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Sep 5, 2026

उदंती.com, सितम्बर - 2026

चित्रः डॉ. सुनीता वर्मा
 भिलाई, छत्तीसगढ़
 वर्ष -19, अंक - 2

"प्रकृति का अध्ययन करो,

 प्रकृति से प्रेम करो, 

प्रकृति के करीब रहो। 

प्रकृति तुम्हें कभी निराश नहीं करेगी।"  

- फ्रैंक लॉयड राइट

अनकहीः नेपाल आपदाः प्रकृति का कहर या... – डॉ. रत्ना वर्मा

पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन  और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग  - पंकज चतुर्वेदी

आलेखः अ द् भु त योगदान देने वाली, भारतीय महिला वैज्ञानिक - निर्देश निधि

हाइकुः  किसान की कथाएँ - भीकम सिंह

प्रदूषणः ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि - प्रमोद भार्गव

लघुकथाः सबक – छवि निगम

विज्ञानः झगड़े से बचना हो तो गले मिलें 

बाल कहानीः सिया का सपना - डॉ. वंदना शर्मा

लघुकथाः प्रार्थनाएँ - अनिता मण्डा

कविताः मृत्यु, तू जब भी आना... - डॉ. पूनम चौधरी

संस्मरणः भाऊ जी - सुदर्शन रत्नाकर      

जागरूकताः प्राथमिक आवश्यकता- न फैशन न दिखावा  - लिली मित्रा

कहानीः बड़ी जिज्जी - डॉ. रंजना जायसवाल

व्यंग्यः भेंट एक लेखक से - गिरिराजशरण अग्रवाल

तीन कविताएँः शांति की प्रतीक्षा, लांछन, रूका वक्त - रेखा शाह आरबी

किताबेंः पर्यावरण संकट का जीवंत दस्तावेज - रोहित कौशिक

अनकहीः नेपाल आपदाः प्रकृति का कहर या...

- डॉ.  रत्ना वर्मा

 नेपाल में हाल की भयावह प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि आखिर हम ऐसी त्रासदियों को किस नजरिये से देखें। पहाड़ों के बीच अचानक उमड़ा पानी, मलबे के साथ बहती नदियाँ, देखते ही देखते उजड़ते घर, टूटते पुल और सड़कें तथा अपनों को खोजते असहाय लोग- यह दृश्य केवल नेपाल की पीड़ा नहीं है; बल्कि उस संकट की तस्वीर है जो बदलते पर्यावरण और जलवायु के साथ पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ी हो गई है। प्रकृति के इस भयावह मंजर के पीछे कई प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिसके समाधान तलाशने होंगे। 

नेपाल की भयावहता को सामान्य मौसमी बाढ़ भर नहीं कहा जा सकता। बर्फ और चट्टानों के अचानक खिसकने तथा उसके बाद आई तेज जलधारा ने कुछ ही समय जो रौद्र रूप दिखाया उसे वैज्ञानिक, भूकंपीय गतिविधि, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन, हिमालय का तेजी से गर्म होना, ग्लेशियरों का पीछे हटना और पर्वतीय भूभाग की अस्थिरता आदि ऐसे अनेक कारणों से जोड़ कर देख  रहे हैं। इस आपदा ने यह भी दिखा दिया कि पहाड़ों में घटित कोई घटना केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं रहती। उसका प्रभाव नदी के साथ दूर-दूर तक बसे समुदायों, बस्तियों, परिवहन, ऊर्जा परियोजनाओं और आजीविका पर लम्बें समय तक पड़ता है, जिससे उबरना आसान नहीं होता। 

 किसी भी आपदा के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण भी एक साथ काम करते हैं। जैसे- अनियोजित निर्माण, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, जंगलों का क्षरण, कमजोर बुनियादी ढाँचा और जोखिम वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार आदि ऐसी आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं। इसलिए हमें प्रकृति को दोष देने के बजाय अपने विकास के तरीके और अपनी तैयारियों पर भी सवाल उठाने होंगे।

सामाजिक दृष्टि से किसी आपदा का सबसे बड़ा प्रभाव केवल जान-माल की क्षति नहीं होता। आपदा सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करती है। घर खोने वाला व्यक्ति केवल एक मकान नहीं खोता, वह अपनी स्मृतियाँ, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका और भविष्य का भरोसा भी खो देता है। बच्चों की पढ़ाई रुकती है, परिवार बिखरते हैं, रोजगार समाप्त होते हैं और मानसिक आघात लम्बे समय तक बना रहता है। इस समय नेपाल में स्वास्थ्य सेवाओं, घरों, बाजारों, सड़कों, पुलों और आवश्यक सुविधाओं के प्रभावित होने से हजारों परिवारों के सामने तत्काल राहत के साथ-साथ लंबी पुनर्वास प्रक्रिया की बड़ी चुनौती है। राहत का अर्थ केवल भोजन, कपड़े और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए; राहत के साथ सम्मान, सुरक्षा, मानसिक सहारा और भविष्य की पुनः स्थापना भी जुड़ी होनी चाहिए।

पर्यावरण विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो इस तरह की आपदाओं से हमें सबक लेना होगा कि विकास और प्रकृति के बीच संघर्ष का रास्ता हमें कहीं नहीं ले जाएगा। पहाड़ों में सड़कें बनें, बिजली परियोजनाएँ बनें, पर्यटन बढ़े और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार पैदा हों- यह विकास आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि  यह विकास कितना सुरक्षित और पर्यावरण-सम्मत है। किसी नदी, पहाड़ या जंगल को केवल निर्माण की जगह मान लेना अंततः मनुष्य के लिए  जोखिम ही पैदा करता है। 

नेपाल की इसी आपदा में एक स्कूल को अचानक आई सूचना के आधार पर समय रहते खाली कराया गया और सैकड़ों विद्यार्थियों की जान बची। यह घटना बताती है कि कई बार कुछ मिनटों की सूचना भी सैकड़ों जिंदगियाँ बचा सकती है; इसलिए आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर की निगरानी, ग्लेशियरों और हिमानी झीलों की लगातार निगरानी तथा स्थानीय स्तर पर त्वरित सूचना-तंत्र को प्राथमिकता देनी होगी।

साथ ही, आपदा-प्रबंधन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करना होगा। स्कूलों में आपदा से बचाव के अभ्यास होने चाहिए। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि अचानक बाढ़ या भूस्खलन की स्थिति में किस दिशा में जाना है, किससे संपर्क करना है और किन स्थानों को सुरक्षित माना जा सकता है। सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय भी उतना ही आवश्यक है। आपदा के समय जिस समाज में लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं, वहाँ पुनर्वास की संभावना भी अधिक मजबूत होती है।

और सबसे महत्त्वपूर्ण है सीमाओं से ऊपर उठकर मानवीय सहयोग। हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है और न ही उसकी नदियाँ राजनीतिक सीमाओं को पहचानती हैं। आपदा के समय राहत और बचाव में क्षेत्रीय सहयोग को राजनीति से ऊपर रखना होगा। नेपाल की त्रासदी में अलग-अलग देशों और संस्थाओं की सहायता तथा बचाव प्रयासों ने यह दिखाया भी है कि संकट के समय मानवता की साझी शक्ति सीमाओं से कहीं बड़ी होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि नेपाल के उजड़े हुए परिवारों को केवल संवेदना देकर हम अपने दायित्व से मुक्त न हो जाएँ। जिन्हें अपना घर, परिवार और आजीविका खोनी पड़ी है, उनके साथ खड़ा होना हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता, पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा और आजीविका की पुनः स्थापना के लिए सरकारों, संस्थाओं और समाज को मिलकर आगे आना होगा; लेकिन इसके साथ ही हमें भविष्य के लिए भी तैयारी करनी होगी। इसलिए समय आ गया है कि विकास की दौड़ में हम यह न भूलें कि धरती केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। आज नेपाल के लिए हाथ बढ़ाना केवल नेपाल की मदद करना नहीं है; यह उन समस्त मानवता के लिए हाथ बढ़ाना है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हम सभी की है। ■

आलेखः अ द् भु त योगदान देने वाली भारतीय महिला वैज्ञानिक

 - निर्देश निधि 

उन महिलाओं के योगदान से जुड़ी बातें करें जिन्हें हम अक्सर भुलाए रखते हैं ।  हम जब भी समाज में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं तो उद्यमियों , शिक्षाविदों , साहित्यकारों,  विभिन्न कलाकारों या सिनेमा से जुड़ी स्त्रियों की बात करते हैं । सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के विषय में तो हम सब, कुछ अधिक ही जानते हैं । उन्हें ही नहीं उनके परिवारों तक को पहचानते हैं । परंतु क्या हम अपनी महिला वैज्ञानिकों के विषय में जानते हैं ? उनमें से किसी एक का चेहरा पहचानते हैं ?  हम भूल जाते हैं भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अद् भुत योगदान देने वाली अपनी महिला वैज्ञानिकों को । 

हमारे देश ही नहीं संसार भर में महिला वैज्ञानिक, पुरुषों के अनुपात में बहुत कम हैं । संसार भर में मात्र अट्ठाईस से तीस प्रतिशत ही वैज्ञानिक शोधों में महिला दिखाई देती हैं । भारत की स्थिति तो मात्र बारह - तेरह प्रतिशत के साथ और भी बदतर है । जब भी हम कक्षा दस या बारह के परीक्षा परिणाम देखते हैं, तो विज्ञान हो या कला, हर बार छात्राएँ, छात्रों से बाज़ी मार लेती हैं । फिर ऐसा क्या हो जाता है कि बड़ी कक्षाओं तक आते - आते विज्ञान तो विज्ञान, लड़कियाँ शिक्षा में ही पिछड़ जाती हैं । क्या उम्र के साथ उनकी बुद्धि कम हो जाती है ? हर्गिज़ नहीं । इस असामानता के कई कारण हो सकते हैं । सबसे पहला तो कह सकते हैं कि जब लैंगिक अनुपात ही हम ठीक - ठाक स्थिति में नहीं ला पाए हैं अभी तक, तो शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में समानता की बात करना बेमाने है । हम अपने समाज में, महिला वैज्ञानिकों को रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, यद्यपि हमारी अनेक महिला वैज्ञानिक इस योग्यता पर खरी उतरती हैं । पितृसत्तात्मक समाज भी महिलाओं के मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच को उभरने न देने का दोषी ज़रूर ही है । यदि किसी परिवार में दो में से एक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता होती है, तो वह निश्चित रूप से अपने पुत्र को ही शिक्षित करता है । पुत्री को विज्ञान की शिक्षा न देकर उसे  प्राइवेट  रूप से ही शिक्षा दिला देता है । कई बार स्त्री की क्षमता को भी सही तरीक़े से आँका नहीं जाता । यह समझ लिया जाता है कि यह तो लड़की है विज्ञान इसके बस का नहीं । महिला वैज्ञानिकों के साथ भी कम भेद भाव नहीं होता । 1930 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय वैज्ञानिक सी वी रमन को सब जानते हैं; परंतु उन्हीं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर चुकी वैज्ञानिक अन्ना मणि को मुट्ठी भर लोग भी शायद ही जानते हों। भेदभाव आज भी है। इस आधुनिक समय में भी समान कार्य के लिए महिलाओं को समान वेतन तक नहीं दिया जाता, पहचान की बात तो दूर है । वैज्ञानिक शोध अधिक समय और दायित्व की माँग करते हैं । कोई स्त्री वैज्ञानिक बनने की राह पर चल भी पड़ी हो, तो भी, जब उस पर पारिवारिक दायित्व का बोझ आता है, तो घर वाले उसका सहयोग नहीं करते और उसे अपना शोध त्यागना पड़ता है। कई बार देखा गया है कि पति की आय अगर ठीक - ठाक हो जाए, तो भारतीय परिवारों में स्त्री को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है या वह स्वेच्छा से ही नौकरी छोड़ देती है। हमारी पारिवारिक व्यवस्था आज भी काफ़ी कुछ ऐसी ही है । महिलाओं का रोज़गार में न होना देश के लिए बहुत हानिकारक है । यह भी एक जाना - माना सत्य है कि रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी से भारत की जी डी पी का बेहतर हो जाना तय है । सरकार द्वारा कई उपाय किए हैं, ताकि हमारे देश में महिला वैज्ञानिकों की संख्या में वृद्धि हो सके । जैसे उन संस्थाओं को अच्छी रैंकिंग देना, जिनमें महिला वैज्ञानिक अधिक हों । अगर किसी महिला वैज्ञानिक के पास कोई डिग्री है और वह कोई कार्य नहीं कर रही है, वह सत्ताईस से सत्तावन वर्ष की आयु तक किसी भी संस्था से जुड़कर क्षमतानुसार कार्य आरम्भ कर सकती है । सरकार की ओर से महिला वैज्ञानिकों की अधूरी रिसर्च को पूरी करने में सहयोग भी दिया जा रहा है । आर्थिक मदद और तत्संबंधी फ़ेलोशिप भी दी जा रही है। ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ की तर्ज़ पर हर बरस ‘महिला विज्ञान कांग्रेस’ का आयोजन भी किया जाता है । महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए ‘भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ’ की भी स्थापना की गई है । पूरे भारत में दस शाखाओं वाली इस संस्था का मुख्यालय, वाशी नवी मुंबी में है । महिला वैज्ञानिकों के लिए अनेक पॉर्टल्ज़ बनाए जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त अपने क्षेत्र में विशिष्ट रही ग्यारह महिला वैज्ञानिकों के नाम पर  सरकार पीठों की स्थापना कर रही है;  ताकि इन वैज्ञानिकों के नामों से युवा छात्राओं को प्रेरणा मिल सके और विज्ञान के क्षेत्र में वे अपने रोल मॉडल पा सकें । इन पीठों के लिए अलग - अलग क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं को चुना गया है, जिनमें कृषि, बायोटेक्नोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फाइटोमेडिसिन, बायोकैमिस्ट्री, चिकित्सा, सामाजिक विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान, मौसम विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, भौंतिकी, और फंडामेंटल रिसर्च। इनमें कुछ वैज्ञानिकों के नाम यहाँ लेने प्रासंगिक होंगे । 


1932 में जन्मी डॉ. अर्चना शर्मा एक जानी - मानी साइटोजेनेटिक्स या कोशिकानुवांशिकी की शोधकर्ता थीं । वे साइटोलॉजी के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल, ‘न्यूक्लियस’ की संस्थापक सदस्य थीं । उन्होंने क्रोमोज़ोम के अध्ययन की नई तकनीक का विकास किया था। वे पद्मभूषण से सम्मानित हुईं। जानकी अम्माल अग्रणी बॉटेनिस्ट थीं । गन्ने की नई मीठी प्रजाति और चीनी की मिठास के लिए उन्हें ही श्रेय जाता है। क्रास ब्रीडिंग के शोध के लिए उन्हें संसार भर में मान्यता मिली । जानकी अम्माल को पंडित नेहरू ने मिशिगन से वापस बुला लिया था; ताकि उनके शोध का लाभ भारतीय किसान उठा सकें । 1861 में जन्मी डॉ कादम्बिनी गांगुली चिकित्सक बनने वाली पहली दो महिलाओं में से एक थीं।1941 में जन्मी दर्शन रंगनाथन ऑर्गेनिक कैमिस्ट थीं। उन्हें प्राकृतिक बायोकैमिकल प्रक्रियाओं को करने के लिए जाना जाता है। 1917 में जन्मी डॉ. आसिमा चटर्जी ने ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री और फाइटोमेडिसिन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। मिर्गी के लिए दवाई और मलेरिया की रोकथाम के लिए उनकी बनाई हुई औषधियाँ आज भी काम आती हैं। डॉ इरावती कर्वे को रक्त सम्बन्धों की व्यवस्था पर अध्ययन के लिए क्रन्तिकारी माना जाता है। अन्ना मणि  एक मौसम विज्ञानी थीं, उन्होंने सौर विकिरण, वायु ऊर्जा और ओज़ोन पर उल्लेखनीय कार्य किया । उन्हीं के  मार्गदर्शन में वह कार्यक्रम बन पाया जिसके कारण भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो पाया। 1922 में जन्मी डॉ. राजेश्वरी चटर्जी पहली महिला इंजीनियर थीं । उन्हें माइक्रोवेव और ऐंटिना इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। उन्होंने  महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। रमन परिमला की  अलजेब्रा सम्बन्धी उपलब्धियों ने विशेषज्ञों तक को चकित कर दिया था। बिभा चौधुरी भौंतिक विज्ञानी थीं । वे पहली भारतीय महिला शोधकर्ता थीं जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी भाभा द्वारा टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के लिए चुना गया । उन्होंने 1940 के दशक में, एक सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। 1917  में जन्मी कमल रणदीव एक बायोकैमिकल रिसर्चर थीं । इन्हें कैंसर पर शोध के लिए जाना जाता है। वे ‘भारतीय महिला  वैज्ञानिक संगठन’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं । 

मिसाइल महिला टेसी थौमस
इनके अतिरिक्त समकालीन युग में भी अनेक महिला वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भारतीय विज्ञान की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया। इनमें राकेट वूमन जानी जाने वाली रितु करिघल, चन्द्रयान मिशन २ की निदेशक मुथैया वनिता, मंगल मिशन में मुख्य भूमिका निभाने वाली,जी सैट 10 और 12 की निदेशक रहने वाली अनुराधा टी के, मंगलयान की सफलता गढ़ने वाली मीनल सम्पत, मिसाइल महिला और अग्निपुत्री के नाम से विख्यात टेसी थॉमस। आज उनके सहयोग से बनी मिसाइल भारतीय सीमाओं की रक्षक हैं । इस तरह से उन्होंने भारतीय रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ किया । 2022 में गगनयान लॉंच करने जा रही लतांबिका ए आर, एडवांस लॉंचर टेक्नोलोजी की विशेषज्ञ हैं । किरण मजूमदार शॉ एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं जिन्होंने जैवप्रौद्यौगिकी में विशिष्ट योगदान किया, कैंसर और मधुमेह आदि पर इन्होंने कई शोध किए । इन्हें टाईम मैगज़ीन द्वारा दुनिया भर के सौ प्रभावशाली लोगों में गिना गया और फ़ॉर्चून पत्रिका में एशिया पैसिफ़िक की सबसे प्रभावशाली महिला माना गया । इनके साथ ही इंदिरा हिंदुजा को कौन भुला सकता है, जिन्होंने भारत में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी सम्भव करके ना जाने कितने संतानहीनों को संतान सौंपी । अदिति पंत एक समुद्र विज्ञानी रहीं। उनके शोध के कारण ही अंटार्कटिका पर दक्षिण गंगोत्री स्टेशन की स्थापना हो सकी। यही नहीं, कल्पना चावला, भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स आदि हमारी कई भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने नासा तक पहुँच बनाई है।  

इंदिरा हिंदुजा
यद्यपि सन 2016 से, हर वर्ष ग्यारह फ़रवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ और यूनेस्को द्वारा संयुक्त रूप से ‘महिलाओं और बालिकाओं के लिए विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है; परंतु यह दिवस अभी ‘महिला दिवस’ की तरह ख्याति प्राप्त नहीं है । 

पितृसत्तात्मक समाज की क्रूरता की सीमा कहाँ ठहरती है, कहना मुश्किल है । देश के वैज्ञानिक अनुसंधानों में जी - जान लगाने वाली जानकी अम्माल सहित इन महान महिला वैज्ञानिकों में से कई को सामाजिक उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ा । कादम्बिनी गांगुली को तो  बंगाल की एक पत्रिका ने ‘वेश्या’ तक कह दिया था । परंतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार करने के लिए कार्यरत उनके पति ने उनके इस घोर अपमान पर कोर्ट में केस दायर किया और सम्पादक महेश पाल को छह महीने की सजा दिलाई । महिलाओं के लिए बना दी गई  यह धारणा कि वे विज्ञान या गणित में पिछड़ी हुई होती हैं, जानबूझकर फैलाया हुआ एक भ्रम ही है  । मनुष्य का मस्तिष्क जिस कार्य का निरंतर अभ्यास करता है वह उसी में दक्ष हो जाता है । पिछली अनेक सदियों से स्त्री को अशिक्षित रख़कर घर का कार्य सौंप दिया गया, तो उसका मस्तिष्क उसी में पारंगत हुआ । पुरुष को शिक्षा, जिसमें गणित और विज्ञान से लेकर विभिन्न विषय थे, वे सौंपे गए तो वह उनमें पारंगत हुआ । परंतु समान अवसर पाया तो पौराणिक समय की आपाला, घोषा, लोपामुद्रा,गार्गी आदि से लेकर पिछली सदियों से समकालीन समय तक विज्ञान के क्षेत्र में वे अग्रणी रहीं । समान अवसर पाकर भारतीय महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं । आज के समय में वे हर क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता से अपने विरुद्ध  बनाई गई हर धारणा को ध्वस्त कर रही हैं । वे आज घरेलू कार्यों से लेकर व्यापार, राजनीति,शिक्षा, साहित्य , खेल, चिकित्सा, विज्ञान आदि से लेकर देश की रक्षा पंक्तियों तक में उपस्थित हैं । परंतु स्त्रियों के लिए मुश्किलें अभी और भी हैं । अभी तो देश में एक नारा निरंतर गूँज रहा है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभी तो हमें बेटी को बचाने की ही दुहाई देनी पड़ रही है, जिस दिन इससे छुटकारा मिलेगा, उस दिन दृश्य शीघ्रता से बदलना आरम्भ हो जाएगा । ■

nirdesh.nidhi@gmail.com

बाल कहानीः सिया का सपना


- डॉ. वंदना शर्मा 

सिया स्कूल जाने के लिए घर से निकली ही थी कि अचानक जोर की बारिश शुरू हो गई। बादल ऐसे गरज रहे थे जैसे आसमान भी आज स्कूल जाने से मना कर रहा हो। सिया ने सोचा, "वापस घर चली जाऊँ?" पर फिर मन में आया, "एक दिन भीग जाने से क्या हो जाएगा।" 

वो छाता लिए बिना ही भागती हुई स्कूल पहुँची। पूरी तरह भीग चुकी थी। गेट पर ही अंग्रेजी वाली मैडम मिल गईं। उन्हें गुस्सा आ गया। 

"घर नहीं बैठ सकती थी? स्कूल आना इतना जरूरी था? जाओ क्लास में बैठो। बारिश रुक जाए, तो घर चले जाना। तुम्हें अकेले क्या पढ़ाना है!"

सिया चुपचाप सिर झुकाकर क्लास में चली गई। आज कोई बच्चा नहीं आया था। पूरी क्लास खाली थी। सिया को बुरा तो लगा, पर उसने हार नहीं मानी। 

उसने ब्लैकबोर्ड पर रंग-बिरंगी ड्राइंग बनानी शुरू की। फिर अपनी कॉपी के पन्ने फाड़े, उन पर सुंदर चित्र बनाए, छोटी-छोटी कविताएँ लिखीं और पूरी क्लास की दीवारों पर चिपका दीं। खाली क्लास को उसने अपने रंगों से सजा दिया।

थोड़ी देर बाद मैडम क्लास में आईं। खाली और उदास क्लास को इस तरह सजा देखकर उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने सिया को गले लगा लिया। 

"शाबाश बेटा! चलो मेरे साथ।"

मैडम सिया को स्कूल की लाइब्रेरी ले गई-। "इनमें से जो किताब अच्छी लगे ले लो और यहीं बैठकर पढ़ो।"

सिया ने दो कहानी की किताबें निकालीं और मासूमियत से पूछा, "मैम, क्या मैं इन्हें घर ले जाकर पढ़ सकती हूँ?"

मैडम मुस्कुराईं, "हाँ बेटा, ले जाओ।"

सिया खुशी-खुशी किताबें बैग में रखकर घर के लिए निकली। रास्ते में उसे एक छोटी सी बिल्ली मिली। ठंड से ठिठुर रही थी, भीग रही थी। सिया का दिल पिघल गया। उसने अपने दुपट्टे से बिल्ली को पोंछा, गोद में उठाया और घर ले आई। 

घर आकर उसने बिल्ली को तौलिए से सुखाया, गर्म कपड़े में लपेटा, उसे दूध पिलाया और खुद भी खाना खाकर सो गई। दिनभर की थकान और बारिश के बाद उसे गहरी नींद आ गई।

नींद में सिया ने एक सपना देखा। 

उसकी वही बिल्ली अब एक सुंदर परी बन गई थी। उसकी पोशाक चमक रही थी। परी ने प्यार से सिया का हाथ पकड़ा और कहा, "सिया तुमने मेरी मदद की है। आज मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?"

सिया का बालमन खुशी से उछल पड़ा। उसने कहा, "परी दीदी, मेरे लिए एक बड़ा- सा घर बना दो। उसमें एक सुंदर झूला लगा दो। मेरा सारा होमवर्क भी कर दो। और... और मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को भी दे दो।"

परी ने ताली बजाई और एक पल में सब कुछ हो गया। बड़ा- सा घर, उसमें झूला, मेज पर गरमा-गरम खाना और सिया की कॉपी में अपने आप होमवर्क लिखा जा रहा था। 

सिया खुशी से चिल्लाई, "मम्मी! मम्मी! देखो हमारा नया घर!"

तभी एक प्यारी सी चपत उसके गाल पर पड़ी। 

"सिया उठो! खाना खा लो। कितना सोएगी?"

सिया हड़बड़ाकर उठी। देखा, तो वह अपने पुराने वाले कमरे में थी। न कोई बड़ा घर था, न झूला। बिल्ली भी वहाँ नहीं थी। 

सिया ने मायूस होकर पूछा, "मम्मी, वो बिल्ली मौसी कहाँ गई?"

मम्मी हँसकर बोलीं, "वह तो थोड़ी देर में ही खाकर चली गई अपने घर।"

सिया ने अपना माथा पकड़ा और धीरे से बोली, "काश... काश ये सपना सच होता।"

मम्मी ने सिया का सिर सहलाया और पूछा क्या सपना देखा हमारी सिया ने। सिया ने सारा किस्सा सुना। दोनों खूब हँसे। 

मम्मी ने कहा, "बेटा, सपने सच करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। तुमने आज क्लास सजाई, किताबें पढ़ीं, एक जानवर की मदद की। तुम आगे बढ़ोगी, तो एक दिन तुम्हारा अपना बड़ा घर भी होगा और झूला भी।"

सिया समझ गई। उसने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है मम्मी। मैं मेहनत करूँगी।"

उस रात सिया फिर सोई, पर इस बार बिना किसी सपने के। क्योंकि उसे पता था, अपने सपने उसे खुद सच करने हैं। ■ 

सम्पर्कः नई दिल्ली, vandna.reporter@gmail.com

लघुकथाः सबक

  - छवि निगम

ऋचा के कमरे से बाहर आते ही नीरव दाँत पीसते हुए बुदबुदाया, "ये अंदर मैथ्स की ट्यूशन ले रही थीं या इन हाईस्कूल के स्टूडेंट्स का दिमाग खराब कर रही थीं, हैं!"

ऋचा की आवाज शांत थी, "क्लास खत्म करके पाँच मिनट तो मैं बच्चों से रोज बात करती ही हूँ; लेकिन आज अचानक आकर आपने ऐसा क्या सुन लिया?"

नीरव और झल्ला गया, "अरे उनको ये सब खबरें-वबरें बाँचना... और क्या! और ये सब वाहियात उलटी-सीधी सुर्खियाँ.. ये सब डिटेल उन्हें बताने की जरूरत ही क्या है? जरा ये तो सोचो तुम हमारे राहुल और पीयूष को भी तो साथ पढ़ाती हो। क्या असर पड़ेगा उन पर?"

ऋचा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा, "असर ये पड़ेगा कि मेरे सारे विद्यार्थियों की तरह वे भी संवेदनशील बनेंगे। कल ये सब खौफनाक सुर्खियाँ ही गायब हो जाएँ, इसके लिए मैं आज को सुधार रही हूँ। मैं उन्हें लड़कियों की इज्जत करना, उनकी तकलीफ महसूस करना सिखा रही हूँ, बस।"

नीरव के पंजे का दबाव उसकी बाँहों पर बढ़ता चला जा रहा था- “बंद करो ये सब बकवास..." आगे कुछ कहते हुए अचानक वह खड़ा का खड़ा रह गया। उसका हाथ नीचे गिर गया। सामने बैग टाँगे हुए उसका बेटा राहुल खड़ा उसे एकटक देख रहा था और नीरव पहली बार उससे नजरें नहीं मिला पा रहा था। ■