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Jun 1, 2026

उदंती.com, जून -2026

वर्ष - 18, अंक - 11

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

                                      - बशीर बद्र

 अनकहीः वर्तमान की धूप और भविष्य के बादल  - डॉ. रत्ना वर्मा

  प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता - पंकज चतुर्वेदी 

 मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर  - प्रमोद भार्गव

 विज्ञानः जलवायु संकट से निपटने, पेड़ व तकनीक दोनों जरूरी 

 तापमानः जम्मू-कश्‍मीर की वादियों पर  हीटवेव का प्रकोप - अजय मोहन

 कविताः गर्मी सबको सता रही है  - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

 संस्मरणः उसकी ख़ुशी ! - निर्देश निधि

 लघुकथाः हाथी के दाँत - विष्णु नागर

 स्मृति शेषः नर्मदा लड़ाई के साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे 

 कविताः पीछे मुड़कर देखा जो मैंने - रमेश बिल्लौरे

 किताबेंः साहित्य का सुहाना सफ़र  - रमेश कुमार सोनी

 लघुकथा- पहली बार - रामकुमार आत्रेय

 कहानीः साँप का शाप - हरी राम यादव

 कविताः बालिका वधू - अनीता सैनी

 व्यंग्यः शासक हाथी और शोषित कुत्ता - डॉ. जेन्नी शबनम

स्वास्थ्यः देखभाल के नाम पर त्वचा खराब तो नहीं कर रहे? - प्रतिका गुप्ता

योग दिवसः योग से ही होगा कल्याण - जैस्मिन जोविअल

लघुकथाः  तिल - हरि मृदुल

योग दिवसः शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का उत्सव - डॉ. योगिता जोशी

दो कविताएँः 1.दक्षिण यात्रा के पूर्व , 2. अंतर्यात्रा - सत्या शर्मा ‘कीर्ति’


अनकहीः वर्तमान की धूप और भविष्य के बादल

- डॉ.  रत्ना वर्मा 

 जून का महीना आते ही हम सभी आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखने लगते हैं कि काश, बस एक बार अच्छी बारिश हो जाए, ताकि इस झुलसाने वाली गर्मी और लू से राहत मिले। गर्मी में राहत की चाह रखना बहुत स्वाभाविक है; लेकिन यह भी सच है कि हम हमेशा जो नहीं है उसकी चाहत में इतने व्याकुल रहते हैं कि, जो सामने है उसकी खूबी को देखना भूल जाते हैं। आज जून की इस चिलचिलाती धूप में हम जुलाई-अगस्त की बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं।  लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जैसे ही बारिश आएगी, वे सब जो आज पानी की एक बूँद के लिए तरस रहे हैं, कल जलभराव, रास्तों के कीचड़, सीलन और उमस को कोसने लगेंगे। तब हर कोई कहेगा कि इससे तो जून की सूखी गर्मी ही भली थी!

वैसे, ध्यान से देखें तो आज ये मौसम भी अपने पुराने और स्वाभाविक चक्र में कहाँ रहे? चाहे यह रिकॉर्ड तोड़ती भीषण गर्मी हो, प्रलय जैसी बाढ़ लाने वाली भारी बारिश हो या हाड़ कँपाने वाली कड़ाके की ठंड- यह सब प्रकृति का बदला हुआ रूप है, जो हमें चेतावनी दे रहा है। असल में तरक्की के नाम पर और 'अंधाधुंध विकास' के मुखौटे के पीछे जो बर्बादी हमने खुद अपने हाथों की है, हमारी उसी लालच और गलतियों के कारण ही यह मौसम चक्र बुरी तरह टूट रहा है। हम कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं, जंगलों को काटकर सड़कें बिछा रहे हैं, नदियों का दम घोंट रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि मौसम हमें अपनी ठंडी छाँव दे। यह भला कैसे संभव है? अपनी ही धरती को भीतर तक झुलसा कर हम सुखद और शांत मौसम की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में हमें ये सारे मौसम अपने सही चक्र में चले और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ इनका स्वागत आनंद मनाते हुए कर सकें, तो  पहले हमें  अपनी धरती को, प्रकृति को सिर्फ भुनाना बंद करना होगा। 

  दरअसल हम कभी उस पल को जीना ही नहीं सीखते जो हमारे हाथ में है। यही वजह है कि हम बहुत तेज दौड़कर सबकुछ बहुत जल्दी पा लेना चाहते हैं और यही छटपटाहट आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का सच बन चुकी है- जब हम बच्चे होते हैं तो हमें बड़े होने की जल्दी रहती है कि कब स्कूल की बंदिशें, होमवर्क का बोझ और बड़ों की डाँट-डपट खत्म हो और आज़ादी का आसमान मिले। फिर जब पढ़ाई के उस सुनहरे दौर से बाहर निकलते हैं, तो दिन-रात एक ही धुन सवार हो जाती है कि कब एक अच्छी- सी नौकरी मिल जाए, खूब पैसा कमाएँ, अपनी मनमर्जी से जीवन जिएँ,  समाज में रुतबा बन जाए। इसके बाद जब नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों का वह मनचाहा मुकाम मिल जाता है, तब हम उस पल का आनंद लेने के बजाय फिर अतीत की ओर मुड़कर देखने लगते हैं कि हमारा वह बेफिक्री वाला बचपन ही सबसे अच्छा था, जहाँ न कोई ईएमआई का तनाव था और न ही कोई जिम्मेदारी। कहने का तात्पर्य यही है कि हम हमेशा अगले पड़ाव की अंधी तलाश में वर्तमान को अधूरा छोड़ते चले जा रहे हैं। 

इस निरंतर आगे भागने और जो हाथ में है उसे कमतर आँकने की आदत ने हमें भीतर से बहुत अधीर, असंतुष्ट और रोबोट जैसा बना दिया है। हमने जिंदगी को एक मशीन समझ लिया है, जहाँ बस चौबीसों घंटे बिना रुके, बिना सोचे-समझे किसी अनजानी रेस के पीछे भागते चले जाना है। जबकि यह सनातन सत्य है कि जीवन जीने की अपनी एक बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। जैसे प्रकृति किसी बीज को रातों-रात पेड़ बनाकर फल देने के लिए मजबूर नहीं करती, वह उसे हर मौसम को सहने और धीरे-धीरे पनपने का समय देती है, वैसे ही हमें भी अपनी उम्र के हर पड़ाव को, उसकी हर खूबी और कमी के साथ स्वीकार करते हुए सहजता से पार करते चले जाना चाहिए। लेकिन आज का इंसान अपनी इस सहजता को भूलकर दूसरों के साथ एक ऐसी आत्मघाती होड़ में शामिल हो गया है, जिसकी न तो कोई मंजिल है और न ही कोई अंत। पड़ोसी की गाड़ी, सहकर्मी का प्रमोशन या सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली चमक देखकर हम अपने आज के सुकून को दांव पर लगा देते हैं।

प्रकृति का अपना एक अटूट नियम है। जून की यह तपिश और लू भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जितनी जुलाई की रिमझिम बौछारें। यह धूप सिर्फ हमारे बदन को नहीं तपाती, बल्कि खेतों में खड़ी फसलों को पकाने, मिट्टी के भीतर के हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने और पूरी पृथ्वी के जल-चक्र को संतुलित रखने के लिए बेहद आवश्यक है। यदि जून में यह प्रचंड गर्मी नहीं पड़ेगी, तो समुद्र का पानी भाप बनकर आसमान में नहीं जाएगा और अगर भाप नहीं बनेगी तो सावन के बादल कहाँ से आएँगे? ठीक इसी तरह, जिंदगी के संघर्ष, कठिनाइयाँ और हमारे हिस्से में आई जिम्मेदारियों की धूप भी हमें भीतर से तपाकर परिपक्व बनाती है। अगर हम इस धूप की तपन को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर लें, तो इसके बाद मिलने वाली सफलता या सुख का आनंद अपने आप दोगुना हो जाएगा।

दरअसल भविष्य के सुंदर और काल्पनिक ख्वाब बुनने में हम इतने मशगूल रहते हैं कि आज के यथार्थ की धूप को सहने का हौसला और धीरज खो देते हैं। जो बीत गया वह सिर्फ यादें हैं, उन पर हमारा कोई वश नहीं है। जो आने वाला है वह केवल एक अनिश्चित संभावना है, जिसके बारे में हम सिर्फ कयास लगा सकते हैं। लेकिन जो पल, जो दिन और जो रिश्ते इस समय हमारे ठीक सामने मौजूद हैं, वही हमारा वास्तविक जीवन है। तो जब तक हम हर स्थिति और हर मौसम के साथ सामंजस्य बिठाना नहीं सीखेंगे, तब तक हम चाहे मनचाही बरसात पा लें या जीवन का कोई बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लें, हमारे मन के किसी कोने में एक छटपटाहट हमेशा बनी रहेगी। और यह छटपटाहट तभी दूर होगी जब हम कहीं पहुँचने की हड़बड़ी छोड़कर, इस सुंदर सफर की खिड़की से बाहर देखते हुए आज पर ठहरकर खुलकर सांस लेना नहीं सीख जाएँगे। जिंदगी कल नहीं, बल्कि इसी वक्त, इसी पल में है। 

प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता

 - पंकज चतुर्वेदी

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

भारत में मौसम का बदलता मिजाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं; लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है।

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे।

बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ तापमान अब नियमित रूप से 48°C के स्तर को छूने लगा है। यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।

इस मानव-निर्मित गर्मी की सबसे प्रत्यक्ष और क्रूर मार उन मजदूरों और सड़क किनारे काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ती है, जो इस ढाँचे का निर्माण कर रहे हैं। भारत के करोड़ों निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और गिग-इकोनॉमी के कर्मचारी इस गर्मी को केवल एक आँकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक शारीरिक हमले के रूप में महसूस करते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गर्मी के कारण भारत को 2030 तक अपने कुल कामकाजी घंटों का 5.8% हिस्सा खोना पड़ सकता है, जो लगभग 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है।

बांदा जैसे शहरों में, कंक्रीट और कोलतार की सड़कें गर्मी को सोखकर रात में भी उसे वापस छोड़ती हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव पैदा होता है और स्थानीय तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 5°C से 7°C तक अधिक बना रहता है।

नीतिगत स्तर पर मजदूरों के लिए ‘छाया का अधिकार’ या लू के दौरान काम के घंटों में बदलाव जैसे नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जो हमारे विकास के उस अंधेपन को दर्शाते हैं जहाँ श्रम को एक जैविक इकाई के बजाय केवल एक मशीन समझा जाता है।

गर्मी का यह घातक रूप हमारी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। ‘थर्मल शॉक’ के कारण गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के दाने दूध भरने की अवस्था में ही सूख रहे हैं, जिससे पैदावार में 15% से 25% तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ जमीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियाँ सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं।

इसी तरह, जंगलों के विखंडन और अवैध खनन ने वन्यजीवों के लिए भोजन  का संकट पैदा कर दिया है। छतरपुर और पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में, खनन के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर आना 40% तक बढ़ गया है। यह केवल मानव-पशु संघर्ष नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिक सुरक्षा चक्र का टूटना है जो इंसानों और जानवरों को एक साथ सुरक्षित रखता था।

वर्तमान ‘हीट एक्शन प्लान’ (एच ए पी) की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे केवल शहरों में मौतों को रोकने पर केंद्रित हैं, जबकि जमीन, जल और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहाँ मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्यजीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए।

हमें केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी से ऊपर उठकर बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाबों जैसे पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। ये तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी को ठंडा रखने के विकेंद्रीकृत साधन थे।

नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि राजमार्गों के लिए काटे गए पेड़ केवल लकड़ी नहीं थे, बल्कि वे उस सूक्ष्म-जलवायु का हिस्सा थे जो फसलों को झुलसने से बचाती थी।

हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है।

आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है। भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। तभी हम इस मानव-निर्मित भट्टी से बाहर निकल पाएँगे और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी धरती दे पाएँगे जो केवल झुलसती नहीं, बल्कि जीवन भी प्रदान करती है। (Indiaclimatechange.com)

मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर

  - प्रमोद भार्गव

देश के ज्यादातर भूभाग पर अँगड़ाई लेता पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र समेत समूचा मध्य व उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। 25 मई को सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही नौतपा शुरू हो गया था, हालांकि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार धरती का अधिक तपना अच्छी बारिश का संकेत है। मौसम विभाग भी नौतपा में भीषण गर्मी बता रहा है। सनातन पंचांग में उल्लेख मिलता है की इन नौ-दिनों में एक ऐसा समय भी आता है जब सूर्य अपनी सबसे तीव्र ऊर्जा के साथ पृथ्वी पर प्रभाव डालता है। फलतः गर्मी चरम पर पहुँच जाती है। 

   इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिकों की मानें तो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक ताकतवर महा-अलनीनो आकर ले रहा है। यह 1877 के बाद सबसे विध्वंसकारी मौसमी आपदा साबित हो सकता है। इसका सीधा असर भारत में देखने को मिल सकता है। क्योंकि अल-नीनो भारत की जीवन रेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को भी प्रभावित कर सकता है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर ऊष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मँडरा रहा है।

 इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को ऊष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। इस समय बर्तन के एक ढक्कन की तरह गर्म हवा ऊष्मा को नीचे धरती की तरफ दबाए रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है। गर्मी की इस प्रचंड स्थिति को ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताया जा रहा है।   

     इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आधे भारत में बढ़ा तापमान  लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहाँ तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पाँच दिन तक यही स्थिति यथावत् बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आँकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएँ आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।

       धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधष्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पीयूष ग्रंथि के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतःस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में हाइपरपीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।

   बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निष्क्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियाँ जानलेवा होती हैं। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियाँ काम नहीं करती हैं; क्योंकि ये दवाएँ दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।

       हवाएँ गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पाँचवाँ तत्त्व यूँ ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्त्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवतः आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा, तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे ब्रह्म तत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है; क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देश भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा, वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहाँ खेत बंजर हो जाएँगे। पालतू मावेशी और वन्य जीव गर्मी से तड़प-तड़पकर प्राण छोड़ने लग जाएँगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा।

       संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आँधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखी के फटने की हैरतअंगेज घटनाएँ भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द-गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

अलनीनो की चपेट में मौसम

 जून के आरंभ में यदि समुद्र तट का तापमान बढ़कर 0.50 डिग्री हो जाता है और यह वृद्धि आगे भी बनी रहती है तो मौसम पर अल-नीनो का प्रभाव दिखाई देने लगता है।  भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पास अलनीनो के हालात बनना शुरु हो गए हैं। धीरे-धीरे समूचे दक्षिणी गोलार्द्ध को अपनी चपेट में लेने की ओर अग्रसर है । असल में उष्णकटिबंधीय प्रशांत और भूमध्यीय क्षेत्र के सागर में यदि तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है तो इससे उत्पन्न होने वाली समुद्री घटना को ही ‘अलनीनो’ या ’एल-नीनो’ प्रभाव कहा जाता है। यह घटना दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतर से घटित होती है।  नतीजतन समुद्र के सतही जल का तापमान सामान्य  से अधिक हो जाता है और अल-निनो वजूद में आ जाता है। एल निनो स्पेनिश भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘उत्पाती छोटा बालक’। अलनीनो का एक प्रभाव यह भी होता है कि वर्षा के क्षेत्रों में परस्पर परिवर्तन जैसे हालात दिखाई देते हैं। मसलन ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होती है। कम वर्षा अथवा अल-नीनो की चपेट में आए मानसून के कारण खेती योग्य कुल कृषि भूमि का 60 फीसदी हिस्सा सूखे के प्रभाव में आ जाता है। इस संकट का कहर किसानों और कृषि पर केंद्रित जनसमुदायों को झेलना होता है। यहाँ यह  भी ध्यान रखने की जरुरत है कि बीते 111 सालों के भीतर जो 20 भयानक सूखे पड़े हैं, उनकी पृष्ठभूमि में अल-नीनो का प्रभाव ही रहा है। 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.), मो. 09425488224-9981061100

विज्ञानः जलवायु संकट से निपटने में पेड़ व तकनीक दोनों जरूरी

 जैसे-जैसे कंपनियाँ और सरकारें जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास बढ़ा रही हैं, यह सवाल उठ रहा है कि हवा
से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का सबसे सही तरीका क्या है? पेड़ लगाने जैसे प्राकृतिक उपाय या मशीनों से कार्बन कैप्चर वाली तकनीक? इस पर नियम तय किए जा रहे हैं; लेकिन अभी भी यह साफ नहीं है कि किसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल, ‘प्रकृति बनाम तकनीक’ का विवाद सही नहीं है। ज़रूरी यह है कि हम समझें कि कौन सा तरीका कैसे काम करता है, कब उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और वह किस समस्या का समाधान करता है। अगर इन दोनों को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा जाएगा, तो जरूरी कदम उठाने में देरी हो सकती है।

कम समयावधि में, पेड़ लगाना और मिट्टी में कार्बन वृद्धि जैसे प्राकृतिक उपाय बहुत काम के होते हैं। इन्हें जल्दी लागू किया जा सकता है और ये अगले 20 सालों में हवा से कार्बन कम करने में मदद करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सबसे अहम समय है। भले ही यह कार्बन हमेशा के लिए न रुके, लेकिन जल्दी किया गया यह काम भी काफी फायदा देता है।

मध्य समयावधि में, कुछ उद्योग - जैसे हवाई यात्रा और बड़ी फैक्टरी - पूरी तरह प्रदूषण कम नहीं कर पाते। ऐसे में कार्बन हटाना ज़रूरी हो जाता है। यहाँ ऐसे तरीके ज़्यादा काम के हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक कैप्चर रख सकें, जैसे ज़मीन के अंदर स्टोर करना या उसे ठोस रूप में बदल देना; ताकि वह लंबे समय तक हवा में वापस न जाए।

दीर्घ समयावधि में, कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए सैकड़ों साल तक लगातार प्रयास करने होंगे। यह काम किसी एक तरीके से नहीं हो सकता, बल्कि सभी उपलब्ध उपायों को साथ मिलाकर अपनाना पड़ेगा।

हालाँकि, अलग-अलग अवधि के ये लक्ष्य जुड़े हुए जरूर हैं; लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इन्हें गड्डमड्ड करने से नीतियाँ बनाने और निवेश करने में उलझन पैदा होती है; इसलिए जरूरत है दोनों के  संतुलित इस्तेमाल की, तभी जलवायु परिवर्तन से सही तरीके से निपटा जा सकता है। बहरहाल, लंबे समय से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने के लिए तकनीक का उपयोग करने से हटकर एक संतुलित दृष्टिकोण पर चर्चा होने लगी है। (स्रोत फीचर्स)