- प्रमोद भार्गव
हमारे यहाँ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहासबद्ध लेखन के परिप्रेक्ष्य में उन पत्रों और साक्ष्यों को लगभग बहिष्कृत किया गया है, जो पत्र और साक्ष्य क्रांतिवीरों ने युद्ध की रणनीति सुनिश्चित करने और हथियार, सेना, धन व खाद्य सामग्री की उपलब्धता प्राप्त करने के लिए लिखे थे। जबकि इसके विपरीत अंग्रेज शासकों ने जो पत्र इत्यादि लिखे, उन्हें 1857 के संग्राम को सैनिक विद्रोह बताने के लिए कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया, जैसे उनकी लिखी सूचनाएँ ब्रह्म वाक्य हों। शासकों की इन सूचनाओं को इतिहास मानने की बड़ी भूल हुई है।
हमारे शहर शिवपुरी में 1857 के संघर्ष से जुड़ी दो बड़ी घटनाएँ घटित हुई हैं। एक तो तात्या टोपे को फाँसी के फंदे पर शिवपुरी में ही लटकाया गया था, दूसरे इतिहास की जिन पुस्तकों में गोपालपुर जागीर का जिक्र है, वह भी शिवपुरी जिले के अंतर्गत है। यही वह स्थल था, जहाँ लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब ने गोपालपुर के जागीरदार रघुनाथ सिंह वशिष्ठ और उनके अनुज गोविंद सिंह के साथ मंत्रणा करके ग्वालियर पर कब्जा करने की योजना को क्रियान्वित किया था। यहाँ के लोक समाज से लक्ष्मीबाई ने सैन्य संगठन भी खड़ा करके अपनी सेना में शामिल किया था।
पत्रों की प्रदर्शनी -
इस जन-संग्राम की प्रामाणिकता की बात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्या टोपे के बलिदान दिवस से करते हैं। दरअसल शिवपुरी में 18 अप्रैल को प्रतिवर्ष दो दिवसीय मेले का आयोजन तात्या के बलिदान को स्मरणीय बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस मेले में अब से बीस साल पहले तक इस संग्राम से जुड़े पत्रों एवं हथियारों की विशाल एवं भव्य प्रदर्शनी लगाई जाती थी। यह प्रदर्शनी लगती अब भी है, लेकिन इसका रूप बहुत संक्षिप्त कर दिया गया है। परिणामतः यह प्रदर्शनी अब इतिहास के जिज्ञासुओं की समझ विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि ये पत्र मूल व संपूर्ण रूप में आज भी राजकीय अभिलेखागार भोपाल में सुरक्षित हैं। दुर्लभ होने के कारण अब पत्रों की छाया प्रतियाँ ही प्रदर्शनी में लगाई जाती हैं।
सौभाग्य से मुझे इन पत्रों को पढ़ने का अवसर मिला है। इन्हें पढ़ने से पता चलता है कि इस संग्राम में खास ही नहीं आम आदमी भी सर्वस्व न्योछावर कर देने की मानसिकता से युद्ध में भागीदारी के लिए मार्ग खोजने में संलग्न थे। चूंकि ये पत्र बुंदेली भाषा में थे और इनमें आंचलिक बोली के शब्द प्रयोग में लाए गए थे, इसलिए इनके वास्तविक अर्थ समझने के लिए मैंने अपने पूज्य गुरुवर डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही‘ से संपर्क साधा। डॉ. विरही बुंदेली, हिंदी एवं अंग्रेजी के विलक्षण ज्ञाता होने के साथ-साथ बड़े साहित्यकार भी हैं। उन्होंने बताया कि इन पत्रों को वे सत्तर के दशक में ही बुंदेली से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। उन्हीं के संपादकत्व में पत्रों के संग्रह का प्रकाशन भी हो चुका है; किंतु दुर्भाग्य से इन दुर्लभ पत्रों की पुस्तक की प्रति उनके पास भी नहीं थी। परंतु उन्होंने मार्ग सुझाया कि यह पुस्तक नगर पालिका परिषद शिवपुरी द्वारा प्रकाशित की गई थी, इसलिए हो सकता है, उनके भंडार- गृह में कुछ पुस्तकें मिल जाएँ।
इस सूत्र वाक्य को पकड़कर जब हमने पालिका का भंडार खँगाला तो बेहद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पुस्तकों का एक बंडल मिल ही गया। बंडल को खोलने पर ज्यादातर पुस्तकें तो सड़-गल गई थीं, लेकिन बीच की दो-चार पुस्तकें संयोग से ऐसी निकल आईं, जिनमें पत्र संपूर्ण रूप से पढ़ने में आ रहे थे। मेरे लिए ये पत्र बड़ी थाती सिद्ध हुए।
‘1857 की क्रांति' शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित जो पत्र संगृहीत हैं, वे पत्र महारानी लक्ष्मीबाई, रानी लड़ई दुलैया, राजा बखतवली सिंह, राजा मर्दन सिंह, राजा रतन सिंह और इस क्रांति के महान योद्धा, संगठक एवं अप्रतिम सेनानायक तात्या टोपे द्वारा लिखे गए या उनको अन्य लोगों द्वारा लिखे गए पत्र हैं। इनके अलावा कुछ पत्र ऐसे भी हैं, जो पंडितों और तांत्रिकों द्वारा लिखे गए हैं। इन पत्रों में अतीन्द्रिय शक्तियों से जुड़े ऐसे मंत्रों व जंत्रों का रेखांकन है, जो तात्या टोपे की रक्षा के लिए बतौर सुरक्षा-कवच हैं। इन पत्रों की भावना से यह स्पष्ट होता है कि इस संग्राम का विस्तार दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों तक हो रहा था और केवल परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़ने की तीव्र इच्छा से आम-आदमी क्रांति के इस महायज्ञ में अपने अस्तित्व की समिधा डालने को तत्पर था।
इस किताब की भूमिका के अनुसार, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित इन पत्रों की प्राप्ति का इतिहास भी बड़ा रोचक है। आजादी की पहली लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी, तब तात्या टोपे अपनी फौज के साथ ओरछा रियासत के गाँव आष्टौन में थे। अंग्रेजों को मुखबिर से यह खबर पता चल गई। अंग्रेजी फौज ने बिना वक्त गँवाए तात्या टोपे के डेरे पर हमला बोल दिया। उस समय तात्या मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा, ऊहापोह की हालत में तात्या को अपना कुछ बहुमूल्य सामान यथास्थान छोड़कर नौ-दो-ग्यारह होना पड़ गया।
उस दौरान ओरछा के दीवान नत्थे खाँ थे। तात्या द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान की पोटली नत्थे खाँ के विश्वसनीय सिपाही ने उन्हें लाकर दी। इस सामान में एक बस्ता था, जिसमें जरूरी कागजात व चिट्ठी-पत्री थीं। इसी सामान में एक तलवार और एक उच्च कोटि की गुप्ती भी थी। नत्थे खाँ के यहाँ कोई पुत्र नहीं था, इसलिए यह धरोहर उनके दामाद को मिली। दामाद के यहाँ भी कोई पुत्र नहीं था, गोया तात्या टोपे के सामान के वारिस उनके दामाद अब्दुल मजीद फौजदार बने, जो टीकमगढ़ के निवासी थे।
स्वतंत्र भारत में 1976 में टीकमगढ़ के राजा रहे नरेंद्र सिंह जू देव को अब्दुल मजीद के पास इन पत्रों के होने की खबर आई। नरेंद्र सिंह उस समय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने इन पत्रों के ऐतिहासिक महत्त्व को समझते हुए तात्या की धरोहर को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की। साथ ही पत्रों की वास्तविकता की पुष्टि इतिहासकार दत्तात्रेय वामन पोद्दार से भी कराई। पोद्दार ने पत्रों के मूल होने का सत्यापन करते हुए इन्हें ऐतिहासिक महत्त्व के दुर्लभ दस्तावेज निरूपित किया। झांसी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ. वृंदावन लाल वर्मा ने भी इन्हें मूल पत्र बताते हुए यह सुनिश्चित किया कि पत्रों के साथ मिला सामान तलवार तथा गुप्ती भी तात्या टोपे की ही हैं। डॉ. वर्मा ने यह भी तय किया कि जिस स्थान और जिस कालखंड में इस सामग्री का उपलब्ध होना बताया जा रहा है, उस समय वहाँ तात्या टोपे के अलावा अन्य किसी सेना-नायक ने पड़ाव नहीं डाला था।
तात्या के बस्ते से कुल 225 पत्र प्राप्त हुए थे, जो देवनागरी एवं फारसी लिपि में थे। हिंदी पत्रों की भाषा ठेठ बुंदेली है। इन पत्रों में 125 हिन्दी में और 130 उर्दू में लिखे गए हैं। तात्या की तलवार और गुप्ती भी अनूठी है। तलवार सुनहरी नक्काशी में मूठ वाली है, जो मोती बंदर किस्म की बताई गई है। इस तलवार की म्यान में दो कुंदों में चार अंगुल लंबे बाण के अग्रभाग जैसे पैने हथियार हैं। इन हथियारों पर हाथी दाँत की बनी शेर के मुँह की आकृतियाँ जुड़ी हुई हैं। इस तरह जो गुप्ती प्राप्त हुई है, वह विचित्र है। गुप्ती की मूठ सोने की है। इसके सिरे पर एक चूड़ीदार डिबिया लगी हुई है, जिसमें इत्र-फुलेल रखने की व्यवस्था है। तात्या की यह अमूल्य धरोहर अब राजकीय अभिलेखागार, भोपाल का गौरव बढ़ा रही है।
पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम किस गहराई से जन-संग्राम में बदलता जा रहा था और आम आदमी किस दीवानेपन से राष्ट्र की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग के संस्कारों में ढल रहा था। समर के इस अछूते अध्याय की बानगी इन पत्रों में द्रष्टव्य है...,
तात्या टोपे के नाम लिखे एक पत्र में राजा बखतवली सिंह लिखते हैं-
‘एजेंट हैमिल्टन ने गोरी फौज को लेकर राहतगढ़ पर आक्रमण किया है। खुरई, कानपुर में हुई लड़ाई में मानपुर के करीब 700 और अंग्रेजों के करीब 500 सैनिक मारे गए हैं। अंग्रेजों ने बलपूर्वक पन्ना, बिजावर, टेहरी, चरखारी और छतरपुर के राजाओं को अपनी ओर मिला लिया है। अंग्रेज फौज से मुकाबला करने के लिए सहायता भेजी जाए।’
तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में महाराजा रतन सिंह लिखते हैं-
‘हमने तीन लाख रुपया जमा करा लिया है, मगर हमसे कौलनामा किसी पंडित को भेजकर लिखा लिया जाए। हमारी इज्जत रखी जाए। अब हम फौज सहित कूच करते हैं। हमारी ओर से किसी बात पर तकरार नहीं होगी।’
तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में श्री राम शुक्ल तथा गंगाराम लिखते हैं-
‘सिरोली के घाट पर अंग्रेज कैप्टन और नवाब बांदा की भीड़ रोकने के लिए सेना की सहायता एवं तोप चाहिए। चाँदपुर के थानेदार भी दो सौ बंदूक लेकर हमारे साथ हैं।’
एक अन्य पत्र में मानीराम एवं गंगाराम ने तात्या टोपे को लिखा है-
‘सिरोली, चखुरा, भौरा, चाँदपुर और गाजीपुर के जमींदार अंग्रेजों से मोर्चा लेने को तैयार हैं। अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने पर वे धावा बोलेंगे। गोरी पलटन को कालपी न पहुँचने देने के लिए कंपू का बंदोबस्त भी किया जाए।’
गुलामी का जुआ उतार फेंकने के लिए उतावले ये वे लोग थे, जिनकी कोई बड़ी जागीर नहीं थी। किसी राज्य के सामंत नहीं थे। चाँदपुर के जिस थानेदार का हवाला दो सौ बंदूकों के साथ रणभूमि में कूदने के लिए दिया गया है, वह सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर प्राणों की आहुति देने को तत्पर था। इससे साफ है, संघर्ष की शुरुआत वर्षों से दमित अपमान और क्षोभ के प्रकट रूप में हो रही थी।
तात्या टोपे को ही लिखे एक अन्य पत्र में महाराज कुमार गणेशजू देव ने तात्या टोपे को अपने डेरे पर बुलाया तथा लड़ाई में ठाकुरों के साथ होने का हवाला दिया। जिसमें कुँवर बुधसी, क्षमा जूदेव के नामों का उल्लेख है। उन्होंने लिखा है- ‘इन सबके मन साफ हैं और मैं बीच में हूँ।’
तात्या को आमजन मूरतीसिंह, शिवप्रसाद और गौरीशंकर अवस्थी लिखते हैं- ‘हमीरपुर व सिरोली की मदद के लिए दो तोपें, एक कंपनी तथा राजा लोगों की 500 फौज जल्दी भेजें। गोरे सिरोली के उस पार पांच तोपें लगाकर गोलीबारी कर रहे हैं।’
तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में जानकारी दी है कि करीब एक सौ अंग्रेज अधिकारी व सिपाही ग्वालियर के किले में घुस गए हैं और इन्हें बेदखल करने के लिए हजारों लोग किले के अंदर पहुँच गए हैं। तात्या टोपे की ग्वालियर विजय पर एक पत्र में जैतपुर के फौजदार सवाई माधोसिंह ने खुशी जाहिर की है।
रानी लड़ई दुलैया द्वारा राजा बखतवली सिंह के नाम लिखे पत्र में कहा गया है- ‘पन्ना की फौज हटा-दमोह में थी, उसने नदी पार करके यहाँ के इलाके पर तोपें चला दी हैं। फतहपुर को जब्त करने का विचार है। जबलपुर में खराबियों की फौज अंग्रेजों से बिगड़ गई है। पलटन अब हटा खाली करना चाहती है। कई जगह लड़ाई चल रही है। इसलिए पचास-साठ मन बारूद, शोरा और गंधक की जरूरत है।’
तात्या टोपे को लिखे पत्र में रानी लड़ई दुलैया ने सूचित किया है-
‘पेशवा के पास उन्होंने कुछ लोग भेजे हैं और वे पेशवा के सूबा जलालपुर में ठहरे हुए हैं।’
महारानी लक्ष्मीबाई ने रानी लड़ई दुलैया को एक पत्र लिखकर याद ताजा कराई है- ‘दोनों ओर अच्छे संबंधों की परंपरा रही है, इसलिए आपकी फौज की ओर से कोई वारदात नहीं होनी चाहिए।’
हालाँकि अंततः रानी लड़ई ने लक्ष्मीबाई की मदद तो नहीं की अपितु अंग्रेजों का साथ जरूर दिया।
तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में राजा मर्दनसिंह ने लिखा है- ‘फौज समेत फौरन आएँ। बुंदेलखंड के राजा अंग्रेजों से मिल गए हैं। अंग्रेज बानपुर, शाहगढ़ और झांसी पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं।’
बरुआ सागर के जमादार नत्थे खां ने रानी लक्ष्मीबाई को सावधान रहने के लिए लिखे पत्र में लिखा है- ‘आपके समाचार भले चाहिए। यहाँ के समाचार भले हैं। कई रोज से आपके खुशी की खबर नहीं मिली है, सो आपको यह पत्र लिखा है। हमारे बुजुर्ग श्री बड़े जमादार जू से आपको घरोबा रहा है। ताही प्रमाण हमारी तरफ से खातिर रखने में आए। हाल वर्तमान रोशन है। के जॉन रईस की जो रियासत सरकार ओरछे की है, सो अपुन की रोशनी है। मुल्क मालिक के अहद में अपनी ढाबा रियासत मजबूर में कुछ होना होवै सो इहाँ खावंद के हुक्म बमूजिब होने से करने परत। अपुन याकी रंजीदगी को चित पर न रखियो। अपने हक में कौनह दुखन वादी होवे को नहीं। हाल अपुन को झांसी में रहिबो व उहाँ तै और कहीं को जैबो मुनासिब नाहीं। यहाँ पुरानी अमलदारी में जौन मुकाम खुशीपूर्वक रहाइश रहि कि मंजूरी परै तहाँ की तजबीज लिखाई पठैवी।’
तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में मनफूल सुकुल ने जानकारी दी है- ‘गोरों ने मुनादी पिटवाई है कि विद्रोहियों को जो कोई रसद-मदद देगा, उसे बच्चों समेत फाँसी पर लटका दिया जाएगा।’
ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने एक विशेष पत्र हरकारे द्वारा भेजकर रानी झाँसी को सूचित किया है कि मोर्चाबंदी की तैयारी की जाए। पंडित मोहनलाल ज्योतिषी ने तात्या टोपे को लिखे पत्र के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा रक्षा किए जाने के लिए एक तंत्र भी भेजा। इस पत्र में उल्लेख है- ‘हम फकीर साहब के साथ बैठकर दो जंत्र तैयार कर आपके पास भेज रहे हैं, वह आप बाँध लें और बड़ा जंत्र निशान पर बाँध देना। ईश्वर रक्षा करेगा।-
1857 में ही हमीरपुर से निकलने वाले ‘हमीर’ नामक एक समाचार-पत्र में पत्रकार जलील अहमद ने खबर छापी है- ‘तात्या टोपे की कोठी में दो षड्यंत्रकारी जो बंदूकधारी थे, मोजा रमेली खालपुर में, तात्या टोपे की हत्या की साजिश रचते हुए पकड़े गए। इन्हें तात्या के सामने पेश किया गया।’
‘1857 की क्रांति’ पुस्तक में छपे इन पत्रों के मजमून से स्पष्ट होता है कि भारतीयों के अंतःकरण में दासता से मुक्ति के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया था। उस समय आम आदमी ने अपने राष्ट्रीय धर्म का अहसास किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हुआ। 1857 के इन बलिदानियों ने ही राष्ट्रीय चरित्र की अवधारणा को अभिव्यक्ति दी।
ग्रामीण अंचल से लेकर शहरी भूमि तक अँगड़ाई ले रहा लोक का यह संग्राम हिंदू-मुस्लिम एकता का भी अद्वितीय उदाहरण रहा है; किंतु इतिहास के इस अति महत्वपूर्ण कालखंड की सच्चाई पर पर्दा डाले रखने की कोशिशें इसलिए होती रहीं, क्योंकि इस युद्ध में साधारण भारतीय समाज ने असाधारणता का परिचय दिया था, जिसे संपन्न, शिक्षित व अंग्रेजों के पिट्ठू रहे लोगों को स्वीकारना हमेशा मुश्किल ही रहा है। इस वास्तविकता को छिपाए रखने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इस मुक्ति संग्राम में अंततः लोक यानी भारतवासी पराजित हुए थे। इस संग्राम का इतिहास लिखने के लिए कोई भी नायक-नायिका न तो जीवित बच पाए और न ही अपने संघर्ष की आपबीती लिखने अथवा लिखाने का समय संघर्ष काल में उनके पास था। जबकि इसके उलट तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों ने इस लोक के संग्राम के अंतर्निहित सत्य को विकृत करके हकीकत पर आवरण डालने का काम किया।
सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100