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Mar 1, 2026

आलेखः ऑनलाइन गेमिंग एक मकड़जाल

 - डॉ. सुरंगमा यादव 

अभी कुछ माह पहले की एक घटना मन को आज भी आंदोलित  कर रही है, लखनऊ में ऑनलाइन गेम के जाल में फँसकर एक 13 वर्षीय किशोर ने, जो कि कक्षा छह का छात्र था, आत्महत्या कर ली। कारण वह 14 लाख  रुपये गेम में हार गया था। ये 14 लाख रुपये की बड़ी रकम  उसके पिता ने मकान बनवाने के लिए खेत बेचकर जमा की थी, जैसे ही किशोर को यह पता चला कि  पैसे गायब होने की जानकारी पिता को हो गई है, उसने डर के कारण फाँसी लगा ली। फ्री फायर बैटल रॉयल शैली का गेम है। बच्चे गेम में पसंद की चीजें खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं और लाखों गँवा देते हैं। 

   वर्ष 2022 से  सरकार ने इसे बैन  कर रखा है; लेकिन अभी भी यह चल रहा है । ऑनलाइन गेमिंग में पैसा लगाकर और भी  बहुत से लोग जान- माल का नुकसान उठा चुके  हैं। किशोर ही नहीं, बड़े भी इसकी लत में पड़ रहे हैं ।  छोटी कक्षाओं से लेकर दसवीं -बारहवीं, प्रतियोगी छात्र यहाँ तक की नौकरी पेशे वाले भी इसकी गिरफ्त में आकर आत्महत्या कर चुके हैं । यह किसी एक शहर की बात नहीं, पूरे देश में ऐसी घटनाएँ  हो रही हैं। पिछले दिनों झांसी में आठवीं में पढ़ने वाले  इकलौते बेटे की ऑनलाइन गेमिंग की लत से परेशान होकर माँ ने खुदकुशी कर ली, बेटा दोस्तों के साथ पबजी खेलता था। ऐसी घटनाएँ कितनी भयावह हैं ।ऑनलाइन गेमिंग की लत परिवार पर कहर बनकर टूट रही है। टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग के दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में सामने आ रहे हैं, जिसमें से एक ऑनलाइन गेम की लत भी है।

 आज कम  उम्र में ही बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि मिल जाते हैं, जो उन्हें पढ़ाई के एक सहायक उपकरण के रूप में दिए जाते हैं लेकिन वे इनका दुरुपयोग करने लगते हैं। बच्चों के अपने कमरे हैं, अपनी प्राइवेसी है। डिवाइस में पासवर्ड लगा कर रखते हैं, ऐप हाइड भी कर देते हैं, अलग विंडो बना लेते हैं। बच्चे मोबाइल व लैपटॉप में एक साथ कई ऐप खोलकर रखते हैं, किसी की आहट पाते ही झट से उसे बदल देते हैं। ज्यादा पूछताछ करने पर बच्चे क्रोधित होकर चीखते- चिल्लाते हैं, तथा कई प्रकार के आरोप -प्रत्यारोप माता- पिता पर ही लगाने लगते हैं। कमरे में माता -पिता की उपस्थिति असहज करती है। बच्चे टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट बन रहे हैं, ये अच्छी बात है; परंतु वे इसका गलत इस्तेमाल करके अपने लिए ही नहीं अपने घर- परिवार के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। सीधे -सादे  माता -पिता समझ नहीं पाते हैं; क्योंकि  वे टेक्नोलॉजी के इतने जानकार भी नहीं हैं।

ये तो एक -दो खेलों का जिक्र था, ऐसे ही कितने ही खेल हैं जो बर्बादी के कारण बन रहे हैं। पैसे कमाने का लालच भी एक बहुत बड़ा कारण है ऑनलाइन गेमिंग का। इनमें से कई खेलों का विज्ञापन चर्चित चेहरे भी करते हैं, विज्ञापन के अंत में एक चेतावनी की औपचारिकता भी रहती है कि अपने जोखिम पर खेलें इसकी लत भी लग सकती है; परंतु खेलने वाले इस पर ध्यान नहीं देते हैं। सबसे पहले इन विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए।

 सूचना, मनोरंजन व पढ़ाई में सहायक मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि घरों में कलह का एक नया कारण बन बन चुके हैं। फ़ोन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों को आक्रामक बना रहा है। किशोर ही नहीं, किशोरियाँ भी इस हद तक आक्रामक हो रही हैं कि  परेशान अभिभावक राज्य महिला आयोग की जन- सुनवाई में परामर्श के लिए पहुँच रहे हैं।

   आयोग की सदस्य मीनाक्षी भराला के अनुसार, “विभिन्न जिलों में होने वाली जन- सुनवाई में हर बार तीन -चार मामले ऐसे सामने आ रहे हैं, जिनमें माताएँ अपनी बेटियों के फोन अधिक इस्तेमाल करने से परेशान होकर मदद माँगने आती हैं। कई मामलों में नाबालिग बेटी को फोन चलाने से रोकने पर माँ पर हाथ उठाने या  हिंसक व्यवहार तक कर रही हैं (अमर उजाला 13-11-2025)।”

आयोग के अनुसार ही एक माँ ने जब अपनी बेटी को फ़ोन चलाने से रोका, तो उसने नाखून से उसका मुंह नोच लिया। संवेदनहीनता इस हद तक कि माँ  रोती रही और बेटी हँसती रही। आज एक डायलॉग जो अकसर बच्चे अपने माता- पिता से बोलते नजर आते हैं- ये उनकी ज़िन्दगी है, वह जैसा चाहें वैसा जिएँगे ये कोई और तय  नहीं करेगा।  आज फ़ोन के अधिक इस्तेमाल से बच्चे आक्रामक हो रहे हैं, वे चिड़चिड़े व झगड़ालू  हो रहे हैं। छोटी -छोटी बातों पर चीखते- चिल्लाते हैं तथा अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। बच्चों के मन की असंतुष्टि दिन- प्रतिदिन उनकी माँगों में बढ़ोतरी कर रही है तथा माता- पिता के साथ टकराव का कारण बन रही है। घर के सदस्य होटल की तरह अपने – अपने  कमरों तक सीमित हो गए हैं। बच्चा अपने कमरे में बैठकर कौन- सा गेम खेलता है, किससे  बात करता है, क्या चीज़ देखता है, यह समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है। बच्चे अपनी उलझनों को माता- पिता या घर के किसी अन्य सदस्य से बताना आवश्यक नहीं समझते। आज के बच्चे बड़ों को ये मान बैठे हैं कि उन्हें आज के समय का चलन नहीं पता है। उन्हें  लगता है कि यह न जाने किस युग की बात कर रहे हैं । डिजिटल दुनिया से ज्यादा जुड़ाव उन्हें वास्तविक जीवन से दूर करता जा  रहा है। आधुनिक माँएँ तो खुद ही बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप के आकर्षण में उलझा रही है । छोटे- छोटे बच्चों को कार्टून दिखाकर खाना खिलाया जा रहा है। धीरे- धीरे ये बच्चों की आदत बन जाती है कि जब तक वे कार्टून नहीं देखेंगे, तब तक खाना नहीं खाएँगे । थोड़ा बड़ा होने पर बच्चा खुद ही मोबाइल में कार्टून देखने लगता है। पहले उन्हें कुछ समय के लिए मोबाइल दिया जाता है, धीरे- धीरे उस समय को बच्चे थोड़ा और थोड़ा करके बढ़ा लेते हैं और इस तरह से बच्चे में मोबाइल देखने की आदत पड़ जाती है। बच्चों में यह लत भयावह रूप धारण न कर ले, इसके लिए हमें समय रहते सचेत होना पड़ेगा तथा बड़े बच्चों को धीरे- धीरे समझाकर या आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाकर इस लत  से छुटकारा दिलाना होगा।

1 comment:

  1. Anonymous02 March

    ऑनलाइन गेमिंग के दुष्परिणामों की सटीक जानकारी देता आलेख। मानव हित के लिए बनाए किसी भी उपकरण का दुरुपयोग मानवता के विरुध्द है। सतर्क रहना और समझना बहुत आवश्यक है अन्यथा भस्मासुर का वरदान ही सिद्ध होगा । सुदर्शन रत्नाकर

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