July 18, 2013

आपदा प्रबंधन

कबाड़ से जुगाड़ की गूँज- 

एक सार्थक प्रयास
 - भारत डोगरा

कई बार पुरानी, बेकार पड़ी चीज़ों को सुधार-संवारकर उनसे उपयोगी वस्तुएँ बनाने का 'कबाड़ से जुगाड़का प्रयास किया जाता है। जो अपने में एक सार्थक प्रयास है। पर हाल के वर्षों में गूँज नामक संस्था ने इससे एक कदम आगे बढ़कर एक नया प्रयोग किया है जिसके अंतर्गत पुरानी, बेकार जा रही वस्तुओं को न केवल सुधारा-संवारा जाता है अपितु उन्हें दूर-दूर के गाँवों में व आपदा पीडि़त क्षेत्रों में ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाता है। इससे विकास कार्यों का नया सिलसिला शुरू हो सका है।
उदाहरण के लिए, किसी ग्रामीण बस्ती को एक कुएँ या तालाब की आवश्यकता है। तो इसके लिए गाँववासी कार्य करते हैं व उन्हें मज़दूरी नकद पैसे के रूप में न देकर उनकी ज़रूरत की विभिन्न वस्तुओं, विशेषकर कपड़ों, के रूप में दी जाती है। इस तरह गाँवों के ज़रूरी विकास कार्य भी हो जाते हैं और ज़रूरत के अनुसार कपड़े या अन्य उत्पाद भी निर्धन या आपदाग्रस्त ज़रूरतमंद परिवारों तक पहुँचते हैं।
इस कार्य का सिलसिला दिल्ली जैसे अनेक बड़े शहरों की विभिन्न कॉलोनियों से आरंभ होता है जहाँ गूँज संस्था के वालंटियर विभिन्न परिवारों से पुराने कपड़े व अन्य उपयोगी वस्तुएँ, जैसे जूते, खिलौने, किताब-कॉपियाँ, एक साइड लिखे हुए कागज़, स्कूल बैग्स आदि एकत्र करते हैं। इनमें सबसे अधिक मात्रा तरह-तरह के कपड़ों की होती है। नए कपड़ों व अन्य उत्पादों का भी स्वागत होता है, पर प्राय: पुराने कपड़े व अन्य उत्पाद ही मिलते हैं। विभिन्न परिवार स्वयं अपने प्रयास से भी इन उत्पादों को गूँज के कार्यालयों में या उसके वालंटियरों के निवास स्थानों पर पहुँचा जाते हैं।
इन विभिन्न संग्रहण स्थानों से ये कपड़े व अन्य उत्पाद शहर के एक केंद्रीय प्रोसेसिंग केंद्र में पहुंचाए जाते हैं जहाँ विभिन्न कपड़ों की अच्छी तरह सफाई-धुलाई की जाती है व ज़रूरी होने पर मरम्मत भी की जाती है। इस तरह कपड़े ऐसी स्थिति में आ जाते हैं कि उन्हें सम्मानपूर्वक किसी ज़रूरतमंद परिवार को दिया जा सकता है।
अब अगला कदम है इन कपड़ों के वर्गीकरण का। विभिन्न बोरियों में स्त्री-पुरुष या बच्चों के कपड़े भरे जाते हैं। इन कपड़ों का आगे अलग से भी वर्गीकरण होता है। जैसे एक बोरी में साड़ियाँ है, तो दूसरी बोरी में सलवार-कमीज़ हैं, तीसरी बोरी में गाउन हैं तो चौथी में ऊनी वस्त्र हैं। इस तरह के वर्गीकरण का एक लाभ यह होता है कि विभिन्न स्थानों पर वहाँ के प्रचलित पहनावे के अनुसार वस्त्र भेजे जा सकते हैं।
हालाँकि इस प्रयास के बाद भी कई समस्याएँ बनी रहती हैं क्योंकि शहर और गाँव में, धनी व निर्धन परिवारों में पहनावे को लेकर काफी सांस्कृतिक विविधताएँ तो हैं ही। अत: आगे चलकर जिन स्थानों पर इन कपड़ों का वितरण होता है वहाँ पर बहुत समझ बूझ वाले सहयोगी चाहिए। गूँज ने ऐसे अनेक सहयोगियों व सहयोगी संस्थाओं को खोज भी निकाला है। समय के साथ अनेक नए सहयोगी भी जुड़ते जा रहे हैं।
ये सहयोगी एक ओर तो गूँज को पहले ही बता देते हैं कि उनके यहाँ किस तरह के वस्त्रों या अन्य उत्पादों की आवश्यकता है ताकि कोई बर्बादी न हो। इसके बावजूद भी कोई गलती हो जाए तो ये सहयोगी अपने स्तर पर इस भूल-चूक को ठीक करने का प्रयास करते हैं ताकि क्षेत्र के लिए अनुकूल सामग्री का ही वितरण हो। इन सहयोगियों की इससे भी बड़ी भूमिका यह है कि वितरण का कार्य गरिमामय परिस्थितियों में हो। गूँज की वरिष्ठ सदस्य मीनाक्षी बताती हैं कि ज़रूरतमंद लोगों की गरिमा इस पूरे प्रयास में बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस उद्देश्य को प्राप्त करने के साथ विकास कार्यों का सिलसिला आरंभ करने के लिए ही गूँज ने 'कार्य के बदले वस्त्रकी योजना बनाई। विकास कार्य विभिन्न स्थानों की परिस्थितियों को देखते हुए ही किए जाते हैं। किसी आपदाग्रस्त क्षेत्र में परिस्थितियाँ इसके अनुकूल नहीं है तो इसे छोड़ा भी जा सकता है, पर प्रयास यही होता है कि कोई वास्तव में उपयोगी विकास कार्य किया जाए। इस तरह कुछ गाँवों में छोटे पुल बने हैं तो कुछ गाँवों में कुएँ बने हैं, कुछ में जल संरक्षण कार्य हुए हैं। सबसे अधिक कार्य जल व सफाई से सम्बंधित रहे हैं।
यह प्रयास उन ज़रूरतमंद स्थानों पर विशेष तौर पर सार्थक रहा है जहाँ लोग विभिन्न आपदाओं से प्रभावित हुए थे। विशेषकर बाढ़ जैसी आपदा से जब अनेक परिवारों के कपड़े व अन्य ज़रूरी साज़ो-सामान भी बह गया हो, तो उनके लिए अचानक ट्रक भरकर कपड़ों का पहुँचना बहुत राहत देता है। चाहे बिहार में कोसी की बाढ़ या असम में हिंसा व आपदा से प्रभावित परिवार हों, चाहे गुजरात में भूकंप प्रभावित परिवार हों या तमिलनाडु में समुद्री चक्रवात प्रभावित लोग हों, गूँज द्वारा एकत्र की गई सहायता सामग्री उन तक पहुँचती रही है। (गूँज इस समय उत्तराखंड में आई आपदा से प्रभावितों की सहयाता के लिए प्रयासरत है)
तमिलनाडु में तो एक समय ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि राहत पहुँचाने वाले अधिकारियों के पास देश के विभिन्न स्थानों से कपड़ों के बड़े भंडार पहुँच गए थे जिनका वर्गीकरण कर उन्हें बाँटना इन अधिकारियों को असँभव लग रहा था। एक समस्या यह थी कि इनमें से बहुत से वस्त्र स्थानीय ज़रूरतों के अनुकूल नहीं थे। यहाँ तक कि गर्म मौसम के अभ्यस्त लोगों के लिए कुछ लोगों ने मंकी कैप तक भेज दिए थे। इस स्थिति में गूँज ने अपने इस अनुभव के आधार पर इस राहत सामग्री के वर्गीकरण की चुनौती को स्वीकार किया ताकि अनुपयोगी वस्त्रों को अलग कर उपयोगी वस्त्रों का भलीभांति वितरण हो सके।  गूँज के संस्थापक अंशु गुप्ता का मानना है कि बहुत से निर्धन परिवारों के लिए प्रति वर्ष कुछ सप्ताहों के लिए पडऩे वाली कड़ाके की ठंड भी एक आपदा जैसी ही है, तब हमें उन तक गर्म कपड़े, रज़ाई, कंबल आदि पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए।
ऐसे ही उत्तर प्रदेश में स्थित बांदा जि़ले के एक गाँव गुडहा जाने पर लेखक द्वारा गाँववासियों से बातचीत करने पर पता चला कि वे उपलब्ध हुए वस्त्रों से काफी संतुष्ट थे व उन्होंने कहा कि उनके परिवारों को वास्तव में इन कपड़ों की ज़रूरत थी। इसके साथ जुड़ा विकास कार्यों का श्रमदान भी उन्होंने प्रसन्नता से किया। यह सब कार्य व वस्त्रों का वितरण अच्छे माहौल व गरिमामय परिस्थितियों में हो सका, इसका काफी श्रेय यहाँ गूँज की पार्टनर संस्था विद्याधाम समिति को भी जाता है।
इस गाँव में स्कूल को गूँज से खिलौनों व खेल सामग्री के उपहार भी प्राप्त हुए हैं। शहरों में प्राय: बच्चे हर वर्ष नए स्कूल बैग्स, पानी की बोतलें, यूनिफॉर्म आदि खरीदते ही हैं। दूसरी ओर देश के सबसे निर्धन इलाकों में प्राय: बच्चों को स्कूल बैग्स, पानी की बोतलें आदि के अतिरिक्त नोट बुक, रजिस्टर, पैन, पेंसिल आदि की ज़रूरत रहती ही है। अत: गूँज ने एक प्रयास आरंभ किया है कि शहरी बच्चों से ग्रामीण निर्धन बच्चे समय-समय पर मिलें। शहरी बच्चों को गाँवों के स्कूलों की स्थिति के बारे में पता चले व वे वहाँ के लिए तरह-तरह की सामग्री भेजने के लिए प्रेरित महसूस करें।
इसका एक कारण यह है कि एक समय में कुछ ज़रूरी वस्तुएँ तो कुछ स्कूलों के माध्यम से मिल जाती थी, पर प्रति वर्ष इस प्रयास को निरंतरता से चलाने से अभी बहुत स्कूल सहमत नहीं हुए हैं। यदि निरंतरता का एक सिलसिला बन जाए तो बहुत-सी ज़रूरी सामग्री ज़रूरतमंद स्कूली बच्चों के लिए भेजी जा सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ गूँज की सहयोगी संस्थाएँ इस सामग्री का उचित वितरण करने के लिए तैयार हैं।
गूँज की रचनात्मकता कुछ अन्य तरह से भी सामने आई है। विभिन्न संग्रहण स्थानों में उसके पास जो वस्त्र आते हैं, उनका अधिकतम उपयोग तो उन्हें ज़रूरतमंद स्थानों तक पहुँचाने में किया जाता है। पर इसके बाद भी कुछ अन्य वस्त्र बच जाते हैं या जो थोड़े बहुत फटे होते हैं व उनका वितरण नहीं हो सकता है, इन्हें भी फेंका नहीं जाता है अपितु इन्हें भलीभाँति धोने-सुखाने के बाद इनके छोटे-छोटे टुकड़ों व कतरनों का भी उचित उपयोग करने का भरसक प्रयास किया जाता है। इनसे मोबाइल फोन रखने के कवर, पर्स, थैले आदि बनाए जाते हैं। विभिन्न प्रदर्शनियों में इनकी बिक्री होती है और इनसे प्राप्त आय गूँज के कार्य को और आगे बढ़ाती है।
इसके अतिरिक्त भलीभाँति साफ किए गए इन कपड़ों से सेनिटरी नैपकिन्स बनाए जाते हैं। मेन्स्टयअल हाईजीन की कमी को दूर करने के लिए बहुत सस्ती कीमत पर बने सेनिटरी नैपकिन्स ज़रूरी माने गए हैं तथा इस कमी को दूर करने में गूँज का यह योगदान है। गूँज द्वारा एक महीने में लगभग 2 लाख सेनिटरी नैपकिन्स का उत्पादन किया जाता है। गूँज ने इस कार्य पर अधिक ज़ोर देना तब आरंभ किया जब उसे अपने अनुसंधान कार्य के दौरान पता चला कि सेनिटरी नैपकिन के अभाव में कई गंभीर संक्रमण हो जाते हैं और इन समस्याओं का इलाज तो दूर, इनके बारे में प्राय: चर्चा तक नहीं होती है।
इसके अतिरिक्त गूँज को जो रद्दी अखबार और एक तरफ लिखे हुए कागज़ प्राप्त होते हैं उनसे लिफाफे व रजिस्टर बनाए जाते हैं।
कपड़ों के वर्गीकरण, मरम्मत, सफाई-धुलाई, इनसे अनेक उपयोगी वस्तुएँ बनाने के कार्य में महिलाओं को अधिक रोज़गार मिला है। और उन्होंने प्राय: बहुत कुशलता से इन जि़म्मेदारियों को सँभाला है।
गूँज के कार्य का एक अन्य विशेष महत्त्व यह है कि इसने कपड़ों के महत्त्व को विकास की चर्चा में स्थापित किया है। रोटी, कपड़ा, मकान को प्राय: तीन सबसे बुनियादी आवश्यकताओं के रूप में स्वीकार किया गया है, पर व्यावहारिक स्तर पर इनमें से अधिक महत्त्व खाद्य और आवास को ही दिया गया है। खाद्य सुरक्षा की चर्चा तो होती है, बेघरों को आवास उपलब्ध करवाने के लक्ष्य भी निर्धारित किए जाते हैं। पर कपड़े जैसी बुनियादी आवश्यकता के बारे में तो चर्चा तक नहीं होती है।
गूँज के संस्थापक-समन्वयक अंशु गुप्ता और उनकी पत्नी ने यह प्रयास लगभग 15 वर्ष पहले बहुत छोटे स्तर पर आरँभ किया था, उस समय उन्हें दूसरी स्थापित दाता संस्थाओं से सहायता नहीं मिल पाई थी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी व छोटे स्तर पर लोगों से सहायता प्राप्त कर अपना प्रयास जारी रखा। आसपास की कॉलोनियों में जाकर उन्होंने स्वयं भी वस्त्र एकत्र किए।
धीरे-धीरे 'गूँजकी गूँज फैलने लगी और विशेषकर बड़ी आपदाओं के समय लोग स्वयं कपड़े या अन्य सामान लेकर पहुंचने लगे। कुछ आर्थिक सहायता भी मिलने लगी। एक वर्ष में अब वे 1000 टन वस्त्र व अन्य सामान दूर-दूर के गाँवों में पहुँचाने में समर्थ हैं। इस आधार पर पिछले 2 वर्ष के ही आँकड़े देखें तो इस दौरान लगभग 600 विकास कार्य सम्पन्न हुए। बिहार में बाढ़ के समय गूँज ने 1500 टन सामान लगभग 200 गाँवों में पहुँचाया था।
इस प्रगति के बीच गूँज और अंशु गुप्ता को अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। अंशु गुप्ता कहते हैं कि जिन वस्तुओं का कोई मूल्य नहीं लगाया जाता था और जिनसे शहरी कूड़ा घरों का बोझ ही बढ़ता था, उन्हें सुधार कर न केवल लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना अपितु विकास कार्यों का एक सिलसिला आरँभ करना ही हमारी मुख्य सार्थकता रही है। हमने अपने विचारों और कार्य को कभी 'कॉपीराईटकी नज़र से नहीं देखा है। हमारे विचारों व कार्य से सीखकर या प्रेरणा लेकर जो भी ऐसा कार्य करना चाहे उसका स्वागत है। ऐसे प्रयासों की सहायता कर हमें प्रसन्नता होगी।
गूँज की उपलब्धियाँ महत्त्वपूर्ण हैं तो आगे की चुनौतियाँ भी कुछ कम नहीं हैं। 'गूँजकी सफलता में उसके वालंटियरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनका उत्साह बना रहे और निष्ठा बनी रहे, यह गूँज की सफलता के लिए आगे भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगा।
इसके अतिरिक्त देश के दूर-दूर के क्षेत्रों में निष्ठावान व सूझबूझ से इन कठिन जि़म्मेदारियों को सँभालने वाले सहयोगियों व पार्टनर सँस्थाओं की भी गूँज को बहुत ज़रूरत है। ऐसे सहयोगियों को जोडऩे के लिए गूँज प्रयासरत रही है, कई गोष्ठियों व सभाओं का आयोजन भी किया है। उचित सहयोगियों का साथ भी गूँज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहेगा।
गूँज के प्रयासों का एक बहुत महत्त्वपूर्ण सबक यह है कि बेकार मानी जाने वाली वस्तुओं के भी कितनी तरह के उपयोग हो सकते हैं और उनसे आगे विकास कार्यों की एक कड़ी भी आरंभ हो सकती है। यह सच है कि इस सँभावना को व्यवहारिक रूप देने में कई कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं व इसमें कई उलझनें भी सामने आती हैं, कुछ दुविधाएँ भी उभरती हैं। पर कुल मिलाकर यह बेहद रचनात्मक सँभावनाओं वाला कार्य है जिसमें बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साथ पर्यावरण की रक्षा का उद्देश्य भी जुड़ जाता है। (स्रोत फीचर्स)              

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