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Mar 1, 2026

उदंती.com, मार्च - 2026

चित्रः डॉ. सुनीता वर्मा
वर्ष- 18, अंक - 8

सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते। वे तो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो युवाओ के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से होता हैं, जिन्हें भयभीत होना नहीं आता। -भगतसिंह

अनकहीः  विरोध प्रदर्शन की यह कैसी परंपरा? - डॉ. रत्ना वर्मा

पर्व- संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली - पंकज चतुर्वेदी

आलेखः कृषि और आहार की सनातन संस्कृति  - प्रमोद भार्गव

शोधः प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर रहे टैटू - स्रोत फीचर्स

धरोहरः भो-रम-देव - तुझमें मेरा मन रमा रहे - राहुल कुमार सिंह

दस क्षणिकाएँ  - डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

आलेखः ऑनलाइन गेमिंग एक मकड़जाल - डॉ. सुरंगमा यादव

स्वास्थ्यः क्या च्यूइंग गम चबाने से तनाव कम होता है? - ज़ुबैर सिद्दिकी

कविताः तुझसे ही तो मेरी होली - शशि पाधा

कविताः मेरी बहनो! - अनिता मंडा

शब्द चित्रः मक्खी नाना - रविन्द्र गिन्नौरे

कविताः हे ऋतु राज - अपर्णा विश्वनाथ

किताबेंः ज़िन्दगी के लिए विटामिन- विटामिन ज़िन्दगी -  रश्मि विभा त्रिपाठी

रेखाचित्रः दादी को चरखो चलाता मालवी दादा... नरहरि पटेल  - ज्योति जैन

कविताः किलकारी खामोश हो रही - सतीश उपाध्याय

व्यंग्यःचना - पाठ का कुरता  - यशवंत कोठारी

लघुकथाः कुत्ते का खाना - दर्शन मितवा

कहानीः अकालग्रस्त इलाका - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

लघुकथाः ताज - आरती स्मित

लघुकथाः हैप्पी फ़ैमिली - आशा शर्मा

व्यंग्यः पाला बदलने की कला - डॉ. हरि जोशी

अनकहीः विरोध प्रदर्शन की यह कैसी परंपरा?

डॉ. रत्ना वर्मा
जब हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर होने वाली घटना की बात करते हैं, तो बात केवल एक कार्यक्रम या कुछ लोगों की हरकत तक सीमित नहीं रहती। वह सीधे-सीधे देश की छवि से जुड़ जाती है। हाल में एआई समिट के दौरान जो फूहड़ प्रदर्शन हुआ, उसे देखकर एक सामान्य नागरिक के मन में यही सवाल उठता है- क्या विरोध जताने का यही तरीका बचा है? क्या कपड़े उतारकर या मंच की मर्यादा तोड़कर अपनी बात रखना हमारी परंपरा है?
हम सब जानते हैं कि भारत में विरोध दशाने की परंपरा कोई नई परंपरा नहीं है। यहाँ आंदोलन हुए, धरने हुए, जेल यात्राएँ हुईं। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में विरोध की सबसे सशक्त धारा सत्याग्रह रही, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। उनका विरोध तीखा था, पर शालीन और संयमित उद्देश्य स्पष्ट था।  यही परंपरा लोकतंत्र की आत्मा है- विचारों का टकराव, पर आचरण में मर्यादा। जो आज के लोगों में तो है ही नहीं।

 पर उनमें भी एक सीमा होती थी। लोग अपनी बात पर अडिग रहते थे; पर व्यवहार में एक शालीनता, एक मर्यादा दिखाई देती थीं। आज अगर किसी को सरकार की नीति से शिकायत है, किसी निर्णय पर गुस्सा है, तो विरोध जताना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है; पर सवाल यह है कि क्या उस विरोध को इस तरह कपड़े उतारकर दिखाना जरूरी है कि पूरी दुनिया उसे देखे और भारत के बारे में गलत धारणा बनाए?

एआई समिट कोई सामान्य राजनीतिक सभा नहीं थी। वहाँ दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और निवेशक मौजूद थे। ऐसे मंच पर अगर कोई समूह अचानक अशोभनीय तरीके से प्रदर्शन करे, तो चर्चा मुद्दे से हटकर उसी घटना पर आ जाती है। तकनीक, विकास और सहयोग की बात पीछे छूट जाती है और सुर्खियाँ बनती हैं- “भारत में ऐसा हुआ।” यह चिंता की बात है।

कुछ अख़बारों ने लिखा कि यह सीमित लोगों का प्रदर्शन था, इसे बढ़ा-चढ़ाकर राष्ट्रीय संकट की तरह पेश नहीं करना चाहिए। उनकी बात में भी एक तर्क है। किसी देश की छवि इतनी कमजोर नहीं होती कि कुछ लोगों के व्यवहार से हमेशा के लिए खराब हो जाए। दूसरी ओर कई अख़बारों और चैनलों ने इसे शर्मनाक बताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए था। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। घटना छोटी हो सकती है, पर मंच बड़ा था; इसलिए असर भी बड़ा लगा।

अब सवाल उठता है- क्या केवल गिरफ्तारी, धरपकड़ और सजा देने से बात खत्म हो जाएगी? कानून अपना काम करेगा, करना भी चाहिए। अगर किसी ने नियम तोड़े हैं तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। पर क्या इससे सोच बदल जाएगी? अगर राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझाएँगे कि देश की छवि सबसे ऊपर है, तो ऐसी घटनाएँ फिर हो सकती हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि देश की संस्कृति महान है; पर संस्कृति केवल त्योहार मनाने से नहीं दिखती, वह सार्वजनिक व्यवहार में भी दिखती है। जब हम वैश्विक मंच पर होते हैं, तो हम किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, पूरे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। ऐसे में थोड़ा संयम, थोड़ा धैर्य, थोड़ा सोच-विचार बहुत मायने रखता है।

यह भी सही है कि लोकतंत्र में विरोध को देश विरोधी कह देना भी ठीक नहीं। हर असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है; पर उसी तरह यह भी सही है कि विरोध के नाम पर ऐसा व्यवहार, जो देश को असहज स्थिति में डाल दे, वह भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों को संतुलन सीखना होगा।

मीडिया की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। अगर हर घटना को सनसनी बनाकर दिखाया जाएगा, तो वह और फैलती है। कभी-कभी संयमित रिपोर्टिंग भी देशहित में होती है। वहीं राजनीतिक बयानबाजी से आग और भड़कती है। एक घटना को लेकर दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

हम आम नागरिक के तौर पर क्या चाहते हैं? बस इतना कि अगर आपकी किसी बात पर असहमति है, तो उसे दर्शाने का तरीका मर्यादित हो; ताकि दोनों पक्षों की गरिमा भी बनी रहे। देश की छवि किसी दल की जीत या हार से बड़ी है। दुनिया हमें हमारी उपलब्धियों से पहचाने, न कि हमारे विवादों से।

शायद हमें फिर से अपने आप से पूछना चाहिए- क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें ध्यान खींचने के लिए किसी भी हद तक जाया जाए? या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें विचारों की टकराहट हो; पर आचरण में शालीनता हो? अगर हम दूसरी राह चुनें, तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा और देश की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।
आखिरकार देश हम सबका है। सरकारें आती-जाती हैं, पार्टियाँ बदलती रहती हैं, नेता बदलते रहते हैं; पर देश की छवि और सम्मान महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए जब भी हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े हों—चाहे सरकार की तरफ से हों या विरोध में- यह याद रखना चाहिए कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। बाकी सब उसके बाद।

एक और बात, यदि भारत से बाहर के कुछ देशों में टकराव हो, तो उसकी प्रतिक्रिया में देश की सम्पत्ति में आग लगा देना सरासर देशद्रोह है। इस तरह के  नकारात्मक आन्दोलनजीवियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए।

पर्व- संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली

- पंकज चतुर्वेदी 
होली भारत में किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश की संस्कृति के रूप में होती है । वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती है, फागुन की सुरमई हवाएँ वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं । इन्हीं दिनों नई फसल भी तैयार होती है और किसानों के लिए यह उल्लास का समय होता है। तभी होली के बहाने नए अन्न की पूजा पूरे देश में की जाती है। यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह  अलग-अलग समय में त्योहार मनाए जाते हैं, जिनका असल मकसद तनावों से दूर कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश  के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है।

वास्तव में होली का अर्थ है – हो ली, यानी जो बीत गई सो बीत गई, अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे  मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो- रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व पर्यावरण का दुश्मन, नशाखोरी, रंग की जगह त्वचा को नुकसान पहुँचाने, आनंद की जगह भोंडे ऊधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और  परंपरा की मूल आत्मा को ही नष्ट  कर दिया है।

कहानियाँ, किवदंतियाँ कुछ भी कहें; लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश तो – स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य  खो दिया है और इसकी छवि पेड़ व हानिकारक पदाथों को जलाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाने और रंगों के माध्यम से जहर बाँटने की बनती जा रही है; हालाँकि देश के कई शहरों और मुहल्लों में बीते एक दशक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं।  हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता।

होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काटकर जलाने की है। वास्तव में होली भी  दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की ख़ुशी व्यक्त करने का पर्व है।  कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थ, मवेशियों के लिए चारा, जैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रौशनी  के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रहा जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले की माला अवश्य  डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जाकर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र करके रखते थे।

चूँकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सो, कंडे- उपले की जरूरत नहीं, तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। उपले की आँच धीमी होती है, लपटें ऊँची नहीं जातीं, इसमें नए अन्न – गेहूँ की बाली या चने के छोड़ (डण्ठल) को भूना भी जा सकता है, सो हमारे पूर्वजों ने होली में उपले के प्रयोग किए। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपटें आसमान से ऊँची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा जहरीला कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  एक बात और आदिवासी समाज में प्रत्येक कृषि  उत्पाद के लिए ‘नवा खाई’ पर्व होता है – जो भी नई फसल आई , उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है।

होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अष्टमी  का यह अवसर! शक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृष्ण  पक्ष पर  बासी खाना खाने का बसौड़ा। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले ही पक्की रसोई यानी पूड़ी कचौड़ी, चने, दही बड़े आदि बन जाते हैं। सुबह सूरज उगने से पहले होलिका के दहन स्थल पर शीतला मैया को भोग लगाया जाता है।

स्कंद पुराण शीतलाष्टक  स्तोत्र  के अनुसार-

‘वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।।’

अर्थात् गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूँ।

 शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं।  हकीकत में संदेश यही है कि यदि स्वच्छता रखेंगे, तो ये रोग नहीं हो सकते।

तनिक गौर करें, होली का प्रारंभ हुआ, घर-खलिहान से कूड़ा-कचरा बुहारकर होली में जलाने से, पर्व में शरीर पर विभिन्न रंग लगाए और  फिर उन्हें छुड़ाने के लिए रगड़-रगड़कर स्नान किया। पुराने कपड़े फटे व नए वस्त्र धारण किए और समापन पर स्वच्छता की देवी की पूजा-अर्चना की। लोगों को अपने परिवेश  व व्यक्तिगत सफाई का संदेश दिया। गली-मुहल्ले के चौराहे  पर होली दहन स्थल पर बसौड़ा का चढ़ावा चढ़ाया, जिसे समाज के गरीब और ऐसे वर्ग के लोगों ने उठाकर भक्षण किया, जिनकी आर्थिक स्थिति उन्हें पौष्टिक आहार से वंचित रखती है। चूँकि भोजन ऐसा है, जो कि दो-तीन दिन खराब नहीं होना, सो वे घर में संग्रह कर भी खा सकते है और फिर यही लोग नई उमंग-उत्साह के साथ फसल की कटाई से लेकर अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने का कार्य तपती धूप में भी लगन से करेंगे। 

इस तरह होली का उद्देश्य  समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेश  की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना है, यही इसका मूल दर्शन  है।

साभार (indiaclimatechange)

आलेखः कृषि और आहार की सनातन संस्कृति

  - प्रमोद भार्गव

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं

करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

  भारतीय ज्ञान परंपरा में यह भोजन का मंत्र है, जो आज भी गाया जाता है। आहार के प्रति सम्मान का द्योतक है। आहार का सीधा संबंध उदर से है। अतएव उदर को आहार का भंडार गृह भी कहा जाता है। भोजन ग्रहण करने के बाद शरीर में पोषण के लिए आवश्यक रासायनिक व शारीरिक क्रिया होती है। यही भोजन को पचाने का काम करती है। पाचन की प्रक्रिया इसे पचाकर सप्त धातुओं में बदल देती है।

    मानव जीवन अन्न पर निर्भर है। अन्न की उत्पादकता कृषि पर आश्रित हैं। कृषि के लिए उत्तम गुणवत्ता के बीजों की आवश्यकता रहती है। तथापि भोजन केवल कृषि से ही नहीं मिलता है, अपितु फल-फूल और जल व वन्य जीवों से भी मिलता है। परंतु उत्तम आहार अनाज की विभिन्न किस्मों और फलों को ही माना जाता है। इन सब भोज्य पदार्थों की उपलब्धता के तत्पश्चात भी दूध और शहद ऐसे आहार हैं, जिन्हें दंश रहित संपूर्ण आहार माना जाता है। इसलिए बीमारी की अवस्था में चिकित्सक दूध और फल के सेवन की सलाह देते हैं। ज्यादातर आयुर्वेदिक दवाएँ मधु ( शहद ) के साथ खाई जाती हैं। शुद्ध शहद हजारों वर्षा तक खराब नहीं होती। हड़प्पा-मोहन जोदड़ो के उत्खनन में पाँच हजार साल से भी ज्यादा पुराना शहद का भरा मिट्टी का मटका निकला था, जिसकी शहद खाने योग्य थी। हमारी सनातन संस्कृति में भूखा नहीं सोने की अवधारणा ऋग्वैदिक काल से ही प्रचलन में रही है। हमारा यही पारंपरिक बोध मनुष्य ही नहीं, पालतू पशुओं की भूख की चिंता करता है। इसीलिए प्रत्येक सनातनी के घर में पहली रोटी गाय के लिए बनाई जाती है। क्योंकि गाय दूध, दही, घी और मठा तो देती ही है, खेती-किसानी के लिए हलधर बैल भी देती है। इसलिए बच्चों के पालन- पोषण की तरह गाय की भी चिंता की जाती है। इन्हीं आदर्श नैतिक मूल्यों को समाज में स्थापित करने की भावना से भक्ति कालीन कवि कबीर दास कहते हैं,

‘साईं  इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए।

आपहुँ भूखा न रहे, साधु न भूखा जाए।

    अपरिग्रह की यह चेतना आज भी भारतीय सनातन समाज में व्याप्त है।

    सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही अन्न की आवश्यकता अनुभव हुई। इस समस्या के निवारण की दृष्टि से ही कृषि का आविष्कार हुआ। कृषि, अन्न और आहार एक-दूसरे के पर्याय हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है। कृषि कार्य में अनाज की उपलब्धता है और अनाज मानव जीवन की ऊर्जा है, अतएव कृषि को मानव कल्याण का साधन माना गया है। इसीलिए यजुर्वेद में राजा के प्रमुख कर्तव्य के बारे में कहा है कि वह कृषि की उन्नति करे, जिससे धन-धान्य में वृद्धि हो। सतपथ ब्रह्मांड में कृषि कार्य को चार प्रकारों में बाँटा गया है। एक, कर्षण (खेत की जुताई करना), दो वपन (बीज बोना), तीन लवण (पके खेत की कटाई करना) और चार मर्दन अर्थात दाएँ करके स्वच्छ अन्न प्राप्त करना। ऋग्वेद और अथर्ववेद में राजा वेन के पुत्र पृथु को कृषि विद्या का प्रथम आविष्कारक और इंद्र को पहला कृषक माना गया है। इंद्र ने मरुत देवों के साथ मिलकर सरस्वती नदी के किनारे की उर्वरा भूमि पर माधुर्य युक्त जौ की खेती की-

इमं देवा मधुना संयुतं यवं, सरस्वत्यार्मांध मणावचर्कृशुः।

इंद्र आसीत सीरपतिः शतक्रतुः कीनाषा आसन् मरुतः सुदानवः

-अथर्ववेदः6.30.1

    आर्य और अनार्यों के युग में जौ या गेहूँ की खेती बीज भूमि में फेंककर की जाती थी। कालांतर में हल का आविष्कार हुआ और खेती हलों में बैल जोतकर की जाने लगी। हल का उपयोग भविष्य में एक अस्त्र के रूप में भी हुआ। बलराम का अस्त्र हल ही है। वैदिक काल में हलेष्टि यज्ञ होता था। सम्राट हल चलाकर खेत में उत्तम फसलों के बीज बोते थे। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ यहाँ की अर्थ-व्यवस्था की नींव कृषि पर ही टिकी है। हल कृषि कार्य का प्रतीक है। वेद और रामायण काल में हल दहेज में दिया जाता था। वधू चरखा साथ लेकर ससुराल जाती थी। राजा जनक ने हल चलाया था। यही हल एक घड़े से टकराया तो उसमें से सीता उत्पन्न हुईं। महाभारत काल में राजा कुरु ने जिस क्षेत्र में हल चलाया था, वह कुरुक्षेत्र कहलाया। बौद्ध काल में राजा हल चलाते थे और रानी बीज बोती थी। हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान‘ का नारा देकर शौर्य और कृषि को चिह्नित किया था। लोक कवि घाघ ने कहा था, ‘हल लगा पाताल, मिट चला सब अकाल।’

     फसल में पौष्टिकता लाने के लिए वैदिक ऋषियों ने खाद के रूप में दूध, घी और शहद का मिश्रण डालने का उपाय किया था। उत्तम फसल के लिए धूप की भी आवश्यकता है। सूर्य की किरणों से फसल के पौधों को ऊर्जा मिलती है, भोजन के रूप में ग्लूकोज मिलता है। सूर्य की किरणें ही बीज में अंकुरण और वृद्धि का कारण हैं। वायु से फसल को कार्बन डाइऑक्साइड मिलती है। वैदिक युग में भिन्न फसलों की पैदावार प्रमुख रूप से होती थी। धान, जौ, उड़द, तिल, मूँग, चना, कँगुनी, छोटा चावल, साँवा, कोदो, गेहूँ और मसूर। दूध और उससे बनने वाले दही व घी का भोजन में सर्वाधिक प्रयोग होता था; क्योंकि इन्हें पौष्टिक एवं बलवर्धक माना गया है। ऋग्वेद में दूध में पकाए गए चावल का उल्लेख है, जिसे हम खीर कहते है। मिट्टी के घड़ों में भरे हुए दही का उल्लेख है, जिससे पनीर बनाया जाता था। घी में तलकर मालपूए बनाए जाते थे। जौ को कूटकर उसकी भूसी अलग करके भूनकर पीसते थे, उससे बने सत्तू को दही के साथ खाने का चलन था। इस सत्तू में आगे चलकर चना और गेहूँ के साथ मोटे अनाज का उपयोग भी होने लगा था, जिसका चलन वर्तमान में भी है।

  प्राचीन भारतीय समृद्धि और समरसता के मूल में प्राकृतिक संपदा, कृषि और गोवंश थे। प्राकृतिक संपदा के रूप में हमारे पास नदियों के अक्षय-भंडार के रूप में शुद्ध और पवित्र जल स्रोत थे। हिमालय और उष्ण कटिबंधीय वनों में प्राणी और वनस्पति की विशाल जैव-विविधता वाले अक्षुण्ण भंडार और ऋतुओं के अनुकूल पोषक तत्त्व पैदा करने वाली जलवायु थी। मसलन मामूली सी कोशिश आजीविका के लायक पौष्टिक खाद्य सामग्री उपलब्ध करा देती थी; इसीलिए नदियों के किनारे और वन प्रातंरों में मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति विकसित हुई। आहार की उपलब्धता सुलभ हुई तो सृजन और चिंतन के पुरोधा सृष्टि के रहस्यों की तलाश में जुट गए।

 आर्थिक संसाधनों को समृद्ध बनाने के लिए ऋषि-मनीषियों ने नए-नए प्रयोग किए। कृषि फसलों के विविध उत्पादनों से जुड़ी। फलतः अनाज, दलहन, चावल, तैलीय फसलें और मसालों की हजारों किस्में प्राकृतिक रूप से फली-फूलीं। 167 फसलों और 350 फल प्रजातियों की पहचान की गई। अकेले चावल की करीब 80 हजार किस्में हमारे यहाँ मौजूद हैं। 89 हजार जीव-जंतुओं और 47 हजार प्रकार की वनस्पतियों की खोज हुई। मनीषियों ने प्रकृति और जैव-विविधता के उत्पादन तंत्र की विकास सरंचना और प्राणी जगत के लिए उपयोगिता की वैज्ञानिक समझ हासिल की। इनकी महत्ता और उपस्थिति दीर्घकालिक बनी रहे, इसलिए धर्म व अध्यात्म के बहाने अलौकिक तादात्म्य स्थापित कर इनके, भोग के लिए उपभोग पर व्यावहारिक अंकुश लगाया। दूर दृष्टा मनीषियों ने हजारों साल पहले ही लंबी ज्ञान-साधना व अनुभवजन्य ज्ञान से जान लिया था कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई विकल्प नहीं है। वैज्ञानिक तकनीक से हम इनका रूपांतरण अथवा कायातंरण तो कर सकते हैं; किंतु तकनीक आधारित किसी भी आधुनिकतम ज्ञान के बूते इन्हें प्राकृतिक स्वरूप में पुनर्जीवित नहीं कर सकते ? तमाम दावों के बावजूद क्लोन से अभी तक जीवन का पुनरागमन नहीं हुआ है। गोया, हमारी कृषि एवं गौवंश आधारित अर्थव्यस्था उत्तरोतर विकसित व विस्तारित हुई। विकास का समावेशी रूप बना रहा। अपढ़ भी गरिमा के साथ स्वावलंबी रहा। नतीजतन हम अर्थ व वैभव संपन्न हुए और सोने की चिड़िया कहलाए।

   ऋषियों ने आहार प्रणालियों में विकास के साथ इनके महत्त्व का निर्धारण करते हुए इन्हें मुख्य रूप से तीन प्रकारों में विभाजित किया। सात्विक आहार, राजसी आहार और तामसिक आहार। सबसे प्रमुख सात्त्विक आहार माना गया; क्योंकि यह आध्यात्मिक विकास के लिए प्रेरित करने वाला माना गया है। इसमें फल-सब्जियां, दूध-दही, अनाज एवं दालें और कई फलों के दाने शामिल है। यह आहार मानसिक शांति और पवित्रता को बढ़ावा देने के साथ, इंद्रियों पर नियंत्रण भी करता है। इससे मानसिक विवेक का संयम बना रहता है। राजसी आहार तामसिक और राजसिक गुणों वाला होता है। इसे आध्यात्मिक उन्नति की दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है, क्योंकि इसमें तामसिक तत्वों की अधिकता होती है। यह तत्व मानसिक स्थिति में विचलन पैदा करते है। अतएव चित्त चंचल बना रहता है। इस तरह के भोज्य पदार्थों में तीखा और तला हुआ भोजन, मिठाई, तेज मसाले, शराब और अन्य नशीले पदार्थ शामिल हैं। तामसिक आहार को सनातन संस्कृति में उचित नहीं माना गया है। क्योंकि यह मानसिक अस्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होता है। इसे ग्रहण करने से क्रोध और कमुकता बने रहते हैं। इस आहार में मांस से बने भोजन और शराब शामिल रहते हैं।

      यदि हमारा भोजन पौष्टिक और पवित्र बना रहता है तो हम यजुर्वेद के उस मंत्र को साकार रूप में बदलने में सफल होंगे जो भोजन और ऊर्जा के बीच अंतर संबंध की व्याख्या करता है। शरीर को जिंदा रहने के लिए आहार की और आत्मा को अच्छे विचारों की जरूरत पड़ती है, जो शुद्ध और सात्विक भोजन से ही संभव है,

ॐ यन्तु नद्यो वर्षन्तु पर्जन्याः । सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु

अन्नवताम मोदनवताम मामिक्षगमयति एशाम राजा भूयासम्।

ओदनम् मुद्रवते परमेष्ठी वा एशः यदोदनः, पमावैनं श्रियं गमयति।

 यजुर्वेद में दिए इस मंत्र का अर्थ है, ‘हे ईश्वर! बादल पानी बरसाते रहें और नदियां बहती रहें। औषधीय वृक्ष फलें-फूलें और सभी वृक्ष फलदायी हों। मुझे अन्न और दुग्ध उत्पादन करने वालों से लाभ प्राप्त हो और ऐसी धरती का मैं राजा बनूँ। हे ईश्वर! थाली में रखा हुआ भोजन आपके द्वारा दिया प्रसाद है। यह मुझे स्वस्थ और समृद्ध बनाए रखेगा।’ साफ है, राजा प्रकृति और अन्नदाता से उत्तम भोजन की सामग्री देते रहने की प्रार्थना कर रहा है। यही प्रार्थना एक समय सभी सनातन संस्कृति के उपासक परमात्मा से करते रहे हैं।

सम्पर्कः  शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी  (म.प्र.), मो. 09425488224, 09981061100

शोधः प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर रहे टैटू

 एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि टैटू सिर्फ त्वचा पर डिज़ाइन बनाने तक सीमित नहीं रहते बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी असर डाल सकते हैं। स्विट्ज़रलैंड के शोधकर्ताओं ने टैटू में इस्तेमाल होने वाले तीन आम रंगों (काला, लाल और हरा) की जांच के बाद टैटू सम्बंधी दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठाए हैं।

अध्ययन में पाया गया कि टैटू की स्याही त्वचा में बनी रहने की बजाय शरीर के अंदर फैल जाती है। जब स्याही त्वचा की निचली परत (डर्मिस) में डाली जाती है, तो उसके बेहद छोटे-छोटे कण शरीर में भटकते-भटकते लसिका ग्रंथियों में जमा हो जाते हैं, ये ग्रंथियां प्रतिरक्षा प्रणाली की महत्त्वपूर्ण अंग होती हैं। ये कण कई सालों तक वहीं बने रह सकते हैं।

प्रतिरक्षा कोशिकाएं (जैसे मैक्रोफेज) इन कणों को तोड़ने की कोशिश में सफल नहीं होतीं और मरने लगती हैं। इस वजह से शरीर में हमेशा हल्की सूजन बनी रहती है। यह निरंतर तनाव प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर सकता है; खास तौर पर काली और लाल स्याही में यह प्रभाव अधिक देखा गया।

चूहों पर किए गए प्रयोगों में पाया गया कि टैटू की स्याही के सूक्ष्म कण कुछ ही घंटों में लसिका ग्रंथियों तक पहुँच जाते हैं और कम से कम दो महीने तक टिके रहते हैं। इस दौरान चूहों में कोविड-19 टीके के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कमज़ोर हो गई, जबकि हैरानी की बात यह थी कि पराबैंगनी विकिरण से निष्क्रिय फ्लू टीके के प्रति उनकी प्रतिक्रिया बेहतर हो गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों पर शोध ज़रूरी है, क्योंकि अलग-अलग टीके, टैटू स्याही के साथ अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

बहरहाल आज टैटू पहले से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय हो चुके हैं। लेकिन एक चिंता यह है कि टैटू की स्याही में लगभग 100 तरह के रसायन होते हैं, जिनमें कई औद्योगिक पिगमेंट भी शामिल होते हैं। यही वजह है कि अब कई देशों में निगरानी कड़ी की जा रही है। युरोप ने 2022 में रेस्ट्रिक्शन ऑफ हैज़ार्डस सब्सटेंसेस इन टैटू इंक्स एंड पर्मानेंट मेक-अप (REACH) नियम के तहत टैटू स्याही के लिए कड़े रासायनिक मानक लागू कर दिए।

टैटू जितने ज़्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को समझना और भी ज़रूरी हो गया है। अन्यत्र भी मानक लागू करने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

धरोहरः भो-रम-देव- तुझमें मेरा मन रमा रहे

 - राहुल कुमार सिंह

‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ कहे जाने वाले भोरमदेव में शब्दों के साथ भटक रहा हूँ। यह भटकना, रास्ता भूलना नहीं, रास्ते की तलाश भी नहीं, बल्कि मनमौजी विचरण है। भोरमदेव, शब्द पर बहुत सी बातें कही- लिखी गई हैं, भोरमदेव, बरमदेव है, ब्रह्म, बूढ़ादेव, बड़ादेव, इतने मत-मतांतर कि भरम होने लगे। अलेक्जेंडर कनिंघम 1881-82 में गजेटियर के हवाले से कहते हैं- The Great Temple of Boram Deo or Buram Deo। छत्तीसगढ़ में भिर्रा या भिरहा (Chloroxylon swietenia) कहे जाने वाले पेड़ को पड़ोसी पश्चिमी ओडिशा में ‘भोरम‘ कहा जाता है, इससे कोई रिश्ता बने न बने, शाब्दिक ही सही, मेल बनता है। भोरम के करीब का छत्तीसगढ़ी शब्द है, भोरहा यानी भ्रम, संदेह या भूल। शायद इसी भूल-भटक में राह सूझे, इसलिए फिलहाल इसे यहीं छोड़कर, उसके आसपास, अगल-बगल। कुछ नादान तोड़-फोड़ करनी हो तो ‘भो!रम देव’, ‘भोर-म-देव’, हे देव, भोर होते ही तुझमें मेरा मन रमा रहे।

भोरमदेव मंदिर

भोरमदेव, स्मारक का नाम है न कि गाँव का। इस स्मारक के साथ मड़वा महल और छेरकी महल भी हैं, गाँव हैं- छपरी और चौंरा। इनमें छपरी का छापर, छावनी या छप्पर नहीं, बल्कि सलोनी मिट्टी से से आया होगा। चौंरा का संदर्भ फणिनागवंशी शासक रामचंद्र के मड़वा महल शिलालेख, विक्रम संवत 1406 में है, जहाँ चतुरापुर या चवरापुर का उल्लेख है। ‘चंवरा’ शब्द यज्ञ वेदी के लिए तैयार की गई चौकोर समतल भूमि, ‘चत्वरक’ तद्भव रूप चउंक-चांतर से आता है। सती चौरा या माता चौंरा जेसे शब्दों में इस शब्द का आशय छोटा मंदिर या देवस्थान, निहित है। चौरा का ताल्लुक अब कबीरपंथी मान्यताओं से भी जुड़ गया है। एक गाँव लाटा है, जिसे लाटा-बूटा या लता-नार से संबंधित माना जाना है, मगर यह भी ध्यान रहे कि लाटा, गुफा, सुरंगनुमा, संकरे-बंद घिरे स्थान का- जहाँ लेट कर, सरक कर, रेंग कर जाना पड़े, का भी पर्यायवाची होता है। भोरम और हरम शब्द आसपास हैं, पास ही गाँव है ‘हरमो’, ईंटों वाली महलनुमा संरचना ‘सतखंडा हवेली’ के कारण यह गाँव चर्चित है। इसे कुछ ‘हरम’ से जोड़ कर देखते हैं तो दूसरी ओर एक आस्था ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य’ से जुड़ी है, जिससे संबद्ध कर हरमो को ‘हरि-नू’, गुजराती ‘हरि का’ भी मानने वाले हैं। इतिहास में काल-निर्धारण की दृष्टि से यह क्षेत्र फणिनाग, कलचुरि वंशजों, मंडला के गोंड़ तथा मराठों से जुड़ता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में योद्धा स्मारक और सती स्मारक प्रतिमाएँ शक्ति संतुलन के लिए होने वाले युद्धों का प्रमाण हैं।


सतखंडा हवेली, हरमो 

यह कछारी जमीन वाला इलाका है। जंगल-पहाड़ नदी-नाले और बांध-तालाब से बची रेतीली जगह- कछार, जिस पर छोटी और कंटीली झाड़ियों वाली वनस्पति, कछार में टिकने के लिए जड़ें मजबूत होनी चाहिए। कछार, धान के लिए उपयुक्त नहीं, लेकिन धान से ही तो काम नहीं चलता। जलधाराओं के नजदीक और पानी उतर जाने पर पाल कछार और उससे दूर पटपर कछार। यहाँ एक और कछार है- सरकी कछार, इस नाम की कई शास्त्रीय व्याख्या होती है, यह भी माना जाता है कि छेरकी ही सरकी बन गया, संभव है, क्योंकि स-द, छ-स होता रहता है, ज्यों रायपुर के पास का गाँव छेरीखेड़ी- सेरीखेड़ी। सरकी का जोड़ सरकना है यानी रेंगना या खिसकना, छत्तीसगढ़ी का सलगना- पेट के बल सरक- सरक कर चलना, सरीसृप की तरह। मगर यह भी संभव जान पड़ता है कि यह सरकी- चटाई या टाट (ज्यों टाट- पैबंद या टाटीबंद) यानी समतल-पटपर का समानार्थी है मगर ‘दादर’ से कुछ अलग।

संकरी नदी पर दुरदुरी आता है, जो तुरतुरिया, खरखरा, सुरसुरी की तरह पानी के बहाव से होने वाली ध्वनि से बना शब्द है। मगर यह सोचने का रास्ता दिखाता है कि जलधारा का बहाव कैसा है, स्थान पथरीला, रेतीला, चौड़ा-संकरा, छोटा-लंबा, कम-अधिक ऊँचाई वाला, धाराओं में बंटा हुआ या अन्य कुछ। जिस तरह का नाम है, यानि नामानुरूप ही ध्वनि सबको सुनाई देती है या इस पर सुनने वाले और आंचलिक भाषा का भी प्रभाव होता है। जलधाराओं की बात हो तो गंगा का स्मरण होता ही है और गंगा के लिए कहा जाता है- ‘गं गं गच्छति गंगा’।

बजरहा यादव जी ठेठवार मिले, मैं पूछता हूँ- देसहा, कनौजिया, कोसरिया, झेरिया, बरगाह, महतो? मुस्कुरा कर छोटा सा ‘पॉज’ देते मेरे इस ‘ज्ञान‘ को ध्वस्त करते हुए गर्व से बताते हैं-दुधकौंरा। दुधकौंरा सुनकर पहले तो रायपुर का मठ, दूधाधारी-दुग्धआहारी याद आया फिर ठेठवारों के ‘कौंराई’ का। मैं भी हार मानने को तैयार नहीं, कभी पाली-कटघोरा की ओर किसी कौंराई ठेठवार से मिला था, कौंराई से तुक जमाने की कोशिश करता हूँ, वे टस से मस नहीं होते। मड़वा महल में बैठे हैं, आसपास छेरी चराते हैं। अब इन दोनों महलों मड़वा और छेरकी की ओर ध्यान जाता है। महल, पत्थरों वाली पक्की इमारत के कारण नाम पड़ा होगा और मड़वा, इस मंदिर के साथ जुड़ी रोचक बात कि मंदिर के सामने का स्तंभयुक्त मंडप, शादी के मड़वा जैसा है साथ ही इस स्मारक का एक नाम ‘दूल्हादेव’ मंदिर प्रचलित रहा है। इस मंदिर की बाहिरी दीवार पर जंघा में विभिन्न मिथुन मूर्तियाँ हैं, कुछ अजूबी भी। गर्भगृह के सामने से बाईं ओर परिक्रमा शुरू करें, तो काम-कला वाली मिथुन प्रतिमाओं का ‘अजीबपन’ बढ़ता जाता है और आखिरी पहुँचते तक शिशु को जन्म देती नारी प्रतिमा है। मिथुन प्रतिमाओं के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ के नाम से इसकी ख्याति रही, खजुराहो काम- कला वाली मिथुन मूर्तियों का पर्याय बन गया। मंडपयुक्त संरचना, मड़वा वाले इस महल की मूर्तिकला से यह मान लिया गया है कि इस मंदिर की दीवार पर विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन के काम पुरुषार्थ के लिए ‘कामसूत्र’ का शिल्पांकन किया गया है, जो नर-नारी समागम- संसर्ग से संतानोत्पत्ति करते वंशवृद्धि के ज्ञान देने वाली मूर्तियों में जीवंत प्रशिक्षण वाली पाठशाला जैसा है। कहा जाता है, यहाँ भाई- बहन का साथ जाने का निषेध है, मगर ऐसा अब तक नहीं सुना कि विवाह के बाद इस मंदिर के दर्शन और परिक्रमा करने का नियम है।

पश्चिमाभिमुख मड़वा महल मंदिर
दक्षिणी जंघा पर प्रतिमाएँ

कछार और छेरकी या छेरी यानि बकरी-बकरे को जोड़ कर सोचने का प्रयास करता हूँ। छेरकी महल के लिए कहा जाता है कि छेरी चराते हुए, बरसात हो जाने पर बकरी चराने वाले चरवार इस मंदिर में शरण लिया करते थे, संभव है मगर लगता है कि इस कछारी इलाके में गोपालक भी बड़ी तादाद में बकरा-बकरी पालन करते हैं इसलिए छेरी- चरवार हैं। फिर बात आती है कि क्या कछार और छेरी का रिश्ता शब्द ‘छ-र’ से आगे भी कुछ है। गोवंश और अजवंश के एक खास अंतर की ओर ध्यान जाता है। अजवंश की उपरी और निचली, दोनों दंतपंक्तियाँ होती हैं, जबकि गोवंश की उपरी दंतपंक्ति नहीं होती, इसलिए दोनों की चराई में अंतर होता है। संभव है कि सामान्य मैदानी घास-पात गोवंश के चरने भरण-पोषण के लिए अधिक उपयुक्त होता हो और कछारी भूमि की वनस्पति अजवंश, बकरे, घोड़े और हिरण परिवार के जीवों के लिए। इस क्षेत्र में देसी बकरे ही पाले जाते हैं जो बौनी-नीची झाड़ियों और घास वाली चराई क्षेत्र में graze करते हैं लंबे और लटके कान वाले जमनापारी बकरे, जो graze के बजाय browse करते हैं, ऐसे चराई क्षेत्र के लिए अनुकूल साबित नहीं होते। ‘हरिन छपरा’ गाँव भी दूर नहीं है। उल्लेखनीय कि यहाँ नाम छेरी-छेरकी है, इसी तरह सरगुजा में प्राचीन मंदिर ‘छेरकी नहीं छेरका’ हैं। खैर! अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र न हो तो उस पर बहुत बातें करना अपनी जांघ उघाड़ने जैसा है, फिर भी इतना तो मुँह मारा ही जा सकता है।

छेरकी महल मंदिर

यहाँ एक परत और है, छेरकी महल के आसपास लीलाबाई यादव जी मिल जाया करती थीं और पूछने पर धाराप्रवाह कहानी सुनाती थीं- ‘देवांसू राजा बिना महल के राखय छेरिया, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरी-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाए। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आही अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हियाय हे। त आघू छेरी के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भुईयां म गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरी लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे।’

मैदानी छत्तीसगढ़ के गाँवों में गुड़ बनाने के लिए सामुदायिक गन्ने की पैदावार, सामुदायिक रूप से बरछा में ली जाती थी। बरछा, तालाब के नीचे की भूमि होती थी। अब भोरमदेव, कवर्धा क्षेत्र की एक पहचान शक्कर कारखाना और गन्ना उपजाने वाले इलाके की भी है। यहाँ संकरी नदी है। छत्तीसगढ़ में सांकर, संकरी जैसी संज्ञाधारी कई-एक हैं, जिनमें ओड़ार संकरी, संकरी-भंइसा, संकरी-कोल्हिया जैसे ग्राम नाम और संकरी नदी को इन सब के साथ जोड़ कर देखना होगा। संकरी, वर्णसंकर है? सांकर यानी संकल-जंजीर है? संकरा यानी कम चौड़ा है? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘अलकर सांकर’। संकरी नदी के करीब का एक नाम चैतुरगढ़-कटघोरा-कोरबा वाली शंकरखोला की जटाशंकरी-अहिरन। इस तरह संकरी, शिव-शंकर के पास भी है। और क्या इसका शर्करा-शक्कर से जुड़ा होना संभव है। पुराने अभिलेखों में शर्करापद्रक, शर्करापाटक, शर्करामार्गीय, गुड़शर्कराग्राम जैसे स्थान-क्षेत्र नाम आते हैं, ये नाम क्या शक्कर से संबंधित हैं या नदी के रेत-कण को महिमामंडित किया गया है- बुझौवल तो है ही, ‘बालू जैसी किरकिरी, उजल जैसी धूप, ऐसी मीठी कुछ नहीं, जैसी मीठी चुप।’

जेन अभ्यास होता है, जिसमें सारे विचार ‘मू’ के अव्यक्त में पहुँचकर मौन हो जाते हैं, ‘चुप’।

दस क्षणिकाएँ

 डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

1. पुरानी जड़ें

गहरी पुरानी जड़ें

समय के साथ सुस्थिर;

फलों का भार उठातीं

वृक्ष का विश्वास स्थविर!


2. हवा की बात 

पेड़ों के बीच से

हवा ला रही है

मौन संदेसे कितने,

रहस्य न जाने कितने;

तुम चाहो तो बूझो,

उसके सुकून को महसूसो 

और जीवन के प्रवाह में

उसी लय में बह लो!

3. पुराना पत्थर 

हरी घास से घिरा

काई सना पुराना पत्थर 

बुन रहा कथानक नया,

परत दर परत कह रहा 

कोई किस्सा अनकहा

अतिशय फिसलन भरा,

इसे समझ-बूझ सकेगा

कोई साहसभाव भरा!

4. आकाश

अगण्य संभावनाएँ लिए 

चतुर्दिक् नीलाभ की

अनंतता पुकारती है!

तोड़कर बंधन सारे 

मुक्त कर आत्मा को

स्वतंत्रता पुकारती है!

5. छाया

ज्यों-ज्यों दिन ढल रहा है

छाया बढ़ती जा रही है,

ज्यों-ज्यों सूर्य झुक रहा है

दुनिया बदलती जा रही है,

दिवस ने जो बीज बोए हैं

रात सहेजने आ रही है,

नई पौध की प्रतीक्षा में

छाया तम से निभा रही है!

6. पगडंडी

वन से गुज़रते हुए,

पहाड़ी रास्ते पर,

ऊँची हरी घास और 

पत्थरों के बीच से,

एक नया घुमाव,

एक नया अनुभव, 

हर क्षण आश्चर्य,

हर मोड़ पर विस्मय,

सतत अनिश्चितता,

एक नई चुनौती,

एक नई आशा,

हर पल पेड़ों का साथ,

मिट्टी की सुगंध साथ,

धूप की मंद किरनें साथ,

मैं अकेला नहीं -

निर्जन वन में!

7. साँझ 

ढल रही है साँझ।

थका माँदा दिन,

फीका-फीका दिन का शोर,

रात का मद्धम ऑर्केस्ट्रा,

गोधूलि मंच का संगीत,

झींगुर मस्त गा रहे हैं

प्रकृति की अद्भुत् लोरी।

एक सुखद सम्मोहक लय

हवा में समा रही है।

इस क्षण में जो भी हो रहा है

मन कहता है ठीक हो रहा है।

8. पर्वत

घिर आया अंधकार,

पर्वत शांत, शयन में लीन;

प्रकृति कर रही पुकार,

सब रहस्य उनके अधीन!

9. धरातल 

पाँव के नीचे

मही -

ठोस, शांत, सच्ची,

उसके दांत हैं ढके;

धरती -

तुम्हें थामे है अभी!

10. बूढ़े पेड़

झुर्रीदार छाल,

अनेक वर्षों के वृत्त,

हर वृत्त में काल -

भीतर तक अंकित;

सब कुछ देखा है

इन बूढ़े पेड़ों ने,

तुम कहीं छिप रहे हो,

तो छिप रहे हो किससे?

आलेखः ऑनलाइन गेमिंग एक मकड़जाल

 - डॉ. सुरंगमा यादव 

अभी कुछ माह पहले की एक घटना मन को आज भी आंदोलित  कर रही है, लखनऊ में ऑनलाइन गेम के जाल में फँसकर एक 13 वर्षीय किशोर ने, जो कि कक्षा छह का छात्र था, आत्महत्या कर ली। कारण वह 14 लाख  रुपये गेम में हार गया था। ये 14 लाख रुपये की बड़ी रकम  उसके पिता ने मकान बनवाने के लिए खेत बेचकर जमा की थी, जैसे ही किशोर को यह पता चला कि  पैसे गायब होने की जानकारी पिता को हो गई है, उसने डर के कारण फाँसी लगा ली। फ्री फायर बैटल रॉयल शैली का गेम है। बच्चे गेम में पसंद की चीजें खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं और लाखों गँवा देते हैं। 

   वर्ष 2022 से  सरकार ने इसे बैन  कर रखा है; लेकिन अभी भी यह चल रहा है । ऑनलाइन गेमिंग में पैसा लगाकर और भी  बहुत से लोग जान- माल का नुकसान उठा चुके  हैं। किशोर ही नहीं, बड़े भी इसकी लत में पड़ रहे हैं ।  छोटी कक्षाओं से लेकर दसवीं -बारहवीं, प्रतियोगी छात्र यहाँ तक की नौकरी पेशे वाले भी इसकी गिरफ्त में आकर आत्महत्या कर चुके हैं । यह किसी एक शहर की बात नहीं, पूरे देश में ऐसी घटनाएँ  हो रही हैं। पिछले दिनों झांसी में आठवीं में पढ़ने वाले  इकलौते बेटे की ऑनलाइन गेमिंग की लत से परेशान होकर माँ ने खुदकुशी कर ली, बेटा दोस्तों के साथ पबजी खेलता था। ऐसी घटनाएँ कितनी भयावह हैं ।ऑनलाइन गेमिंग की लत परिवार पर कहर बनकर टूट रही है। टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग के दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में सामने आ रहे हैं, जिसमें से एक ऑनलाइन गेम की लत भी है।

 आज कम  उम्र में ही बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि मिल जाते हैं, जो उन्हें पढ़ाई के एक सहायक उपकरण के रूप में दिए जाते हैं लेकिन वे इनका दुरुपयोग करने लगते हैं। बच्चों के अपने कमरे हैं, अपनी प्राइवेसी है। डिवाइस में पासवर्ड लगा कर रखते हैं, ऐप हाइड भी कर देते हैं, अलग विंडो बना लेते हैं। बच्चे मोबाइल व लैपटॉप में एक साथ कई ऐप खोलकर रखते हैं, किसी की आहट पाते ही झट से उसे बदल देते हैं। ज्यादा पूछताछ करने पर बच्चे क्रोधित होकर चीखते- चिल्लाते हैं, तथा कई प्रकार के आरोप -प्रत्यारोप माता- पिता पर ही लगाने लगते हैं। कमरे में माता -पिता की उपस्थिति असहज करती है। बच्चे टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट बन रहे हैं, ये अच्छी बात है; परंतु वे इसका गलत इस्तेमाल करके अपने लिए ही नहीं अपने घर- परिवार के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। सीधे -सादे  माता -पिता समझ नहीं पाते हैं; क्योंकि  वे टेक्नोलॉजी के इतने जानकार भी नहीं हैं।

ये तो एक -दो खेलों का जिक्र था, ऐसे ही कितने ही खेल हैं जो बर्बादी के कारण बन रहे हैं। पैसे कमाने का लालच भी एक बहुत बड़ा कारण है ऑनलाइन गेमिंग का। इनमें से कई खेलों का विज्ञापन चर्चित चेहरे भी करते हैं, विज्ञापन के अंत में एक चेतावनी की औपचारिकता भी रहती है कि अपने जोखिम पर खेलें इसकी लत भी लग सकती है; परंतु खेलने वाले इस पर ध्यान नहीं देते हैं। सबसे पहले इन विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए।

 सूचना, मनोरंजन व पढ़ाई में सहायक मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि घरों में कलह का एक नया कारण बन बन चुके हैं। फ़ोन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों को आक्रामक बना रहा है। किशोर ही नहीं, किशोरियाँ भी इस हद तक आक्रामक हो रही हैं कि  परेशान अभिभावक राज्य महिला आयोग की जन- सुनवाई में परामर्श के लिए पहुँच रहे हैं।

   आयोग की सदस्य मीनाक्षी भराला के अनुसार, “विभिन्न जिलों में होने वाली जन- सुनवाई में हर बार तीन -चार मामले ऐसे सामने आ रहे हैं, जिनमें माताएँ अपनी बेटियों के फोन अधिक इस्तेमाल करने से परेशान होकर मदद माँगने आती हैं। कई मामलों में नाबालिग बेटी को फोन चलाने से रोकने पर माँ पर हाथ उठाने या  हिंसक व्यवहार तक कर रही हैं (अमर उजाला 13-11-2025)।”

आयोग के अनुसार ही एक माँ ने जब अपनी बेटी को फ़ोन चलाने से रोका, तो उसने नाखून से उसका मुंह नोच लिया। संवेदनहीनता इस हद तक कि माँ  रोती रही और बेटी हँसती रही। आज एक डायलॉग जो अकसर बच्चे अपने माता- पिता से बोलते नजर आते हैं- ये उनकी ज़िन्दगी है, वह जैसा चाहें वैसा जिएँगे ये कोई और तय  नहीं करेगा।  आज फ़ोन के अधिक इस्तेमाल से बच्चे आक्रामक हो रहे हैं, वे चिड़चिड़े व झगड़ालू  हो रहे हैं। छोटी -छोटी बातों पर चीखते- चिल्लाते हैं तथा अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। बच्चों के मन की असंतुष्टि दिन- प्रतिदिन उनकी माँगों में बढ़ोतरी कर रही है तथा माता- पिता के साथ टकराव का कारण बन रही है। घर के सदस्य होटल की तरह अपने – अपने  कमरों तक सीमित हो गए हैं। बच्चा अपने कमरे में बैठकर कौन- सा गेम खेलता है, किससे  बात करता है, क्या चीज़ देखता है, यह समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है। बच्चे अपनी उलझनों को माता- पिता या घर के किसी अन्य सदस्य से बताना आवश्यक नहीं समझते। आज के बच्चे बड़ों को ये मान बैठे हैं कि उन्हें आज के समय का चलन नहीं पता है। उन्हें  लगता है कि यह न जाने किस युग की बात कर रहे हैं । डिजिटल दुनिया से ज्यादा जुड़ाव उन्हें वास्तविक जीवन से दूर करता जा  रहा है। आधुनिक माँएँ तो खुद ही बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप के आकर्षण में उलझा रही है । छोटे- छोटे बच्चों को कार्टून दिखाकर खाना खिलाया जा रहा है। धीरे- धीरे ये बच्चों की आदत बन जाती है कि जब तक वे कार्टून नहीं देखेंगे, तब तक खाना नहीं खाएँगे । थोड़ा बड़ा होने पर बच्चा खुद ही मोबाइल में कार्टून देखने लगता है। पहले उन्हें कुछ समय के लिए मोबाइल दिया जाता है, धीरे- धीरे उस समय को बच्चे थोड़ा और थोड़ा करके बढ़ा लेते हैं और इस तरह से बच्चे में मोबाइल देखने की आदत पड़ जाती है। बच्चों में यह लत भयावह रूप धारण न कर ले, इसके लिए हमें समय रहते सचेत होना पड़ेगा तथा बड़े बच्चों को धीरे- धीरे समझाकर या आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाकर इस लत  से छुटकारा दिलाना होगा।

स्वास्थ्यः क्या च्यूइंग गम चबाने से तनाव कम होता है?

 - ज़ुबैर सिद्दिकी

पिछले सौ साल से भी ज़्यादा समय से च्यूइंग गम सिर्फ मुखवास के तौर पर नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाली चीज़ के रूप में बेचा जाता रहा है। दावा किया जाता था कि च्यूइंग गम तंत्रिकाओं को शांत करता है और मन को हल्का करता है। आज वही दावे आ रहे हैं - फर्क यह है कि अब लग रहा है कि इसमें थोड़ा हाथ शायद मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान का भी है। 

हालाँकि, थोड़ी सतर्कता ज़रूरी भी है; क्योंकि ऐसे वैज्ञानिक दावे तब आ रहे हैं, जब कोविड-19 के बाद च्यूइंग गम की बिक्री तेज़ी से घटी है। कोविड-19 महामारी के दौरान अमेरिका में च्यूइंग गम का इस्तेमाल काफी कम हो गया था। लोग कम बाहर निकलते, कम मिलते-जुलते और साँस की ताज़गी की चिंता में कमी भी थी। अब कंपनियाँ लोगों को लुभाने के लिए च्यूइंग गम को मानसिक सेहत से जोड़कर पेश कर रही हैं।

च्यूइंग गम एक अजीब लत है। इससे कोई पोषण नहीं मिलता और यह जल्द ही बेस्वाद हो जाती है; फिर भी लोग इसे लंबे समय तक चबाते रहते हैं। क्यों?

यह सवाल वैज्ञानिकों को लंबे समय से परेशान करता रहा है। शोध बताते हैं कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान थोड़ा बेहतर होता है और कुछ हद तक तनाव कम होता है; लेकिन इसका कारण अब तक पूरी तरह समझ में नहीं आया है। दिलचस्प बात यह है कि मनुष्य हज़ारों सालों से च्यूइंग गम जैसी चीज़ें चबा रहे हैं।

पुरातात्विक सबूत बताते हैं कि मनुष्य करीब 8000 साल पहले भी चिपचिपी चीज़ें चबाया करते थे। स्कैंडिनेविया में पेड़ों की छाल से बनी प्राचीन गम मिली है, जिस पर दाँतों के निशान मौजूद हैं। कुछ निशान छोटे बच्चों के भी थे। इससे लगता है कि पुराने समय में गोंद चबाना सिर्फ औज़ारों के लिए गोंद नरम करने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों को इससे आनंद भी मिलता होगा। 

अमेरिका में च्यूइंग गम 

आधुनिक समय में च्यूइंग गम की शुरुआत अमेरिका में 1800 के दशक में हुई थी। अलबत्ता, च्यूइंग गम को लोकप्रिय बनाने का काम विलियम रिग्ले जूनियर ने किया। पहले साबुन और बेकिंग सोडा के साथ च्यूइंग गम मुफ्त दिए गए। लोकप्रियता बढ़ने पर 1890 के दशक में सिर्फ च्यूइंग गम का कारोबार शुरू कर दिया। 20वीं सदी की शुरुआत तक च्यूइंग गम हर जगह दिखने लगी। हालांकि इससे सभी खुश नहीं थे - सार्वजनिक जगहों पर च्यूइंग गम चबाने की आलोचना हुई और सड़कों पर थूके गए च्यूइंग गम से प्रशासन परेशान रहने लगे।

युद्ध में च्यूइंग गम

पहले विश्व युद्ध के दौरान विलियम रिग्ले ने अमेरिकी सेना को सुझाव दिया कि च्यूइंग गम सैनिकों के लिए फायदेमंद हो सकता है। उनका कहना था कि इससे भूख कुछ हद तक दबाई जा सकती है, दाँत साफ रहते हैं और तनाव कम होता है। सेना ने यह बात मान ली।

इसके बाद च्यूइंग गम सैनिकों के राशन का हिस्सा बन गई। अमेरिकी सैनिकों के साथ च्यूइंग गम युरोप, एशिया और बाकी दुनिया में फैली। इसी दौरान अखबारों में यह बातें छपने लगीं कि च्यूइंग गम चबाने से चिंता कम होती है, नींद अच्छी आती है और उदासी दूर होती है। इन्हीं दावों से वैज्ञानिकों की इसमें रुचि बढ़नी शुरू हुई।

शुरुआती अध्ययन

1940 के दशक में अमेरिका के बार्नार्ड कॉलेज में च्यूइंग गम पर किए गए शोध में पाया गया कि च्यूइंग गम चबाने वाले लोग थोड़ा कम तनाव महसूस करते थे और उनका काम करने का तरीका कुछ बेहतर लगता था। तब वैज्ञानिक यह नहीं समझ पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है।

कई साल बाद कार्डिफ युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक एंड्र्यू स्मिथ ने करीब 15 साल तक च्यूइंग गम चबाने के असर का अध्ययन किया। उनके कुछ शोध च्यूइंग गम बनाने वाली कंपनी के सहयोग से हुए थे, इसलिए नतीजों पर सवाल भी उठे। स्मिथ ने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त में कोई खास सुधार नहीं होता - लोग कहानियाँ या शब्द दूसरों से बेहतर याद नहीं रख पाते। अलबत्ता, कुछ और असर ज़रूर देखने को मिले। कई शोधों में यह बात सामने आई कि च्यूइंग गम के दो असर साफ हैं। पहला, इससे सतर्कता और एकाग्रता थोड़ी देर तक बेहतर बनी रहती है। दूसरा, कुछ स्थितियों में तनाव कम महसूस होता है।

अध्ययनों के अनुसार च्यूइंग गम चबाने से सतर्कता लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, खासकर तब जब काम बहुत लंबा, उबाऊ या मशीनी हो। जैव-मनोवैज्ञानिक क्रिस्टल हैस्केल-रैम्से के शोध में भी यही नतीजे मिले। उन्होंने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान लगाने में तब ज़्यादा मदद मिलती है, जब व्यक्ति पहले से थका हुआ या मानसिक रूप से बोझिल हो। लेकिन अगर कोई पहले ही पूरी तरह सतर्क है, तो गम से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। तनाव कम होने के मामले में, इसके असर के प्रमाण अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत पाए गए।

प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जब लोग सार्वजनिक भाषण देने या गणित के कठिन सवाल हल करने जैसे तनाव वाले काम के दौरान च्यूइंग गम चबाते हैं, तो उनकी घबराहट कुछ कम हो जाती है। अस्पतालों में हुए अध्ययनों में दिखा कि कुछ सर्जरी से पहले च्यूइंग गम चबाने वाली महिलाओं की चिंता कम थी।

हालांकि च्यूइंग गम कोई जादू नहीं है। बहुत ज़्यादा तनाव की स्थिति में - जैसे ऑपरेशन से ठीक पहले या बेहद कठिन हालात में - यह मददगार साबित नहीं होता। कुल मिलाकर, च्यूइंग गम मानसिक रूप से थोड़ा फायदा ज़रूर देता है। लेकिन इसके पीछे के कारण अब भी पूरी तरह समझ में नहीं आए हैं। अलबत्ता, कुछ संभावनाएं बताई गई हैं।

एक विचार यह है कि चबाने से चेहरे की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जिससे मस्तिष्क तक खून का प्रवाह बढ़ जाता है। दूसरी धारणा यह है कि मांसपेशियों की हल्की गतिविधि एकाग्रता में मदद करती है, जिससे दिमाग अधिक सक्रिय रहता है।

तीसरा विचार है कि चबाना शरीर की तनाव-नियंत्रण प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जो कॉर्टिसोल नामक हार्मोन को नियंत्रित करती है। यह हार्मोन सतर्कता और तनाव दोनों से जुड़ा होता है। अध्ययनों में इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं - कभी कॉर्टिसोल बढ़ा, जो ध्यान बढ़ने के संकेत है, तो कभी यह घटा, जो तनाव कम होने का संकेत है।

चबाना क्या नैसर्गिक आदत है? 

कुछ वैज्ञानिकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या चबाने की आदत बहुत पुराने समय से हमारे भीतर मौजूद है। कई जानवर तनाव में कुछ न कुछ चबाते हैं - जैसे कुत्ते खिलौने कुतरते हैं और शाकाहारी जानवर लगातार जुगाली करते रहते हैं। इसलिए माना गया कि शायद चबाना एक स्वाभाविक तरीके से मन को शांत करने वाली क्रिया हो।

लेकिन वैज्ञानिक एडम वैन कैस्टरेन इससे अलग बात कहते हैं। उनके अनुसार इंसान अपने करीबी प्राइमेट रिश्तेदारों की तुलना में बहुत कम चबाता है। चिंपैंज़ी दिन में 4–5 घंटे और गोरिल्ला करीब 6 घंटे तक चबाते रहते हैं, जबकि इंसान औसतन सिर्फ 35 मिनट ही भोजन चबाता है। खाना पकाने और औज़ारों के विकास से इंसानों को ज़्यादा चबाने की ज़रूरत नहीं रही, और बची हुई ऊर्जा मस्तिष्क के विकास में लगी।

इसलिए च्यूइंग गम को किसी पुरानी जीवन-रक्षा आदत का हिस्सा नहीं माना जाता। वैन कैस्टरेन का मानना है कि इसकी वजह कहीं ज़्यादा सरल है - इंसानों को बार-बार होने वाली हल्की और दोहराई जाने वाली गतिविधियां पसंद आती हैं।

सोचते वक्त लोग अक्सर पैर हिलाते हैं, पेन क्लिक करते हैं, स्ट्रेस बॉल दबाते हैं या कागज़ पर कुछ बनाते रहते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसी छोटी-छोटी दोहराई जाने वाली हरकतें लंबे काम के दौरान ध्यान बनाए रखने में मदद करती हैं।

कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी के शोध में पाया गया कि जब एकाग्रता के अभाव और अति सक्रियता (ADHD) से पीड़ित बच्चों को काम करते समय खुलकर हिलने-डुलने दिया गया तो उनका प्रदर्शन बेहतर रहा। च्यूइंग गम भी कुछ ऐसा ही काम करता है और दिमाग बेहतर तरीके से ध्यान लगा पाता है।

आज की तेज़ रफ्तार, स्क्रीन और तनाव से भरी दुनिया में च्यूइंग गम से मिलने वाली ज़रा-सी राहत शायद इसकी सबसे बड़ी ताकत है। वैज्ञानिक जब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर की हलचल मस्तिष्क को कैसे प्रभावित करती है, तब च्यूइंग गम हमें याद दिलाता है कि मस्तिष्क अकेले काम नहीं करता। कई बार जबड़ा हिलाने जैसी क्रिया भी हमारे सोचने और महसूस करने के तरीके को बदल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

कविताः तुझसे ही तो मेरी होली

 -  शशि पाधा

मन के मौसम कोरे-रीते

कितने सावन-भादों बीते

चैती-होरी, गीत फागुनी

तुम गा दो तो, हो ली होली।



पीला-संदली हुआ है अम्बर

धरती ओढ़े सतरंग चूनर

लाल-गुलाबी भोर हुई है

रंग बिखेरे फागुन जी भर

        

बेरंग मेरा अँगना देहरी 

तुम रंग दो तो, हो ली होली।

 

चोली लहंगा हुए पुराने

रंगरेजा के लाख बहाने

कहाँ रंगाऊँ चूनर धानी

गाँव हाट में कोई न माने

 

बंधी-धरी रंगों की पुड़िया

तुम घोलो तो, हो ली होली।

  

हवा में उड़ता केसर-चंदन

मुखरित है भंवरों का गुंजन

बिछुआ-पायल  भूले हँसना

भूल गया कंगना भी छनछन

 

हरी चूड़ियाँ, बिंदिया-झूमर 

तुम ला दो तो, हो ली होली

 

तुम कैसे जोगी बंजारे

गाँव-गली ढूँढें हरकारे

न चिट्ठी न पता ठिकाना

खुले रहे नैनों के द्वारे

 

पंछी यूँ घर लौट के आएं

तुम आओ तो, हो ली होली


कविताः मेरी बहनो!

 - अनिता मंडा


वे तुम्हारे पंखों को 

अनावश्यक बोझ बताकर

कतरने की कोशिश करेंगे

तुम होशियार रहना मेरी बहनो!

 

कहना उनसे-

अपने सपनों का बोझ

हम किसी के कंधों पर नहीं डालेंगे

मत डरो

 

वे तुम्हारे सपनों की कीमत 

हीरे जवाहरात से लगाएँगे

तुम इतनी कच्ची सौदागर मत बनना

हीरों की चमक से

अपनी आँखों को बचाना

 

वे तुम्हारे लिए संस्कृति का 

सिंहासन सजाएँगे

घर के बाहर बैठे हैं लुटेरे

कहकर डराएँगे

तुम डर पर नहीं

अपनी हिम्मत पर भरोसा करना

 

वे आँचल को 

परचम बनाने की बातों की

खिल्ली उड़ायेंगे

भूलना मत

हिम्मत की आँधियों में वे

राख की मानिंद उड़ जाएँगे

तुम अपनी आग को ज़िंदा रखना

राहतों का पानी तुम्हें

ख़ुद ही खोज लेगा।