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Oct 1, 2026

उदंती.com, अक्टूबर- 2026

वर्ष- 19, अंक- 3

   जब तक हम अपने किसानों के अधिकारों का समर्थन नहीं करेंगे, तब तक विकास संभव नहीं।     -लाल बहादुर शास्त्री


इस अंक में 

अनकहीः कब मिलेगी नारी को वास्तविक बराबरी ? - डॉ. रत्ना वर्मा

धरोहरः दुनिया के आश्चर्य को समेटे सरगुजा - रविन्द्र गिन्नौरे

लघुकथाः उम्मीद के पंख - अनीता पंडा ‘अन्वी’

व्यक्तित्वः देश के बेमिसाल लाल, लाल बहादुर शास्त्री - हरी राम यादव

विज्ञानः मनुष्य बनने की ओर कृत्रिम बुद्धि रोबोट - प्रमोद भार्गव  

आलेखः आधी दुनिया की पूरी कहानी - डॉ. योगिता जोशी

शोधः नींद पूरी होने का हिसाब रखता है मस्तिष्क – स्रोत फीचर्स

कविताः तू रहना माँ - डॉ. कनक लता मिश्रा 

कविताः माँ तुम थी तो - कृष्णा वर्मा       

यादेंः मीठी नींद, मीठे सपने - शशि पाधा

सॉनेटः मुक्त हो जाओ - अनिमा दास 

लघुकथाः ज़रूरत - आनन्द हर्ष

कहानीः स्कूल-ट्रिप - कुलबीर बड़ेसरों, पंजाबी से अनुवाद- सुभाष नीरव

व्यंग्यः गुमशुदा और शादीशुदा - अख़तर अली

लघुकथाः स्मृतियाँ - नमिता सिंह ‘आराधना’ 

किताबेंः रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना का रेखांकन - डॉ. सुरंगमा यादव

कुण्डलियाः पंख फैलाती रहना - परमजीत कौर ‘रीत’

अनकहीः कब मिलेगी नारी को वास्तविक बराबरी?

 डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ ही दिनों में आदिशक्ति की आराधना का पावन पर्व नवरात्र का शुभारंभ होने वाला है। इन नौ दिनों में पूरा देश देवी दुर्गा की भक्ति, गरबा की उमंग और अनुष्ठानों के उल्लास में सराबोर हो जाता है। कन्या पूजन और कन्या भोज के द्वारा मासूम बच्चियों में साक्षात् जगद्जननी का रूप निहारना हमारी सांस्कृतिक सभ्यता और सदियों पुरानी समृद्ध विरासत का हिस्सा रहा है। हमारे संस्कारों ने स्त्री को हमेशा जननी और देवी के सर्वोच्च पद पर आसीन किया है।

लेकिन इस पावन आस्था के आवरण के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई बहुत भयावह है। जिस देश में देवी की पूजा की परंपरा रही है, उसी समाज में सदियों से नारी की अवहेलना, उस पर अत्याचार और दोहरे दर्जे का अन्याय भी समानांतर चलता आ रहा है। जब 21वीं सदी और बराबरी के इस आधुनिक दौर में भी हम नारी के साथ बर्बर भेदभाव और उत्पीड़न की ख़बरें पढ़ते हैं, तो मन अफ़सोस और ग्लानि से भर जाता है।

हाल ही में आई कुछ खबरों ने समाज के इस दोहरे चरित्र को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से आई एक दिल दहला देने वाली घटना में एक माह की मासूम बच्ची को सिर्फ इसलिए पानी से भरे टब में डुबोकर मार दिया गया और पीठ पर भारी ईंट रख दी गई; क्योंकि वह परिवार की दूसरी बेटी थी। हत्या के बाद चुपचाप अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गई; लेकिन स्थानीय आशा कार्यकर्ता की सतर्कता से यह खौफनाक सच सामने आ गया। इस अमानवीय कृत्य पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने आरोपी दादा की जमानत याचिका खारिज करते हुए जो टिप्पणी की, वह समाज के मुँह पर करारा तमाचा है। माननीय कोर्ट ने अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए कहा- ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 80 साल बाद भी देश में लोग लड़के को प्राथमिकता देते हैं।’

 जिस देश में नवरात्र के दिनों में हम नौ दिनों तक छोटी-छोटी कन्याओं के पैर धोकर उन्हें भोजन कराते हैं, उसी देश में आज भी बेटी होने के अपराध में एक माह की मासूम को तड़पा-तड़पाकर मार दिया जाता है। यह घटना साबित करती है कि आधुनिकता और विकास की बातें केवल कागजी हैं; हमारी सामाजिक जड़ों में आज भी बेटा और बेटी का भेदभाव गहराई तक समाई हुई है।

पर यह सिर्फ नवजात बच्चियों के जीने के अधिकार का मुद्दा नहीं है, बल्कि जो बेटियाँ जीवित बच जाती हैं, उनके साथ भी जीवन के हर मोड़ पर भेदभाव किया जाता है। यदि हम सोचते हैं कि शिक्षा और आधुनिकता ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा कर दिया है, तो वैश्विक आँकड़े हमारी इस गलतफहमी को दूर कर देते हैं।

हाल ही में जारी यूएन वीमेन की जेंडर स्नैपशॉट 2026 की रिपोर्ट हमारी आँखें खोलने के लिए काफी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और अवसर मिलने की मौजूदा रफ्तार यही रही, तो पूरी दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार पाने में 171 साल और लगेंगे। वहीं, दुनिया भर की संसदों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर प्रतिनिधित्व मिलने में लगभग 63 साल का समय लग जाएगा।

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जीवन के हर क्षेत्र में- चाहे वह राजनीति हो, कॉर्पोरेट जगत् हो या विज्ञान और तकनीक का क्षेत्र- महिलाओं को पीछे ही धकेला जा रहा है।- दुनिया भर की संसदों में महिलाओं के पास केवल 27.4 प्रतिशत सीटें हैं वहीं सरकार के बड़े मंत्रालयों में महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है -वित्त व आर्थिक मामलों में 19 प्रतिशत, कानून व न्याय में 18 प्रतिशत, और रक्षा में मात्र 11 प्रतिशत। 

कॉर्पोरेट लीडरशिप में वैश्विक स्तर पर महिलाएँ आज भी बहुत पीछे हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के 80 प्रतिशत देशों में समान पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम तनख्वाह मिलती है। टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी मात्र 22 प्रतिशत है और बड़े पदों पर केवल 14 प्रतिशत। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हम 21वीं सदी में प्रवेश तो कर चुके हैं, लेकिन महिलाओं को नेतृत्व, निर्णय लेने की शक्ति और समान अवसर देने के मामले में हमारी मानसिकता आज भी बहुत संकुचित है।

यूएन रिपोर्ट का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस देश की संसद में महिलाओं की भागीदारी 20 प्रतिशत से अधिक होती है, वहाँ बच्चों की सेहत, टीकाकरण और माँ-बच्चे का स्वास्थ्य काफी बेहतर रहता है। यानी जब महिला को नीति-निर्माण और शासन में बराबरी की जगह मिलती है, तो पूरा समाज और आने वाली पीढ़ी स्वस्थ बनती है। अफसोस इसके बावजूद हम महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर आगे बढ़ने से रोकते हैं।

हमारे समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम स्त्री को देवी का दर्जा देकर उसे आसमान पर बिठा देते हैं, लेकिन जमीन पर उसे एक सामान्य मनुष्य का अधिकार देने से भी कतराते हैं। जब तक हम स्त्री को केवल भक्ति का पात्र मानेंगे और व्यावहारिक जीवन में उसे बराबरी, सुरक्षा और स्वतंत्रता नहीं देंगे, तब तक नवरात्र के ये उत्सव और कन्या-पूजन केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएँगे। यदि हमें वास्तव में माँ दुर्गा की भक्ति और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना है, तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा- बेटियों के जन्म पर मातम मनाने या उन्हें बोझ समझने की घटिया मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा, घर के फैसलों से लेकर देश की संसद और कॉर्पोरेट तक, महिलाओं को पुरुषों के बराबर निर्णय लेने का अधिकार देना होगा, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव खत्म कर उन्हें समान काम के लिए समान वेतन और सुरक्षित माहौल देना होगा।

नवरात्र का पावन पर्व हमें केवल उपवास रखने या गरबा खेलने का संदेश नहीं देता, बल्कि वह नारी शक्ति के सम्मान और भेदभाव को भी दूर करने का भी संदेश देता है। आज समय आ गया है कि हम ढोंग और दिखावे से बाहर निकलें; क्योंकि जब तक आजादी के 80 साल बाद भी मासूम बच्चियों की बलि चढ़ती रहेगी और महिलाओं को अपना हक पाने के लिए सदियों का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक हमारी संस्कृति और विकास के दावे अधूरे रहेंगे। सच्चे अर्थों में कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब हर बेटी को इस धरती पर जन्म लेने, पढ़ने, बढ़ने और बराबरी से काम करने का पूर्ण अधिकार मिलेगा।

धरोहरः दुनिया के आश्चर्य को समेटे सरगुजा

- रविन्द्र गिन्नौरे 

सरगुजा में एशिया की सबसे पहली रंगशाला है, सीता बेंगरा। सोलह सौ फीट ऊँचे पहाड़ की चट्टान को तराश कर बनी है यह रंगशाला। ऐसे मुक्ताकाशी रंगमंच (ओपन एयर थिएटर) की परंपरा वैदिक काल से शुरू हुई थी। त्रेतायुग में राम का वनवास काल और कालिदास का रामगिरि सहित ईसा पूर्व तीसरी सदी की समृद्ध सभ्यता एवं संस्कृति को समेटे हुए हैं रामगढ़ की पहाड़ियाँ।

छत्तीसगढ़ का सरगुजा अपने आगोश में युगों की गाथा, ऐतिहासिकता और पुरा-अवशेष संपदा समेटे हुए है। कहा गया है कि त्रेतायुग में राम ने वनवास काल में यहाँ विश्राम किया था। महाकवि कालिदास की रामगिरि भी यही है, जहाँ बैठकर कवि ने ‘मेघदूत’ की रचना की थी। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की सभ्यता के पुष्ट प्रमाण रामगढ़ की पहाड़ियों में विद्यमान हैं। यही है सीता बेंगरा, जहाँ नाटक और गीत-संगीत के आयोजन होते थे।

सरगुजा अर्थात ‘सुर’ और ‘गजा’ - अर्थात देवता या सुर-संगीत और हाथियों वाली धरती। ‘स्वर्गजा’- स्वर्ग और जा अर्थात स्वर्ग के समान वाला प्रदेश। तीसरा नाम ‘सुरगुंजा’- सुर और गुंजा अर्थात गीतों के मधुर स्वरों का गुंजन। सभी नाम सरगुजा की विशिष्टता को साकार करते हैं। सुर और संगीत की तान यहाँ के गुफा रंगमंच में कभी गूंजती थी। सुरम्य वन-प्रकृति में हाथियों के स्वच्छंद विचरण वाली यह धरती है। मुगल काल में सेना के लिए यहीं से हाथी भेजे जाते थे। रामायण काल में ‘दंडकारण्य’ और 10वीं सदी में ‘डांडोर’ के नाम से जाना जाता रहा आज का सरगुजा।

सरगुजा का गुफ़ा नाट्यालय

सरगुजा के गुफा रंगमंच को सबसे पहले कर्नल आउसुले ने 1848 में देखा। इसी आधार पर 1904 में डॉ. टी. ब्लास ने रामगढ़ की पहाड़ियों के पुरावशेषों का अध्ययन किया। ब्लास ने गुफा रंगमंच को भारत के महान आश्चर्यों में शामिल किया और जर्मन भाषा में इस पर विस्तृत विवरण लिखा।

पुराविद् डॉ. टी. ब्लास ने अपनी रिपोर्ट में इसे प्राचीन नाट्यशाला बताया। ब्लास ने कहा है, “रामगढ़ की पहाड़ी में अवस्थित सीता बेंगरा गुफा स्पष्ट तौर पर ऐसे तपस्वी का आश्रय नहीं हो सकती, जो संसार से विरक्त होकर यहाँ पुण्यशील क्रियाओं में संलग्न थे; बल्कि यह एक ऐसी जगह थी जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच में अभिनय होता था।”

छत्तीसगढ़ में गीत-संगीत, अभिनय और कला ईसा पूर्व तीसरी सदी में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी थी। इस काल में रामगढ़ और उसके आसपास समृद्ध नागर सभ्यता रही थी। ईसा पूर्व तीसरी सदी में रामगढ़ की पहाड़ियों को तराश कर तीन वृहत् निर्माण किए गए- पहला नाट्यशाला सीता बेंगरा, दूसरा गुफा-चित्रकारी जोगीमारा, और तीसरा आवागमन के लिए बनाई गई हाथीपोल सुरंग।

अरण्य का गोपन

रामगढ़ की नाट्यशाला पर ममगैन लिखते हैं, “रामगढ़ की नाट्यशाला निश्चित ही एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला है। यहाँ पंच विधान, पर्ण परिधि, दर्शक दीर्घा, कौतुक मंडल, कर्णाक्ष छिद्र, ध्वनि रूपक आदि की सारी व्यवस्था का ध्यान नाट्यशाला के निर्माण में सुनिश्चित किया गया है। विशेष अवसरों पर यहाँ नाटकों का मंचन किया जाता रहा होगा।”

कालिदास का रामगिरि

कवि कालिदास ने राम के यहाँ आने का उल्लेख करते हुए 'मेघदूतम्' के प्रथम श्लोक में लिखा है:

दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन्निवत्स्यसि।

चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसन्निभः॥

(वाल्मीकि रामायण)

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः

शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।

यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु

स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेशु॥

(मेघदूतम्, पूर्वमेघ - श्लोक 1)

महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना यहीं की थी। कालिदास ने निर्वासित यक्ष बनकर स्वयं अपनी विरह-वेदना को जिस स्थल पर लिखा, वह यही रामगिरि है। यक्ष ने अपना प्रणय-संदेश मेघ को दूत बनाकर मानसरोवर स्थित अलकापुरी में अपनी प्रियतमा के पास भेजा था।

कालिदास ने ‘मेघदूत’ में 'सीता कुंड' का वर्णन किया है- यही रामगढ़ के कालिदास की रामगिरि होने का पुख्ता आधार है। हाथीपोल सुरंग के भीतर पहाड़ से रिसकर एक शीतल जल कुंड बना है, जिसे सीता कुंड कहा जाता है।

लोकगीत में राम

सरगुजा के लोकगीतों और किंवदंतियों में राम की महिमा गाई जाती है। राम को महिमामंडित करते हुए यहाँ के कई स्थलों के नाम भी रखे गए हैं- रामगढ़ की पहाड़ियाँ, सीता बेंगरा, जोगीमारा, लक्ष्मण बेंगरा, सीता कुंड आदि राम से ही जुड़े हैं।

त्रेतायुग में सरगुजा क्षेत्र घनघोर जंगलों से परिपूर्ण था। जंगलों में ऋषि-मुनि आश्रम बनाकर रहते थे। वनवास काल के दौरान राम ने उन राक्षसों का वध किया जो ऋषि-मुनियों को सताते थे। सरगुजा के लोकगीतों में ऐसा ही वर्णन मिलता है:

"चउदह बछर विपत्ति ला बितावें

रामगढ़ परबत में घर ला बनावें

बनवासे करण बने राम चले।"

सीता बेंगरा रंगमंच

सीता बेंगरा नाट्यशाला आज के आधुनिक थिएटर जैसी बनी है, जहाँ नेपथ्य, रंगपीठ, रंगशीर्ष आदि विद्यमान हैं। सीता बेंगरा गुफा नाट्यालय तक पहुँचने के लिए 15 सीढ़ियाँ बनी हैं। इन सीढ़ियों से चढ़कर गुफा में पहुँचते हैं, तो सामने 17 फुट चौड़ा गुफा नाट्यालय का प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता है, जिसका ऊपरी भाग गोलाई लिए हुए है। नाट्यशाला 46 फीट लंबी, 15 फीट चौड़ी और 9 फीट ऊँची है। पर्दे और खंभे लगाने के लिए दीवारों में दोनों ओर गड्ढे बने हुए हैं। नाट्यालय की दीवारों से सटकर दर्शकों के बैठने के लिए पत्थरों की आसंदियाँ (बैठने की जगह) बनी हैं। मंच का निर्माण तीन मेढ़ियों पर किया गया है जो ढालनुमा हैं।

सीता बेंगरा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित रंगशाला के अनुरूप बनाई गई है। ईसा पूर्व तीसरी सदी में यहाँ नाटक एवं गीत-संगीत के आयोजन होते थे। यह एक ऐसा स्थान था जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच पर अभिनय होता था।

सीता बेंगरा की गुफा में उत्कीर्ण पंक्तियों में ऐसी परिकल्पना की गई है, जहाँ मनुष्य कोलाहल से दूर एकांत में, रात्रि के नृत्य-संगीत और हास-परिहास की दुनिया में स्वर्गीय आनंद में लीन होकर पुष्पों की भीनी खुशबू से मोहित हो उसका आलिंगन करता है।

जोगीमारा गुफा

सीता बेंगरा के बगल में पहाड़ी के दक्षिणी ढलान पर स्थित है जोगीमारा गुफा। यहाँ ईसा पूर्व तीसरी सदी के जनजीवन के भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। जोगीमारा गुफा 30 फुट लंबी, 15 फुट चौड़ी और 9 फुट ऊँची है। गुफा की भीतरी दीवारों पर चिकना लेप लगाकर उस पर तरह-तरह के भित्तिचित्र बनाए गए हैं। गुफा की छत भी आकर्षक रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित है।

ज्यामितीय अलंकरणों के साथ गुफा की दीवारें पशु-पक्षी, मछली, मकराकृति, देव और दानवों के चित्रों से सुसज्जित हैं। गुफा की छत व दीवारों पर लाल, पीले, हरे व काले रंगों से अलंकरण किया गया है। जोगीमारा के गुफा-चित्रों को निहारने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इन्हें देखकर प्रतीत होता है कि तत्कालीन साहित्य, कला, सामाजिक वातावरण, मानवीय कला-संवेदना और भावनाओं का उत्कर्ष अत्यंत वैभवशाली रहा होगा।

प्रेम-अभिलेख

नाट्यशाला का संचालन देवदासी सुतनुका के हाथों में था। सुतनुका को रूपदक्ष/शिल्पकार देवदीन से प्रेम हो गया। नाट्यशाला की मर्यादा के विपरीत ऐसा प्रेम-संबंध उस समय राजकीय कोप का कारण बना। तत्कालीन राज्य अधिकारियों ने चेतावनी स्वरूप उनकी इस प्रणय-गाथा को गुफा की दीवार पर अंकित करवा दिया ताकि भविष्य में ऐसे संबंध की पुनरावृत्ति न हो। देवदीन और सुतनुका की प्रणय-गाथा ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में गुफा की दीवार पर अंकित है, जो इस प्रकार है:

सुतनुका नाम देवदसिं।

तं कमयिथ बलानसेए।

देवदिने नाम लुपदखे॥

अर्थात्: "सुतनुका नाम की देवदासी से वाराणसी के श्रेष्ठ रूपदक्ष (शिल्पकार) देवदीन ने प्रेमासक्त होकर प्रणय किया।"

प्राचीन शिल्पकार देवदत्त (देवदीन)

देवदासी सुतनुका की ओर आकर्षित होकर शिल्पकार देवदीन (देवदत्त) उन पर मोहित हो गए थे। सुतनुका अपने समय की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र पर उत्कीर्ण पंक्तियाँ देवदीन और सुतनुका की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।

देवदीन अपने समय के प्रसिद्ध शिल्पकार थे। डॉ. हीरालाल शुक्ल कहते हैं, “प्रदेश के कलात्मक वैभव के आदि पुरुष देवदत्त हैं, जिन्हें भारत के प्रथम ज्ञात ‘रूपदक्ष’ (शिल्पकार) होने का गौरव हासिल है, जो ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में रामगढ़ अभिलेख में सादर स्मरण किए गए हैं। भारत के शेष कलाकार इन्हीं देवदत्त के उत्तराधिकारी हैं।”

हाथीपोल सुरंग

सीता बेंगरा के पार्श्व भाग में आवागमन के लिए हाथीपोल सुरंग बनाई गई है। सुरंग का प्रवेश द्वार 55 फीट ऊँचा है, जिससे हाथी भी आसानी से गुजर सकता है। यह सुरंग 180 फीट लंबी है। रामगढ़ की पहाड़ी के पार से सीता बेंगरा पहुँचने के लिए इसी सुरंग का उपयोग किया जाता है।

रामगढ़ की पहाड़ी का वैभव

रामगढ़ की पहाड़ी के आसपास ईसा पूर्व तीसरी सदी की उन्नत नागर सभ्यता विद्यमान थी। समृद्ध नगर होने के प्रमाण सर्वेक्षणों में मिले हैं- ईंटों की दीवारें, बर्तनों के टुकड़े, मनके और प्राचीन सिक्के पाए गए हैं। यहीं पर लोहा गलाने वाली भट्टी भी मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में यहाँ धातुकर्म (लोहा गलाई) का कार्य होता था।

बीसवीं सदी की शुरुआत में जिस रामगढ़ को पुराविदों ने भारत के महान आश्चर्यों में गिना था, उस रामगढ़ के संपूर्ण वैभव से दुनिया आज भी काफी हद तक अनजान है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन विरासत को सँजोए सरगुजा के इस गौरवशाली इतिहास को नए सिरे से खँगालने और विश्व पटल पर स्थापित करने की आवश्यकता है।

लघुकथाः उम्मीद के पंख

- अनीता पंडा ‘अन्वी’ (यू एस)

रात में धमाका हुआ। बारूद की गंध बिना छत की पत्थर की दीवारों से अब भी आ रही थी। मेहर शेष बचे अपने लकड़ी के घर के पास खड़ी थी। पास ही रखा सिर्फ एक जूता भरे-पूरे परिवार कहानी बता रहा था। वह डरी नहीं पर आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने अपनी दोनों बाँहें फैलाईं। उसने देखा कि उसकी परछाई पक्षी के समान दिखाई दे रही थी। उसने परछाई से पूछा, “क्या आसमान में बम का डिब्बा है?”

परछाई मौन रही पर रेस्क्यू टीम के एक सैनिक अंदर आया और  उसे देखकर कहा,”बेबी! तुम अकेली हो? सुरक्षित जगह पर जल्दी चलो।”

“अंकल! हम अपने घर कब लौटेंगे?”

“पता नहीं बेबी। आओ चले। वहाँ तुम्हारे जैसे कई बच्चे हैं। उनके साथ मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा,” रेस्क्यू टीम में एक वयोवृद्ध ने रोती हुई मेहर को चुप कराते हुए कहा। 

आँसू पोंछते हुए मेहर बोली, “अंकल! आसमान से  बोलो अगली बार बम नहीं खिलौने गिराना और ढेर सारे सफेद कबूतर भी।”

aneeta.panda@gmail.com

व्यक्तित्वः देश के बेमिसाल लाल, लाल बहादुर शास्त्री

 - हरी राम यादव

 जय जवान, जय किसान का नारा 1965  के बाद देश के हर बच्चे, बूढ़े और युवा की जबान पर था, बच्चे गलियों में चलते हुए यह नारा लगाया करते थे। एक बच्चा जय जवान बोलता था तो साथ का दूसरा बच्चा जय किसान बोलता था।  इस नारे को देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल  बहादुर शास्त्री ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिया था, उस समय देश के सैनिक  सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए लड़ रहे थे और किसान खेतों में अन्न उपजाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस समय  देश को एकजुट और आत्मनिर्भर बनाने की सख्त ज़रूरत थी।  शास्त्री जी ने अपने इस नारे के द्वारा किसानों और जवानों  दोनों का सम्मान बढ़ाया और देश के नागरिकों  को यह एहसास कराया कि जवान और किसान दोनों देश के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। इस नारे के द्वारा उन्होंने पूरे देश को एक नई दिशा दी और इस दिशा ने कुछ  ही वर्षों में देश की दिशा और दशा बदल कर रख दी। देश खाद्यान्न के  मामले में आत्मनिर्भरता की और  बढ़ चला और 06 वर्षों बाद ही सन 1971 में देश ने अपनी सैनिक शक्ति और मजबूत इरादे  के बलबूते  पाकिस्तान के दो टुकड़े कर 'जय जवान और जय किसान' के नारे को सार्थक कर दिया।

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आकस्मिक मृत्यु  के पश्चात् शास्त्री जी  09 जून 1964 को देश के प्रधानमंत्री बने।  वह  अपने सादे जीवन और नैतिक मूल्यों के लिए जाने जाते थे।  वे बहुत ही सामान्य जीवन जीते थे और दिखावे से सदैव दूर रहते थे। देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी, उनके पास न तो ज्यादा धन-संपत्ति थी और न ही कोई दिखावे वाली जीवनशैली।   उनका जीवन एक साधारण व्यक्ति जैसा रहा, कार्यकाल के दौरान मिलने वाले  वेतन और भत्ते से ही अपने पूरे परिवार का भरण पोषण करते थे। सच्चाई और ईमानदारी उनकी रग- रग में बसी थी। एक बार उनके बेटे ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गाड़ी का उपयोग कर लिया, जब यह बात  शास्त्री जी को पता चली तो उन्होंने सरकारी खाते में गाड़ी जितनी दूर चली थी उसका किराया जमा करवाया। उनके  पास न तो खुद का घर था और न ही कोई अन्य संपत्ति। जब उनका  निधन हुआ तो उनके पास जमीन जायदाद नहीं बल्कि एक ऋण था, जो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने पर कार खरीदने के लिए सरकार से लिया था। इस सरकारी ऋण से उऋण होने के लिए परिवार ने उनकी पेंशन की राशि से यह राशि जमा की। वह हमेशा खादी की धोती और कुर्ता  पहनते थे। वह 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। 1965 के भारत पाकिस्तान के मध्य हुए युद्ध में उन्होंने ऐसे ठोस और दूरदर्शी निर्णय लिये कि सैन्य कमांडर भी हतप्रभ थे।

प्रधानमत्री बनने से पूर्व वह रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृह मंत्री रहे। उनके रेल मंत्री रहते हुए 02 सितंबर, 1956 को आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में हुई सिकंदराबाद-द्रोणाचलम पैसेंजर ट्रेन दुर्घटना में 125 लोग मारे गए, इस दुर्घटना के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश तथा संसद में उनकी  इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए शास्त्री जी की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी सराहना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने “लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं; बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी”। रेल दुर्घटना पर  बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा- “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ़ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है; लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।” ऐसे थे लाल बहादुर शास्त्री। जहाँ आज एक तो क्या दस बीस दुर्घटनाएँ होने के बाद और नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा मांगने के बाद भी लोग कुर्सी छोड़ने का नाम नहीं लेते हैं।

 लालबहादुर शास्त्री का जन्म 02 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय  में श्रीमती  रामदुलारी और मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे इसलिए गांव के  सब लोग उन्हें मुंशीजी  कहते थे। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण गाँव के बड़े बुजुर्ग लालबहादुर शास्त्री को प्यार में नन्हे कहकर बुलाया करते थे। अठारह महीने की छोटी सी उम्र में इनके पिता का निधन हो गया। पिता के निधन के पश्चात  उनकी माँ श्रीमती रामदुलारी अपने मायके मिर्ज़ापुर चली गईं। कुछ समय बाद उसके नाना का भी निधन हो गया। शास्त्री जी की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उनकी माँ का बहुत सहयोग किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा अपने ननिहाल के गाँव में  ग्रहण की और उसके पश्चात उनकी आगे की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से जब उन्हें शास्त्री की उपाधि मिली तब उन्होंने अपने नाम के पीछे से श्रीवास्तव शब्द  हमेशा के लिए हटा दिया और नाम के साथ  'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द उनके  नाम का पर्याय बन गया। सन 1927 में उनकी शादी मिर्जापुर की ललिता देवी से हुई। इनके परिवार में इनके चार बेटे – हरिकृष्ण शास्त्री , सुनील शास्त्री , अनिल शास्त्री तथा अशोक शास्त्री एवं दो बेटियाँ कुसुम शास्त्री और सुमन शास्त्री हैं। सन 1966 में भारत सरकार द्वारा उन्हें भारत रत्न से विभूषित किया गया।

वर्तमान समय में सत्ता और विपक्ष में बैठे देश के नीति निर्माताओं को लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान के 61 वर्ष पहले दिए नारे के बारे में गंभीरता से  सोचने की आवश्यकता है। आज न तो किसान सुखी है और ना जवान । दोनों वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित है । आये दिन किसान लाइनों में लगे रहते हैं। कभी अपनी फसल को बेचने के लिए , कभी खाद खरीदने के लिए, कभी फॉर्मर रजिस्ट्री के लिए । सरकारी बाबू वर्ग हर स्तर पर इनका शोषण करता है । यही हाल देश की सीमा पर अपनी जवानी देकर आये जवानों का भी है। सरकारें साल में सैनिक कल्याण के नाम पर दस बीस पत्र निकालती हैं; लेकिन धरातल पर कोई परिणाम नजर नहीं आता । जरूरत इस बात की है कि जवान की जड़ किसान को खेती के लिए जरूरी साधन और सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाएँ , उनके बच्चों को पढ़ने के लिए गाँवों में बढ़िया स्कूल खोले जाएँ । उनकी चिकित्सा के लिए गाँव में चिकित्सालय हों, रेफरल केंद्र नहीं और उन अस्पतालों में समुचित दवा  और स्टाफ भी हो । यह सब आवश्यक इसलिए है कि भारत गाँवों  का देश है और गाँव में किसान बसते हैं, धनवान नहीं।