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Jun 1, 2024

उदंती.com, जून 2024

चित्रः बसंत साहू,
धमतरी (छत्तीसगढ़)
 वर्ष-16, अंक-11

भूमि की देखभाल करो तो भूमि तुम्हारी देखभाल करेगी, भूमि को नष्ट करो, तो वह तुम्हें नष्ट कर देगी।  - एक आदिवासी कहावत

इस अंक में

पर्यावरण विशेष 

अनकहीः जीना दुश्वार हो गया...- डॉ. रत्ना वर्मा

पर्यावरणः हिमालय पर तापमान बढ़ने के खतरे - प्रमोद भार्गव

शब्द चित्रः हाँ धरती हूँ मैं - पुष्पा मेहरा

आलेखः विश्व में पसरती रेतीली समस्या - निर्देश निधि

प्रकृतिः हमारे पास कितने पेड़ हैं? - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जलवायु परिवर्तनः मौसम को कृत्रिम रूप से बदलने के खतरे - भारत डोगरा

प्रदूषणः ई-कचरे का वैज्ञानिक निपटान - सुदर्शन सोलंकी

अनुसंधानः ग्लोबल वार्मिंग नापने की एक नई तकनीक - आमोद कारखानीस

चिंतनः खत्म हो रही है पृथ्वी की संपदा - निशांत

 दो लघु कविताएँः 1. निवेदन, 2. बस यूँ ही - भीकम सिंह

अध्ययनः पक्षियों के विलुप्ति के पीछे दोषी मनुष्य है

दोहेः नभ बिखराते रंग - डॉ. उपमा शर्मा

लघुकथाः प्रमाणपत्र - प्रेम जनमेजय

कविताः उसकी चुप्पी -  डॉ.  कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

कहानीः विश्वास की जीत - टि्वंकल तोमर सिंह

 व्यंग्यः ठंडा- ठंडा कूल- कूल - विनोद साव 

कविताः चलो लगा दें इक पेड़ - राजेश पाठक

माहियाः गर्मी के धूप हुए - रश्मि विभा त्रिपाठी

हाइबनः जीवन-धारा - डॉ. सुरंगमा यादव

लघुकथाः धारणा - पद्मजा शर्मा

प्रेरकः पीया चाहे प्रेम रस – ब्रजभूषण

किताबेंः साहित्य की गहनतम अनुभूतियों का रसपान कराती पुस्तक -  डॉ. सुरंगमा यादव

कविताः पक्षी जीवन बचा रहेगा - चक्रधर शुक्ल

 जीवन दर्शनः इकीगाई- सोच की खोज - विजय जोशी 

अनकहीः जीना दुश्वार हो गया...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा
फट रही है ये फिर से धरती क्यूँ,

फिर से यज़्दाँ का क़हर आया है।

पर्यावरण प्रदूषण एक ऐसा धीमा जहर है,  जो समूची धरती को धीरे- धीरे निगलते चले जा रहा है।  साल- दर- साल हम प्रदूषण की मार झेलते हुए यह जान गए हैं कि इस विनाश के पीछे प्रमुख कारण, प्रकृति का दोहन करते हुए अंधाधुंध औद्यौगिक विकास ही है। परिणामस्वरूप हम बाढ़, सूखा, भूकंप और महामारी जैसी अनके प्रलयंकारी तबाही का मंजर झेलते चले जा रहे हैं । हवा और पानी इतने जहरीले हो चुके हैं कि जीना दुश्वार हो गया है; लेकिन फिर भी हम इनसे सबक नहीं लेते। विकास की अंधी दौड़ में हम आने वाली पीढ़ियों के लिए लगातार कब्र खोदते ही चले जा रहे हैं। 

हम एक ऐसे देश के वासी हैं, जहाँ सिर्फ नदियों और वृक्षों की ही पूजा नहीं होती, बल्कि धरती का कण- कण हमारे लिए पूजनीय है। अफसोस है, ऐसे पवित्र विचारों से परिपूर्ण देश में पर्यावरण जैसे गंभीर विषय को सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बनाया जाता।  ऐसा तब है,जब हमारी संस्कृति और परंपरा हमें यही सिखाती है कि अपनी प्रकृति, अपनी धरती का सम्मान करें और उनकी रक्षा करें। हम अपने पूर्वजों द्वारा दिए ज्ञान के इस अनुपम भंडार पर गर्व तो करते हैं; पर उनपर अमल करने में पीछे रह जाते हैं। 

परिणाम -विनाश है, जो आज दुनिया भर में दिखाई दे रहा है। हमारे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों  ने हमेशा चेतावनी दी है कि पहाड़ों का पर्यावरण और मैदानी क्षेत्रों का पर्यावरण भिन्न होता है। पहाड़ के पर्यावरण को समझे बिना ही हम विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाएँगे, तो आपदाओं को आमंत्रित करेंगे। विकसित देशों ने तो बड़े बाँधों के निर्माण पर प्रतिबंध ही लगा दिया है, क्योंकि वे जान चुके हैं- इससे भविष्य में विनाश ही होगा। हमारे यहाँ लगातार तबाही के बाद भी पहाड़ों पर बाँध बनते ही चले जा रहे हैं, पहाड़ों में सुरंग बनाकर, जंगलों से हज़ारों वृक्षों का काटकर, सड़कें और रेल लाइनें बिछाई जा रही हैं। भला धरती का सीना चीरकर हम विकास की कौन सी सीढ़ी चढ़ रहे है?

हम हर बार कहते तो यही हैं कि सरकार चाहे किसी की भी हो, उन्हें  पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोचना ही होगा। ज्यादातर जनता भी यही सोचती है कि देश के पर्यावरण की रक्षा करना, हमारा नहीं, सरकार का काम है। कहने को तो दुनिया भर में इस दिशा में काम हो रहा है; परंतु जिस तेजी से पर्यावरण बिगड़ रहा है, उतनी तेजी से नहीं। यह सही है कि सरकार को नीतियाँ, नियम और कानून बनाने होंगे; पर देश की जनता को भी तो अपनी भूमिका निभानी होगी। 

 पूरा देश पिछले दिनों चुनावी त्योहार में निमग्न रहा है । अनेक वायदों और आश्वसनों के बल पर वोट माँगे गए; लेकिन हमेशा यह पाया गया है कि चुनाव के समय पर्यावरण हमारे राजनीतिक दिग्गजों की जुबान पर कभी नहीं होता, ऐसा क्यों? भला चुनाव में पर्यावरण एक प्रमुख मुद्दा क्यों नहीं बन पाता? 

 दरअसल जिनके बल पर पार्टियाँ चुनाव लड़ती हैं, जो उनके वोट बैंक हैं,  अर्थात् वह मध्यम और निम्न वर्ग, जिन्हें  पर्यावरण से ज्यादा चिंता, अपनी रोजी- रोटी और वर्तमान को बेहतर बनाने की होती है । इसीलिए चुनाव भी उनकी इन्हीं प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर लड़े जाते  हैं। उनके वोट तो उन्हें मकान, नौकरी, मुफ्त अनाज और बिना मेहनत किए ही उनके बैंक खाते में हजारों रुपये डलवाने के लुभावने वायदों के बल पर बटोरे जाते हैं।  ऐसे में पर्यावरण जैसा विषय भला चुनाव में मुद्दा क्यों बनेगा?

पिछले कार्यकाल में अवश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा सहित अन्य नदियों के प्रति आस्था दिखाई और नमामि गंगे सहित नदियों की सफाई को लेकर अनेक कार्यक्रम चलाए,  स्वच्छ भारत मिशन भी तेजी से चला; लेकिन एक लम्बें समय बाद  उसके भी परिणाम उस तरह देखने को नहीं मिले, जैसी उम्मीद थी। इस दिशा में और अधिक तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है, अन्यथा परिणाम भयानक होने की भविष्यवाणी हमारे पर्यावरणविद् कई बरसों से करते ही आ रहे हैं । 

धरती एक ही है, यदि हमें अपनी धरती को जीने और रहने लायक बनाना है, तो विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने से बचना होगा। विकास की एक सीमा तय करनी होगी। कुछ कठोर कानून बनाने होंगे और इसके पालन के लिए सख्ती बरतनी होगी। अन्यथा पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबिंग वार्मिंग के चलते दुनिया भर के तापमान में जैसी वृद्धि देखी गई है वह भयावह है।  बाढ़, भूकंप और सुनामी जैसा सैलाब पिछले कुछ वर्षों से हम देख ही रहे हैं; वह कल्पना से परे है। पहाड़ों का टूटना, ग्लेशियर का पिघलना,  जंगलों में भयंकर आग, ये सब प्रलय की शुरूआत ही तो है। तो क्या हमें विनाश के लिए तैयार रहना होगा या इस विनाश को रोकने के लिए सजग हो जाना होगा? फैसला हमारे हाथ में है। हम अब भी सचेत हो सकते हैं।  हाँ, आने वाले विनाश को रोक तो नहीं सकते; पर कम अवश्य कर सकते हैं। 

 धरती माता का स्वभाव यदि देने का है, तो क्या हम उसे पूरी तरह खोखला करके ही छोड़ेंगे। हमें कहीं से आरंभ तो करना होगा। अपने जीवन को सादा, सच्चा और सरल बनाना होगा, अपने लालच को कम करना होगा। सबसे जरूरी, प्रकृति के अनुरूप अपने जीवन को ढालना होगा । प्रकृति के साथ, धरती के साथ प्यार करते हुए जीवन गुजारने का संकल्प लेना होगा। अपनी कमजोरियों को दूसरों पर थोपना बंद करना होगा। सम्पूर्ण जगत् को, सभी जीव- जंतु, पशु- पक्षी और मानव के रहने लायक बनाकर फिर से अपनी धरती को शस्य- श्यामला बनाना होगा। और नहीं तो सब कुछ अपनी आँखों के सामने तबाह होते देखने के लिए अपना दिल मजबूत कर लीजिए। 

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का,

जो धूप छाँव से रिश्ता बनाए रहता है।

पर्यावरणः हिमालय पर तापमान बढ़ने के खतरे

 - प्रमोद भार्गव

संपूर्ण हिमालय के पहाड़ एवं भूभाग 21वीं शताब्दी के सबसे बड़े बदलाव के खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं। इसी स्थाई हिम-रेखा 100 मीटर पीछे खिसक चुकी है। यहाँ जाड़ों में तापमान 1 डिगी बढ़ने से हिमखंड तीन कि.मी. तक सिकुड़ चुके हैं। नतीजतन बर्फबारी का ऋतुचक्र डेढ़ महीने आगे खिसक गया है। हिमालय क्षेत्र में जो बर्फबारी दिसंबर-जनवरी माह में होती थी, वह फरवरी मध्य से शुरू होकर मार्च 2024 तक जा रही है। उत्तराखंड के वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने 1901 से लेकर 2018 तक के जलवायु अनुसंधान इकाई के आँकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाला है कि तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो 8 से 10 साल के भीतर हिमालय पर बर्फबारी का मौसम पूरी तरह परिवर्तित हो जाएगा या बर्फबारी की मात्रा घट जाएगी। दिसंबर-जनवरी की बर्फीली बारिश इन महीनों में तापमान कम होने के कारण सूख कर जम जाती थी, लेकिन इन माहों में आसमान से जो बर्फ गिरी, वह तापमान ज्यादा होने के कारण पिघल कर बह गई। अतएव आशंका की जा रही है कि इस बार हिमालय की चोटियाँ और सतही भूमि जल्द ही बर्फ से खाली हो जाएगी। उत्तराखंड में समुद्रतल से 11,385 फीट ऊँचाई पर बना तुंगनाथ मंदिर के क्षेत्र में 14 साल पहले जनवरी में जितनी बर्फ मौजूद होती थी, उतनी इस बार मार्च में है। यह स्थिति इतनी ऊँचाई पर बर्फीली बारिश के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। संस्थान का यह शोध-अध्ययन हाल ही में प्रकाशित हुआ है। 

 भू-गर्भ वैज्ञानिक डॉ. मनीश मेहता के अनुसार, ‘पहले दिसंबर-जनवरी में हर साल सूखी बर्फबारी होती थी, जो तापमान कम रहने के कारण जमी रहती थी। इससे हिमखंड सुरक्षित व सुगठित रहते थे। पारा चढ़ने पर सूखी बर्फबारी बंद हो गई। बाद में गीली बर्फ गिरी, जो थोड़ी गर्मी होते ही पिघलने लग गई।‘ पहाड़ों पर अमूमन गर्मी मई माह से शुरू होती थी। परंतु बीते एक दशक में सर्दी का तापमान तो बढ़ा है, जबकि गर्मी का स्थिर है। इसलिए हिमालय में गर्मी ज्यादा समय बनी रहती है। ये बदलते हालात हिमालय के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए खतरे की घंटी हैं। स्थाई बर्फीली रेखा हिमालय पर 4 से 5 हजार मीटर ऊपर होती है। यह स्थाई बर्फ के कारण बनती है। इसके तीन हजार मीटर नीचे तक वनस्पतियाँ नहीं होती हैं। इस रेखा के पीछे खिसकने से जहाँ पहले कम तापमान में हिमपात होता था, वहाँ अब बारिश होने लगी है। परिणामस्वरूप हिमालय के कई किमी क्षेत्र से बर्फ विलुप्त होने लगी है। इस सिलसिले में वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक विनीत कुमार का कहना है कि मौसम चक्र बदलने का सबसे ज्यादा असर देश के उत्तर-पूर्वी भाग्य में हुआ है। सुदुर संवेदन उपग्रह के आँकड़े बताते है कि अरुणाचल प्रदेश में 1971 से 2021 के मध्य ज्यादातर हिमखंड 9 मीटर प्रतिवर्ष की औसत गति से 210 मीटर पीछे खिसक गए हैं। जबकि लद्दाख में यह रफ्तार 4 मीटर प्रतिवर्ष रही है। कश्मीर के हिमखंडों के पिघलने की गति भी लगभग यही रही है। 

वाडिया संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. डी.पी डोभाल के अनुसार, ‘जहाँ आज गंगोत्री मंदिर है, वहाँ कभी हिमखंड हुआ करता था। परंतु जैसे-जैसे तापमान बढ़ा और ऋृतुचक्र बदला वैसे- वैसे हिमखंड सिकुड़ता चला गया। 1817 से लेकर अब तक यह 18 कि.मी. से ज्यादा पीछे खिसक चुका है। करीब 200 साल पहले हिमखंड खिसकने का दस्तावेजीकरण सर्वे ऑफ इंडिया के भूविभानी जॉन हॉजसन ने किया था। उससे पता चला था कि 1971 के बाद से हिमखंडों के पीछे हटने की रफ्तार 22 मीटर प्रतिवर्ष रही है। ‘कुछ साल पहले गोमुख के विशाल हिमखंड का एक हिस्सा टूटकर भागीरथी, यानी गंगा नदी के उद्गम स्थल पर गिरा था। हिमालय के हिमखण्डों का इस तरह से टूटना प्रकृति का अशुभ संकेत माना गया है। इन टुकड़ों को गोमुख से 18 किलोमीटर दूर गंगोत्री के भागीरथी के तेज प्रवाह में बहते देखा गया था। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के वनाधिकारी ने इस हिमखण्ड के टुकड़ों के चित्रों से इसके टूटने की पुष्टि की थी। तब भी ग्लेशियर वैज्ञानिक इस घटना की पृष्ठभूमि में कम बर्फबारी होना बता रहे थे। इस कम बर्फबारी की वजह धरती का बढ़ता तापमान बताया जा रहा है। यदि कालांतर में धरती पर गर्मी इसी तरह बढ़ती रही और हिमखंड क्षरण होने के साथ टूटते भी रहे तो इनका असर समुद्र का जलस्तर बढ़ने और नदियों के अस्तित्व पर पड़ना तय है। गरमाती पृथ्वी की वजह से हिमखण्डों के टूटने का सिलसिला आगे भी जारी रहा तो समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे कई लघु द्वीप और समुद्रतटीय शहर डूबने लग जाएँगे। हालाँकि वैज्ञानिक अभी तक यह निश्चित नहीं कर पाए हैं कि इन घटनाओं को प्राकृतिक माना जाए या जलवायु परिवर्तन के कारण टूटना माना जाए ?  

 अब तक हिमखण्डों के पिघलने की जानकारियाँ तो आती रही हैं; किंतु किसी हिमखण्ड के टूटने की घटना अपवाद स्वरूप ही सामने आती है। हालाँकि कुछ समय पहले ही आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों की ताजा अध्ययन रिपोर्ट से पता चला था कि ग्लोबल वार्मिंग से बढ़े समुद्र के जलस्तर ने प्रशांत महासागर के पाँच द्वीपों को जलमग्न कर दिया है। यह अच्छी बात थी कि इन द्वीपों पर मानव बस्तियाँ नहीं थीं, इसलिए दुनिया को विस्थापन और शरणार्थी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। दुनिया के नक्षे से गायब हुए ये द्वीप थे, केल, रेपिता, कालातिना, झोलिम एवं रेहना। पापुआ न्यू गिनी के पूर्व में यह सालोमन द्वीप समूह का हिस्सा थे। पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र में समुद्र के जलस्तर में सालाना 10 मिली की दर से बढ़ोतरी हो रही है।    

 गोमुख के द्वारा गंगा के अवतरण का जलस्त्रोत बने हिमालय पर जो हिमखण्ड हैं, उनका टूटना भारतीय वैज्ञानिक फिलहाल साधारण घटना मानकर चल रहे हैं। उनका मानना है कि कम बर्फबारी होने और ज्यादा गर्मी पड़ने की वजह से हिमखण्डों में दरारें पड़ गई थीं, इनमें बरसाती पानी भर जाने से हिमखण्ड टूटने लग गए। अभी गोमुख हिमखण्ड का बाईं तरफ का एक हिस्सा टूटा है। उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग की आँच ने भी हिमखण्डों को कमजोर करने का काम किया है। आँच और धुएँ से बर्फीली शिलाओं के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलती चली गई। इस कारण दरारें भर नहीं पाईं। अब वैज्ञानिक यह आशंका भी जता रहे हैं कि धुएँ से बना कार्बन यदि शिलाओं पर जमा रहा तो भविष्य में नई बर्फ जमना मुश्किल होगी ?

हिमखण्डों का टूटना तो नई बात है; लेकिन इनका पिघलना नई बात नहीं है। शताब्दियों से प्राकृतिक रूप में हिमखण्ड पिघलकर नदियों की अविरल जलधारा बनते रहे हैं। लेकिन भूमण्डलीकरण के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन पर आधारित जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित  कॉर्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है। एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे ; लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था ;  इसीलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह बना रहा। किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्श घटना शुरू हो गया था। 1990 के बाद यह गति और तेज हो गई इसके बाद से गंगोत्री के हिमखण्ड प्रत्येक वर्ष 5 से 20 मीटर की गति से पिघल रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तराखण्ड के पाँच अन्य हिमखण्ड सतोपंथ, मिलाम, नीति, नंदादेवी और चोराबाड़ी की है। भारतीय हिमालय में कुल 9,975 हिमखण्ड हैं। इनमें 900 उत्तराखण्ड के क्षेत्र में आते हैं। इन हिमखण्डों से ही ज्यादातर नदियाँ निकली हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पेय, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं। यदि हिमखण्डों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा, तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके ?

  बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है, बावजूद हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर एक हद तक रोक सकते हैं। पर्यटन के रूप में मानव समुदायों की जो आवाजाही हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही है, उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों के सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्त्व देना होगा। हिमालय के शिखरों पर रहने वाले लोग आजादी के दो दशक बाद तक बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियाँ बनाकर पानी रोक देते थे। तापमान शून्य से नीचे जाने पर यह पानी जमकर बर्फ बन जाता था। इसके बाद इस पानी के ऊपर नमक डालकर जैविक कचरे से इसे ढक देते थे। इस प्रयोग से  लंबे समय तक यह बर्फ जमी रहती थी और गर्मियों में इसी बर्फ से पेयजल की आपूर्ति की होती थी। इस तकनीक को हम ‘वाटर हार्वेस्ंटिग’ की तरह ‘स्नो हार्वेस्टिंग‘ भी कह सकते हैं। हालाँकि पृथ्वी के ध्रुवों में समुद्र के खारे पानी को बर्फ में बदलने की क्षमता प्राकृतिक रूप से होती है। बहरहाल हिमखंडों के टूटने या गलने की घटनाएँ चिंताजनक हैं।  

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100