मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

May 1, 2026

उदंती.com, मई - 2026

वर्ष- 18, अंक- 10

जंगल में घर बहुत ही कम हैं

बोले कैसे वास करेंगे?

घर में जंगल जब उग जाएँ 

जीने की क्या आस करेंगे।

              - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस अंक में

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या ‘सच’ से भी भाग रहे हैं? - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल - प्रमोद भार्गव

मनोविज्ञानः बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ - स्रोत फीचर्स

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ! - अंजू खरबंदा

भाषाः पाँच सौ प्रतियाँ और करोड़ों के प्रतिनिधि - जयप्रकाश मानस

चिंतनः टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरना  - डॉ. महेश परिमल

यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा - मांडवी सिंह

लघुकथाः साँझा दर्द - सुदर्शन रत्नाकर

लघुकथाः 1. कूप मण्ड़ूक,  2. बैल - सुकेश साहनी

कथाः अंतिम याचना - बसंत राघव

लघुकथाः अगोचर - भीकम सिंह

कविताः बचा रहे जो आवश्यक है - पूनम चौधरी

कहानीः राही  - भावना सक्सैना

व्यंग्यः प्लास्टर वाली टाँग  - डॉ. मुकेश 'असीमित'

कविताः खामोशी - अनिता मण्डा

किताबेंः युवा क्रांतिकारी के  बहुआयामी  व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति - प्रो. सुरंगमा यादव

आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी - हिना श्रीवास्तव

सॉनेटः इस समय - अनिमा दास

खानपानः कॉफी के स्वाद निराले - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या 'सच' से भी भाग रहे हैं?

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

इन दिनों मैं पहाड़ों की ओर रोड ट्रिप पर हूँ। जब भी घर या दोस्तों से बात होती है और वे जब उधर का हाल बताते हैं कि यहाँ तो पारा 45-46 डिग्री से भी ऊपर पहुँच गया है, तो एक अजीब-सी द्वंद्वात्मक स्थिति मन में जन्म लेती है। एक ओर मैं हूँ, जो इस भीषण गर्मी से राहत पाने, अपने घुमक्कड़ी शौक को पूरा करने, पहाड़ों की ठंडी हवा में सुकून ढूँढने निकल पड़ी हूँ; दूसरी ओर वे लोग हैं, जो उसी तपिश में झुलस रहे हैं।

सच तो यह है कि मुझे घूमने का शौक है। मौका मिले, साथ मिले, तो बस निकल पड़ती हूँ। इस बार की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है- रायपुर से सिलीगुड़ी, फिर कालिम्पोंग, गंगटोक में चंगू लेक और नाथुला दर्रा होते हुए दार्जिलिंग की ओर बढ़ रही हूँ। यहाँ का मौसम मन को हर पल ठंडक देता है। बादलों की ओट में लिपटे पहाड़, हल्की बारिश की फुहारें और ठंडी हवा के झोंके- सब कुछ किसी स्वप्नलोक जैसा लगता है। यहाँ आकर मन प्रसन्न है, आत्मा जैसे तरोताज़ा हो गई हो।

लेकिन जैसे ही नीचे के इलाकों का हाल सुनती हूँ, मन ठहर जाता है। सोचने को विवश हो जाती हूँ- क्या हम सिर्फ़ इस ठंडक का आनन्द लेने के लिए यहाँ आए हैं, या उस तपिश से आँख चुराने के लिए भी, जो अब हर साल और भयावह होती जा रही है?

छह दशक का जीवन बीत चुका है। बचपन से लेकर अब तक हर साल गर्मियाँ देखी हैं। लू के थपेड़े भी नए नहीं हैं; लेकिन पिछले एक- दो दशकों में जो बदलाव आया है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। अब गर्मी सिर्फ़ असहनीय नहीं रही, बल्कि खतरनाक होती जा रही है। हाल ही में देश के कई हिस्सों से खबरें आई हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़- जहाँ तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच गया। कई शहरों में ‘हीट वेव’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ जगहों पर तो मौत की खबरें भी सामने आई हैं।

वैज्ञानिक भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं। बदलते मौसम और धरती के लगातार गर्म होने की समस्या अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की सच्चाई बन चुकी है। दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है, बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है- ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है।

पर सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उत्तर बहुत जटिल नहीं है- हम स्वयं हैं।

विकास की दौड़ में हमने प्रकृति को पीछे छोड़ दिया है। सड़कों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को चीर दिया जा रहा है, रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों पर कंक्रीट के भारी भारी पिलर खड़े किए जा रहे हैं।  बिजली बनाने के लिए अब भी कोयले पर ज्यादा निर्भरता है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं; लेकिन उनके लिए पर्यावरण के कड़े नियमों का पालन अक्सर नहीं दिखता।

विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों की ओर हम गर्मी से राहत पाने आते हैं, वहाँ भी वही कहानी दोहराई जा रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों को कंक्रीट से ढका जा रहा है। होटल, रिसॉर्ट, सड़कें- सब कुछ इस तरह बढ़ रहे हैं कि पहाड़ों की असली बनावट ही खतरे में पड़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जल- स्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता भी खतरे में पड़ रही है।


मौसम विभाग और दुनिया की कई संस्थाएँ बार-बार कह रही हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू और भी तेज़ और लंबे समय तक पड़ सकती है। सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सब चिंता सिर्फ़ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सरकारों की जिम्मेदारी रह गई है, क्या हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। हम अक्सर कहते हैं- “सरकार कुछ नहीं कर रही।” लेकिन क्या हम स्वयं कुछ कर रहे हैं?

क्या हमने अपने स्तर पर पेड़ लगाने की कोशिश की? क्या हमने बिजली और पानी के इस्तेमाल में संयम बरता? क्या हमने प्लास्टिक का उपयोग कम किया? क्या हमने अपने शहरों में हरियाली बचाने की कोशिश की? सच यह है कि हम समस्या को समझते हैं, उस पर चर्चा भी करते हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कदम उठाने से बचते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ।

विकास जरूरी है; लेकिन वह प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना होना चाहिए। तरक्की तो हर किसी को चाहिए; पर हमें ऐसी तरक्की करनी होगी, जिसमें हम आगे भी बढ़ें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। सरकारों को भी कड़े नियम बनाने होंगे- जंगलों की कटाई पर नियंत्रण, निर्माण कार्यों के लिए कठोर पर्यावरणीय स्वीकृति, सूरज, हवा और पानी से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना होगा;  लेकिन इसके साथ-साथ, आम नागरिक के रूप में हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जैसे- जब हम यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति का सम्मान करें। कूड़ा न फैलाएँ, स्थानीय संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग न करें। ऐसे पर्यटन को अपनाएँ , जिससे घूमना भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।

आज जब मैं इन पहाड़ों की ठंडी हवा में साँस ले रही हूँ, तो यह सोचकर संतोष होता है कि अभी भी प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है और देती ही जा रही है; लेकिन यह संतोष तभी तक है, जब तक हम इसे सहेज कर रख सकें। यदि हमने अभी भी चेतावनी को अनसुना किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब ये पहाड़ भी तपने लगेंगे और हमें राहत पाने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।

इसलिए जरूरी है कि हम सिर्फ़ चिंतित न रहें, बल्कि सक्रिय भी हों; क्योंकि यह सिर्फ़ मौसम का बदलाव नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल

 -  प्रमोद भार्गव

अमेरिकी दैनिक 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी खबर के अनुसार, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो गेम किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं। अतएव, आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है, तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिए आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है। इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएँ।

इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की 'काउंटर-टेररिज्म कमेटी' ने किया है। इसके अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आँकड़ा तीन गुना अधिक है। नीदरलैंड के हेग स्थित 'इन्टरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म' के अनुसार, यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों की जांच में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं। अनेक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं। ये प्रशिक्षित बच्चे कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

हालाँकि, भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है। मुंबई के 26/11/2008 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है। इस सच्चाई का खुलासा संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। पाकिस्तान के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली’ अखबार में पहले ही यह मुद्दा उठा दिया था— “कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं। हमने इस धंधे को व्यापार का जरिया बना लिया है, वह भी अपनी ही कौम के किशोर एवं युवाओं के जीवन को दाँव पर लगाने का खेल खेलते हुए!”

पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है। इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है, नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है। फिलहाल विश्व में लोकप्रिय डिजिटल खेलों में मोबाइल प्रीमियर लीग (एमपीएल), फेंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म, माइनक्राफ्ट, रोब्लॉक्स, ड्रीम-11, कोरियन लवर गेम और लूडो किंग हैं। ये सभी खेल भारत समेत लगभग सभी देशों में उपलब्ध हैं। भारत से संचालित होने वाली खेल कंपनियों में चीन सहित कई देशों की कंपनियों की पूँजी लगी हुई है। इन खेलों के अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और स्पेन बड़े खिलाड़ी हैं।

हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। इन बहनों को ऑनलाइन ‘टास्क बेस्ड कोरियन लवर गेम’ खेलने की लत लग गई थी। इसी आत्मघाती खेल को खेलते हुए इन बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। इस घटना से साफ होता है कि ये खेल कितने खतरनाक हैं।

कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बढ़ते चलन के चलते दुनिया के विद्यार्थियों की मुट्ठी में एंड्रॉयड मोबाइल जरूरी हो गया था। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इसके बढ़ते चलन पर निरंतर चिंता प्रकट कर रहे हैं। अभिभावक बच्चों में गेम देखने की बढ़ती लत और उनके स्वभाव में आते परिवर्तन से चिंतित व परेशान हैं। वे बच्चों का मनोचिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद इस लत से मुक्ति दिलाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। दरअसल, बच्चों का मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन पर बढ़ता समय आँखों की दृष्टि को खराब कर रहा है। साथ ही, बच्चे अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों की गिरफ्त में भी आ रहे हैं। यहाँ तक कि बच्चे पोर्न फिल्में देखते भी पाए गए हैं।

अब ऐसे वीडियो खेल भी आभासी दुनिया (Virtual World) के लिए बनाए जाने लगे हैं, जहाँ खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड के चर्च और मस्जिदों पर हुए हमलों को भी खेलों का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये उपाय बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी बनाए जाने की दृष्टि से किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में किशोर और युवाओं को लुभाने के लिए ‘एक्टिव क्लब्स’ नाम के समूह बनाए जा रहे हैं। ये ऐसे समूह हैं जो खेलते हुए नस्लीय युद्ध की तैयारी में जुट जाते हैं और नस्लीय भावना से लड़ते दिखाई देते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लबों द्वारा 15 से 17 साल के नादान किशोरों को लक्षित किया जा रहा है। इन्हें देखते हुए किशोर अपनी गोरी या काली पहचान से जुड़कर नस्लवादी मानसिकता की गिरफ्त में आकर आतंकी बनने की दिशा में अनायास मुड़ जाते हैं।

ऑनलाइन खेल आंतरिक श्रेणी में आते हैं, जो भौतिक रूप से मोबाइल पर एक ही किशोर खेलता है, लेकिन इनके समूह बनाकर इन्हें बहुगुणित कर लिया जाता है। वैसे तो ये खेल सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन ब्लू ह्वेल, पबजी, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे खेल उत्सुकता और जुनून का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि मासूम बालक के दिमाग की परत पर नकारात्मकता की पृष्ठभूमि रच देते हैं।

मनोचिकित्सकों और स्नायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खेल बच्चों के मस्तिष्क पर बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। ये प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीव्र व तीक्ष्ण होते हैं; इसलिए ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट होते हैं। दरअसल, व्यक्ति की आंतरिक शक्ति से आत्मबल दृढ़ होता है और जीवन क्रियाशील रहता है; किंतु जब बच्चे निरंतर एक ही खेल खेलते हैं, तो दोहराव की इस प्रक्रिया से मस्तिष्क कोशिकाएँ परस्पर घर्षण के दौर से गुजरती हैं। नतीजतन दिमागी द्वंद्व बढ़ता है और बालक मनोरोगों से लेकर नस्लीय गिरफ्त में आता जाता है, जो उसे आतंक की राह में धकेलने का काम कर देते हैं।

ये खेल हिंसक और अश्लील होते हैं; इसलिए बच्चों के आचरण में आक्रामकता और गुस्सा देखने को मिलता है। दरअसल, इस तरह के खेल देखने से मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न करने वाले डोपामाइन जैसे हार्मोनों का स्राव होने लगता है। इस द्वंद्व से भ्रम और संशय की मनःस्थिति निर्मित होने लगती है और बच्चों का आत्मविश्वास छीजने के साथ विवेक अस्थिर होने लगता है, जो उन्हें आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर देता है। हालाँकि, डोपामाइन ऐसे हार्मोन भी सृजित करता है जो आनंद की अनुभूति के साथ सफलता की अभिप्रेरणा देते हैं; किंतु यह रचनात्मक साहित्य पढ़ने से संभव होता है, जो अब अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं और घरों से बाहर होता जा रहा है। यह एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है।

सम्पर्क: शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.) 

मनोविज्ञानः बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’


 इन
दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं
है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है; लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है; लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्त्वपूर्ण होंगे। 

सोशल मीडिया के प्रभाव पर एक ऐतिहासिक फैसला

लॉस एंजिल्स की अदालत के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की माँग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली - के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुँचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी को कैसे देखता है।

कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) जैसी समस्याएँ होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता (Body Image Issues) रहने लगी।

ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप) और गूगल (यूट्यूब) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों के लिए भी महत्त्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।

इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स—जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना—इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूजर्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य था।

कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इनकार किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएँ कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही की है।

यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूजर एंगेजमेंट से ज्यादा यूजर की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएँ  तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों की जरूरत है।

अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम और कंपनियों में सुधार भी जरूरी होंगे।

बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है—तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। (स्रोत फीचर्स)

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

 - अंजू खरबंदा

ढक्का गाँव की एक गली से

गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी

पार्क की एक बेंच पर बैठी

दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…

मग्न थीं वे

अपने सुख-दुःख बाँटने में,

जैसे समय ठहर गया हो

उनकी बातों के आसपास!

उम्र के इस पड़ाव तक

आते-आते

कितने विषय होंगे उनके पास,

कितनी कहानियाँ, 

कितनी उपलब्धियाँ!

जो किसी किताब में दर्ज नहीं!

उनके चेहरे की झुर्रियों ने

सहे होंगे जीवन के

अनगिनत थपेड़े,

हर लकीर एक किस्सा 

कहती होगी,

इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते

एक लंबा इतिहास

बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,

उम्र बढ़ने के साथ-साथ

तजुर्बा भी गहराता गया,

कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर

जीवन को गति देती रहीं 

वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!