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Feb 3, 2024

कालजयी कहानीः बट बाबा


 - फणवीश्वरनाथ रेणु

गाँव से सटे, सड़क के किनारे का वह पुराना वट-वृक्ष।

इस बार पतझ्ड़ में उसके पत्ते जो झड़े, तो लाल-लाल कोमल पत्तियों को कौन कहे, कोंपल भी नहीं लगे। धीरे-धीरे वह सूखता गया और एकदम सूख गया-खड़ा ही खड़ा।

शाम को निरधन साहु की दुकान पर इसी पेड़ की चर्चा छिड़ी हुई थी।

जब से इस गाँव के खुशहाल किसान ‘मुखिया अनन्त मंडर' की दुनिया बिगड़ गई, उनका बैठकखाना उजड़ गया, तभी से निरधन साहु की दुकान पर ही गाँव के लोगों की मंडली शाम को बैठती। दिन-भर के थके-माँदे किसान, खेतिहर मजदूर नोन-तेल, चावल-दाल लेने अथवा यों ही थोड़ी देर बैठकर चिलम पीने, सुख-दुख की कहानी कहने-सुनने चले आते। शाम को थोड़ी देर बैठकर बातें करने का यही एकमात्र सहारा था। हाँ  तो, उस शाम को वहाँ पर इसी पेड़ की चर्चा छिड़ी हुई थी। आठ-दस व्यक्ति बैठे हुए थे। फरजन मियाँ ने कहा-“अरे! क्या पूछते हैं, हमारे दादा कहते थे कि उनके बाप के बचपन में भी यह ऐसा ही बूढ़ा था।...ओह !”

बैठे हुए लोगों में से प्रत्येक ने इसी प्रकार की कुछ-न-कुछ बातें कहीं। बूढ़ा निरधन साहु का शरीर काला ज्वर से कंकाल मात्र रह गया था, तिस पर खाँसी, कुछ बोलते ही ‘खाँय-खाँय’ करने लगता था। उसकी अठारह वर्ष की बेटी लछमनिया दुकान चलाती थी, बुढ़िया वसूल-तगादा करती और शहर से सिर पर ‘सौदा-पत्तर’ ले आती थी। बूढ़ा बैठा-बैठा दिन गिन रहा था। अभी जो उसने पेड़ के सूखने की बात सुनी, तो खाँसता और कराहता हुआ घर से बाहर निकल आया। बोला-“बड़कवा बाबा सूख गइले का?”

बैठी हुई मंडली ने एक स्वर में कहा-“हाँ!”

“अब दुनिया ना रही”-कहकर वह जो खाँसने लगा, तो बीस मिनट तक खाँसता ही रहा। खाँसी शान्त होने पर, भर्राए स्वर में, लम्बी निःश्वास लेता हुआ बोला-““अब ना बचब हो राम!”

हिमालय और भारतवर्ष का जो सम्बन्ध है, वही सम्बन्ध उस वृद्ध पेड़ और गाँव का था। वह उन्नत-मस्तक विशाल पेड़ प्रतिदिन सबेरे मटमैले अन्धकार में, गाँव के आँगन-आँगन में दृष्टि दौड़ाकर क्षितिज पर न जाने क्या देखकर एक बार सिहरता. -सिसकता, फिर टप-टप आँसू बहाकर शान्त हो जाता, सोता हुआ गाँव जब अँगड़ाई लेकर उठता, तो उसकी जटाएँ हिलती-डुलती रहतीं। पेड़ पर पक्षियों का कलरव होता रहता।

जाड़े का दिन हो या गर्मी का मौसम, चाहे वर्षा की ही झड़ी क्‍यों न लगी हो, सुबह से शाम तक उसके नीचे औरत, बूढ़े, बच्चे, जवान, गाय-मैंस-बैलों की छोटी-सी टोली बैठी ही रहती थी।

चैत्र-वैशाख की दोपहरी में तो सारा गाँव ही उसकी शीतल छाया का सहारा लेता। गाँव का लुहार यहीं बैठकर हल वगैरह की मरम्मत करता, घर बनानेवाले मजदूर बाँस यहीं बैठकर फाड़ते-छीलते। औरतों का ओखल-मूसल चलता रहता, बच्चों का घरौंदा खेल, जटाओं को बाँधकर झूला-झूलना, बूढ़ों की अनुभव अभिमान-मिश्रित बातें तथा नौजवानों की नजर बचाकर-नववधुओं और भाभियों की छेड़छाड़ भी चलती रहती। पेड़ की एक तरफ की जमीन में अनेक खुदे हुए काले चूल्हे, उसके पास जली-अधजली लकड़ियाँ सदा बिखरी रहतीं। रात में व्यापारी गाड़ीवानों का यही रैन बसेरा था। इसके अतिरिक्त कभी बारात तो कभी डोली, कभी गाजे-बाजे, हाथी-घोड़ा थोड़ी देर तक यहीं बैठकर सुस्ताते, गाँववालों का मनोरंजन कर चले जाते। डोलियाँ रुकतीं, किशोरी बालिकाएँ, बाल-वृद्ध ‘लाल डोली, लाल डोली, लाल कन्ने है?’ रटते दौड़ते, डोली की खिड़की खुलती, सब आश्चर्य से देखते।

किशोरी लड़कियाँ मन-ही-मन अरमान सजाने लगतीं, हौंसले-भरे छोटे-छोटे लड़के दौड़कर माँ से कहते-'मैं भी ऐछी ही दुलहन लूँगा।

एक जमाना था, जब प्रत्येक शाम को उसके नीचे 'दिवाली' की बहार रहती थी। प्रत्येक घर से घी से भरा-पूरा एक-एक दीप जाता था। सारी रात जगमग-जगमग... !! किन्तु इधर कई वर्षों से तो बस सहुआइन का दीपक ही थोड़ी देर तक टिमटिमाकर बुझ जाता, जुगनू की चकमक सारी रात होती रहती।

एकादशी, पूर्णिमा आदि एवं त्योहारों पर उसकी पूजा भी होती-सिन्दूर-चन्दन, अक्षत, बेलपत्र, धूप-दीप, पान-सुपारी से। वह देवता” था हिन्दुओं का भी, मुस्लिमों का भी। इधर कई वर्षों से मुसलमानों ने पूजा-पत्तर छोड़ दिया है। मौलवी साहब एक आए थे, उन्हीं के कहने से। पर ‘बट बाबा’ को छोड़कर किसी दूसरे नाम से सम्बोधित करने की हिम्मत अब भी उन लोगों की नहीं हुई । बट बाबा कितने मानतों के आरजू-मिननत को सुनते आए थे। जो उससे निराश होते, सदा के लिए निराश हो जाते। जिनकी मनोकामना पूरी होती, वे निहाल हो जाते।

कल की बच्चियाँ जवान होतीं, बट-सावित्री पूजने आतीं, कुछ दिनों के बाद उसके बेटे की भी छठी पूजी जाती, मुंडन-उत्सव होता, फिर शादी में जब वह वर का आभूषण पहनकर प्रणाम करने आती, तो उसकी जटाएँ सदा की तरह हिलती रहतीं। गुड़िया-सी दुलहिन आती, सोने-चाँदी के जेवरों से झमझमाती-गाती-बजाती औरतों की टोली उसे ले आती, प्रणाम कराकर ले जाती, वह खड़ा-खड़ा न जाने कितने वर्षों से यह सब देखता आया था, वर-यात्रा, शवयात्रा, भरी लाल माँग, धुली माँग, फूल-सा कोमल बच्चे का माँ की गोद में किलकारी भरना और चिरननिद्रा- में मगन, एक ही दिन, गाँव में दस-दस नवागत शिशुओं का “सोहर' गाती तथा एक ही साथ पन्द्रह- पन्द्रह अर्थियाँ इत्यादि देखते-देखते वह स्थितप्रज्ञ हो गया था।

इस बार वह खड़ा-खड़ा ही सूख गया। प्रतिवर्ष की भाँति वैशाख की दोपहरी आई। कड़कड़ाती धूप से आग की वर्षा होने लगी और इस बार गाँव के पशु-पक्षियों में भी कुहराम मच गया। आने-जानेवाले राही-बटोही, गाड़ीवान एक निराशापूर्ण दृष्टि से पेड़ की ओर देखकर आपस में कुछ बोलते-चालते चले जाते।

गाँव के बाहर, सड़क के किनारे अज्ञात काल से वह खड़ा था। ऐसा मालूम होता था, मानो भय से हार्ट-फेल करके मरे हुए विकराल राक्षस के कंकाल को खड़ा कर दिया गया है। मुँह और आँखें भय से विस्फारित, दोनों हाथ उठाए हुए कंकाल की तरह!

वह सूख गया, किन्तु गाँववालों की उस पर श्रद्धा और भक्ति की धारा और भी तीव्र हो गई। यों तो ‘आपत-विपद’ में उसकी मिन्‍नतें और पूजा पहले भी होती थी, पर जब से पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा ‘पूजा और भिन्न्तों’ का ताँता-सा लग गया।

लोगों की यह धारणा थी कि बाबा जाने के समय सबों की मनोकामना पूरी करेंगे। जिस पर ढल जाएँ, वह मालामाल हो जाए। अभी उस दिन अनन्त मंडल की पतोहू चार आने का बताशा मान आई थी कि उसका पति जो भारत-रक्षा कानून के अन्तर्गत ढाई वर्षों से जेल में नजरबन्द है और टी.बी. का शिकार हो चुका है-छूट जाए। रोग भी छूट जाए और वह भी। जिस दिन पहली बार ससुराल आई थी, बनारसी साड़ी, गहनों तथा शिक्षित पति के घमंड में वह बोली थी-मैं पेड़-पत्थर की पूजा नहीं करती । लोग कहते हैं और वह भी मानने लगी है कि यह दुर्दिन उसी घमंड का कुफल है।

उस दिन वह जो गई तो शरीर पर सिर्फ एक फटी साड़ी थी, जिसमें पाँच-सात पैबन्द लगे थे, चार-पाँच साड़ी के टुकड़ों की पट्टियाँ लगी थीं, दो-ढाई हाथ कंट्रोल की साड़ी, सुहाग की साड़ी का एक टुकड़ा तथा अन्य साड़ियों के टुकड़ों की पट्टियों से - बनी एक पंचरंगी' साड़ी से अपनी लाज ढँकते, आँसू पोंछते वह बोली थी, “बाबा! अब इससे बढ़कर और कौन-सी सजा दोगे?” और वह फूट-फूटकर रो पड़ी थी।

निरधन साहु की बेटी ‘लछमनिया’ रो आई थी-“बाबा! गाँव-मुहल्ला, टोला-पड़ोस तथा जाति-बिरादरी के लोग हैंस रहे हैं। मैं इतनी बड़ी हो गई, कोई दूल्हे का बाप एक हजार से नीचे तिलक की बात ही नहीं करता है। बाबू और घर की दशा तुमसे छिपी नहीं है। दुनिया के लिए तुम सूख गए हो, पर तुम्हारा प्रताप तो नहीं सूखा है।

बाबा! यदि किसी दूल्हे के बाप का मन फेर दो तो मैं आठ आने की मिठाई, सवा हाथ लँगोट और प्रत्येक रविवार को नया दीया और नई बत्ती जला दूँ। कलरू महता पर जमींदार की कुर्की आनेवाली थी। टहलू पासवान का बेटा फौज में था, भजू धानुक की स्त्री बीमार थी। सब अपने-अपने धन-माल-जान के लिए 'मनौती' मना रहे थे।

आज प्रातःकाल ही जमींदार के अमले-सिपाही चालीस-पचास मजदूर लेकर आए, गाँव के मजदूर भी बेगार में पकड़े गए। लड़ाई का जमाना है, जलावन की भारी कमी। जमींदार साहब का हुक्म है कि पेड़ काटा जाएगा।

लोग आपस में कानाफूसी कर बातें करने लगे। एक ही साथ पेड़ के सूखे तने पर साठ-साठ कुल्हाड़ों का वार हुआ- 'घड़-धड़ खड़-खड़-खड़ाक...” गाय-बैल, घोड़े-बकरे चौंककर गाँव से भागे, कुत्ते भौंकने लगे, भयभीत पक्षियों ने कलरव आरम्भ कर दिया। छोटे-छोटे बच्चे डरकर माँ की छाती से चिपट गए। गाँव के अर्धनग्न नर-नारियों तथा शिशुओं के कंकालों की कतार...एकटक से देख रही थी। कोई-कोई मर्द भी फूट-फूटकर रो रहा था, मानो सबों के कलेजे पर ही कुल्हाड़े चलाए जा रहे हैं।

धड़-धड़-धड़-धड़ाम...आर्तनाद कर पेड़ गिरा, फिर गाँव में भारी कोलाहल...!!

निरधन साहु कल से बेहोश था। बोलने और सुनने की शक्ति शायद जाती रही थी। अन्तिम घड़ियाँ गिन रह्म था। पेड़ गिरने के धमाके से वह भी चिहुँका, अस्फुट स्वरों में बोला-“असमान से...का गिरल रें लछमनि...! अरे बाप!!”

लछमनिया खिड़की से देख रही थी, और खड़ी-खड़ी सिसक रही थी।

Dec 18, 2015

ठेस

कलाकार मन को टटोलती
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी
फणीश्वरनाथ रेणु एक ऐसे कथाकार थे जिन्होंने आजादी के बाद स्वप्न-भंग पर सर्वाधिक चर्चित कृतियों का सृजन किया है। मैला आंचल जैसे प्रख्यात और दुर्लभ उपन्यास के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने अभावों में जीने वाले मन के कुबेरों की कथा की अनोखी परंपरा को समृद्ध किया। नव- सामंतवाद, जातिप्रथा, राजनीतिक षडयंत्र और निरंतर शोषण के वीभत्स चेहरों की पहचान रेणु के पाठकों ने किया। इनकी लेखन- शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र- निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य- सरल मानव मन (प्राय:) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। प्रस्तुत है कलाकार के मन को टटोलती उनकी यह कहानी ठेस- 
ठेस
खेती- बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते..  लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगारसमझते हैं। इसलिए, खेत- खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुलाकर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक- तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा। पगडण्डी पर तौल- तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे- धीरे..  मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।
...आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े- बड़े बाबू लोगों की सवारियाँ बंधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे...  ‘.. अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गयी है सारे इलाके में। एक दिन समय निकालकर चलो। कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से- सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।
मुझे याद है..  मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, ‘भोग क्या- क्या लगेगा? ‘
माँ हँस कर कहती, ‘जा-  जा, बेचारा मेरे काम में पूजा- भोग की बात नहीं उठाता कभी।
ब्राह्मण टोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने-  तुम्हारी भाभी नाखून से खांट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार- कुम्हारों की घरवाली बनाती है। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनायीं!
इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं माँ को पूछ लेता...
सिरचन को देखते ही माँ हुलस कर कहती, ‘आओ सिरचन! आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न... और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी की शीतलपाटी के लिए।
सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सम्हाल कर हँसता-  घी की सुगँध सूँघ कर आ रहा हूँ, काकी! नहीं तो इस शादी ब्याह के मौसम में दम मारने की भी छुट्टी कहाँ मिलती है? ‘
सिरचन जाति का कारीगर है। मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक- एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त... काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन सांप की तरह फुफकार उठता-  फिर किसी दूसरे से करवा लीजिये काम। सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं।
बिना मजदूरी के पेट- भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं, किन्तु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता।
सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं... तली- बघारी हुई तरकारी, दही की कुढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सबका प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ, दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने- पीने में चिकनायी की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म! काम अधूरा रखकर उठ खड़ा होगा-  आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-  सा रह गया है, किसी दिन आ कर पूरा कर दूँगा।’...  ‘किसी दिन’-  माने कभी नहीं!
मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी- चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े- बड़े जाले, हलावाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी- टोपी तथा इसी तरह के बहुत से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग- बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरुरत नहीं। पेट- भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना- धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा...।
कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारीगर है... महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी-  ठहरो! मैं माँ से जा कर कहती हूँ। इतनी बड़ी बात!
बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है।  नहीं तो दो- दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी! सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।
उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी।
पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है- मानू के साथ मिठाई की पतीली न आये, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो.. ।  भाभी ने हँस कर कहा, ‘बैरंग वापस! इसलिए, एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था माँ ने-  देख सिरचन! इस बार नयी धोती दूँगी, असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएँ।
पान- जैसी पतली छुरी से बांस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।
मँझली भाभी से नहीं रहा गया, परदे के आड़ से बोली, ‘पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।
काम में व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गयी। बोला, ‘मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है..  मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।
मँझली भाभी का मुँह लटक गया। मेरी चाची ने फुसफुसा कर कहा, ‘किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूँगिया- लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।
दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा! सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बहार निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने- पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली-  चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएं उभर आयीं। मैं दौड़ कर माँ के पास गया। माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़? ‘ 
माँ रसोईघर में अन्दर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, ‘मैं अकेली कहाँ- कहाँ क्या- क्या देखूं!..  अरी मँझली, सिरचन को बुँदिया क्यों नहीं देती? ‘
बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी!सिरचन के मुँह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।
माँ की बोली सुनते ही मँझली भाभी की भौंहें तन गयीं। मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंक कर चली गयी।
सिरचन ने पानी पी कर कहा, ‘मँझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बाँटती है क्या? ‘
बस, मँझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने माँ के पास जा कर लगाया-  छोटी जाति के आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही... किसी के नैहर- ससुराल की बात क्यों करेगा वह? ‘
मँझली भाभी माँ की दुलारी बहू है। माँ तमक कर बाहर आई-  सिरचन, तुम काम करने आये हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरुरत हो, मुझसे कहो।
सिरचन का मुँह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बांस में टंगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा।
मानू पान सजा कर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई बोली, इधर- उधर देख कर कहा-  सिरचन दादा, काम- काज का घर! पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बात करेंगे..  तुम किसी की बात पर कान मत दो।
सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गयी। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देखकर कहा-  छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा खाते हो?... चटोर कहीं के! मेरा कलेजा धड़क उठा..  यत्परो नास्ति!
बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हंसियाँ वैगरह समेट सम्हाल कर झोले में रख...  टंगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन के बाहर निकल गया।
चाची बड़बड़ाई-  अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी! कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपये में मोहरछाप वाली धोती आती है।... इस मुँहझौंसे के मुँह में लगाम है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर लेकर गली- गली मारी फिरती हैं।
मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही... सातो तारें मंद पड़ गए।
माँ बोली, ‘जाने दे बेटी! जी छोटा मत कर, मानू। मेले से खरीद कर भेज दूँगी।
मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी माँ ने। ससुरालवालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गयी।
मैं सिरचन को मनाने गया। देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है।
मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं... मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा?..  ससुरी खुद मरी, बेटे बेटियों को ले गयी अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा..  गाँव- भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी..  अब क्या? ‘
मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।
बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी- यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?’
मानू कुछ नहीं बोली। ..बेचारी! किन्तु, मैं चुप नहीं रह सका- चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी।
मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था।
स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जातां से अधूरे चिक को मोड़ कर लिए जा रही है अपने साथ। मन- ही- मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर- में- सुर मिला कर कोसने को जी हुआ... कामचोर, चटोर.. ।!
गाड़ी आई। सामान चढ़ा कर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी-  बबुआजी! उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा।
क्या है? ‘ मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा-  दौड़ता आया हूँ... दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखूं!
मैंने दरवाजा खोल दिया।
सिरचन दादा! मानू इतना ही बोल सकी।
खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, ‘यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।
गाड़ी चल पड़ी।
मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दांत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए।
मानू फूट- फूट रो रही थी। मैं बण्डल को खोलकर देखना लगा- ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों को ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।

Mar 21, 2011

ठेस

ठेस
- फणीश्वरनाथ रेणु
खेती- बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते.. लोग उसको बेकार ही नहीं, 'बेगार' समझते हैं। इसलिए, खेत- खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुलाकर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक- तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा। पगडण्डी पर तौल- तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे- धीरे.. मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।
...आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े- बड़े बाबू लोगों की सवारियाँ बंधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे... '.. अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गयी है सारे इलाके में। एक दिन समय निकालकर चलो। कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से- सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।'
मुझे याद है.. मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, 'भोग क्या- क्या लगेगा?'
माँ हँस कर कहती, 'जा- जा, बेचारा मेरे काम में पूजा- भोग की बात नहीं उठाता कभी।'
ब्राह्मण टोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने- 'तुम्हारी भाभी नाखून से खांट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार- कुम्हारों की घरवाली बनाती है। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनायीं!'
इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं माँ को पूछ लेता...
सिरचन को देखते ही माँ हुलस कर कहती, 'आओ सिरचन! आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न... और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी की शीतलपाटी के लिए।'
सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सम्हाल कर हँसता- 'घी की सुगंध सूंघ कर आ रहा हूँ, काकी! नहीं तो इस शादी ब्याह के मौसम में दम मारने की भी छुट्टी कहाँ मिलती है?'
सिरचन जाति का कारीगर है। मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक- एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त... काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन सांप की तरह फुफकार उठता- 'फिर किसी दूसरे से करवा लीजिये काम। सिरचन मुंहजोर है, कामचोर नहीं।'
बिना मजदूरी के पेट- भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं, किन्तु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता।
सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं... तली- बघारी हुई तरकारी, दही की कुढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सबका प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ, दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने- पीने में चिकनायी की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म! काम अधूरा रखकर उठ खड़ा होगा- 'आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा- सा रह गया है, किसी दिन आ कर पूरा कर दूँगा।'... 'किसी दिन'- माने कभी नहीं!
मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी- चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े- बड़े जाले, हलावाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी- टोपी तथा इसी तरह के बहुत से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग- बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरुरत नहीं। पेट- भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना- धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा...।
कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारीगर है... महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी- ठहरो! मैं माँ से जा कर कहती हूँ। इतनी बड़ी बात!'
'बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो- दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी!' सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।
उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी।
पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है- 'मानू के साथ मिठाई की पतीली न आये, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो.. ।' भाभी ने हँस कर कहा, 'बैरंग वापस!' इसलिए, एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था माँ ने- 'देख सिरचन! इस बार नयी धोती दूँगी, असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएँ।'
पान- जैसी पतली छुरी से बांस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।
मंझली भाभी से नहीं रहा गया, परदे के आड़ से बोली, 'पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।'
काम में व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गयी। बोला, 'मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है.. मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।'
मंझली भाभी का मुंह लटक गया। मेरी चाची ने फुसफुसा कर कहा, 'किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूँगिया- लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।'
दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा! सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बहार निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने- पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली- चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएं उभर आयीं। मैं दौड़ कर माँ के पास गया। 'माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़?'
माँ रसोईघर में अन्दर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, 'मैं अकेली कहाँ- कहाँ क्या- क्या देखूं!.. अरी मंझली, सिरचन को बुँदिया क्यों नहीं देती?'
'बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी!' सिरचन के मुंह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।
माँ की बोली सुनते ही मंझली भाभी की भौंहें तन गयीं। मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंक कर चली गयी।
सिरचन ने पानी पी कर कहा, 'मंझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बाँटती है क्या?'
बस, मंझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने माँ के पास जा कर लगाया- 'छोटी जाति के आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही... किसी के नैहर- ससुराल की बात क्यों करेगा वह?'
मंझली भाभी माँ की दुलारी बहू है। माँ तमक कर बाहर आई- 'सिरचन, तुम काम करने आये हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरुरत हो, मुझसे कहो।'
सिरचन का मुँह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बांस में टंगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा।
मानू पान सजा कर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई बोली, इधर- उधर देख कर कहा- 'सिरचन दादा, काम- काज का घर! पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बात करेंगे.. तुम किसी की बात पर कान मत दो।'
सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गयी। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देखकर कहा- 'छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा खाते हो?... चटोर कहीं के!' मेरा कलेजा धड़क उठा.. यत्परो नास्ति!
बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हंसियाँ वैगरह समेट सम्हाल कर झोले में रख... टंगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन के बाहर निकल गया।
चाची बड़बड़ाई- 'अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी! कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपये में मोहरछाप वाली धोती आती है।... इस मुँहझौंसे के मुँह में लगाम है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर लेकर गली- गली मारी फिरती हैं।'
मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही... सातो तारें मंद पड़ गए।
माँ बोली, 'जाने दे बेटी! जी छोटा मत कर, मानू। मेले से खरीद कर भेज दूँगी।'
मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी माँ ने। ससुरालवालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गयी।
मैं सिरचन को मनाने गया। देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है।
मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं... मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा?.. ससुरी खुद मरी, बेटे बेटियों को ले गयी अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा.. गाँव- भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी.. अब क्या?' मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।
बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी- 'यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?'
मानू कुछ नहीं बोली। .. बेचारी! किन्तु, मैं चुप नहीं रह सका- 'चाची और मंझली भाभी की नजर न लग जाए
इसमें भी।'
मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था।
स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जातां से अधूरे चिक को मोड़ कर लिए जा रही है अपने साथ। मन- ही- मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर- में- सुर मिला कर कोसने को जी हुआ... कामचोर, चटोर.. ।!
गाड़ी आई। सामान चढ़ा कर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी- 'बबुआजी!' उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा।
'क्या है?' मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा- 'दौड़ता आया हूँ... दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखूं!'
मैंने दरवाजा खोल दिया।
'सिरचन दादा!' मानू इतना ही बोल सकी।
खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, 'यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।'
गाड़ी चल पड़ी।
मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दांत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए।
मानू फूट- फूट रो रही थी। मैं बण्डल को खोलकर देखना लगा- ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों को ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।
कलाकार मन को टटोलती रेणु की कहानी
हिन्दी की यादगार कहानियां स्तंभ के अंतर्गत अब तक आप प्रेमचंद, माधवराव सप्रे, मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी, उपेन्द्रनाथ अश्क और कमलेश्वर की कहानियां पढ़ चुके हैं। पाठकों ने इस स्तंभ के लिए चयनित कहानियों को खूब पसंद किया है। इस अंक में हिन्दी के यशस्वी कथाकारों की ऐसी कहानियों का चयन कर रहे हैं जिन्हें कथा परंपरा और प्रवृत्तियों की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है।
फणीश्वरनाथ रेणु एक ऐसे कथाकार थे जिन्होंने आजादी के बाद स्वप्न-भंग पर सर्वाधिक चर्चित कृतियों का सृजन किया है। मैला आंचल जैसे प्रख्यात और दुर्लभ उपन्यास के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने अभावों में जीने वाले मन के कुबेरों की कथा की अनोखी परंपरा को समृद्ध किया। नव- सामंतवाद, जातिप्रथा, राजनीतिक षडयंत्र और निरंतर शोषण के वीभत्स चेहरों की पहचान रेणु के पाठकों ने किया। इनकी लेखन- शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र- निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य- सरल मानव मन (प्राय:) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। प्रस्तुत है कलाकार के मन को टटोलती उनकी यह कहानी 'ठेस'।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा , एल आई जी-18, आमदीनगर, भिलाई 490009, मोबाइल 9827993494
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