मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 1, 2026

उदंती.com, फरवरी - 2026

वर्ष- 18, अंक - 7

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी... - डॉ. रत्ना वर्मा

ललित निबंधः वसंत...वसंत...कहाँ हो तुम... - डॉ. महेश परिमल

आलेखः छाप तिलक सब छीनी... - डॉ. सुशीला ओझा 

लघु लेखः प्यार एक दिन के उत्सव का नाम नहीं - डॉ. योगिता जोशी

दोहेः ऋतु वासंती - कमल कपूर

संस्मरणः प्रेमिल पिंकी - निर्देश निधि

प्रेरकः पिंजरे का संगीत और पहाड़ की गूँज - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

कुंडलिया छंदः प्रहरी रक्षक देश के - परमजीत कौर ‘रीत’

प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं? - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कविताः आँखों में खिलते बसंत के फूल - अंजू निगम

शख्सियतः पर्यावरणविद वैज्ञानिक माधव गाडगिल - संकेत राउत

कविताः बीते हुए बसंत की याद में - सांत्वना श्रीकान्त

कविता: ढाई आखर - विजय जोशी

आलेखः प्रभावशाली बनना है तो दूसरों को महत्त्व दीजिए - सीताराम गुप्ता

यादेंः मुझसे ईश्वर ने  बुलवाया - राजनन्दिनी राजपूत

लघुकथाः ख़ुदा ख़ैर करे - छवि निगम   

बाल डायरी के अंशः सुबह हंस रही थी - डॉ. पद्मजा शर्मा

लघुकथाः उन सुनहरे दिनों की तरह - सन्तोष सुपेकर

कहानीः कद्रदान - गंभीर सिंह पालनी

व्यंग्यः नेताओं का शृंगार हैं चमचे - रेखा शाह आरबी

किताबेंः इतिहास के हाशिये से उठती एक चेतना - डॉ. पूनम चौधरी 

कविताः कविता करने के लिए... -  डॉ. रमाकांत गुप्‍ता

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

महाराष्ट्र के लातूर ज़िले में हाल ही में संपन्न हुई एक शादी ने समाज को ठहरकर सोचने का अवसर दिया है। यह अवसर किसी भव्य आयोजन या असाधारण खर्च के कारण नहीं, बल्कि सादगी और सामाजिक चेतना के कारण सामने आया है ।

परभणी निवासी इंजीनियर शेखर माधव शेजुल और ऋतुजा शिंदे ने अपने विवाह को सादगी और अर्थपूर्ण मूल्यों के साथ सम्पन्न कर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। केवल 25 करीबी परिजनों की उपस्थिति में, बिना किसी तामझाम के, उनका यह विवाह एक मंदिर में सम्पन्न हुआ।

दरअसल इस विवाह की चर्चा हम सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि यह सादगी से सम्पन्न हुआ है, बल्कि इसलिए कर रहे हैं; क्योंकि इस शादी में खर्च होने वाले दस लाख रुपये उन्होंने अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय में आधुनिक कंप्यूटर कक्ष की स्थापना के लिए दे दिए, ताकि ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जा सके। 

एक सार्थक और सराहनीय कदम इन्होंने उठाया है, तो उल्लेखनीय तो है ही, क्योंकि देखा तो यही जाता है कि इन दिनों वे शादियाँ ही मीडिया में अधिक चर्चा का विषय बनती हैं, जो भव्य और खर्चीली होती हैं, जबकि यहाँ तो शादी में खर्च होने वाली राशि को भी उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उपयोगी बना दिया। 

इन दिनों देखा यही जा रहा है कि आज के समय में शादियाँ धीरे-धीरे संस्कार से अधिक प्रदर्शन का रूप लेती जा रही हैं और वे पवित्र संस्कार जैसे- हल्दी, मेहंदी, सप्तपदी जो सब घरेलू आँगनों में लोकगीतों और ढोलक- मंजीरे के साथ पारिवारिक सहभागिता के साथ संपन्न होती थीं, वे अब इवेंट मैनेजमेंट के माध्यम से भव्य रिसॉर्ट्स और डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में आयोजित की जाती हैं तथा बाज़ार और दिखावे का माध्यम बनकर महँगे और भव्य आयोजनों में बदल गई हैं। 

इस बदलाव को बढ़ावा देने में उन शादियों की भी बड़ी भूमिका है, जहाँ पैसे का मोल गौण हो जाता है - चाहे वह उद्योग जगत के बड़े नाम हों या फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध। जब इस प्रकार होने वाली करोड़ों की शादियाँ सार्वजनिक रूप से भव्यता के साथ प्रस्तुत की जाती हैं, तो समाज के एक वर्ग भी उसी होड़ में शामिल हो जाता है। परिणाम यह होता है कि अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके वे भी अपनी शादियों को दिखावे की शादी में बदल देते हैं। यहाँ तक कि अब तो देखा- देखी पैसे के बल पर फ़िल्मी सितारों  और नामी- गिरामी गायकों और कलाकारों को शादी में आमंत्रित करने लगे हैं। 

शादियों के इस भव्य माहैल में शेखर माधव और ऋतुजा शिंदे की यह शादी कोई आंदोलन नहीं है; लेकिन सादगी से की गई उनकी शादी और उस पैसे का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका सहयोग यह अवश्य बताती है कि खुशी पैसे खर्च करने से नहीं, सोच से बनती है। और जब सोच बदलती है, तो एक शादी केवल रस्म नहीं रहती - वह समाज के लिए दिशा संकेत भी बन जाती है।

 बस दुख तब होता है जब ऐसे नेक उदाहरण से बहुत कम लोग सीख लेते हैं। ऐसे नेक कदम की सराहना तो हर कोई करता है; पर अमल करना नहीं चाहते। यह सवाल अक्सर अभिभावकों के सामने रखा भी जाता है कि इतनी फिज़ूलखर्ची क्यों - तो वे यह कहते हुए सामने वाले का मुँह बंद कर देते हैं कि मेरा इकलौता बेटा या बेटी है और शादी कौन रोज- रोज होती है, एक बार खुशियाँ मना लेने दो। या फिर यह भी कि बच्चे चाहते हैं कि उनकी शादी यादगार बने या सब उनकी भव्य शादी को याद रखें। आज के डिजीटल युग में युवाओं की सोच भी बदलती दिखाई देती है – वे अपनी काबिलियत पर धन अर्जित कर रहे हैं तो उन्हें खर्च भी उसी अंदाज में करने की इच्छा रखते हैं। 

समाज में अक्सर ऐसी फ़िज़ूलखर्च के विरुद्ध बातें तो होती हैं, कई सामाजिक आयोजनों में प्री- वेडिंग जैसे समारोह पर रोक लगाने की बात भी हुई है; पर एक दो उदाहरण को छोड़ व्यवहार में बदलाव कम ही दिखाई पड़ता है। कारण यही है कि आज दिखावे को सामाजिक सम्मान से जोड़ कर देखा जाने लगा है।  

आज ज़रूरत इस बात की है कि माधव शेजुल और ऋतुजा ने जिस सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व का रास्ता चुनते हुए विवाह किया है, उनके इन प्रयासों की सामाजिक मंचों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए। उन्हें केवल सराहना ही नहीं, सम्मान भी मिलना चाहिए। आज का सोशल मीडिया यदि चाहे तो दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाय ऐसे सकारात्मक उदाहरणों को व्यापक रूप से समाज तक पहुँचा सकता है। सही उदाहरणों को साझा करना, उन्हें चर्चा का विषय बनाना और उनसे प्रेरणा लेना - यही डिजिटल युग की वास्तविक शक्ति और सकारात्मक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव बन सकती है। 

तो आइए हम और आप मिलकर इस नींव को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाएँ और विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भव्यता और दिखावे की संस्कृति से दूर रखते हुए इस पवित्र रिश्ते को समाज के उत्थान से जोड़ते हुए कुछ नेक काम भी करते जाएँ। 

ललित निबंधः वसंत...वसंत...कहाँ हो तुम...

 - डॉ. महेश परिमल

अभी तो पूरे देश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। लगता है इस बार वसंत जल्‍दी आ गया। बस कुछ ही दिनों की बात है, जब हमें लगेगा कि हवाओं में एक अजीब सी मादकता है। मन में उमंगें कुलाँचे मार रही है। कुछ नया करने की इच्‍छा हो रही है। तब समझो, हमारे द्वार पर वसंत ने दस्‍तक दे दी है। इसे ही दूसरे रूप में हम कह सकते हैं कि अभी-अभी ठंड ने गर्मी का चुम्बन लिया है.. समझ लो बस वसंत आने वाला है।

 पर वसंत है कहाँ? वह तो खो गया है, सीमेंट और कांक्रीट के जंगल में। अब प्रकृति के रंग भी बदलने लगे हैं। लोग तो और भी तेज़ी से बदलने लगे हैं। अब तो उन्हें वसंत के आगमन का नहीं, बल्कि ‘वेलेंटाइन डे’ का इंतजार रहता है। उन्हें तो पता ही नहीं चलता कि वसंत कब आया और कब गया। उनके लिए तो वसंत आज भी खोया हुआ है। कहाँ खो गया है वसंत? क्या सचमुच खो गया है, तो हम क्यों उसके खोने पर आँसू बहा रहे हैं, क्या उसे ढूँढ़ने नहीं जा सकते। क्या पता हमें वह मिल ही जाए? न भी मिले, तो क्या, कुछ देर तक प्रकृति के साथ रह लेंगे, उसे भी निहार लेंगे, अब वक्त ही कहाँ मिलता है, प्रकृति के संग रहने का। तो चलते हैं, वसंत को तलाशने। सबसे पहले तो यह जान लें कि हमें किसकी तलाश है? ‘मोस्ट वांटेड’ चेहरे भी आजकल अच्छे से याद रखने पड़ते हैं। तो फिर यह तो हमारा प्यारा वसंत है, जो इसके पहले हर साल हमारे शहर ही नहीं, हमारे देश में आता था। इस बार समझ नहीं आता कि अभी तक क्यों नहीं आया, ये वसंत। आपने कभी देखा है हमारे वसंत को? आपको भी याद नहीं। अब कैसे करें उसकी पहचान। कोई बताए भला, कैसा होता है, यह वसंत? क्या मिट्टी की गाड़ी की नायिका वसंतसेना की तरह प्राचीन नायिका है या आज की बिपाशा बसु या मल्लिका शेरावत की तरह है। कोई बता दे भला। चलो उन बुज़ुर्ग से पूछते हैं, शायद वे बता पाएँ। अरे.. यह तो कहते हैं कि मेरे जीवन का वसंत तो तब ही चला गया, जब उसे उसके बेटों ने धक्के देकर घर से निकाल दिया। ये क्या बताएँगे, इनके जीवन का वसंत तो चला गया। चलो उस वसंत भाई से पूछते हैं, आखिर कुछ सोच-समझकर ही रखा होगा माता-पिता ने उनका नाम। लो ये भी गए काम से, ये तो घड़ीसाज वसंत भाई निकले, जो कहते हैं कि जब से इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ बाज़ार में आई हैं, इनका तो वसंत ही चला गया। अब क्या करें। चलो इस वसंत विहार सोसायटी में चलते हैं, यहाँ तो मिलना ही चाहिए हमारे वसंत को। कांक्रीट के इस जंगल के कोलाहल में बदबूदार गटर, धुआँ-धूल और कचरों का ढेर है, यहाँ कहाँ मिलेगा हमारा वसंत। यहाँ तो केवल शोर है, बस शोर। भागो यहाँ से.. ये आ रहीं हैं वासंती- ये जरूर बताएगी वसंत के बारे में। लो इनकी भी शिकायत है कि जब से लोगों के घरों में कपड़े धोने की मशीन और वैक्यूम क्लीनर आ गया है, हमारा तो वसंत चला ही गया। अब कहाँ मिलेगा हमें हमारा वसंत? चलो हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. प्रेम त्रिपाठी से पूछते हैं, वे तो उसका हुलिया बता ही देंगे। लो ये तो शुरू हो गए, वह भ्रमर का गुंजन, वह कोयल की कूक, वह शरीर की सुडौलता, वह कमर का कसाव, वह विरही प्रियतम और उन्माद में डूबी प्रेयसी, वह घटादार वृक्ष और महकते फूलों के गुच्छे, वह बहते झरने और गीत गाती लहरें, वह छलकते रंग और आनंद का मौसम, बस मन मयूर हो उठता है और मैं झूमने लगता हूँ।

हो गई ना दुविधा। इन्होंने तो हमारे वसंत का ऐसा वर्णन किया कि हम यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि वसंत को किस रूप में देखें? सब गड्ड-मड्ड कर दिया त्रिपाठी सर ने। चलो अँगरेज़ी साहित्य के लेक्चरर यजदानी सर से पूछते हैं, शायद उनका वसंत हमारे वसंत से मेल खाता हो? अरे ये सर तो उसे ‘स्प्रिंग सीजन’ बता रहे हैं। कहाँ मिलेगा यह ‘स्प्रिंग सीजन’? थक गए भाई, थोड़ी चाय पी लें, तब आगे बढ़ें। अरे इस होटल के ‘मीनू’ में किसी ‘स्प्रिंग रोल्स’ का ज़िक्र है, शायद उसी में हमें दिख जाए वसंत। गए काम से! ये तो नूडल्स हैं। क्या इसे ही कहते हैं वसंत?

अब तो हार गए,  इस वसंत महाशय को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते। न जाने कहाँ, किस रूप में होगा ये वसंत। हम तो नई पीढ़ी के हैं, हमें तो मालूम ही नहीं है, कैसा होता है यह वसंत। वसंत को पद्माकर ने देखा है और केशवदास ने भी। कैसे दिख गया इन्हें बगरो वसंत? कहाँ देख लिया इन्होंने इस वसंत महाशय को? अब नहीं रहा जाता हमसे, हम तो थक गए। ये तो नहीं मिले, अलबत्ता पाँव की जकड़न जरूर वसंत की परिभाषा बता देगी। अचानक भीतर से आवाज़ आई, लगा कहीं दूर से कोई कह रहा है..

कौन कहता है कि वसंत खो गया है, मेरे साथ आओ, तुम्हें तरह-तरह के वसंत से परिचय कराता हूँ। ये देखो कॉलेज कैम्पस। यहाँ जुगनुओं की तरह यौवन का मेला लगा है। मैं पूछता हूँ- क्या ये सभी प्रकृति के पुष्प नहीं हैं? इन्हें भी वसंत के मस्त झोकों ने अभी-अभी आकर छुआ है। यौवन का वसंत। इसकी छुअन मात्र से इनके चेहरे पर निखार आ गया है। देख रहे हो इनकी अदाएँ, ये शोखी, ये चंचलता? वसंत केवल पहाड़ों, झरनों और बागों में ही आता है, ऐसा किसने कहा? कभी भरी दोपहरी में किसी फिल्म का शो खत्म होने पर सिनेमाघर के आसपास का नजारा देखा है? वहाँ तो वसंत होता ही है, स्नेक्स खाते हुए, भुट्टे खाते हुए, चाट खाते हुए, पेस्ट्री खाते हुए। मालूम है, नहीं भाया वसंत का यह रूप आपको। तो चलो, स्कूल की छुट्टी होने वाली है, वहाँ दिखाता हूँ आपको वसंत, देखोगे तो दंग रह जाओगे, वसंत का यह रूप देखकर। वो देखो.. छुट्टी की घंटी बजी और टूट पड़ा सब्र का बाँध। कैसा भागा आ रहा है यह मासूम और अल्हड़ बचपन। पीठ पर बस्ता लिये ये बच्चे जब सड़क पर चलते हैं, तब पूरी की पूरी सड़क एक बगीचा नजर आती है और हर बच्चा एक फूल। क्या इन फूलों पर नहीं दिखता आपको वसंत?

कभी किसी ग्रीटिंग कार्ड की दुकान पर खड़े होकर देखा है, इठलाती युवतियाँ हमेशा सुंदर फूलों, बाग-बगीचों और हरियाली वाले कार्ड ही पसंद करती हैं। ऐसा नहीं लगता है कि इनके भीतर भी कोई वसंत है, जो इस पसंद के रूप में बाहर आ रहा है। ऐश्वर्यशाली लोगों के घरों में तो वाल पेंटिंग के रूप में हरियाला वसंत पूरी मादकता के साथ लहकता रहता है। ये सारे तथ्य बताते हैं कि वसंत है, यहीं कहीं है, हमारे भीतर है, हम सबके भीतर है, बस ज़रा-सा दुबक गया है और हमारी आँखों से ओझल हो गया है। अगर हम अपने भीतर इस वसंत को ढूँढ़े, तो उसे देखते ही आप अनायास ही कह उठेंगे- हाँ यही है वसंत, जिसे मैं और आप न जाने कब से ढूँढ़ रहे थे। वसंत जीवन का संगीत है, ताज़गी की चहक और सौंदर्य की खनक है, परिवर्तन की पुकार और रंग उल्लास का साक्षात्कार है। जहाँ कहीं ऐसी अनुभूति होती है, वसंत वहीं है। वसंत कहीं नहीं खोया है। मेरे और आपके अंदर समाया वसंत अभी भी अपना उजाला, ताज़गी, सौंदर्य पूरी ऊर्जा के साथ चारों ओर फैला रहा है। बस खो गई है वसंत को परखने वाली हमारी नज़र। अब तो मिल गया ना हमारे ही भीतर हमारा वसंत। तो विचारों को भी यहीं मिलता है बस अंत। ■

आलेखः छाप तिलक सब छीनी...

 - डॉ. सुशीला ओझा 

आकाश की अनंतता, सागर की विशालता अलौकिक है। आकाश में तारे टिमटिमाते हैं, सागर की गोद में अथाह रत्न भरे हैं। विचित्र है आकाश और पाताल का मर्म.. जब कोई इसमें उतरने की कोशिश करता है, साधना, आराधना, उपासना की सीढ़ियों से नीचे उतरता है तो कितना उज्ज्वल, भव्य, दिव्य तीर्थस्थल को पाता है। और मन....मन तो मंदिर हो जाता है- 

"छाप तिलक सब छिन जाता है।" किनारे पायदान की तरह होते हैं। भावनाओं, इच्छाओं की धूल, छाप, तिलक पायदान में सिमट जाते हैं। नवकंजलोचन की पंखुड़ियों में नील नलिन प्रतिष्ठित हो जाता है। नील सरोवर में नील नलिन की पंखुड़ियाँ खुलती हैं। और एक महारास की रचना होती है, एक अवर्णनीय रूप। नील नलिन का अद्भुत रूप सौन्दर्य, सागर में शेष-शय्या पर लेटे उस सुनील वर्ण से जब आँखें लग जाती हैं, तो "छाप तिलक सब छिनी"- पता नहीं वह बाहरी आवरण कहाँ खो जाता है! उसका खोना ही समर्पण है, विराटता का अमूल्य धरोहर है। ये नवकंज पंखुड़ियाँ भी बड़ी विचित्र हैं! कैसे इन पंखुड़ियों में विराट को समेट लेती हैं! प्रवेश द्वार पर लिखा है- जप, माला, छापा, तिलक- सब का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। केवल उत्कृष्ट भावनाओं के पुष्प, ‌अगुरु, चंदन, मन के फूल ही डलिया में रखना है। जब नवकंज पंखुड़ियों पर नील नलिन विकसित होता है तो विष्णु के नाभि केन्द्र में रहता है। ब्रह्मा की सृष्टि वहीं से आरंभ होती है। यह नीरज नमित भाव से वंदना करता है। मृणालिनी विनम्रता से झुककर अर्घ्य निवेदित करती है। नयनों की कोठरी में नील नलिन से मिलना मन-ही-मन भावनाओं की सोलह हजार, एक सौ आठ ऋचाएँ- सब में विष्णु भाव की आभा झलकती है। राधा भाव उसमें निमग्न है। राधा पद्मा है, पद्मासना है, कमलासना है, लक्ष्मी स्वरूपा है, शक्ति स्वरूपा है, प्रकाशिनी है, आह्लादिनी है। लहरों के किनारों को स्पर्श करता वह रूप..अहा! काजल लगे किनारों पर चिपका वह अभूतपूर्व सौन्दर्य! सखि! रख लो ये अपनी छाप तिलक। मैं रीझ गई। इसके नयन द्वार तक ही इसकी आवश्यकता थी। नील सागर की गहराई में तो अनंत रत्न हैं। मैं समेट रही हूँ, अँजुरी भर रही हूँ, छलक रहा है रत्न। मैंने सोचा उसे कोमल, मनोरम, मखमली तिजोरी में रख दूँ। तिजोरी में विशालता है, गहराई है, सब कुछ रखने की क्षमता है। अरे सखि! उस सुनील वर्ण का बिम्ब फल जैसे होठों की लालिमा, उस पर बाँसुरी का अनुपम स्वर! राधा का प्रज्वलित सौंदर्य, बिजली-सी चमक, उस गौरवर्ण की गरिमा में धुल जाती है और आँखों की सारी कालिमा भी। और तुम तो ठहरे छलिया! नटवर नागर! मेरे मन को, अपने नृत्य में पाँव की घुँघरु बना देते हो। हृदय की तिजोरी के द्वार पर तुम्हारी मूर्ति है। नील रंग, पीताम्बर लपेटे हुए, लाल होठों पर वह हरी बाँसुरी, वह पोंगी बाँसुरी- केवल उनके स्पर्श की प्रतीक्षा में तिरछे नैन करके लेटी हुई रहती है। 

वह छलिया भी कितना नृत्य शिरोमणि है! सर्वदा नृत्य मुद्रा में रहता है। देखो ना सखि! कदंब के नीचे, काली धवरी गईयों पर त्रिभंगी मुद्रा में खड़ा है। अपने तो नीला है, पयस्विनी धार को कैसे पी रहा है! गजब का जादू है आँखों में! सम्मोहन शक्ति है। ये बाँसुरी, ये गइयाँ, ये मोर पंख, ये घुंघराली अलकें, ये त्रिभंगी मुद्रा- इसके समक्ष तिलक, छाप सब व्यर्थ है। उसकी विशालता के समक्ष मैंने फेंक दिया सखि! उन सारे बाह्यावरणों को। उन अँखियों के जादू में समर्पित कर दिया स्वयं के जीवन को। समर्पण और अधिकार का सामंजस्य ही तुम्हारा नीलत्व है। बाँसुरी को छूते हो तो मैं तुम्हारी रागिनी बन जाती हूँ। गइयों के गले की घंटियों में मैं ही हूँ। हे सुनील! तुम्हारी गहराई में मैं डूबती हूँ तो राधा बनकर निकलती हूँ। मीरा श्याम रंग में ऐसी डूबती है कि विष भी अमृत में परिवर्तित हो जाता है। ये तुम्हारी कैसी लीला है! तुम लीलामय हो! तुम्हारे स्वर में कितनी ऊँचाई है, कितनी गहराई है! तुम्हारे इस रूप ऐश्वर्य में कितनी अलौकिक क्षमता है जो मेरे लिए महौषधि है। छोड़ो इन बातों में कौन उलझे? मैं तो उलझ गई हूँ श्याम तुम्हारे नयनों में -

"कैसे मैं निकलूँ स्याम तेरे नयनों से,

मैं तो उलझ गई इन कटीली डारों में 

एक तो तुम्हारे सुनील वर्ण, उस पर काले मेघ-सी काजल,

बिजली-सी चमके पीत पट, बिम्ब फल पर बाँसुरिया

मैं तो उलझ गई तमाल बिरिछवा

छाप तिलक सब छिनी रे तोसे नैना मिलाई के!"

नहीं चाहिए मुझे छाप, तिलक.. मैं शाश्वतता के रंग में रंग गई हूँ-

"श्याम की छाप बसी हिय द्वारे, पीत झंगुलिया नयन बीच चमके, 

दसन चमके बिजुरिया, राधा श्याम संग मिल गई।"

"ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।" 

सखि! यह कौन सा श्याम रसायन है जिसमें डूबकर ही तीर्थत्व की प्राप्ति होती है!

अमीर खुसरो ने भी इस अद्भुत रूप का दर्शन किया है। उनकी आँखों में वह माधुर्य, लावण्य- निधि समाहित हो गई है। पूर्ण समर्पित होकर ही तो छाप तिलक को देह के पायदान पर छोड़ दिया है। कितनी अगाध भक्ति है! कितना समर्पण भाव है! उस श्याम रसायन में! रागात्मक चेतना शब्दों के प्याले से छलकते हैं और आँखें कैनवास बन जाती हैं। उसमें श्याम की मूर्ति ‌उत्कीर्ण होने लगती है इसलिए तो छाप, तिलक को दरवाजे पर फेंकने को विवश हो जाते हैं - "छाप तिलक सब छिनी रे, तोसे नयना मिलाई के।"

रसखान भी तो उलझते जा रहे हैं इस रूप माधुर्य पर। वे तो ब्रज भूमि पर स्वयं को समर्पित कर देते हैं। अधिकार और समर्पण का अनूठा संगम -

"मानुष हौं तो वही रसखान< बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" मनुष्य, पशु किसी भी रूप में वे ब्रज में ही जन्म लेना चाहते हैं। ‌उनको समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सी अलौकिक छवि है जिससे देवता भी पार नहीं पाते और वह अहीर की छोरियों के बीच नाचता रहता है -

"ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरी छाछ पर नाच 

नचावत।" 

‌जिसको अनादि, अनंत, अछेद, अभेद कहा जाता है उसे माटी से कितना प्रेम है। वे दामोदर तो माटी खाकर ऊखली में बँधने को भी कितने आतुर हो जाते हैं।■

सम्पर्कः पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, माहेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार 

लघु लेखः प्यार एक दिन के उत्सव का नाम नहीं

 - डॉ. योगिता जोशी

प्रेम और उसकी प्रासंगिकता सिर्फ एक विशेष दिन पर ही सीमित नहीं हो सकती। यह जीवन का एक अदृश्य रंग है, जो समय के साथ बढ़ता है और हमारी दिनचर्या को अपनी भावनाओं से भर देता है। प्रेम एक दिन की विशेषता नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है, जिसमें साझा किए जाने वाले क्षण हमें आनंद और संतुष्टि में डालते हैं। प्रेम का अर्थ सिर्फ रोमांटिक रिलेशनशिप में ही नहीं होता, बल्कि यह दो लोगों के बीच संबंधों के विभिन्न पहलुओं को समाहित करने का एक व्यापक शब्द है। यह दोस्ती, परिवार और समाज में भी मौजूद हो सकता है। प्रेम एक अनुभव है जो हमें आत्मा के सबसे गहरे कोनों में ले जाता है और हमें अपने चारों ओर के लोगों के प्रति सहानुभूति और समर्पण की भावना देता है। वेलेंटाइन डे एक मौका है, जब हम अपने प्रियजनों के साथ अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं, लेकिन यह केवल एक दिन नहीं, बल्कि हमें हर दिन अपने आस-पास के लोगों के साथ संबंध बनाए रखने का मौका देने का प्रेरणा स्रोत बन सकता है। प्रेम की प्रासंगिकता बनी रहे, इस के लिए सतत प्रयासशील रहना चाहिए, ताकि हम समृद्धि, समर्थन, और समर्पण से भरे रहें।

प्रेम को एक दिन में सीमित नहीं किया जा सकता है। वेलेंटाइन डे के माध्यम से अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सुखद और मनोहर तो होता है; लेकिन यह सिर्फ एक दिन के लिए ही सीमित नहीं रहता। प्रेम का अर्थ है, समर्पण, समझदारी, और साझा करना, जो दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपनी विशेषता बनता है। प्रेम एक गहरा और स्थायी बंधन है जो अधिकांश समय धीरे-धीरे बनता है। यह वेलेंटाइन डे का मोहताज नहीं, इसके बाहर भी अपनी मिठास बनाए रखता है।

प्रेम और प्रेम की प्रासंगिकता एक बहुमूल्य और समृद्धि से भरपूर भावना है, जो सिर्फ एक विशेष दिन के लिए नहीं हो सकती। जब कही प्रेम होता है तो उसमें न उम्र की सीमा होती है और न दूरियाँ मायने रखती हैं। प्रेम का अर्थ समर्पण, समर्थन, और साझा जीवन है। यह सिर्फ एक ही दिन में नहीं, बल्कि हर दिन, हर क्षण में महसूस किया जा सकता है। प्रेम की प्रासंगिकता व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर हर क्षण में मौजूद हो सकती है, जो व्यक्ति को अपने साथी के साथ मजबूत और सुरक्षित महसूस कराती है। अच्छे संबंध और प्रेम न केवल एक दिन, बल्कि पूरे जीवन के लिए होते हैं, जो साझा जीवन, समर्थन, और समर्पण की ऊँचाइयों तक जा सकते हैं। इसलिए, व्यक्ति को हमेशा चाहिए कि वह अपने प्रेम को सदैव महसूस करे, न कि किसी एक दिन के माध्यम से। सच्चा प्रेम कालजयी होता है। ■

सम्पर्कः 16-Hanuman Nagar, Dadi ka phatak , Benad road, Jhotwara. Jaipur-302012, Jaipur-  Rajasthan.

दोहेः ऋतु वासंती

  - कमल कपूर

पीत पाग जब पहनके, आए संत बसंत ।

धरा कहे कर जोड़के, आओ रति के कंत ।।

 

सौरभ की गगरी उठा, भर आँचल में फूल।

मधु-ऋतु जब पैदल चली, उड़ी बसंती धूल।।

 

मधुबन में है आ खड़ी, मधुर बसंत-बहार।

घूँघट के पट खोलके, कलियाँ रहीं निहार।।

 

बारिश और बसंत का, बड़ा अनोखा मेल।

बगिया के हर फूल से, खेले बरखा खेल।।

 

वासंती ऋतु ने किया, आज अनोखा काम।

सारा गुलशन लिख दिया, अलि तितली के नाम।।

 

आते ही ऋतुराज के, धरा बदलती रूप।

बरसाते रविराज भी, चटक बसंती धूप।।

 

पर्णहीन हर पेड़ पे, उगती मीठी आस।

हरित पात लाकर खड़ा, फिर से यह मधुमास ।। 

 

आते ही ऋतुराज के, हुलस उठे सब बाग।

कोयल बुलबुल गा रहीं, मधुर मिलन के राग।।

 

वसन वसंती धारके, आए जब ऋतु-भूप।

धरती ने धारण किया, नूतन एक स्वरूप।।

 

आते ही मधुमास के, खुले भाव के बंध।

कलमकार लिखने लगे, कविता और निबंध।।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।

जब भारत के पटल ने, लिखा 'निराला' नाम।।

 

पाँचवीं तिथि बसंत की, मौसम था खुशहाल ।

'महा निराला' रूप में, मिला धरा को लाल ।।

 

थाती मधुर बसंत की, बचपन वाला गाँव।

हरे चने के खेत सब, अमलतास की छाँव।।

 

माँ रंगती थी चुन्नियाँ, घोल बसंती रंग।

बढ़ जाती थी चौगुनी, जी की मदिर उमंग।

 

माँ के चौके में पका, सर्वोत्तम पकवान।

पीले चावल गुड़- पगे, ऋतु बसंत की शान।

 

कली-कली इतरा रही, छूकर मुखर बयार।

ओढ़ बसंती ओढ़नी, इठलाए ज्यों नार।।

 

धरती-अंबर में घुला, शोख बसंती रंग।

मधुराज यहाँ रँग रहे, खुद को इनके संग।।

 

सरसों के खलिहान में, आया धीर बसंत ।

पीले चोले पहनके, घूम रहे ज्यों संत ।।

 

अभिनंदन मधुमास का, करें रेशमी पेड़।

छू फूलों की डालियाँ, हवा रही है छेड़।।

 

रंग-गगरिया थामके, आ पहुँचे ऋतुराज ।

कलियाँ सज़दे कर रहीं, हवा छेड़ती साज।।


संस्मरणः प्रेमिल पिंकी

 - निर्देश निधि

उन दिनों मेरा भतीजा गुड्डू, यानी  विजय सिंह अपने छोटे बेटे अक्षय के साथ नैनीताल में रहता था। उसका घर सैकड़ों बरस पूर्व कभी अंग्रेजों का अपने ऐश- ओ- आराम के लिए बनवाया हुआ घर है, जो एकबारगी देखने पर घने जंगल या बीहड़ में बना दिखाई देता है, दिखाई क्या देता है, है ही जंगल में। वह  न जाने कितने बरसों से बुला रहा था मुझे नैनीताल के सुरम्य वातावरण का आनंद लेने के लिए। पर हर बार कोई न कोई विवशता आ घेरती और मेरा वहाँ जाना रह जाता। उस बार छुट्टियों में उसकी पत्नी उषा भी देहरादून से आई हुई थी उसने भी आग्रह किया मुझे वहाँ जाकर कुछ दिनों रहने का, अतः उस बार मेरा जाना किसी तरह संभव हो गया।

पहाड़ पर जाकर भी सुबह देर तक सोते रहने के कोई मायने नहीं थे। वहाँ के स्थायी निवासियों के लिए तो वहाँ का हर सौन्दर्य रोज़मर्रा  की सामान्य सी बात थी अतः सुबह - सुबह उन्हें उठाकर परेशान ही करना था और कुछ नहीं। इसलिए वहाँ पहुँचकर एक दिन का आराम कर मैं सुबह - सुबह  उठकर पहाड़ों का सौन्दर्य निहारने अकेली ही चल पड़ी। पर थोड़ी दूर चलने के बाद मुझे आभास हुआ कि मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ हल्के पीले से रंग की एक सारमेयी यानी कुत्ती भी चल रही थी। हालाँकि उससे परिचय नहीं था मेरा पर उसका साथ आना मुझे सुखद लगा। मैं तेज़ चलती, वह भी तेज़ चलती, मैं धीरे चलती वह भी धीरे चलती, मैं रुकती तो वह भी रुक जाती, बार – बार ऐसा करके यह निश्चित कर रही थी कि वह मेरे साथ ही चल रही थी या नहीं। मैं पेड़ - पौधे देखने लगती तो वह खड़ी होकर इधर - उधर देख रही होती जैसे कह रही हो इन्हें आप देखो मेरे तो ये सब देखे हुए हैं। जब मैं पुनः चलती तो वह फिर मेरे साथ - साथ चल पड़ती।

शैशववस्था लिये सुबह की धूप में उसके हल्के पीले रेशमी रोएँ सोने की तरह चमक उठे। वह मुझे बेहद प्यारी लगी, उसपर बहुत लाड़ आ रहा था पर मेरे पास उसे खाने को देने के लिए कुछ नहीं था , सुबह - सुबह न पैसे ही थे, न कोई दुकान जिससे खरीदकर कोई बिस्कुट का पैकेट वगैरह उसे दिया जा सकता। परंतु वह खाने - पीने के  इस लालच से दूर मेरे साथ ऐसे चलती आ रही थी, जैसे वह मेरी गंभीर अभिभावक हो। मैं पहाड़ी चिड़ियों का मधुर कलरव सुनने, पहाड़ की चोटी में से फव्वारे सा रंग छिटकाता हुआ सा उगता लाल - लाल सूरज और उसपर पसर आया बदली का झीना सा आँचल देखने, आसमान का अद्भुत रूप निहारने, पहाड़ों पर उनके विघटन के विरुद्ध, उनकी रक्षा में मुस्तैद खड़े घने पेड़ों पर पड़ती नरमी लिये सूरज की किरणें देखने में देर तक मग्न रही। इतनी देर वह भी बिना विचलित - बेचैन हुए, चुपचाप मेरे साथ ही खड़ी रही। अपनी दृष्टि भर या क्षमता के अनुसार पहाड़ी सौन्दर्य को खुद में समेटकर जब मैं घर की ओर लौटने लगी तो वह भी मेरे साथ लौट आई। और गुड्डू के घर के आगे खुले वरांडे के दरवाजे पर आकर चुपचाप खड़ी हो गई। जैसे गुड्डू से कह रही हो कि, देखो मालिक मैं तुम्हारी बुआ जी को घुमा - फिरा कर सुरक्षित वापस ले आई हूँ और वह आकर वरांडे में  बैठ गई चुपचाप। । तब मुझे पता चला कि यह गुड्डू की परिचिता है। पर उसे सुबह - सुबह भ्रमण पर मेरे साथ जाने की ज़िम्मेदारी का अहसास कैसे हुआ यह आश्चर्य की बात थी। 

उन दिनों गुड्डू की पत्नी उषा भी नैनीताल में मेहमान की तरह ही आती थी। उनके बड़े बेटे अभय की शिक्षा देहरादून में हो रही थी; क्योंकि उसने नैनीताल आने के लिए साफ इंकार कर दिया और मैं तो थी ही सप्ताह भर की मेहमान । अतः मुझसे और उषा से उस सारमेयी ने कुछ नहीं माँगा; पर गुड्डू बिस्तर से उठा, तो वह भी उठकर खड़ी हो गई। और उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हल्की- सी आवाज़ में ‘कूँ’ की, वह भी बस एक बार। गुड्डू जैसे उसकी उस ‘कूँ’ का अर्थ जानता था। वह उठकर सबसे पहले रसोई में ही गया और एक गिलास में दूध लाकर उसकी बरामदे में रखी  कटोरी में डाल दिया। वह उसे पीकर एक दो बार गुड्डू के चारों तरफ चक्कर लगाकर घूमने चली गई। नाश्ते के समय वह फिर लौटी और आकर चुप चाप बैठ गई।

उषा मेरे लिए स्वादिष्ट  व्यंजन बना रही थी, मुझसे भी पहले गुड्डू उसे चखा रहा था। गुड्डू के भीतर यों भी संसार के हर प्राणी के लिए अथाह प्रेम भरा है, फिर वह तो स्वयं भी गुड्डू को बहुत प्रेम करती थी, तो उसका प्रत्युत्तर गुड्डू न देता, यह तो संभव ही न था। नाश्ता करके मैं कुमायूँ विश्वविद्यालय के पुस्तकालय जाने लगी, वह तब भी मेरे साथ गई और तीन घंटे बाद जब मैं वापस लौटी, तब भी मैंने उसे पुस्तकालय के बाहर बैठे पाया। वह फिर घर तक मेरे साथ आई। आकर फिर उसने उषा का दिया खाना खाया और घूमने चली गई। खाने - पीने  व मेरे साथ घूमने का यह उपक्रम उसका रोज़ ही चलता रहा। विशेष बात यह थी कि अगर मैं बाकी घरवालों के साथ जाती, तो वह मेरे साथ नहीं आती। अगर मैं अकेली कहीं जा रही होती, तो वह मेरे पीछे - पीछे लग जाती मेरे मार्ग दर्शक की तरह। जैसे उसे पता था कि मैं उसके शहर में एकदम नई थी और मेरे साथ चलना उसकी ज़िम्मेदारी थी। आखिर मैं उसके मालिक की बुआ जो थी। 

गुड्डू उस सारमेयी को प्रेम तो बहुत करता, हर चीज अपने साथ खिलाता- पिलाता भी पर उसे कोई नाम न देकर, पुकारता उसे कुत्ती ही। इस पर मैं और उषा बहुत हँसते। आखिर हमने उसे अकस्मात ही जिह्वा पर आ गया एक नाम दे दिया, ‘पिंकी’। आश्चर्य हुआ कि पहली बार ही पिंकी नाम से पुकारने पर वह ऐसे दौड़ी चली आई, जैसे इस नाम को वह जन्म से सुनती आ रही हो। अब वह मेरे साथ घूमने जाती तो, मैं उसे पिंकी ही पुकारती और वह अपने पुकारे जाने पर प्रत्युत्तर में तुरंत मेरी तरफ देखती और अपनी थोड़ी लंबी- सी, सुनहरी पूँछ हिला देती, और अपने नरम गुलाबी कान भी हिलाती ।

मेरा प्रवास नैनीताल में एक सप्ताह का रहा। मेरा घूमने जाने का क्रम सप्ताह भर लगभग चला ही पर अंतिम दिन पिंकी मेरा साथ देने के लिए नहीं आई, न गुड्डू के लाड़ प्यार से खिलाए गए व्यंजनों को खाने ही वह आई। सुबह जब मैं घूमकर लौटी, तो मैंने गुड्डू से कहा, गुड्डू आज तो पिंकी मेरे साथ घूमने गई ही नहीं। गुड्डू ने लापरवाही से कहा- कहीं चली गई होगी घूमने- घामने। आ जाएगी थोड़ी देर में, पर वह नहीं आई। मेरा पुत्र वरुण और पुत्रवधू शिल्पा मुझे साथ ले जाने आ चुके थे। उसी रात को मेरी वापसी थी। पूरा दिन पिंकी के आने की उत्सुकता- भरी प्रतीक्षा रही। उस दिन उसके सिवा और कोई बात ही न हुई घर में, ज़ोर - ज़ोर से पुकारा भी, पर वह नहीं आई। घर का काम काज निपटाकर जब मैं और उषा बाहर आए, तो पड़ोसन ने बताया कि रात बाघ आया था। कुत्ते बहुत बुरी तरह भौंके थे और थोड़ी देर बाद शांत हो गए। सब कुत्ते मौजूद थे एक पिंकी को छोड़कर। मैं उस रात ही लौट आई नैनीताल से। पर क्या पिंकी के बिना शर्त वाले अनकहे प्रेम को, उसके जिम्मेदारी भरे सानिध्य को, उसकी भूरी आँखों से छलक़ते अपनेपन को  कभी भुला पाऊँगी मैं...■

प्रेरकः पिंजरे का संगीत और पहाड़ की गूँज

  - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल 

एक राज्य में एक बहुत ही कुशल बाँसुरी वादक रहता था। उसके पास दो शिष्य थे— आर्यन और कबीर।

एक दिन गुरुजी ने दोनों को अलग-अलग काम सौंपे। उन्होंने आर्यन को राजमहल के एक भव्य कमरे में भेजा, जहाँ सोने का एक पिंजरा था। उस पिंजरे में एक दुर्लभ पक्षी था। आर्यन का काम था उस पक्षी को समय पर सबसे उत्तम फल खिलाना, रेशम के बिछौने पर सुलाना और उसे जंगली जानवरों से बचाकर सुरक्षित रखना।

दूसरी ओर, गुरुजी ने कबीर को अपने साथ एक ऊँचे और पथरीले पहाड़ पर चलने को कहा। वहाँ पहुँचकर गुरुजी ने एक जंगली पक्षी की ओर इशारा किया,  जो तेज़ हवाओं के बीच एक पेड़ की टहनी पर बैठा था।

एक महीने बाद, गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और पूछा, "तुमने क्या सीखा?"

आर्यन ने गर्व से कहा: "गुरुजी, राजमहल का वह पक्षी सबसे सुखी है। उसे न भोजन की चिंता है, न शिकारियों का डर। वह दिन भर बस आराम करता है। उसे वह सब प्राप्त है,  जो एक जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए चाहिए।"

गुरुजी मुस्कुराए और फिर कबीर की ओर देखा।

कबीर धीमे स्वर में बोला: "गुरुजी, मैंने उस पहाड़ी पक्षी को देखा। उसे भोजन के लिए मीलों उड़ना पड़ता है। कभी बारिश में भीगता है, तो कभी बाज से अपनी जान बचाता है। लेकिन, जब वह सूरज ढलते समय अपनी पूरी ताकत से चहकता है, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज होती है। वहीं जब मैं आर्यन के साथ उस महल वाले पक्षी को देखने गया, तो वह सोने के पिंजरे में बैठा सिर्फ फड़फड़ा रहा था। उसके पास सब कुछ था, पर उसकी आँखों में चमक नहीं थी।"

गुरुजी ने दोनों को पास बिठाया और कहा: "जीवन में दो तरह की शांति होती है। एक वह, जो 'दबाव और सुरक्षा' से आती है- जैसे महल का वह पक्षी। वहाँ तुम्हारी ज़रूरतें तो पूरी होंगी, लेकिन तुम्हारी आत्मा मर जाएगी।

दूसरी शांति वह है, जो 'चुनौतियों और स्वतंत्रता' से आती है। पहाड़ का वह पक्षी जोखिम उठाता है, लेकिन वह अपनी पूरी क्षमता से आकाश को नापता है। असली खुशी सुरक्षा में नहीं, बल्कि स्वयं को खोजने के संघर्ष में है।"

शिष्यों को समझ आ गया कि केवल पेट भरना और सुरक्षित रहना 'जीना' नहीं है। असल में खुश वही है, जिसके पास अपनी उड़ान के लिए खुला आसमान है। ■

मोबाइल- 7838090732

कुंडलिया छंदः प्रहरी रक्षक देश के

 - परमजीत कौर ‘रीत’

1.

सीमा पर तैनात वे, सजग रहें दिन रैन ।

प्रहरी रक्षक देश के, छीनें अरि का चैन ।।

छीनें अरि का चैन, चनें नाकों चबवाते ।

हिमगिरि रेगिस्थान, धूल ही उसे चटाते ।

नहीं दिखाते पीठ, संकटों से घबराकर ।

'रीत' नमन हर बार, डटे हैं जो सीमा पर ।।

2

धीरे-धीरे धीर धर, बनता है विश्वास ।

अनजाने अपने बनें, रिश्ते जुड़ते पास ।।

रिश्ते जुड़ते पास, खजाना बढ़ता जाता ।

शुभचिंतक यदि साथ,दु:ख फिर नहीं सताता ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, मित्र यदि सच्चे हीरे ।

बन जाये अनमोल, मुद्रिका जीवन धीरे ।।

3.

धरती से बस वृक्ष तक, जिसका है आवास ।

एक मयूरी कब कहे, सारा नभ हो पास ।।

सारा नभ हो पास, नहीं की इच्छा मन में ।

छोटी भले उड़ान, बड़ी खुशियाँ जीवन में ।

पंखों से ले रंग, सँवारा आँगन करती ।

मुट्ठी- सा आकाश, और थोड़ी ले धरती ।।

4

करना है संघर्ष बस, कहती करतल रेख ।

चिंता से कब बदलते, किस्मत के आलेख ।।

किस्मत के आलेख, नहीं जब वश में अपने ।

मिला लेखनी कर्म, रंग भरने को सपने ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, जगत वैतरणी तरना ।

जीवन का संघर्ष, सभी को पड़ता करना ।।

5.

संघर्षों की धुंध से, फ़ीकी पड़े न आब ।

बैठ शूल की नोक पर, कहता यही गुलाब ।।

क़हता यही गुलाब, इत्र से रोज़ महककर ।

भले धूप या छाँव, सभी से मिलो चहककर ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, कथा लाखों वर्षों की ।

जिजीविषा से हार, हुई नित संघर्षों की ।।


प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं?

सुनकर क्या करते हैं?

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

“क्या आप अपने पौधों को संगीत सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं, जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भाँप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं। 

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियाँ  पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियाँ, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति और हॉरमोन नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जाँचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएँ , पौधे अच्छे से लहलहाएँ गे। (स्रोत फीचर्स) ■

कविताः आँखों में खिलते बसंत के फूल

  - अंजू निगम

कुछ आँखों में 

कभी शाम नहीं उतरती

और कुछ आँखों से

हमेशा रात लिपटी रहती है

सुनो न ऐ जिन्दगी 

तुमने क्यों भर दिया

कुछ आँखों में आषाढ़ का महीना 

या क्यों नहीं टूटती

कुछ आँखों से पूस की रात 

मैं तुमसे बात करूँगी ज़िन्दगी

जब कभी मिलूँगी किसी नुक्कड़ पर

अच्छा लगेगा जब देखूँगी

इन आँखों में 

खिलते बसंत के फूलों को।