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Aug 1, 2026

व्यंग्यः हम आजाद हैं

  -  विनोद साव

‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं।’ गाते हुए वे झूम रहे थे। सीना तानकर फूल रहे थे। सिर के बाल उनके दिलीप कुमार की तरह लहलहा रहे थे।

मैंने कहा कि ‘ये तो बहुत अच्छी बात है कि आप अपनी आजादी मिटाने लुटाने के लिए तैयार नहीं हैं.. लेकिन लोग आपकी आजादी लूटने के लिए तैयार बैठे हैं तब आप क्या करेंगे’ वे ट्रेजिडी किंग की तरह गमगीन हो गए। फिर फुसफुसाकर पूछे कि ‘ये लूटने वाले कहाँ से आ गए.’

‘लूटने वाले भी आपके आसपास हैं। आपके हुक्मरान हैं।‘ मैंने भी फुसफुसाते हुए कहा।

‘मेरा दिल कोई हिन्दुस्तान नहीं जिस पर हुकुमत की जाए।’ उन्होंने युसुफ मियाँ की तरह धाँसू डायलाग मारा। फिर थियेट्रिकल अन्दाज में वे लाउड हो गए ‘अरे आज गाने का दिन है तो कम से कम गा तो लेने दीजिये।’ मैंने कहा ‘गाइए .. गाइए और अपनी आजादी के जश्न मनाइये।’ मैं उन्हें गाता बजाता छोड़कर आगे बढ़ चला।

चारों तरफ आजादी का शोर है और अपनी आजादी पर जोर है। वे कुदाल फावड़ा लेकर सड़क पर आ गए थे। मैंने कहा कि ‘आजादी का कुदाल फावड़े से कोई सम्बंध है! ऐसा लग रहा है जैसे किसी दूसरे की आजादी पर हमले की तैयारी है।‘

‘दूसरों पर हमले की नहीं बल्कि अपनी आजादी की रक्षा करने के लिए कुदाल फावड़ा जरूरी है।‘ वे सड़क से लगे बीच चौराहे पर खुदाई करने लगे।

मैंने कहा ‘क्या बीच चौराहे पर आप आजादी का झण्डा फहराएँगे!' 

‘झण्डा नहीं फहराएँगे। बल्कि उनकी मूर्ति लगाएँगे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने को कुर्बान किया था।’

‘पर जो कुर्बान हुए वे सब देशप्रेम की भावना से भरे हुए थे। उन्होंने नाम कमाने और अपनी पूजा कराने के लिए अपनी कुर्बानी नहीं दी थी। वे व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे। अगर वे आज जीवित होते और कहीं लोगों को ऐसा करते देखते तो उनकी आत्मा दुखी होती।’

‘पर इससे हमारी आत्मा सुखी होगी। क्योंकि सरकार उन्हीं लोगों पर रहम करती है जिनके बाप दादों की मूर्ति लगी है। जिनकी महिमा के ग्रन्थ छपाये जा रहे हैं। शिलान्यास के पत्थर ही देशप्रेम की गवाही देते हैं। उन्हीं में हमारे पूर्वजों का यशगान और आजादी की दास्तान है।‘ वे सड़क किनारे खुदाई में तल्लीन हो गए।   

शहर भक्ति भाव से भरा है और कर्णधारों के भीतर भक्ति रस की ज्वाला फूट रही है। सौन्दर्य विकास की कई योजनाएँ  हैं। कहीं कमजोरों के अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं तो शक्तिवानों द्वारा अतिक्रमण किए जा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाकर और पीताम्बर धारण किए हुए वे मिल गए, कहा - ‘समाज में पाप और अनाचार बढ़ते जा रहे हैं। मनुष्य पतित मार्ग पर विचरण कर रहे हैं। ऐसे लोगों को हमारी महान संस्कृति के द्वार पर लाना जरूरी है।’ वे आश्रम के प्रवेश द्वार का निर्माण करवाते हुए अपने शिष्यों के बीच खड़े थे।

‘गुरुदेव आपका आश्रम बड़ा मनोहारी बन पड़ा है। यहाँ किसम- किसम के फल फूल भरे पड़े हैं। आश्रम के खेतों में फसलें भी जमकर लहलहा रही हैं। गौ शालाओं में उन्नत नस्ल के पशुओं से दूध निकाले जा रहे हैं। आपका आश्रम एक सुन्दर उपवन जान पड़ रहा है। लग रहा है हम अपने शहर में नहीं वृन्दावन में खड़े हैं।’ मैंने भी उनकी राग में राग मिलाया।

वे विहँसे ‘हाँ .. वातावरण बनाने के लिए इतना तो आवश्यक है। फिर इसमें अपना क्या है .. सब ऊपर वाले की कृपा है। जो सेवा करेगा वह मेवा पाएगा। आश्रम के सेवाभावियों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा तो ऊपर वाले की सेवा में भी कोई कमी नहीं होगी।’ मैं उन्हें सत्ता और प्रभुता से मिली उनकी आजादी उनके पास छोड़कर वहाँ से चलता बना।

‘मीलों दूर तक दुपाहिया, तिपहिया, चौपहिया और दस पहिया वाहनों की कतार है। वित्त योजनाओं का चमत्कार रेलवे फाटकों पर मौजूद है। लगता है जैसे सारी वैश्विक योजनाएँ मोटर गाड़ी बनाने और हवाई जहाज उड़ाने में ही झोंक दी गई है। विश्व बन्धुत्व कायम करने की स्पर्धा फाटक के सामने है। फाटक पार करने के लिए शूरवीरों में होड़ मची है। वाहन चालन के बहाने सौन्दर्य दर्शन की धूम है। अब तो ट्रेन आने से पहले फाटक उठाकर भागने के लिए फाटकों की उँचाई भी बढ़ गई है। दोनों ही तरफ जन समूह में वही बेताबी है जैसे 'कैद में है बुल बुल सैय्याद मुस्कराये - रहा भी न जाए कुछ कहा भी न जाए।’ मैंने सर पर कफन बांधकर निकले नौजवान से कहा ‘रुक जाइये.. ट्रेन आ रही है।’

‘रुकने का टाइम कहा है अंकल। ट्रेनों का क्या भरोसा वो तो कभी भी लेट हो सकती हैं।’  वे अपनी बाइक बीच में घुसेड़ते हुए बोले। मैंने कहा- ‘आपने लड़कियों की तरह सिर में पट्टी क्यों बाँध ली है। क्या आपको भी धूप में जल जाने का खतरा है.’ 

‘ये पट्टी तो पिछली बार बंद होते रेलवे फाटक को पार करने का नतीजा है।’ वे किसी फौजी की तरह जुझारूपन के साथ आगे बढ़ गए। उनके साथ पुलिस वालों की एक टोली भी लाइन अटैच हो गई। कुछ भद्र महिलाएँ भी अभद्र तरीके से पार कर गई।  तब किसी ज्ञानी जन के ज्ञान चक्षु खुल गए जनता बड़ी आजाद खयाल की होती है। उसका भी अपना मनोविज्ञान है। उसे भीड़ और शोर पसंद है। हम भीड़ और शोर से घबराते हैं तब वे इसी भीड़ और शोर में आनंद उठाते हैं।  

यह रेलवे फाटक पर आनंद लेने की उनकी आज़ादी थी। सबकी अपनी- अपनी आजादी।

०००

मो. 9009884014


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