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Jul 1, 2026

उदंती.com, जुलाई - 2026

 वर्ष - 18, अंक - 12

प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, पत्ते-पत्ते में शिक्षापूर्ण पाठ हैं, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है। - हरिऔध

अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश - डॉ. रत्ना वर्मा

शिक्षाः आखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’? - बृजेंद्र दुबे

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान? - हिना श्रीवास्तव

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! - अपर्णा विश्वनाथ

कविताः शब्दमुक्त - आशा पाण्डेय

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक - डॉ. रत्ना वर्मा

शोधः क्या कृत्रिम बुद्धि बता सकती है आपकी सेहत का भविष्य?

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की  घाटी - सीताराम गुप्ता

ललित निबंधः  घिर घिर आये काले कजरारे मेघ - रविन्द्र गिन्नौरे

कविताः आषाढ़ के बादल - अर्चना अनुपम

व्यंग्यः प्रपंच - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कविताः पानी में बहुत नीचे तक -  मोती प्रसाद साहू

कहानीः लव यू मोर - डॉ. यशोधरा भटनागर

दो कविताएँः 1. उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी, 2. अमलतास बन जाऊँगी - गुंजन अग्रवाल ‘अनहद’

दो लघुकथाएँः 1- ईश्वर की खाँसी, 2- बच्चों की आँखें  - आनन्द हर्षुल

लघुकथाः उजली दुनिया - अन्तरा करवडे

किताबेंः अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

कविताः कुछ और... - रमेश कुमार सोनी


अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।

मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी  रंग - बिरंगे कपड़े  से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।

कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।

लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार   ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है।  विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।

यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी।  भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?

यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है,  तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

शिक्षाःआखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’?

जंगल मास्टर के साथ प्रकृति का
 अध्ययन करते बच्चे
 - बृजेंद्र दुबे

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गॉंव ऐसे हैं जहां के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गाँव ऐसे हैं, जहाँ के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा, ढेंकानाल (कंकड़हाड) : गाँव में हर बच्चे का सपना होता है कि बड़े होकर किसी बड़े शहर में जाएगा, वहाँ पढ़ाई करेगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा। और ये सपने साकार भी होते हैं; लेकिन इन सपनों के साकार होने के साथ-साथ एक चीज है जो पीछे छूट जाती है। वो है गाँव व आसपास के क्षेत्रों का इतिहास और भूगोल। और अगर गाँव व आस-पास के क्षेत्रों में ज्ञान का समुंदर हो, तो समझ लीजिए अकसर वहाँ के ज्ञान की लहरें उनसे दूर हो जाती हैं।   

ओडिशा के ढेंकानाल में कुछ गाँव ऐसे हैं, जो घने जंगलों से घिरे हुए हैं। इन जंगलों में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है और यहाँ इंसानों और जानवरों के बीच एक अनूठा रिश्‍ता है। यह रिश्‍ता आगे चलकर कमजोर नहीं पड़े, इसके लिए यहाँ बच्चों की एक अनोखी पाठशाला चलती है - “विज़डम वॉक”। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को समझने के लिए चलाई जाने वाली पाठशाला, किसी स्कूल में नहीं; बल्कि घने जंगलों में चलती है।  

दरअसल ढेंकानाल जिले में पहाड़ों से घिरे चार गाँव - दानापासी, हडगारी, कंटोल गाँव और बालीकुमा गाँव के बच्चों के लिए यह पाठशाला चलती है। इस पाठशाला की शुरुआत बालीकुमा गाँव से हुई थी। गाँव वाले मानते हैं कि यहाँ के युवा निर्माण- कार्य, औद्योगिक मजदूरी और होटल सेवा व अन्य नौकरियों के लिए बाहर चले जाते हैं। नतीजतन, जंगलों से जुड़ा उनका पारंपरिक ज्ञान उन तक पहुँचा नहीं पाता। ऐसे में इस ज्ञान के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति से जुड़ा यह ज्ञान आजीवन साथ रहे इसके लिए जंगल मास्टर बच्चों को विज़डम वॉक पर ले जाते हैं। 

कौन होते हैं ओडिशा के जंगल मास्टर? 

ओडिशा के इन गाँवों में एक नहीं, दो नहीं बल्कि कई दर्जन जंगल मास्टर हैं। ये जंगल मास्टर किसी स्कूल के टीचर नहीं; बल्कि यहाँ के बुजुर्ग हैं, जो अब अपने काम से रिटायर हो चुके हैं। यहाँ के आदिवासी समुदायों के कुछ बुजुर्ग गाँव के बच्चों को हर सप्ताहांत ‘विज़डम वॉक’ पर जंगल में ले जाते हैं। इन्‍हीं बुजुर्गों को जंगल मास्टर कहा जाता है।

क्या सिखाते हैं ढेंकानाल के जंगल मास्टर? 

जैसे हमारे दादा-नाना कहानियों के जरिए हमें लाइफ स्किल्स सिखाते हैं। ठीक वैसे ही यहाँ के जंगल मास्टर प्रकृति के बारे में बच्चों को रोचक ज्ञान देते हैं। जंगल की सैर के दौरान, यहाँ के बुजुर्ग बच्चों को दिखाते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में जंगल से मिले संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। कुछ उदाहरण जो जंगल मास्टर ने हमें बताए-    

पौधे, जो दूर कर देते हैं सिरदर्द 

कक्षा में बच्चों को पढ़ाते मास्टर जी
जंगल मास्टर बताते हैं कि इंद्रजाल और महाकालरे जैसे पौधों का उपयोग लोग सिरदर्द को ठीक करने के लिए करते हैं। वहीं महासिंदु वह औषधि है, जो हर प्रकार के दर्द से राहत देती है। 

मधुमेह और हृदय रोग व पेट की समस्या से दूर रखने वाले पौधे 

अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग मधुमेह, हृदय और पेट की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। जंगल मास्टर केवल इन पौधों के नाम ही नहीं बताते हैं; बल्कि कैसे इन पौधों की पत्तियों व छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है यह भी बताते हैं। 

त्वचा संबंधी रोगों में काम आने वाले औषधि-युक्त पौधे 

विज़डम वॉक पर नियमित रूप से जाने वाले 10 वर्षीय इंद्रमणि दास ने बताया कि उन्होंने सीखा कि कैसे जयसंदा का पौधा शरीर पर पड़ने वाले चकत्तों से राहत देता है और त्वचा की चोटों को ठीक करता है।

जंगल के पेड़ कैसे देते हैं बारिश के संकेत? 

विज़डम वॉक पर चर्चा करते हुए गाँव के सोहम दास ने बाताया कि बच्चों को अलग-अलग प्रकार के पौधों और जानवरों की पहचान करना और उन्हें मौसम का अंदाजा लगाना भी सिखाया जाता है। उन्‍होंने कहा, “हमें पता है कि अगर बारिश होने वाली होती है, तो दीमक पेड़ों से उतरना शुरू कर देती हैं। सूखे मौसम में अर्जुन के पेड़ की पत्तियों से पानी का टपकना भी बारिश के आने का संकेत देता है। ये सब बातें बच्चों को तो तभी पता चलेंगी, जब हम उन्हें बताएँगे।” 

किन पेड़ों से निकलता है नारियल पानी जैसा पौष्टिक पानी?  

सोहम दास ने आगे बताया कि इस दौरान बच्चों को दिखाया जाता है कि पीने के पानी के लिए किन पेड़ों का उपयोग किया जा सकता है और कैसे? उदाहरण के लिए, पलाश पेड़ की छाल में बने वी-आकार का कट लगाकर रस निकाल कर प्यास बुझाई जा सकती है। वहीं अटांडी लता के तने के सबसे मोटे हिस्से में एक सीधा कट लगाने से पानी निकलता है, जिसे इकट्ठा किया जा सकता है। ये पानी नारियल पानी जितना पौष्टिक होता है। इनके अलावा खजूर, बाँस और सियाली झाड़ी भी पानी देने वाले पौधे हैं।

विज़डम वॉक करते स्थानीय बच्चे 

विज़डम वॉक की हर सैर होती है दिलचस्प 

गाँव के रहने वाले दयाशंकर बहेरा बताते हैं कि बच्चे हर सैर पर कुछ नया खोजते हैं जो इसे दिलचस्प बनाता है। उन्‍होंने कहा, “हम उन्हें बताते हैं कि फल और अन्य खाद्य पौधे कहाँ मिलेंगे और हम छोटे-छोटे खेल खेलते हैं, जैसे पत्तियों को ढूँढना और उन्हें मालाओं में पिरोना।” 

दयाशंकर ने बताया कि किशोरों और युवा वयस्कों को जंगल के बारे में जानने में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी बच्चों को होती है। बच्चे न केवल हमारे ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में हमारी मदद करते हैं बल्कि प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक भी करते हैं। 

कब से शुरू हुई ओडिशा की विज़डम वॉक? 

दयाशंकर ने बताया कि बीते दो दशकों में लोगों का पलायन बढ़ा है। दूसरों को शहरों में नौकरी करते देख यहाँ के युवाओं का मन भी उधर ही लगने लगा और जंगलों से ध्‍यान लगभग हट गया। और तो और जिनका भविष्‍य अधर में लटक गया वो बुरी संगत में पड़ने लगे। ऐसे में यहाँ के बुजुर्गों को अहसास हुआ कि अगर इस ज्ञान को संजोकर रखना है तो बच्चों को छोटी उम्र से ही हमारी प्राकृतिक संपदा का महत्त्व बताना होगा। बस इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए बुजुर्गों ने बच्चों को जंगलों की जानकारी देना शुरू किया।  

दयाशंकर के अनुसार इस मुहिम ने औपचारिक रूप करीब सात साल पहले लिया जब गाँव वालों ने पद यात्रा शुरू कीं। शुरुआत में ये पद यात्राएँ गाँव तक सीमित रहती थीं और धीरे-धीरे ये यात्राएँ जंगल की ओर बढ़ गईं और फिर इसका नाम पड़ा विज़डम वॉक। उन्होंने बताया कि बच्चे अब जंगल जाने को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। उनमें से कई खुद ही जंगल में चले जाते हैं, और कुछ ने तो अपने आंगन में पेड़ उगाना भी शुरू कर दिया है। हम अपने वनों में रुचि लौटती देखकर उत्साहित है। (इंडिया वॉटर पोर्टल )

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान?

 - हिना श्रीवास्तव

सर्दियों की वह सुबह आज भी मेरी स्मृतियों में ज्यों की त्यों है। धूप अभी पूरी तरह फैली नहीं थी और छत पर बने छोटे से बाथरूम में गीज़र की हल्की भाप तैर रही थी। ठंड इतनी थी कि बिना गरम पानी के नहाने की कल्पना भी मुश्किल लगती थी। मैं उस वक्त कॉलेज के तृतीय वर्ष में थी और कॉलेज जाने के लिए ही तैयारी कर रही थी। मैं नहा ही रही थी कि अचानक गीज़र के भीतर से तेज़ आवाज़ आई। अगले ही पल उसकी जाली से तीखी आँच-सी निकलने लगी। उस क्षण मेरे हाथ-पाँव जैसे सुन्न हो गए। समझ ही नहीं आया कि क्या करूँ। एक पल को लगा, मानो पूरा बाथरूम आग की लपटों में घिर जाएगा।

उस क्षण मैं कुछ सेकंड के लिए जड़ हो गई। समझ नहीं पा रही थी कि पहले शरीर ढकूँ… या जीवन बचाऊँ। घबराकर मैंने जल्दी से दरवाज़ा खोला और किसी तरह बाहर आ गई। उस समय मेरे मन में बस एक ही विचार था- इस जगह से जितनी जल्दी हो सके निकल जाना चाहिए।

कुछ देर बाद जब मन थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने यह बात घर में बताई और कहा कि आग लगने पर भी कुछ क्षण तो मैं यह विचार कर रही थी कि पहले कपड़े पहनूँ कि जान बचाऊँ।

सबसे पहले माँ ने सुना। माँ ने मेरी बात पूरी होते ही कहा-“अरे पगली! ऐसी हालत में क्या सोचती? सीधे बाहर भाग आती। जान है तो सब है। कपड़े बाद में भी पहने जा सकते थे।”

उनकी आवाज़ में चिंता थी- वह चिंता, जो केवल माँ के स्वर में होती है।

थोड़ी देर बाद पिताजी ने भी यह बात सुनी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा- “नहीं, ऐसे कैसे बाहर आ जाती? इज़्ज़त सबसे बड़ी चीज़ होती है। थोड़ी चोट लग जाती, तो लग जाती; लेकिन बिना कपड़े पहने बाहर आना ठीक नहीं होता। तुमने सही किया कि पहले खुद को ढका।”

मैं चुपचाप दोनों की बातें सुनती रही। एक ही घटना थी, पर दो बिल्कुल अलग प्रतिक्रियाएँ। माँ के लिए जीवन सबसे बड़ा था , पिताजी के लिए सम्मान।

उस दिन पहली बार मैंने गहराई से महसूस किया कि स्त्री और पुरुष की सोच में अंतर केवल अनुभव का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का भी होता है। शरीर का नहीं, दृष्टि का भी होता है।

आज जब मैं स्वयं एक बेटी की माँ हूँ, तब उस घटना को याद करती हूँ , तो मन अपने आप माँ की ही ओर खड़ा दिखाई देता है। यदि मेरी बिटिया के साथ कभी ऐसी कोई स्थिति आए, तो मेरा उत्तर भी वही होगा- जो उस दिन मेरी माँ ने कहा था।

फिर भी मन के किसी कोने में यह प्रश्न आज भी शांत नहीं हुआ है कि क्या जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है, या सम्मान?

या फिर अन्तर्द्वंद्व से बचने के लिए आज भी मैं स्वयं को ये कहकर संतुष्ट कर लेती हूँ कि जीवन और सम्मान का यह प्रश्न स्वयं में ही सापेक्ष  है और इसे सापेक्षता के सिद्धांत के अनुप्रयोग के अंतर्गत ही देखा जाना चाहिए।

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो!

 - अपर्णा विश्वनाथ

किंचित सही; लेकिन समय निकालिए और समझिए कि अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण (Recycling) को समझना आज के समय में हर एक के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि घरेलू अपशिष्ट के जिम्मेदार हम सभी हैं। इसलिए हमारा यह कर्तव्य है कि घरेलू अपशिष्टों के सही निपटान में अपना सहयोग दें।

अपशिष्ट पुनर्चक्रण मुख्य रूप से उपयोग किए जा चुके कचरे—जैसे पॉलिथीन, प्लास्टिक की बोतलें, एल्युमीनियम व स्टील के डिब्बे, कागज़-गत्ता, काँच, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और पुरानी बैटरियों—को संसाधित (process) करके नए उपयोगी उत्पाद बनाने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया पर्यावरण को बचाने के लिए की जाती है।

पर्यावरण में हमारे चारों ओर का वातावरण, पेड़-पौधे, छोटे-बड़े जीव-जंतु सभी शामिल है। हमारे द्वारा फैलाए अपशिष्ट पदार्थ इनके लिए कितने नुकसानदेह और प्राणघातक भी है कभी सोचा है आपने ?

किचन और घर की सफाई में यह नजरअंदाज करते हैं कि क्या हमने अपने घर के कचरे को सही जगह फेंका है? ऑफिस जाते हाथ में कचरे की पॉलिथीन चुपचाप कहीं भी रख देते हैं। बस अपने घर से दूर। गृहणियाँ रात का बचा बासी खाना पॉलिथीन में भर कर बाहर फेंक आती हैं। पीछे उसका क्या हुआ, कहाँ गया कचरा कोई मतलब नहीं।

अपने आस-पास नजरें फेरें तो सड़क किनारे, मैदानों, पार्कों के आसपास भोजन की तलाश में पॉलिथीन चबाते गाएँ और अन्य जीव दिख जाएँगे। यह मासूम जीव पॉलिथीन या अन्य पैकटों में बंद खाना जब बाहर निकालने में असमर्थ होते हैं और कोई विकल्प नहीं दिखता तो विवशतावश पूरी पॉलिथीन ही खा जाते हैं। पॉलीथीन

हम क्या अनर्थ कर रहे हैं? यह घटना हैरतअंगेज से ज्यादा हम लोगों के लिए शर्मनाक है। क्योंकि इसकी जिम्मेदारी समाज में रह रहे हरेक व्यक्ति की है जो कर्तव्य विमुख है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभाता है।

घटना जनवरी माह 2026 छत्तीसगढ़ की है। तबीयत बिगड़ने से एक गौ माता और बछड़े को भिलाई से रायपुर के राज्य स्तरीय पशु चिकित्सालय लाया गया। स्थिति ऑपरेशन तक आई। दो वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर संतोष आदिल (MVsc surgery ), डॉ नम्रता सिंह तथा अन्य सहयोगी कर्मचारियों की मदद से गाय और बछड़े का ऑपरेशन किया गया। घंटो मशक्कत के बाद गाय के पेट से पच्चीस किलो और बछड़े के पेट से ग्यारह किलो पॉलिथीन बाहर निकाला गया। सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह क्या परिस्थिति कर दी हम मानवों ने। ऐसा अमानवीय,

गैर-जिम्मेदाराना रवैया इन मूक प्राणियों के प्रति कहाँ तक उचित है?

उन मूक प्राणियों के  बचने की उम्मीद क्या ही हम कर सकते हैं! हम जैसे मतलबपरस्त लोग प्रार्थना करने के हकदार भी नहीं हैं।

अगर यह घटना आपको नहीं झकझोरती तो शायद यह बात जरूर परेशान करेगी कि आपके घर जिस गाय का दूध आ रहा है वह गाय सड़कों, मैदानों में इधर उधर फैले पॉलिथीन नहीं खाई होगी ! क्या आपके घर आया दूध शुद्ध है ? पॉलिथीन युक्त है पॉलिथीन मुक्त है"।

इस घटना को यहाँ लिखने का मकसद डराना नहीं; बल्कि चेतावनी है समय रहते सँभलने की। खुद के स्वास्थ्य और अपने आस-पास रह रहे जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधे की सुरक्षा की। क्योंकि उनमें भी प्राण है ।

थोड़ी भी संवेदना बाकी है आपमें तो सोचिएगा जरूर ! कूड़ा-करकट खासकर पॉलिथीन अपने घरों से अलग-अलग समेटकर पुनर्चक्रण के लिए दें।

हम मार्च 18 को विश्व पुनर्चक्रण दिवस मनाते हैं। हर बार नई थीम के साथ।  2026 का विषय है : "अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! ” यह विषय आपको अपशिष्ट के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए प्रेरित करता है। अपशिष्ट को बेकार वस्तु समझने के बजाय, इसे कुछ नया बनाने के अवसर के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। कहते हैं ना एक पंथ दो काज। संवेदना और जिम्मेदारी एक सुंदर, स्वस्थ और टिकाऊ सामाजिक वातावरण के आधारस्तंभ हैं।