मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Apr 1, 2026

उदंती.com, अप्रैल - 2026

 वर्ष - 18, अंक -9

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, 

मन की शक्ति बढ़ाना 

और आत्मनिर्भर बनाना है।

                          - स्वामी विवेकानंद

अनकहीः आस्था, परंपरा और हमारा विश्वास  - डॉ. रत्ना वर्मा

 आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ - संध्‍या राजपुरोहित

 मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ -  अजय मोहन

 यात्रा वृतांतः उदयेश्वर नीलकण्ठ महादेव मंदिर  - डॉ. आरती स्मित

 आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें - सीताराम गुप्ता

 प्रकृतिः घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है 

 कथाः पहली बार - अर्चना राय

 तुतलाहटः भाषा का प्रथम संगीत - जयप्रकाश मानस

 कविताः निःशब्द -  डॉ. कनक लता मिश्रा

 लघुकथाः अदृश्य आघात - योगराज प्रभाकर

 कहानीः उदास आँखें - आशा पाण्डेय

 लघुकथाः मकड़ी - सुषमा गुप्ता

 संस्मरणः कमली तू आ गई... - देवी नागरानी

 व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर - गिरीश पंकज

 कविताः भूमि का शृंगार तरु है - पूर्णिमा राय

 दो नवगीतः 1. अवसादों का बंद पिटारा, 2. आकस्मिक  - डॉ. भावना तिवारी

 किताबेंः ‘बिजुरी’ के बहाने हमारे समय का सामाजिक रूपक - कुँवर सिंह

कविताः पर मेरे हुए तो नहीं - सुरभि डागर

आलेखः महानदी जल-बँटवारा - छत्तीसगढ़ और ओडिशा में विवाद - प्रमोद भार्गव

शोधः प्यास लगना और बुझना 


अनकहीःआस्था, परंपरा और हमारा विश्वास

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

  भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वह हमारे घर- परिवार, समाज और पूरे देश के लोगों की दिनचर्या में रचा- बसा हुआ है। अभी- अभी हमने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण  पर्व  रंगारंग होली का त्योहार मनाने के बाद नवसत्संवर, नवरात्रि और फिर रामनवमी का त्योहार बड़े ही धूम- धाम से मनाया है। पूरा देश रंगों से सराबोर होकर श्रद्धा, भक्ति और आस्था में डूबा हुआ था; परंतु क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमने नौ दिनों तक जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा अर्चना की, देवी के लिए लाल चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर, आलता और जेवर चढ़ाकर हवन - पूजन किया और पूजा समाप्ति के बाद इनमें से बहुत कुछ पूजा सामग्री जैसे-  फूल- मालाएँ, कपड़े, प्लास्टिक, थर्माकोल, रंग- रोगन वाली मूर्तियाँ और भी बहुत सारी चढ़ावे की सामग्री नदी और तालाब में यह कहते हुए विसर्जित कर देते हैं कि यह पूजा की पवित्र सामग्री है, इसे यूँ ही कहीं भी नहीं फेंका जा सकता। 

 यहीं एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। क्या हमने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि जिन जलस्रोतों को गंगा मैया और नर्मदा मैया कहते हुए पूजते हैं, वे हमारे ही हाथों से धीरे-धीरे विषैले बनते जा रहे हैं? वे आज दुर्गंध और गंदगी के कारण उपयोग के योग्य भी नहीं बचे। आखिर यह स्थिति आई क्यों? यह सब  किसी एक व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक उपेक्षा का परिणाम है।

दरअसल समस्या आस्था में नहीं है, समस्या आस्था की हमारी समझ में है। हमारी परंपराओं में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि पूजा के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जाए; बल्कि इसके उलट भारतीय दर्शन में तो प्रकृति को देवतुल्य माना गया है- पृथ्वी माता, जल देवता, वायु देव और अग्नि देव। जब हम इन्हें देव या माता के रूप में पूजते हैं, तो इन्हें प्रदूषित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते।  

आज आवश्यकता है कि हम आस्था और अपने धार्मिक विश्वास को इस अंधविश्वास में न बदलें कि पूजन- सामग्री का जल में विसर्जन ही अनिवार्य है। इस सोच को बदलना जरूरी है। पूजा के बाद जो सामग्री प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकती है- जैसे फूल, पत्ते, लकड़ी, राख, मिट्टी के दीपक और मूर्तियाँ- उन्हें मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का सरल और सम्मानजनक तरीका है, जिससे न आस्था को ठेस पहुँचती है और न पर्यावरण को हानि होती है। और जो वस्तुएँ नष्ट नहीं होतीं- जैसे भगवान के वस्त्र, सजावटी आभूषण, मुकुट, चुनरी, कृत्रिम फूल- उन्हें नदी या तालाब में डालना किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश भर में कई सामाजिक संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन ऐसी पूजा- सामग्री को एकत्र कर उसका पुनः उपयोग या रिसाइक्लिंग कर रहे हैं। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं; बल्कि जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में भी मदद मिलती है। यह एक व्यावहारिक और सकारात्मक समाधान है, जिसमें आस्था भी सुरक्षित रहती है और पर्यावरण भी। कुछ मंदिरों में अलग- अलग डब्बे रखकर भक्तों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है, पर यह कार्य अभी इतने प्रारंभिक स्तर पर है कि इस छोटे से प्रयास मात्र से नदी तालाब को प्रदूषित होने से बचाया नहीं जा सकता। 

अतः यह विषय केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार, समाज और आम नागरिक-  सभी को इसमें अपनी - अपनी भूमिका निभानी होगी। पूजा स्थलों के पास संग्रह केंद्र, स्पष्ट दिशानिर्देश और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए और उनके पालन में भी सख्ती बरतनी चाहिए। कुछ वैसे ही सख्त नियम कि एक दिन हमारा देश भी न्यूजीलैंड की तरह उदाहरण के रूप में रेखांकित किया जा सके। ज्ञात हो कि न्यूजीलैंड में पर्यावरण को लेकर नियम और कानून इतने सख्त हैं कि वहाँ कोई व्यक्ति पानी को प्रदूषित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

सोशल मीडिया जागरूकता का अच्छा माध्यम हो सकता है; लेकिन वास्तविक बदलाव तब आएगा जब हम अपने घरों में, अपने बच्चों को छोटी उम्र से यह सीख देंगे कि पूजा का अर्थ प्रकृति को कष्ट देना नहीं; बल्कि उसका सम्मान करना है। जिस दिन यह समझ आम हो जाएगी, उस दिन नदियाँ भी स्वच्छ होंगी और हमारी आस्था भी। इसके लिए हमें आज अपने पूजा-पाठ के तरीकों में थोड़ा-सा बदलाव लाने की आवश्यकता है। भगवान को फूलों से ढकने की बजाय उनके चरणों में एक फूल चढ़ाकर भी हम अपनी आस्था व्यक्त कर सकते हैं। हवन- पूजन के बाद जली हुई राख को आपने बगीचे या गमलों में डालकर मिट्टी को और अधिक उपजाऊ बना सकते हैं। यदि प्रतिवर्ष आप अपने भगवान के वस्त्र और आभूषण बदलते हैं, तो उन्हें नदी या तालाब में विसर्जित मत कीजिए, इन सबको इकट्ठा कीजिए और उनके लिए रोजगार का माध्यम बनिए, जो इन वस्तुओं का उपयोग करके आपके लिए खूबसूरत सजावटी सामान तैयार करते हैं। 

यदि हमने अपनी आस्था में इन छोटी- छोटी कुछ बातों को जीवन में ढाल लिया, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सच्ची आस्था- तीनों सौंप सकते हैं। तो आइए, हम यह संकल्प लें कि भक्ति निभाते समय प्रकृति की रक्षा करेंगे, क्योंकि नदियाँ तभी माँ की तरह हमें स्नेह करेंगी, जब हम उन्हें साफ- सुथरा रखते हुए,  कल – कल कर बहते हुए रहने देंगे।■

आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ

  - संध्‍या राजपुरोहित

आज का समय अवसरों, संभावनाओं और प्रतिस्पर्धा का समय है। बदलती तकनीक, वैश्वीकरण और नई आर्थिक संरचनाओं ने करियर के पारंपरिक ढाँचे को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। एक समय था जब डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी को ही सफलता का पर्याय माना जाता था; लेकिन आज डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया, डिजाइन, खेल, उद्यमिता और अनेक कौशल आधारित क्षेत्रों में भी उज्ज्वल भविष्य के द्वार खुले हैं। यह विविधता जहाँ एक ओर युवाओं को नए अवसर प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर उनके सामने सही चुनाव की चुनौती भी खड़ी करती है।

भारत का वर्तमान जनसांख्यिकीय परिदृश्य इस चर्चा को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ युवा कार्यबल में प्रवेश करते हैं। यह स्थिति भारत को एक बड़ी संभावित शक्ति प्रदान करती है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। किन्तु यदि इस युवा शक्ति को उचित दिशा, कौशल और अवसर नहीं मिले, तो यही संभावना एक चुनौती में परिवर्तित हो सकती है।

यही वह बिंदु है जहाँ कैरियर चयन और कौशल विकास के बीच का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। विभिन्न रिपोर्ट्स यह संकेत करती हैं कि देश में रोजगार की समस्या से अधिक “रोजगार योग्य कौशल” की कमी एक बड़ी चुनौती है। आज भी लगभग आधे युवा ऐसे हैं जो उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप पूरी तरह तैयार नहीं हैं। कई अध्ययन बताते हैं कि केवल लगभग 50 प्रतिशत ग्रेजुएट ही वास्तव में जॉब-रेडी माने जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए आवश्यक व्यावहारिक दक्षताओं से वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करती है। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी बेरोजगारी के आंकड़ों में बड़ी हिस्सेदारी शिक्षित युवाओं की ही दिखाई देती है। लगभग 65 से 67 प्रतिशत बेरोजगार युवाओं का ग्रेजुएट होना इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि केवल डिग्री हासिल करना सफलता की गारंटी नहीं है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अभी भी अधिकतर सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित है, जबकि उद्योग और समाज को व्यवहारिक कौशल, नवाचार और समस्या समाधान की क्षमता रखने वाले युवाओं की आवश्यकता है।

कौशल अंतर या “स्किल गैप” भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। देश में औपचारिक रूप से प्रशिक्षित युवाओं का प्रतिशत अभी भी बहुत कम है, जो लगभग 4 से 5 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। वहीं, नई तकनीकी क्षेत्रों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और डिजिटल तकनीक में कुशल युवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उस अनुपात में प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध नहीं है। यह अंतर युवाओं के लिए अवसर भी है और चुनौती भी, क्योंकि जो इस दिशा में स्वयं को तैयार करेगा, वही भविष्य में आगे बढ़ेगा।

इसके साथ ही रोजगार की गुणवत्ता भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभर रही है। बड़ी संख्या में युवा अपनी योग्यता से कम स्तर के कार्य करने के लिए मजबूर हैं, जिससे उनमें असंतोष और अस्थिरता की भावना बढ़ती है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी प्रभाव डालती है।

इन सभी तथ्यों और आंकड़ों के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विद्यार्थी अपने कैरियर का चुनाव किस प्रकार करें। इसका उत्तर आत्म पहचान में निहित है। प्रत्येक विद्यार्थी की अपनी रुचियाँ, क्षमताएँ और सपने होते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप क्षेत्र का चयन करता है, तो वह उसमें अधिक समय तक टिकता है, बेहतर प्रदर्शन करता है और अंततः संतुष्टि भी प्राप्त करता है। इसके विपरीत, यदि कैरियर का चुनाव केवल सामाजिक दबाव, तुलना या अधूरी जानकारी के आधार पर किया जाता है, तो वह आगे चलकर असंतोष का कारण बनता है।

सही निर्णय के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी अपने भीतर झांकें, अपनी रुचियों और क्षमताओं को समझें और विभिन्न कैरियर विकल्पों के बारे में ठोस जानकारी प्राप्त करें। आज सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन सही और प्रामाणिक जानकारी का चयन करना भी उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही शिक्षकों, अभिभावकों और कैरियर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेना निर्णय को अधिक सुदृढ़ बनाता है।

इस प्रक्रिया में परिवार और विद्यालय की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर अपने सपनों का बोझ न डालें, बल्कि उनकी रुचियों और क्षमताओं को समझते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। वहीं शिक्षकों का दायित्व केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विद्यार्थियों के मार्गदर्शक बनकर उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए तैयार करते हैं। एक सकारात्मक और सहयोगात्मक वातावरण बच्चों में आत्मविश्वास विकसित करता है और उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आज का समय निरंतर सीखने का समय है। कैरियर अब एक स्थिर विकल्प नहीं, बल्कि एक गतिशील यात्रा बन चुका है, जिसमें समय-समय पर नए कौशल सीखना, स्वयं को अपडेट करना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलना आवश्यक है। यही लचीलापन और सीखने की प्रवृत्ति व्यक्ति को दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जाती है।

अंततः यह स्पष्ट है कि कैरियर का सही चुनाव केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया तभी सफल हो सकती है जब उसमें आत्मविश्वास, सही जानकारी, कौशल विकास और स्पष्ट लक्ष्य का समन्वय हो। आज के विद्यार्थी यदि इन आधारों को समझकर अपने कैरियर की दिशा तय करते हैं, तो वे न केवल अपने लिए एक सफल भविष्य का निर्माण करेंगे, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

याद रखना होगा कि कैरियर का चुनाव भीड़ का अनुसरण नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझते हुए अपनी राह बनाने की प्रक्रिया है। सही कैरियर वही है, जहाँ रुचि, क्षमता और लक्ष्य एक साथ मिलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं।

 लेखक के बारे में-  सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षा कें क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में मध्‍यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में जीवन कौशल शिक्षा से जुडी है।  डेढ़ दशक से अधिक समय तक स्‍कूली शिक्षा से सम्‍बद्ध रही है। ■

मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ

 -  अजय मोहन

प्रशांत और हिंद महासागर से जुड़ा है मौसम का बदलता पैटर्न

फरवरी मध्‍यम में गर्मी की दस्तक के बाद मार्च में ही हीटवेव का आना गंभीर संकेत है। इसके पीछे क्या कारण हैं, जानिए इस रिपोर्ट में जो हाल ही में वैज्ञानिकों ने तैयार की है।

भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सामान्यतः ला नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के असर को कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में सर्दियाँ  छोटी होती जा रही हैं और गर्मी पहले से कहीं जल्दी दस्तक दे रही है। और वर्तमान में चल रहे मार्च के महीना में ऐसा देखने को भी मिल रहा है। 

एक समय था जब मार्च के मध्‍य तक उत्तर भारत में लोग कम से कम हाफ स्वेटर पहन कर रहते थे। दिन में भले ही थोड़ी गर्मी हो, लेकिन रातें ठंडी रहती थीं। ओर जब बात हीट वेव की आती थी, तब मार्च में लोग केवल यह सोच कर रहत में रहते थे कि अभी मई-जून दूर है। लेकिन अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा है। 

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष भी भारत में फरवरी के पहले पखवाड़े में ही सर्दी लगभग समाप्त हो गई और कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से जल्दी गर्मी शुरू हो गई। यह बदलाव केवल तापमान का नहीं है, बल्कि इससे जल संकट, कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

फरवरी से ही बढ़ने लगी गर्मी

मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर तापमान हीटवेव की सीमा तक पहुंचने लगा।

तीन प्रमुख स्थान जहाँ हीटवेव जैसा महसूस हुआ वो हैं:

1. मुंबई : जहाँ 10 मार्च को तापमान 40°C दर्ज हुआ, जो सामान्य से 7.6°C अधिक था और इसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा गया।

2. दिल्ली-एनसीआर : यहाँ अधिकतम तापमान लगभग 35°C रहा, जो सामान्य से 5–7°C अधिक है।

3. हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र: पहाड़ होने के बावजूद यहाँ सामान्य से 5.1°C से 8°C अधिक तापमान दर्ज किया गया।

मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव वाले दिन देखने को मिल सकते हैं।

क्या होता है हीटवेव?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) हीट वेव को इस प्रकार परिभाषित करता है- जब तापमान सामान्य से काफी अधिक हो या वास्तविक तापमान एक निश्चित सीमा पार कर जाए तब उस क्षेत्र में हीट वेव घोषित की जाती है। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार तापमान का पैमाना इस प्रकार है- 

• मैदानी क्षेत्रों में: जब अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक हो

• पहाड़ी क्षेत्रों में: जब तापमान 30°C या उससे अधिक हो

• तटीय क्षेत्रों में: जब तापमान 37°C या उससे अधिक हो

यदि यह स्थिति लगातार दो दिन तक बनी रहती है और एक से अधिक मौसम केंद्रों पर दर्ज होती है, तब इसे आधिकारिक रूप से हीटवेव घोषित किया जाता है।

हीटवेव को विस्तार से समझिए इस टेबल में -

क्षेत्र आधार मानदंड हीटवेव (Heatwave) गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave)

मैदानी क्षेत्र (Plains) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 40°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 45°C सामान्य से 6.4°C से अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 47°C

पहाड़ी क्षेत्र (Hills) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 30°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक सामान्य से 6.4°C से अधिक

तटीय क्षेत्र (Coastal) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 37°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C या उससे अधिक-

सर्दियाँ  क्यों हो रही हैं छोटी?

रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उत्तर भारत में दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई।

• फरवरी में 81% वर्षा की कमी दर्ज की गई।

• सामान्यतः फरवरी में लगभग 22.7 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल 4.2 मिमी बारिश हुई।

इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) सामान्य से अधिक आए, लेकिन अधिकांश कमजोर रहे और पर्याप्त बारिश नहीं कर सके। कम बारिश और बादलों की कमी के कारण तापमान तेजी से बढ़ने लगा और सर्दी जल्दी समाप्त हो गई।

ला नीना भी नहीं रोक पा रहा गर्मी का बढ़ना

आमतौर पर ला नीना प्रशांत महासागर में ठंडे समुद्री तापमान से जुड़ा एक जलवायु चक्र है, जो वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025, ला नीना की स्थिति के बावजूद 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। पिछले 11 वर्षों में से सभी 11 वर्ष रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ गया है कि अब प्राकृतिक शीतलन प्रभाव भी पर्याप्त नहीं रह गया।

बढ़ती आर्द्रता और ‘वेट बल्ब तापमान’ का खतरा

तटीय क्षेत्रों में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि नमी भी तेजी से बढ़ रही है। इससे वेट बल्ब तापमान बढ़ता है। यानी वह तापमान जिसे शरीर महसूस करता है। जब नमी अधिक होती है तो शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ने के साथ-साथ अन्‍य कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी मौसम के असंतुलन का बड़ा कारण है।

• 1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान लगभग 1.2°C प्रति शताब्दी की दर से बढ़ा।

• भविष्य के मॉडल बताते हैं कि 2000 से 2100 के बीच यह वृद्धि 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक हो सकती है।

यह समुद्री गर्मी मानसून, वर्षा और चक्रवातों के पैटर्न को भी प्रभावित कर सकती है। समुद्र का तापमान जितना अधिक होगा मॉनसून में आने वाले चक्रवात उतने अधिक विनाशकारी होंगे। बीते वर्षों में बुलबुल, फानी, मोचा, सितरंग, आदि कितने भयावह थे, यह भारत व पड़ोसी देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अच्‍छी तरह जानते हैं।   

उत्तर भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

उत्तर भारत विशेषकर इंडो-गंगेटिक मैदान, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली पहले से ही गर्मी की लहरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहाँ पर मई-जून में लू चलना आम बात है। हीट-वेव के दिन बढ़ने के कारण गर्म हवाएँ और अधिक गर्म हो सकती हैं। 

इससे इन राज्यों में निम्नलिखित जोखिम बढ़ सकते हैं:

1. लंबी हीटवेव से ज्यादा समय तक गर्म हवाएँ

2. रात्रि के तापमान में वृद्धि 

3. पेट संबंधी बीमारियों का खतरा 

4. जल संकट और भूजल पर दबाव

5. गेहूं जैसी रबी फसलों पर असर

6. शहरी क्षेत्रों में हीट आइलैंड प्रभाव

7. श्रम उत्पादकता में गिरावट 

भारत में मौसम के पैटर्न के बदलने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान बढ़ने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान में परिवर्तन

1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी का परिणाम है, हालांकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न एरोसोल तथा भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC) में बदलाव इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। पिछले तीन दशकों (1986–2015) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस और सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि

वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण महाद्वीपीय हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्री जल का तापीय प्रसार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया भर में समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है। उत्तरी हिंद महासागर (NIO) में 1874 से 2004 के बीच समुद्र स्तर में वृद्धि की दर लगभग 1.06 से 1.75 मिमी प्रति वर्ष रही, जो पिछले लगभग ढाई दशकों (1993–2017) में बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष तक पहुँच गई है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात

बीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1951–2018 के बीच उत्तरी हिंद महासागर बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की कुल वार्षिक संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इसके विपरीत, मानसून के बाद के मौसम में आने वाले बहुत गंभीर चक्रवाती तूफानों (Very Severe Cyclonic Storms - VSCS) की आवृत्ति पिछले दो दशकों (2000–2018) में स्पष्ट रूप से बढ़ी है, जिसमें औसतन प्रति दशक लगभग एक अतिरिक्त घटना दर्ज की गई है।

हिमालय में परिवर्तन

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में 1951 से 2014 के बीच औसत तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के दशकों में इस क्षेत्र के कई हिस्सों में हिमपात में कमी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रवृत्ति देखी गई है। हालांकि इसके विपरीत, उच्च ऊंचाई वाले काराकोरम हिमालय में सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हिमपात हुआ है, जिसके कारण यहाँ के ग्लेशियर अन्य क्षेत्रों की तुलना में सिकुड़ने से काफी हद तक बचे हुए हैं।

भारी वर्षा और सूखा

1950 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं—यानी एक दिन में 150 मिमी से अधिक बारिश—की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, 1951 से 2015 के दौरान भारत में सूखे की घटनाओं की संख्या और उनका भौगोलिक विस्तार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

आगे क्या करना होगा?

रिपोर्ट के माध्‍यम से विशेषज्ञों ने कहा है कि बदलते मौसम से निपटने के लिए केवल चेतावनी र्याप्त नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:

• शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू करना

• जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना

• जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना

• शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र और जल निकायों का संरक्षण

कुल मिलाकर भारत में मौसम के पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सर्दियों का छोटा होना और गर्मी का जल्दी आना अब अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य बनता जा रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियाँ  नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव, जल संकट और मौसम की अनिश्चितता भारत के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है। ( indiawaterportal) ■

यात्रा वृत्तांतः उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर

 - डॉ. आरती स्मित 

यात्राएँ कहीं की हो, रोमांच पैदा करती हैं। मध्य प्रदेश कई कारणों से मेरा प्रिय स्थल रहा है, हालाँकि स्वरूप बदल रहा है, कहानियाँ बदल रही हैं, तब भी वह प्रांत आदि मानव का प्रांत होने के साथ ही अपनी स्थापत्य कलाओं, प्राचीन गुफाओं और एक बड़े हिस्से में आदिदेव महादेव की नगरियों के कारण मुझे अति प्रिय है। 

  साहित्य अकादेमी, भोपाल के आमंत्रण पर ‘गंज बसौदा’ जाने हेतु सहमति के पीछे एक बालसुलभ ललक थी- दसवीं सदी में स्थापित, शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते  उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर जाने और शिव के उस प्रतीक के दर्शन-पूजन की, जिनका अभिषेक करने प्रतिवर्ष शिवरात्रि की प्रात: रश्मियाँ धरती पर उतरती हैं। यह गल्प लग सकता है, किंतु यह सच है। इस मंदिर के इतिहास में कई गल्प भी शामिल हुए होंगे, किंतु यह उस महान कलाकार के ज्ञान का प्रत्यक्ष नमूना है। दसवीं सदी का वह शिल्पकार कितना विलक्षण रहा होगा, यह अनुमान लगाना भी कठिन जान पड़ता है।

   दिल्ली से गंज बसौदा की रेलयात्रा कुछ कष्टप्रद रही। किंतु स्थानीय संयोजक युवा कवि ध्रुव शर्मा द्वारा गंज बसौदा में की गई व्यवस्था बेहद व्यवस्थित और उत्कृष्ट थी। नीलकंठ महादेव के नाम पर ही होटल का नामकरण किया गया था—नीलकंठ। कार्यक्रम के सफल समापन के उपरांत अगले दिन ११ मार्च २०२५ को स्थानीय युवा सन्नी, उसकी बहन रोशनी, युवा कवयित्री शिखा, प्रगति एवं कार्यक्रम में शिरकत करने आए युवा साथी संदीप एवं राहुल के साथ यह यात्रा आरंभ हुई। इस प्रकार, एक से दो और दो से सात यात्री हो गए। दो स्कूटी एवं एक मोटर बाइक से बिना हेलमेट के १८ किलोमीटर की यात्रा भी रोमांचक रही। 

   गंज बसौदा यों तो विदेश निर्यात किए जाने वाले उम्दा पत्थर एवं उत्तम गुणवत्ता वाले गेहूँ के लिए प्रसिद्ध है, किंतु स्थानीय जन के बीच वहाँ के कुछ मंदिर प्रसिद्ध हैं जिनमें से एक राम मंदिर भी है। हालाँकि उस परिसर में शक्ति मंदिर भी है और गुरु गोरखनाथ के भव्य मंदिर निर्माण-कार्य चल रहा था। राम मंदिर तक की लघु यात्रा शिखा की स्कूटी से हुई थी। यहाँ से रोशनी के साथ यात्रा आगे बढ़ी। हमने स्टॉल से चेहरा और सिर ढँक रखा था। फिर भी गर्म हवा अपना प्रभाव जमाने में सफल रही। गंज बसौदा से उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर के लिए कोई सवारी गाड़ी या निजी गाड़ी आती-जाती नहीं दिखी। न बस, न ऑटो। रास्ता भी कुछ दूर के बाद शांत ही था। आसपास घर भी न के बराबर। सड़कें कहीं-कहीं बिगड़ी हालत में मिलीं। दोनों ओर खेत में लहराती सुनहरी फसल पथिकों का मन मोह लेते हैं। मंदिर के निकट पहुँचने का संकेत उसके गोपुरम से मिल जाता है जो रास्ते से दिखता है। 

   लगभग चालीस मिनट बाद हमें दूर से मार्ग की दायीं दिशा में भील राजा का कोट (क़िला) दिखने लगा जिससे राजा भोज के वंशज वीरसेन ने आक्रमण करके जीता था और उस इलाक़े पर आधिपत्य स्थापित किया था। बाद में मंदिर के पुजारी श्री महेंद्र शर्मा ने आक्रमण से लेकर उदयपुर की स्थापना एवं मंदिर निर्माण से जुड़ी लंबी कथा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए बताया, अब भी उस क़िले के भीतर के कुछ अवशेष बचे हुए हैं जिन्हें देखा जा सकता है।

      मंदिर के प्रवेश द्वार से कुछ पूर्व दोनों ओर फूल-प्रसाद की दुकानें हैं, जहाँ भक्त अपनी पसंद और इच्छानुसार फूल-प्रसाद आदि लेते हैं। प्रवेश द्वार के पास ही जल की मशीन लगी हुई है, जहाँ से शिवलिंग पर चढ़ने के लिए भी जल भर लिया जाता है। जलते तलवों की चीख सुनते हुए हम जल्दी-जल्दी मुख्य मंदिर में प्रवेश हेतु चलने लगे किंतु दृष्टि रह-रहकर परिसर में आठों कोनों में बने वेदीमंडप एवं मुख्य मंदिर के गोपुरम की शिल्पकला में अटकती रही। प्रत्येक खंभे पर बारीक नक़्क़ाशी एवं देवी-देवताओं के अलग-अलग आकार की मूर्तियाँ तराशी हुई थीं, जो एक-दूसरे से जुड़कर गोपुरम का स्वरूप धारण कर रही थीं। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा ने बताया, “प्रत्येक खंभा अलग-अलग पत्थरों पर शिल्पकला उकेरने के बाद लोहे के तार से भीतर ही भीतर परस्पर इस प्रकार जोड़ा हुआ है कि खंभा एक पत्थर से बना होने का भ्रम होता है।” मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थर की कई सीढ़ियों के ऊपर है, जहाँ मंदिर दो हिस्सों में प्रतीत होता है। खुले चबूतरे के बाद दोनों ओर के मोटे-मोटे खंभों पर नीचे से लेकर लगभग ढाई-तीन फीट तक शिलालेख हैं, वे पत्थर ही अन्य से कुछ अलग दिखते और दीवारों से मेल खाते हैं। उसके ऊपर बारीक शिल्पकला का अद्भुत नमूना, कहीं बड़ी मूर्तियाँ भी और उन मूर्तियों के किसी अंग में जाली-- उसी पत्थर से। 

    एक भी कोना खाली न दिखा जहाँ कुछ निर्मिति न हो। गर्भगृह के द्वार पर द्वारपाल बने हैं और इससे बाहरी द्वार पर यक्ष, गण आदि बने हुए हैं। एक स्थल पर विष्णु के मस्तक के स्थान पर बकरे का मस्तक, इसी प्रकार गणपति कई रूपों में दिखाई दे जाते हैं। उनकी छोटी-सी प्रतिमा में बनी सूँढ़ के भीतर गोलाई से छिद्र बना है, जिसमें धागा या पतली डोर घुस सके, इतनी जगह है। इसी प्रकार हाथी तथा अन्य कलाकृतियों में भी। चारों ओर कलाकृतियों से से घिरे खंभों और दीवारों के बीच नंदी अपना स्थान ग्रहण किए है। सीलिंग पर एक स्थान पर फूल की खिली पंखुरियों के भीतर की ओर उकेरी गई शिल्पकला को देखने के लिए मोबाइल के कैमरे को सेल्फ़ी मोड पर ले जाकर उस स्क्रीन पर देखना संभव होता है। यह तरीक़ा हमें पुजारी जी ने ही बताया। गर्भ गृह में उतरकर शिवलिंग के ऊपर चढ़े पीतल की खोल में बने भोलेनाथ की छवि भी कुछ अलग-सी है मानो पुरुष के अंतस की स्त्रैण प्रकृति का मूर्त रूप हो। प्रतिदिन उन्हीं का अभिषेक-सिंगार होता है। उस खोल के नीचे मूल शिवलिंग का एकाध इंच हिस्सा दिखाई पड़ता है। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा के कथनानुसार, शिवरात्रि के दिन प्रात:बेला में सूर्यकिरणें सीढ़ियाँ चढ़ती हुई शिवलिंग को स्पर्श कर, उसी दिशा में ऊपर दीवार तक जाती हैं। इसलिए उस खोल को केवल शिवरात्रि के दिन ही हटाया जाता है। उस दिन समस्त श्रद्धालु मूल शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं। खोल या आवरण पहनाने का कारण शिवलिंग के पत्थर को क्षय से बचाने का प्रयास मात्र है। दसवीं सदी से आज तक शिवलिंग ही नहीं, मंदिर का आंतरिक हिस्सा भी ज्यों का त्यों है। बाहरी हिस्से में गोपुरम की कुछ मूर्तियों के अंग भंग दिखाई देते हैं। इस मंदिर से जुड़ी कई विलक्षण बातों एवं कथाओं में से एक कथा यह भी है, जिसे सत्यकथा मानी जाती है। राजा भोज के वंश के राजा वीरसेन को स्वप्न में शिव मंदिर बनाने का आदेश मिला था। कथा लंबी है। जिसमें किसी कारण के तहत निश्चित समय मंदिर पूरा हो जाना था। प्रधान शिल्पकार ने एक ही रात में यह मंदिर खड़ा किया। शिल्पकारी के बाद वे पत्थर परिसर में ला-लाकर रखते थे। मंदिर जोड़ते-जोड़ते ऊपर गोपुरम तक वे गए। रात भर वे काम करते रहे, भोर होने तक वे उतर न पाए और सूर्य की किरणों के स्पर्श के साथ वे भी पत्थर के हो गए। आज भी मंदिर के शीर्ष पर पत्थर का एक आदमी उतरने की जुगत सोचता नज़र आता है। इस गोपुरम में बनी कुछ मूर्तियाँ शिल्पकार की अनूठी चिंतनदृष्टि का परिणाम कही जा सकती हैं। जैसे कि गणपति का स्त्री रूप, कहीं नर-नारी रूप में गणपति, कहीं अर्धांगेश्वर के रूप में महादेव एवं विष्णु एक साथ तो कहीं शक्ति अलग ही रूप में …. ऐसी कई विशेषताएँ जो अन्य गोपुर की कलाकृतियों से इसे भिन्न करती है। पर्यटकों द्वारा इसे स्वयं देख-समझ पाना तो कठिन होता होगा, पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा जी ने स्वयं एक-एक विशिष्ट प्रतिमा दिखलाई और उसके निर्माण के पीछे शिल्पकार की दृष्टि पर संवाद किया। 

     मंदिर की विशिष्टता के साथ ही पुजारी जी के गुणों का उल्लेख किए बिना यह वृत्तांत पूरा न होगा। उनकी उदारता से पलकें भीगने का समय तब आया जब उन्होंने आग्रह करके एक कोने में रखी अपनी चप्पल पहन लेने को कहा ताकि धूप से मेरे पैर न जलें और स्वयं नंगे पाँव धूप में चलते हुए, परिसर का एक-एक कोना दिखाते और ख़ूबी बताते चले। 

     परिसर में ही फ़र्श पर पूरे मंदिर का नक़्शा बना हुआ है जो धुँधला गया है। मंदिर का कार्य निर्विघ्न पूरा हो, इसलिए आठों दिशाओं में वेद मंडप बनाए गए जिनमें नियमपूर्वक यज्ञ होता था। प्रमुख मंडप अन्य वेदी मंडप से बड़ा और मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने है। राजा उदयसेन के नाम पर यह प्रांत उदयपुर कहलाया। जहाँ से सूर्य किरणें भूमि से मंदिर के लिए उर्ध्वमुखी होती हैं, उस स्थान से गर्भगृह का शिवलिंग (तेज़ प्रकाश से अँधेरे में देखने के कारण) नहीं दिखा किंतु जलता दीया दिखा। शिवलिंग के ठीक पीछे शक्ति की प्रतिमा स्थापित है जो कुछ अलग सी है। शक्ति की प्रतिमा ढाई-तीन सौ वर्ष मात्र पुरानी है। 

     चलते-चलते पुजारी जी ने बताया कि जब से यह मंदिर बना है, यानी दसवीं सदी से अब तक एक वंश के ही पुजारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा का दायित्व निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे। सबसे अच्छी बात लगी कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह न तो पुजारियों ने कोई वीआईपी द्वार बनाया है, न वीआईपी पंक्ति और न ही वे भक्तों को मूर्ख बनाकर लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं। कहीं दान पेटी नहीं दिखी। कुछ लोग सुकून के लिए परिसर में बैठे दिखे। न कोई रोक-टोक, न ही किसी के द्वारा कोई अभद्रता। हमने कुछ तस्वीरें लीं। तीन बज चुके। फिर हमने उस पावन भूमि को प्रणाम किया और परिसर से बाहर निकल आए। स्थानीय जन ने बताया, पुजारी जी इस तरह किसी को समय नहीं देते। आपको तो उन्होंने अपने भोजन की बेला बीतने देकर एक-एक महत्त्वपूर्ण बात बताई। इसे शिव की कृपा ही कहा जा सकता है क्योंकि हमने देखा, लोग मंदिर घुसते-निकलते या कहीं बैठकर सुस्ताते रहे और फिर परिसर से बाहर हो गए। 

     एक बार फिर स्कूटी पर आनंद भरा सफ़र शुरू हुआ। अब हृदय इत्मीनान से की गई पूजा, मंदिर के कलात्मक सौंदर्य, उसके इतिहास, संबद्ध कथाओं तथा मंदिर के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने की बातों से पूर्ण आनंद में रहा। वापसी में भील राजा के कोट (दुर्ग) ने भी आने का आमंत्रण दिया। अब भी कुछ निशानियाँ बची हैं। आदिवासी राजाओं का हर जगह परास्त होते जाने और उनके सल्ला-गंगरा को सनातन धर्म में शिवलिंग माने जाने की सोच भी एक कोने में तारी रही। ठीक चार बजे हम होटल नीलकंठ के सामने थे, जहाँ मुझे ठहराया गया था और जहाँ से कुछ घंटों में विदा होकर दिल्ली की यात्रा शुरू होनी थी। 

   दिल्ली के व्यस्त और शोरभरी दिनचर्या में जब भी उस मंदिर की शांति भीतर उमड़ती है, चेतना नीलकंठ महादेव को निकट पाती है।  ■

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