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Aug 1, 2026

उदंती.com, अगस्त- 2026

 वर्ष - 19, अंक - 1

अनकहीः  देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष  - डॉ. रत्ना वर्मा

यादेंः तीजन बाई के साथ वे दो घंटे  - डॉ. रत्ना वर्मा

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे  - रविन्द्र गिन्नौरे

आलेखः पत्रों में लोक-संग्राम - प्रमोद भार्गव

शौर्यः सिपाही बबली सिंह - हरी राम यादव

लघुकथाः दूसरा सरोवर - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

प्रसंगः लड़का और आयरिश टोप  - आदित्य पाधा, अनुवाद : शशि पाधा

कविताः टूट रही है डोर - कृष्णा वर्मा

दो नवगीतः 1. गाँव की पगडंडियाँ, 2. उजालों का झरना - रमेश गौतम

दो संस्मरणः 1. कपड़े सुखाना भी एक कला है, 2. बाबू मोशाय  - अंजू खरबंदा

व्यंग्यः हम आजाद हैं -  विनोद साव

हाइबनः अगले जनम...  -  प्रियंका गुप्ता

कविताः ठहरा हुआ पल - भावना सक्सैना

लघुकथाएँः 1. आखिरी तारीख, 2. खरबूजा - सुकेश साहनी

लघुकथाएँः 1. काम,2. कोशिश 3. कोटा 4. कथा चलती रहे - स्नेह गोस्वामी

चिंतनः ख्वाबों का खयाल - डॉ. महेश परिमल

विज्ञानः क्या एआई भी  पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है?

 किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा- यात्रा पुरातन से नूतन  - विजय जोशी

अनकहीः देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

देश की राजधानी का जंतर-मंतर एक ऐसा स्थान जो कभी जन-आकांक्षाओं, सत्याग्रह और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतीक हुआ करता था, आज राजनीति की मुख्य प्रयोगशाला बन चुका है। कोई भी मुद्दा हो- चाहे वह किसानों की व्यथा हो, पहलवानों का सम्मान हो या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली को लेकर छात्रों का आक्रोश- जंतर-मंतर पर लगने वाले झंडे और नारे जल्द ही राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान का मंच बन जाते हैं।
किंतु इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, वह यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना उचित है? या फिर समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि समस्या केवल किसी एक नीति या घटना में नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिस्टम की बुनियादी जड़ों में है?
अक्सर देखा यह जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक घुसपैठ होती है, तो  ।मूल समस्या दरकिनार हो जाती है।  फिर चाहे समस्या कोई भी हो या नीतिगत कमियाँ, किसी भी आंदोलनों को जब दलगत चश्मे से देखा जाता है, तो सत्ता पक्ष उसे विरोधियों की साजिश मानकर खारिज करने लगता है और विपक्ष उसे भुनाने में लग जाता है; लेकिन इसमें पिसता कौन है? वे जो अपनी समस्या या अधिकार को लेकर न्याय की उम्मीद में आंदोलन पर बैठ जाते हैं।  आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं; लेकिन जब ये आंदोलन केवल सत्ता की चाबी पाने का माध्यम बन जाएँ, तो यह देश की लोकतांत्रिक चेतना के लिए घातक सिद्ध होता है।
यदि ताजा घटनाक्रम पर,  आएँ तो स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्षों बाद भी क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को एक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत माहौल दे पाए हैं? कड़वी सच्चाई तो यही है कि आज शिक्षा का क्षेत्र सेवा न रहकर एक अति-लाभकारी व्यवसाय बन चुका है।  
आज कोचिंग संस्थानों, निजी विश्वविद्यालयों और प्रश्न-पत्र लीक करने वाले गिरोहों का एक ऐसा मकड़जाल तैयार हो चुका है, जो युवाओं के सपनों का व्यापार करता है। सालों-साल मेहनत करने वालों के भविष्य के साथ जब पेपर लीक या प्रशासनिक गड़बड़ियों के जरिए खिलवाड़ होता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती- यह एक पूरी पीढ़ी के विश्वास की हत्या होती है।
परिणाम आज के युवा मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा के उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या यह भारत के युवाओं के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है? इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करते हुए सबसे पीड़ादायक प्रश्न यह उठता है कि हम उनके भविष्य को लेकर आज कहाँ खड़े हैं?
क्या हमारे तंत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ ऐसे लोग से भर गए  हैं, जो हर फैसले में केवल अपना निजी या राजनीतिक फायदा देखते हैं? जिस देश ने वसुधैव कुटुंबकम् और त्याग का दर्शन दिया, क्या उस देश में अपनी धरती, अपने लोगों और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचने का जज्बा खत्म हो रहा है?
यदि उत्तर हाँ है, तो यह हम पूरी मानव सभ्यता के लिए अत्यंत शर्म की बात होगी। एक समाज के रूप में हमारी सबसे बड़ी असफलता यही होगी कि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित, निष्पक्ष और प्रेरणादायक माहौल तक न दे सकें।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बदलाव आ ही नहीं सकता। आवश्यकता सिर्फ पहल करने की है । अब समय आ गया है कि हम समस्याओं पर केवल ऊपरी लीपा - पोती करना बंद करें और एक नए नजरिये से सोचना शुरू करें। हमें व्यवस्था में आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 
शिक्षा में व्यावसायिक माफियागिरी पर नकेल कसने के लिए सख्त कानून और उनका कड़ाई से पालन होना चाहिए। परीक्षाओं में तकनीक का ऐसा पारदर्शी उपयोग हो, जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश शून्य हो। धाँधली करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो उदाहरण बने। और सबसे जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े मुद्दों को राजनीति से परे रखा जाए। प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की सीधी जवाबदेही तय हो।  कितना ही अच्छा हो कि ऐसे  मुद्दों पर सभी राजनीतिक दल मिलकर एक राष्ट्रीय सहमति बना पाएँ।  हालाँकि आज के अवसरवादी राजनेताओं  के उद्देश्यहीन प्रलाप के कारण यह सम्भव नहीं है।
इन सबके साथ यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य और बेहतर जिंदगी देनी है, तो इसकी शुरुआत केवल सरकार से नहीं, बल्कि समाज और परिवार के स्तर से भी करनी होगी। हमें अपने परिवारों और समुदायों में ऐसे मूल्यों को सींचना होगा जहाँ ईमानदारी, परोपकार और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा जाए। यही नहीं नागरिकों को भी केवल मूकदर्शक बनने या दलगत राजनीति में बँटने की बजाय एक जागरूक प्रहरी की भूमिका निभानी होगी। 
तो समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसा परिवार, ऐसा समाज और ऐसा समुदाय बनाएँ जहाँ युवाओं के सपनों की कद्र हो। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जिसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों का नाम पूरी दुनिया में एक मिसाल की तरह लिया जाए। यही उन शहीदों और राष्ट्र-निर्माताओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने हमें एक खुशहाल, आजाद और स्वाभिमानी भारत की नींव सौंपी थी। याद रखिए -जो शिक्षा संस्कार नहीं दे सकती, जो शिक्षा राष्ट्र-प्रेम नहीं सिखा सकती, उस अराजक शिक्षा से  युवा -वर्ग का कोई भला नहीं हो सकता।

यादें/श्रद्धांजलिः तीजन बाई के साथ वे दो घंटे

                               दुनिया भर में गूँजी जिसकी हुंकार

                                                                    - डॉ. रत्ना वर्मा

हाल ही में छत्तीसगढ़ की उस महान लोकगायिका का निधन हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की लोकगाथा 'पंडवानी' को सिर्फ देश ही नहीं; बल्कि सात समुद्र पार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई। राज्य सरकार ने उन्हें ससम्मान अंतिम विदाई दी और उनके नाम से राज्य सम्मान की घोषणा भी की।

खबर सुनते ही मन लगभग दो दशक पीछे चला गया। तब ‘उदंती’ की शुरुआत भी नहीं हुई थी, जब मैं भिलाई स्थित उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और यादगार बातचीत करने पहुँची थी। पिछले कुछ दिनों से मैं अपनी पुरानी फाइलों और हार्ड डिस्क में उस साक्षात्कार को ढूँढ रही थी। पर शब्द भले ही फाइलों की परत में कहीं गुम हो गए थे; लेकिन जब यादों का पिटारा खुला, तो उस दिन का एक-एक दृश्य और बातचीत की पंक्तियाँ स्मृतियों से निकलकर सामने आ गईं।

चलिए मैं आपको अपनी यादों के पिटारे के साथ ले चलती हूँ- तीजन बाई के उस छोटे से क्वाटर 6 बी में- 

भिलाई का वह क्वार्टर और तखत पर बैठी तीजन

बात उस दौर की है जब भारत सरकार से पद्मश्री, और पद्मभूषण पा चुकीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीजन बाई भिलाई स्टील प्लांट के सेक्टर-1, सड़क नं. 18 के क्वार्टर नंबर '6बी' में रहा करती थीं। (बाद में तो उन्हें पद्म विभूषण से भी अंलकृत किया गया।) मिलने के तय वक्त पर जब मैं पहुँची, तो पता चला कि वे खाना खा रही हैं। 

मैं उनके छोटे से बैठक खाने में रखी ट्रॉफियों और दीवारों पर टँगी तस्वीरों को देखने लगी। 19 मार्च 1988 को तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों पद्मश्री और 3 अप्रैल 2003 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों पद्मभूषण ग्रहण करती उनकी तस्वीरें। लाल साड़ी और छत्तीसगढ़ी पारंपरिक जेवरों में सजी, हाथ में तंबूरा लिये पंडवानी गाती उनकी छवि देखकर मुझे स्टेज पर ‘द्रौपदी चीर हरण’ के प्रसंग में उनका रौद्र रूप की याद आने लगा।

समय की रफ्तार के साथ आगे बढ़ते और कई विवादों को झेलते हुए तीजन बाई अपनी पंडवानी गायिका के साथ उसी बुलंदी के शिखर पर विराजमान और उतनी ही व्यस्त भी रहीं। भारत सरकार ने  जब उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया था, तब तीजन बाई को इसका गुमान तक नहीं था कि वे कितनी बड़ी पदवी राष्ट्रपति के हाथों लेकर लौटी हैं। अपने घर में वे उस दिन भी गनियारी गाँव की वही तीजन थीं, जो कभी अपनी संगी-सहेलियों के बीच खेल-खेल में ही महाभारत की कथा को गाकर सुनाया करती थी। मैं उनके जीवन के उतार -चढ़ाव के बारे में सोचते हुए उनका इंतजार कर रही थी कि तभी वे भोजन के बाद बाहर निकलीं। गीले हाथों को अपनी रोज पहनने वाली साधारण सी साड़ी से पोंछते हुए। बाल खुले थे, शायद तुरंत स्नान करके खाने बैठी थीं। हाथ में कंघी लिए वे मेरी बगल में आकर बैठ गईं और बाल सँवारते हुए इतनी सहजता से बातें करने लगीं, मानो परिवार का कोई सदस्य हाल-चाल पूछने आया हो। वे अपने रोज पहनने वाले पारंपरिक गहने पहने हुए थीं- कानों में झुमका और बारी, बाँह में गुदना, गले में हार, हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ , हाँ माथे पर उनकी पहचान वाली बड़ी- सी गोल बिंदी अभी वे लगा नहीं पाई थीं। 

चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लगातार यात्राओं की थकान भी। जब मैंने स्वास्थ्य  के बारे में पूछा, तो एक लंबी साँस लेकर बोलीं- “हाँ, कुछ न कुछ चलता रहता है।” तभी उनके सचिव मनहरण सखा ने उन्हें पान पेश किया। पान चबाते हुए वे आराम से बैठ गईं, जैसे कह रही हों- ‘पूछो, क्या पूछना है?’  वैसे तो वे हिन्दी में बातचीत कर रही थीं; पर  बीच बीच में छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए वे इतनी सहज हो गईं  कि न उन्हें और न मुझे समय का भान हुआ। 

वह ऐतिहासिक साक्षात्कार: तीजन बाई की ज़ुबानी

प्रश्न: क्या आपने कभी सोचा था कि गाँव (गनियारी) से शुरू हुआ यह सफर दुनिया तक पहुँचेगा?

तीजन बाई:  हँसते हुए... मुझे नहीं मालूम था कि मैं गाँव से निकलकर इतनी दूर विदेशों तक हवाई जहाज में यात्रा करूँगी। यह तो सब भगवान की कृपा है।

प्रश्न: कौन-सी बात थी, जिसने आपको 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी गाने के लिए प्रेरित किया?

तीजन बाई: मेरे नाना महाभारत की कहानी कहते थे। उन्हें महाभारत की पूरी कथा कंठस्थ थी। द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग सुनकर मुझे पूरी कहानी जानने की इच्छा हुई, तो मैं नाना से लुका के (छिपकर) उनको गाते हुए सुनती थी।

प्रश्न: छिपकर क्यों सुनती थीं?

तीजन बाई: मेहर ना, अपन नाना ल अब्बड़ डर्राववं (मैं अपने नाना से बहुत डरती थी)। उनके कमरे के बाहर दरवाजे के पीछे छुपकर बैठती थी। नाना बीच-बीच में उठकर चोंगी (सुलफी/बीड़ी का पारंपरिक रूप) पिया करते थे। एक दिन वे अचानक बाहर आ गए और मैं दीवार से चिपकी पकड़ी गई। उन्होंने पूछा- ‘कौन है तू?’  मैंने डरते हुए कहा- ‘मेह तीजन आंव’ (मैं तीजन हूँ)। उन्होंने पूछा कि - छुपा-छुपी खेल रही है, दाई ह मारीस हे के ददा ह खिसयाईस हे (माँ ने मारा है या पिता ने डाँटा है)? जब मैंने कहा कि नहीं, तो बोले- फिर क्यों छुपी है? मैंने डरते हुए कहा कि मैं आपकी कहानी छिपकर सुन रही थी। नाना बहुत खुश हुए और बोले- ‘चल अंदर बैठकर सुन।’ फिर वे मुझे रोज कथा सुनाने लगे।

प्रश्न: क्या नाना ही आपके गुरु थे? सार्वजनिक मंच पर पहली बार कब आईं?

तीजन बाई: हाँ, नाना ही गुरु थे। जब सीख गई और घर में पता चला तो,  माँ ने खूब मारा और तब मैं भागकर चंदखुरी गाँव आ गई। वहाँ मजदूरी करते हुए शाम को संगी-साथियों को नाना से सुनी सुनाई पंडवानी सुनाती थी। एक दिन गाँव के भूषण दाऊ ने मेरा गाना सुना, तो खुश होकर 10 रुपये दिए। उस ज़माने में 10 रुपये बहुत थे! फिर उन्होंने शाम को चौराहे पर शोलापुरी चादर से स्टेज बनवा दिया। तबला-हारमोनियम और रागी (हुंकार भरने वाला साथी) का इंतज़ाम किया। और इस तरह चंदखुरी गाँव के चौराहे पर मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। 18 दिन तक महाभारत कथा चली। उसके बाद तो गाँव-गाँव से बुलावे आने लगे, तब से गावत हव अऊ आज तक गातेच हव (तब से गा रही हूँ और आज तक गा ही रही हूँ)।

प्रश्न: जनता के सामने पहली बार गाते समय डर नहीं लगा?

तीजन बाई: ‘डर काबर लागही’ (डर क्यों लगेगा), हिम्मत अपने आप आती गई। जितनी ज्यादा पब्लिक आती, उतना ही ज्यादा आनंद आता। (बात करते हुए उनका अंदाज बिल्कुल वैसा ही था जैसे महाभारत का कोई प्रसंग सुना रही हों)

प्रश्न: आप पेरिस गईं, पूरे विश्व में घूम आईं। गाँव की याद नहीं आती? खुशी कहाँ ज्यादा मिलती है?

तीजन बाई: अपने गाँव में जो खुशी मिलती है, वह विदेश में कहाँ! विदेश में चार दिन अच्छा लगता है, फिर मन घर की ओर खींचता है। अपनी धरती पर आते ही लगता है कि घर आ गए। हम तो भारत की संस्कृति और परंपरा लेकर बाहर गए थे और वहाँ से वाह-वाही और ताली अपने देश के लिए लेकर आए। वही हमारी असली कमाई है।

प्रश्न: पेरिस यात्रा से लौटने के बाद भिलाई स्टील प्लांट में आपको पानी पिलाने की नौकरी मिली। इतने बड़े कलाकार के लिए यह काम छोटा नहीं लगा?

तीजन बाई: (बेहद गंभीर और सहज होकर) कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। कोई  समय था जब  हम मजदूरी करते थे न? बड़ा पद मिल जाने पर कोई अपनी मजदूरी के दिनों को तो नहीं भूल सकता- (और वे एक दार्शनिक की तरह बोलने लगीं) ‘कल्याण तभे होही जब पाछू मुड़ के घलो देखबे। जले रोटी के याद जब तक नई आही, तब तक मिठाई में स्वाद नई लागय’ (कल्याण तभी होगा जब पीछे मुड़कर भी देखोगे। जली हुई रोटी की याद जब तक नहीं आएगी, तब तक मिठाई का स्वाद समझ नहीं आएगा)  स्टील प्लांट ने मुझे नौकरी दी, यही बड़ी बात है। उन्होंने मुझे विदेश जाने से कभी नहीं रोका, वहीं से मेरे आगे बढ़ने की सीढ़ी बनी। 

प्रश्न: इतनी व्यस्तता के बाद घर-परिवार कैसे सँभालती हैं?

तीजन बाई: घर का जीवन वैसा ही है, जैसे गाँव में रहता था। खाना बनाती हूँ, सब्जी बनाती हूँ, लइका मन ल देखथव (बच्चों को देखती हूँ)। रंक को राजा और राजा को रंक बनाना प्रभु का काम है। ‘कोनो दिन मोर स्थिति डाँवा-डोल हो जाही, त लोग हांसही न, कि वो दिन तो हीरोइन बने रहीस, अभी जीरो निकल गे! त ये कहे के नौबत झन आवे’ (कल को स्थिति खराब हुई तो लोग हँसेंगे कि कल तक हीरोइन बनी थी, आज जीरो हो गई। यह नौबत न आए, इसलिए जो है उसी में गुज़ारा कर लो)। यह कहते हुए वे भावुक हो गईं- हम बहुत गरीब घर की लड़की हैं। जब हम फटे-पुराने कपड़े पहनते थे, कई बार ब्लाउज तक नहीं होता था... उन दिनों को याद करती हूँ, तो जी थक जाता है। इसलिए हम बड़े घमंड या चरित्र में नहीं जीते।

  मैंने तुरंत प्रसंग बदलना उचित समझा क्योंकि मैं जानती थी तीजन का बचपन कितने मुश्किल दौर से गुजरा है। 

प्रश्न: महाभारत का कौन- सा प्रसंग आपको सबसे प्रिय है?

तीजन बाई: मुझे भीमसेन का प्रसंग सबसे ज्यादा पसंद है। भीम का रौद्र रूप और जोशीला अंदाज मुझे अपनी ओर खींचता है।

प्रश्न: आगे कब तक पंडवानी गाने का इरादा है?

तीजन बाई: वह मालिक की मर्जी। जितनी दूरी की उसने ‘ड्यूटी’ दी है, वहीं तक जाना है। मेरी ड्यूटी खलास, तो मैं चुप हो जाऊँगी।

अमर रहेगी वह हुंकार

इतना कहकर तीजन बाई जी उठने लगीं – “अब मुझे ड्यूटी जाना है” मैंने उनसे थोड़ा रुकने का अनुरोध किया और तस्वीर लेने के लिए कैमरा निकाला। उन्हें समय पर पहुँचना था, वे मुस्कुराते हुए कैमरे की ओर बगैर देखे, कंघी लेकर अपने बाल काढ़ने लगीं । इतने में बीएसपी की गाड़ी उन्हें लेने आ पहुँची थी।  वे भीतर गईं  माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाकर कंधे में एक झोला लटकाकर गाड़ी की ओर बढ़ गईं ... मैं भी उनसे विदा लेकर बाहर निकल आई।

छोटी उम्र में ही घर छोड़ देने से लेकर, गाँव, शहर से होते हुए विदेशों तक पहुँचने वाली तीजन बाई को लेकर भले ही कई विवाद खड़े हुए हों, लेकिन तीजन बाई की माटी से जुड़ी सादगी ने कभी इन विवादों को तूल नहीं दिया। वे अंत तक गनियारी गाँव की वही सहज तीजन बनी रहीं, जिसके लिए ‘भीम की गदा’ बना उनका तंबूरा ही सब कुछ था। 

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं और वे अपनी ‘ड्यूटी’ पूरी करके अनंत की यात्रा पर चली गई हैं, तो लगता है कि कागज़ के पन्नों पर दर्ज साक्षात्कार भले ही कहीं खो जाएँ, लेकिन तीजन बाई की वह हुंकार, तंबूरे की तान और उनका ज़मीन से जुड़ा व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा। तीजन बाई को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!

पर्व - संस्कृतिः हरेली तिहार आ गे

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

सावन मास की अमावस्या, जब वसुंधरा हरित परिधान ओढ़ लेती है। गाँव- गँवई के खेत खलिहान, नदी, तालाब जल से छलक- छलक उठते हैं। खेतों में धान के बिरवा हर ओर हरियाते नज़र आने लगते हैं जो हवाओं के साथ लहराते दिख पड़ते हैं। खेती- किसानी का काम संपन्न हो जाता है और तब मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार 'हरेली'। छत्तीसगढ़ की परंपरा, संस्कृति और आस्था को संजोकर जन कल्याण की भावना के साथ मनाई जाती है 'हरेली'।

लोक पर्व हरेली के दिन सुबह- सुबह हर दरवाजे पर नीम की एक डाल खोंची जाती है। वहीं गाँव के लुहार देहरी पर एक कील ठोंकते हुए नज़र आते हैं। किसी अनिष्ट की संभावना से बचने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। गाँव का हर वर्ग हरेली में अपनी अपनी- अपनी भूमिका निभाता है। राऊत, बढ़ई, लोहार, बैगा, गुनिया सभी भागीदारी निभाते हैं। गाँवों में सुबह से ही हर ओर उल्लास और उमंग से भरे लोगों का हुजूम दिख पड़ता है। मस्ती से भरे ठिठोली करते हुए बच्चे गेड़ी चढ़ गाँव की गलियों में दौड़ लगाते हैं। हर ओर बच्चों की टोली का शोर सुनाई पड़ता है।

  धान के लहलहाते खेतों को देख महसूस होता है कि हर ओर हरियाली फैली हुई है। आकाश में बादलों की गरजना, कहीं रिमझिम बरसते मेध, तो कहीं दूर कौंधती बिजली मानो प्रकृति भी हरेली का स्वागत करने आतुर हो उठीं हो। पर्यावरण, संरक्षण, संवर्धन का संदेश देते, वहीं कर्म को बल देते, गाँव में आपसी सौहार्द को अपने में समेटे हुए मनायी जाती है 'हरेली'। अपने श्रम सीकरों से फसलों के लिए किसान अपने कृषि औजारों, गोधन की साज संभाल करते हैं। अनजाने अनिष्टों से बचने के लिए अनुष्ठान करते हैं। इसी के साथ उल्लासित होते मनती है 'हरेली'।

पशु कल्याण –

गोधन संस्कृति गाँव को आर्थिक स्वालंबन देती है। गोधन संवर्धन के लिए राऊत आज भी अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं, जो सतत पशुओं के कल्याण में लगे रहते हैं। हरेली के पहले ही जंगल में जाकर भांवर पेड़ की छाल बटोरते हैं। दशमूल कंद को खोदकर लाते हैं। वनौषधियों से काढ़ा तैयार किया जाता है। हरेली की सुबह 'सांहड़ा देव' की पूजा अर्चना कर गाँव में काढ़ा बांटा जाता है। ग्रामीण अपने गाय, बैल, भैसों को आटे की लोदी खिलाते हैं और काढ़ा पिलाते हैं। यह औषधि गाँव के पशुधन को बीमारियों से बचाती है। राऊत सभी को शुभकामना देते हुए कह उठते हैं- 

"धन दुगानी पावय भझ्या

पावय हमर असीसे, 

नाती पूत ले घर भरय 

जीर्यों लाख बरीसे।"

पौराणिक मान्यता-

प्राकृतिक, देवीय और मानवीय संकटों से गाँव की रक्षा के लिए बैगा की अपनी भूमिका निभाता है। मान्यता है कि गाँव का बैगा ही संक्रामक रोगों, शत्रुओं और कष्टों से रक्षा करने में समर्थ होता है। गाँव बंद किया जाता है और रात में सवनाई चलाई जाती है। हर घर की दीवारों पर गोबर से 'पुतरा पुतरी' अंकित किए जाते हैं। पशुधन को खुरहा चपका बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के दस नामों का स्मरण किया जाता है।

 पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में अर्जुन  अपने अज्ञात वास में छिपने के लिए विराटनगर में वृहनल्ला बने थे। अर्जुन जब अपने असली रूप में वापस आये तब विराटनगर में फैली पशुओं की बीमारी अपने आप समाप्त हो गयी। इस घटना को ध्यान में रखकर पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए अर्जुन के नाम का स्मरण किया जाता है।

कृषि औजारों की पूजा -

 हरेली का तीसरा महत्वपूर्ण चरण है कृषि उपयोगी औजारों की साज सम्हाल। खेती का काम पूरा हो जाता है फिर नागर, कुदारी, रांपा, बसुला, टँगिया, आरी, भँवारी, साबर, चटवार, हँसिया, बिंधना जैसे उपकरणों को निकालकर धोया जाता है। ग्राम- देवताओं और लोक देवताओं के साथ इनकी भी पूजा-अर्चना की जाती है। देवों को चीला रोटी का भोग लगाया जाता है। कृषि औजार किसानों के अंलकार हैं। इनकी सुरक्षा उतना ही जरूरी है जितनी कि आभूषण की। इस पर कहा गया है,

"नागर तुतारी टँगिया 

कुदारी किसान के गहना,

अऊ किसनिन के रापा

 गैंती झऊंहा नहना ।।"

लोक देवी-देवता- 

   लोक देवताओं के बारे में मान्यता है कि ये ग्रामीणों का दुख दूर करते हैं। हर गाँव के अपने एक अलग देवी-देवता होते हैं जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। गाँवों में तो हरेली से लेकर ऋषि पंचमी तक तंत्र- मंत्र सीखने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। तन्त्र मंत्र सीखने की शुरुआत हरेली से होती है इस दिन 'पाठ पीढ़ा' दिया जाता है।

हरेली का उल्लास -

   बच्चों के साथ वृद्धों का उत्साह देखते बनता है। हरेली के दिन बांस से बनी गेंड़ी चढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। कीचड़ पानी से सराबोर हुई गाँव की गलियों में गेड़ी पर चलते लोग दिखते हैं। हरेली त्यौहार में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता आयोजित होती है, कहीं गेंड़ी नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। महीने भर गेंड़ी का आनंद लेने के बाद इसे विसर्जित कर दिया जाता है।     

  हरेली पर गाँव के चौपाल में पारंपरिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान होता है। कहीं आल्हा सुनाई देता है, तो कहीं रामायण की स्वर लहरियाँ गूँज उठती हैं। लोक मान्यता है कि जब तक हरियाली रहेगी, तब तक किसानों के खेत आबाद रहेंगे। जंगल हरे-भरे रहेंगे। जंगल हरे रहेंगे, तो उनके पशुओं के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ‘दिव्य रसायन’ की प्राप्ति होती रहेगी। हर हमेशा हरियाली बनी रहे, जो सब का पोषण करती रहे, ऐसी परंपराओं को संजोए हरेली त्यौहार हर बरस मनाया जाता है।

ravindraginnore58@gmail.com

आलेखः पत्रों में लोक-संग्राम

  - प्रमोद भार्गव

हमारे यहाँ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहासबद्ध लेखन के परिप्रेक्ष्य में उन पत्रों और साक्ष्यों को लगभग बहिष्कृत किया गया है, जो पत्र और साक्ष्य क्रांतिवीरों ने युद्ध की रणनीति सुनिश्चित करने और हथियार, सेना, धन व खाद्य सामग्री की उपलब्धता प्राप्त करने के लिए लिखे थे। जबकि इसके विपरीत अंग्रेज शासकों ने जो पत्र इत्यादि लिखे, उन्हें 1857 के संग्राम को सैनिक विद्रोह बताने के लिए कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया, जैसे उनकी लिखी सूचनाएँ ब्रह्म वाक्य हों। शासकों की इन सूचनाओं को इतिहास मानने की बड़ी भूल हुई है।

हमारे शहर शिवपुरी में 1857 के संघर्ष से जुड़ी दो बड़ी घटनाएँ घटित हुई हैं। एक तो तात्या टोपे को फाँसी के फंदे पर शिवपुरी में ही लटकाया गया था, दूसरे इतिहास की जिन पुस्तकों में गोपालपुर जागीर का जिक्र है, वह भी शिवपुरी जिले के अंतर्गत है। यही वह स्थल था, जहाँ लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब ने गोपालपुर के जागीरदार रघुनाथ सिंह वशिष्ठ और उनके अनुज गोविंद सिंह के साथ मंत्रणा करके ग्वालियर पर कब्जा करने की योजना को क्रियान्वित किया था। यहाँ के लोक समाज से लक्ष्मीबाई ने सैन्य संगठन भी खड़ा करके अपनी सेना में शामिल किया था।

पत्रों की प्रदर्शनी -

इस जन-संग्राम की प्रामाणिकता की बात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्या टोपे के बलिदान दिवस से करते हैं। दरअसल शिवपुरी में 18 अप्रैल को प्रतिवर्ष दो दिवसीय मेले का आयोजन तात्या के बलिदान को स्मरणीय बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस मेले में अब से बीस साल पहले तक इस संग्राम से जुड़े पत्रों एवं हथियारों की विशाल एवं भव्य प्रदर्शनी लगाई जाती थी। यह प्रदर्शनी लगती अब भी है, लेकिन इसका रूप बहुत संक्षिप्त कर दिया गया है। परिणामतः यह प्रदर्शनी अब इतिहास के जिज्ञासुओं की समझ विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि ये पत्र मूल व संपूर्ण रूप में आज भी राजकीय अभिलेखागार भोपाल में सुरक्षित हैं। दुर्लभ होने के कारण अब पत्रों की छाया प्रतियाँ ही प्रदर्शनी में लगाई जाती हैं।

सौभाग्य से मुझे इन पत्रों को पढ़ने का अवसर मिला है। इन्हें पढ़ने से पता चलता है कि इस संग्राम में खास ही नहीं आम आदमी भी सर्वस्व न्योछावर कर देने की मानसिकता से युद्ध में भागीदारी के लिए मार्ग खोजने में संलग्न थे। चूंकि ये पत्र बुंदेली भाषा में थे और इनमें आंचलिक बोली के शब्द प्रयोग में लाए गए थे, इसलिए इनके वास्तविक अर्थ समझने के लिए मैंने अपने पूज्य गुरुवर डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही‘ से संपर्क साधा। डॉ. विरही बुंदेली, हिंदी एवं अंग्रेजी के विलक्षण ज्ञाता होने के साथ-साथ बड़े साहित्यकार भी हैं। उन्होंने बताया कि इन पत्रों को वे सत्तर के दशक में ही बुंदेली से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। उन्हीं के संपादकत्व में पत्रों के संग्रह का प्रकाशन भी हो चुका है;  किंतु दुर्भाग्य से इन दुर्लभ पत्रों की पुस्तक की प्रति उनके पास भी नहीं थी। परंतु उन्होंने मार्ग सुझाया कि यह पुस्तक नगर पालिका परिषद शिवपुरी द्वारा प्रकाशित की गई थी, इसलिए हो सकता है, उनके भंडार- गृह में कुछ पुस्तकें मिल जाएँ।

इस सूत्र वाक्य को पकड़कर जब हमने पालिका का भंडार खँगाला तो बेहद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पुस्तकों का एक बंडल मिल ही गया। बंडल को खोलने पर ज्यादातर पुस्तकें तो सड़-गल गई थीं, लेकिन बीच की दो-चार पुस्तकें संयोग से ऐसी निकल आईं, जिनमें पत्र संपूर्ण रूप से पढ़ने में आ रहे थे। मेरे लिए ये पत्र बड़ी थाती सिद्ध हुए।

‘1857 की क्रांति' शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित जो पत्र संगृहीत हैं, वे पत्र महारानी लक्ष्मीबाई, रानी लड़ई दुलैया, राजा बखतवली सिंह, राजा मर्दन सिंह, राजा रतन सिंह और इस क्रांति के महान योद्धा, संगठक एवं अप्रतिम सेनानायक तात्या टोपे द्वारा लिखे गए या उनको अन्य लोगों द्वारा लिखे गए पत्र हैं। इनके अलावा कुछ पत्र ऐसे भी हैं, जो पंडितों और तांत्रिकों द्वारा लिखे गए हैं। इन पत्रों में अतीन्द्रिय शक्तियों से जुड़े ऐसे मंत्रों व जंत्रों का रेखांकन है, जो तात्या टोपे की रक्षा के लिए बतौर सुरक्षा-कवच हैं। इन पत्रों की भावना से यह स्पष्ट होता है कि इस संग्राम का विस्तार दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों तक हो रहा था और केवल परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़ने की तीव्र इच्छा से आम-आदमी क्रांति के इस महायज्ञ में अपने अस्तित्व की समिधा डालने को तत्पर था।

इस किताब की भूमिका के अनुसार, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित इन पत्रों की प्राप्ति का इतिहास भी बड़ा रोचक है। आजादी की पहली लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी, तब तात्या टोपे अपनी फौज के साथ ओरछा रियासत के गाँव आष्टौन में थे। अंग्रेजों को मुखबिर से यह खबर पता चल गई। अंग्रेजी फौज ने बिना वक्त गँवाए तात्या टोपे के डेरे पर हमला बोल दिया। उस समय तात्या मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा, ऊहापोह की हालत में तात्या को अपना कुछ बहुमूल्य सामान यथास्थान छोड़कर नौ-दो-ग्यारह होना पड़ गया।

उस दौरान ओरछा के दीवान नत्थे खाँ थे। तात्या द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान की पोटली नत्थे खाँ के विश्वसनीय सिपाही ने उन्हें लाकर दी। इस सामान में एक बस्ता था, जिसमें जरूरी कागजात व चिट्ठी-पत्री थीं। इसी सामान में एक तलवार और एक उच्च कोटि की गुप्ती भी थी। नत्थे खाँ के यहाँ कोई पुत्र नहीं था, इसलिए यह धरोहर उनके दामाद को मिली। दामाद के यहाँ भी कोई पुत्र नहीं था, गोया तात्या टोपे के सामान के वारिस उनके दामाद अब्दुल मजीद फौजदार बने, जो टीकमगढ़ के निवासी थे।

स्वतंत्र भारत में 1976 में टीकमगढ़ के राजा रहे नरेंद्र सिंह जू देव को अब्दुल मजीद के पास इन पत्रों के होने की खबर आई। नरेंद्र सिंह उस समय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने इन पत्रों के ऐतिहासिक महत्त्व को समझते हुए तात्या की धरोहर को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की। साथ ही पत्रों की वास्तविकता की पुष्टि इतिहासकार दत्तात्रेय वामन पोद्दार से भी कराई। पोद्दार ने पत्रों के मूल होने का सत्यापन करते हुए इन्हें ऐतिहासिक महत्त्व के दुर्लभ दस्तावेज निरूपित किया। झांसी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ. वृंदावन लाल वर्मा ने भी इन्हें मूल पत्र बताते हुए यह सुनिश्चित किया कि पत्रों के साथ मिला सामान तलवार तथा गुप्ती भी तात्या टोपे की ही हैं। डॉ. वर्मा ने यह भी तय किया कि जिस स्थान और जिस कालखंड में इस सामग्री का उपलब्ध होना बताया जा रहा है, उस समय वहाँ तात्या टोपे के अलावा अन्य किसी सेना-नायक ने पड़ाव नहीं डाला था। 

तात्या के बस्ते से कुल 225 पत्र प्राप्त हुए थे, जो देवनागरी एवं फारसी लिपि में थे। हिंदी पत्रों की भाषा ठेठ बुंदेली है। इन पत्रों में 125 हिन्दी में और 130 उर्दू में लिखे गए हैं। तात्या की तलवार और गुप्ती भी अनूठी है। तलवार सुनहरी नक्काशी में मूठ वाली है, जो मोती बंदर किस्म की बताई गई है। इस तलवार की म्यान में दो कुंदों में चार अंगुल लंबे बाण के अग्रभाग जैसे पैने हथियार हैं। इन हथियारों पर हाथी दाँत की बनी शेर के मुँह की आकृतियाँ जुड़ी हुई हैं। इस तरह जो गुप्ती प्राप्त हुई है, वह विचित्र है। गुप्ती की मूठ सोने की है। इसके सिरे पर एक चूड़ीदार डिबिया लगी हुई है, जिसमें इत्र-फुलेल रखने की व्यवस्था है। तात्या की यह अमूल्य धरोहर अब राजकीय अभिलेखागार, भोपाल का गौरव बढ़ा रही है। 

पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम किस गहराई से जन-संग्राम में बदलता जा रहा था और आम आदमी किस दीवानेपन से राष्ट्र की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग के संस्कारों में ढल रहा था। समर के इस अछूते अध्याय की बानगी इन पत्रों में द्रष्टव्य है...,

तात्या टोपे के नाम लिखे एक पत्र में राजा बखतवली सिंह लिखते हैं-

‘एजेंट हैमिल्टन ने गोरी फौज को लेकर राहतगढ़ पर आक्रमण किया है। खुरई, कानपुर में हुई लड़ाई में मानपुर के करीब 700 और अंग्रेजों के करीब 500 सैनिक मारे गए हैं। अंग्रेजों ने बलपूर्वक पन्ना, बिजावर, टेहरी, चरखारी और छतरपुर के राजाओं को अपनी ओर मिला लिया है। अंग्रेज फौज से मुकाबला करने के लिए सहायता भेजी जाए।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में महाराजा रतन सिंह लिखते हैं-

‘हमने तीन लाख रुपया जमा करा लिया है, मगर हमसे कौलनामा किसी पंडित को भेजकर लिखा लिया जाए। हमारी इज्जत रखी जाए। अब हम फौज सहित कूच करते हैं। हमारी ओर से किसी बात पर तकरार नहीं होगी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में श्री राम शुक्ल तथा गंगाराम लिखते हैं-

‘सिरोली के घाट पर अंग्रेज कैप्टन और नवाब बांदा की भीड़ रोकने के लिए सेना की सहायता एवं तोप चाहिए। चाँदपुर के थानेदार भी दो सौ बंदूक लेकर हमारे साथ हैं।’

एक अन्य पत्र में मानीराम एवं गंगाराम ने तात्या टोपे को लिखा है-

‘सिरोली, चखुरा, भौरा, चाँदपुर और गाजीपुर के जमींदार अंग्रेजों से मोर्चा लेने को तैयार हैं। अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने पर वे धावा बोलेंगे। गोरी पलटन को कालपी न पहुँचने देने के लिए कंपू का बंदोबस्त भी किया जाए।’

गुलामी का जुआ उतार फेंकने के लिए उतावले ये वे लोग थे, जिनकी कोई बड़ी जागीर नहीं थी। किसी राज्य के सामंत नहीं थे। चाँदपुर के जिस थानेदार का हवाला दो सौ बंदूकों के साथ रणभूमि में कूदने के लिए दिया गया है, वह सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर प्राणों की आहुति देने को तत्पर था। इससे साफ है, संघर्ष की शुरुआत वर्षों से दमित अपमान और क्षोभ के प्रकट रूप में हो रही थी।

तात्या टोपे को ही लिखे एक अन्य पत्र में महाराज कुमार गणेशजू देव ने तात्या टोपे को अपने डेरे पर बुलाया तथा लड़ाई में ठाकुरों के साथ होने का हवाला दिया। जिसमें कुँवर बुधसी, क्षमा जूदेव के नामों का उल्लेख है। उन्होंने लिखा है- ‘इन सबके मन साफ हैं और मैं बीच में हूँ।’

तात्या को आमजन मूरतीसिंह, शिवप्रसाद और गौरीशंकर अवस्थी लिखते हैं- ‘हमीरपुर व सिरोली की मदद के लिए दो तोपें, एक कंपनी तथा राजा लोगों की 500 फौज जल्दी भेजें। गोरे सिरोली के उस पार पांच तोपें लगाकर गोलीबारी कर रहे हैं।’

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में जानकारी दी है कि करीब एक सौ अंग्रेज अधिकारी व सिपाही ग्वालियर के किले में घुस गए हैं और इन्हें बेदखल करने के लिए हजारों लोग किले के अंदर पहुँच गए हैं। तात्या टोपे की ग्वालियर विजय पर एक पत्र में जैतपुर के फौजदार सवाई माधोसिंह ने खुशी जाहिर की है। 

रानी लड़ई दुलैया द्वारा राजा बखतवली सिंह के नाम लिखे पत्र में कहा गया है- ‘पन्ना की फौज हटा-दमोह में थी, उसने नदी पार करके यहाँ के इलाके पर तोपें चला दी हैं। फतहपुर को जब्त करने का विचार है। जबलपुर में खराबियों की फौज अंग्रेजों से बिगड़ गई है। पलटन अब हटा खाली करना चाहती है। कई जगह लड़ाई चल रही है। इसलिए पचास-साठ मन बारूद, शोरा और गंधक की जरूरत है।’

तात्या टोपे को लिखे पत्र में रानी लड़ई दुलैया ने सूचित किया है- 

‘पेशवा के पास उन्होंने कुछ लोग भेजे हैं और वे पेशवा के सूबा जलालपुर में ठहरे हुए हैं।’

महारानी लक्ष्मीबाई ने रानी लड़ई दुलैया को एक पत्र लिखकर याद ताजा कराई है- ‘दोनों ओर अच्छे संबंधों की परंपरा रही है, इसलिए आपकी फौज की ओर से कोई वारदात नहीं होनी चाहिए।’

हालाँकि अंततः रानी लड़ई ने लक्ष्मीबाई की मदद तो नहीं की अपितु अंग्रेजों का साथ जरूर दिया।

तात्या टोपे को लिखे एक पत्र में राजा मर्दनसिंह ने लिखा है- ‘फौज समेत फौरन आएँ। बुंदेलखंड के राजा अंग्रेजों से मिल गए हैं। अंग्रेज बानपुर, शाहगढ़ और झांसी पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं।’

बरुआ सागर के जमादार नत्थे खां ने रानी लक्ष्मीबाई को सावधान रहने के लिए लिखे पत्र में लिखा है- ‘आपके समाचार भले चाहिए। यहाँ के समाचार भले हैं। कई रोज से आपके खुशी की खबर नहीं मिली है, सो आपको यह पत्र लिखा है। हमारे बुजुर्ग श्री बड़े जमादार जू से आपको घरोबा रहा है। ताही प्रमाण हमारी तरफ से खातिर रखने में आए। हाल वर्तमान रोशन है। के जॉन रईस की जो रियासत सरकार ओरछे की है, सो अपुन की रोशनी है। मुल्क मालिक के अहद में अपनी ढाबा रियासत मजबूर में कुछ होना होवै सो इहाँ खावंद के हुक्म बमूजिब होने से करने परत। अपुन याकी रंजीदगी को चित पर न रखियो। अपने हक में कौनह दुखन वादी होवे को नहीं। हाल अपुन को झांसी में रहिबो व उहाँ तै और कहीं को जैबो मुनासिब नाहीं। यहाँ पुरानी अमलदारी में जौन मुकाम खुशीपूर्वक रहाइश रहि कि मंजूरी परै तहाँ की तजबीज लिखाई पठैवी।’

तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में मनफूल सुकुल ने जानकारी दी है- ‘गोरों ने मुनादी पिटवाई है कि विद्रोहियों को जो कोई रसद-मदद देगा, उसे बच्चों समेत फाँसी पर लटका दिया जाएगा।’

ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने एक विशेष पत्र हरकारे द्वारा भेजकर रानी झाँसी को सूचित किया है कि मोर्चाबंदी की तैयारी की जाए। पंडित मोहनलाल ज्योतिषी ने तात्या टोपे को लिखे पत्र के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा रक्षा किए जाने के लिए एक तंत्र भी भेजा। इस पत्र में उल्लेख है- ‘हम फकीर साहब के साथ बैठकर दो जंत्र तैयार कर आपके पास भेज रहे हैं, वह आप बाँध लें और बड़ा जंत्र निशान पर बाँध देना। ईश्वर रक्षा करेगा।-

1857 में ही हमीरपुर से निकलने वाले ‘हमीर’ नामक एक समाचार-पत्र में पत्रकार जलील अहमद ने खबर छापी है- ‘तात्या टोपे की कोठी में दो षड्यंत्रकारी जो बंदूकधारी थे, मोजा रमेली खालपुर में, तात्या टोपे की हत्या की साजिश रचते हुए पकड़े गए। इन्हें तात्या के सामने पेश किया गया।’

‘1857 की क्रांति’ पुस्तक में छपे इन पत्रों के मजमून से स्पष्ट होता है कि भारतीयों के अंतःकरण में दासता से मुक्ति के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया था। उस समय आम आदमी ने अपने राष्ट्रीय धर्म का अहसास किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हुआ। 1857 के इन बलिदानियों ने ही राष्ट्रीय चरित्र की अवधारणा को अभिव्यक्ति दी।

ग्रामीण अंचल से लेकर शहरी भूमि तक अँगड़ाई ले रहा लोक का यह संग्राम हिंदू-मुस्लिम एकता का भी अद्वितीय उदाहरण रहा है; किंतु इतिहास के इस अति महत्वपूर्ण कालखंड की सच्चाई पर पर्दा डाले रखने की कोशिशें इसलिए होती रहीं, क्योंकि इस युद्ध में साधारण भारतीय समाज ने असाधारणता का परिचय दिया था, जिसे संपन्न, शिक्षित व अंग्रेजों के पिट्ठू रहे लोगों को स्वीकारना हमेशा मुश्किल ही रहा है। इस वास्तविकता को छिपाए रखने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इस मुक्ति संग्राम में अंततः लोक यानी भारतवासी पराजित हुए थे। इस संग्राम का इतिहास लिखने के लिए कोई भी नायक-नायिका न तो जीवित बच पाए और न ही अपने संघर्ष की आपबीती लिखने अथवा लिखाने का समय संघर्ष काल में उनके पास था। जबकि इसके उलट तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों ने इस लोक के संग्राम के अंतर्निहित सत्य को विकृत करके हकीकत पर आवरण डालने का काम किया।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100 

शौर्यः सिपाही बबलू सिंह - सेना मेडल (मरणोपरांत)

   - हरी राम यादव, सूबेदार मेजर (ऑनरेरी)

वीरता शब्द मनोभावों की वह पराकाष्ठा है जिसके आगे दुनिया का हर बल बौना हो जाता है । इस मनोभाव के पैदा होते ही सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी की शक्ति, साहस सब कम पड़ जाते हैं, हर वह शक्ति क्षीण हो जाती है जो स्वयं को शक्तिशाली समझती है । इस मनोभाव से आच्छादित व्यक्ति एकाएक इतना बलशाली हो उठता है कि उसके सामने खड़ा पहाड़ भी कम्पित हो उठता है, वह उसके मनोभावों को आँखों में देखकर थर्रा उठता है । आज कृष्णनगरी के एक ऐसे ही योद्धा का वीरगति दिवस है, जिन्होंने अपने साहस और वीरता के बल पर एक अमित वीरगाथा लिखी , जिसे आने वाली पीढ़ियों को जानना चाहिए ।

वर्ष 2016 में सिपाही बबलू सिंह 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे और 61 राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू और कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों में लगी हुई थी। 29/30 जुलाई 2016 की रात में नौगाम सेक्टर में आतंकवादियों द्वारा सीमा पर कर भारतीय इलाके में घुसने की कोशिश की गई थी। 61 राष्ट्रीय राइफल्स  की टुकड़ियाँ पहले से सतर्क थीं । । 30 जुलाई 2016 को लगभग 0030 बजे, नायक बिजेंद्र सिंह और सिपाही विशाल चौधरी एंटी-इंफिल्ट्रेशन ऑब्स्टिकल सिस्टम के साथ गश्त कर रहे थे।  आतंकवादियों ने इस गश्ती दल पर फायरिंग की। इस गश्ती दल पर फायरिंग के बाद  सिपाही  बबलू सिंह और नायक राकेंद्र सिंह को गश्ती दल की सहायता  के लिए एम्बुश इलाके में भेजा गया।

इसी बीच एक आतंकवादी आड़ में बड़े पत्थरों के पीछे छिप गया। सिपाही बबलू सिंह उस आतंकवादी को खोजते हुए दूसरे आतंकवादी के सामने आ गए ।  लगभग 15 मीटर की दूरी से उस आतंकवादी ने उन पर फायर कर दिया, जिससे वह  गंभीर रूप से घायल हो गए।  घायल होने के बावजूद, सिपाही बबलू सिंह ने साहस और वीरता का प्रदर्शन करते हुए जवाबी कार्रवाई की और आतंकवादी को मार गिराया  । घाव गहरा होने और तेजी से होते रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त  हो गए। सिपाही बबलू सिंह ने 29 साल की उम्र में अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया । उनकी असाधारण वीरता और साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत  'सेना मेडल' से सम्मानित किया गया।

सिपाही बबलू सिंह का जन्म कृष्ण नगरी मथुरा की सदर तहसील के फरह ब्लॉक के गांव झंडीपुर में 10 जुलाई 1987 को श्रीमती मुन्नी देवी और  श्री मलूक सिंह के यहाँ हुआ था । उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीन पब्लिक स्कूल से पूरी की और हाई स्कूल की शिक्षा  जवाहर इंटर कॉलेज और  इंटर की शिक्षा सेठ प्रेम सुखदास भगत इंटर कॉलेज से पूरी की ।  18 साल की उम्र में सन 2005 में सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हो गए । प्रशिक्षण के पश्चात  18 जाट रेजिमेंट में तैनात  हुए ।  लगभग 11 साल की सेवा पूरी करने के पश्चात वह सन  2016 में  61 राष्ट्रीय राइफल्स  में तैनात हुए। ।  सिपाही बबलू सिंह के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनके चार  भाई - श्री निर्भय सिंह, श्री हरिओम सिंह और चौधरी सतीश सिंह और एक बहन श्रीमती अंजना सिंह , उनकी पत्नी श्रीमती रविता देवी, बेटी गरिमा चौधरी और बेटे द्रोण चौधरी हैं।

सिपाही बबलू सिंह की याद में उनके गांव में एक स्मारक का निर्माण किया गया है, जिसमें उनकी  प्रतिमा स्थापित की गयी है । इस स्मारक की सबसे खास बात यह है कि इस स्मारक के ठीक सामने टी – 55  टैंक (वॉर ट्राफी) स्थापित किया गया है ।  यह स्मारक उत्तर प्रदेश में अपनी तरह का पहला स्मारक है, जिस पर टी – 55  टैंक लगा हुआ है । यह टी – 55  टैंक भाइयों में आपसी प्रेम और समर्पण की भी निशानी है । इस टैंक  को अपने भाई के स्मारक पर लगवाने के लिए एडवोकेट सतीश चौधरी ने जो प्रयास किया वह अवर्णनीय और अपने आप में एक इतिहास है । इस टैंक को हासिल करने के लिए सिपाही बबलू सिंह के भाई चौधरी  सतीश ने पिछले कई सालों तक मेहनत की, उन्होंने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक, सम्बंधित नेताओं और अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया, अनगिनत पत्र व्यवहार किया, तब जाकर सन 2023 में यह टी - 55  टैंक उन्हें मिला ।

सम्पर्कः अयोध्या, लखनऊ, मो. 7087815074

लघुकथाः दूसरा सरोवर

 - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँववाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।

एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा-"सरोवर आपके गाँव से एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ। जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप-परिवर्तन कर सकता हूँ। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डंडा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में जाऊँगा। ये मेरे चमत्कारी डंडे को जैसे ही जमीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।"

लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डंडा जमीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डंडा भी उसके हाथ से गिर गया।

अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँववाले चार मील दूर सरोवर पर जाने लगे हैं।

प्रसंगः लड़का और आयरिश टोप

 - आदित्य पाधा,  अनुवाद- शशि पाधा 

"हवा को सुनो, वह बातें करती है। मौन को सुनो, वह बोलता है। अपने हृदय को सुनो, वह जानता है।"
— एक नेटिव अमेरिकन कहावत
यह कहानी पुनर्जन्म की है- यदि आप ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। या शायद यह केवल अपनी जड़ों की कहानी है।
उन अदृश्य धागों की कहानी, जो पीढ़ियों को महासागरों, दशकों और कभी-कभी जन्मों के पार भी जोड़ देते हैं।
हाल ही में मुझे काम के सिलसिले में स्पेन के बार्सिलोना जाने का अवसर मिला। मेरे बेटे शिव ने पूछा –“‘क्या मैं आपके  साथ चल सकता हूँ।”
पहले तो मैं थोड़ा झिझका। मेरा कार्यक्रम अक्सर व्यस्त और अनिश्चित रहता है और किसी विदेशी देश के होटल के कमरे में बारह वर्षीय बच्चे को अकेला छोड़ना मुझे उचित नहीं लगा। लेकिन शिव अपनी जिद पर अड़ा रहा और सच कहूँ, तो मुझे भी उसके साथ कुछ निर्बाध समय बिताने का अवसर अच्छा लगा।
मैंने कल्पना की थी कि यह यात्रा पिता-पुत्र की यादों से भरी होगी—बार्सिलोना की घुमावदार गलियों में घूमना, स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेना, छोटी-मोटी खरीदारी करना, अनिवार्य रूप से एक एफ.सी. बार्सिलोना की जर्सी खरीदना और सग्रादा फ़मीलिया की भव्यता को निहारना।
और अधिकांशतः ऐसा ही हुआ।
शिव के साथ यात्रा करना आनंददायक था। बच्चे दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उनकी जिज्ञासा साधारण क्षणों को भी रोमांचक बना देती है। एक ही दिन में वह यात्री से मार्गदर्शक बन गया। मैं उसके पीछे-पीछे चलता, और वह तय करता कि हमें कहाँ जाना है, क्या देखना है और सबसे महत्वपूर्ण—क्या खाना है। उसके अनुसार हर अवसर पर जिलेटो खाना चाहिए!
और यदि आसपास जिलेटो न मिले, तो मैकडॉनल्ड्स हमेशा मौजूद था। उसके लिए चिकन नगेट्स एक ऐसी भाषा थे जिसे पूरी दुनिया समझती है।
लेकिन शहर में घूमते हुए मैंने एक और बात पर ध्यान दिया।
हम जहाँ भी होते, जिस विषय पर भी बात कर रहे होते, शिव किसी न किसी तरह बातचीत को भारत की ओर मोड़ देता। पहले मुझे लगा कि यह केवल सामान्य बातचीत का हिस्सा है; लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे महसूस हुआ कि बात इससे कहीं गहरी है।
यह एक ऐसा लड़का था, जिसका जन्म और पालन-पोषण अमेरिका में हुआ था। जिसकी दुनिया अमेरिकी स्कूलों, उपनगरीय मोहल्लों, खेल के मैदानों और आधुनिक जीवनशैली से बनी थी। फिर भी वह भारत के बारे में जिस आत्मीयता और अपनत्व से बात करता था, वह बात उसकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व लगती थी।
वह भारतीय इतिहास, संस्कृति, प्राचीन राजवंशों, युद्धों, स्वतंत्रता संग्राम और हमारे पारिवारिक वंश के बारे में बातें करता। उसे यह जानने में गहरी रुचि थी कि हमारे पूर्वज कौन थे, उन्होंने कैसा जीवन जिया और हम कहाँ से आए।
हर शाम, जिलेटो के कप हाथ में लिये, हमारी बातचीत सदियों और महाद्वीपों की यात्रा करने लगती। वह इतिहास के तथ्य सुनाता, विचारोत्तेजक प्रश्न पूछता और अपने खोजे हुए नए-नए प्रसंग साझा करता।
जितना अधिक मैं उसे सुनता, उतना ही महसूस करता कि यह केवल जिज्ञासा नहीं थी। यह एक संबंध था।
उसके भीतर कुछ ऐसा था, जो एक ऐसी भूमि से बँधा हुआ था जिसे उसने वास्तव में कभी जाना ही नहीं था। भारत उसके लिए केवल एक देश नहीं था। वह एक ऐसा घर था जिसे मानो उसका मन कहीं गहराई से पहचानता था।
यात्रा की अंतिम शाम तक मैं सोचने लगा था कि यह गहरा लगाव आया कहाँ से। ऐसा कैसे हो सकता है कि अमेरिका में पला-बढ़ा एक बालक उस देश से इतना जुड़ाव महसूस करे, जहाँ उसने जीवन के केवल कुछ दिन बिताए हों?

उत्तर मुझे अगले दिन मिला।
हमारी अंतिम दोपहर थी। हम ‘ला राम्बला’ सड़क पर टहल रहे थे कि अचानक शिव रुक गया। वह मुड़ा और एक छोटी-सी दुकान में चला गया।
जिज्ञासावश मैं भी उसके पीछे हो लिया।
दुकान में न कोई फुटबॉल जर्सी थी, न कोई स्मृति-चिह्न, न ही जिलेटो।
शिव बिना कुछ कहे सीधे विक्रेता महिला के पास गया और शो-केस की ओर इशारा किया।
महिला मुस्कुराई और कोने की एक शेल्फ से एक विशेष टोपी निकाल लाई।
एक बहुत विशेष टोपी।
जैसे ही उसने वह टोपी शिव को थमाई, उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
और उसी क्षण मुझे सब समझ में आ गया।
मेरे दादाजी—जिन्हें हम सब प्यार से पिताजी कहते थे—लगभग हर दिन एक आयरिश टोपी पहनते थे। शिव ने उन्हें कभी नहीं देखा था। वह उन्हें केवल एक पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर में जानता था, जो मेरे पिता के लैपटॉप में सुरक्षित थी।
फिर भी, वर्षों बाद और घर से हजारों मील दूर बार्सिलोना की एक दुकान की खिड़की में उसने वही टोपी पहचान ली।
और वह उसे चाहता था; इसलिए नहीं कि वह फैशन में थी।
इसलिए नहीं कि वह आकर्षक दिखती थी; बल्कि इसलिए कि वह उसे उसके परदादा की याद दिलाती थी।
दुकान से बाहर निकलते ही शिव अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहा था।
“पापा,” उसने कहा, “जब से मैंने वह तस्वीर देखी है, मैं ऐसी ही टोपी चाहता था।”
उसे याद था…
एक तस्वीर…
एक चेहरा जिसे उसने कभी नहीं जाना।
एक व्यक्ति, जो उसके जन्म से बहुत पहले इस दुनिया से जा चुका था।
और फिर भी, वह उनसे जुड़ाव महसूस करता था।
हम आगे बढ़ते रहे। मैं उसे देखता रहा। वह गर्व से टोपी को अपनी बाँह के नीचे दबाए चल रहा था। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो बच्चों के चेहरे पर क्रिसमस की सुबह दिखाई देती है।
मैंने आसमान की ओर देखा। अचानक मुझे अपने गाल पर पानी की एक बूँद महसूस हुई। शायद बारिश थी।
शायद नहीं।
और उस शांत क्षण में, बार्सिलोना के हृदय में खड़ा, मैं पिताजी के बारे में सोचने लगा-
 चार पीढ़ियाँ।
एक तस्वीर।
एक टोपी।
एक अदृश्य धागा, जो एक अमेरिकी जन्मे बालक को उस व्यक्ति से जोड़ रहा था, जिसने अपना पूरा जीवन भारत में बिताया था।
लेकिन जब मैंने शिव को अपने आगे चलते देखा, अपने परदादा की स्मृति को साथ लिये हुए, तो मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
पिताजी, शिव से मिलिए।
आपका परपोता।
उसका जन्म महासागर के उस पार हुआ है, लेकिन किसी रहस्यमय ढंग से वह आपका एक अंश अपने भीतर लिये हुए है।
और बिल्कुल आपकी तरह, वह भी उस टोपी में बहुत अच्छा लगता है।

सम्पर्कः  वर्जीनिया, यू एस ए, Email: shashipadha@gmail.com

कविताः टूट रही है डोर

 - कृष्णा वर्मा

कई बार बाँधने का प्रयास किया

मन के आवारा पैरों को

लेकिन दिल है कि टिकने ही नहीं देता


सतत भटकाता है दिशा-दिशा

मासूम मन बड़ी ताबेदारी से सिर झुकाकर

मान लेता है उसकी बात

दिमाग परेशान रहता है सोच-सोचकर

क्यों मचा है हर ओर पैसे-पैसे का शोर

रिश्ते-नातों रस्मों-रिवाज़ों की

क्यों टूट रही है डोर

संबंधों को नाम तो दे देते हैं

पर निभाने की रस्म क्यों हो गई है ग़ायब

प्रेम प्यार नफ़रत की दुनिया में

नफ़रत हो गई है ठेकेदार और

दूरियाँ हो गई हैं वफ़ादार

प्यार जताते हैं पर दूरियाँ मिटाने से

करते हैं परहेज़  

मिट्टी कि दुनिया में जब

सबका अंत है मिट्टी

तो फिर क्यों औकात की

नुमाइश करने से बाज़ नहीं आते लोग।

दो नवगीतः

 - रमेश गौतम 

1. गाँव की पगडंडियाँ

गीत

गाँव पर लिखो तो

दंश भी लिखना समय के।

 

किस तरह

पाटे गए हैं ताल

छीनी धूप छाया

घेरते ही  जा  रहे  हैं

गाँव की अनमोल काया

अश्व रुकते

ही कहाँ अब

लालची इस दिग्विजय के।

 

हम बहुत लिखते रहे

हल, बैल

खेतो की कथाएँ

लिख नहीं पाए नगर

होती हुई अंतर्व्यथाएँ

कुछ कहो

इन चुप्पियों के छंद,

कुछ टूटे हृदय के।

 

चल रही

बैसाखियों पर

गाँव की पगडंडियाँ हैं

खुल गईं  सीमेन्ट  की

कच्चे घरों में मंडियाँ है

हाशिए पर

शब्द फेंके हैं

सभी अनुनय-विनय के।

2. उजालों का झरना

धुंध जाओ

छोड़ कर आकाश सारा

अब सुबह की गोद में सूरज रहेगा।

 

तोड़ डाला

मौन व्रत अब आइनों ने

बोलना सीखा

डरे सहमे दिनों ने

धूप ने

खोले अधर काँपा कुहासा

फिर उजालों का यहाँ झरना बहेगा।

 

ज़िंदगी ने आज

अपना मूल्य आँका

हर हिमानी देह में

अंगार टाँका

जाल पिघलेगा

हमारी ही तपन से

मछलियों का तन मछेरों से कहेगा।

 

बस्तियाँ, पगडंडियाँ

या हो घना वन

बाँध ली सामर्थ्य

तो होगा अभय मन

भाल पर

जब बिंब

दिनकर का दमकता

तन भला क्यों तामसी चाबुक सहेगा।

दो संस्मरणः

- अंजू खरबंदा

 1.कपड़े सुखाना भी एक कला है

हाँ, बिल्कुल है! सच्ची! किंग्जवे कैम्प में गली में लोहे की तारें या रस्सियाँ बंधी रहती थीं कपड़े सुखाने के लिए। कुछ महिलाएँ तो जल्दबाज़ी में कपड़े सूखने डालतीं, पर कुछ बड़े ही सिस्टेमैटिक वे में कपड़े सुखातीं।

एक तार पर पुरुषों की सफेद झक्क बनियानें बड़े ही करीने से चमचमातीं, तो दूसरी तार पर पुरुषों की हल्के रंग की कमीज़ें! बीच-बीच में आकर उन्हें अलटा-पलटी करना। फिर एक पंक्ति में जेंट्स के फाटे वाले कच्छे (उस समय यही ट्रेंड हुआ करता था) और दूसरी तार पर पतलूनें। फिर आती लेडिज कपड़ों की बारी। रंग-बिरंगी खूबसूरत सलवार-कमीज।

चुन्नी सुखाना तो हम बच्चों के लिए मानो खेल ही होता। दो बच्चे चुन्नी के दो-दो सिरे लंबाई में पकड़ लेते और गाने- गाते हुए चुन्नी सुखाते।

मेरी एक दीदी चुन्नी सुखाने को चैलेंज की तरह लेती। खूब अच्छे से चुन्नी सुखाना, कोई सिलवट न रहने पाए, उसका कोना-कोना अच्छे से चेक करना कि गीला न रह गया हो। फिर खूब जतन से उसे तह करके सँभालकर रखना। उस ज़माने में हम लोगों के घरों में अलमारियाँ नहीं हुआ करती थीं। हर कपड़े को करीने से तह करके ट्रंक में रखा जाता था।

कई साइज़ के अलग-अलग ट्रंक हुआ करते थे।

सबसे बड़ा ट्रंक मेरी दादी के दहेज का था। उसमें घर भर की रजाइयाँ रखी जाती थीं और दादी के दहेज के पीतल के बड़े बर्तन, जिन्हें साल भर में एक बार कलई जरूर करवाया जाता। वह ट्रंक इतना बड़ा था कि जब सालाना सफाई के लिए उसे बाहर धूप में रखा जाता, तो हम पाँचों भाई-बहन उसमें घुस जाते। तब दादी से खूब डाँट पड़ती।

"नामुराद ओत्रो! ट्रंक भज पोसी!"

और नए कपड़ों का ट्रंक, जिसे मेरी दादी हाथ तक लगाने नहीं देती थीं, जब खुलता, तो हम आसपास मजमा लगाकर खड़े हो जाते और कौतूहल से पूछते,"दादी, हम ये नए कपड़े कब पहनेंगे?"

दादी हर बार एक ही जवाब देतीं, "जब कोई शादी-ब्याह होगा, तब पहनना।"

और कपड़े वहीं पड़े-पड़े छोटे हो जाते और हम मन मसोसकर रह जाते।

सर्दियों में रजाई के उछाड़ यानी गिलाफ धोने-सुखाने में बड़ी मशक्कत हुआ करती थी। बड़े-बड़े गिलाफ धोना कोई बच्चों का हँसी-खेल न था। उसे सोडे के पानी में उबालना, साबुन से कुच-कुच करके धोना, पानी में तब तक अघालना, जब तक साबुन अच्छे से न निकल जाए। फिर नील लगाना। उसके बाद दो लोग आ जाते मैदान में। गिलाफ के दोनों सिरे पकड़कर खूब ज़ोर लगाकर निचोड़ते, ताकि खुली धूप में अच्छे से सूखकर कड़क हो जाए।

वाह! सफेद झक्क रजाई के गिलाफ! आनंद ही आ जाता उसे ओढ़कर।

मेरी दादी की आदत थी एक बड़े थाल में पानी डालकर उसी में एक-एक कपड़ा बड़े जतन से रगड़तीं, फिर उस कपड़े को साथ रखी पानी की बाल्टी में डालती जातीं। थाल का पानी मटमैला हो जाता, पर क्या मजाल जो दादी उस पानी को फेंक दें। जब तक उसमें साबुन की ज़रा-सी भी झाग शेष रहती, दादी उसी में कपड़े रगड़ती रहतीं। आखिरकार उस साबुन वाले पानी का उपयोग घर के पोछे आदि धोने में लाया जाता।

कपड़े धोना यानी पूरी दिहाड़ी उसी में गई।

आजकल तो कपड़े मशीन में डाले और निश्चिंत हो गए। धन्य थे पहले के लोग, जो शरीर से इतना काम लेते थे कि उन्हें न तो किसी जिम की आवश्यकता पड़ी, न ही कभी किसी मेड की!

2 . बाबू मोशाय

लंबा, ऊँचा, गौरवर्णीय बंगाली लड़का। पान की गिलौरी मुँह में दबाए जब बोलता, तो इतनी जल्दी-जल्दी बोलता कि आधी बात उसके मुँह में ही रह जाती।

"चटर्जी भैया, धीरे बोलिए न! आपकी आधी बात तो मुझे समझ ही नहीं आई।"

मैं उनकी बात न समझ पाने पर अक्सर शिकायत करती। मेरी बात सुनकर फिस्स से हँस पड़ते। जब वे हँसते, तो उनके गालों में गड्ढे पड़ जाते। उनकी गहरी काली आँखों पर नज़र जाती, तो यूँ लगता मानो वे भी खिलखिलाकर हँस रही हों... सुंदर, मोहक, मनभावन हँसी।

मेरी बात में शिकायत का लहजा पाकर वे अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर देखते। अपने हाथों से होंठों पर उतर आई पान की लाली पर धीरे से हाथ फेरते। उनका दिल होता, तो अपनी बात फिर से दोहराते, नहीं तो हँसकर निकल जाते। पीछे वाला सोचता ही रह जाता कि बंदे ने बोला, तो बोला क्या। उनकी बोलचाल में बंगाली शब्द बहुत होते, जो हम दिल्ली वालों को भला कहाँ समझ आने वाले थे।

वे दिखने में मस्तमौला टाइप के व्यक्ति थे। जाने उनकी कौन-सी क्वालिटी देखकर उन्हें नौकरी पर रखा गया था। न काम करते, न किसी को करने देते। जब देखो, मजमा लगाकर बैठ जाते और सबका हाथ देखने लगते।

हाँ! हाथ देखते हुए उनका खिलंदड़पन एकाएक दार्शनिक व्यक्तित्व में तब्दील हो जाता। उन्हें हस्तरेखाओं की भरपूर जानकारी थी। बड़ी गहराई से हाथों की रेखाएँ पढ़ा करते।

उन्हें रत्नों की भी बेहद गहरी समझ थी और उनकी खूब पहचान भी थी। एक नज़र देखते ही समझ जाते कि कौन-सा रत्न असली है और कौन-सा सिर्फ पत्थर!

एक बार मैंने भी उत्सुकतावश अपना हाथ दिखाया। मेरा हाथ देख उन्होंने जो-जो भी बताया, उसे सुनकर मैं खूब हँसी; पर भविष्य में एक-एक बात शत-प्रतिशत सच साबित हुई। जब-जब उनकी बात सच सिद्ध होती, तब-तब वे शिद्दत से याद आते। बीस-तीस बरस आगे का भविष्य बातों ही बातों में बता देने वाला वह शख्स पता नहीं आज कहाँ है।

उनकी मीठी यादें मेरी ज़िंदगी के ख़ज़ाने का अनमोल हिस्सा हैं और उनसे अपनी शादी के लिए बंगाल से मँगवाई एक बंगाली साड़ी भी, जिसे आज भी सबसे ज़्यादा खुशी से पहनती हूँ।

सम्पर्कः 207, द्वितीय तल, परमानंद कॉलोनी, दिल्ली – 110009, मो. 9582404164

व्यंग्यः हम आजाद हैं

  -  विनोद साव

‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं।’ गाते हुए वे झूम रहे थे। सीना तानकर फूल रहे थे। सिर के बाल उनके दिलीप कुमार की तरह लहलहा रहे थे।

मैंने कहा कि ‘ये तो बहुत अच्छी बात है कि आप अपनी आजादी मिटाने लुटाने के लिए तैयार नहीं हैं.. लेकिन लोग आपकी आजादी लूटने के लिए तैयार बैठे हैं तब आप क्या करेंगे’ वे ट्रेजिडी किंग की तरह गमगीन हो गए। फिर फुसफुसाकर पूछे कि ‘ये लूटने वाले कहाँ से आ गए.’

‘लूटने वाले भी आपके आसपास हैं। आपके हुक्मरान हैं।‘ मैंने भी फुसफुसाते हुए कहा।

‘मेरा दिल कोई हिन्दुस्तान नहीं जिस पर हुकुमत की जाए।’ उन्होंने युसुफ मियाँ की तरह धाँसू डायलाग मारा। फिर थियेट्रिकल अन्दाज में वे लाउड हो गए ‘अरे आज गाने का दिन है तो कम से कम गा तो लेने दीजिये।’ मैंने कहा ‘गाइए .. गाइए और अपनी आजादी के जश्न मनाइये।’ मैं उन्हें गाता बजाता छोड़कर आगे बढ़ चला।

चारों तरफ आजादी का शोर है और अपनी आजादी पर जोर है। वे कुदाल फावड़ा लेकर सड़क पर आ गए थे। मैंने कहा कि ‘आजादी का कुदाल फावड़े से कोई सम्बंध है! ऐसा लग रहा है जैसे किसी दूसरे की आजादी पर हमले की तैयारी है।‘

‘दूसरों पर हमले की नहीं बल्कि अपनी आजादी की रक्षा करने के लिए कुदाल फावड़ा जरूरी है।‘ वे सड़क से लगे बीच चौराहे पर खुदाई करने लगे।

मैंने कहा ‘क्या बीच चौराहे पर आप आजादी का झण्डा फहराएँगे!' 

‘झण्डा नहीं फहराएँगे। बल्कि उनकी मूर्ति लगाएँगे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने को कुर्बान किया था।’

‘पर जो कुर्बान हुए वे सब देशप्रेम की भावना से भरे हुए थे। उन्होंने नाम कमाने और अपनी पूजा कराने के लिए अपनी कुर्बानी नहीं दी थी। वे व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे। अगर वे आज जीवित होते और कहीं लोगों को ऐसा करते देखते तो उनकी आत्मा दुखी होती।’

‘पर इससे हमारी आत्मा सुखी होगी। क्योंकि सरकार उन्हीं लोगों पर रहम करती है जिनके बाप दादों की मूर्ति लगी है। जिनकी महिमा के ग्रन्थ छपाये जा रहे हैं। शिलान्यास के पत्थर ही देशप्रेम की गवाही देते हैं। उन्हीं में हमारे पूर्वजों का यशगान और आजादी की दास्तान है।‘ वे सड़क किनारे खुदाई में तल्लीन हो गए।   

शहर भक्ति भाव से भरा है और कर्णधारों के भीतर भक्ति रस की ज्वाला फूट रही है। सौन्दर्य विकास की कई योजनाएँ  हैं। कहीं कमजोरों के अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं तो शक्तिवानों द्वारा अतिक्रमण किए जा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाकर और पीताम्बर धारण किए हुए वे मिल गए, कहा - ‘समाज में पाप और अनाचार बढ़ते जा रहे हैं। मनुष्य पतित मार्ग पर विचरण कर रहे हैं। ऐसे लोगों को हमारी महान संस्कृति के द्वार पर लाना जरूरी है।’ वे आश्रम के प्रवेश द्वार का निर्माण करवाते हुए अपने शिष्यों के बीच खड़े थे।

‘गुरुदेव आपका आश्रम बड़ा मनोहारी बन पड़ा है। यहाँ किसम- किसम के फल फूल भरे पड़े हैं। आश्रम के खेतों में फसलें भी जमकर लहलहा रही हैं। गौ शालाओं में उन्नत नस्ल के पशुओं से दूध निकाले जा रहे हैं। आपका आश्रम एक सुन्दर उपवन जान पड़ रहा है। लग रहा है हम अपने शहर में नहीं वृन्दावन में खड़े हैं।’ मैंने भी उनकी राग में राग मिलाया।

वे विहँसे ‘हाँ .. वातावरण बनाने के लिए इतना तो आवश्यक है। फिर इसमें अपना क्या है .. सब ऊपर वाले की कृपा है। जो सेवा करेगा वह मेवा पाएगा। आश्रम के सेवाभावियों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा तो ऊपर वाले की सेवा में भी कोई कमी नहीं होगी।’ मैं उन्हें सत्ता और प्रभुता से मिली उनकी आजादी उनके पास छोड़कर वहाँ से चलता बना।

‘मीलों दूर तक दुपाहिया, तिपहिया, चौपहिया और दस पहिया वाहनों की कतार है। वित्त योजनाओं का चमत्कार रेलवे फाटकों पर मौजूद है। लगता है जैसे सारी वैश्विक योजनाएँ मोटर गाड़ी बनाने और हवाई जहाज उड़ाने में ही झोंक दी गई है। विश्व बन्धुत्व कायम करने की स्पर्धा फाटक के सामने है। फाटक पार करने के लिए शूरवीरों में होड़ मची है। वाहन चालन के बहाने सौन्दर्य दर्शन की धूम है। अब तो ट्रेन आने से पहले फाटक उठाकर भागने के लिए फाटकों की उँचाई भी बढ़ गई है। दोनों ही तरफ जन समूह में वही बेताबी है जैसे 'कैद में है बुल बुल सैय्याद मुस्कराये - रहा भी न जाए कुछ कहा भी न जाए।’ मैंने सर पर कफन बांधकर निकले नौजवान से कहा ‘रुक जाइये.. ट्रेन आ रही है।’

‘रुकने का टाइम कहा है अंकल। ट्रेनों का क्या भरोसा वो तो कभी भी लेट हो सकती हैं।’  वे अपनी बाइक बीच में घुसेड़ते हुए बोले। मैंने कहा- ‘आपने लड़कियों की तरह सिर में पट्टी क्यों बाँध ली है। क्या आपको भी धूप में जल जाने का खतरा है.’ 

‘ये पट्टी तो पिछली बार बंद होते रेलवे फाटक को पार करने का नतीजा है।’ वे किसी फौजी की तरह जुझारूपन के साथ आगे बढ़ गए। उनके साथ पुलिस वालों की एक टोली भी लाइन अटैच हो गई। कुछ भद्र महिलाएँ भी अभद्र तरीके से पार कर गई।  तब किसी ज्ञानी जन के ज्ञान चक्षु खुल गए जनता बड़ी आजाद खयाल की होती है। उसका भी अपना मनोविज्ञान है। उसे भीड़ और शोर पसंद है। हम भीड़ और शोर से घबराते हैं तब वे इसी भीड़ और शोर में आनंद उठाते हैं।  

यह रेलवे फाटक पर आनंद लेने की उनकी आज़ादी थी। सबकी अपनी- अपनी आजादी।

०००

मो. 9009884014


हाइबनः अगले जनम...

  -  प्रियंका गुप्ता 

आज सुबह सोकर उठी तो आँगन में दीदी की अजीब सी गुनगुनाहट आ रही थी...अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...। आवाज़ कुछ रुँधी थी या फिर माँजे जा रहे बर्तनों और नल के पानी का शोर था, तुरन्त समझ नहीं पाई। पास जाकर देखा तो दीदी की आँखों से टपाटप आँसू गिर रहे थे। मैं घबरा गई थी...दी और आँसू...इम्पॉसिबिल...। मेरी दी तो कितनी हँसमुख हैं...हमेशा खिलखिलाने वाली...फिर आज क्या हो गया?

उनके हाथ से भगौना छीनकर मैंने किनारे डाल दिया, "बताओ दी, क्या हुआ...? रो क्यों रही...?"

कुछ बोलने की बजाय दी की सुबकियाँ बँध गई। मेरा जी घबराने लगा...कहीं किसी प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं? पर नहीं...अगर ऐसा होता तो दी मुझे तो ज़रूर बताती...तो फिर...?

"तुम्हें मेरी कसम दी, बताओ तो...मेरा दिल घबरा रहा है...।" मैंने अपने हाथों में उनका चेहरा लेकर जबरिया अपनी ओर घुमा दिया।

किसी तरह शान्त होकर दी ने जो बताया, उसका लब्बोलुआब ये था- कल शाम को जब दी ऑफ़िस से लौट रही थी, तो रिक्शे की तलाश करते-करते वो पैदल ही चली जा रही थी। थोड़ा झुटपुटा हो गया था, सो सावधानीवश उन्होंने सूट की चुन्नी से अपना सिर और मुँह भी लपेट लिया था। तभी जाने कहाँ से पीछे से आता एक साइकिल सवार मानो जानबूझकर उनके ऊपर गिर पड़ा। इस गिरने की एक्टिंग के दौरान उसके लिजलिज़े हाथ दी के शरीर पर जिस तरह से रेंग गए, बताते-बताते दी गिनगिनाहट से भर गई।

"तुम्हें उसे घुमाकर एक थप्पड़ देना था दी...वो कमीना भी याद रखता ज़िन्दगी भर...।" सुनकर मैं गुस्से से तमतमा गई।

"मारा था गुड़िया, उस समय मेरा भी यही इंस्टेण्ट रियक्शन था...पर जानती हो, उस बेशर्म, घिनौने इंसान ने क्या किया...? मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया और फिर जो कहा न...वो मैं बोल नहीं पाऊँगी। मेरे मन और तन दोनों से उसके गन्दे, घिनौने स्पर्श की याद नहीं जा रही। मुझे अपने लड़की होने से नफ़रत हो रही। न मैं लड़की होती, न कोई मेरे साथ ऐसा करता। क्या जीवन में आगे बढ़ने, कुछ करने का सपना देखना एक लड़की के लिए गुनाह है...? क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, जन्म से लेकर मौत तक हम सिर्फ भय में जीते रहेंगे? क्या तन-मन से जीवन भर किसी पुरुष के अधीन रहकर, उसकी चाकरी करना ही हमारी नियति है...? क्या हम इंसान नहीं...? इंसान के नाम पर हमारे समाज में खुले घूम रहे हैवानों को काबू में करने की बजाए सिर्फ हम लड़कियों पर बन्दिशें क्यों लगाई जाती हैं...? क्यों सिर्फ हमें सिखाया जाता है कि हम कैसे हँसे-बोलें, कैसे पहने ओढ़ें, कैसे घुटकर जिएँ...? क्यों नहीं लड़कों को बचपन से सिखाया जाता कि एक लड़की भी जीने का हक़ रखती है, खुली हवा में साँस लेने की चाहत होती है उसे...और सबसे बड़ी बात...एक लड़की भी इंसान है...।"

मैं तो दी की बात से निरुत्तर हूँ अब तक...आप के पास इसका जवाब है कोई...?

अगले जन्म

बेटी होकर जीना

चाहेगा कौन?

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम आई जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र)


कविताः ठहरा हुआ पल

  - भावना सक्सैना

मन उदास है

क्यों, पता नहीं

कुछ चाहिए

क्या? ये पता नहीं


ये दुख भी नहीं कि रोकर बह जाए

ये ख़ुशी भी नहीं कि हँसकर जी जाए


बस एक ठहरा हुआ- सा पल है

जो दिन भर चुप रहता है

और रात होते ही

अपना हिसाब खोल देता है


रात आती है

तो अनकिए की आहट लाती है

कुछ सपने

जो बस सोचे गए

कुछ रास्ते

जो छूटते चले गए


कोई मलाल भी नहीं

कोई संतोष भी नहीं

बस एक हल्की- सी कसक

जिसका कोई नाम भी नहीं


वक़्त के साथ तहें जमती जाती हैं

बिना शोर, बिना शिकायत

हर तह में, थोड़ा- सा मैं हूँ

थोड़ा सा वो, जो कभी थी


और कुछ खाली जगहें भी

जहाँ होना था कुछ;

पर रह गया… बस ‘शायद’


मैं अकेली नहीं

पर कोई पास भी नहीं

भीड़ में चलती हूँ;

पर लगता है कदम अपने नहीं


जो है

उसे सहेज पाने का भरोसा नहीं

जो नहीं है

उसके मिल जाने  की आस भी नहीं


फिर भी,

कहीं बहुत भीतर

थोड़ी- सी गर्माहट है


जैसे ठंडी राख में

धीमी- सी आग

जो बुझी नहीं है पूरी


शायद यही काफ़ी है अभी

कि सब ख़त्म नहीं हुआ


कि इन जमी हुई तहों के बीच

कहीं एक साँस चल रही है


धीरे-धीरे ही सही

पर ये परतें खुलेंगी कभी

और उस दिन,


मैं खुद से कह पाऊँगी

कि ठहरना भी एक सफ़र था

और मैं…

रुकी नहीं थी

बस…

थोड़ा-थोड़ा खुद को 

समेट चलती रही।


दो लघुकथाएँ

 - सुकेश साहनी

1. आखिरी तारीख

“वर्माजी!” उसने पुकारा।

बड़े बाबू की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उनकी आँखें बंद थीं और दाँतों के बीच एक बीड़ी दबी हुई थी। ऐश-ट्रे माचिस की तीलियाँ और बीड़ी के अधजले टुकड़ों से भरी पड़ी थी।

सुरेश को आश्चर्य हुआ। द्फ्तर के दूसरे भागों से भी लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। बड़े बाबू की अपरिवर्तित मुद्रा देखकर वह सिर से पैर तक सुलग उठा। उसकी इच्छा हुई एक मुक्का उनके जबड़े पर जड़ दे ।

“वर्माजी, आपने आज बुलाया था!” अबकी उसने ऊँची आवाज में कहा।

बड़े बाबू ने अपनी लाल सुर्ख आँखें खोल दीं। सुरेश को याद आया- पहली दफा वह जब यहाँ आया था तो बड़े बाबू के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ था। तब बड़े बाबू ने आदर के साथ उसे बिठाया था और उसके पिता की फाइल ढ़ूँढ़कर सारे कागज़ खुद ही तैयार कर दिए थे। दफ्तर के लोग भी एकाग्रचित् हो काम कर रहे थे।

बड़े बाबू अभी भी उसकी उपस्थिति की परवाह किए बिना टेबल कैलेंडर पर एक तारीख के इर्द-गिर्द पेन से गोला खींच रहे थे। उसने बड़े बाबू द्वारा दायरे में तारीख को ध्यान से देखा तो उसे ध्यान आया, आज महीने का आखिरी दिन है और पिछली दफा जब वह यहाँ आया था, तब महीने का प्रथम सप्ताह था। बड़े बाबू के तारीख पर चलते हाथ से ऐसा लग रहा था मानो वे इकतीस तारीख को ठेलकर आज ही पहली तारीख पर ले आना चाहते थे।

एकाएक उसका ध्यान आज सुबह घर के खर्चे को लेकर पत्नी से हुए झगड़े की तरफ चला गया। पत्नी के प्रति अपने क्रूर व्यवहार के बारे में सोचकर उसे हैरानी हुई। अब उसके मन में बड़े बाबू के प्रति गुस्सा नहीं था बल्कि वह अपनी पत्नी के प्रति की गई ज्यादती पर पछतावा हुआ। वह कार्यालय से बाहर आ गया।

2. खरबूजा

बड़े साहब आफिस से घर लौटे तो काफी थके हुए लग रहे थे। चपरासी ने उनके सूटकेस के साथ-साथ एक पुराना टू इन वन और प्रेशर कुकर भी भीतर रखा तो मेम साहब चौंक पड़ीं।

“ये सब किसका है?” उन्होंने साहब से पूछा ।

“वही---चीफ साहब,” वे चिढ़कर बोले, “मीटिंग के बाद चलने लगा तो बोले-हमारा टू इन वन और प्रेशर कुकर कई दिनों से खराब पड़ा है, तुम्हारे शहर में अच्छी दुकानें हैं, रिपेयर कराकर भेज देना।”

“अपना टेप रिकार्डर भी महीनों से खराब पड़ा है, उसे भी साथ भेजना न भूलिएगा,” मेम साहब ने कहा,---“हाँ, याद आया, राम खिलावन पर सख्ती कीजिए---चोरी करने लगा है।”

“मैं आज विरमानी स्टोर्स गई थी, मैंने बातों ही बातों में उससे कहा कि मिक्सी की मरम्मत के बहुत पैसे ले लिये। तब उसने मुझे बताया कि राम खिलावन ने ही वाउचर में कुछ रुपये बढ़वाए थे।”

“राम खिलावन!” बड़े साहब ने सख्त आवाज़ में कहा, “कब से कर रहे हो चोरी?”

“मैं कुछ समझा नहीं, हुजूर!” वह बिना घबड़ाए बोला।

“विरमानी कह रहा था, तुमने उस ट्यूब लाइट वाले वाउचर में कुछ रुपए बढ़वाए थे?”

“अच्छा, वो” राम खिलावन ने कहा, “आपने उस दिन शाम को मिक्सी रिपेयर करवाने को दी थी, स्टोर बद हो चुका था इसलिए मैं मिक्सी घर ले गया था। हुजूर! मेरी घरवाली थोड़ी तेज है, पूछने लगी-यह क्या है, किसका है। मुझे ‘सबकुछ’ बताना पड़ा। बस, फिर क्या था, पीछे पड़ गई । कहने लगी-साहब लोग दफ्तर के खर्चे से न जाने क्या-क्या घर ले जाते हैं, मुझे भी एक सिलबट्टा चाहिए। हुजूर आपकी मिक्सी रिपेयर के वाउचर में उसी सिलबट्टे के लिए कुछ रुपए बढ़वाए थे।” राम खिलावन ने रुककर बारी-बारी से साहब और मेम साहब की ओर देखा, फिर ढिठाई से बोला, “इसे चोरी तो नहीं कहेंगे, साहब!”

“तू बहुत बातें बनाने लगा है। चल जा---काम कर्।” इस बार बड़े साहब की आवाज़ खोखली थी।

चार लघुकथाएँ

 - स्नेह गोस्वामी

1. काम

दफ़्तर में पैर रखते हुए उसे घबराहट हो रही थी। पता नहीं ऑफिसर कैसा होगा। बात सुनेगा भी या बाहर से ही भगा देगा। काम हो भी जाएगा या डाँट ही मिलेगी। इन्हीं चिंताओं में वह दफ़्तर में काग़ज़ हाथ में पकड़कर खड़ी थी। पति की मौत के बाद पेंशन के पेपर जमा करने थे पर हर बार आकर भी अंदर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उसकी परेशानी देख एक क्लर्क को आखिर दया आ गई।

“जी बहन जी! क्या काम था? आप कबसे यहाँ खड़ी हैं?”

उसने बिना बोले काग़ज़ आगे बढ़ा दिए। मन में सोचा- ये कौन है? पता नहीं काम करवाने के कितने पैसे माँग लेगा। पता नहीं काम करवाएगा भी या चक्कर ही कटवाएगा? ऐसा ही कितना कुछ सोच गई वे एक मिनट में।

क्लर्क ने काग़ज़ देख लिए थे। “बस इतना ही काम है? हो जाएगा जी। आप ये सब मेरे पास छोड़ जाइए। मैं ख़ुद करवा दूँगा, आपको आने की ज़रूरत नहीं है बस यहाँ साइन कर दीजिए।”

उसने अविश्वास से देखा था, “पैसे कितने देने पड़ेंगे?”

“पैसे कैसे? कोई पैसा नहीं।” वह हँस पड़ा, “मुझे कोई पैसा नहीं चाहिए बहन जी। बस आपका काम हो जाए। जब हो गया तो आपको फोन कर दूँगा। आप निश्चिंत होकर घर जाइए।”

उसके मन से दुआएँ निकली थी। लोग झूठ ही डरा रहे थे, या फिर शायद सभी लोग एक जैसे नहीं होते। उसने साइन करके काग़ज़ पकड़ा दिए थे।

2. कोशिश

सास और जेठानियों के सितम सहते हुए उसने हर बार अपने-आप से वादा किया था कि वह अपनी बहू को बेटी से ज़्यादा प्यार देगी।
बेटे की शादी में उसने अपनी सारी फ़िक्स डिपॉज़िट तुड़वाकर बहू के लिए कपड़े और गहने बनवाए थे। सौ तरह के शगुन किए थे। हर रस्म चाव से पूरी की। रसोई की शक्ल तो दो महीने नहीं देखने दी।
बहू को अंदर बेड पर लेटे देख उसने बड़े लाड़ से पूछा,
“बेटे ठीक है न। कुछ दुख तो नहीं रहा।”
वह चौंककर उठकर बैठ गई,“नहीं मम्मी जी।”
उससे रहा नहीं गया। तुलसी, लौंग और इलायची डालकर चाय बनाई और बहू को देने के लिए गई। अंदर बहू पता नहीं किस सहेली से बता रही थी,“इतनी मीठी बातें करती हैं कि पूछ मत। पक्का कोई तगड़ा प्लान बना रही है वरना सास ऐसी… मुझे तो डर लग रहा है।”
सुनकर एक बार तो पाँव वही अटक गए। फिर सोचा कि इतने सालों से सैकड़ों सच्ची- झूठी कहानियों के चलते सदियों से मन पर जमी बर्फ़ इतनी आसानी से कहाँ पिघलने वाली है। वह कप लेकर अंदर आ गई थी, ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए।

3. कोटा

“सुधा! ओ सुधा!”
दरवाज़े पर मिश्रा की आवाज़ सुनते ही सुधा हिलक उठी और दरवाज़ा खोलने भागी। बाहर सत्यनारायण मिश्रा ही थे। उसने वहीं से पुकारा,
“माँ... माँ! अंकल आए हैं।”
दुर्गा ने सिर पर आँचल धर कैलेंडर में छपे बाँसुरी बजाते कृष्ण को हाथ जोड़ सिर नवाया।
“तूने आज सुन ली। सच कहते हैं, ईश्वर के घर देर है, अँधेर नहीं।”
उसने एक बार फिर माथा झुकाया और प्लेट में मिठाई सजा ड्राइंगरूम में आई,“लो भैया मुँह मीठा करो।”
“नहीं नहीं बेनजी इसकी ज़रूरत न ....”
“ऐसा कैसे, लो भैया बरफी लो।”
“मैं तो कहने आया था...”
“हमें तो पहले ही पता था भाई साहब। आपके होते सौरभ को नौकरी न मिले ऐसा कैसे हो सकता है।”
“लेकिन बहनजी....”
“हमें तो जिस दिन पता चला था, आपके जीजाजी इंटरव्यू कमेटी के मैंबर हो गए हैं, मैंने सौरभ को कह दिया था कि अब तू चिंता मत करै। तेरे फूफा बएठेंगे इंटरव्यू में, बस तू अपनी 
तैयारी कर।” वह अपनी ही रौ में बोले जा रही थी कि उसका 
ध्यान परेशान से मिश्रा के चेहरे पर गया।
“क्या हुआ?“
“आपका काम नहीं हुआ भाभी। मैं इतनी देर से कहने की कोशिश कर रहा था।”
“आपके जीजा ...बोर्ड में...”
“बोर्ड में ही थे भाभी, पर दो ही पोस्ट की सैंक्शन आई लास्ट में। एक तो अपने शिक्षामंत्री के बेटे को मिलनी ही थी, दूसरी के लिए था जीजा का भतीजा ..“
“तो क्या सौरभ के एम.बी.ए.. के अस्सी प्रतिशत कम थे? एक क्लर्क की नौकरी भी नहीं?” मिठाई की प्लेट हाथ से छूटकर नीचे बिखर गई थी।
“ऐसा नहीं भाभी, दो महीने बाद फिर निकलेंगी न नौकरी।” कहते-कहते मिश्रा उठकर दहलीज़ पार कर गए।

4. कथा चलती रहे

चेले ने संदूक़ में झाँका तो ख़ुशी से उछल पड़ा,
“गुरुजी इतनी पोथियाँ? वो भी इस ट्रंक में ताला मार के।”
उसने जल्दी-जल्दी पोथियाँ प्रवचन हॉल के कोने में पड़ी मेज़ पर सजानी शुरू कर दीं।
“ओए नालायक! ये क्या कर रहा है? धंधा बंद कराएगा क्या?”
“वो कैसे जी?”
“गधे! जब तक हम ये पोथियाँ अपने हिसाब से पढ़कर सुना रहे हैं, तभी तक लोग आ रहे हैं। जिस दिन लोगों ने ये किताबें पढ़ लीं, उसी दिन यहाँ आना-जाना छोड़ देंगे इसलिए इन पढ़े-लिखे लोगों को अनपढ़ ही रहने दे।”
चेले ने फटाफट सारे पोथियाँ संदूक़ में बंद कर दीं और माईक सेट करने लग गया।