July 18, 2013

इस अंक में

उदंती-  जुलाई- 2013
इस जीवन का प्रथम लक्ष्य है दूसरों की सहायता करना । 
और यदि आप दूसरों की सहायता नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें आहत तो न करें    - दलाई लामा

अनकही

ये कैसा विकास है !
  डॉ. रत्ना वर्मा
प्रकृति मानव जीवन का वह स्रोत है ,जिसके बगैर हम कुछ भी नहीं ;इसलिए एक ओर जहाँ प्रकृति हमपर अपना सब कुछ न्योछावर कर हमें जीवन देती है, तो दूसरी ओर जब वह अपने प्रति हो रहे अन्याय से क्रुद्ध हो जाती है तो फिर वह ऐसा तांडव दिखाती है कि उससे बचने का कोई रास्ता नहीं रह जाता। प्रकृति ने ऐसा ही विकराल रूप पिछले महीने उत्तराखंड में दिखाया है। भारी बारिश और बादल फटने के कारण आई भयानक बाढ़ ने उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग और केदारनाथ के आस-पास के इलाकों में ऐसी तबाही मचाई कि देशवासियों के दिल दहल उठे।  चारधाम की यात्रा पर गए हजारों यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।  साथ ही वहाँ रहने वाले स्थानीय लोगों के घर- बार सब कुछ तबाह हो गए। एक अनुमान के अनुसार इस आपदा से 16000 गाँव  प्रभावित हुए हैं जिसमें से 4200 गाँव तो पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। सबसे अफसोसनाक़ बात तो ये है कि इस संकट की घड़ी में जैसी सहायता पीडि़तों को मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाई। सरकार यह पता लगाने में अब तक कामयाब नहीं हो पाई है कि वहाँ अब तक जान- माल का कितना नुकसान हुआ है। आपदा- प्रबंधन कितनी पुख्ता था ,उसकी पोल इसी से खुल जाती है कि आपदा की इस घड़ी में सहायता तीन दिन बाद पँहुची। सेना यदि आगे न आती तो स्थिति बद-से-बदतर हो गई होती। प्रदेश में इस तबाही से प्रभावित हुए लोगों की जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने में अब न जाने कितने साल लग जाएँगे।
उत्तराखंड की चार धाम की यात्रा पर जाने का सौभाग्य मुझे भी मिला है। एक बार नहीं दो- दो बार, 2005  और 2009 में। दूसरी बार शायद इसलिए कि पहली यात्रा में यमनोत्री के दर्शन नहीं हो पाए थे। पहाड़ों की इस दुर्गम लेकिन सुखद यात्रा का बेहद खूबसूरत अनुभव आज भी यादों में किसी चलचित्र की भाँति बसा हुआ है। वैसे तो पूरा उत्तराखंड प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर इलाका है- जीवनदायी नदी गंगा की बहती धारा के संग-संग यात्रा करने के अनुभव को सिर्फ वहाँ जाकर ही महसूसा जा सकता है, गंगा को माँ और उसके पानी को अमृत क्यों कहते हैं यह गंगा की कल-कल बहती धारा को देखकर ही समझा जा सकता है। सही मायने में चंद शब्दों से वहाँ के सौन्दर्य का वर्णन करना बहुत मुश्किल है। फिर केदारनाथ मंदिर के समीप पँहुच कर तो बस एक ही बात मन में आई- सच ही कहते हैं स्वर्ग यदि कहीं है तो बस यहीं है। अपने जीवन में आत्मा को तृप्त कर देने वाला प्रकृति का ऐसा मनभावन सौन्दर्य मैंने तो नहीं देखा था, न कभी इससे पूर्व इस  अप्रतिम सौन्दर्य का अहसास हुआ था। यही वजह है कि वहाँ जाने का जब दूसरा मौका मिला तो अपने आप को रोक नहीं पाई थी। कहीं मन में यह बात भी थी कि यदि एक बार और आने का मौका मिलेगा तो फिर आऊँगी! लेकिन प्रकृति के कोप की जो लीला पिछले दिनों देखने को मिली है उसके बाद पता नहीं एक बार और उस सौंदर्य को निहारने का मौका मिलेगा भी या...।
वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड में आई यह विपदा थी तो पूर्णत: प्राकृतिक पर प्रकृति के इस कोप से जो जान- माल की हानि हुई है, वह पूरी तरह मानव निर्मित है। पिछले दो दशकों से वैश्विक स्तर पर किये गये अध्ययनों का भी यह निष्कर्ष रहा है कि 'ग्लोबल वार्मिंग' के कारण इस तरह की घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मोटर-गाडिय़ों के प्रदूषण तथा सड़कों व बाँधों के निर्माण से उत्पन्न धूल के कणों से भी ऐसी अतिवृष्टि की संभावना बढ़ती है। विकास के नाम पर पहाड़ और नदियों का जो दोहन मनुष्य ने किया है उसने प्रकृति के इस रूप को इतना विकराल बनाया है। (पढिय़े इसी अंक में डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया और शेखर पाठक्र के लेख)  ऐसा नहीं है कि ऐसी तबाही के प्रति कभी चेतावनी न दी गई हो। हमेशा से ही वैज्ञानिकों और प्रकृति को बचाने के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ी है। लेकिन हम ऐसी चेतावनियों को हमेशा ही अनसुना,अनदेखा और उपेक्षित  कर देते हैं। पूरे उत्तराखंड में धार्मिक आस्था और पर्यटन विकास के नाम पर कच्चे पहाड़ों पर जिस तादाद में होटलों का निर्माण हुआ है, पहाड़ों को काट कर पुल, सुरंगें सड़कें और बाँध बनाए गए हैं ,वे सब इस महाविनाश का कारण बने हैं। दरअसल हमारी सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को ही विकास का एकमात्र रास्ता मान लिया है। यह जानते हुए भी कि विकास का यह रास्ता विनाश की ओर ही ले जाएगा।  पहाड़ों को खोखला कर, उसकी हरियाली को ही नष्ट कर, नदियों की धाराओं को रोक कर हम कैसा और किसका विकास करना चाहते है?
प्रश्न ये उठता है कि क्या इस आपदा के बाद प्रकृति के प्रति हमारी सोच में बदलाव आएगा? इससे पहले कि फिर से वही गलतियाँ दोहराएँ कुछ कड़े निर्णय लेने होंगे; क्योंकि पर्यावरण की कीमत पर जब तक विकास कार्य होते रहेंगे ,ऐसे विनाश को हम स्वयं ही आमंत्रित करते रहेंगे। अत: अब समय आ गया है कि हमारे मौसम विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और पर्यावरण की चिंता करने वाले गंभीरता से आवाज उठाएँ और उत्तराखंड की इस आपदा को भविष्य की चेतावनी मानते हुए हमारी सरकारों को प्रकृति के दोहन से की जाने वाली विकास की परिभाषा को बदलने को बाध्य कर दें। विकास प्रकृति का दोहन करके नहीं बल्कि प्रकृति को बचाते हुए करना होगा। 
उपर्युक्त चिंतन के साथ इस समय सबसे पहली जरूरत- आपदा से प्रभावित लोगों की जिंदंगी को पुन: सामान्य स्तर पर लाने का प्रयास होना चाहिए। उनके रहने, खाने और स्वास्थ्य की चिंता के साथ सड़क, बिजली, पानी और रोजगार की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए सिर्फ सरकार को ही नहीं देश की पूरी जनता को अपने स्तर पर सहायता करनी होगी।इस त्रासदी के विनाश की भरपाई करने के लिए खोखली घोषणाओं की नहीं, क्षुद्र राजनीति की नहीं, वरन् ठोस स्तर पर नि:स्वार्थ कल्याणकारी प्रबन्धन की आवश्यकता है ।इतना ज़रूर ध्यान रहे कि कोई भी योजना सरकारी बन्दरबाँट की भेंट न चढ़ जाए। साथ ही इस बात को भी गाँठ बाँध लें कि प्रकृति हमें वही देती है ,जो हम उसको लौटाते हैं । प्रकृति को हम घाव देंगे तो वह भी प्रतिकार स्वरूप ऐसा ही करेगी।
                                                                                                          

प्राकृतिक आपदा

 और इसलिए बच गया केदारनाथ मंदिर
- डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया,  
   मानद प्रोफेसर
 जेएनसीएएसआर
 उत्तराखंड की त्रासद घटनाएँ मूलत: प्राकृतिक थीं. अतिवृष्टि, भूस्खलन और बाढ़ का होना प्राकृतिक है. लेकिन इनसे होने वाला जान-माल का नुकसान मानव-निर्मित हैं. अंधाधुंध निर्माण की अनुमति देने के लिए सरकार जि़म्मेदार है. वो अपनी आलोचना करने वाले विशेषज्ञों की बात नहीं सुनती. यहाँ तक कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की भी अच्छी-अच्छी राय पर सरकार अमल नहीं कर रही है. वैज्ञानिक नज़रिए से समझने की कोशिश करें तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस बार नदियाँ इतनी कुपित क्यों हुईं.
नदी घाटी काफी चौड़ी होती है. बाढग़्रस्त नदी के रास्ते को फ्लड वे (वाहिका) कहते हैं. यदि नदी में सौ साल में एक बार भी बाढ़ आई हो तो उसके उस मार्ग को भी फ्लड वे माना जाता है. इस रास्ते में कभी भी बाढ़ आ सकती है. लेकिन इस छूटी हुई ज़मीन पर निर्माण कर दिया जाए तो ख़तरा हमेशा बना रहता है.
नदियों का पथ
 केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी नदी के दो फ्लड वे हैं. कई दशकों से मंदाकिनी सिर्फ पूर्वी वाहिका में बह रही थी. लोगों को लगा कि अब मंदाकिनी बस एक धारा में बहती रहेगी. जब मंदाकिनी में बाढ़ आई तो वह अपनी पुराने पथ यानी पश्चिमी वाहिका में भी बढ़ी. जिससे उसके रास्ते में बनाए गए सभी निर्माण बह गए.
केदारनाथ मंदिर इस लिए बच गया ; क्योंकि यह मंदाकिनी के पूर्वी और पश्चिमी पथ के बीच की जगह में बहुत साल पहले ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई एक भारी चट्टान के आगे बना था.
नदी के फ्लड वे के बीच मलबे से बने स्थान को वेदिका या टैरेस कहते हैं. पहाड़ी ढाल से आने वाले नाले मलबा लाते हैं. हजारों साल से ये नाले ऐसा करते रहे हैं.
पुराने गाँव ढालों पर बने होते थे. पहले के किसान वेदिकाओं में घर नहीं बनाते थे. वे इस क्षेत्र पर सिर्फ खेती करते थे. लेकिन अब इस वेदिका क्षेत्र में नगर, गाँव, संस्थान, होटल इत्यादि बना दिए गए हैं.
यदि आप नदी के स्वाभाविक, प्राकृतिक पथ पर निर्माण करेंगे तो नदी के रास्ते में हुए इस अतिक्रमण को हटाने के लिए बाढ़ अपना काम करेगी ही. यदि हम नदी के फ्लड-वे के किनारे सड़कें बनाएँगे तो वे बहेंगी ही.
विनाशकारी मॉडल
मैं इस क्षेत्र में होने वाली सड़कों के नुकसान के बारे में भी बात करना चाहता हूँ. पर्यटकों के लिए, तीर्थ करने के लिए या फिर इन क्षेत्रों में पहुँचने के लिए सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है. ये सड़कें ऐसे क्षेत्र में बनाई जा रही हैं जहाँ दरारें होने के कारण भू-स्खलन होते रहते हैं.
इंजीनियरों को ऊपर की तरफ़ से चट्टानों को काटकर सड़कें बनानी थी . चट्टानें काटकर सड़कें बनाना आसान नहीं होता. यह काफी महँगा भी होता है. भू-स्खलन के मलबे को काटकर सड़कें बनाना आसान और सस्ता होता है. इसलिए तीर्थ स्थानों को जाने वाली सड़कें इन्हीं मलबों पर बनी हैं.
ये मलबे अंदर से पहले से ही कच्चे थे. ये राख, कंकड़-पत्थर, मिट्टी, बालू इत्यादि से बने होते हैं. ये अंदर से ठोस नहीं होते. काटने के कारण ये मलबे और ज्यादा अस्थिर हो गए हैं. इसके अलावा यह भी दुर्भाग्य की बात है कि इंजीनियरों ने इन सड़कों को बनाते समय बरसात के पानी की निकासी के लिए समुचित उपाय नहीं किया. उन्हें नालियों का जाल बिछाना था और जो नालियाँ पहले से बनी हुई हैं, उन्हें साफ रखना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता.
हिमालय अध्ययन के अपने पैंतालिस साल के अनुभव में मैंने आज तक भू-स्खलन के क्षेत्रों में नालियाँ बनते या पहले के अच्छे इंजीनियरों की बनाई नालियों की सफाई होते नहीं देखा है. नालियों के अभाव में बरसात का पानी धरती के अंदर जाकर मलबों को कमजोर करता है. मलबों के कमजोर होने से बार-बार भू-स्खलन होते रहते हैं.
इन क्षेत्रों में जल निकास के लिए रपट्टा (काज़ वे) या कलवर्ट (छोटे-छोटे छेद) बनाए जाते हैं. मलबे के कारण ये कलवर्ट बंद हो जाते हैं. नाले का पानी निकल नहीं पाता. इंजीनियरों को कलवर्ट की जगह पुल बनाने चाहिए, जिससे बरसात का पानी अपने मलबे के साथ स्वतत्रंता के साथ बह सके.
हिमालयी क्रोध
पर्यटकों के कारण दुर्गम इलाकों में होटल इत्यादि बना लिये गए हैं. ये सभी निर्माण समतल भूमि पर बने होते हैं ,  जो मलबों से बनी होती है. नाले से आए मलबे पर मकानों का गिरना तय था.
हिमालय और आल्प्स जैसे बड़े-बड़े पहाड़ भूगर्भीय हलचलों (टैक्टोनिक मूवमेंट) से बनते हैं. हिमालय एक अपेक्षाकृत नया पहाड़ है और अभी भी उसकी ऊँचाई बढऩे की प्रक्रिया में है.
हिमालय अपने वर्तमान वृहद् स्वरूप में करीब दो करोड़ वर्ष पहले बना है. भू-विज्ञान की दृष्टि से किसी पहाड़ के बनने के लिए यह समय बहुत कम है. हिमालय अब भी उभर रहा है, उठ रहा है यानी अब भी वो हरकतें जारी हैं , जिनके कारण हिमालय का जन्म हुआ था.
हिमालय के इस क्षेत्र को ग्रेट हिमालयन रेंज या वृहद् हिमालय कहते हैं. संस्कृत में इसे हिमाद्रि कहते हैं यानी सदा हिमाच्छादित रहने वाली पर्वत श्रेणियाँ. इस क्षेत्र में हजारों-लाखों सालों से ऐसी घटनाएँ हो रही हैं. प्राकृतिक आपदाएँ कम या अधिक परिमाण में इस क्षेत्र में आती ही रही हैं.
केदारनाथ, चौखम्बा या बद्रीनाथ, त्रिशूल, नन्दादेवी, पंचचूली इत्यादि श्रेणियाँ इसी वृहद् हिमालय की श्रेणियाँ हैं. इन श्रेणियों के निचले भाग में, करीब-करीब तलहटी में कई लम्बी-लम्बी झुकी हुई दरारें हैं. जिन दरारों का झुकाव 45 डिग्री से कम होता है उन्हें झुकी हुई दरार कहा जाता है.
कमज़ोर चट्टानें
वैज्ञानिक इन दरारों को थ्रस्ट कहते हैं. इनमें से सबसे मुख्य दरार को भू-वैज्ञानिक मेन सेंट्रल थ्रस्ट कहते हैं. इन श्रेणियों की तलहटी में इन दरारों के समानांतर और उससे जुड़ी हुई ढेर सारी थ्रस्ट हैं.
इन दरारों में पहले भी कई बार बड़े पैमाने पर हरकतें हुईं थी. धरती सरकी थी, खिसकी थी, फिसली थीं, आगे बढ़ी थी, विस्थापित हुई थी. परिणामस्वरूप इस पट्टी की सारी चट्टानें कटी-फटी, टूटी-फूटी, जीर्ण-शीर्ण, चूर्ण-विचूर्ण हो गईं हैं. दूसरों शब्दों में कहें तो ये चट्टानें बेहद कमजोर हो गई हैं.
इसीलिए बारिश के छोटे-छोटे वार से भी ये चट्टाने टूटने लगती हैं, बहने लगती हैं. और यदि भारी बारिश हो जाए तो बरसात का पानी उसका बहुत सा हिस्सा बहा ले जाता है. कभी-कभी तो यह चट्टानों के आधार को ही बहा ले जाता है.
भारी जल बहाव में इन चट्टानों का बहुत बड़ा अंश धरती के भीतर समा जाता है और धरती के भीतर जाकर भीतरघात करता है. धरती को अंदर से नुकसान पहुँचाता है.
इसके अलावा इन दरारों के हलचल का एक और खास कारण है. भारतीय प्रायद्वीप उत्तर की ओर साढ़े पाँच सेंटीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से सरक रहा है यानी हिमालय को दबा रहा है. धरती द्वारा दबाए जाने पर हिमालय की दरारों और भ्रंशों में हरकतें होना स्वाभाविक है. (बी.बी.सी. से साभार)

आपदा प्रबंधन

कबाड़ से जुगाड़ की गूँज- 

एक सार्थक प्रयास
 - भारत डोगरा

कई बार पुरानी, बेकार पड़ी चीज़ों को सुधार-संवारकर उनसे उपयोगी वस्तुएँ बनाने का 'कबाड़ से जुगाड़का प्रयास किया जाता है। जो अपने में एक सार्थक प्रयास है। पर हाल के वर्षों में गूँज नामक संस्था ने इससे एक कदम आगे बढ़कर एक नया प्रयोग किया है जिसके अंतर्गत पुरानी, बेकार जा रही वस्तुओं को न केवल सुधारा-संवारा जाता है अपितु उन्हें दूर-दूर के गाँवों में व आपदा पीडि़त क्षेत्रों में ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाता है। इससे विकास कार्यों का नया सिलसिला शुरू हो सका है।
उदाहरण के लिए, किसी ग्रामीण बस्ती को एक कुएँ या तालाब की आवश्यकता है। तो इसके लिए गाँववासी कार्य करते हैं व उन्हें मज़दूरी नकद पैसे के रूप में न देकर उनकी ज़रूरत की विभिन्न वस्तुओं, विशेषकर कपड़ों, के रूप में दी जाती है। इस तरह गाँवों के ज़रूरी विकास कार्य भी हो जाते हैं और ज़रूरत के अनुसार कपड़े या अन्य उत्पाद भी निर्धन या आपदाग्रस्त ज़रूरतमंद परिवारों तक पहुँचते हैं।
इस कार्य का सिलसिला दिल्ली जैसे अनेक बड़े शहरों की विभिन्न कॉलोनियों से आरंभ होता है जहाँ गूँज संस्था के वालंटियर विभिन्न परिवारों से पुराने कपड़े व अन्य उपयोगी वस्तुएँ, जैसे जूते, खिलौने, किताब-कॉपियाँ, एक साइड लिखे हुए कागज़, स्कूल बैग्स आदि एकत्र करते हैं। इनमें सबसे अधिक मात्रा तरह-तरह के कपड़ों की होती है। नए कपड़ों व अन्य उत्पादों का भी स्वागत होता है, पर प्राय: पुराने कपड़े व अन्य उत्पाद ही मिलते हैं। विभिन्न परिवार स्वयं अपने प्रयास से भी इन उत्पादों को गूँज के कार्यालयों में या उसके वालंटियरों के निवास स्थानों पर पहुँचा जाते हैं।
इन विभिन्न संग्रहण स्थानों से ये कपड़े व अन्य उत्पाद शहर के एक केंद्रीय प्रोसेसिंग केंद्र में पहुंचाए जाते हैं जहाँ विभिन्न कपड़ों की अच्छी तरह सफाई-धुलाई की जाती है व ज़रूरी होने पर मरम्मत भी की जाती है। इस तरह कपड़े ऐसी स्थिति में आ जाते हैं कि उन्हें सम्मानपूर्वक किसी ज़रूरतमंद परिवार को दिया जा सकता है।
अब अगला कदम है इन कपड़ों के वर्गीकरण का। विभिन्न बोरियों में स्त्री-पुरुष या बच्चों के कपड़े भरे जाते हैं। इन कपड़ों का आगे अलग से भी वर्गीकरण होता है। जैसे एक बोरी में साड़ियाँ है, तो दूसरी बोरी में सलवार-कमीज़ हैं, तीसरी बोरी में गाउन हैं तो चौथी में ऊनी वस्त्र हैं। इस तरह के वर्गीकरण का एक लाभ यह होता है कि विभिन्न स्थानों पर वहाँ के प्रचलित पहनावे के अनुसार वस्त्र भेजे जा सकते हैं।
हालाँकि इस प्रयास के बाद भी कई समस्याएँ बनी रहती हैं क्योंकि शहर और गाँव में, धनी व निर्धन परिवारों में पहनावे को लेकर काफी सांस्कृतिक विविधताएँ तो हैं ही। अत: आगे चलकर जिन स्थानों पर इन कपड़ों का वितरण होता है वहाँ पर बहुत समझ बूझ वाले सहयोगी चाहिए। गूँज ने ऐसे अनेक सहयोगियों व सहयोगी संस्थाओं को खोज भी निकाला है। समय के साथ अनेक नए सहयोगी भी जुड़ते जा रहे हैं।
ये सहयोगी एक ओर तो गूँज को पहले ही बता देते हैं कि उनके यहाँ किस तरह के वस्त्रों या अन्य उत्पादों की आवश्यकता है ताकि कोई बर्बादी न हो। इसके बावजूद भी कोई गलती हो जाए तो ये सहयोगी अपने स्तर पर इस भूल-चूक को ठीक करने का प्रयास करते हैं ताकि क्षेत्र के लिए अनुकूल सामग्री का ही वितरण हो। इन सहयोगियों की इससे भी बड़ी भूमिका यह है कि वितरण का कार्य गरिमामय परिस्थितियों में हो। गूँज की वरिष्ठ सदस्य मीनाक्षी बताती हैं कि ज़रूरतमंद लोगों की गरिमा इस पूरे प्रयास में बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस उद्देश्य को प्राप्त करने के साथ विकास कार्यों का सिलसिला आरंभ करने के लिए ही गूँज ने 'कार्य के बदले वस्त्रकी योजना बनाई। विकास कार्य विभिन्न स्थानों की परिस्थितियों को देखते हुए ही किए जाते हैं। किसी आपदाग्रस्त क्षेत्र में परिस्थितियाँ इसके अनुकूल नहीं है तो इसे छोड़ा भी जा सकता है, पर प्रयास यही होता है कि कोई वास्तव में उपयोगी विकास कार्य किया जाए। इस तरह कुछ गाँवों में छोटे पुल बने हैं तो कुछ गाँवों में कुएँ बने हैं, कुछ में जल संरक्षण कार्य हुए हैं। सबसे अधिक कार्य जल व सफाई से सम्बंधित रहे हैं।
यह प्रयास उन ज़रूरतमंद स्थानों पर विशेष तौर पर सार्थक रहा है जहाँ लोग विभिन्न आपदाओं से प्रभावित हुए थे। विशेषकर बाढ़ जैसी आपदा से जब अनेक परिवारों के कपड़े व अन्य ज़रूरी साज़ो-सामान भी बह गया हो, तो उनके लिए अचानक ट्रक भरकर कपड़ों का पहुँचना बहुत राहत देता है। चाहे बिहार में कोसी की बाढ़ या असम में हिंसा व आपदा से प्रभावित परिवार हों, चाहे गुजरात में भूकंप प्रभावित परिवार हों या तमिलनाडु में समुद्री चक्रवात प्रभावित लोग हों, गूँज द्वारा एकत्र की गई सहायता सामग्री उन तक पहुँचती रही है। (गूँज इस समय उत्तराखंड में आई आपदा से प्रभावितों की सहयाता के लिए प्रयासरत है)
तमिलनाडु में तो एक समय ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि राहत पहुँचाने वाले अधिकारियों के पास देश के विभिन्न स्थानों से कपड़ों के बड़े भंडार पहुँच गए थे जिनका वर्गीकरण कर उन्हें बाँटना इन अधिकारियों को असँभव लग रहा था। एक समस्या यह थी कि इनमें से बहुत से वस्त्र स्थानीय ज़रूरतों के अनुकूल नहीं थे। यहाँ तक कि गर्म मौसम के अभ्यस्त लोगों के लिए कुछ लोगों ने मंकी कैप तक भेज दिए थे। इस स्थिति में गूँज ने अपने इस अनुभव के आधार पर इस राहत सामग्री के वर्गीकरण की चुनौती को स्वीकार किया ताकि अनुपयोगी वस्त्रों को अलग कर उपयोगी वस्त्रों का भलीभांति वितरण हो सके।  गूँज के संस्थापक अंशु गुप्ता का मानना है कि बहुत से निर्धन परिवारों के लिए प्रति वर्ष कुछ सप्ताहों के लिए पडऩे वाली कड़ाके की ठंड भी एक आपदा जैसी ही है, तब हमें उन तक गर्म कपड़े, रज़ाई, कंबल आदि पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए।
ऐसे ही उत्तर प्रदेश में स्थित बांदा जि़ले के एक गाँव गुडहा जाने पर लेखक द्वारा गाँववासियों से बातचीत करने पर पता चला कि वे उपलब्ध हुए वस्त्रों से काफी संतुष्ट थे व उन्होंने कहा कि उनके परिवारों को वास्तव में इन कपड़ों की ज़रूरत थी। इसके साथ जुड़ा विकास कार्यों का श्रमदान भी उन्होंने प्रसन्नता से किया। यह सब कार्य व वस्त्रों का वितरण अच्छे माहौल व गरिमामय परिस्थितियों में हो सका, इसका काफी श्रेय यहाँ गूँज की पार्टनर संस्था विद्याधाम समिति को भी जाता है।
इस गाँव में स्कूल को गूँज से खिलौनों व खेल सामग्री के उपहार भी प्राप्त हुए हैं। शहरों में प्राय: बच्चे हर वर्ष नए स्कूल बैग्स, पानी की बोतलें, यूनिफॉर्म आदि खरीदते ही हैं। दूसरी ओर देश के सबसे निर्धन इलाकों में प्राय: बच्चों को स्कूल बैग्स, पानी की बोतलें आदि के अतिरिक्त नोट बुक, रजिस्टर, पैन, पेंसिल आदि की ज़रूरत रहती ही है। अत: गूँज ने एक प्रयास आरंभ किया है कि शहरी बच्चों से ग्रामीण निर्धन बच्चे समय-समय पर मिलें। शहरी बच्चों को गाँवों के स्कूलों की स्थिति के बारे में पता चले व वे वहाँ के लिए तरह-तरह की सामग्री भेजने के लिए प्रेरित महसूस करें।
इसका एक कारण यह है कि एक समय में कुछ ज़रूरी वस्तुएँ तो कुछ स्कूलों के माध्यम से मिल जाती थी, पर प्रति वर्ष इस प्रयास को निरंतरता से चलाने से अभी बहुत स्कूल सहमत नहीं हुए हैं। यदि निरंतरता का एक सिलसिला बन जाए तो बहुत-सी ज़रूरी सामग्री ज़रूरतमंद स्कूली बच्चों के लिए भेजी जा सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ गूँज की सहयोगी संस्थाएँ इस सामग्री का उचित वितरण करने के लिए तैयार हैं।
गूँज की रचनात्मकता कुछ अन्य तरह से भी सामने आई है। विभिन्न संग्रहण स्थानों में उसके पास जो वस्त्र आते हैं, उनका अधिकतम उपयोग तो उन्हें ज़रूरतमंद स्थानों तक पहुँचाने में किया जाता है। पर इसके बाद भी कुछ अन्य वस्त्र बच जाते हैं या जो थोड़े बहुत फटे होते हैं व उनका वितरण नहीं हो सकता है, इन्हें भी फेंका नहीं जाता है अपितु इन्हें भलीभाँति धोने-सुखाने के बाद इनके छोटे-छोटे टुकड़ों व कतरनों का भी उचित उपयोग करने का भरसक प्रयास किया जाता है। इनसे मोबाइल फोन रखने के कवर, पर्स, थैले आदि बनाए जाते हैं। विभिन्न प्रदर्शनियों में इनकी बिक्री होती है और इनसे प्राप्त आय गूँज के कार्य को और आगे बढ़ाती है।
इसके अतिरिक्त भलीभाँति साफ किए गए इन कपड़ों से सेनिटरी नैपकिन्स बनाए जाते हैं। मेन्स्टयअल हाईजीन की कमी को दूर करने के लिए बहुत सस्ती कीमत पर बने सेनिटरी नैपकिन्स ज़रूरी माने गए हैं तथा इस कमी को दूर करने में गूँज का यह योगदान है। गूँज द्वारा एक महीने में लगभग 2 लाख सेनिटरी नैपकिन्स का उत्पादन किया जाता है। गूँज ने इस कार्य पर अधिक ज़ोर देना तब आरंभ किया जब उसे अपने अनुसंधान कार्य के दौरान पता चला कि सेनिटरी नैपकिन के अभाव में कई गंभीर संक्रमण हो जाते हैं और इन समस्याओं का इलाज तो दूर, इनके बारे में प्राय: चर्चा तक नहीं होती है।
इसके अतिरिक्त गूँज को जो रद्दी अखबार और एक तरफ लिखे हुए कागज़ प्राप्त होते हैं उनसे लिफाफे व रजिस्टर बनाए जाते हैं।
कपड़ों के वर्गीकरण, मरम्मत, सफाई-धुलाई, इनसे अनेक उपयोगी वस्तुएँ बनाने के कार्य में महिलाओं को अधिक रोज़गार मिला है। और उन्होंने प्राय: बहुत कुशलता से इन जि़म्मेदारियों को सँभाला है।
गूँज के कार्य का एक अन्य विशेष महत्त्व यह है कि इसने कपड़ों के महत्त्व को विकास की चर्चा में स्थापित किया है। रोटी, कपड़ा, मकान को प्राय: तीन सबसे बुनियादी आवश्यकताओं के रूप में स्वीकार किया गया है, पर व्यावहारिक स्तर पर इनमें से अधिक महत्त्व खाद्य और आवास को ही दिया गया है। खाद्य सुरक्षा की चर्चा तो होती है, बेघरों को आवास उपलब्ध करवाने के लक्ष्य भी निर्धारित किए जाते हैं। पर कपड़े जैसी बुनियादी आवश्यकता के बारे में तो चर्चा तक नहीं होती है।
गूँज के संस्थापक-समन्वयक अंशु गुप्ता और उनकी पत्नी ने यह प्रयास लगभग 15 वर्ष पहले बहुत छोटे स्तर पर आरँभ किया था, उस समय उन्हें दूसरी स्थापित दाता संस्थाओं से सहायता नहीं मिल पाई थी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी व छोटे स्तर पर लोगों से सहायता प्राप्त कर अपना प्रयास जारी रखा। आसपास की कॉलोनियों में जाकर उन्होंने स्वयं भी वस्त्र एकत्र किए।
धीरे-धीरे 'गूँजकी गूँज फैलने लगी और विशेषकर बड़ी आपदाओं के समय लोग स्वयं कपड़े या अन्य सामान लेकर पहुंचने लगे। कुछ आर्थिक सहायता भी मिलने लगी। एक वर्ष में अब वे 1000 टन वस्त्र व अन्य सामान दूर-दूर के गाँवों में पहुँचाने में समर्थ हैं। इस आधार पर पिछले 2 वर्ष के ही आँकड़े देखें तो इस दौरान लगभग 600 विकास कार्य सम्पन्न हुए। बिहार में बाढ़ के समय गूँज ने 1500 टन सामान लगभग 200 गाँवों में पहुँचाया था।
इस प्रगति के बीच गूँज और अंशु गुप्ता को अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। अंशु गुप्ता कहते हैं कि जिन वस्तुओं का कोई मूल्य नहीं लगाया जाता था और जिनसे शहरी कूड़ा घरों का बोझ ही बढ़ता था, उन्हें सुधार कर न केवल लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना अपितु विकास कार्यों का एक सिलसिला आरँभ करना ही हमारी मुख्य सार्थकता रही है। हमने अपने विचारों और कार्य को कभी 'कॉपीराईटकी नज़र से नहीं देखा है। हमारे विचारों व कार्य से सीखकर या प्रेरणा लेकर जो भी ऐसा कार्य करना चाहे उसका स्वागत है। ऐसे प्रयासों की सहायता कर हमें प्रसन्नता होगी।
गूँज की उपलब्धियाँ महत्त्वपूर्ण हैं तो आगे की चुनौतियाँ भी कुछ कम नहीं हैं। 'गूँजकी सफलता में उसके वालंटियरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनका उत्साह बना रहे और निष्ठा बनी रहे, यह गूँज की सफलता के लिए आगे भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगा।
इसके अतिरिक्त देश के दूर-दूर के क्षेत्रों में निष्ठावान व सूझबूझ से इन कठिन जि़म्मेदारियों को सँभालने वाले सहयोगियों व पार्टनर सँस्थाओं की भी गूँज को बहुत ज़रूरत है। ऐसे सहयोगियों को जोडऩे के लिए गूँज प्रयासरत रही है, कई गोष्ठियों व सभाओं का आयोजन भी किया है। उचित सहयोगियों का साथ भी गूँज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहेगा।
गूँज के प्रयासों का एक बहुत महत्त्वपूर्ण सबक यह है कि बेकार मानी जाने वाली वस्तुओं के भी कितनी तरह के उपयोग हो सकते हैं और उनसे आगे विकास कार्यों की एक कड़ी भी आरंभ हो सकती है। यह सच है कि इस सँभावना को व्यवहारिक रूप देने में कई कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं व इसमें कई उलझनें भी सामने आती हैं, कुछ दुविधाएँ भी उभरती हैं। पर कुल मिलाकर यह बेहद रचनात्मक सँभावनाओं वाला कार्य है जिसमें बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साथ पर्यावरण की रक्षा का उद्देश्य भी जुड़ जाता है। (स्रोत फीचर्स)              

प्राकृतिक आपदा

नदियाँ दिखा रहीं हैं अपना रौद्र रूप 
- शेखर पाठक्र
 केदारनाथ मंदिर के पट खुलने के दिन मैं वहीं मौजूद था. आज के केदारनाथ को देखकर मेरे मन में पहले वो तस्वीर कौंधी जो 1882 में भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के निदेशक द्वारा खींची गई थी.
इस तस्वीर में सुंदर प्रकृति से घिरा सिर्फ़ मंदिर दिखता है.
उस तस्वीर की तुलना मैंने आज के केदारनाथ से की जहाँ मंदिर के चारों ओर अतिक्रमण करके मकान बना दिए गए हैं जिसने मंदिर परिसर को भद्दा बना दिया है.
मैंने सोचा कि काश इस निर्माण को नियमबद्ध तरीक़े से हर्जाना देकर यहाँ से हटा दिया जाता और मंदिर अपनी पुरानी स्थिति में आ जाता.
कुछ ही दिनो बाद प्रकृति ने केदारनाथ में इंसानी घुसपैठ को अपने तरीक़े से नेस्तनाबूद कर दिया है, लेकिन हमारे पूर्वजों की ओर से बनाए गए स्थापत्य का बेहतरीन नमूना बचा रह गया है.
प्रकृति का विकराल रुप
हिमालय पुराने ज़माने में भी टूटता, बनता और बिखरता रहा है. मानवीय आबादी के अत्यधिक विस्तार और दख़ल के पहले हिमालय के विस्तृत क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने, भूस्ख़लन और भूकंप की घटनाएँ होती रही हैं.
सरकारें अच्छी-बुरी आती रहती हैं, लेकिन उनके बदलाव का हिमालय के स्वभाव पर कोई असर नहीं पड़ा.
बीसवीं शताब्दी में पहली बार मनुष्य के कार्यकलाप ने प्रकृति के बनने और बिगडऩे की प्रक्रिया को त्वरित किया है और पिछले पच्चीस सालों में उसमें तेज़ी आई है. जबसे हमने विकास के आठ प्रतिशत और नौ प्रतिशत वाले विकास वाले मॉडल को अपनाया है, प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप और बढ़ गया है.
मेरी पचास वर्ष की स्मृति में (अगर पूर्वजों की पचास साल की स्मृति को जोड़ें तो पिछले सौ सालों में) पहले कभी जून महीने के पहले पंद्रह दिनों में इतनी भारी विपदा और प्रकृति के इतने विकराल स्वरूप की याद नहीं है.
उत्तराखंड की नाजु़क स्थिति
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हमने यहाँ की नदियों को खोदने, बाँधने, बिगाडऩे और कुरूप करने का जिम्मा सा ले लिया है. ऐसा लगता है जैसे विकास और जनतंत्र की परिभाषा यही हो.
पिछले दो-तीन दशकों में और राज्य बनने के बाद पहले दशक में विशेष रूप से जिस तरीके से हमने पहाड़ों को बाँध, सड़क, खनन, विकास के नाम पर छेड़ा है, उसने प्रकृति के स्वाभाविक अभिव्यक्ति को एकदम त्वरित किया है और उसको सैकड़ों गुना बढ़ा दिया है. प्रकृति के इस कोप के आगे मनुष्य, सरकार और तमाम लोग असहाय, लाचार और पराजित हैं.
बारह साल पहले उत्तराखंड में असाधारण रूप से सड़कें बनाने, खनन, रेता-बजरी खोदने का, विद्युत परियोजनाओं आदि का काम इतना तेजी और अनियंत्रित तरीके से हुआ है कि नदियों ने विकराल रूप ले लिया है. इसके कारण मनुष्य, मनुष्य के विकास कार्य और उसके खेत सब धरे के धरे रह जाते हैं.
उत्तराखंड के इन इलाकों में 1991 और 1998 में भूकंप भी आए थे’; लेकिन इतनी भारी तबाही नहीं देखी. इस तबाही को मैंने अपनी आँखों से बढ़ते हुए देखा है.
विकास के मॉडल को चुनौती
भागीरथी, धौली, पिंडर, मंदाकिनी, विष्णुगंगा आदि अलकनंदा की सभी सहयोगी नदियों ने अपना विकराल रूप दिखाया है. उन्होंने विकास के उस प्रारूप को चुनौती दी है , जिसके ज़रिए नदियों को बाँधा जा रहा है, बिजली पैदा करने के लिए पहाड़ों को खोदकर सुरंगें बनाई जा रही हैं.
समाज बार-बार सरकार बहादुरों की तरफ़ उम्मीद से देखता ; लेकिन पिछले बरसों में आई सरकारों में कहीं भी अपनी प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि नहीं है. समाज के लोगों ने भी बहुत सारी जगहों पर नदियों में घुसपैठ की है, होटल बनाए हैं ताकि अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकें. एक समाज के रूप में हम भी शत-प्रतिशत ईमानदार नहीं रहे हैं.
अब नदियाँ कह रही हैं कि तुम्हारी सरकारों, तुम्हारे योजना आयोग और तुम्हारे दलालों और ठेकेदारों से हम अब भी ज़्यादा ताक़तवर हैं. (बी.बी.सी. से साभार)

प्रेरक

अद्भुत पात्र  
 प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था।
एक दिन नियत समय से पहले ही एक संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर द्वार पर आ खड़ा हुआ। उसने राजा से कहा-  'राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में भी कुछ भी डाल दें.
याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह उसे कुछ भी नहीं कह सकता था। उसने अपने सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के सिक्कों से भर दिया जाय।
जैसे ही उस पात्र में सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब हो गए। ऐसा बार-बार हुआ। शाम तक राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह पात्र रिक्त ही रहा।
अंतत: राजा ही याचक स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से पूछा- मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता. अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएँ. यह कभी
भरता क्यों नहीं?

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