्त हुआ है

उसी प्यार का मान मन में रहे बस

साज-सिंगार छोड़े, उदासी लपेटे

क्यों रहे स्त्री मन को मसोसे

सौभाग्य उसका पुरुष मात्र ही है?

अन्यथा शून्य ही उसकी नियति है?

उठो स्त्रियो! रूढि़याँ सारी तोड़ो

जीवन में खुशियों से नाता न तोड़ो

तुम्हारी भी अपनी एक अस्मिता

ढूँढ लो फिर से उसका पता

सारे रंग- सिंगार- त्योहार 

अपने लिए अब सजाओ

जमाने से ऐसे नज़र न चुराओ।


Jun 1, 2024

हाइबनः जीवन-धारा

 डॉ. सुरंगमा यादव

बद्रीनाथ धाम के लिए हम सब बदायूँ से सुबह सात बजे निजी वाहन से निकले। हल्द्वानी तक तो पहाड़ी और मैदानी रास्तों में अधिक अंतर पता न चला; परन्तु उसके बाद हम जैसे -जैसे ऊपर चढ़ते गए, पहाड़ काटकर बनाए गए गोल घुमावदार रास्ते रोमांच मिश्रित भय की अनुभूति कराने लगे। जब गाड़ी ओवरटेक होती. तो नीचे गहरी खाई देखकर जान ही सूख जाती। पहाड़ों से बहते हुए झरने दुग्ध की धवल धार- से प्रतीत हो रहे थे। मन में सहसा प्रश्न  उठा , अपने  अंतस्तल से निर्मल, शीतल, शुद्ध जलधार प्रवाहित करने वाले पहाड़ों को कठोर क्यों कहते हैं? दूर तक फैले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बहते हुए झरनों की पतली धार आँसुओं की सूखी रेखा-सी  प्रतीत हो रहे थे। शायद अपनी ऊँचाई  के कारण एकाकी पहाड़ स्वयं को ही अपना सुख-दुःख सुनाकर हँसते-रोते रहते हैं।  जागेश्वर जी पहुँचते-पहुँचते अंधेरा हो गया। ड्राइवर ने रात्रि में आगे चलने से मना किया तो हम लोग रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए। प्रातः हमने अपनी यात्रा पुनः शुरू की। दोपहर होते-होते हम उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बद्रीनाथ धाम पहुँच गए। अलकनंदा का जल हल्का हरा रंग लिये हुए इतनी तीव्र गर्जना और वेग के साथ बह रहा था। मानो पहाड़ रूपी पिता के घर से विदा लेते समय नदी के मन में भावनाओं का रेला उमड़ पड़ा हो। जल इतना निर्मल कि उसमें पड़े हुए पत्थर भी साफ नजर आ रहे थे। यही पहाड़ी नदियाँ खिंचती चली जाती हैं सागर की ओर, अंततः लंबी यात्रा के बाद सागर में मिलकर ही विश्राम लेती हैं। जीवन भी एक लंबी यात्रा  है। एक दिन उसे विश्राम लेना ही है। फर्क सिर्फ इतना है, नदी को यात्रा की दूरी ज्ञात है , जीवन की यात्रा कब कहाँ समाप्त होगी यह अज्ञात है।  

जीवन गति

पथिक को अज्ञात

कहाँ है इति। 

किताबेंः साहित्य की गहनतम अनुभूतियों का रसपान कराती पुस्तक

-  डॉ. सुरंगमा यादव

संवेदना एवं अभिव्यक्ति (विमर्श ) : प्रथम संस्करण: 2024, मूल्य: 280 रुपये (सज़िल्द), पृष्ठ: 104, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/ 139, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली - 110059

भूमिका पुस्तक का दर्पण होती है,जिसमें पुस्तक का मुखड़ा प्रतिबिंबित होता है। किसी पुस्तक में भूमिका के दो रूप देखे जा सकते हैः पहला, रचनाकार द्वारा व्यक्त किए गए स्वयं के उद्गार; दूसराः किसी अन्य साहित्यकार, स्नेही या आत्मीय जन द्वारा लिखी गयी भूमिका। इसमें शुभेच्छा का भाव प्रमुख होता है। भूमिका पुस्तक प्रकाशन से पूर्व अस्तित्त्व में आती है जिसमें पुस्तक की उन विशेषताओं तथा अंशों को उजागर किया जाता है, जिसे पढ़कर पाठक में पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न हो सके।

समीक्षा पुस्तक प्रकाशन के पश्चात् लिखी जाती है। समीक्षक तटस्थ भाव से पुस्तक की विशेषताओं तथा कमजोर पक्षों को रेखांकित करता है। विषय- विस्तार, भाषा- शैली, संप्रेषण, सामाजिक सरोकार आदि को दृष्टिगत रखकर समीक्षक कृति की परख करता है। समीक्षा पाठक के मस्तिष्क पर रचना की रेटिंग- सी कर देती है।

रामेश्वर कांबोज ‘हिमांशु’ जी का लेखन- फलक बहुत विस्तृत है।  गद्य और और पद्य साहित्य की विविध विधाओं के साथ- साथ बाल कविताओं तथा  पाठ्य पुस्तकों की रचना भी आपने की है। आप न केवल एक  सहृदय साहित्यकार हैं: बल्कि एक जागरूक पाठक भी है। भूमिका तथा समीक्षा लेखन आप की सर्जनशीलता का एक प्रमुख आयाम है। भूमिका लिखना हो या समीक्षा आप कृति का सर्वांगपूर्ण अवलोकन और अध्ययन करने के उपरान्त ही अपनी  लेखनी चलाते हैं। आपकी पारखी दृष्टि आलोच्य कृति का तटस्थ मूल्यांकन करके ऐसा निचोड़ प्रस्तुत करती है कि पाठक पुस्तक के हर पक्ष से परिचित हो जाता है। सद्यः प्रकाशित ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’ हाथ में आने पर यह विचार और भी प्रबल हो गया। ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’  में  आपने स्वयं की कृति सहित कुल 14 रचनाकारों की रचनाओं पर सारगर्भित समीक्षात्मक लेख लिखे हैं।

डॉ. जेन्नी शबनम की चार कृतियों- लम्हों का सफर- काव्य संग्रह, प्रवासी मन- हाइकु संग्रह, नवधा- विविध काव्य विधा संग्रह तथा मरजीना- क्षणिका संग्रह, डॉ. कविता भट्ट -मीलों चलना है- काव्य संग्रह तथा काँठा माँ जून- हिन्दी हाइकु का गढ़वाली में अनुवाद, कृष्णा वर्मा -सिंदूरी भोर- हाइकु संग्रह, डॉ. भीकम सिंह-सिवानों पे गाँव- हाइकु-संग्रह तथा थके से सहयात्री- चोका- संग्रह, रचना श्रीवास्तव- सपनों की धूप- हाइकु संग्रह, सुदर्शन रत्नाकर-मन मल्हार गाए, बोलो न निर्झर, युग बदल रहा है; क्रमशः सेदोका, छोटी कविताएँ तथा काव्य संग्रह, डॉ. हरदीप कौर सन्धु-रंग शहूदी-द्विपदी कविताएँ, रश्मि विभा त्रिपाठी-मन की परिधि-काव्य संग्रह, डॉ. मीना अग्रवाल- बातें करती हवा- हाइकु संग्रह, रामेश्वर काम्बोज- नवगीत की भूमिका, डॉ. पद्मजा शर्मा- आसमान को छूना है, शिव डोयले-शब्दों के मोती, पुरुषोत्तम श्रीवास्तव ‘पुरु’-अनुभूति के पल तथा रेखा रोहतगी- मन मुखिया, हाइकु संग्रहों पर अपनी लेखनी चलाकर सुधी पाठकों का मार्ग प्रशस्त किया है। 

पुस्तक की भूमिका में आप लिखते हैं- “हमारे भावप्रवण साथियों ने चाहे छोटी-बड़ी कविताएँ लिखी हों, चाहे जापानी शैली के हाइकु, ताँका,चोका, सेदोका आदि रचे हों, उनमें हमारी समूची भारतीयता दूध-मिसरी की तरह घुल गई है है, उनमें संस्कृति की सुगंध रच-बस गई है।

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे अपने अग्रजों की रचनाओं के साथ-साथ युवा साथियों के साहित्य की गहनतम अनुभूतियों का आनंद प्राप्त करने का भी अवसर मिला है।”

पुस्तक के कुछ प्रमुख उद्धरण हैं- डॉ. जेन्नी शबनम की कविताओं में जीवन की जद्दोजेहद के साथ संतप्त मन लिये आगे बढ़ने का संघर्ष है-लम्हों का सफर।

कोहरा ढक ले/अठखेलियाँ सारी/प्रिय-संग की।  

डाकिया आँखें/मन के ख़त भेजे/ प्रिय न पढ़े।

सर्द न होना/चाय की प्याली जैसे/अधर धरो।- ( मीलों चलना है/  डॉ. कविता भट्ट )

 उपर्युक्त ये तीन हाइकु केवल हाइकु नहीं, वरन् किसी कुशल कैमरामैन द्वारा लिए गए स्नैपशॉट प्रतीत होते हैं। 

डॉ. भीकम सिहं वही हाइकुकार हैं, जिनके पास चित्रकार की कल्पना, कैमरामैन की सटीक दृश्य को क्लिक करने की सूझ-बूझ और कवि के शब्द-चित्रांकन की क्षमता मौजूद है-सिवानों पे गाँव। 

कवयित्री  डॉ.  हरदीप कौर सन्धु को शब्द-सिद्धि प्रप्त है । वह आसपास के शब्दों में प्राण फूँककर उनको जीवंत कर देती हैं ।प्राण प्रतिष्ठा होने पर उनके शब्द श्लोक का रूप धारण कर लेते हैं-रंग शहूदी।

21 कृतियों का समग्रता में परिचय कराने वाली ‘संवेदना एवं अभिव्यक्ति’ पुस्तक में दो लेख- भाव जगत के मोती तथा बहुवर्णी भावों का गुलदस्ता क्रमशः मरजीना तथा बातें करती हवा, कृति के नाम निर्धारण से पूर्व लिखी गयी भूमिकाएँ है, इसी कारण इनमें कृति के नामों का उल्लेख नहीं आ सका है। 

Mar 7, 2024

महिला दिवसः स्त्री - पुरुष असमानता और हमारा समाज

 - डॉ. सुरंगमा यादव

हम सभी जानते हैं संसार में प्राकृतिक रूप से दो प्रकार के प्राणी या जीवधारी होते हैं- नर और मादा, जिसे व्याकरणिक शब्दों में स्त्रीलिंग- पुलिंग कहा जाता  है। प्रकृति ने नर और मादा की शारीरिक संरचना में कुछ भिन्नता रखी है। यह भिन्नता प्राणियों के जीवन चक्र को बनाए रखने के लिए तथा इस सृष्टि को गतिमान रखने के लिए ईश्वरीय उपहार के समान है। इस प्रकार स्त्रीलिंग तथा पुल्लिंग एक जैविक या प्राकृतिक तथ्य है।  जब इसके साथ किसी प्रकार की असमानता को जोड़ दिया  जाता है अर्थात् एक की अपेक्षा दूसरे को अधिक महत्त्व मिलने लगता है तब यह  एक सामाजिक तथ्य बन जाता है जिसे हम लैंगिक असमानता कहते हैं। नर व मादा इन दोनों वर्गों के स्वभाव, कार्यक्षमता,लक्षण तथा आवश्यकताओं आदि में कुछ समानताएँ  और कुछ भिन्नताएँ होती हैं। ये भिन्नताएँ अन्य प्राणियों की तरह स्त्री और पुरुषों में भी होती हैं। दोनों का अपना- अपना महत्त्व है, इसलिए दोनों को समान अवसर, समान अधिकार और सामान रूप से सम्मान मिलना चाहिए; लेकिन ऐसा नहीं होता, हमारे समाज में पुरुषों को श्रेष्ठ मान लिया गया और महिलाओं को उनसे कमतर समझा गया। महिलाओं के अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। उन्हें एक संकुचित भूमिका से बाँध दिया गया। हमारे समाज में सारे विधान- नियम- ग्रंथ पुरुषों ने रचे और अपने लिए सारे अधिकार सुरक्षित करके स्त्रियों के लिये आदर्श, उत्तरदायित्व, त्याग, समर्पण जैसी चीजों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर दी। मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है-

नरकृत शास्त्रों के सब बंधन, हैं नारी को ही लेकर

 अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले  ही कर बैठा है नर।

     सिमोन द बबुआर ने लिखा है – ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है।’

    मैं कहूँगी कि स्त्री व पुरुष दोनों को बनाया जाता है। बचपन से ही दोनों के आगे ऐसे उदाहरण पेश किए जाते हैं, ऐसी चीजों को बार -बार दोहराया जाता है जिससे समाज द्वारा निर्धारित गुण चाहें वे अच्छे हों या न हों उनमें भर जाएँ, जैसे लड़कियों से बार- बार कहा जाता है कि धीरे बोलो, धीरे हँसो, धीरे चलो, तुम्हें पराये घर जाना है तुम क्या करोगी  ज्यादा पढ़कर आदि आदि। दूसरी ओर लड़के का उत्साह बढ़ाया जाता है- डरा नहीं करते, क्या लड़कियों की तरह डर रहे हो, लड़के रोया नहीं करते, मर्द को दर्द नहीं होता, क्या चूड़ियाँ पहन रखी हैं इत्यादि। इस तरह की बहुत- सी बातें हैं जो बचपन से लड़के और लड़की का व्यक्तित्व गढ़ती हैं और उनमें असमानता की खाई पैदा करती हैं।  लैंगिक असमानता हमारे समाज में सदियों से चली आ रही है यह असमानता की प्रवृत्ति समाज का व्यवहार बन गयी है, इसकी जड़ें हमारी सोच में गहरे बहुत गहरे तक जम गई हैं और हमने कई चीजों में यह मान लिया है कि ऐसा , तो होता ही रहता है। हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था रही है।   पितृसत्ता  यानी पिता का शासन,जिस व्यवस्था में पिता का शासन चलता है उसे पित्तृसत्तात्मक व्यवस्था कहते हैं ऐसी व्यवस्था में सभी प्रमुख अधिकार व निर्णय पुरुषों के होते हैं। स्त्रियों की भूमिका संकुचित होती है। बच्चों की पहचान पिता के नाम से होती है, विवाह के बाद महिलाओं का उपनाम भी बदल जाता है। स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होती थीं इसलिए भी उन्हें मुख्य भूमिका से पृथक रखा जाता था। यद्यपि अब काफी परिवर्तन हुआ है। दस्तावेजों में माता- पिता दोनों का नाम लिखा जाने लगा है। सरनेम भी बदलना आवश्यक नहीं है; लेकिन फिर भी यदि बदलना होगा,  तो स्त्री ही सरनेम बदलती है, पुरुष नहीं बदलता। 

हमारी बहुत-सी प्राचीन मान्यताएँ भी लैंगिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं। स्त्री को  सदैव ही पराधीन माना जाता रहा है और पराधीनता किसी के लिए भी सुखकर नहीं होती-कत बिधि रची नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं। इस चौपाई से भी स्त्री जाति की स्थिति को समझा जा सकता है, जिसमें पार्वती जी की विदाई के समय उनकी माँ मैना कहती हैं कि विधाता ने स्त्री जाति को क्यों पैदा किया। पराधीन को सपने में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती।  मनुस्मृति में भी ऐसा ही कहा गया है- 

पिता रक्षित कौमारे भर्ता रक्षति यौवने

 रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा: न स्त्री स्वतंत्र्यम् अर्हति ।।

 मनु स्मृति के इस श्लोक को स्त्री स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से हथियार के रूप में प्रयोग व प्रचारित किया गया। यदि इस श्लोक को सही मायने में देखें , , तो यह पुरुषों को उनके कर्तव्य का बोध कराने वाला भी है। हमारे समाज में ये भी प्रचलित है कि वंश बढ़ाने के लिए पुत्र होना आवश्यक है, पुत्र बुढ़ापे का सहारा होता है। माता -पिता का अंतिम संस्कार भी पुत्र द्वारा ही होना चाहिए तभी मोक्ष प्राप्त होता है। लड़की पराया धन होती है उसे ससुराल जाना होता है। कन्यादान जैसी प्रथा के द्वारा ये मान लिया जाता है कि विवाह के बाद लड़की पर मायके वालों का कोई हक नहीं है। प्राचीन काल से ही स्त्रियों को वस्तु के रूप में समझा गया जिसे इच्छानुसार और अवसरानुसार प्रयोग किया जा सकता है। क्रय-विक्रय, बलात् हरण, उपहार में देना, जैसे कार्य साधारण समझे जाते रहे हैं। देवदासी प्रथा के बहाने भी स्त्रियों का शोषण होता रहा।

 हमारी मानसिकता का विकास धीरे- धीरे होता है और कई चीजों पर निर्भर करता है। ग्रामीण परिवेश में पले- बढ़े और शहरी परिवेश में पले बढ़े पुरुष की मानसिकता में भी अंतर रहता है, जो दोनों स्थानों की स्त्रियों की स्थिति देखकर साफ पता चलता है । बचपन से पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों ने भी लैंगिक असमानता दिखाई देती है जैसे- माताजी रसोई घर में खाना पका रही है। पिताजी अखबार पढ़ रहे हैं। गीता बहुत अच्छा गाती है। रामू तेज दौड़ता है। इस तरह के उदाहरण बाल -मन में अनजाने ही घर कर जाते हैं कि अमुक काम किसका है?  परंतु यह अच्छी बात है कि इस तरह के उदाहरण पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाने की माँग की गई, और ये हटाए भी  गए । 

कई क्षेत्रों में विशेषकर गाँव में स्त्रियों के मन में प्रारंभ से ही यह बात बिठा दी जाती है कि पुरुष महिलाओं से अधिक श्रेष्ठ है इसीलिए उसके खान- पान और रहन-सहन के स्तर में भी अंतर होता है।  पुरुष के बिना स्त्रियों का कोई अस्तित्व नहीं है तथा उनसे ही उसकी पहचान है। उनकी आज्ञा का पालन करना स्त्री का धर्म है। राम चरित मानस में सीता जी के मुख से तुलसीदास जी ने ये बात कहलवाई है-

 जिय बिन देह, नदी बिनु वारि

 तैसेइ नाथ, पुरुष बिनु नारी।

पुरुष की श्रेष्ठता स्त्री मन पर हावी होने का ही ये परिणाम है कि वह स्वयं स्त्री होकर भी बालिका के जन्म तथा उसके विकास का विरोध करती रही हैं। स्त्री को स्त्री का विरोधी भी कहा जाता है, तुलसीदास जी भी लिखते हैं-

 नारी न मोहे नारी के रूपा

आज भी बहुत से ऐसे परिवार हैं जहाँ कन्या का जन्म देने वाली बहू की उपेक्षा की जाती है और पुत्र को जन्म देने पर महत्ता बढ़ जाती है । महिलाएँ स्वयं भी पुत्र को जन्म देने में गौरव का अनुभव करती हैं। कन्या के जन्म के साथ ही शुरू हुआ असमानता का सिलसिला जीवन पर्यंत चलता रहता है, आज भी कई घरों में पुत्र का जन्मदिन मनाया जाता है; लेकिन पुत्री का जन्मदिन नहीं मनाया जाता। 

समाज में विधवा और विधुर स्त्री-पुरुष की स्थिति में भी जमीन- आसमान का अंतर है। पुरुष यदि विधुर है , तो उस पर कोई वर्जना नहीं होती, परन्तु स्त्री को उपेक्षित और बेचारी बना दिया जाता है। शुभ कार्यों में वह सहभागी नहीं हो सकती, जाने कितनी ही बार समाज के रीति- रिवाज उसे मुँह चिढ़ाते हैं, जैसे वह कोई अपराधिनी है। जीवन पर्यंत वह यह दंश झेलती है, यहाँ तक कि उसकी निर्जीव देह भी भेदभाव का शिकार बनती है।

 ऐसे  अनेकानेक उदाहरण हैं,जो लैंगिक असमानता को दर्शाते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिये सबसे पहले हमें अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा और इसकी शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी होगी। बेटे और बेटी में फ़र्क करना बंद करना होगा। हमने अपनी बेटियों को बेटों की तरह शिक्षा देना, उनका पालन- पोषण करना शुरू भी कर दिया है, परन्तु बेटों को बेटियों की तरह पालना नहीं शुरू किया है। बेटियों की तरह पालने से मेरा अभिप्राय है कि हम उनके अंदर भी संवेदनशीलता का संचार करें। घरेलू कामकाज में हाथ बँटाना सिखाएँ, वे कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं, इसकी जानकारी रखें तथा उनके मन में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को जाग्रत करें।  बचपन से ही उन्हें ये न सिखाएँ कि वे लड़के हैं , , तो  उनके लिए सब ठीक है,चलता है।

 समाज में परिवर्तन लाने के लिए जागरूकता की आवश्यकता है, बेटियों के लिए सुरक्षात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है,  बालिकाओं को अच्छी शिक्षा और आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है, ये तभी संभव है जब हम घर व बाहर दोनों ही जगह अपनी सोच का परिष्कार करेंगे। ■


Sep 1, 2023

आलेखः बोलियों में निहित हिन्दी की शक्ति

  - डॉ. सुरंगमा यादव

    शाब्दिक दृष्टि से ‘हिन्दी’ शब्द का अभिप्राय हिन्द या भारतवर्ष में प्रयुक्त किसी भी भाषा के लिए हो सकता है; लेकिन आज सामान्य अर्थ में इसका व्यवहार उत्तर भारत के मध्य देश की उस भाषा के अर्थ में किया जाता है जिसका विस्तार पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पश्चिम में अम्बाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल की तराई, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण-पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पश्चिम में खंडवा तक फैला हुआ है। इसे हिन्दी-भाषी क्षेत्र भी कहा जाता है। इस भू-भाग के आधुनिक साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं, शिष्ट वार्तालाप तथा शिक्षा का माध्यम मानकीकृत खड़ी बोली हिन्दी है। सामान्यतया हिन्दी शब्द का प्रयोग जन साधारण इसी अर्थ में करता है। भौगोलिक विस्तार के कारण आम बोलचाल में एक क्षेत्र की हिन्दी दूसरे क्षेत्र की हिन्दी से पर्याप्त भिन्नता रखती है। इस भिन्नता का कारण क्षेत्रीय बोलियाँ हैं। वास्तव में हिन्दी-भाषा है क्या? इस पर विचार करना आवश्यक है। हिन्दी-भाषा विभिन्न उपभाषाओं और बोलियों का समुच्चय व संश्लिष्ट रूप है। इसके अन्तर्गत पाँच उपभाषाएँ तथा कुछ समय पूर्व तक 18 बोलियाँ समाहित थीं, जिनकी संख्या आज 17 रह गई है। मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करके अलग भाषा का दर्जा दे दिया गया है। ये पाँच उपभाषाएँ और उनकी बोलियाँ इस प्रकार हैं- 1-पश्चिमी हिन्दी - खड़ी बोली, ब्रजभाषा, हरियाणवी, बुन्देली, कन्नौजी, 2-पूर्वी हिन्दी-अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, 3-राजस्थानी- मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी, 4-पहाड़ी- नेपाली, गढ़वाली, कुमाऊँनी, 5-बिहारी- भोजपुरी, मगही। हिन्दी कोई अलग भाषा नहीं है बल्कि इन्हीं उपभाषाओं और बोलियों का समन्वित रूप है या इनके समूह का नाम हिन्दी है। हिन्दी की इन्हीं बोलियों में से एक खड़ी बोली को मानकीकृत कर राजभाषा हिन्दी का दर्जा दिया गया है या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि बोलियों के इस समूह का मुखिया खड़ी बोली को बनाया गया है;  लेकिन ऐसा होने से न हिन्दी अपनी बोलियों से पृथक हो जाती है और न ही बोलियों का महत्त्व कम हो जाता है। वास्तव में बोलियाँ ही तो हिन्दी की शक्ति हैं। उनके बोलने वालों की संख्या और उनके साहित्य के दम पर ही तो हिन्दी बहुसंख्यक जन की समृद्ध भाषा के रूप में गौरवान्वित है। हिन्दी और उसकी बोलियाँ एक सूत्र में बंधें हुए लकड़ी के उस गट्ठर के समान हैं जो एक-दूसरे को बल प्रदान करती हैं। जब-जब उसमें से कोई लकड़ी खींची जाएगी,  तब-तब पकड़ भी ढीली होगी और शक्ति भी क्षीण होती जाएगी। गट्ठर की भी और पृथक् की गई लकड़ी की भी। इधर संविधान की आठवीं अनुसूची में हिन्दी की बोलियों को शामिल कराने की होड़- सी चल पड़ी है। पहले मैथिली हिन्दी परिवार से पृथक् हुई और अब भोजपुरी और राजस्थानी को भी अलग करने का प्रयास हो रहा है। ये या तो कोई षड्यंत्र है या फिर इसके दूरगामी परिणामों पर विचार नहीं किया जा रहा है। आज अपने संकीर्ण राजनैतिक, साहित्यिक तथा क्षेत्रीय स्वार्थ पूर्ति के लिए उस हिन्दी को कमजोर बनाया जा रहा है, जो देश की एकता की प्रतीक है। अपने एक हजार वर्ष के इतिहास में जिन विविध भाषा रूपों के सम्मिश्रण से हिन्दी एक मानक भाषा के रूप में विकसित हुई थी, उसमें बिखराव प्रारम्भ हो गया है। आज जो माँग हिन्दी की इन बोलियों के लिए उठ रही है, कल अन्य बोलियों के लिए भी उठने लगेगी। जिसका परिणाम ये होगा कि जनगणना के समय इन भाषाओं को बोलने वालों की गणना हिन्दी से पृथक् की जाएगी और आँकड़ों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या घटती जायेगी। प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित के अनुसार - “यदि इसी तरह हिन्दी की भाषाएँ/बोलियाँ अलग होती चली गईं, तो हिन्दी बोलनेवालों की संख्या 72करोड़ से घटकर 7 करोड़ रह जाएगी और तब हिन्दी केवल खड़ी बोली रह जाएगी।’’ हिन्दी का विस्तृत क्षेत्र और साहित्य संकुचित हो जाएगा। हिन्दी की विशाल साहित्यिक परम्परा लगभग डेढ़ सौ वर्षों में सिमटकर रह जायेगी। हिन्दी में विद्यापति, चन्दरवरदाई, कबीर, रहीम, जायसी, मीरा, सूर, तुलसी, बिहारी, भूषण आदि भी अलग-अलग क्षेत्रों में बँट जाएँगे। हिन्दी की विभिन्न बोलियों के साहित्य में हमारे देश के अलग-अलग स्थानों की आंचलिक संस्कृति, रीति-रिवाज व आचार-विचार समाहित हैं। हिन्दी साहित्य नई पीढ़ी को विविधवर्णी संस्कृति का ज्ञान कराकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का कार्य करता है।

आज जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में हिन्दी बोलनेवालों की संख्या दूसरे स्थान पर है। इसी आधार पर हम संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को सम्मिलित करने की माँग कर रहे हैं। जब हमारे पास संख्या बल ही नहीं होगा, तो हमारी माँग में क्या दम रह जाएगा। हिन्दी की बोलियों का विकास अवश्य होना चाहिए;  किन्तु भाषा के विघटन के रूप में न होकर भाषा के संवर्द्धन के रूप में। बोलियों को अपने विकास के लिए अधिकाधिक अवसर मिलने चाहिए। इनकी अकादमी स्थापित हों, पाठ्यक्रम में विभिन्न स्तरों पर इनका साहित्य सम्मिलित किया जाए, जैसे हिन्दी में कुछ बोलियों का साहित्य सम्मिलित है। इसी प्रकार अन्य बोलियों का साहित्य भी जोड़ा जाना चाहिए। उनका मानकीकरण हो, उत्कृष्ट कोटि का साहित्य सृजन हो, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो तथा फिल्म निर्माण हो,  ताकि वे समृद्ध हो सकें। इन बोलियों के भाषाशास्त्रियों, साहित्यकारों तथा विद्वानों के लिए सम्मान-पुरस्कार आदि की व्यवस्था हो। जो हिन्दी के अन्तर्गत ही बोलियों के लिए पृथक् से दिये जाएँ। भाषा और बोली के वैमनस्य को खत्म करने के लिए हमें संकुचित मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना होगा। भारत विभाजन का दंश हम झेल ही रहे हैं। यदि हम नहीं चेते, तो भाषा विभाजन की पीड़ा भी हमें क्षेत्रीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक कई स्तरों पर कई रूपों में झेलनी होगी। आज हिन्दी पूरे देश में सम्पर्क भाषा के रूप में बोली व समझी जा रही है। हम देश के किसी भी कोने में चले जाएँ, हिन्दी बोलकर अपना काम चला सकते हैं। हिन्दी हमें एकता के सूत्र में बाँधने की अद्भुत सामर्थ्य रखती है। अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में कितनी ही संस्थाएँ और समितियाँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं और हम हिन्दी भाषी क्षेत्र के होते हुए भी अपनी ही देशव्यापी और विश्वव्यापी हिन्दी को संकुचित कर रहे हैं। हिन्दी हिन्दुस्तान की पहचान है। हिन्दुस्तान का नाम लेते ही यहाँ की भाषा के रूप में हिन्दी ही जेहन में आती है। प्रत्येक देश की एक घोषित राष्ट्रभाषा होती है, हमारे यहाँ वह भी नहीं है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक विदेशी भाषा के कारण इतने विशाल और गौरवशाली देश में राष्ट्रभाषा के पद पर कोई भाषा प्रतिष्ठित नहीं है और हम सबसे प्रबल दावेदार को ही कमजोर बना रहे हैं। सर्वप्रथम हिन्दी को  ‘राष्ट्रभाषा’ का गौरव संवैधानिक रूप से प्रदान किया जाये तत्पश्चात् इस सूची में कितनी ही क्षेत्रीय भाषाएँ और बोलियाँ सम्मिलित हों देश के हिन्दी प्रेमियों को इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। हिन्दी को राष्ट्रभाषा और पूरे देश की राजभाषा बनाये जाने के लिए सभी राज्यों का सहमत होना आवश्यक है। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी ये सहमति न बनी है और न इसकी कोई संभावना है। अतएव इस व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था है। लोकतन्त्र में बहुमत निर्णायक होता है। शत-प्रतिशत सहमति आवश्यक नहीं है। भाषायी संकीर्णताओं से निकलकर सर्वप्रथम हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन कराने के लिए एकजुट प्रयास करना चाहिए। अन्यथा हम नूर लखनवी के शब्दों में, ‘‘इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।’’ कहकर हाथ मलते रह जायेंगे।

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सम्पर्कः महामाया राजकीय महाविद्यालय, महोना, लखनऊ (उ. प्र.)


Nov 1, 2022

आलेखः आदिकवि महर्षि वाल्मीकि

- डॉ. सुरंगमा यादव
उल्टा नाम जपत जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।

    वाल्मीकि के विषय में तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ उनके जीवन के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनों का परिचय कराती हैं।  राम का नाम उल्टा  अर्थात मरा- मरा का जाप करते- करते वाल्मीकिजी स्वयं राममय होकर ब्रह्म स्वरूप हो गए।  रत्नाकर से वाल्मीकि, वाल्मीकि से महर्षि और महर्षि से आदि कवि बनने की कथा भी कम रोचक नहीं है।

 वाल्मीकिजी का  जन्म आज से लगभग 9300 वर्ष पूर्व आश्विन मास की पूर्णिमा को हुआ था, जिसे हम शरद् पूर्णिमा भी कहते हैं।  वाल्मीकि जयंती को ‘प्रकट दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार वाल्मीकिजी महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र  प्रचेता की संतान थे इनकी माता का नाम चर्षणी था।   कथाओं के अनुसार बचपन में उन्हें एक नि:संतान भीलनी ने चुरा लिया था।  इस कारण उनका पालन- पोषण भील प्रजाति में हुआ। वाल्मीकिजी का प्रारंभिक नाम रत्नाकर था।  घने जंगलों में रहने वाला भील समुदाय वन्य प्राणियों का  आखेट और दस्युकर्म किया करता था।  यही कारण है कि वे बड़े होकर कुख्यात डाकू रत्नाकर बने।  अपनी आजीविका चलाने के लिए वे राहगीरों से  लूटपाट करते थे तथा कई बार उनकी हत्या भी कर देते थे।  एक बार जंगल में शिकार  की खोज में भटकते हुए उनका सामना नारदमुनि से हुआ, जो उस जंगल से गुजर रहे थे।

    अपनी प्रवृत्ति के अनुसार रत्नाकर ने उन्हें बंधक बना लिया।  नारदमुनि ने उनसे सवाल किया कि तुम ऐसा पापकर्म क्यों कर रहे हो? रत्नाकर ने तत्काल उत्तर दिया- अपने परिवार के जीवन यापन के लिए।  तब नारद मुनि ने पूछा-जिस परिवार के लिए तुम ये पाप कर रहे हो,  क्या वह परिवार तुम्हारे पापों के फल का सहभागी बनेगा? इस पर रत्नाकर ने अति उत्साह के साथ कहा - ‘हाँ बिलकुल मेरा परिवार सदैव मेरे साथ खड़ा रहेगा।’  नारद मुनि ने फिर कहा- एक बार उनसे जाकर पूछ लो यदि वे हाँ कहेंगे

, तो मेरे पास जो कुछ है, मैं वह सब  इस तुम्हें   दे दूँगा।  दस्यु रत्नाकर ने सबसे पहले अपनी पत्नी से प्रश्न किया कि क्या वह उनके पापों मैं सहभागी होगी? पत्नी ने कहा- आप मेरे पति हैं, मेरा भरण -पोषण करना आपका दायित्व है, मैं आपके  सुख- दुख की साथी हूँ; परन्तु आपके पापों का भार मैं नहीं उठा सकती।  यही प्रश्न रत्नाकर ने अपने माता पिता से किया और उनसे भी उसे नकारात्मक उत्तर मिला। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वृद्धावस्था में माता-पिता की देखभाल  करना संतान  का उत्तरदायित्व है। रत्नाकर को इस बात से गहरा आघात पहुँचा। उन्होंने शीघ्रता से जाकर देवर्षि को बंधनमुक्त किया और विलाप करते हुए उनके चरण पकड़ लिये तथा नारदजी से मार्गदर्शन माँगा। नारद जी ने उन्हें राम- राम का जाप करने का उपदेश दिया।  रत्नाकर के बारे में यह प्रचलित है कि पूर्वकृत कर्मों के कारण वे राम नाम का उच्चारण नहीं कर पा रहे थे; इसलिए नारद मुनि ने उन्हें राम का उल्टा अर्थात मरा- मरा जपने का उपदेश दिया;  लेकिन इस बारे में कि नारद जी ने उन्हें मरा-मरा जपने का उपदेश दिया, मुझे कुछ तार्किक प्रतीक नहीं होता, मेरा मंतव्य इस विषय में थोड़ा-सा अलग  है, वह यह कि नारद जी उन्हें राम- राम जपने का मंत्र देकर चले गए होंगे, चूँकि रत्नाकर  भील समुदाय में पले बढ़े थे, जो कि सभ्यता संस्कृति दूर घने जंगलों में  रहने वाली आदिवासी जनजातियाँ थीं, जिनका उल्लेख रामायण में भील, कोल, किरात आदि नामों से मिलता है। आदिवासियों के अपने देवता और अपने संस्कार होते हैं;  इसलिए उन्होंने पहले कभी ये नाम नहीं सुना होगा, अतः वे भूल गए होंगे कि नारदजी क्या नाम बता कर गए थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे हम कभी- कभी किसी काम के सिलसिले में यह अन्य किसी संदर्भ में यदि किसी का नाम एक ही बार सुनते हैं, तो अकसर ऐसा होता है कि हम वो नाम भूल जाते हैं और फिर याद करते हैं कि क्या नाम बताया था, उसकी जगह कई नाम हमारे दिमाग में आते हैं कि ये था या ये था।   इसी प्रकार रत्नाकर भी भूल गए होंगे और राम- राम की जगह मरा- मरा का जाप करने लगे।  वैसे भी यदि हम जल्दी- जल्दी राम -राम कहें,  तो मरा- मरा और मरा- मरा कहें तो राम- राम की ध्वनि उच्चारित होते हुए प्रतीत होती है। 

वैसे भी राम और मरा दोनों ही शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण और अटल हैं।  राम अखिल ब्रह्मांड का अंतिम सत्य तो मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है।  यदि व्यक्ति को जीवन की नश्वरता का बोध रहे,  तो वह पापों से बचेगा और सत्पथ पर चल कर राममय हो जाएगा।  हृदय परिवर्तन होने के बाद रत्नाकर ने कई वर्षों तक ध्यानमग्न होकर कठिन साधना की।  इनके शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढक लिया।  आप कभी घने जंगलों में गए होंगे तो आपने देखा होगा मिट्टी के ढेर को इकट्ठा करके दीमक अपनी बांबी या घर बना लेती हैं उसे वल्मीक  भी कहा जाता है।  जब इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और इनकी साधना पूरी हुई,  तो यह उससे बाहर निकले, तभी से लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।  इस प्रकार यह रत्नाकर से वाल्मीकि बन गए।  चाहे वाल्मीकि हों या तुलसीदास, दोनों के जीवन  की एक घटना ने  न केवल उनके जीवन की दिशा बदली बल्कि उन्हें उच्चतम सोपान पर प्रतिष्ठित भी किया। दोनों को ही अपनों से ही आघात पहुँचा, अपनों से मिली हुई पीड़ा सचमुच असहनीय होती है, परन्तु व्यक्ति को सन्मार्ग पर लाने के लिए ये कड़वी औषधि की तरह काम करती है।

    इनकी गणना वैदिक काल के महान् ॠषियों में की जाती है।  विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार उन्होंने कठोर तप और अनुष्ठान सिद्ध करके वैदिक युगीन ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करते हुए महर्षि का पद प्राप्त किया था।

 महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं।  आदिकवि शब्द ‘आदि’ और ‘कवि’ के मेल से बना है ।  आदि का अर्थ होता है ‘प्रथम’ और कवि का अर्थ होता है काव्य की रचना करने वाला।  वाल्मीकिजी ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की थी।  कविता उनके मुख से सहसा प्रकट हुई।  महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर रहा करते थे।  ये कथा है कि एक बार वे स्नान इत्यादि के लिए नदी पर जा रहे थे।  वहाँ उन्होंने क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को प्रेम मग्न देखा।  तभी एक बहेलिए ने उस जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया।  इस पर मादा पक्षी व्यग्र होकर करुण विलाप करने लगा।  क्रौंच सारस पक्षी को कहते हैं इसके बारे में कहा जाता है की यह अपना जोड़ा एक ही बार बनाता है।  यदि ये अपने साथी से बिछड़ जाता है तो पूरा जीवन एकाकी ही काटता है।  उसके विलाप को सुन कर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही प्रथम अनुष्टुप छंद निःसृत हो उठा –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

अर्थात् अये निषाद तू ने प्रेम में लिप्त पक्षी का वध किया है। तुझे कभी भी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी।  वाल्मीकि के मुख से उस व्याध के लिए शाप स्वरूप जो पंक्तियाँ निकलीं, वे संस्कृत भाषा में तथा अनुष्टुप छंद में थी। 

आश्रम में आकर वाल्मीकि जी व्याध को दिए गए शाप को लेकर चिंतित थे। तभी वहाँ ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि यह श्लोक मेरी इच्छा से ही माँ सरस्वती ने आपके मुख से प्रकट किया है। आप अब श्रीराम का जीवन चरित्र लिखिए।  वाल्मीकिजी को अपने तपोबल से श्री राम के जीवन के भूत

, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी सभी घटनाओं का ज्ञान हो गया; इसीलिए उन्हें   त्रिकालदर्शी भी कहते हैं।  उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रथम महाकाव्य रामायण की रचना की। रामायण में लगभग 24,000 श्लोक हैं।  ‘रामायण’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसने मर्यादा, सत्य, प्रेम, भ्रातृत्व, मित्रता एवं राजा- प्रजा के धर्म की परिभाषा सिखाई। वाल्मीकि रामकथा के रचयिता ही नहीं बल्कि वे रामकथा के पात्र भी रहे हैं।  रामकथा में वाल्मीकि जी की महत्वपूर्ण भूमिका है।  अपने 14 वर्ष के वनवास काल के दौरान भगवान श्री राम वाल्मीकि जी के आश्रम में भी गए थे और स्वयं भगवान राम ने उन्हें त्रिकालदर्शी बताते हुए उनसे पूछा था कि  इस वन प्रदेश में सीता और लक्ष्मण सहित मैं कहाँ निवास करूँ? वे कहते हैं-

 तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा,विस्ब बदर जिमि तुम्हरे हाथा।

इसलिए हे मुनीश्वर-

 अस जिय जानि कहिअ सोई ठाँऊँ,सिय सौमित्र सहित जह जाऊँ।

तब वाल्मीकि जी ने उन्हें चित्रकूट में निवास करने की सलाह दी।

सीता जी को जब पुनः कतिपय कारणों से वन जाना पड़ता है,  तब वाल्मीकि जी उन्हें अपनी मानस पुत्री मानकर अपने आश्रम में स्थान देते हैं।  सीता और राम जी के पुत्र लव और कुश का जन्म भी वाल्मीकि के आश्रम में ही होता है।  महर्षि वाल्मीकि लवकुश को शिक्षा दीक्षा देते हैं और हर प्रकार से निपुण बनाते हैं।  सामाजिक धार्मिक राजनीतिक शिक्षा के साथ साथ ललित कलाओं में तो निपुण बनाते ही हैं, युद्धकौशल भी ऐसा सिखाते हैं कि वे बालक श्रीराम द्वारा छोड़े गए राजसूय यज्ञ के घोड़े को बंधक बना लेते हैं और राम की सेना के योद्धाओं को परास्त कर देते हैं।

 वाल्मीकि का जीवन हमें बहुत कुछ सिखाता है।  उनके मन में दृढ़ इच्छा शक्ति और अटल निश्चय का भाव था। जीवन में घटित एक घटना ने उनके जीवन का रास्ता बदल दिया।  जैसे ही उन्हें ये अहसास हुआ कि वे अनुचित मार्ग पर चल रहे हैं उन्होंने अपने जीवन की दिशा ही बदल दी।  आज हम भली-भाँति ये जानते हुए भी की हमारा रास्ता सही नहीं है, हमारे बड़े, हमारे हितैषी, गुरुजन हमें लाख समझाते है लेकिन हम उस रास्ते को छोड़ना तो दूर,  कभी अपने कृत्यों पर विचार भी नहीं करते।  हम यह भूल जाते हैं की व्यक्ति अपने कृत्यों के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है ओर कुकृत्यों की हानि कभी न कभी उसे अवश्य उठानी पड़ती है।  तुलसीदास जी ने कहा भी है-

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा,जो जस करइ सो तस फल चाखा।

 वाल्मीकि जी का जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्ति मनुष्यमात्र के लिए ही नहीं प्राणिमात्र के लिए अपने मन में दया, ममता ,करुणा और परोपकार की भावना रखे, एक पक्षी की व्यथा देख कर वाल्मीकि का हृदय किस तरह व्याकुल हो उठा ।  आज मनुष्य के भीतर मानवीय गुण ही जैसे समाप्त होते जा रहे हैं। उसी का परिणाम हम समाज में हिंसा, हत्या अपराध और सांप्रदायिकता के रूप में देख रहे हैं।  वाल्मीकि का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि यदि व्यक्ति अपने मन में ठान लें तो वह क्या से क्या बन सकता है। 

सम्पर्कः असिस्टेंट प्रोफेसर, 4/27, जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ 226031

Jun 1, 2022

आलेखः कब बदलेगा अपमान का यह तरीका?

- डॉ. सुरंगमा यादव

हमारे समाज में महिलाओं के लिए पुरुषों के मुकाबले ज्यादा असुविधाएँ एवं असहज स्थितियाँ हैं। अधिकतर संस्थाओं में पुरुष व महिलाएँ साथ काम करते हैं। पुरुष अपनी बातचीत में अकसर अमर्यादित शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे ये भूल जाते हैं या ये ध्यान रखने की आवश्यकता नहीं समझते कि वहाँ कोई महिला भी उपस्थित है। वैसे भी पुरुषों द्वारा महिलाओं को अपमानित करने के कई तरीके हमारे समाज में प्रचलित हैं, जिनमें कुछ प्रत्यक्ष हैं कुछ अप्रत्यक्ष। दो पुरुष जब आपस में झगड़ा करते हैं तो एक दूसरे का अपमान करने के लिए माँ-बहन आदि का प्रयोग करते हुए गाली- गलौच करते हैं। महिलाओं का अपमान करने के लिए भी पुरुषों द्वारा इसी तरह के अश्लील शब्दों का प्रयोग किया जाता है। बहुत ही शर्मनाक स्थिति तब पैदा हो जाती है, जब पिता अपने युवा पुत्र को डाँटने के लिए ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता है और तर्क देता है कि ऐसा करके वो लड़के के मन में लज्जा पैदा करना चाहता है। वह स्त्री जो उन दोनों पुरुष में से एक की माँ और एक की पत्नी है, कितना असहज और अपमानित महसूस करती है इसका अंदाजा स्त्री को नगण्य समझने वाला पुरुष समाज कदापि नहीं कर सकता।

प्राचीन काल से लेकर अब तक हमारे समाज में बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं। महिलाओं से सम्बन्धित अनेक कुप्रथाओं तथा परम्पराओं पर रोक लग चुकी है। परन्तु महिलाओं पर केन्द्रित गालियाँ देने की परम्परा यथावत् जारी है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आश्चर्य तो तब और ज्यादा होता है, जब उच्च शिक्षित और अपने को सभ्य समझने का दम्भ भरने वाले पुरुषों के मुख से भी ऐसी ही अभद्र भाषा सुनाई देती है। तब उनमें और अनपढ़ व्यक्ति में क्या फर्क़ रह जाता है। आखिर महिलाओं को अपमानित करने का यह तरीका कब बदलेगा। जिस प्रकार विशेष जातिसूचक शब्दों द्वारा सम्बोधन प्रतिबंधित है, वैसे ही इस पर भी रोक लगनी चाहिए; क्योंकि यह सम्पूर्ण महिला जाति का अपमान है। महिलाओं को कमतर, दुर्बल और अबला साबित करने के लिए पुरुष एक और वाक्य का अकसर प्रयोग करते हैं, “ हमने चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं। या ‘क्या चूड़ियाँ पहन रखी हैं?’ ऐसा कहने वाले पुरुष ये भूल जाते हैं कि चूड़ियाँ कभी महिलाओं की कमजोरी नहीं रहीं। इतिहास इस बात का गवाह है कि चूड़ियाँ पहनने वाले हाथों ने किस तरह कुश्ती, मलखंभ, घुड़सवारी, तीरंदाजी, तैराकी जैसे पुरुषोचित माने जाने वाले कार्यों में निपुणता प्राप्त की और अपने राज्य की महिलाओं को भी इन कार्यों में दक्ष बनाया। वो कोई और नहीं आज भी वीरता का प्रतीक मानी जाने वाली रानी लक्ष्मीबाई थीं, जिन्होंने युद्धभूमि में देशप्रेम और वात्सल्य का एक साथ कुशलता पूर्वक निर्वाह किया। उनके शौर्य और पराक्रम को देखकर अंग्रेज भी चकित रह गए। क्या किसी पुरुष का ऐसा उदाहरण मिल सकता है? महिलाओं की वीरता और विद्वत्ता के उदाहरणों की इतिहास में कमी नहीं है। आधुनिक महिलाएँ उन क्षेत्रों में भी अपना खास स्थान बना रही हैं जिन पर अब तक केवल पुरुषों का ही आधिपत्य था। फिर आखिर क्या कारण है कि पुरुष हमेशा महिलाओं को कमजोर सिद्ध करके अपने पुरुषत्व का प्रमाण देने में लगे रहते हैं। इसका उत्तर जयशंकर प्रसाद के शब्दों में दिया जा सकता है, “तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की”। पुरुषों को अपनी अहंवादी संकीर्ण मानसिकता से मुक्त होने की महती आवश्यकता है।

 आज समाज की जो कुत्सित मानसिकता विकसित हो रही है, वह केवल महिलाओं के लिए ही नहीं; बल्कि पुरूषों के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। अभी कुछ समय पूर्व तक यदि कोई महिला परिवार के किसी पुरुष सदस्य के साथ कहीं जाती थी, तो वह अपने आप को पूर्णतया सुरक्षित समझती थी; परन्तु अब स्थिति बदल गई है। एक क्या एक से अधिक पुरूष सदस्य भी साथ हों, तो भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। आज पुरुष के रक्षक रूप पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है।     

Mar 1, 2022

दोहे- फिर खिल उठा पलाश

 - डॉ. सुरंगमा यादव

1.  अमराई यौवन भरी, कोयल भरे मिठास।

हवा वसंती कह रही, आजा छोड़ प्रवास।।

2.  फागुन आया मद भरा, मौसम हुआ हसीन।

इठलाता यौवन हुआ, रंग बिना रंगीन। ।

3.  नेह रंग बरसा सखी, कोरे मन पर आज।

सारे रंग फीके लगें, क्या है इसका राज।।

4. रंगों की वर्षा करे, होली बारह मास।

गले सभी मिलते रहें, मन की मिटे खटास।।

5. चटक प्रीत के रंग-सा, फिर खिल उठा पलाश।

मादक महुआ कह रहा, पिया मिलन की आस।।

6. होरी और कबीर की, मौन हुई आवाज।

डीजे की धुन पर सभी, थिरकें झूमें आज।।

सम्पर्कः 4/27, जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ-226031


Dec 1, 2021

कविताः आ लौट चलें!


- डॉ. सुरंगमा यादव

आ लौट चलें बचपन की ओर

माँ की गोदी में छिप जाएँ

खींचे कोई डोर

हर आहट पर ‘पापा-पापा’ कहते

भागें द्वार की ओर

मिट्टी के रंगीन खिलौने

मिल जाएँ, तो झूमें-नाचें

कॉपी फाड़ें नाव बनाएँ

पानी में जब लगे तैरने

खूब मचाएँ शोर

भीग-भीगकर बारिश में

नाचें जैसे मोर

गिल्ली-डंडा, खो-खो और कबड्डी

छुपम-छुपाई, इक्कल-दुक्कल,

कोड़ा जमाल शाही

खेल-खेलकर करते खूब धुनाई

वह भी क्या था दौर!

कच्ची अमिया और अमरूद

पेड़ों पर चढ़ तोड़ें खूब

पकड़े जाने के डर से फिर

भागें कितनी जोर

आ लौट चलें बचपन की ओर!