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Jul 1, 2023

आलेखः पानी तो बहता है समुद्र में मिलने के लिए

 - अनुपम मिश्र
इस दुनिया से न तो हम ठीक से जुड़ पा रहे हैं न ही इससे पूरी तरह से अलग हो पाते हैं। हम त्रिशंकु की तरह अधर में लटके रह जाते हैं। गुजरात विद्यापीठ की स्थापना के समय सन् 1920 में गांधीजी ने विद्यापीठ में जो पहला भाषण दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इसकी स्थापना हेतु केवल विद्यादान नहीं है, विद्या देना नहीं है। विद्यार्थी के लिए गुजारे का साधन जुटाना भी एक उद्देश्य है। इस वाक्य को पूरा करते ही उन्होंने आगे के वाक्य में कहा कि इसके लिए जब मैं इस विद्यापीठ की तुलना दूसरी शिक्षण- संस्थाओं से करता हूँ तो मैं चकरा जाता हूँ। उन्होंने इस विद्यापीठ की तुलना उस समय के बड़े माने गए, बड़े बताए गए दूसरे विद्यालयों से करते हुए एक भिन्न अर्थ में इसे अणुविद्यालय, एक लघु यानी छोटा- सा विद्यालय कहा था। यहाँ के मुकाबले दूसरे संस्थाओं में ईंट -पत्थर, चूना कहीं ज्यादा लगा था- ऐसा भी तब गांधीजी ने कहा था। लेकिन इस मौके पर हम यह दुहरा लें कि अणु दिखता छोटा -सा ही है पर उसके भीतर ताकत तो अपार होती है।

पिछले दो-पाँच वर्षों में आप सबने देखा ही है कि समृद्धि की सबसे आकर्षक चमक दिखाने वाले अमेरिका जैसे देश भी भयानक मंदी के शिकार हुए हैं और वहाँ भी इस अर्थव्यवस्था ने ग़जब की तबाही मचाई है। उधारी की अर्थव्यवस्था में डूबे सभी देशों को तारने के लिए किफायत को लाइफ जैकेट नहीं फेंकी गई है। उन्हें तो विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बड़े महाजनों ने और उधार देकर बचाना चाहा है। हिंदी में और गुजराती में भी दो शब्द हैं- एक नौकरी दूसरा शब्द है चाकरी। नौकरी कीजिए, आप जीविका के लिए; पर जो काम करें उसमें अपना मन ऐसा उडेल दें कि वह काम आपका खुद का काम बन जाए-  दूसरे के लिए किया जाने वाला काम नहीं बने। नौकरी में चाकरी का भाव जितना सध सकेगा आपसे, उतना आनंद आने लगेगा और तब आप उसे केवल पैसे के तराजू पर तोलने के बदले संतोष के तराजू पर तोलने लगेंगे।

देश में दो और पुरानी विद्यापीठों की उम्र देखेंगे, तो यह विद्यापीठ एकदम ताज़ा, आज की लगेंगी। हमारे सुनहरे बताए गए इतिहास में एक विद्यापीठ थी नालंदा और दूसरी थी तक्षशिला। दूसरी विद्यापीठ का अर्थ है तक्ष यानी तराशना, शिला यानी पत्थर, या चट्टान। अनगढ़ पत्थर में से यानी साधारण से दिखने वाले पत्थर में से, शिक्षक, अध्यापक अपने सधे हाथों से, औजारों से एक सुंदर मूर्ति तराश कर निकालें। मामूली से छात्र को एक उपयोगी, संवेदनशील नागरिक के रूप में तराशकर उसके परिवार और समाज को वापस करें। इन नामों का यह सुंदर खेल कुछ हजार बरस पहले चला था और हमें आज भी नहीं भूलना चाहिए कि नालंदा और तक्षशिला जैसी इतनी बड़ी-बड़ी विद्यापीठ आज तो खंडहर बन गई हैं और बहुत हुआ तो पर्यटकों के काम आती है। उनकी ईंट से ईंट बज चुकी है। तो इससे हमें यह समझ में आना चाहिए कि संस्थाएँ, खासकर शिक्षण संस्थाएँ केवल ईंट-पत्थर, गारे, चूने से नहीं बनती। वे गुरु और छात्रों के सबसे संयोग से बनती है। यह बारीक संयोग जब तक वहाँ बना रहा, ये प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान भी चलते रहेंगे। आप सब जानते ही हैं कि इनमें से कैसे-कैसे बड़े नाम उस काल में निकले। कैसे-कैसे बड़े-बड़े प्राध्यापक वहाँ पढ़ाते थे, चाणक्य जैसी विभूतियाँ वहाँ थीं, जिनका लिखा लोग वे सारे अक्षर आज भी पढ़ते थे और उनके लिखे वे सारे अक्षर आज भी क्षर नहीं हुए हैं, आज भी मिटे नहीं हैं। नालंदा और तक्षशिला को राज्याश्रय भी खूब था; पर वह राज ही नहीं बचा तो आश्रय क्या बचता।

आज हमारे अखबार, टेलीविजन के सात दिन-चौबीस घंटे चलने वाले एक-दो नहीं, सौ चैनल अमंगलकारी समाचारों से भरे पड़े हैं। तो क्या हम सचमुच ऐसे अनिष्टकारी युग से गुजर रहे हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। गाँधीजी ने हिंद स्वराज में जैसा कहा था, यह ठीक वैसा ही है- यह तो किनारे की मैल है। बीच बड़ी धारा तो साफ है। समाज के उस बड़े हिस्से के बारे में गांधीजी ने सौ बरस पहले बड़े विश्वास से कहा था कि उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं और न आप राज कर सकेंगे। हाँ आज वह लगातार उपेक्षित रखे जाने पर शायद थोड़ा टूट गया है, पर अभी अपनी धुरी पर कायम है।

विनोबा कहते हैं कि पानी तो निकलता है, बहता है समुद्र में मिलने के लिए। पर रास्ते में एक छोटा-सा गड्ढा आ जाए, मिल जाए, तो वह पहले उसे भरता है। उसे भरकर आगे बढ़ सके, तो ठीक, नहीं तो वह उतने से ही संतोष पा लेता है। वह किसी से ऐसी शिकायत नहीं करता, कभी ऐसा नहीं सोचता कि अरे मुझे तो समुद्र तक जाने का एक महान् उद्देश्य एक महान् लक्ष्य, एक महान्  सपना पूरा करना था। और वो महान्  लक्ष्य तो पूरा हो ही नहीं पाया। तो हम बहना शुरू करें। जीवन की इस यात्रा में छोटे-छोटे गड्ढे आएँगे, खूब प्यार के साथ उन्हें भरते चलें।

(अनुपम मिश्र (1948-2016): गांधीवादी, लेखक, पत्रकार,        पर्यावरणविद् और जल संरक्षणकर्ता थे जिन्होंने जल संरक्षण, जल संचालन और बारिश के पानी के संरक्षण की परम्परागत तकनीकों का प्रचार किया और और जन जागरण की दिशा में काम करते हुए लोगों को प्रोत्साहित किया।) ■■

Jun 5, 2019

पर्यावरण प्रदूषणः खाने का और, दिखाने का और..

पर्यावरण प्रदूषणः
खाने का और, दिखाने का और...
अनुपम मिश्र
पाँच जून को 'पर्यावरण दिवसमनाया जाता है। गिनती में यह कुछ भी हो, पर चरित्र में, पर्यावरण की समझ में, यह पहले समारोह से अलग नहीं होता। 1972 में सौ से अधिक देश संयुक्त राष्ट्र संघ के छाते के नीचे पर्यावरण की समस्याओं को लेकर इकट्ठे हुए थे। तब विकास और पर्यावरण में छत्तीस का रिश्ता माना गया था।
सरकारें आज भी पर्यावरण और विकास में खटपट देख रही हैं, इसलिए प्रतिष्ठित हो चुके विकास-देवता पर सिन्दूर चढ़ाती चली जा रही हैं; लेकिन विकास के इसी सिन्दूर ने पिछले दौर में पर्यावरण की समस्याओं को पैदा किया है और साथ ही अपने चटख लाल रंग में उन्हें ढकने की भी कोशिश की है।
सरकारी कैलेंडर में देखें, तो पर्यावरण पर बातचीत 1972 में हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टॉकहोम सम्मेलन से शुरू होती है। पश्चिम के देश चिन्तित थे कि विकास का कुल्हाड़ा उनके जंगल काट रहा है, विकास की पताकानुमा उद्योग की ऊँची चिमनियाँ, सम्पन्नता के वाहन, मोटर गाड़ियाँ आदि उनके शहरों की हवा खराब कर रही हैं, देवता सरीखे उद्योगों से निकल रहा 'चरणामृतवास्तव में वह गन्दा और ज़हरीला पानी है, जिसमें उनकी सुन्दर नदियाँ, नीली झीलें अन्तिम साँसें गिन रही हैं।
ये देश जिस तकनीक ने उन्हें यह दर्द दिया था, उसी में इसकी दवा खोज रहे थे। पर तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों को लग रहा था कि पर्यावरण संरक्षण की यह नई बहस उनके देशों के विकास पर ब्रेक लगाकर उन्हें पिछड़ा ही रहने देने की साजिश है। ब्राजील ने तब जोरदार घोषणा की थी कि हमारे यहाँ सैकड़ों साफ नदियाँ हैं, चले आओ, इनके किनारे अपने उद्योग लगाओ और उन्हें गन्दा करो। हमें पर्यावरण नहीं, विकास चाहिए।
भारत ने ब्राजील की तरह बाहर का दरवाजा जरूर नहीं खोला, लेकिन पीछे के आँगन का दरवाजा धीरे से खोलकर कहा था कि गरीबी से बड़ा कोई प्रदूषण नहीं है। गरीबी से निपटने के लिए विकास चाहिए और इस विकास से थोड़ा बहुत पर्यावरण नष्ट हो जाये तो वह लाचारी है हमारी। ब्राजील और भारत के ही तर्क के दो छोर थे और इनके बीच में थे ,वे सब देश जो अपनी जनसंख्या को एक ऐसे भारी दबाव की तरह देखते थे, जिसके रहते वे पर्यावरण संवर्धन के झंडे नहीं उठा पाएँगे। इस दौर में वामपंथियों ने भी कहा कि हम पर्यावरण की विलासिता नहीं ढो सकते।
इस तरह की सारी बातचीत ने एक तरफ तो विकास की उस प्रक्रिया को और भी तेज किया जो प्राकृतिक साधनों के दोहन पर टिकी है और दूसरी तरफ गरीबों की जनसंख्या को रोकने के कठोर-से-कठोर तरीके ढूँढे। इस दौर में कई देशों में संजय गांधियों का उदय हुआ, जिन्होंने पर्यावरण संवर्धन की बात आधे मन और आधी समझ से, पर परिवार नियोजन का दमन चलाया पूरी लगन से; लेकिन इस सबसे पर्यावरण की कोई समस्या हल नहीं हुई, बल्कि उनकी सूची और लम्बी होती गई।
पर्यावरण की समस्या को ठीक से समझने के लिए हमें समाज में प्राकृतिक साधनों के बँटवारे को, उसकी खपत को समझना होगा। सेंटर फॉरसाइंस एंड एनवायरनमेंट के निदेशक अनिल अग्रवाल ने इस बँटवारे का एक मोटा ढाँचा बनाया था। कोई 5 प्रतिशत आबादी प्राकृतिक साधनों के 60 प्रतिशत भाग पर कब्जा किए हुए है। 10 प्रतिशत आबादी के हाथ में कोई 25 प्रतिशत साधन हैं। फिर कोई 25 प्रतिशत लोगों के पास 10 प्रतिशत साधन हैं। लेकिन 60 प्रतिशत की फटी झोली में मुश्किल से 5 प्रतिशत प्राकृतिक साधन हैं।
हालत फिर ऐसी भी होती, तो एक बात थी। लेकिन इधर 5 प्रतिशत हिस्से की आबादी लगभग थमी हुई है और साथ ही जिन 60 प्रतिशत प्राकृतिक साधनों पर आज उसका कब्जा है, वह लगातार बढ़ रहा है। दूसरे वर्ग की आबादी में बहुत थोड़ी बढ़ोतरी हुई है और शायद उनके हिस्से में आये प्राकृतिक साधनों की मात्रा कुछ स्थिर-सी है। तीसरे 25 प्रतिशत की आबादी में वृद्धि हो गई है और उनके साधन हाथ से निकल रहे हैं। इसी तरह चौथे 60 प्रतिशत वाले वर्ग की आबादी तेजी से बढ़ चली है और दूसरी तरफ उनके हाथ में बचे-खुचे साधन भी तेज़ी से कम हो रहे हैं।
यह चित्र केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया का है। और इस तरह देखें तो कुछ की ज्यादा खपत वाली जीवनशैली के कारण ज्यादातर की, 80-85 प्रतिशत लोगों की जिन्दगी के सामने आया संकट समझ में आ सकता है। इस चित्र का एक और पहलू है। आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा बस किसी तरह जिन्दा रहने की कोशिश में अपने आस-पास के बचे-खुचे पर्यावरण को बुरी तरह नोचता-सा दिखता है तो दूसरी तरफ वह 5 प्रतिशत वाला भाग पर्यावरण के ऐसे व्यापक और सघन दोहन में लगा है जिसमें भौगोलिक दूरी कोई अर्थ नहीं रखती।
कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश में लगे कागज उद्योग आस-पास के जंगलों को हजम करने के बाद असम और उधर अण्डमाननिकोबार के जंगलों को भी साफ करने लगे हैं। जो जितना ताकतवर है, चाहे वह उद्योग हो या शहर, उतनी दूरी से किसी कमजोर का हक छीनकर अपने लिए प्राकृतिक साधन का दोहन कर रहा है।
दिल्ली जमुना किनारे है, उसका पानी तो वह पिएगी ही, पर कम पड़ेगा तो दूर गंगा का पानी भी खींच लाएगी। इन्दौर पहले अपनी छोटी-सी खान नदी को अपने प्रदूषण से मार देगा और फिर दूर बह रही नर्मदा का पानी उठा लाएगा। भोपाल पहले अपने समुद्र जैसे विशाल ताल को कचराघर बना लेगा, फिर 80 किलोमीटर दूर बह रही नर्मदा से पीने के पानी का प्रबन्ध करने की योजना बना सकता है। पर नर्मदा के किनारे ही बसा जबलपुर नर्मदा के पानी से वंचित रहेगा, क्योंकि इतना पैसा नहीं है।
कुल मिलाकर प्राकृतिक साधनों की इस छीना झपटी ने, उनके दुरुपयोग ने पर्यावरण के हर अंग पर चोट की है और इस तरह सीधे उससे जुड़ी आबादी के एक बड़े भाग को और भी बुरी हालत में धकेला है। आधुनिक विज्ञान, तकनीक और विकास के नाम पर हो रही यह लूटपाट प्रकृति से (खासकर उसके ऐसे भण्डारों से, जो दोबारा नहीं भरे जा सकेंगे, जैसे कोयला, खनिज पेट्रोल आदि) पहले से कहीं ज्यादा कच्चा माल खींचकर उसे अपनी जरूरत के लिए नहीं, लालच के लिए पक्के माल में बदल रही है।
विकास कच्चे माल को पक्के माल में बदलने की प्रक्रिया में जो कचरा पैदा करता है, उसे ठीक से ठिकाने भी लगाना नहीं चाहता। उसे वह ज्यों-का-त्यों प्रकृति के दरवाजे पर पटक आना जानता है। इस तरह इसने हर चीज को एक ऐसे उद्योग में बदल दिया है जो प्रकृति से ज्यादा-से-ज्यादा हड़पता है और बदले में इसे ऐसी कोई चीज नहीं देता, जिससे उसका चुकता हुआ भण्डार फिर से भरे। और देता भी है तो ऐसी रद्दी चीजें, धुआँ, गन्दा जहरीला पानी आदि कि प्रकृति में अपने को फिर सँवारने की जो कला है, उसका जो सन्तुलन है वह डगमगा जाता है। यह डगमगाती प्रकृति, बिगड़ता पर्यावरण नए-नए रूपों में सामने आ रहा है।
बाढ़ नियंत्रण की तमाम कोशिशों के बावजूद पिछले दस सालों में देश के पहले से दुगने भाग में, 2 करोड़ हेक्टेयर के बदले 4 करोड़ हेक्टेयर में बाढ़ फैल रही है। कहाँ तो देश के 33 प्रतिशत हिस्से को वन से ढकना था, कहाँ अब मुश्किल से 10 प्रतिशत वन बचा है। उद्योगों और बड़े-बड़े शहरों की गन्दगी ने देश की 14 बड़ी नदियों के पानी को प्रदूषित कर दिया है। गन्दे पानी से फैलने वाली बीमारियों, महामारियों के मामले, जिनमें सैकड़ों लोग मरते हैं कभी दबा लिये जाते हैं ,तो कभी इस वर्ष की तरह सामने आ जाते हैं।
इसी तरह कोलकाता जैसे शहरों की गन्दी हवा के कारण वहाँ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा साँस, फेफड़ों की बीमारियों का शिकार हो रहा है। शहरों के बढ़ते कदमों से खेती लायक अच्छी जमीन कम हो रही है, बिजली बनाने और कहीं-कहीं तो खेतों के लिए सिंचाई का इन्तजाम करने के लिए बाँधे गए बाँधों ने अच्छी उपजाऊ जमीन को डुबोया है। इस तरह सिकुड़ रही खेती की जमीन ने जो दबाव पैदा किया उसकी चपेट में चारागाह या वन भी आए हैं। वन सिमटे हैं तो उन जंगली जानवरों का सफाया होने लगा है जिनका यह घर था।
किसान नेता शरदजोशी ने खेतों के मामले में जिस इण्डिया और भारत के बीच एक टकराव की-सी हालत देखी है - पर्यावरण के सिलसिले में प्राकृतिक साधनों के अन्याय -भरे बँटवारे में यह और भी भयानक हो उठती है। इसमें इण्डिया बनाम भारत तो मिलेगा, यानी शहर गाँव को लूट रहा है, तो शहर-शहर को भी लूट रहा है, गाँव-गाँव को भी और सबसे अन्त में यह बँटवारा लगभग हर जगह के आदमी और औरत के बीच भी होता है।
उदाहरण के लिए दिल्ली में ही जमनापार के लोगों का पानी छीनकर दक्षिण दिल्ली की प्यास बुझाई जाती है, एक ही गाँव में अब तक 'बेकारजा रहे जिस गोबर से गरीब का चूल्हा जलता था ,अब सम्पन्न की गोबर गैस बनने लगी है और घर के लिए पानी, चारा ईंधन जुटाने में हर जगह आदमी के बदले औरत को खपना पड़ता है।
बिगड़ते पर्यावरण की इसी लम्बी सूची के साथ-ही-साथ सामाजिक अन्यायों की एक समानान्तर सूची भी बनती है। इन समस्याओं का सीधा असर बहुत से लोगों पर पड़ रहा है।
पर क्या कोई इन समस्याओं से लड़ पाएगा? बिगड़ते पर्यावरण को सँवार न पाएँ तो फिलहाल कम-से-कम उसे और बिगड़ने से रोक पाएँगे क्या? इन सवालों का जवाब ढूँढने से पहले बिगड़ते पर्यावरण के मोटे-मोटे हिस्सों को टटोलना होगा।
विकास की सभी गतिविधियाँ उद्योगबन गई हैं या बनती जा रही हैं। खेती आज अनाज पैदा करने का उद्योग है, बाँध बिजली बनाने या सिंचाई करने का उद्योग है, नगरपालिकाएँ शहरों को साफ पानी देने या उसका गन्दा पानी ठिकाने लगाने का उद्योग है। सचमुच जो उद्योग हैं ,वे अपनी जगह हैं ही। इन सभी तरह के उद्योगों से चार तरह का प्रदूषण हो रहा है।
उद्योग छोटा हो या बड़ा, एक कमरे में चलने वाली मन्दसौर की स्लेट-पेंसिल यूनिट हो या नागदा में बिड़ला परिवार की फैक्टरी या समाजवादी सरकार का कारखाना-इन सबमें भीतर का पर्यावरण कुछ कम-ज्यादा खराब रहता है। इसका शिकार वहाँ काम करने वाला मजदूर बनता है। वह संगठित है तो भी और असंगठित हुआ तो और भी ज्यादा। फिर इन सबसे बाहर निकलने वाले कचरे से बाहर का प्रदूषण फैल रहा है।
यह जहरीला धुआँ, गन्दा पानी वगैरह है। इसकी शिकार उस उद्योग के किनारे या कुछ दूर तक रहने वाली आबादी होती है। तीसरी तरह का प्रदूषण इन उद्योगों से पैदा हो रहे पक्के माल का है। जैसे रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाएँ आदि। चौथा प्रदूषण वहाँ होता है जहाँ से इन उद्योगों का कच्चा माल आता है।
इनमें से पहले तीन तरह के प्रदूषणों का कुछ हल निकल सकता है, वह आज नहीं निकला पाया है तो इसका कारण है मजदूर और नागरिक आन्दोलनों की सुस्ती। आज भी परम्परागत मजदूर आन्दोलन उद्योग के भीतर के प्रदूषण को अपने संघर्ष का मुद्दा नहीं बना पाया है। ज्यादातर लड़ाई मजदूरी वेतन या बोनस को लेकर होती है। इसलिए कभी प्रदूषण का सवाल उठे भी तो इसे भी पैसे से तोल लिया जाता है। मध्य प्रदेश में सारणी बिजली घर की मजदूर यूनियन ने धुआँ कम करने की माँग के बदले धुआँ-भत्ता माँगा है।
दूसरा प्रदूषण उद्योग से बाहर निकलने वाली चीजों का है। अगर उससे पीड़ित नागरिक संगठित हो जाएँ,तो उससे भी लड़ा जा सकता है। पक्के माल के रूप में ही सामने आ रहे प्रदूषण से लड़ना जरा कठिन होगा, क्योंकि इसके लिए उन चीजों की खपत को ही चुनौती देनी पड़ेगी। लेकिन विकास के इस ढाँचे के बने रहते चौथी तरह के, प्राकृतिक साधनों के कच्चे माल के रूप में दोहन के कारण हो रहे प्रदूषण से लड़ना सबसे कठिन काम होगा; क्योंकि एक तो इस तरह का प्रदूषण हमारे आस-पास नहीं काफी दूर होता है और उसका जिन पर असर पड़ता है-वनवासियों पर, मछुआरों पर, बंजारा समुदायों पर, छोटे किसानों, भूमिहीनों पर, वे सब हमारी-आपकी आँखों से ओझल रहते हैं।
ऐसी जगहों से भी विरोध की कुछ आवाज़ें उठ ज़रूर रही हैं ;पर उनकी कोशिशें पूरे समाज की धारा के एकदम विपरीत होने के कारण जल्दी दब जाती हैं, दबा दी जाती हैं। ऐसे आन्दोलनअक्सर अपने बचपन में ही असमय मर जाते हैं।
फिर भी पर्यावरण के बचाव के लिए उठी इन छोटी-मोटी आवाजों ने सरकार के कान खड़े किए हैं। पर्यावरण की वास्तविक चिन्ता की फुसफुसाहट बढ़े ,तो उसे नकली चिन्ता के एक लाउडस्पीकर से भी दबाया जा सकता है। बेमन से कुछ विभाग, कुछ कानून बना दिए गए हैं। उनको लागू करने वाला ढाँचा जन्म से ही अपाहिज रखा जाता है।
जल- प्रदूषण नियंत्रण कानून को बने कई साल हो गए। पर आज तक उसने नदियों को गिरवी रख रहे उद्योगों को, नगरपालिकाओं को कोई चुनौती भी नहीं दी है। पहले केन्द्र में और अब सभी राज्यों में खुल रहे पर्यावरण विभाग भी उन थानों से बेहतर नहीं हो पाएँगे जो अपराध कम करने के लिए खुलते हैं।
पर्यावरण की इस चिन्ता ने पिछले दिनों पर्यावरण शिक्षा का भी नारा दिया है। विश्वविद्यालयों में तो यह शिक्षा शुरू हो गई है, अब स्कूलों में भी यह लागू होने वाली है। पर इस मामले में शिक्षा और चेतना का फर्क करना होगा। पर्यावरण की चेतना चाहिए, शिक्षा या डिग्री नहीं। चेतना बिगड़ते पर्यावरण के कारणों को ढूँढने और उनसे लड़ने की ओर ले जाएगी, महज शिक्षा विशेषज्ञ तैयार करेगी जो अन्तत: उन्हीं अपाहिज विभागों में नौकरी पा लेंगे। नकली चिन्ता का यह दायरा हजम किए जा रहे पर्यावरण से ध्यान हटाने के लिए ऐसी ही दिखावटी चीजें, हल और योजनाएँ सामने रखता जाएगा।
जब तक पर्यावरण की चेतना नहीं जागती, जब तक विकास के इस देवता पर चढ़ाया जा रहा सिन्दूर नहीं उतारा जाता, तब तक पर्यावरण लूटता रहेगा, उस पर टिकी तीन-चौथाई आबादी की जिन्दगी बद-से-बदतर होती जाएगी। लेकिन विकास की इस धारा को चुनौती देकर विकल्प खोजना एक बड़ा सवाल है। अन्याय गैर बराबरी से लड़ने की प्रेरणा देने वाली मार्क्सवाद विचारधाराओं तक में विकास के उसी ढाँचे को अपनाया गया है जो पर्यावरण के कायमी उपयोग ढूँढे बिना पर्यावरण बिगड़ता ही जाएगा।

गरीबी-गैरबराबरी बढ़ेगी, सामाजिक अन्यायों की बाढ़ आएगी। समाज का एक छोटा-सा लेकिन ताकतवर भाग बड़े हिस्से का हक छीनकर पर्यावरण खाता रहेगा, बीच-बीच में दिखाने के लिए कुछ संवर्धन की बात भी करता रहेगा। खाने और दिखाने के इस फर्क को समझे बिना 5 जून के समारोह या पूरे साल भर चलने वाली चिन्ता एक कर्मकांड बनकर रह जाएगी। (पुस्तक - साफ माथे का समाज से)

Jun 7, 2017

वर्षा जल की साझेदारी

           वर्षा जल की साझेदारी 

                 - अनुपम मिश्र

कुण्ड या टाँका
(गतांक से आगे)
परम्परागत जल संग्रह में तालाब आदि के निर्माण में जो जगह आगोर की यानी जलागम क्षेत्र की होती है वही जगह समाज ने मरुभूमि के शहरों और गाँवों में घर की छतों पर भी ढूँढ निकाली थी। वर्षा का पानी जैसे भूमि पर गिरकर एक जगह एकत्र हो सकता है, तो उसी तरह छोटी या बड़ी छत या आँगन में गिरने वाला पानी क्यों न एकत्र किया जाए। वर्षा के ऐसे मीठे या पालर पानी का महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब हमें पता चलता है कि उन क्षेत्रों में भूजल बिल्कुल खारा हैं और वह पीने के लायक नहीं है।
प्राय: हर घर की छत एक हल्का-सा ढाल लिए बनाई जाती है। वहाँ से एक नाली के जरिए पानी नीचे आता है। नाली में रेत के कण और कचरे को छानने का प्रबन्ध रखा जाता है। उस क्षेत्र में गिरने वाली वर्षा के माप या आँकड़े के अनुसार नीचे जमा करने का टाँका बनाया जाता है। मोटे तौर पर ऐसे टाँकों की क्षमता 50 हजार लीटर से लेकर पाँच लाख लीटर तक रहती है। पुराने समय में इन्हें घड़ों के नाप से देखा जाता और ऐसे घड़ों का आकार एक निश्चित मानक से तय होता था।
राजस्थान ने अनेक शहरों में, कस्बों में कोई 25-30 साल पहले से नगरपालिकाओं ने नलों की व्यवस्था बना दी है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि समय के साथ-साथ पानी की उपलब्धता में लगातार गिरावट आई है और जो नल कभी दिनभर चलते थे, अब बड़ी मुश्किल से उनमें एकाध घंटे पानी आ पाता है। ऐसे क्षेत्रों में छतों और आँगनों से भरने वाले टाँकों की व्यवस्था आज भी बहुत व्यावहारिक और आधुनिक सिद्ध हो रही है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे क्षेत्र कम वर्षा वाले क्षेत्र हैं।
ऐसे कुण्ड, टाँके सब जगह हैं। ऊँचे पहाड़ों में बने किलों में, मंदिरों में, पहाड़ की तलहटी में बसे गाँव में, गाँव के बाहर निर्जन क्षेत्रों में, और तो और खेतों में भी सब जगह हमें अलग-अलग आकारों के कुण्ड या टाँके मिलते हैं।
जहाँ जितनी भी जगह मिल सके, वहाँ गारे-चूने से लीपकर एक ऐसा आँगनबना लिया जाता है, जो थोड़ी ढाल लिये रहता है। यह ढाल एक तरफ से दूसरी तरफ भी हो सकता है और यदि आँगनकाफी बड़ा है तो ढाल उसके सब कोनों से बीच केंद्र की तरफ भी आ सकता है। आँगनके आकार के हिसाब से, उस पर बरसने वाली वर्षा के हिसाब से इस केंद्र में एक कुण्ड बनाया जाता है। कुण्ड के भीतर की चिनाई इस ढंग से की जाती है कि उसमें एकत्र होने वाले पानी की एक बूँद भी रिसे नहीं, वर्ष भर पानी सुरक्षित और साफ-सुथरा बना रहे।
जिस आँगन में कुण्ड के लिए वर्षा का पानी जमा किया जाता है, वह आगोर कहलाता है। आगोर संज्ञा अगोरने क्रिया से बनी है। अगोरना यानी बटोर लेना के अर्थ में। आगोर को खूब साफ-सुथरा रखा जाता है, वर्ष भर। वर्षा से पहले तो इसकी बहुत बारीकी से सफाई होती है। जूते, चप्पल आगोर में नहीं आ सकते। समाज ने कड़े नियम बनाए थे, पानी को सरल ढंग से साफ रखने के लिए।
आगोर की ढाल से बहकर आने वाला पानी कुण्ड के मंडल, यानी घेरे में चारों तरफ बने ओयरों यानी सुराखों से भीतर पहुँचता है। ये छेद कहीं-कहीं झुंड भी कहलाते हैं। आगोर की सफाई के बाद भी पानी के साथ आ सकने वारी रेत, पत्तियाँ रोकने के लिए ओयरों में कचरा छानने के लिए जालियाँ भी लगती हैं। कहीं-कहीं बड़े आकार के कुण्डों में एकत्र होने वाले पानी की शुद्धता के लिए आगोर ठीक किसी चबूतरे की तरफ ऊँचा उठा रहता है।
बहुत बड़ी जोतों के कारण मरुभूमि में गाँव और खेतों की दूरी और भी बढ़ जाती है। खेतों पर दिन-भर काम करने के लिए भी पानी चाहिए। खेतों में भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटी-बड़ी कुण्डियाँ बनाई जाती हैं। इनमें एकत्र कर लिया गया पानी कृषक समाज के निस्तार और पीने के काम में आ जाता है।
राजस्थान में जल संरक्षणककुण्ड बनते ही ऐसे रेतीले इलाकों में हैं, जहाँ भूजल सौ-दो सौ हाथ से भी गहरा और प्राय: खारा मिलता है। बड़े कुँड बीस-तीस हाथ गहरे बनते हैं और वह भी रेत में । भीतर बूँद-बूँद भी रिसने लगे तो भरा-भराया कुण्ड खाली होने में देर नहीं लगे।
इसलिए कुण्ड के भीतरी भाग में सर्वोत्तम चिनाई की जाती है। आकार छोटा हो या बड़ा, चिनाई तो सौ टका ही होती है। चिनाई में पत्थर या पत्थर की पट्टियाँ भी लगाई जाती हैं। साँस यानी पत्थरों के बीच जोड़ते समय रह गई जगह में फिर से महीन चूने का लेप किया जाता है। मरुभूमि में तीस हाथ पानी भरा हो पर तीस बूँद भी रिसन नहीं होगी-इसका पक्का और पुख्ता इंतजाम किया जाता रहा है।
आगोर की सफाई और भारी सावधानी के बाद भी कुछ रेत कुण्ड में पानी के साथ चली जाती है। इसलिए कभी-कभी वर्ष के आरंभ में, चैत्र में कुण्ड के भीतर उतर कर इसकी सफाई भी करनी पड़ती है। नीचे उतरने के लिए चिनाई के समय ही दीवार की गोलाई में एक-एक हाथ के अंतर पर जरा सी बाहर निकली पत्थर की एक-एक छोटी-छोटी पट्टी बिठा दी जाती है। नीचे कुण्ड के तल पर जमा रेत आसानी से समेट कर निकाली जा सके, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है। तल एक बड़े कढ़ाव जैसा ढालदार बनाया जाता है। इसे खमाड़ियाँ या कुण्डलियाँ भी कहते हैं। लेकिन ऊपर आगोर में इतनी अधिक सावधानी रखी जाती है कि खमाडिय़ों में से रेत निकालने का काम पाँच से दस बरस में एकाध बार ही करना पड़ता है। एक पूरी पीढ़ी कुण्ड को इतने सँभाल कर रखती है कि दूसरी पीढ़ी को ही उसमें सीढ़ियों से उतरने का मौका मिल पाता है।
पिछले दौर में सरकारों ने अनेक स्थानों पर अनेक गाँवों में पानी का नया प्रबंध किया है। पेयजल की नई योजनाएँ आई हैं। हैंडपंप या ट्यूबवेल लगे हैं। इंदिरा गाँधी नहर से भी शहरों, गाँवों को पीने का पानी दिया जाने लगा है। ऐसे इलाकों में कुण्ड, टाँकों की रखवाली की, देखरेख की मजबूत परम्परा जरूर कमजोर हुई है। यहाँ के कुण्ड टूट-फूट चले हैं, आगोर में झाड़ियाँ उग आई हैं। लेकिन कहीं-कहीं पानी की नई व्यवस्था अकाल आदि के दौर में फिर से लडख़ड़ा गई है और तब ऐसी जगहों पर लोगों ने टूटे कुण्डों की फिर से मरम्मत की है। राजस्थान में ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ समाज ने पानी के नए साधन आने पर भी अपने पुराने तरीके कायम रखे हैं।
कुण्ड निजी भी है और सार्वजनिक भी। निजी कुण्ड घरों के सामने, आँगन में, अहाते में और पिछवाड़े बाड़ों में बनते हैं। सार्वजनिक कुण्ड पंचायती भूमि में या प्राय: दो गाँव के बीच बनाए जाते हैं। बड़े कुण्डों की चारदीवारी में प्रवेश के लिए दरवाजा भी होता है। इसके सामने प्राय: दो खुले हौज रहते हैं। एक छोटा, एक बड़ा। इनकी ऊँचाई भी कम ज्यादा रखी जाती है। ये खेल, थाला, हवाड़ों या उबारा कहलाते हैं। इनमें आसपास से गुजरने वाले भेड़-बकरियों, ऊँट और गायों के लिए पानी भर कर रखा जाता है। पशुओं को बाहर ही पानी मिल जाता है और इनके भीतर जाने से जो गंदगी हो सकती है, वह भी रुक जाती है।
सार्वजनिक कुण्ड भी लोग ही बनाते हैं। पानी का काम पुण्य का काम माना जाता है। किसी भी घर में कोई अच्छा प्रसंग आने पर गृहस्थ सार्वजनिक कुण्ड बनाने का संकल्प लेते हैं और फिर इसे पूरा करने में गव के दूसरे घर भी अपना श्रम देते हैं। कुछ सम्पन्न परिवार सार्वजनिक कुण्ड बनाकर उसकी रखवाली का काम एक परिवार को सौंप देते थे। कुण्ड के बड़े अहाते में आगोर के बाहर इस परिवार के रहने का प्रबंध कर दिया जाता था। यह व्यवस्था दोनों तरफ से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। कुण्ड बनाने वाले परिवार के मुखिया अपनी सम्पत्ति का एक निश्चित भाग कुण्ड की सार-संभाल के लिए अलग रख देते थे। बाद की पीढ़ियाँ भी इसे निभाती थीं। आज भी राजस्थान में ऐसे बहुत से कुण्ड हैं, जिनको बनाने वाले परिवार नौकरी, व्यापार के कारण यहाँ से निकल कर असम, बंगाल, मुंबई जा बसे हैं पर रखवाली करने वाले परिवार अभी भी कुण्ड पर ही बसे हैं। ऐसे बड़े कुंड आज भी वर्षा के जल का संग्रह करते हैं और पूरे बरस भर आसपास की आबादी को किसी भी नगरपालिका से ज्यादा शुद्ध पानी देते हैं। ऐसे कुण्डों या टाँकों की क्षमता एक लाख लीटर से ऊपर होती है।
कई कुण्ड टूट-फूट भी गए हैं, कहीं-कहीं उनमें एकत्र पानी भी खराब हुआ है पर यह सब समाज की टूट-फूट के अनुपात में ही मिलेगा। इसमें इस पद्धति का कोई दोष नहीं है। यह पद्धति तो नई खर्चीली और अव्यावहारिक योजनाओं के दोष भी ढँकने की उदारता रखती है। इन इलाकों में पिछले दिनों जल संकट हल करने के लिए जितने भी नलकूप और हैंडपंपलगे, उनमें पानी खारा ही निकला। पीने लायक मीठा पानी इन कुण्ड, कुण्डियों में ही उपलब्ध था। इसलिए बाद में अकाल आने पर कहीं-कहीं कुण्डों के ऊपर ही हैंडपंप लगा दिए गए हैं।
चुरू क्षेत्र में ऐसे कई कुण्ड मिल जाएँगे,जो नई पुरानी रीत एक साथ निभाते हैं। बहुप्रचारित इंदिरा गाँधी नहर से ऐसे कुछ क्षेत्र में पीने का पानी पहुँचाया गया है और इस पानी का संग्रह कहीं तो नई बनी सरकारी टंकियों में किया गया है और कहीं-कहीं इन्हीं पुराने कुण्डों में।
हम सभी जानते हैं कि राजस्थान में रंगों के प्रति एक विशेष आकर्षण हैं। लहँगे ओढ़नी और चटकीले रंगों की पगड़ियाँ जीवन के सुख और दुख में अपने रंग बदलती हैं। पर इन  कुण्डियों का केवल एक ही रंग मिलता है - बस सफेद। तेज धूप और गर्मी के इस इलाके में यदि कुण्डियों पर कोई गहरा रंग हो तो बाहर की गर्मी सोख कर भीतर के पानी पर भी अपना असर छोड़ेगा। इसलिए इतने रंगीन पहनावे वाला समाज कुण्डियों को सिर्फ सफेद रंग में रंगता है। सफेद परत तेज धूप की किरणों को वापस लौटा देती है।
इन कुण्डों ने पुराना समय भी देखा है, नया भी। इस हिसाब से वे समय सिद्ध हैं। स्वयंसिद्ध इनकी एक और विशेषता है। इन्हें बनाने के लिए किसी भी तरह की सामग्री कहीं और से नहीं लानी पड़ती। मरुभूमि में पानी का काम करने वाले विशाल संगठन का एक बड़ा गुण है - अपनी ही जगह उपलब्ध चीजों से अपना मजबूत ढाँचा खड़ा करना। किसी जगह कोई एक सामग्री मिलती है, पर कहीं और वह नहीं-लेकिन कुण्ड वहाँ भी मिलेंगे।
जहाँ पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं, वहाँ कुण्ड का मुख्य भाग उसी से बनता है। कुछ जगह ये उपलब्ध नहीं है। पर वहाँ फोग नाम की झाड़ी खड़ी है साथ देने। फोग की टहनियों को एक दूसरे में गूँथ कर फँसा कर कुण्ड के ऊपर का गुम्बदनुमा ढाँचा बनाया जाता है। इस पर रेत, मिट्टी और चूने का मोटा लेप लगाया जाता है। गुम्बद के ऊपर चढ़ने के लिए भीतर गुथी लकड़ियों का कुछ भाग बाहर निकाल कर रखा जाता है। बीच में पानी निकालने की जगह बनाई जाती है। यहाँ भी वर्षा का पानी कुण्ड के मंडल में बने ओयरों, छेद से जाता है। पत्थर वाले कुण्ड में ओयरों की संख्या एक से अधिक होती है लेकिन फोग की कुण्डियों में सिर्फ एक ही रखी जाती है। कुण्ड का व्यास कोई सात-आठ हाथ, ऊँचाई कोई चार हाथ और पानी लेने वाले छेद प्राय: एक बित्ता बड़े होते हैं। वर्षा का पानी भीतर कुण्ड में जमा करने के बाद बाकी दिनों इसे कपड़े या टाट आदि को लपेट कर बनाए गए एक डाट से ढक कर रखते हैं। फोग वाले कुण्ड थोड़े छोटे होते हैं इसलिए प्राय: कुण्डी कहलाते हैं।
फोग की टहनियों से बना गुंबद भी इस तेज धूप में गरम नहीं होता। उसमें चटक कर दरारें नहीं पड़तीं और भीतर का पानी इन सब बातों के साथ-साथ रेत में रमा रहने के कारण ठंडा बना रहता है।
मरुभूमि में जहाँ कहीं भी जिप्सम या खड़िया पट्टी मिलती है, ऐसे क्षेत्रों में इसी कुण्ड का उपयोग कुण्डी बनाने के लिए किया जाता है। खड़िया के बड़े-बड़े टुकड़े खदान से निकाल कर लकड़ी की आग में पका लिए जाते हैं। एक निश्चित तापमान पर ये बड़े डले यानी टुकड़े टूट-टूट कर छोटे-छोटे नरम टुकड़ों में बदल जाते हैं। फिर इन्हें कूटते हैं। आगोर का ठीक चुनाव कर कुण्डी की खुदाई की जाती है। फिर भीतर की चिनाई और ऊपर का गुम्बद भी इसी खड़िया के चूरे से बनाया जाता है। पाँच-छ: हाथ के व्यास वाला यह गुम्बद कोई एक बित्ता मोटा रखा जाता है। इस पर दो महिलाएँ खड़े होकर पानी निकालें तो भी यह टूटता नहीं।
मरुभूमि में कई जगह चट्टाने हैं। इनमें पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं। इन पट्टियों की मदद से बड़े-बड़े कुण्ड तैयार होते हैं। ये पट्टियाँ प्राय: दो हाथ चौड़ी और चौदह हाथ लम्बी रहती है। जितना बड़ा आगोर हो, जितना अधिक पानी एकत्र हो सकता हो, उतना ही बड़ा कुण्ड इन पट्टियों से ढक कर बनाया जाता है।
घर छोटे हों, बड़े हों या पक्के- कुण्ड तो उनमें पक्के तौर पर बनते ही हैं। मरुभूमि में गाँव दूर-दूर बसे हैं। आबादी भी कम है। ऐसे छितरे हुए गाँवों को पानी की किसी केंद्रीय व्यवस्था से जोड़ने का काम सम्भव ही नहीं है। इसलिए समाज ने यहाँ पानी का सारा काम बिल्कुल विकेंद्रित रखा, उसकी जिम्मेदारी को आपस में बूँद-बूँद बाँट लिया। यह काम एक नीरस तकनीक, यांत्रिक, न रह कर एक संस्कार में बदल गया। ये कुण्डियाँ कितनी सुंदर हो सकती हैं, इसका परिचय दे सकते हैं जैसलमेर की सीमा पर बसे अनेक गाँव।
ये इलाके वर्षा के आँकड़ों में भी सबसे कम हैं और आबादी के घनत्व में भी। आबादी का घनत्व यहाँ पर पाँच, सात व्यक्ति प्रति किलोमीटर है। दस-बीस घरों या ढाणियों के गाँव रेत के विस्तार में एक दूसरे से बहुत दूर-दूर बसे हैं। ऐसी बसावट के लिए पीने का पानी घर-घर के लिए जुटाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही है। लेकिन हमारे परम्परागत समाज में इसको बहुत व्यावहारिक ढंग से हल करके दिखाया है। ऐसे गाँव में हरेक घर के आगे एक बड़ा-सा चबूतरा बनाया जाता है। इसे जमीन से ऊपर कोई दो फुट रखा जाता है और जमीन से नीचे कोई दस फुट गहरा कुण्ड होता है। इनमें घर की छत और आँगन से वर्षा का पानी छानकर एकत्र किया जाता है। जिस घर की सदस्य संख्या ज्यादा होगी उस घर का आकार भी बड़ा होगा और उसी हिसाब से उस घर की छत, उसका आँगन और उसका कुण्ड भी बनाया जाता है। इन कुण्डों के भीतर बहुत सफाई से ऐसी प्लास्ट्रिंग की जाती है कि उसमें एकत्र पानी रिस कर रेत में गायब न हो जाए।
राजस्थान में जल संरक्षण
आज देश के बहुत सारे बड़े शहरों में - दिल्ली चेन्नई, बैंगलोर आदि में सरकारों ने वर्षा के जल का संग्रह करने के लिए नए कानून बनाए हैं। इन कानूनों के कारण अब हर घर को अपनी छत पर बरसने वाले पानी को अनिवार्य रूप से एकत्र करना है या उससे भूजल को रिचार्ज करना है।
लेकिन सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर घरों में यह कानून प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाया है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि रेगिस्तान के अनपढ़ और पिछड़े माने गए गाँव और कस्बों में लोगों ने सैकड़ों बरस से इस पद्धति को अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना लिया था। उन्होंने यह सब किया तो इसीलिए नहीं कि कानून उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है। उन्होंने इसे बाध्य नहीं साध्य माना है। मरुभूमि के लोगों ने अपने पुरखों को ऐसा करते देखा, ऐसा करते सुना। उनकी स्मृति और श्रुति उन्हें इस व्यावहारिक पद्धति की तरफ ले गई। इस स्मृति और श्रुति से यह रीति बन गई और फिर कानून के बराबर बनते रहने वाली कृति भी बन गई।
इन टाँकों के भीतर का डिजाइन भी समाज ने लगातार उन्नत किया है। इनमें भीतर रेत या गाद न जमे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। इसकी पहली सावधानी छत या आँगन में बरती जाती है - जहाँ से पानी एकत्र होता है। दूसरी सावधानी टाँके में प्रवेश से ठीक पहले बनाई जाने वाली संरचना में देखने को मिलती है। अधिकांश रेत या कचरा इन दोनों जगहों पर रोक लिया जाता है। लेकिन फिर भी यदि कुछ रेत कण मुख्य टाँके में चले जाएँ,  तो उनको सरलता से एकत्र कर निकालने का भी पुख्ता इंतजाम इन टाँकों में देखने को मिलता है। भीतर से टाँके गोल हों या चौकोर उनका तल दीवार या परिधि से नब्बे डिग्री के कोण से नहीं जुड़ता। वह हल्की-सी गोलाई लिए रहता है। फिर यह तल भी पूरी तरह समतल नहीं रहता। कुण्ड के आकार के अनुसार इसके बीच में थोड़ी ढाल के साथ एक कढ़ाईनुमा ढाँचा और बनाया जाता है। इसमें पानी के साथ आए हुए रेत के कण धीरे-धीरे जमा हो जाते हैं। दो-चार वर्षों के अंतर पर इसका निरीक्षण किया जाता है और फिर कुण्ड में नीचे उतरकर आसानी से रेत को अलग कर लिया जाता है। कहीं कोण से उतरती हुई सीढिय़ाँ होती हैं तो कहीं खड़ी सीढ़ियाँ। जगह कम हो तो केवल पंजे रखने लायक खाँचे बनाये जाते हैं।
मरुभूमि में कहीं-कहीं छोटे तालाबों के साथ उनके जलग्रहण क्षेत्र में भी टाँके मिलते हैं। इनको बनाने के पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक कारण रहा है। पानी का काम करने वाले नए लोगों को, संस्थाओं को और शासन को भी ऐसी अनोखी बातों को समझने का प्रयत्न करना चाहिेए।
इन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है कभी-कभी इतनी कम कि छोटे जलग्रहण के तालाब पूरी तरह से भर नहीं सकते। इनमें जो थोड़ा पानी आएगा, वह मटमैला होगा और फिर यहाँ की तेज गर्मी और धूप में कीचड़ में बदल सकता है। इसलिए ऐसे छोटे आगोर वाले तालाबों में हमें कहीं-कहीं तालाब में बहकर आने वाले पानी के रास्ते में छोटे कुण्ड या टाँके भी बने मिलते हैं। इनको बनाने का एक ही कारण है - खुले तालाब में जाने से पहले पानी को इन ढके कुण्डों में रोक लेना। ऐसे सभी टाँकों की क्षमता बीस से पचास हजार लीटर तक ही होती है। पक्का बना ढका हुआ टाँका थोड़ी-सी मात्रा में आए पानी को अगले कुछ महीनों तक साफ-सुथरे ढंग से पीने के लिए सुरक्षित रखता है।
पानी का काम करने वाले नए संगठनों को, स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने समाज में चारों तरफ बिखरी ऐसी अनोखी समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध रचनाओं को बनाने का, फैलाने का पूरा ध्यान रखना चाहिए। इससे उनका काम बहुत कम खर्च में कम पैसे में अधिक से अधिक जगहों में फैल सकता है।
छत से वर्षा के जल का संग्रहण
रेगिस्तानी क्षेत्रों के अनेक भागों और विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ अच्छी किस्म का भूजल उपलब्ध नहीं है, अथवा सतही जल संसाधन बहुत दूरी पर अवस्थित है, आने वाले समय में भी घरेलू जल आपूर्ति का वर्षाजल ही एक मात्र स्रोत है। इन क्षेत्रों मे घर की छत पर बरसने वाले जल को वर्षा ऋतु के बाद में उपयोग हेतु अच्छी प्रकार से बनी नालियों एवं पाइपों के द्वारा नियंत्रित कर भंडारण हेतु सतह के ऊपर अथवा अधोसतही पक्के टैंक अथवा टाँकों में एकत्र किया जाता है। यदि भंडारित जल का उपयोग पीने हेतु करना है तो नाली के सामने ही जल के साथ आ सकने वाले कचरे को रोकने का उचित प्रबंध किया जाता है इससे जल छनकर नीचे टाँके में जमा होता है। टाँके का आकार मुख्य रूप से छत के नाप पर आधारित होता है। यथायोग्य टाँकों में जल की इतनी मात्रा भरी जा सकती है, जो आगामी वर्षा के पूर्व तक यथोचित लंबी अवधि हेतु पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें और लोगों को मान्य रूप में राहत पहुँचा सके। इस प्रकार से एकत्र और संचित जल से उन क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई हेतु जल की प्राप्ति कठिन हो, छोटे भूमि के टुकड़ों में जैसे गृह वाटिकाओं और सब्जी उत्पादन के लिए सिंचाई भी की जा सकती है।
लोहे की चद्दरों केवलू अथवा खपरैल और अन्य सभी प्रकार की पक्की छतें जो चिकनी, कठोर एवं घनी हों, छतों से वर्षा के जल का संग्रहण करने के उद्देश्य से सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
इस पद्धति का वास्तविक आकार विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। टाँके के आकार मुख्य रूप से पद्धति की लागत, एकत्रित किए जाने वाले वर्षा के जल की मात्रा, टाँके के मालिकों की आकांक्षाएँ एवं जरूरतें और बाहरी मदद के स्तर से प्रभावित होंगी।
छत से प्राप्त हो सकने वाले जल की मात्रा की गणना इस सूत्र से कर सकते हैं-
एकत्रित जल (लीटर में) = छत का क्षेत्रफल (वर्ग मी.) x वर्षा (मि.मी.)। टैंक अथवा टाँके के आयतन की गणना निम्नांकित सूत्र से की जा सकती है :
V = (t x n x q) + et
जहां V = टाँके का आयतन (लीटर में) t = सूखे मौसम की अवधि (दिनों में) n = उपभोक्ताओं की संख्या, q = उपभोग प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (लीटर में, ) और et = सूखे मौसम में वाष्पन द्वारा जल ह्रास।
क्योंकि बंद टैंक से वाष्पन लगभग नगण्य होता है, अतः वाष्पन में होने वाले जल के ह्रास (et) को नजरअंदाज (= शून्य) किया जा सकता है।
राजस्थान में जल संरक्षण आकांक्षित जल ग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल (यानी छत का क्षेत्रफल) ज्ञात करने हेतु टैंक के आयतन (कुल भराव क्षमता) में पिछले मानसूनों में एकत्रित हुए औसत वर्षाजल की कुल मात्रा (लीटर में) प्रति इकाई क्षेत्र (वर्ग मी.) से भाग देने के बाद उसे अपवाह गुणांक से गुणा कर दें (अपवाह गुणांक, यानी वर्षा का वह भाग जिसका वास्तव में संग्रहण किया जा सकता है, जो 0.8केवलू अथवा खपरैल की छतों से 0.9 लोहे की चद्दरों वाली छतों के अनुसार है)। (समाप्त) जल संग्रहण एवं प्रबंध पुस्तक से साभार