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जंगल मास्टर के साथ प्रकृति का अध्ययन करते बच्चे |
- बृजेंद्र दुबे
ओडिशा के ढेंकानाल के चार गॉंव ऐसे हैं जहां के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…
ओडिशा के ढेंकानाल के चार गाँव ऐसे हैं, जहाँ के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…
ओडिशा, ढेंकानाल (कंकड़हाड) : गाँव में हर बच्चे का सपना होता है कि बड़े होकर किसी बड़े शहर में जाएगा, वहाँ पढ़ाई करेगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा। और ये सपने साकार भी होते हैं; लेकिन इन सपनों के साकार होने के साथ-साथ एक चीज है जो पीछे छूट जाती है। वो है गाँव व आसपास के क्षेत्रों का इतिहास और भूगोल। और अगर गाँव व आस-पास के क्षेत्रों में ज्ञान का समुंदर हो, तो समझ लीजिए अकसर वहाँ के ज्ञान की लहरें उनसे दूर हो जाती हैं।
ओडिशा के ढेंकानाल में कुछ गाँव ऐसे हैं, जो घने जंगलों से घिरे हुए हैं। इन जंगलों में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है और यहाँ इंसानों और जानवरों के बीच एक अनूठा रिश्ता है। यह रिश्ता आगे चलकर कमजोर नहीं पड़े, इसके लिए यहाँ बच्चों की एक अनोखी पाठशाला चलती है - “विज़डम वॉक”। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को समझने के लिए चलाई जाने वाली पाठशाला, किसी स्कूल में नहीं; बल्कि घने जंगलों में चलती है।
दरअसल ढेंकानाल जिले में पहाड़ों से घिरे चार गाँव - दानापासी, हडगारी, कंटोल गाँव और बालीकुमा गाँव के बच्चों के लिए यह पाठशाला चलती है। इस पाठशाला की शुरुआत बालीकुमा गाँव से हुई थी। गाँव वाले मानते हैं कि यहाँ के युवा निर्माण- कार्य, औद्योगिक मजदूरी और होटल सेवा व अन्य नौकरियों के लिए बाहर चले जाते हैं। नतीजतन, जंगलों से जुड़ा उनका पारंपरिक ज्ञान उन तक पहुँचा नहीं पाता। ऐसे में इस ज्ञान के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति से जुड़ा यह ज्ञान आजीवन साथ रहे इसके लिए जंगल मास्टर बच्चों को विज़डम वॉक पर ले जाते हैं।
कौन होते हैं ओडिशा के जंगल मास्टर?
ओडिशा के इन गाँवों में एक नहीं, दो नहीं बल्कि कई दर्जन जंगल मास्टर हैं। ये जंगल मास्टर किसी स्कूल के टीचर नहीं; बल्कि यहाँ के बुजुर्ग हैं, जो अब अपने काम से रिटायर हो चुके हैं। यहाँ के आदिवासी समुदायों के कुछ बुजुर्ग गाँव के बच्चों को हर सप्ताहांत ‘विज़डम वॉक’ पर जंगल में ले जाते हैं। इन्हीं बुजुर्गों को जंगल मास्टर कहा जाता है।
क्या सिखाते हैं ढेंकानाल के जंगल मास्टर?
जैसे हमारे दादा-नाना कहानियों के जरिए हमें लाइफ स्किल्स सिखाते हैं। ठीक वैसे ही यहाँ के जंगल मास्टर प्रकृति के बारे में बच्चों को रोचक ज्ञान देते हैं। जंगल की सैर के दौरान, यहाँ के बुजुर्ग बच्चों को दिखाते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में जंगल से मिले संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। कुछ उदाहरण जो जंगल मास्टर ने हमें बताए-
पौधे, जो दूर कर देते हैं सिरदर्द
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| कक्षा में बच्चों को पढ़ाते मास्टर जी |
जंगल मास्टर बताते हैं कि इंद्रजाल और महाकालरे जैसे पौधों का उपयोग लोग सिरदर्द को ठीक करने के लिए करते हैं। वहीं महासिंदु वह औषधि है, जो हर प्रकार के दर्द से राहत देती है।
मधुमेह और हृदय रोग व पेट की समस्या से दूर रखने वाले पौधे
अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग मधुमेह, हृदय और पेट की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। जंगल मास्टर केवल इन पौधों के नाम ही नहीं बताते हैं; बल्कि कैसे इन पौधों की पत्तियों व छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है यह भी बताते हैं।
त्वचा संबंधी रोगों में काम आने वाले औषधि-युक्त पौधे
विज़डम वॉक पर नियमित रूप से जाने वाले 10 वर्षीय इंद्रमणि दास ने बताया कि उन्होंने सीखा कि कैसे जयसंदा का पौधा शरीर पर पड़ने वाले चकत्तों से राहत देता है और त्वचा की चोटों को ठीक करता है।
जंगल के पेड़ कैसे देते हैं बारिश के संकेत?
विज़डम वॉक पर चर्चा करते हुए गाँव के सोहम दास ने बाताया कि बच्चों को अलग-अलग प्रकार के पौधों और जानवरों की पहचान करना और उन्हें मौसम का अंदाजा लगाना भी सिखाया जाता है। उन्होंने कहा, “हमें पता है कि अगर बारिश होने वाली होती है, तो दीमक पेड़ों से उतरना शुरू कर देती हैं। सूखे मौसम में अर्जुन के पेड़ की पत्तियों से पानी का टपकना भी बारिश के आने का संकेत देता है। ये सब बातें बच्चों को तो तभी पता चलेंगी, जब हम उन्हें बताएँगे।”
किन पेड़ों से निकलता है नारियल पानी जैसा पौष्टिक पानी?
सोहम दास ने आगे बताया कि इस दौरान बच्चों को दिखाया जाता है कि पीने के पानी के लिए किन पेड़ों का उपयोग किया जा सकता है और कैसे? उदाहरण के लिए, पलाश पेड़ की छाल में बने वी-आकार का कट लगाकर रस निकाल कर प्यास बुझाई जा सकती है। वहीं अटांडी लता के तने के सबसे मोटे हिस्से में एक सीधा कट लगाने से पानी निकलता है, जिसे इकट्ठा किया जा सकता है। ये पानी नारियल पानी जितना पौष्टिक होता है। इनके अलावा खजूर, बाँस और सियाली झाड़ी भी पानी देने वाले पौधे हैं।
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| विज़डम वॉक करते स्थानीय बच्चे |
विज़डम वॉक की हर सैर होती है दिलचस्प
गाँव के रहने वाले दयाशंकर बहेरा बताते हैं कि बच्चे हर सैर पर कुछ नया खोजते हैं जो इसे दिलचस्प बनाता है। उन्होंने कहा, “हम उन्हें बताते हैं कि फल और अन्य खाद्य पौधे कहाँ मिलेंगे और हम छोटे-छोटे खेल खेलते हैं, जैसे पत्तियों को ढूँढना और उन्हें मालाओं में पिरोना।”
दयाशंकर ने बताया कि किशोरों और युवा वयस्कों को जंगल के बारे में जानने में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी बच्चों को होती है। बच्चे न केवल हमारे ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में हमारी मदद करते हैं बल्कि प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक भी करते हैं।
कब से शुरू हुई ओडिशा की विज़डम वॉक?
दयाशंकर ने बताया कि बीते दो दशकों में लोगों का पलायन बढ़ा है। दूसरों को शहरों में नौकरी करते देख यहाँ के युवाओं का मन भी उधर ही लगने लगा और जंगलों से ध्यान लगभग हट गया। और तो और जिनका भविष्य अधर में लटक गया वो बुरी संगत में पड़ने लगे। ऐसे में यहाँ के बुजुर्गों को अहसास हुआ कि अगर इस ज्ञान को संजोकर रखना है तो बच्चों को छोटी उम्र से ही हमारी प्राकृतिक संपदा का महत्त्व बताना होगा। बस इसी बात को ध्यान में रखते हुए बुजुर्गों ने बच्चों को जंगलों की जानकारी देना शुरू किया।
दयाशंकर के अनुसार इस मुहिम ने औपचारिक रूप करीब सात साल पहले लिया जब गाँव वालों ने पद यात्रा शुरू कीं। शुरुआत में ये पद यात्राएँ गाँव तक सीमित रहती थीं और धीरे-धीरे ये यात्राएँ जंगल की ओर बढ़ गईं और फिर इसका नाम पड़ा विज़डम वॉक। उन्होंने बताया कि बच्चे अब जंगल जाने को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। उनमें से कई खुद ही जंगल में चले जाते हैं, और कुछ ने तो अपने आंगन में पेड़ उगाना भी शुरू कर दिया है। हम अपने वनों में रुचि लौटती देखकर उत्साहित है। (इंडिया वॉटर पोर्टल )