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Nov 5, 2026

उदंती.com, नवम्बर- 2026

वर्ष - 19, अंक – 4

दीपक की लौ में एक सादगी है,

वह अँधेरे से लड़ती एक जिंदगी है।

 खुद को जलाकर जो राह दिखाए,

 सच्ची सेवा तो बस उसी की बंदगी है।

                            -भवानी प्रसाद मिश्र

इस अंक में

अनकहीः पर्व- त्योहार पर बढ़ता बाजार का शिकंजा -डॉ.रत्ना वर्मा

जलवायु परिवर्तनः इस साल ठंड कैसी होगी? - धीरज चतुर्वेदी

कविताः समंदर यूँ ही खारा नहीं हुआ - अर्चना अनुपम

आलेखः चितेरे हैं हम... - डॉ. महेश परिमल

पर्व- संस्कृतिः लुप्त होते लोकगीत - जेन्नी शबनम

आलेखः प्रकृति की मूक शिक्षा - मीरा गोयल

आपदाः अपनी बर्बादी का मुआवज़ा चाहता है नेपाल - प्रमोद भार्गव

लघुकथाः  पोर्टर  - भीकम सिंह

प्रकृतिः टाइडपूलिंग का मनोरम संसार - डॉ. रमाकांत गुप्ता

कविताः प्रवाह के पार - अनीता सैनी

स्वास्थ्यः ...प्लास्टिक के उपयोग को रोकना होगा -स्रोत फीचर्स

व्यंग्यः आओ शिकायत करें - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

लघुकथाः आर्द्रता - सन्तोष सुपेकर

लघुकथाएँ - 1.जन्म दिन, 2. बेटी का क़द, 3.अंतिम पंक्ति के... - आनन्द हर्षुल

दो कविताएँः 1. संस्कार, 2. बड़े बुजुर्ग  - डॉ. प्रगति गुप्ता

कहानी: कुकी  - शुभ्रा ओझा

लघुकथाः जयजयवन्ती - अन्तरा करवडे

किताबेंः संघर्षमय जीवन का दस्तावेज - प्रो. अश्विनी केशरवानी

दो कविताएँ- 1. हे पुरुष!, 2. खंडित मूर्तियाँ - डॉ .अंजुल चौहान

अनकहीः पर्व- त्योहार पर बढ़ता बाजार का शिकंजा

 - डॉ.रत्ना वर्मा

पर्व और त्योहारों का एक लंबा सिलसिला- गणपति बप्पा के साथ दस दिन, बीच में पितृ पक्ष, और उसके बाद फिर दुर्गा माता के साथ नौ दिन, पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए गए।  विजयादशमी पर रावण दहन भी उतनी ही धूमधाम और हंगामे के साथ संपन्न हुआ। और फिर आ गई है पूरे देश भर का सबसे बड़ा पर्व दीपावली - घर की साफ़-सफाई, लिपाई-पुताई के साथ, खूब सारे प्रकाश, खरीददारी, आतिशबाजी  और पकवानों की महक के साथ धनतेरस के लेकर लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और उसे बाद तुलसी विवाह तक लम्बे समय तक चलने वाला हमारी भारतीय संस्कृति की भव्यता को रेखांकित करने वाला महा उत्सव।

थोड़ा पीछे पलटकर कुछ दशक पूर्व की ओर देखें, तो आज परिवार, समाज, गाँव, और शहर सभी की जीवनशैली में ज़मीन-आसमान का बदलाव आ चुका है। पर्व-त्योहार हम तब भी मनाते थे और आज भी मनाते हैं, बस इन्हें मनाने के तौर-तरीकों में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है।

गणेश जी तब भी विराजते थे, हाँ पर तब हर गली, हर सड़क या हर मोहल्ले में कानफोड़ू डीजे की गूँज नहीं होती थी; पूरा गाँव शहर या मोहल्ला मिलकर एक निर्धारित स्थान पर ही गणेश जी की स्थापना करते थे।  पारंपरिक मूल्यों के अनुसार ही झाकियाँ बनती थीं; पर आज तो  स्थिति यह है कि तेज ध्वनि वाले डीजे और लाउडस्पीकरों के शोर ने बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है। हाल ही में ऐसी कई रिपोर्ट्स आई हैं जहाँ लगातार और अत्यधिक शोर के कारण बच्चों, बुजुर्गों के कान के परदे प्रभावित हुए और वे बहरेपन का शिकार हो गए।

दुर्गा पूजा का हाल भी कुछ ऐसा ही है। पहले पंडालों में दर्शन और मेलों का एक सहज आनंद होता था; लेकिन अब हर तरफ भव्यता दिखाने की होड़ है। भीड़ इतनी अनियंत्रित होती है कि प्रबंधन पीछे छूट जाता है। कलकत्ता जैसे बड़े शहरों के पंडालों में अत्यधिक भीड़ और कुप्रबंधन के कारण हुई भगदड़ में कई लोगों की अकाल मौत की खबर हमारे दिल को दहला देती है। आस्था का यह सैलाब जब भीड़ और भगदड़ में बदलने लगे, तो सोचना पड़ता है कि हम उत्सव मना रहे हैं या अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

रावण- दहन का भी यही हाल है। कभी गाँव या शहर के किसी एक बड़े मैदान में रावण जलता था और दूर-दूर से लोग उसे देखने आते थे। अब तो हर मोहल्ले और घर-घर में रावण जलाए जाने लगे हैं। फिर बात जब दीपावली की आती है, तो जहाँ कभी मिट्टी के दीयों की सरसों के तेल में पगी सोंधी रोशनी से घर जगमगाते थे,  वहाँ आज हर घर में सजी बिजली की लड़ियाँ आँखों को चौंधिया  देती हैं। इसके बाद आती है पटाखों की कानफोड़ू आवाज और उसके जहरीले धुएँ से हवा में घुलता जहर कि सांस लेना भी दूभर हो जाता है। यह प्रदूषण हमारे फेफड़ों और अस्थमा के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। इसके अलावा, त्योहारों के नाम पर बाजार में मिलने वाली मिठाइयों और खाद्य सामग्री मिलावट का खेल भी हमारी सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ है।

कुल मिलाकर त्योहारों के नाम पर चल रहे इस दिखावे और बाजारवाद का एक और कड़वा सच हमारी बदलती सांस्कृतिक जीवनशैली में साफ दिखाई देता है। अब त्योहारों में आनंद कम और शोर-शराबा तथा दिखावा बहुत अधिक है। इन दिनों बाजार हर चीज में ऑफर्स और डिस्काउंट की ऐसी बौछार करता है कि यदि हमने अभी खरीदारी नहीं की, तो हम किसी भारी नुकसान में रह जाएँगे। नवदुर्गा के नौ दिन और धनतेरस को तो शुद्ध रूप से खरीदारी का दिन ही बना दिया गया है। ऐसा लगता है मानों खुशियाँ अब बाज़ार से सामान खरीदने और पैसे खर्च करने से आने लगी हैं। इस अंधी दौड़ में हम यह भी भूल जाते हैं कि जिन दीयों को हम जला रहे हैं, उन्हें बनाने वाले कुम्हारों और पारंपरिक कारीगरों के घरों में अँधेरा है या उजाला। मॉल और बड़ी कंपनियों के चमक-दमक वाले सामान के आगे हम अपने ही देश के मेहनतकश कलाकारों की कला को भूलते जा रहे हैं।

इन सबके बीच जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वह है इंसानी रिश्तों और आत्मीयता का। पहले बड़े संयुक्त परिवार होते थे। त्योहार का मतलब था- मिल -जुलकर पकवान बनाना, हँसी-मज़ाक और एक-दूसरे के घर आना-जाना, पर आज शहरीकरण और फ्लैट संस्कृति ने हमें एकल परिवारों के संकरे दायरे में समेट दिया है।

अब दीपावली या किसी भी पर्व की शुभकामनाएँ आमने-सामने गले मिलने से बदलकर मोबाइल स्क्रीन और फॉरवर्डेड मैसेज तक सीमित हो गई हैं। रिश्ते अब सोशल मीडिया पर स्टेटस और स्टोरी अपडेट करने तक सिमटकर रह गए हैं, जहाँ दिखावा अधिक और सच्चा जुड़ाव कम दिखाई देता है। परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर सुकून के पल बिताना अब गौण बन गया है।

यदि हम इन तमाम विसंगतियों को गहराई से देखें, तो यह आत्ममंथन का समय है। आधुनिकता और विकास के इस दौर में हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि त्योहार केवल उपभोग, दिखावे या शोर-शराबे का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह हमारे मन को जोड़ने, प्रकृति का सम्मान करने और अपनों के साथ प्रेम बाँटने का अवसर हैं।

आइए, थोड़ा विचार करें और इस दीपावली हम बाजार के कृत्रिम दबाव से थोड़ा बाहर निकलें। रोशनी सिर्फ बिजली की लड़ियों और पटाखों से नहीं, बल्कि दिलों के जुड़ाव और जरूरतमंदों के चेहरों की मुस्कान से आनी चाहिए। अगर हम थोड़ी सी सादगी अपना लें, अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण का ध्यान रखें, और अपनों को वक्त दें, तो हमारे ये पर्व अपनी खोई हुई पवित्रता और सोंधी महक को फिर से वापस पा सकते हैं।

जलवायु परिवर्तनः इस साल ठंड कैसी होगी?

-  धीरज चतुर्वेदी

भारत में सर्दी अब पहले जैसी स्थिर ऋतु नहीं रह गई है। एक ही मौसम में कहीं घना कोहरा, शीतलहर और पाला पड़ सकता है, तो कुछ ही दिन बाद तापमान असामान्य रूप से बढ़ सकता है। आने वाली सर्दी—दिसंबर 2026 से फरवरी 2027—के बारे में अभी निश्चित, शहर-वार भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मौसमी पूर्वानुमान सर्दी के निकट आने पर अधिक विश्वसनीय होंगे। फिर भी, उपलब्ध जलवायु शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में सर्दियों का औसत तापमान बढ़ने की प्रवृत्ति है, जबकि अचानक पड़ने वाली शीतलहरों और घने कोहरे जैसी चरम घटनाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी।

भारत में सर्दी का स्वरूप केवल तापमान से तय नहीं होता। उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उत्पन्न होकर पश्चिम एशिया के रास्ते भारत आते हैं। इनके प्रभाव से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बर्फबारी होती है तथा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में वर्षा, बादल और ठंडी हवाएँ पहुँचती हैं।

जब पश्चिमी विक्षोभ के बाद उत्तर-पश्चिम से सूखी तथा ठंडी हवाएँ मैदानी क्षेत्रों में आती हैं, तब शीतलहर की स्थिति बन सकती है। साफ आसमान और हवा की गति कम होने पर रात में धरती तेजी से ठंडी होती है; इससे न्यूनतम तापमान गिरता है और पाला पड़ने की संभावना बढ़ती है। दूसरी ओर, बादल होने पर रात की गर्मी वायुमंडल में फँस जाती है, जिससे न्यूनतम तापमान बढ़ सकता है।

पूर्वी भारत में गंगा के मैदानी भूगोल, नमी और वायु प्रदूषण के कारण कोहरा अधिक गंभीर रूप ले सकता है। दक्षिण भारत में सर्दी अपेक्षाकृत हल्की रहती है, लेकिन वहाँ भी रात के तापमान, वर्षा और चक्रवाती गतिविधियों में बदलाव महसूस किया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन से भारत की सर्दी कैसे बदल रही है?

भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की 202 की रिपोर्ट, *Assessment of Climate Change over the Indian Region*, के अनुसार भारत का औसत सतही तापमान 1901 से 2018 के बीच लगभग **.7 डिग्री सेल्सियस** बढ़ा है। यह वृद्धि केवल गर्मियों में नहीं हुई है; न्यूनतम तापमान, रातों की गर्मी और सर्दियों के औसत तापमान में भी बदलाव देखा गया है।

जलवायु परिवर्तन का सामान्य प्रभाव यह है कि कड़ाके की ठंड वाले दिनों की दीर्घकालिक संख्या घट सधकती है और सर्दी की अवधि छोटी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तर भारत में ठंड खत्म हो जाएगी। विज्ञान की भाषा में औसत तापमान बढ़ना और चरम ठंड की घटनाएँ होना एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं। उदाहरण के लिए

, पूरे मौसम का औसत तापमान सामान्य से अधिक हो सकता है, लेकिन जनवरी में तीन-चार दिन की बहुत तेज शीतलहर भी आ सकती है।

इसी कारण आने वाले वर्षों में भारत को ‘कम ठंड” से अधिक ‘अनिश्चित ठंड” का सामना करना पड़ सकता है- अर्थात दिन गर्म, रात ठंडी; कुछ सप्ताह शुष्क, फिर अचानक बारिश; या लंबे कोहरे के बाद अचानक तापमान वृद्धि।

शहरों में यह बदलाव और अधिक जटिल है। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, कानपुर और पटना जैसे शहरों में कंक्रीट निर्माण, वाहनों, उद्योगों और घटते हरित क्षेत्र के कारण **शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव** बनता है। इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में, खासकर रात में, अधिक रह सकता है। इसलिए शहरों में सर्दियों का औसत तापमान बढ़ सकता है, भले ही शीतलहर के दौरान कुछ दिन बहुत ठंडे रहें।

सुपर एल नीनो क्या होता है?

एल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के असामान्य गर्म होने की घटना है। यह एक बड़ी समुद्री-वायुमंडलीय प्रणाली का हिस्सा है, जिसे एल नीनो-दक्षिणी दोलन या ENSO कहा जाता है। एल नीनो का असर दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा, तापमान, तूफान और सूखे के पैटर्न पर पड़ता है।

जब प्रशांत महासागर के नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान औसत से लगभग **2 डिग्री सेल्सियस या अधिक** बढ़ जाता है, तो उसे अनौपचारिक रूप से ‘सुपर एल नीनो” कहा जाता है। वर्ष 1982–83, 1997–98 और 2015–16 के एल नीनो बहुत शक्तिशाली माने जाते हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 2023–24 के एल नीनो को भी शक्तिशाली घटनाओं में गिना था।

हालाँकि, ‘सुपर एल नीनो” कोई औपचारिक, हर जगह समान रूप से प्रयोग होने वाला वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं है। यह भी जरूरी है कि किसी वर्ष एल नीनो होने का अर्थ यह नहीं कि भारत में सर्दी निश्चित रूप से गर्म ही होगी या मानसून निश्चित रूप से कमजोर होगा। मौसम पर हिंद महासागर, पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी बर्फ, स्थानीय हवाएँ और अन्य जलवायु कारक भी असर डालते हैं।

इस साल की ठंड पर एल नीनो का संभावित प्रभाव

यदि आगामी महीनों में शक्तिशाली एल नीनो की स्थिति सक्रिय रहती है या विकसित होती है, तो वैश्विक औसत तापमान पर गर्माहट का दबाव बढ़ सकता है। एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर से वायुमंडल में अतिरिक्त ऊष्मा पहुँचती है। जलवायु परिवर्तन से पहले से गर्म हो रहे वातावरण में यह अतिरिक्त प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है।

भारत में इसका संभावित असर निम्न प्रकार से देखा जा सकता है:

1. औसत तापमान अधिक रहना:** मध्य भारत, पश्चिमी भारत और कई शहरी क्षेत्रों में सर्दियों का औसत अधिक गर्म हो सकता है। रातों का तापमान भी सामान्य से ऊपर रह सकता है।

2. छोटे लेकिन तीव्र शीतलहर दौर:** औसत गर्म सर्दी के बावजूद उत्तर-पश्चिम भारत और हिमालयी क्षेत्रों से आने वाली ठंडी हवाएँ कुछ दिनों के लिए तेज ठंड ला सकती हैं। इसलिए शीतलहर की तैयारी आवश्यक रहेगी।

3. कोहरा और प्रदूषण:** दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में कोहरा केवल ठंड से नहीं बनता। नमी, हवा की गति, तापमान प्रतिलोमन और प्रदूषण इसकी तीव्रता तय करते हैं। अपेक्षाकृत गर्म सर्दी में भी हवा धीमी हो तो घना कोहरा और प्रदूषण बना रह सकता है।

4. रबी फसलों पर असर:** गेहूँ, चना, सरसों, आलू और मटर जैसी फसलों के लिए सर्दी महत्वपूर्ण है। यदि फरवरी और मार्च में तापमान जल्दी बढ़ता है, तो गेहूँ में दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वर्ष 2022 में मार्च की असामान्य गर्मी ने भारत के कई गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों में चिंता पैदा की थी।

आँकड़े और हाल के संकेत

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, भारत में तापमान संबंधी चरम घटनाएँ बढ़ती चिंता का विषय हैं। 2024 में देश ने लंबी तथा तीव्र हीटवेव का अनुभव किया, विशेषकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में। गर्मियों की यह बढ़ती तीव्रता इस व्यापक संकेत का हिस्सा है कि भारत की जलवायु तेजी से गर्म हो रही है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में 195 से 2015 के बीच गर्म दिनों और गर्म रातों की आवृत्ति बढ़ी है, जबकि कई क्षेत्रों में ठंडे दिनों और ठंडी रातों की प्रवृत्ति घटी है। इसका सीधा अर्थ है कि सर्दियों में तापमान का आधार स्तर पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रहा है।

वैश्विक स्तर पर भी WMO और यूरोपीय जलवायु सेवा कॉपरनिकस के आकलनों ने 2023 और 2024 को रिकॉर्ड गर्म वर्षों में शामिल किया। समुद्रों का लगातार गर्म होना भविष्य के एल नीनो, मानसून और मौसमी तापमान के प्रभावों को अधिक जटिल बना सकता है।

पश्चिमी विक्षोभ क्यों महत्वपूर्ण रहेंगे?

भारत की सर्दी के बारे में किसी भी अनुमान में पश्चिमी विक्षोभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि दिसंबर और जनवरी में पश्चिमी विक्षोभ बार-बार सक्रिय होते हैं, तो हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी तथा उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा हो सकती है। बादल और वर्षा कुछ समय के लिए रात का तापमान बढ़ा सकते हैं, लेकिन इनके गुजरने के बाद आने वाली ठंडी हवाएँ शीतलहर पैदा कर सकती हैं।

हिमालय में बर्फबारी का असर जल संसाधनों और कृषि पर भी पड़ता है। बर्फ पिघलने से नदियों को पानी मिलता है, पर जलवायु परिवर्तन हिमनदों और बर्फ के पैटर्न को बदल रहा है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2023 की रिपोर्ट ने हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान और हिमनदों के तेजी से पिघलने पर गंभीर चेतावनी दी है।

स्वास्थ्य, खेती और दैनिक जीवन पर प्रभाव

बदलती सर्दी का सबसे बड़ा असर कमजोर वर्गों पर पड़ता है। शीतलहर से बुजुर्ग, बच्चे, बेघर लोग, दिहाड़ी मजदूर और हृदय या श्वसन रोगों से पीड़ित लोग अधिक जोखिम में होते हैं। दूसरी ओर, गर्म दिन और ठंडी रात के बीच तेज उतार-चढ़ाव से सर्दी-जुकाम, श्वसन संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

किसानों के लिए मौसम पूर्वानुमान का उपयोग बहुत जरूरी होगा। पाला पड़ने की चेतावनी मिलने पर किसान सिंचाई, धुआँ करने या फसल ढकने जैसे उपाय अपना सकते हैं। गेहूँ और सब्जियों के लिए फरवरी-मार्च की गर्मी पर विशेष निगरानी चाहिए। पशुपालकों को भी ठंड और कोहरे से पशुओं को बचाने के लिए सूखा बिछावन, साफ पानी तथा हवा से बचाव की व्यवस्था करनी होगी।

निष्कर्ष

भारत में आगामी सर्दी के बारे में अभी यह कहना अधिक उचित होगा कि औसत तापमान पर गर्माहट का दबाव बना रहेगा, क्योंकि जलवायु परिवर्तन लगातार तापमान बढ़ा रहा है। यदि शक्तिशाली एल नीनो सक्रिय होता है, तो गर्म सर्दी की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन उत्तर भारत में शीतलहर, पाला, घना कोहरा और प्रदूषण के दौर फिर भी संभव हैं।

इसलिए आने वाली सर्दी का सबसे संभावित स्वरूप ‘कम ठंड” नहीं, बल्कि **असमान और उतार-चढ़ाव वाली ठंड** हो सकता है। सटीक स्थिति के लिए भारतीय मौसम विभाग के अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर 2026 के मौसमी पूर्वानुमानों पर ध्यान देना चाहिए। (indiaclimatechange.com से साभार)

कविताः समंदर यूँ ही खारा नहीं हुआ

  - अर्चना अनुपम

1.

समंदर क्या केवल खारा जल

गहराइयों तक?

दुख,वेदना का गहन-सागर नहीं..?

कोलाहल-नाद वेदना का

टीस-कसक की लहरें

क्या उठती भाप,

समंदर की आँखों की नमी नहीं..?

समा जाती मेघों मे नमी,

परिणित होती अश्रु बूँद में..

टपक पड़ती अथाह वेदना बन मेघों से!

ज्वार-भाटा लाता ऊफान-तूफान

वेदना आती-जाती तट पर

उफनता समंदर खारा-खारा..

अथाह वेदना समाने का बल है,

हौसला है, संकल्प भी ..

छिपा रखी अथाह वेदना समंदर ने अंतस् अपने..

कहते हैं, 'समंदर यूँ ही खारा नही हो गया'!

2.

मैं काँधे पर ना बैठी तुम्हारे !

आलकी कि पालकी वाली

बाँहों पर भी तो ना बैठी मैं..

काँधे की सुंदरता तुमसे ही सीखी

बाँहों की मजबूती तुमसे ही जानी

लड़खड़ाते कदमों को दृढ़ता से बढ़ाना

तुमने ही तो सिखाया..

किंतु हे पिता!

मेघों से जब बारिश होती है 

ढेरों-ढेर बूँदे टपकती हैं

महसूस होता है बूँदों में होगी तुम्हारी भी एक बूँद..

मैं भीगती हूँ बारिश में,

होती हूँ सराबोर स्नेह-जल से..

आँखों से मेरी भी टपक पड़ती है

खारी बूँद असंयमित होकर..

घुल -मिल जाती है बारिश-बूँदों में,

बूँदों को लेकर नदी जा मिलती है समंदर से..

कहते हैं, 'समंदर यूँ ही खारा नहीं हो गया'!

आलेखः चितेरे हैं हम...

  - डॉ. महेश परिमल

यह सच है कि प्रकृति से बड़ा कोई चितेरा नहीं हो सकता। यह हर पल अपना रंग बदलती है। पल-पल उसका रूप बदलता रहता है। उसे हर पल की जानकारी भी होती है। अपने व्यवहार से वह लोगों को रिझाती है, तो दूसरी तरफ सचेत भी करती है। उसके व्यवहार की यदि हम बारीकी से अध्ययन करें, तो समझ में आ जाएगा कि उससे बड़ा कोई शिक्षक है ही नहीं। प्रकृति के बीच रहकर भी हम नासमझ ही होते हैं। प्रकृति के साथ नासमझ के रूप में ही रहना सबसे अच्छा है। समझदार बनकर हम कभी भी प्रकृति को समझ नहीं पाएँगे। आपने देखा होगा कि जो प्रकृति प्रेमी होते हैं, उनकी कई हरकतें एकदम बच्चों जैसी होती हैं।

प्रकृति के संग रहते हुए हम अनजाने में कब उसकी तरह चितेरे बन जाते हैं, इसका भान हमें नहीं होता। अब देखो ना...हमारे पास किसी का फोन आता है, उनका नाम पढ़कर ही हम उसका चित्र अपने मस्तिष्क में बना लेते हैं। यदि फोन पर नाम नहीं आया, तो उसकी आवाज सुनते ही उसका एक काल्पनिक चित्र हमारी आँखों के सामने आ जाता है। यह बात हुई अभी की, इसके पहले यदि किसी का पत्र हमें मिलता था, तो हम पत्र पढ़ते हुए उसके काल्पनिक चित्र से बातें करना शुरू कर देते थे। कई बार लोग अपने आप में बुदबुदाते हुए मिलेंगे, वास्तव में वे अपने किसी खास परिचित से वार्तालाप कर रहे होते हैं।

सपना वास्तव में हमारे चित्रों की परिकल्पना ही है। उस दुनिया में रहते हुए हम एक के बाद एक कई जिंदगियाँ जी लेते हैं। अपने हिसाब से सारे काम कर लेते हैं। हम विमान भी चला लेते हैं, हम उड़ भी लेते हैं, हम कई लोगों से मुकाबला भी कर लेते हैं। ये सब हमारी कल्पनाओं में होता है। कल्पनाओं के इन चित्रों को आखिर बनाता कौन है‌‌? वह चित्रकार हम ही हैं। इस तरह की चित्रकला हमें प्रकृति से ही मिली है। पिता से यदि हमें संवाद करना होता है, तो हम उसकी पटकथा पहले ही लिख लेते हैं। इस पटकथा का चित्र हमारी कल्पना में पहले ही बन जाता है। लेखनी में तो वह बाद में आता है।

जब हम माँ के हाथ का लिखा हुआ पत्र पढ़ते हैं, तो हमारा अचेतन उन पत्रों के शब्दों में मां का स्नेह, दुलार, झिड़की, प्यार सब कुछ तलाशता रहता है। वही पत्र जब पिता का होता है, तो उसमें सख्त हिदायतें, कुछ नसीहतें, तो कुछ चेतावनियाँ भी होती हैं। इन सबके बीच हम उसमें उनका प्यार तलाश नहीं पाते। वास्तव में इन्हीं भावनाओं के बीच उनका प्यार होता है, जो हमें दिखाई नहीं देता। क्योंकि हमारे पास वह दृष्टि नहीं होती। वह दृष्टि हमें प्राप्त होती है, जब हम स्वयं ही पिता बन जाते हैं। चितेरे कई बार चित्रों के माध्यम से कुछ ऐसा बताने की कोशिश करते हैं, जो सामने होकर भी नहीं होता। पारखी आँखें इन्हें आसानी से तलाश लेती हैं।

वास्तव में हम सब कुशल चितेरे हैं। हमारी भीतर का चित्रकार समय-समय पर बाहर आता है, आते ही एक चित्र उकेरकर कहीं लुप्त हो जाता है। हम कुछ समझ पाएँ, तब तक देर हो चुकी होती है। अब हमारा काम होता है, उस चित्र को समझना। कई बार चित्र जल्द समझ में आ जाता है, कई बार देर से ही सही पर समझ में आ ही जाता है। नदी, जल, बादल, बारिश, धूप-छांव, सुख-दु:ख ये बस प्रकृति के बाहरी रूप हैं। असल रूप तो हमें इंसान के भीतर ही मिलते हैं। जहाँ प्यार में भीगी भावनाएँ, अपनापन, उलाहना, कटाक्ष, व्यंग्य सब कुछ होता है। यही प्रकृति का असली रूप है, जो इंसान के भीतर होता है।

यदि इंसान अपने भीतर प्रकृति को ही बसा ले, तो उससे सुखी कोई हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि तपस्या करते थे, तब अपने भीतर प्रकृति को बसाकर ही यह कार्य निर्विघ्न रूप से कर पाते थे। प्रकृति से दूर रहकर हमें अशांति के अलावा और कुछ भी नहीं मिलेगा। आजकल प्रकृति को व्यावसायिक रूप में देखा जा रहा है। जिसका असर हम सबने उत्तराखंड में देख ही लिया। प्रकृति केवल देना ही नहीं जानती, पर जब वह लेती है, तो बहुत-कुछ ले लेती है। तब इंसान के पास कुछ भी शेष नहीं रहता। किसी ने सही कहा है, पहाड़ को पहाड़ ही रहने दो, नदी को साफ मत करो, पर उसे गंदा भी मत करो। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दो।

गाय को माँ मत मानो, उसे एक प्राणी मानोगे, तो उसकी इज्जत कर पाओगे। माँ मानने से वह न तो सम्मान प्राप्त कर पाती है, न ही वह पूजनीय हो पाती है। उसे एक प्राणी मानोगे, तो उसका संरक्षण तो ही हो जाएगा, वह बेसहारा होकर रास्ते में नहीं भटकना होगा। नदी को भी माँ मत मानो, वह स्वच्छ हो जाएगी। विदेशों में नदी को माँ नहीं माना जाता, इसलिए वहाँ की नदियाँ स्वच्छ और सुंदर है। यहाँ भी हम एक चितेरे की भूमिका में होते हैं। गाय हो या नदी, हमने अपने भीतर उसे बालमन से ही अपने भीतर समा लिया है। हमारे अवचेतन में वह उसी रूप में स्थायी रूप से रह रही है। इसलिए नदी का गंदापन और गाय का बेसहारापन हमें दिखाई नहीं देता।

हमें अपने भीतर के चितेरे को सदैव जाग्रत रखना होगा। हमें सदैव नए चित्रों से परिचय कराता रहेगा, हमारा अवचेतन: क्योंकि हमारे अवचेतन में ही बसी होती है, संवेदनाएँ। यही संवेदनाएँ ही हमें मानव रूप के दर्शन करवाती हैं।