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Jan 28, 2017

मन का संदूक

          मन का संदूक 
                  - रश्मि प्रभा

अँधेरी कोठरी मिट्टी की
लकड़ी का संदूक
मुड़े-तुड़े पुराने कपड़ों में नेफ्थालिन की महक
खुलते ही
और क्या है? देखने की इच्छा बलवती होती है
...
ये चिट्ठी पापा की है
तब की
जब मैं पहली बार घर से गई थी
महाविद्यालय में पढ़ने
ये चिट्ठी- एक घरेलू इतिहास-सी
अम्मा की
...
क्या अंदाज था उस समय का
‘हम सकुशल है
आशा है वहाँ भी ईश्वर की कृपा से
सब कुशल होगा’
समय कंधे पर हाथ रखकर पूछता है
‘सबकुछ अभी अभी यहीं था न?’
समय की हथेली थामकर
दबी रुलाई उसे सौंपती हूँ
समय कभी पापा
कभी अम्मा बनकर
सर सहलाता है ...
और क्या है ? फिर ढूँढने लगती हूँ
पुराना
बहुत पुराना एल्बम
फोटो पर धब्बे आ गए हैं
थोड़ी सलवटें
सीधा करती हूँ
आँचल से साफ़ करती हूँ
बच्चों से कहूँगी
स्कैन करके दे दें
...
भले ही कभी-कभी देखना होगा
पर देख तो लूँगी !
अंकू कहती है,
‘नाना के बारे में जब तुम बताती हो
तो वह छवि मुझे बहुत प्रभावित करती है
टुकड़ों में सुना है सब कुछ
मन करता है
एक शॉर्ट मूवी बनती
हूबहू वैसी- जैसे नाना थे ... ’
बीती और कहानियों के लिए
खोलती हूँ मन का संदूक
सोंधी सी खुशबू फैलती है
खिलखिलाते प्रश्न, जवाब मिलते हैं
न कोई दाग
न सलवटें
रख लेती हूँ सँजोके
थोड़ी सी सोंधी खुशबू डालके ...
आगे के लिए

559, ground floor, 4th block, 8th main road, koramanagala, banglore – 560034

Feb 21, 2013

प्यार


प्यार
 
- रश्मि प्रभा
प्यार में .... हाँ हाँ प्यार में
कोई जेनेरेशन गैप नहीं
प्यार जो करता है
वह आज भी आग का दरिया पार करता है
सूरज का गोला हाथ में लिये कहता है
लो छू लो इसे- यही ख्वाहिश थी न तुम्हारी....
शीतल जल में पाँव डाले सिर्फ मैं
विस्मित लिए देखता है आग का दरिया
उसमें से निकलता प्यार
हाथ में सूरज का गोला
और कहता है- पागल ही हो तुम!
और सूरज का गोला नहीं छूना
वह तो मैंने यूँ हीं कहा ....
हाथ जल जायेंगे!...
मैं बुद्धिजीवी की तरह कहता है
आग का दरिया पार करना व्यावहारिकता नहीं
देखो अपना चेहरा... कितने धब्बे हो गए
कितना भी कर लो अब ये दाग नहीं जाएँगे
और तुम्हें पता है न- मुझे दाग पसंद नहीं....
प्यार सिकुड़ता जाता है
अकेले में खुद को समझाता है
चलो कोई नहीं- मैं प्यार तो हूँ न!
प्यार!!!
संपर्क: brahma emerald county, B- 2, FLAT- 901, NIBM road, Pune- 411048, Mo. 09371022446, rasprabha@gmail.com

May 30, 2012

13 मई मातृत्व दिवस

माँ वह लफ्ज वह पुकार, जहाँ से रुदन को मुस्कान मिलती है। रिश्तों की पहचान मिलती है, जिन्दगी क्या है, प्रकृति क्या है, सहनशीलता क्या है, अँधेरे में भी धुंधली किरण क्या है- माँ सब कुछ एक धरोहर की तरह जोड़ती जाती है। जब सारी दुनिया सो रही होती है, माँ उस रुदन उस मुस्कान से बातें करती है। माँ जादुई स्पर्श- बिल्कुल अलादीन के चिराग की तरह। माँ एक लोरी, माँ एक कहानी, माँ एक फिरकिनी... माँ सरस्वती, माँ अन्नपूर्णा,... पर विपरीत परिस्थितियों में माँ दुर्गा से चंडिका, रक्तदंतिका, महिषासुरमर्दिनी .... पूरे नौ रूप की यात्रा करती है। इस माँ को कवि विष्णु नागर ने जिस तरह शब्दों में पिरोया है, उसको आप तक पहुँचाने से मैं खुद को रोक नहीं सकी...                     - रश्मि प्रभा

सर्वगुण संपन्न माँ 

मां सब कुछ कर सकती है
रात- रात भर बिना पलक झपकाए जाग सकती है
पूरा- पूरा दिन घर में खट सकती है
धरती से ज्यादा धैर्य रख सकती है
बर्फ से तेजी से पिघल सकती है
हिरणी से ज्यादा तेज दौड़कर
खुद को भी चकित कर सकती है
आग में कूद सकती है
तैरती रह सकती है समुद्रों में
देश- परदेश शहर- गांव
झुग्गी- झोंपड़ी सड़क पर भी रह सकती है
वह शेरनी से ज्यादा खतरनाक
लोहे से ज्यादा कठोर सिद्ध हो सकती है
वह उत्तरी ध्रुव से ज्यादा ठंडी और
रोटी से ज्यादा मुलायम साबित हो सकती है
वह तेल से भी ज्यादा देर तक खौलती रह सकती है
चट्टान से भी ज्यादा मजबूत साबित हो सकती है
वह फांद सकती है ऊंची-से-ऊंची दीवारें
बिल्ली की तरह झपट्टा मार सकती है
वह फूस पर लेटकर महलों में रहने का सुख भोग सकती है
वह फुदक सकती है चिडिय़ा की मानिंद
जीवन बचाने के लिए वह कहीं से कुछ भी चुरा सकती है
किसी के भी पास जाकर वह गिड़गिड़ा सकती है
तलवार की धार पर दौड़ सकती है वह लहुलुहान हुए बिना
वह देर तक जल सकती है राख हुए बगैर
वह बुझ सकती है पानी के बिना
वह सब कुछ कर सकती है इसका यह मतलब नहीं
कि उससे सब कुछ करवा लेना चाहिए
उसे इस्तेमाल करने वालों को गच्चा देना भी खूब आता है
और यह काम वह चेहरे से बिना
कुछ कहे कर सकती है।...
            - कवि विष्णु नागर
फिर स्वत: मेरी कलम ने कवि के साथ अपना रिश्ता कायम करते हुए खुद को शब्दों में ढाला-

माँ जो हूँ

प्यार करनेवाली माँ जब नीम सी लगने लगे तो समझो
उसने तुम्हारी नब्ज पकड़ ली है और तीखी दवा बन गई है!
याद रखो जो माँ नौ महीने तुम्हें साँसें देती है
पल- पल बनती काया का आधार बनी रहती है
तुम्हारी नींद के लिए पलछिन जागती है
वह तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है
तब तक जब तक नीम का असर
फिर से जीवन न दे जाए!
माँ प्यार करती है, दुआ बनती है, ढाल बनती है
तो समय की माँग पर वह नट की तरह रस्सी पर
बिना किसी शिक्षा के अपने जाये के लिए
द्रुत गति से चल सकती है
अंगारों पर बिना जले खड़ी रह सकती है
वह इलाइची दाने से कड़वी गोली बन सकती है
जिन हथेलियों से वह तुम्हें दुलराती है
समय की माँग पर
वह कठोरता से तुम्हें मार सकती है ...
तुम्हें लगेगा माँ को क्या हुआ!
क्योंकि तुम्हें माँ से सिर्फ पाना अच्छा लगता है
यह तुम बाद में समझोगे
कि माँ उन चीजों को बेरहमी से छीन लेती है
जो तुम्हारे लिए सही नहीं
और सही मायनों में
ऐसी माँ ही ईश्वर होती है!

Oct 29, 2011

विजयी मंत्र


- रश्मि प्रभा
मैं नन्हा गाँधी
इस बार कोई सत्याग्रह नहीं करूँगा
अपनी पदयात्रा भी अकेले करूँगा
परायों से युद्ध जटिल होकर भी आसान था
पर अपने घर में ...
बाल सुलभ हठ हर उम्र में एक सुख देता है
पर जब अपने षडय़ंत्र करते हैं
एक दूजे को नीचा दिखाने का
हर संभव प्रयास करते हैं
तो भूख यूँ ही मर जाती है ...
फिर कैसा अनशन
और किससे क्या पाना।
जो मद के गुमां में होते हैं
उनके लिए तो प्रेम ही वर्जित है ...
न घर न देश .... सिर्फ मैं
तो इस मैं का हश्र मैं देखना चाहता हूँ
अपने नन्हें कदमों से वहाँ तक जाना चाहता हूँ
जहाँ 'मैं' स्तब्ध होता है
दिशाएं मौन होती हैं
अपना साया भी पीछे रह जाता है
वहाँ उस सन्नाटे में अपनी हथेली बढ़ाना चाहता हूँ
इस लम्बी यात्रा को वसुधैव कुटुम्बकम्
का विजयी मंत्र देना चाहता हूँ
मैं नन्हा गाँधी
पीछे आने वाली आहटों पर ध्यान लगाए
आज से अपनी यात्रा शुरू करता हूँ
तुम्हारी नजरें जहाँ- जहाँ जाती हैं
वहाँ वहाँ से तुम्हारा आह्वान करता हूँ
याद रखना मैं एक देश हूँ तुम्हारा
कोई पार्टी नहीं ...

Email : rasprabha@gmail.com

Aug 25, 2011

बीती कहानी बंद करो

- रश्मि प्रभा
इति यानि बीती... हास यानी कहानी...
बीती कहानी बंद करो।
नहीं जानना-
वंदे मातरम् की लहर के बारे में,
नहीं सुनना-
'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल....'
नहीं सुनना-
'फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल...'
नहीं जानना-
ईस्ट इंडिया कंपनी कब आई।
कब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया।
कहना है तो कहो-
आज कौन आतंक बनकर आया है।
और अब कौन गाँधी है?
कौन नेहरू? कौन भगत सिंह ?
वंदे मातरम् की गूंज
किनकी रगों में आज है?
अरे यहाँ तो अपने घर से
कोई किसी को देश की खातिर नहीं भेजता
(गिने-चुनों को छोड़कर )
जो भेजते हैं उनसे कहते हैं,
'एक बेटा-क्यूँ भेज दिया?'
क्या सोच है।
ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?
देश?
जहाँ से विदेश जाने की होड़ है...
एक सर शर्म से झुका है,
'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,'
दूसरी तरफ गर्वीला स्वर,
'विदेश में नौकरी लग गई है'
भारत - यानि अपनी माँ को
प्राय: सब भूल गए हैं
तो- बीती कहानी बंद करो!!!
कहाँ आतंक है, कौन है आतंकवादी?
कौन जाने!!!
शान है 'डॉन' होना,
छापामारी की जीती- जागती तस्वीर होना,
फिर बजाना साल में दो बार उन्ही के हाथों-
'वो भारत देश है मेरा'
पताः
नेको एन एक्स फ्लैट नम्बर - 42,
दत्त मंदिर, विमान नगर ,
पुणे - 14
मोब. 09371022446

May 10, 2011

उनके बाल छू लेने की ख्वाहिश मेरे दिल में ही रह गई ...

कवि सुमित्रानंदन पन्त से अबोध मन की एक मुलाकात...
- रश्मि प्रभा
आज मैं आपको प्रकृति के कवि सुमित्रानंदन पन्त जी से मिलवाने, समय के उस बिन्दु पर ले चलती हूं, जहाँ मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं, उनकी महत्ता क्या है!
नन्हा बचपन, नन्हें पैर, नन्ही तिलस्मी उड़ान सपनों की और नन्ही- नन्ही शैतानियां। उम्र के इसी अबोध, मासूमियत भरे दिनों में मैं अपने परिवार के साथ इलाहाबाद गई थी। मेरे पापा, मेरी अम्मा, हम पांच भाई- बहन अपने छोटे भाई के फूल संगम में प्रवाहित करने गए थे। उम्र को मौत के मायने नहीं मालूम थे, बस इतना पता था कि वह नहीं है- फूल, संगम... अर्थ से बहुत परे थे।
आंसुओं में डूबे दर्द के कुछ टुकड़े मेरे पापा, मेरी अम्मा ने संगम को समर्पित किया, पानी की लहरों के साथ लौटती यादों को समेटा और लौट चले वहां, जहां हम ठहरे थे। हां, संगम का पानी और मां की आंखों से गिरते टप- टप आंसू याद हैं और याद है कि हम कवि पन्त के घर गए (जो स्टेनली रोड पर था)। मां उन्हें 'पिता जी' कहती थीं, कवि ने उनको अपनी पुत्री का दर्जा दिया था, और वे हमारे घर की प्रकृति में सुवासित थे, बाकी मैं अनजान थी।
उस उम्र में भी सौंदर्य और विनम्रता का एक आकर्षण था, शायद इसलिए कि वह हमारे घर की परम्परा में था।
जब हम उनके घर पहुंचे, माथे पर लट गिराए जो व्यक्ति निकला... उनके बाल मुझे बहुत अच्छे लगे, बिल्कुल रेशम की तरह। मैं बार- बार उनकी कुर्सी के पीछे जाती... एक बार बाल को छू लेने की ख्वाहिश थी। पर जब भी पीछे जाती, वे मुड़कर हंसते... और इस तरह मेरी हसरत दिल में ही रह गई।
उनके साथ उनकी बहन 'शांता जोशी' थीं, जो हमारे लिए कुछ बनाने में व्यस्त थीं। मेरे लिए मीठा, नमकीन का लोभ था, सो उनके इर्द-गिर्द मंडराती मैंने न जाने कितनी छोटी- छोटी बेकार की कविताएं उन्हें सुनाईं...
उन्होंने कितनी सुनीं, कितनी उबन हुई पता नहीं, मैं बस रिकॉर्ड- प्लेयर की तरह बजती गई।
दीदी और भैया ने एक जुगलबंदी बनाई थी।
'सुमित्रानंदन पन्त, जिनके खाने का न अंत', ... मैं भी फक्र से यह सुनाने वाली ही थी कि दीदी, भैया ने आंख दिखाया और मैं बड़ी मायूसी लिए चुप हो गई।
फिर पन्त जी ने अपनी कवितायें गाकर सुनाईं, मां और दीदी ने भी सुनाया... मैं कब पीछे रहती - मैंने भी सुनाया, 'नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए ...'
उसके बाद मैंने सौन्दर्य प्रिय कवि के समक्ष अपने जिज्ञासु प्रश्न रखे - 'नाना जी, पापा हैं तो अम्मा हैं, मामा हैं तो मामी, दादा हैं तो दादी...फिर यहां नानी कहां हैं?' प्रकृति कवि किसी शून्य में डूब गए, अम्मा, पापा सकपकाए, मैं निडर उत्तर की प्रतीक्षा में थी (बचपन में मां, पिता की उपस्थिति में किसी से डर भी नहीं लगता)।
कुछ देर की खामोशी के बाद कवि ने कहा ,'बेटे, तुमने तो मुझे निरुत्तर कर दिया, इस प्रश्न का जवाब मेरे पास नहीं...' क्या था इन बातों का अर्थ, इससे अनजान मैं अति प्रसन्न थी कि मैंने उनको निरुत्तर कर दिया, यानी हरा दिया।
इसके बाद सुकुमार कवि ने सबका पूरा नाम पूछा - रेणु प्रभा, मंजु प्रभा, नीलम प्रभा, अजय कुमार और मिन्नी।
सबके नाम कुछ पंक्तियां लिखते वे रुक गए, सवाल किया- 'मिन्नी? कोई प्रभा नहीं'- और आंखें बंदकर कुछ सोचने लगे फिर अचानक कहा- 'कहिये रश्मि प्रभा, क्या हाल है?'
अम्मा, पापा के चेहरे की चमक से अनजान मैंने इतराते हुए कहा-'छि:! मुझे नहीं रखना ये नाम, बहुत खराब है। एक लड़की- जिसकी नाक बहती है, उसका नाम भी रश्मि है....'पापा ने डांटा -'चुप रहो', पर कवि पन्त ने बड़ी सहजता से कहा, 'कोई बात नहीं, दूसरा नाम रख देता हूं'- तब मेरे पापा ने कहा- 'अरे इसे क्या मालूम, इसने क्या पाया है... जब बड़ी होगी तब जानेगी और समझेगी'
जैसे- जैसे समय गुजरता गया, वह पल और नाम मुझे एक पहचान देते गए।
वह डायरी अम्मा ने संभालकर रखा है, जिसमें उन्होंने सबके नाम कुछ लिखा था। मेरे नाम के आगे ये पंक्तियां थीं,
'अपने उर की सौरभ से
जग का आंगन भर देना'...
कवि का यह आशीर्वाद मेरी जिन्दगी का अहम हिस्सा बन गया... इस नाम के साथ उन्होंने मुझे पूरी प्रकृति में व्याप्त कर दिया।
'पन्त की बेटी' का संबोधन क्या मिला महाविद्यालय में, कि खुशी के आवेग में मेरी माँ (सरस्वती प्रसाद) ने कवि पन्त तक अपनी खुशी के चंद शब्द भेजे, लौटती डाक में पिता का स्नेहिल आशीष मिला और संबोधन को सार्थकता मिली। 1964 में कवि पन्त से हम सपरिवार मिले और उन्होंने विदाई में अपनी पुस्तक 'लोकायतन' की प्रति के साथ अपनी भावनाओं का सौभाग्य अपनी बेटी के नाम लिखा- बेटी सरस्वती (मेरी माँ) के प्रयाग आगमन पर ....
16/10/६४

चन्द्रकिरण किरीटिनी

तुम कौन आती
मौन स्वप्नों के चरण धर।
हृदय के एकांत शांत स्फटिक क्षणों को
स्वर्ग के संगीत से भर।
मचल उठता ज्वार, शोभा सिन्धु में जग
नाचता आनंद पागल
शिखर लहरों पर
थिरकते प्रेरणा पग।
सप्तहीरक रश्मि दीपित
मर्म के चैतन्य का
खुलता गवाक्ष रहस्य भरकर
अमर वीणाएं निरंतर
गूँज उठतीं- गूँज उठतीं
भाव नि: स्वर ...
तारकों का हो खुला स्वप्नाभ अम्बर।
वैश्य लय में बाँध जीवन को
छिपाता मुख पराशर
मर्त्य से उठ स्वर्ग तक
प्रासाद जीवन का अनश्वर
रूप के भरता दिगंतर।
चन्द्रकिरण किरीटिनी, तुम कौन आती
मौन स्वप्न सजग चरण धर।

पता: NECO NX flat no- 42,
Near Dutt mandir chauk ,
Viman Nagar pune - 14,
मो. 09371022446

Jan 29, 2011

अनुभवों का शंखनाद

- रश्मि प्रभा
तुम एक वटवृक्ष हो
इसकी शाखाओं में
ऋतुओं के गीत हैं ...
पत्ते गिरते हैं
तो पत्ते आते भी हैं
वर्षों में
समय दर समय बने घोंसलों में
अनगिनत लम्हों के कलरव हैं ...
चलो गिनते हैं अपनी उँगलियों पर
उन सालों को
जब इसके हरे पत्तों पर
हम अपना नाम लिखा करते थे
देखो न
अब इन हरे पत्तों पर
हमारे बच्चों के नाम हैं...
तुम्हारे घनत्व में
कितने राहगीर सुकून पाते हैं
परत दर परत तुम्हारे तने में
जाने कितनी कहानियाँ हैं
कुछ इनकी कुछ उनकी
कुछ हमारी ...

एक नया साल
नई उम्मीदों के संग
लिपटा है तेरी टहनियों से
नए सपनों की सरसराहट है पत्तों में
तुम्हारे जड़ों की मजबूती
सपनों का हौसला ...
ईश्वर का प्रतिनिधित्व करो
कहो किसी मंत्र की तरह
मस्जिद के अजान की तरह
नया वर्ष,
सपनों से हकीकत तक का
स्वर्णिम सफऱ तय करे
हर दिन तुम्हारा हो

अपने अनुभवों का शंखनाद करो
2011 का जयघोष करो ....
मेरे बारे में...
सौभाग्य मेरा कि मैं कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की बेटी हूं और मेरा नामकरण स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पन्त ने किया और मेरे नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियां मेरे नाम की... 'सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर- सुन्दर जग-जीवन'। शब्दों की पांडुलिपि मुझे विरासत में मिली है। अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते... मेरा मन जहां तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं...
मेरा पता: NECO NX flat no- 42 near dutt mandir chauk viman nagar pune -14
मो। 09371022446, Email- rasprabha@gmail.com, www.urvija.parikalpnaa.com
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भोर की पहली किरण
- आशा भाटी
कोहरे की चादर ओढ़कर सोये हैं पेड़ सभी
नहीं है याद इन्हें मौसम की कोई
भोर की पहली किरण इन्हें जगाती है
तो नया वर्ष आता है।

मौसम का भरोसा क्या, ये तो आते जाते हैं
कभी- कभी कई बार ये बदलते भी हंै
कोई क्षण जीवन में ठहर जाता है।
तो नया वर्ष आता है।

कुछ दिन पहले बाग था वीरान
महकते फूलों के इंतजार में था
कली कोई मुसकुराती है
तो नया वर्ष आता है।

यूं तो इन्द्रधनुष धरा पर
बिखरते रहते हैं
कभी कोई रंग जीवन में निखर जाता है
तो नया वर्ष आता है।
मेरे बारे में...
हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हूं। प्रकृति से प्रेम है। पढऩे- लिखने की शौकीन हूं। लखनऊ की एक साहित्यिक संस्था कादम्बिनी से जुड़ी हूं।
मेरा पता- शताक्षी, 13/89
इंदिरा नगर, लखनऊ
(उ. प्र.) 226016
फोन-0522 - २७१२४७७
*****
हाइकु
खुशी के फूल
- डॉ. भावना कुंअर
1
सीढिय़ां चढ़े
संभलकर सभी
नये वर्ष में।
2
उलझे रास्ते
जल्द ही सुलझेंगे
नव वर्ष में।

3
मंगलमय
सभी को नव वर्ष
दिल से दुआ।
4
पुराने दिन
जो थे मुश्किल भरे
लो बीत चले।
5
डाकिया लाया
खुशियों भरे पत्र
नये साल में।
6
नये साल की
बगिया में खिलेंगे
खुशी के फूल।
7
लो बीत चला
एक और सफऱ
नई तलाश।
8
लो चल पड़े
नया साल खोजने
बर्फीले दिन।
9
आओ लें प्रण
हो न कोई गुनाह
इस वर्ष में।
10
ओढ़े हुए है
कोहरे की चादर
नूतन वर्ष।
11
सर्द हवाएं
करती आलिंगन
नव-वर्ष का।
12
पंछी-समूह
गाये मधुर गीत
नये साल में।
13
करें स्वागत
खुशियां ले के हम
नव-वर्ष का।
14
खड़ा द्वार पे
प्रेम संदेश लिये
ये नव-वर्ष।
15
ना बरसाए
पलकों की झालर
दु:ख के मोती।
16
प्रथम गान
नव-वर्ष बेला में
गाती कोयल।
17
इस साल में
ना उजड़े चमन
कोशिश यही।
18
खुशियां लाए
बिछड़ों के मध्यस्थ
ये नववर्ष।
19
ओस के कण
चुगती हुई आई
ये जनवरी।
20
सहमे पंछी
अब फिर झूमेंगे
नये साल में।
मेरे बारे में...
मुझे साहित्य से बहुत प्यार है। साहित्य की वादियों में ही भटकते रहने को मन करता है। ज्यादा जानती नहीं हूं पर मेरे अन्त:करण में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो कभी तो आत्ममंथन करती हैं और कभी शब्दों में ढलकर रचनाओं का रूप ले लेती हैं। वही सब आपके साथ बांटना चाहूंगी। पिछले वर्ष से आस्ट्रेलिया में अध्यापन कर रही हूं।
मेरा स्थायी पता- द्वारा श्री सी. बी. शर्मा, आदर्श कॉलोनी
(एसडी डिग्री कॉलेज के सामने) मुजफ्फरनगर (उप्र) 251001
Email- bhawnak2002@gmail.com
www.dilkedarmiyan.blogspot.com