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Aug 1, 2026

उदंती.com, अगस्त- 2026

 वर्ष - 19, अंक - 1

"शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है
 जिसका उपयोग आप 
दुनिया को बदलने के लिए
 कर सकते हैं।" - नेल्सन मंडेला

अनकहीः  देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष  - डॉ. रत्ना वर्मा

यादेंः तीजन बाई के साथ वे दो घंटे  - डॉ. रत्ना वर्मा

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे  - रविन्द्र गिन्नौरे

आलेखः पत्रों में लोक-संग्राम - प्रमोद भार्गव

शौर्यः सिपाही बबली सिंह - हरी राम यादव

लघुकथाः दूसरा सरोवर - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

प्रसंगः लड़का और आयरिश टोपी  - आदित्य पाधा, अनुवाद : शशि पाधा

कविताः टूट रही है डोर - कृष्णा वर्मा

दो नवगीतः 1. गाँव की पगडंडियाँ, 2. उजालों का झरना - रमेश गौतम

दो संस्मरणः 1. कपड़े सुखाना भी एक कला है, 2. बाबू मोशाय  - अंजू खरबंदा

व्यंग्यः हम आजाद हैं -  विनोद साव

हाइबनः अगले जनम...  -  प्रियंका गुप्ता

कविताः ठहरा हुआ पल - भावना सक्सैना

लघुकथाएँः 1. आखिरी तारीख, 2. खरबूजा - सुकेश साहनी

लघुकथाएँः 1. काम,2. कोशिश 3. कोटा 4. कथा चलती रहे - स्नेह गोस्वामी

चिंतनः ख्वाबों का खयाल - डॉ. महेश परिमल

विज्ञानः क्या एआई भी  पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है?

 किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा- यात्रा पुरातन से नूतन  - विजय जोशी

अनकहीः देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

देश की राजधानी का जंतर-मंतर एक ऐसा स्थान जो कभी जन-आकांक्षाओं, सत्याग्रह और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतीक हुआ करता था, आज राजनीति की मुख्य प्रयोगशाला बन चुका है। कोई भी मुद्दा हो- चाहे वह किसानों की व्यथा हो, पहलवानों का सम्मान हो या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली को लेकर छात्रों का आक्रोश- जंतर-मंतर पर लगने वाले झंडे और नारे जल्द ही राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान का मंच बन जाते हैं।
किंतु इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, वह यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना उचित है? या फिर समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि समस्या केवल किसी एक नीति या घटना में नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिस्टम की बुनियादी जड़ों में है?
अक्सर देखा यह जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक घुसपैठ होती है, तो  ।मूल समस्या दरकिनार हो जाती है।  फिर चाहे समस्या कोई भी हो या नीतिगत कमियाँ, किसी भी आंदोलनों को जब दलगत चश्मे से देखा जाता है, तो सत्ता पक्ष उसे विरोधियों की साजिश मानकर खारिज करने लगता है और विपक्ष उसे भुनाने में लग जाता है; लेकिन इसमें पिसता कौन है? वे जो अपनी समस्या या अधिकार को लेकर न्याय की उम्मीद में आंदोलन पर बैठ जाते हैं।  आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं; लेकिन जब ये आंदोलन केवल सत्ता की चाबी पाने का माध्यम बन जाएँ, तो यह देश की लोकतांत्रिक चेतना के लिए घातक सिद्ध होता है।
यदि ताजा घटनाक्रम पर,  आएँ तो स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्षों बाद भी क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को एक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत माहौल दे पाए हैं? कड़वी सच्चाई तो यही है कि आज शिक्षा का क्षेत्र सेवा न रहकर एक अति-लाभकारी व्यवसाय बन चुका है।  
आज कोचिंग संस्थानों, निजी विश्वविद्यालयों और प्रश्न-पत्र लीक करने वाले गिरोहों का एक ऐसा मकड़जाल तैयार हो चुका है, जो युवाओं के सपनों का व्यापार करता है। सालों-साल मेहनत करने वालों के भविष्य के साथ जब पेपर लीक या प्रशासनिक गड़बड़ियों के जरिए खिलवाड़ होता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती- यह एक पूरी पीढ़ी के विश्वास की हत्या होती है।
परिणाम आज के युवा मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा के उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या यह भारत के युवाओं के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है? इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करते हुए सबसे पीड़ादायक प्रश्न यह उठता है कि हम उनके भविष्य को लेकर आज कहाँ खड़े हैं?
क्या हमारे तंत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ ऐसे लोग से भर गए  हैं, जो हर फैसले में केवल अपना निजी या राजनीतिक फायदा देखते हैं? जिस देश ने वसुधैव कुटुंबकम् और त्याग का दर्शन दिया, क्या उस देश में अपनी धरती, अपने लोगों और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचने का जज्बा खत्म हो रहा है?
यदि उत्तर हाँ है, तो यह हम पूरी मानव सभ्यता के लिए अत्यंत शर्म की बात होगी। एक समाज के रूप में हमारी सबसे बड़ी असफलता यही होगी कि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित, निष्पक्ष और प्रेरणादायक माहौल तक न दे सकें।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बदलाव आ ही नहीं सकता। आवश्यकता सिर्फ पहल करने की है । अब समय आ गया है कि हम समस्याओं पर केवल ऊपरी लीपा - पोती करना बंद करें और एक नए नजरिये से सोचना शुरू करें। हमें व्यवस्था में आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 
शिक्षा में व्यावसायिक माफियागिरी पर नकेल कसने के लिए सख्त कानून और उनका कड़ाई से पालन होना चाहिए। परीक्षाओं में तकनीक का ऐसा पारदर्शी उपयोग हो, जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश शून्य हो। धाँधली करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो उदाहरण बने। और सबसे जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े मुद्दों को राजनीति से परे रखा जाए। प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की सीधी जवाबदेही तय हो।  कितना ही अच्छा हो कि ऐसे  मुद्दों पर सभी राजनीतिक दल मिलकर एक राष्ट्रीय सहमति बना पाएँ।  हालाँकि आज के अवसरवादी राजनेताओं  के उद्देश्यहीन प्रलाप के कारण यह सम्भव नहीं है।
इन सबके साथ यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य और बेहतर जिंदगी देनी है, तो इसकी शुरुआत केवल सरकार से नहीं, बल्कि समाज और परिवार के स्तर से भी करनी होगी। हमें अपने परिवारों और समुदायों में ऐसे मूल्यों को सींचना होगा जहाँ ईमानदारी, परोपकार और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा जाए। यही नहीं नागरिकों को भी केवल मूकदर्शक बनने या दलगत राजनीति में बँटने की बजाय एक जागरूक प्रहरी की भूमिका निभानी होगी। 
तो समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसा परिवार, ऐसा समाज और ऐसा समुदाय बनाएँ जहाँ युवाओं के सपनों की कद्र हो। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जिसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों का नाम पूरी दुनिया में एक मिसाल की तरह लिया जाए। यही उन शहीदों और राष्ट्र-निर्माताओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने हमें एक खुशहाल, आजाद और स्वाभिमानी भारत की नींव सौंपी थी। याद रखिए -जो शिक्षा संस्कार नहीं दे सकती, जो शिक्षा राष्ट्र-प्रेम नहीं सिखा सकती, उस अराजक शिक्षा से  युवा -वर्ग का कोई भला नहीं हो सकता।

यादें/श्रद्धांजलिः तीजन बाई के साथ वे दो घंटे

                               दुनिया भर में गूँजी जिसकी हुंकार

                                                                    - डॉ. रत्ना वर्मा

हाल ही में छत्तीसगढ़ की उस महान पंडवानी लोकगायिका तीजन बाई का निधन हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की लोकगाथा 'पंडवानी' को सिर्फ देश ही नहीं; बल्कि सात समुद्र पार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई। राज्य सरकार ने उन्हें ससम्मान अंतिम विदाई दी और उनके नाम से राज्य सम्मान की घोषणा भी की।

खबर सुनते ही मन लगभग दो दशक पीछे चला गया। तब ‘उदंती’ की शुरुआत भी नहीं हुई थी, जब मैं भिलाई स्थित उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और यादगार बातचीत करने पहुँची थी। पिछले कुछ दिनों से मैं अपनी पुरानी फाइलों और हार्ड डिस्क में उस साक्षात्कार को ढूँढ रही थी। पर शब्द भले ही फाइलों की परत में कहीं गुम हो गए थे; लेकिन जब यादों का पिटारा खुला, तो उस दिन का एक-एक दृश्य और बातचीत की पंक्तियाँ स्मृतियों से निकलकर सामने आ गईं।

चलिए मैं आपको अपनी यादों के पिटारे के साथ ले चलती हूँ- तीजन बाई के उस छोटे से क्वाटर 6 बी में- 

भिलाई का वह क्वार्टर और तखत पर बैठी तीजन

बात उस दौर की है जब भारत सरकार से पद्मश्री, और पद्मभूषण पा चुकीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीजन बाई भिलाई स्टील प्लांट के सेक्टर-1, सड़क नं. 18 के क्वार्टर नंबर '6बी' में रहा करती थीं। (बाद में तो उन्हें पद्म विभूषण से भी अंलकृत किया गया।) मिलने के तय वक्त पर जब मैं पहुँची, तो पता चला कि वे खाना खा रही हैं। 

मैं उनके छोटे से बैठक खाने में रखी ट्रॉफियों और दीवारों पर टँगी तस्वीरों को देखने लगी। 19 मार्च 1988 को तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों पद्मश्री और 3 अप्रैल 2003 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों पद्मभूषण ग्रहण करती उनकी तस्वीरें। लाल साड़ी और छत्तीसगढ़ी पारंपरिक जेवरों में सजी, हाथ में तंबूरा लिये पंडवानी गाती उनकी छवि देखकर मुझे स्टेज पर ‘द्रौपदी चीर हरण’ के प्रसंग में उनका रौद्र रूप की याद आने लगा।

समय की रफ्तार के साथ आगे बढ़ते और कई विवादों को झेलते हुए तीजन बाई अपनी पंडवानी गायिका के साथ उसी बुलंदी के शिखर पर विराजमान और उतनी ही व्यस्त भी रहीं। भारत सरकार ने  जब उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया था, तब तीजन बाई को इसका गुमान तक नहीं था कि वे कितनी बड़ी पदवी राष्ट्रपति के हाथों लेकर लौटी हैं। अपने घर में वे उस दिन भी गनियारी गाँव की वही तीजन थीं, जो कभी अपनी संगी-सहेलियों के बीच खेल-खेल में ही महाभारत की कथा को गाकर सुनाया करती थी। मैं उनके जीवन के उतार -चढ़ाव के बारे में सोचते हुए उनका इंतजार कर रही थी कि तभी वे भोजन के बाद बाहर निकलीं। गीले हाथों को अपनी रोज पहनने वाली साधारण सी साड़ी से पोंछते हुए। बाल खुले थे, शायद तुरंत स्नान करके खाने बैठी थीं। हाथ में कंघी लिए वे मेरी बगल में आकर बैठ गईं और बाल सँवारते हुए इतनी सहजता से बातें करने लगीं, मानो परिवार का कोई सदस्य हाल-चाल पूछने आया हो। वे अपने रोज पहनने वाले पारंपरिक गहने पहने हुए थीं- कानों में झुमका और बारी, बाँह में गुदना, गले में हार, हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ , हाँ माथे पर उनकी पहचान वाली बड़ी- सी गोल बिंदी अभी वे लगा नहीं पाई थीं। 

चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लगातार यात्राओं की थकान भी। जब मैंने स्वास्थ्य  के बारे में पूछा, तो एक लंबी साँस लेकर बोलीं- “हाँ, कुछ न कुछ चलता रहता है।” तभी उनके सचिव मनहरण सखा ने उन्हें पान पेश किया। पान चबाते हुए वे आराम से बैठ गईं, जैसे कह रही हों- ‘पूछो, क्या पूछना है?’  वैसे तो वे हिन्दी में बातचीत कर रही थीं; पर  बीच बीच में छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए वे इतनी सहज हो गईं  कि न उन्हें और न मुझे समय का भान हुआ। 

वह ऐतिहासिक साक्षात्कार: तीजन बाई की ज़ुबानी

प्रश्न: क्या आपने कभी सोचा था कि गाँव (गनियारी) से शुरू हुआ यह सफर दुनिया तक पहुँचेगा?

तीजन बाई:  हँसते हुए... मुझे नहीं मालूम था कि मैं गाँव से निकलकर इतनी दूर विदेशों तक हवाई जहाज में यात्रा करूँगी। यह तो सब भगवान की कृपा है।

प्रश्न: कौन-सी बात थी, जिसने आपको 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी गाने के लिए प्रेरित किया?

तीजन बाई: मेरे नाना महाभारत की कहानी कहते थे। उन्हें महाभारत की पूरी कथा कंठस्थ थी। द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग सुनकर मुझे पूरी कहानी जानने की इच्छा हुई, तो मैं नाना से लुका के (छिपकर) उनको गाते हुए सुनती थी।

प्रश्न: छिपकर क्यों सुनती थीं?

तीजन बाई: मेहर ना, अपन नाना ल अब्बड़ डर्राववं (मैं अपने नाना से बहुत डरती थी)। उनके कमरे के बाहर दरवाजे के पीछे छुपकर बैठती थी। नाना बीच-बीच में उठकर चोंगी (सुलफी/बीड़ी का पारंपरिक रूप) पिया करते थे। एक दिन वे अचानक बाहर आ गए और मैं दीवार से चिपकी पकड़ी गई। उन्होंने पूछा- ‘कौन है तू?’  मैंने डरते हुए कहा- ‘मेह तीजन आंव’ (मैं तीजन हूँ)। उन्होंने पूछा कि - छुपा-छुपी खेल रही है, दाई ह मारीस हे के ददा ह खिसयाईस हे (माँ ने मारा है या पिता ने डाँटा है)? जब मैंने कहा कि नहीं, तो बोले- फिर क्यों छुपी है? मैंने डरते हुए कहा कि मैं आपकी कहानी छिपकर सुन रही थी। नाना बहुत खुश हुए और बोले- ‘चल अंदर बैठकर सुन।’ फिर वे मुझे रोज कथा सुनाने लगे।

प्रश्न: क्या नाना ही आपके गुरु थे? सार्वजनिक मंच पर पहली बार कब आईं?

तीजन बाई: हाँ, नाना ही गुरु थे। जब सीख गई और घर में पता चला तो,  माँ ने खूब मारा और तब मैं भागकर चंदखुरी गाँव आ गई। वहाँ मजदूरी करते हुए शाम को संगी-साथियों को नाना से सुनी सुनाई पंडवानी सुनाती थी। एक दिन गाँव के भूषण दाऊ ने मेरा गाना सुना, तो खुश होकर 10 रुपये दिए। उस ज़माने में 10 रुपये बहुत थे! फिर उन्होंने शाम को चौराहे पर शोलापुरी चादर से स्टेज बनवा दिया। तबला-हारमोनियम और रागी (हुंकार भरने वाला साथी) का इंतज़ाम किया। और इस तरह चंदखुरी गाँव के चौराहे पर मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। 18 दिन तक महाभारत कथा चली। उसके बाद तो गाँव-गाँव से बुलावे आने लगे, तब से गावत हव अऊ आज तक गातेच हव (तब से गा रही हूँ और आज तक गा ही रही हूँ)।

प्रश्न: जनता के सामने पहली बार गाते समय डर नहीं लगा?

तीजन बाई: ‘डर काबर लागही’ (डर क्यों लगेगा), हिम्मत अपने आप आती गई। जितनी ज्यादा पब्लिक आती, उतना ही ज्यादा आनंद आता। (बात करते हुए उनका अंदाज बिल्कुल वैसा ही था जैसे महाभारत का कोई प्रसंग सुना रही हों)

प्रश्न: आप पेरिस गईं, पूरे विश्व में घूम आईं। गाँव की याद नहीं आती? खुशी कहाँ ज्यादा मिलती है?

तीजन बाई: अपने गाँव में जो खुशी मिलती है, वह विदेश में कहाँ! विदेश में चार दिन अच्छा लगता है, फिर मन घर की ओर खींचता है। अपनी धरती पर आते ही लगता है कि घर आ गए। हम तो भारत की संस्कृति और परंपरा लेकर बाहर गए थे और वहाँ से वाह-वाही और ताली अपने देश के लिए लेकर आए। वही हमारी असली कमाई है।

प्रश्न: पेरिस यात्रा से लौटने के बाद भिलाई स्टील प्लांट में आपको पानी पिलाने की नौकरी मिली। इतने बड़े कलाकार के लिए यह काम छोटा नहीं लगा?

तीजन बाई: (बेहद गंभीर और सहज होकर) कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। कोई  समय था जब  हम मजदूरी करते थे न? बड़ा पद मिल जाने पर कोई अपनी मजदूरी के दिनों को तो नहीं भूल सकता- (और वे एक दार्शनिक की तरह बोलने लगीं) ‘कल्याण तभे होही जब पाछू मुड़ के घलो देखबे। जले रोटी के याद जब तक नई आही, तब तक मिठाई में स्वाद नई लागय’ (कल्याण तभी होगा जब पीछे मुड़कर भी देखोगे। जली हुई रोटी की याद जब तक नहीं आएगी, तब तक मिठाई का स्वाद समझ नहीं आएगा)  स्टील प्लांट ने मुझे नौकरी दी, यही बड़ी बात है। उन्होंने मुझे विदेश जाने से कभी नहीं रोका, वहीं से मेरे आगे बढ़ने की सीढ़ी बनी। 

प्रश्न: इतनी व्यस्तता के बाद घर-परिवार कैसे सँभालती हैं?

तीजन बाई: घर का जीवन वैसा ही है, जैसे गाँव में रहता था। खाना बनाती हूँ, सब्जी बनाती हूँ, लइका मन ल देखथव (बच्चों को देखती हूँ)। रंक को राजा और राजा को रंक बनाना प्रभु का काम है। ‘कोनो दिन मोर स्थिति डाँवा-डोल हो जाही, त लोग हांसही न, कि वो दिन तो हीरोइन बने रहीस, अभी जीरो निकल गे! त ये कहे के नौबत झन आवे’ (कल को स्थिति खराब हुई तो लोग हँसेंगे कि कल तक हीरोइन बनी थी, आज जीरो हो गई। यह नौबत न आए, इसलिए जो है उसी में गुज़ारा कर लो)। यह कहते हुए वे भावुक हो गईं- हम बहुत गरीब घर की लड़की हैं। जब हम फटे-पुराने कपड़े पहनते थे, कई बार ब्लाउज तक नहीं होता था... उन दिनों को याद करती हूँ, तो जी थक जाता है। इसलिए हम बड़े घमंड या चरित्र में नहीं जीते।

  मैंने तुरंत प्रसंग बदलना उचित समझा क्योंकि मैं जानती थी तीजन का बचपन कितने मुश्किल दौर से गुजरा है। 

प्रश्न: महाभारत का कौन- सा प्रसंग आपको सबसे प्रिय है?

तीजन बाई: मुझे भीमसेन का प्रसंग सबसे ज्यादा पसंद है। भीम का रौद्र रूप और जोशीला अंदाज मुझे अपनी ओर खींचता है।

प्रश्न: आगे कब तक पंडवानी गाने का इरादा है?

तीजन बाई: वह मालिक की मर्जी। जितनी दूरी की उसने ‘ड्यूटी’ दी है, वहीं तक जाना है। मेरी ड्यूटी खलास, तो मैं चुप हो जाऊँगी।

अमर रहेगी वह हुंकार

इतना कहकर तीजन बाई जी उठने लगीं – “अब मुझे ड्यूटी जाना है” मैंने उनसे थोड़ा रुकने का अनुरोध किया और तस्वीर लेने के लिए कैमरा निकाला। उन्हें समय पर पहुँचना था, वे मुस्कुराते हुए कैमरे की ओर बगैर देखे, कंघी लेकर अपने बाल काढ़ने लगीं । इतने में बीएसपी की गाड़ी उन्हें लेने आ पहुँची थी।  वे भीतर गईं  माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाकर कंधे में एक झोला लटकाकर गाड़ी की ओर बढ़ गईं ... मैं भी उनसे विदा लेकर बाहर निकल आई।

छोटी उम्र में ही घर छोड़ देने से लेकर, गाँव, शहर से होते हुए विदेशों तक पहुँचने वाली तीजन बाई को लेकर भले ही कई विवाद खड़े हुए हों, लेकिन तीजन बाई की माटी से जुड़ी सादगी ने कभी इन विवादों को तूल नहीं दिया। वे अंत तक गनियारी गाँव की वही सहज तीजन बनी रहीं, जिसके लिए ‘भीम की गदा’ बना उनका तंबूरा ही सब कुछ था। 

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं और वे अपनी ‘ड्यूटी’ पूरी करके अनंत की यात्रा पर चली गई हैं, तो लगता है कि कागज़ के पन्नों पर दर्ज साक्षात्कार भले ही कहीं खो जाएँ, लेकिन तीजन बाई की वह हुंकार, तंबूरे की तान और उनका ज़मीन से जुड़ा व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा। तीजन बाई को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

सावन मास की अमावस्या, जब वसुंधरा हरित परिधान ओढ़ लेती है। गाँव- गँवई के खेत खलिहान, नदी, तालाब जल से छलक- छलक उठते हैं। खेतों में धान के बिरवा हर ओर हरियाते नज़र आने लगते हैं जो हवाओं के साथ लहराते दिख पड़ते हैं। खेती- किसानी का काम संपन्न हो जाता है और तब मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार 'हरेली'। छत्तीसगढ़ की परंपरा, संस्कृति और आस्था को संजोकर जन कल्याण की भावना के साथ मनाई जाती है 'हरेली'।

लोक पर्व हरेली के दिन सुबह- सुबह हर दरवाजे पर नीम की एक डाल खोंची जाती है। वहीं गाँव के लुहार देहरी पर एक कील ठोंकते हुए नज़र आते हैं। किसी अनिष्ट की संभावना से बचने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। गाँव का हर वर्ग हरेली में अपनी अपनी- अपनी भूमिका निभाता है। राऊत, बढ़ई, लोहार, बैगा, गुनिया सभी भागीदारी निभाते हैं। गाँवों में सुबह से ही हर ओर उल्लास और उमंग से भरे लोगों का हुजूम दिख पड़ता है। मस्ती से भरे ठिठोली करते हुए बच्चे गेड़ी चढ़ गाँव की गलियों में दौड़ लगाते हैं। हर ओर बच्चों की टोली का शोर सुनाई पड़ता है।

  धान के लहलहाते खेतों को देख महसूस होता है कि हर ओर हरियाली फैली हुई है। आकाश में बादलों की गरजना, कहीं रिमझिम बरसते मेध, तो कहीं दूर कौंधती बिजली मानो प्रकृति भी हरेली का स्वागत करने आतुर हो उठीं हो। पर्यावरण, संरक्षण, संवर्धन का संदेश देते, वहीं कर्म को बल देते, गाँव में आपसी सौहार्द को अपने में समेटे हुए मनायी जाती है 'हरेली'। अपने श्रम सीकरों से फसलों के लिए किसान अपने कृषि औजारों, गोधन की साज संभाल करते हैं। अनजाने अनिष्टों से बचने के लिए अनुष्ठान करते हैं। इसी के साथ उल्लासित होते मनती है 'हरेली'।

पशु कल्याण –

गोधन संस्कृति गाँव को आर्थिक स्वालंबन देती है। गोधन संवर्धन के लिए राऊत आज भी अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं, जो सतत पशुओं के कल्याण में लगे रहते हैं। हरेली के पहले ही जंगल में जाकर भांवर पेड़ की छाल बटोरते हैं। दशमूल कंद को खोदकर लाते हैं। वनौषधियों से काढ़ा तैयार किया जाता है। हरेली की सुबह 'सांहड़ा देव' की पूजा अर्चना कर गाँव में काढ़ा बांटा जाता है। ग्रामीण अपने गाय, बैल, भैसों को आटे की लोदी खिलाते हैं और काढ़ा पिलाते हैं। यह औषधि गाँव के पशुधन को बीमारियों से बचाती है। राऊत सभी को शुभकामना देते हुए कह उठते हैं- 

"धन दुगानी पावय भझ्या

पावय हमर असीसे, 

नाती पूत ले घर भरय 

जीर्यों लाख बरीसे।"

पौराणिक मान्यता-

प्राकृतिक, देवीय और मानवीय संकटों से गाँव की रक्षा के लिए बैगा की अपनी भूमिका निभाता है। मान्यता है कि गाँव का बैगा ही संक्रामक रोगों, शत्रुओं और कष्टों से रक्षा करने में समर्थ होता है। गाँव बंद किया जाता है और रात में सवनाई चलाई जाती है। हर घर की दीवारों पर गोबर से 'पुतरा पुतरी' अंकित किए जाते हैं। पशुधन को खुरहा चपका बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के दस नामों का स्मरण किया जाता है।

 पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में अर्जुन  अपने अज्ञात वास में छिपने के लिए विराटनगर में वृहनल्ला बने थे। अर्जुन जब अपने असली रूप में वापस आये तब विराटनगर में फैली पशुओं की बीमारी अपने आप समाप्त हो गयी। इस घटना को ध्यान में रखकर पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के नाम का स्मरण किया जाता है।

कृषि औजारों की पूजा -

 हरेली का तीसरा महत्वपूर्ण चरण है कृषि उपयोगी औजारों की साज सम्हाल। खेती का काम पूरा हो जाता है फिर नागर, कुदारी, रांपा, बसुला, टँगिया, आरी, भँवारी, साबर, चटवार, हँसिया, बिंधना जैसे उपकरणों को निकालकर धोया जाता है। ग्राम- देवताओं और लोक देवताओं के साथ इनकी भी पूजा-अर्चना की जाती है। देवों को चीला रोटी का भोग लगाया जाता है। कृषि औजार किसानों के अंलकार हैं। इनकी सुरक्षा उतना ही जरूरी है जितनी कि आभूषण की। इस पर कहा गया है,

"नागर तुतारी टँगिया 

कुदारी किसान के गहना,

अऊ किसनिन के रापा

 गैंती झऊंहा नहना ।।"

लोक देवी-देवता- 

   लोक देवताओं के बारे में मान्यता है कि ये ग्रामीणों का दुख दूर करते हैं। हर गाँव के अपने एक अलग देवी-देवता होते हैं जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। गाँवों में तो हरेली से लेकर ऋषि पंचमी तक तंत्र- मंत्र सीखने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। तन्त्र मंत्र सीखने की शुरुआत हरेली से होती है इस दिन 'पाठ पीढ़ा' दिया जाता है।

हरेली का उल्लास -

   बच्चों के साथ वृद्धों का उत्साह देखते बनता है। हरेली के दिन बांस से बनी गेंड़ी चढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। कीचड़ पानी से सराबोर हुई गाँव की गलियों में गेड़ी पर चलते लोग दिखते हैं। हरेली त्यौहार में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता आयोजित होती है, कहीं गेंड़ी नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। महीने भर गेंड़ी का आनंद लेने के बाद इसे विसर्जित कर दिया जाता है।     

  हरेली पर गाँव के चौपाल में पारंपरिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान होता है। कहीं आल्हा सुनाई देता है, तो कहीं रामायण की स्वर लहरियाँ गूँज उठती हैं। लोक मान्यता है कि जब तक हरियाली रहेगी, तब तक किसानों के खेत आबाद रहेंगे। जंगल हरे-भरे रहेंगे। जंगल हरे रहेंगे, तो उनके पशुओं के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ‘दिव्य रसायन’ की प्राप्ति होती रहेगी। हर हमेशा हरियाली बनी रहे, जो सब का पोषण करती रहे, ऐसी परंपराओं को संजोए हरेली त्यौहार हर बरस मनाया जाता है।

ravindraginnore58@gmail.com

आलेखः पत्रों में लोक-संग्राम

  - प्रमोद भार्गव

हमारे यहाँ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहासबद्ध लेखन के परिप्रेक्ष्य में उन पत्रों और साक्ष्यों को लगभग बहिष्कृत किया गया है, जो पत्र और साक्ष्य क्रांतिवीरों ने युद्ध की रणनीति सुनिश्चित करने और हथियार, सेना, धन व खाद्य सामग्री की उपलब्धता प्राप्त करने के लिए लिखे थे। जबकि इसके विपरीत अंग्रेज शासकों ने जो पत्र इत्यादि लिखे, उन्हें 1857 के संग्राम को सैनिक विद्रोह बताने के लिए कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया, जैसे उनकी लिखी सूचनाएँ ब्रह्म वाक्य हों। शासकों की इन सूचनाओं को इतिहास मानने की बड़ी भूल हुई है।

हमारे शहर शिवपुरी में 1857 के संघर्ष से जुड़ी दो बड़ी घटनाएँ घटित हुई हैं। एक तो तात्या टोपे को फाँसी के फंदे पर शिवपुरी में ही लटकाया गया था, दूसरे इतिहास की जिन पुस्तकों में गोपालपुर जागीर का जिक्र है, वह भी शिवपुरी जिले के अंतर्गत है। यही वह स्थल था, जहाँ लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब ने गोपालपुर के जागीरदार रघुनाथ सिंह वशिष्ठ और उनके अनुज गोविंद सिंह के साथ मंत्रणा करके ग्वालियर पर कब्जा करने की योजना को क्रियान्वित किया था। यहाँ के लोक समाज से लक्ष्मीबाई ने सैन्य संगठन भी खड़ा करके अपनी सेना में शामिल किया था।

पत्रों की प्रदर्शनी -

इस जन-संग्राम की प्रामाणिकता की बात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्या टोपे के बलिदान दिवस से करते हैं। दरअसल शिवपुरी में 18 अप्रैल को प्रतिवर्ष दो दिवसीय मेले का आयोजन तात्या के बलिदान को स्मरणीय बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस मेले में अब से बीस साल पहले तक इस संग्राम से जुड़े पत्रों एवं हथियारों की विशाल एवं भव्य प्रदर्शनी लगाई जाती थी। यह प्रदर्शनी लगती अब भी है, लेकिन इसका रूप बहुत संक्षिप्त कर दिया गया है। परिणामतः यह प्रदर्शनी अब इतिहास के जिज्ञासुओं की समझ विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि ये पत्र मूल व संपूर्ण रूप में आज भी राजकीय अभिलेखागार भोपाल में सुरक्षित हैं। दुर्लभ होने के कारण अब पत्रों की छाया प्रतियाँ ही प्रदर्शनी में लगाई जाती हैं।

सौभाग्य से मुझे इन पत्रों को पढ़ने का अवसर मिला है। इन्हें पढ़ने से पता चलता है कि इस संग्राम में खास ही नहीं आम आदमी भी सर्वस्व न्योछावर कर देने की मानसिकता से युद्ध में भागीदारी के लिए मार्ग खोजने में संलग्न थे। चूंकि ये पत्र बुंदेली भाषा में थे और इनमें आंचलिक बोली के शब्द प्रयोग में लाए गए थे, इसलिए इनके वास्तविक अर्थ समझने के लिए मैंने अपने पूज्य गुरुवर डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही‘ से संपर्क साधा। डॉ. विरही बुंदेली, हिंदी एवं अंग्रेजी के विलक्षण ज्ञाता होने के साथ-साथ बड़े साहित्यकार भी हैं। उन्होंने बताया कि इन पत्रों को वे सत्तर के दशक में ही बुंदेली से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। उन्हीं के संपादकत्व में पत्रों के संग्रह का प्रकाशन भी हो चुका है;  किंतु दुर्भाग्य से इन दुर्लभ पत्रों की पुस्तक की प्रति उनके पास भी नहीं थी। परंतु उन्होंने मार्ग सुझाया कि यह पुस्तक नगर पालिका परिषद शिवपुरी द्वारा प्रकाशित की गई थी, इसलिए हो सकता है, उनके भंडार- गृह में कुछ पुस्तकें मिल जाएँ।

इस सूत्र वाक्य को पकड़कर जब हमने पालिका का भंडार खँगाला तो बेहद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पुस्तकों का एक बंडल मिल ही गया। बंडल को खोलने पर ज्यादातर पुस्तकें तो सड़-गल गई थीं, लेकिन बीच की दो-चार पुस्तकें संयोग से ऐसी निकल आईं, जिनमें पत्र संपूर्ण रूप से पढ़ने में आ रहे थे। मेरे लिए ये पत्र बड़ी थाती सिद्ध हुए।

‘1857 की क्रांति' शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित जो पत्र संगृहीत हैं, वे पत्र महारानी लक्ष्मीबाई, रानी लड़ई दुलैया, राजा बखतवली सिंह, राजा मर्दन सिंह, राजा रतन सिंह और इस क्रांति के महान योद्धा, संगठक एवं अप्रतिम सेनानायक तात्या टोपे द्वारा लिखे गए या उनको अन्य लोगों द्वारा लिखे गए पत्र हैं। इनके अलावा कुछ पत्र ऐसे भी हैं, जो पंडितों और तांत्रिकों द्वारा लिखे गए हैं। इन पत्रों में अतीन्द्रिय शक्तियों से जुड़े ऐसे मंत्रों व जंत्रों का रेखांकन है, जो तात्या टोपे की रक्षा के लिए बतौर सुरक्षा-कवच हैं। इन पत्रों की भावना से यह स्पष्ट होता है कि इस संग्राम का विस्तार दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों तक हो रहा था और केवल परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़ने की तीव्र इच्छा से आम-आदमी क्रांति के इस महायज्ञ में अपने अस्तित्व की समिधा डालने को तत्पर था।

इस किताब की भूमिका के अनुसार, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित इन पत्रों की प्राप्ति का इतिहास भी बड़ा रोचक है। आजादी की पहली लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी, तब तात्या टोपे अपनी फौज के साथ ओरछा रियासत के गाँव आष्टौन में थे। अंग्रेजों को मुखबिर से यह खबर पता चल गई। अंग्रेजी फौज ने बिना वक्त गँवाए तात्या टोपे के डेरे पर हमला बोल दिया। उस समय तात्या मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा, ऊहापोह की हालत में तात्या को अपना कुछ बहुमूल्य सामान यथास्थान छोड़कर नौ-दो-ग्यारह होना पड़ गया।

उस दौरान ओरछा के दीवान नत्थे खाँ थे। तात्या द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान की पोटली नत्थे खाँ के विश्वसनीय सिपाही ने उन्हें लाकर दी। इस सामान में एक बस्ता था, जिसमें जरूरी कागजात व चिट्ठी-पत्री थीं। इसी सामान में एक तलवार और एक उच्च कोटि की गुप्ती भी थी। नत्थे खाँ के यहाँ कोई पुत्र नहीं था, इसलिए यह धरोहर उनके दामाद को मिली। दामाद के यहाँ भी कोई पुत्र नहीं था, गोया तात्या टोपे के सामान के वारिस उनके दामाद अब्दुल मजीद फौजदार बने, जो टीकमगढ़ के निवासी थे।

स्वतंत्र भारत में 1976 में टीकमगढ़ के राजा रहे नरेंद्र सिंह जू देव को अब्दुल मजीद के पास इन पत्रों के होने की खबर आई। नरेंद्र सिंह उस समय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने इन पत्रों के ऐतिहासिक महत्त्व को समझते हुए तात्या की धरोहर को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की। साथ ही पत्रों की वास्तविकता की पुष्टि इतिहासकार दत्तात्रेय वामन पोद्दार से भी कराई। पोद्दार ने पत्रों के मूल होने का सत्यापन करते हुए इन्हें ऐतिहासिक महत्त्व के दुर्लभ दस्तावेज निरूपित किया। झांसी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ. वृंदावन लाल वर्मा ने भी इन्हें मूल पत्र बताते हुए यह सुनिश्चित किया कि पत्रों के साथ मिला सामान तलवार तथा गुप्ती भी तात्या टोपे की ही हैं। डॉ. वर्मा ने यह भी तय किया कि जिस स्थान और जिस कालखंड में इस सामग्री का उपलब्ध होना बताया जा रहा है, उस समय वहाँ तात्या टोपे के अलावा अन्य किसी सेना-नायक ने पड़ाव नहीं डाला था। 

तात्या के बस्ते से कुल 225 पत्र प्राप्त हुए थे, जो देवनागरी एवं फारसी लिपि में थे। हिंदी पत्रों की भाषा ठेठ बुंदेली है। इन पत्रों में 125 हिन्दी में और 130 उर्दू में लिखे गए हैं। तात्या की तलवार और गुप्ती भी अनूठी है। तलवार सुनहरी नक्काशी में मूठ वाली है, जो मोती बंदर किस्म की बताई गई है। इस तलवार की म्यान में दो कुंदों में चार अंगुल लंबे बाण के अग्रभाग जैसे पैने हथियार हैं। इन हथियारों पर हाथी दाँत की बनी शेर के मुँह की आकृतियाँ जुड़ी हुई हैं। इस तरह जो गुप्ती प्राप्त हुई है, वह विचित्र है। गुप्ती की मूठ सोने की है। इसके सिरे पर एक चूड़ीदार डिबिया लगी हुई है, जिसमें इत्र-फुलेल रखने की व्यवस्था है। तात्या की यह अमूल्य धरोहर अब राजकीय अभिलेखागार, भोपाल का गौरव बढ़ा रही है। 

पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम किस गहराई से जन-संग्राम में बदलता जा रहा था और आम आदमी किस दीवानेपन से राष्ट्र की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग के संस्कारों में ढल रहा था। समर के इस अछूते अध्याय की बानगी इन पत्रों में द्रष्टव्य है...,

तात्या टोपे के नाम लिखे एक पत्र में राजा बखतवली सिंह लिखते हैं-

‘एजेंट हैमिल्टन ने गोरी फौज को लेकर राहतगढ़ पर आक्रमण किया है। खुरई, कानपुर में हुई लड़ाई में मानपुर के करीब 700 और अंग्रेजों के करीब 500 सैनिक मारे गए हैं। अंग्रेजों ने बलपूर्वक पन्ना, बिजावर, टेहरी, चरखारी और छतरपुर के राजाओं को अपनी ओर मिला लिया है। अंग्रेज फौज से मुकाबला करने के लिए सहायता भेजी जाए।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में महाराजा रतन सिंह लिखते हैं-

‘हमने तीन लाख रुपया जमा करा लिया है, मगर हमसे कौलनामा किसी पंडित को भेजकर लिखा लिया जाए। हमारी इज्जत रखी जाए। अब हम फौज सहित कूच करते हैं। हमारी ओर से किसी बात पर तकरार नहीं होगी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में श्री राम शुक्ल तथा गंगाराम लिखते हैं-

‘सिरोली के घाट पर अंग्रेज कैप्टन और नवाब बांदा की भीड़ रोकने के लिए सेना की सहायता एवं तोप चाहिए। चाँदपुर के थानेदार भी दो सौ बंदूक लेकर हमारे साथ हैं।’

एक अन्य पत्र में मानीराम एवं गंगाराम ने तात्या टोपे को लिखा है-

‘सिरोली, चखुरा, भौरा, चाँदपुर और गाजीपुर के जमींदार अंग्रेजों से मोर्चा लेने को तैयार हैं। अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने पर वे धावा बोलेंगे। गोरी पलटन को कालपी न पहुँचने देने के लिए कंपू का बंदोबस्त भी किया जाए।’

गुलामी का जुआ उतार फेंकने के लिए उतावले ये वे लोग थे, जिनकी कोई बड़ी जागीर नहीं थी। किसी राज्य के सामंत नहीं थे। चाँदपुर के जिस थानेदार का हवाला दो सौ बंदूकों के साथ रणभूमि में कूदने के लिए दिया गया है, वह सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर प्राणों की आहुति देने को तत्पर था। इससे साफ है, संघर्ष की शुरुआत वर्षों से दमित अपमान और क्षोभ के प्रकट रूप में हो रही थी।

तात्या टोपे को ही लिखे एक अन्य पत्र में महाराज कुमार गणेशजू देव ने तात्या टोपे को अपने डेरे पर बुलाया तथा लड़ाई में ठाकुरों के साथ होने का हवाला दिया। जिसमें कुँवर बुधसी, क्षमा जूदेव के नामों का उल्लेख है। उन्होंने लिखा है- ‘इन सबके मन साफ हैं और मैं बीच में हूँ।’

तात्या को आमजन मूरतीसिंह, शिवप्रसाद और गौरीशंकर अवस्थी लिखते हैं- ‘हमीरपुर व सिरोली की मदद के लिए दो तोपें, एक कंपनी तथा राजा लोगों की 500 फौज जल्दी भेजें। गोरे सिरोली के उस पार पांच तोपें लगाकर गोलीबारी कर रहे हैं।’

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में जानकारी दी है कि करीब एक सौ अंग्रेज अधिकारी व सिपाही ग्वालियर के किले में घुस गए हैं और इन्हें बेदखल करने के लिए हजारों लोग किले के अंदर पहुँच गए हैं। तात्या टोपे की ग्वालियर विजय पर एक पत्र में जैतपुर के फौजदार सवाई माधोसिंह ने खुशी जाहिर की है। 

रानी लड़ई दुलैया द्वारा राजा बखतवली सिंह के नाम लिखे पत्र में कहा गया है- ‘पन्ना की फौज हटा-दमोह में थी, उसने नदी पार करके यहाँ के इलाके पर तोपें चला दी हैं। फतहपुर को जब्त करने का विचार है। जबलपुर में खराबियों की फौज अंग्रेजों से बिगड़ गई है। पलटन अब हटा खाली करना चाहती है। कई जगह लड़ाई चल रही है। इसलिए पचास-साठ मन बारूद, शोरा और गंधक की जरूरत है।’

तात्या टोपे को लिखे पत्र में रानी लड़ई दुलैया ने सूचित किया है- 

‘पेशवा के पास उन्होंने कुछ लोग भेजे हैं और वे पेशवा के सूबा जलालपुर में ठहरे हुए हैं।’

महारानी लक्ष्मीबाई ने रानी लड़ई दुलैया को एक पत्र लिखकर याद ताजा कराई है- ‘दोनों ओर अच्छे संबंधों की परंपरा रही है, इसलिए आपकी फौज की ओर से कोई वारदात नहीं होनी चाहिए।’

हालाँकि अंततः रानी लड़ई ने लक्ष्मीबाई की मदद तो नहीं की अपितु अंग्रेजों का साथ जरूर दिया।

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में राजा मर्दनसिंह ने लिखा है- ‘फौज समेत फौरन आएँ। बुंदेलखंड के राजा अंग्रेजों से मिल गए हैं। अंग्रेज बानपुर, शाहगढ़ और झांसी पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं।’

बरुआ सागर के जमादार नत्थे खां ने रानी लक्ष्मीबाई को सावधान रहने के लिए लिखे पत्र में लिखा है- ‘आपके समाचार भले चाहिए। यहाँ के समाचार भले हैं। कई रोज से आपके खुशी की खबर नहीं मिली है, सो आपको यह पत्र लिखा है। हमारे बुजुर्ग श्री बड़े जमादार जू से आपको घरोबा रहा है। ताही प्रमाण हमारी तरफ से खातिर रखने में आए। हाल वर्तमान रोशन है। के जॉन रईस की जो रियासत सरकार ओरछे की है, सो अपुन की रोशनी है। मुल्क मालिक के अहद में अपनी ढाबा रियासत मजबूर में कुछ होना होवै सो इहाँ खावंद के हुक्म बमूजिब होने से करने परत। अपुन याकी रंजीदगी को चित पर न रखियो। अपने हक में कौनह दुखन वादी होवे को नहीं। हाल अपुन को झांसी में रहिबो व उहाँ तै और कहीं को जैबो मुनासिब नाहीं। यहाँ पुरानी अमलदारी में जौन मुकाम खुशीपूर्वक रहाइश रहि कि मंजूरी परै तहाँ की तजबीज लिखाई पठैवी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में मनफूल सुकुल ने जानकारी दी है- ‘गोरों ने मुनादी पिटवाई है कि विद्रोहियों को जो कोई रसद-मदद देगा, उसे बच्चों समेत फाँसी पर लटका दिया जाएगा।’

ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने एक विशेष पत्र हरकारे द्वारा भेजकर रानी झाँसी को सूचित किया है कि मोर्चाबंदी की तैयारी की जाए। पंडित मोहनलाल ज्योतिषी ने तात्या टोपे को लिखे पत्र के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा रक्षा किए जाने के लिए एक तंत्र भी भेजा। इस पत्र में उल्लेख है- ‘हम फकीर साहब के साथ बैठकर दो जंत्र तैयार कर आपके पास भेज रहे हैं, वह आप बाँध लें और बड़ा जंत्र निशान पर बाँध देना। ईश्वर रक्षा करेगा।-

1857 में ही हमीरपुर से निकलने वाले ‘हमीर’ नामक एक समाचार-पत्र में पत्रकार जलील अहमद ने खबर छापी है- ‘तात्या टोपे की कोठी में दो षड्यंत्रकारी जो बंदूकधारी थे, मोजा रमेली खालपुर में, तात्या टोपे की हत्या की साजिश रचते हुए पकड़े गए। इन्हें तात्या के सामने पेश किया गया।’

‘1857 की क्रांति’ पुस्तक में छपे इन पत्रों के मजमून से स्पष्ट होता है कि भारतीयों के अंतःकरण में दासता से मुक्ति के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया था। उस समय आम आदमी ने अपने राष्ट्रीय धर्म का अहसास किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हुआ। 1857 के इन बलिदानियों ने ही राष्ट्रीय चरित्र की अवधारणा को अभिव्यक्ति दी।

ग्रामीण अंचल से लेकर शहरी भूमि तक अँगड़ाई ले रहा लोक का यह संग्राम हिंदू-मुस्लिम एकता का भी अद्वितीय उदाहरण रहा है; किंतु इतिहास के इस अति महत्वपूर्ण कालखंड की सच्चाई पर पर्दा डाले रखने की कोशिशें इसलिए होती रहीं, क्योंकि इस युद्ध में साधारण भारतीय समाज ने असाधारणता का परिचय दिया था, जिसे संपन्न, शिक्षित व अंग्रेजों के पिट्ठू रहे लोगों को स्वीकारना हमेशा मुश्किल ही रहा है। इस वास्तविकता को छिपाए रखने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इस मुक्ति संग्राम में अंततः लोक यानी भारतवासी पराजित हुए थे। इस संग्राम का इतिहास लिखने के लिए कोई भी नायक-नायिका न तो जीवित बच पाए और न ही अपने संघर्ष की आपबीती लिखने अथवा लिखाने का समय संघर्ष काल में उनके पास था। जबकि इसके उलट तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों ने इस लोक के संग्राम के अंतर्निहित सत्य को विकृत करके हकीकत पर आवरण डालने का काम किया।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100