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Jan 1, 2023

व्यंग्यः भैया जी

 - शंकर लाल माहेश्वरी

भैया जी का नाम है भगवान् स्वरूप; किन्तु लोग इन्हें भाईचारे के कारण भैयाजी शब्द से संबोधित करते है। शादी-विवाह, मौत-मरकत, जाति-बिरादरी, जान-बरात, स्कूल-अस्पताल, थाना-चुगी नाका कहीं पर भी आपके दर्शन हो सकते हैं। कभी वे किसी से बतियाते, ताल ठोंकते, हाथ उठाते, नारा लगाते, तख्ती पकड़े, माइक थामे, रेली में धरने पर, जुलूस में और आम सभा के मंच पर भी दिखाई दे सकते है। सिर पर कभी लाल तो कभी सफेद टोपी में, कभी गले में भगवा रंग का रूमाल डाले तो कभी शुद्ध खादी के धवल परिधान में भाषण देते हुए इनके दर्शन लाभ कर धन्य हो सकते है।

यदि आपको स्कूल की फीस माफ कराना हो, जमीन का नामांतरण कराना हो, मकान की रजिस्ट्री कराना हो, बैंक से ऋण लेना हो, भामाशाही उपचार कराना हो, तो पहुँच जाइए भैयाजी के पास; किन्तु ध्यान रखना उनसे अकेले मिलोगे तभी काम होगा। काम कैसा भी हो आपको निराश नहीं लौटना पड़ेगा। उद्घाटन, शिलान्यास, भूमि पूजन, रैली, धरना, अनशन, प्रदर्शन इन सबके लिये भैयाजी की सेवाएँ सराहनीय है। वह भी निःशुल्क और समयबद्ध। क्षेत्रीय प्रशासन से लेकर दिल्ली दरबार तक इनकी पहुँच है। सुना है भैयाजी को किसी आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।

आजकल उनके ही गाँव के पास वाले शहर में उनकी चर्चा हर सुनागरिक की जबान पर है। मैं भी हनुमान बगीचे वाले चौराहे पर गया था। वहाँ शान्ता जी आँगनबाड़ी वाली मिल गई। वह चीख रही थी। नेता बनकर फिरने वाला ढोंगी समाजसेवक भैयाजी अबकी बार जो मेरे केन्द्र पर आया तो उसे धक्के देकर बाहर कर दूँगी। भोला कुम्हार कह रहा था, उन्होंने पैसे भी ले लिये और काम भी नहीं हुआ। थानेदार से तो हर माह बीस हजार की बन्दी लेना नहीं चूकता हैं। खुद नहीं आयेगा। पोते को इस सेवाकार्य के लिए नियुक्त कर रखा है। बेचारे सेठ धन्ना लाल की उस दिन सबके सामने लू उतार दी। कह रहा था-‘‘हिसाब-किताब ध्यान से रखना, नहीं तो रेड पड़वा दूँगा।’’ बेचारा गिड़गिड़ाकर कहने लगा, अगले महीने से समय पर आपका माल घर पर पहुँच जाएगा बाबू साहब! बड़े स्कूल वाला रामू चपरासी परेशान है इन दिनों। उसे चौबीसों घण्टे भैयाजी के घर सेवा देनी पड़ रही है। यह तो हद हो गई श्रीमती भैयाजी अपने कपड़े भी खुद नहीं धोती;  पर करे तो करे क्या रामा। परिवार को जो पालना है। नौकरी स्कूल की चाकरी भैयाजी के घर की। कैसी विडम्बना है यह। इन दिनों भैया जी को राज्य मन्त्री का दर्जा भी मिल गया है।

भैया भगवान् स्वरूप उर्फ भैयाजी जब भी शहर आते दो-चार चाटुकार चमचे साथ आते और पूर्व नियोजित योजनानुसार भैयाजी को वहीं ले जाते जहाँ काम के बदले भारी भरकम धनराशि उपलब्ध हो सके। कभी आपने काम के बदले अनाज वाली बात तो सुनी होगी पर धीरे-धीरे विकास की अनवरत प्रवाहित होने वाली धारा मायाजाल में फँसती दिखाई देने लगी। भैयाजी की विनम्रता, उदारता, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा, अनवरत सेवा-भावना की लोग प्रशंसा करते है। सबके सामने फिर पीछे मुड़कर हँस देते है। यदि आप रास्ते में मिल गये तो भैयाजी पूछेंगे, कहिए भैया ! क्या हालचाल है। घर पर सब ठीक है ना। बड़वा बेटा क्या कर रहा है? और हाँ, सीमा की तो शादी हो गई होगी। बड़ी अच्छी लड़की है वह। कभी कोई काम हो तो उसे कहना आकर मिल ले और हाँ, तुम्हारे बड़े लड़के ने बी.एड. कर लिया है ना। मास्टरों की सीधी भर्ती निकली है, उसे लेकर जयपुर आना। मास्टर बना दूँगा छोकरे को। तू भी क्या याद करेगा। जिन्दगी बन जाएगी। जब किसी का जीवन बनाना है, तो त्याग तो करना ही पड़ता है। मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए कह दिया हाँ बाबूजी! सही है। मैने भी संक्षिप्त उत्तर से काम चलाया।

अब उन्हें उसी शान्ता बाई की याद आ गई। कहने लगे-‘‘आजकल वो शान्ता बाई दिखाई नहीं दे रही है। अब वह गाँव छोड़कर चली गई सर। कह रही थी-जब तक यह भैया का भूत यहाँ मँडराता रहेगा, मै नहीं आने वाली। मेरी जिन्दगी बरबाद कर दी। अब अपने बड़े बेटे के पास अमृतसर में रह रही है। भैयाजी ने मातादीन को अच्छा भला काम दिलाया-‘हवाला का’। अपने दोस्त के यहाँ। पगार भी अच्छी थी किन्तु निकला बड़ा धोखेबाज। छोड़ आया उस धन्धे को। लाखों के वारे-न्यारे थे। देश- प्रेम की बात करता है। मातृभूमि की सेवा, भारत माँ की आन-बान-शान की रक्षा। यह कहता हुआ अपने भागीदार से लड़ाई करके आ गया। अब दर-दर की भीख माँगेगा। करेगा भी क्या ? इस बार तुम्हारी स्कूल में प्रधानाध्यापक जी बड़े नेक इन्सान है। मेहनती है। विद्यालय के विकास की चिन्ता है उन्हें। वफादार इतने कि जब से वे आए, दो साल हो गए मेरी दोनों लड़कियों और राहुल को निःशुल्क पढ़ा रहे है। मिलते कहाँ है आजकल ऐसे लोग।

गाँव वालों को सब्सिडी दिलाने, शौचालयों को मुफ्त बनवाने, वृद्धावस्था पेंशन दिलाने में गहरी भूमिका रही थी आपकी। किन्तु लोग भूल जाते है किए गए उपकार को दादा! लोग मुँह पर मीठे है, पर पीठ पीछे कह रहे है सब्सिडी से, बैंक लोन से, वृद्धावस्था पेंशन से, नरेगा कार्य से सब में भैयाजी की ‘बन्धी’ बंधी हुई है और बातें करते है समाज सेवा की। दलित और पिछड़ों का उद्धार और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को ऊपर उठाने की बातें। कब तक यह नौटंकी चलेगी। देखते है हम भी। कुछ निजी विद्यालयों में आर.टी.ई. में हुए घोटालों की जाँच करने में भैयाजी को नियुक्त किया गया। बिना विलम्ब के निरीक्षण करने पहुँच गए। भारी मात्रा में गड़बड़ थी। लाखों का घोटाला था; किन्तु तीन दिन की जगह सात दिनों में जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, तो घोटाले की शिकायत बेबुनियाद निकली। एक स्कूल के संचालक भैयाजी के लिए बड़े काम के आदमी है। चुनाव में रात-दिन पसीना बहाने वाले संचालक महोदय ने विद्यालय की अनुदान राशि भी बढ़वा ली; क्योंकि भैयाजी भी सिद्धान्तवादी थे। उन्हें अधिक आभारी बनने का शौक नहीं था। संचालक जी उपकृत हुए। कहने लगे, इस बार आपके विद्यालय में आर.टी.ई. में छात्र संख्या बढ़ जाएगी। हाँ, जरूर बढ़ाओ। देश का विकास तभी होगा जब नीचे का आदमी शिक्षित बनकर ऊँचा उठेगा। भगवान् सब ठीक करेगा। आप निश्चिन्त रहे। जाते-जाते भैयाजी ने संचालक जी के कन्धे पर हाथ रखकर कहा- बोलो रावत सा. मैं कब वापस आऊँ? यह फोन पर बता देना। बस इतना ही कहना-‘‘आपकी याद आ रही है भैयाजी। बस, मैं समझ जाऊँगा।

भैयाजी की उदारता का क्या कहना, वे तो कहते है यदि आप वृद्धजन है। निःशुल्क रेल या हवाई यात्रा करना चाहते है तो कभी भी आकर मेरे फार्म हाउस वाले बंगले पर मिल ले। उम्र की चिन्ता न करे। चालीस तक भी होंगे तो चलेगा। आयु प्रमाण पत्र कुछ ले देकर बनवा लेना। बाद में मैं सब कुछ सम्हाल लूँगा। पूछो उस छोटू के बच्चे को मैंने कैसे तीन बार मु्फ्त में हवाई यात्राएँ करवाई है। मैं तो कहता हूँ, लोग व्यर्थ ही परेशान होते है। काम सबके होते है। समस्याएँ तो आती जाती है। सबका समाधान है। कहा गया है-‘‘जीवन में कुछ पाना हो तो खोना भी पड़ता है।’’

हमारी सरकार अच्छे दिनों के लिए ढेर सारी योजनाओं से जनता की सहायता कर रही है। व्यापार, उद्योग, बैंक, स्कूल, अस्पताल, पेन्शन, कन्या उन्नयन, किसान विकास की कई योजनाएँ है, जिनका उपयोग लोगों को करना चाहिए। किन्तु लोग समय पर लाभ नहीं उठाना जानते। नोट बंदी के समय रामनाथ आया था, कह रहा था, पुराने नोट पड़े रह गए दादा! क्या करें? मैने कहा, चिन्ता मत कर, ‘‘मैं हूँ ना, सब ठीक हो जाएगा। कल आता तो मैंने पुरुषोत्तम पाण्डे का यही काम करवाया था। साथ-साथ ही हो जाता। पुरुषोत्तम से जरूर मिल लेना।

जयपुर में भैयाजी का एक होटल है, राजदीप। निर्माण उस समय शुरू हुआ जब देश में नरेगा शुरू हुआ था। नरेगा से ही पचास से अधिक कुशल मजदूर और बीस कारीगरों की कठोर साधना से इस भव्य भवन का निर्माण पाँच वर्ष में पूरा हुआ। अब अपने ही गाँव के 14-15 वर्षीय नौजवान बालक अपना सेवा धर्म निभा रहे है। जिनमें 25 बालक है और 15 बालिकाएँ। होटल के ऊपरी भाग में आपको राजस्थानी कला व संस्कृति के दर्शन के साथ ही खान-पान भी राजस्थानी ही होगा। नीचे तलघर है यानी बेसमेण्ट। यहाँ मांसाहार, बार बालाएँ, नगर वधुएँ विदेशी शराब और नशीली हेरोइन की समुचित व्यवस्था है। इस कक्ष के दरवाजे पर लिखा होगा, वन्दे मातरम्। यही पहचान है नीचे वाले तल की।

भैयाजी को मैंने कहा, आपने दल बदलकर अच्छा नहीं किया। लोग आपके पुराने कारनामों को उघाड़ रहे हैं। कहते है किसना गुर्जर को लोन दिलाया तो आधा पैसा ही हाथ आया। बैक मेनेजर से पूछा तो कहने लगा-‘‘भैयाजी से जाकर मिल लो।’’ बीस लाख में से केवल अठारह लाख मिले। इतना भी घपला होता है क्या। पर करे तो करे क्या।  ‘‘कौन सुने, किससे कहें, सुने तो समझे नाहिं, कहना, सुनना, समझना सब मन हि के मन मांहि।’’

एक दिन मास्टर अशोक के तबादले के लिये भैयाजी को मैने कहा, तो वह कहने लगे- बारह वर्ष हो गए उसे यहाँ। कभी एक बार भी आया क्या मेरे पास। बुलाओ उसे अभी का अभी। अशोक जी नंगे पाँव दोड़े आये भैयाजी के पास। जैसे सुदामा जी दौड़कर गए थे। मास्टर गिड़गिड़ाया, रोया, दाँतों में अँगुली दबाई, पैर पड़ गया। बन्द कमरे में लम्बी बात हुई। लम्बी अवधि के ठहराव वालों की सूची तैयार की गई। सभी को उपकृत करने का आश्वासन दिया भैयाजी ने। दोनों ओर के आश्वासन रंग लाया और चुनाव के बाद तबादला हो गया। भैयाजी का लंगोटिया भीखू भाई चूड़ीघर बाजार में मिल गया। वर्षों तक साथ निभाया भैयाजी का उसने। कुछ समय उनका निजी सचिव भी बना रहा। अब तो भैयाजी के पैर जमीन पर नहीं टिकते। अब उनकी पाँचों नहीं दसों अँगुलियाँ घी में है। क्योंकि वेतन भत्तों में भारी बढ़ोतरी के साथ विदेशी यात्राओं में छूट तथा दैनिक भत्ते भी आसमान को छूने लगे है। सेवा केवल पाँच साल की और सेवाप्रसाद जीवन भर का। है ना आदमी तकदीर वाला। सावधान दोस्तों, अब उनका सेवा शुल्क भी आनुपातिक ढंग से बढ गया है। विद्यालय का वार्षिक उत्सव था। भैयाजी मुख्य अतिथि थे। उद्बोधन में कहा- मेरे देशवासियों, मैंने हमेशा जनभावना का ध्यान रखा है। लोगों को रास्ता दिखाया। उनकी लम्बित समस्याओं का समाधान किया। फिर भी लोग कहते है तो कहने दो। ‘‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।’’ यदि भैयाजी से मिलना चाहें, तो दो माह बाद ही जाएँ; क्योंकि वे कल ही अपने सेवाकाल के पाँचवे वर्ष में सपरिवार निःशुल्क विदेश यात्रा करेंगे। पाँच बड़े राष्ट्रों में अन्तिम यात्रा चीन की होगी। जहाँ कुछ अधिक समय ठहर कर लौटने की योजना है। धैर्य बनाए रखे। मिलेंगे अवश्य।

सम्पर्कः पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी, पोस्ट-आगूचा, जिला- भीलवाडा, राजस्थान. पिन- 311022, मो. 09413781610

Aug 1, 2021

आलेख- राजस्थान के रणवीर

- शंकर लाल माहेश्वरी

राजस्थान की धरती राजपूतों के त्याग और बलिदान की भूमि रही है। इस वीर भूमि पर ऐसे रणवीर पैदा हुए है, जिन्होंने अपनी मान-मर्यादा की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर अमरता प्राप्त की हैं राणा प्रताप ऐसे ही रणवीरों में एक थे। राणा प्रताप के पिता राणा उदय सिंह ने एक बार क्रोधित अवस्था में घोषित किया कि जब तक बूँदी के गढ़ पर मेवाड़ का झण्डा नहीं लहरा दूँगा तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगा। इस घोषणा पर तत्काल बुद्धिमान सेनापति ने कहा, महाराज! आपने यह क्या कह दिया? बूँदी के गढ़ पर मेवाड़ का झण्डा लहराना नितान्त असम्भव है। इस पर अपने ही कथन पर राणा को पश्चाताप हुआ। 'अब पछताये क्या होत है’। तत्काल ही प्रधानमंत्री ने एक तरकीब बताई। मेवाड़ के ही अपने एक गढ़ पर बूँदी का झण्डा लगाया गया और अपनी ही सेना के सौ हाड़ा राजपूतों को उस पर चढ़ाई करने हेतु भेजा गया। यह एक नकली युद्ध ही था जिसमें एक घण्टे तक तलवारबाजी के साथ हाड़ा राजपूतों को आत्मसमर्पण करना पड़ा और नाटकीय ढंग से बूँदी का झण्डा उतारकर मेवाड़ का झण्डा फहराने की व्यवस्था की।

ऐतिहासिक कथन के अनुसार कहा जाता है कि जब मेवाड़ के सेनिक गढ़ में घुस गये और हाड़ा रणवीर मेवाड़ की सैन्य टुकड़ी पर बहादुरी के साथ टूट पड़े। भीषण युद्ध हुआ। मेवाड़ की सेना से मुकाबला करते हुए हाड़ा वीर सैनिक शाम तक लोहा लेते रहे। हाड़ा योद्धाओं की संख्या सौ थी। युद्ध में जब आखिरी हाड़ा योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया तब राणा ने बूँदी  का झण्डा उतारकर मेवाड़ की ध्वजा फहराई। बूँदी  में आज भी उन सौ हाड़ा योद्धाओं के बलिदान की स्मृति में विशाल मेले का आयोजन होता है।

जिस समय समूचे भारत देश में मुगल बादशाहों का साम्राज्य था उस समय मेवाड़ पर एक वीर योद्धा महाप्रतापी महाराणा प्रताप का अवतरण हुआ। मेवाड़ प्रदेश एक स्वतन्त्र प्रदेश था। जिस पर मुगलों का आधिपत्य नहीं था। तत्कालीन किसी भी राजपूत राजा ने मुगलों की हुकूमत स्वीकार नहीं की। इस पर मुगल सम्राट अकबर स्वयं आश्चर्य चकित था। अकबर की सेना का मुकाबला करने के लिये राणा प्रताप ने बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर मुगलों की अस्सी हजार सैनिकों की सेना का मुकाबला किया तथा हार नहीं माने। यद्यपि राणा प्रताप शत्रु सेना से घिर गए थे। उस समय राणा के चेतक घोड़े ने अपना पराक्रम दिखाया तथा प्रताप के भाई शक्ति सिंह ने प्रताप को बचाने में सहयोग किया। इस युद्ध में चेतक की भी मृत्यु हो गई। केवल एक दिन ही चलने वाले इस युद्ध में सत्रह हजार सैनिक मारे गये। फिर भी राणा प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की। राणा प्रताप की इस शौर्यगाथा का वर्णन करते हुये अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टॉड ने लिखा है, 'राजस्थान की भूमि पर ऐसा कोई फूल नहीं उगा, जो राष्ट्रीय वीरता और त्याग की सुगन्ध से भरकर न झूमा हो। वायु का एक भी झोंका ऐसा नहीं उठा जिसकी झंझा के साथ युद्ध की देवी के चरणों में साहसी युवकों का स्थान न हुआ हो।’

महान योद्धा रावल रतन सिंह चुण्डावत की शौर्यगाथा पढ़कर रोंगटे खड़े जो जाते है। नवविवाहित सलूम्बर के रावत रतन सिंह चुण्डावत युद्ध भूमि में प्रस्थान करते समय जब अपनी पत्नी से अपनी निशानी मांगी तो रानी ने अपना सिर काटकर निशानी के रूप में ही दे दिया ताकि युद्ध भूमि में नवविवाहिता पत्नी के मोहपाश में न घिरकर बहादुरी के साथ रणभूमि में दुश्मनों का मुकाबला कर सके।

इसी तरह महाराणा अमर सिंह की सेना के दो रजपूती दल थे। चुण्डावत और शक्तावत। दोनों दलों में अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिये परस्पर मुकाबला होना था। महाराणा की सेना ने चुण्डावत खाप के ही सपूतों को हरावल (युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति) में ही रहने का अवसर मिलता था। शक्तावत राजपूत भी किसी से कम नहीं थे; अत: उन्होंने भी हरावल में रहकर अपना पराक्रम दिखाने का प्रस्ताव महाराणा के सम्मुख रखा। इसका निर्णय करने के लिए महाराणा ने एक प्रतियोगिता आयोजित की।

उस समय उन्ठाला का किला जहॉंगीर के अधीन था और उस किले का किलेदार नवाब समस खॉं था। उस समय यह निश्चय किया गया कि इस किले पर अलग-अलग दिशाओं से आकर दोनों दल आक्रमण करेंगे। दोनों ही दलों ने उन्ठाला दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। वीर शक्तावत दुर्ग के निकट जाकर उसे तोडऩे की कौशिश करने लगे। शर्त यह थी कि जिस दल का व्यक्ति दुर्ग में पहले प्रविष्ट होगा उसे ही हरावल में रहने का अधिकार होगा। इधर चुण्डावत सरदारों ने दुर्ग की दीवार पर कबन्ध द्वारा चढऩे का प्रयास करने लगे। शक्तावतों ने भी दुर्ग की फाटक को तोडऩे के लिए हाथी की टक्कर से तोडऩे का प्रयास किया; किन्तु हाथी दुर्ग के फाटक पर लगे तीखी कीलों को देखकर डर गया और पीछे लौट आया। यह दृश्य देखकर शक्तावतों का सरदार बल्लू अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए फाटक की कीलों पर अपना सीना रखकर खड़ा हो गया। महावत को हाथी द्वारा अपने सीने पर टक्कर मारने का संकेत दिया। तत्काल महावत ने हाथी को टक्कर मारने का इशारा किया और उस टक्कर से दुर्ग के पैने कीले बहादुर बल्लू शक्तावत के सीने को चीर कर आरपार हो गये और बल्लू का प्राणान्त हो गया। उसी समय चुण्डावतों के सरदार जेत सिंह ने फाटक को टूटने की अवस्था में देखा, तो तत्काल अपने सिर को काटकर दुर्ग में फेंकने का आदेश दिया, ताकि शर्त जीत सके; किन्तु साथियों द्वारा ऐसा नहीं करने पर स्वयं ने ही अपना सिर अपने ही हाथों से काटकर दुर्ग में फेंक दिया। इस प्रकार चुण्डावतों ने अपना हरावल में रहने का अधिकार प्राप्त किया।

इतिहास प्रसिद्ध वीरांगनाओं में रानी पद्मिनी का नाम विख्यात है। वह सिंहल की राजकुमारी थी। इसके पिता गंधर्व सेन सिंहल राज्य के राजा थे। राजकुमारी पद्मिनी बड़ी सुन्दर थी। पिता ने उसके विवाह के लिये स्वयंवर आयोजित किया। चित्तौड़ के राजा रावल रतन सिंह ने स्वयंवर में प्रस्तुत सभी राजाओं को हराकर रानी पद्मिनी को जीता और उसे चित्तौडग़ढ़ लेकर आ गए। रानी की सुन्दरता जग जाहिर थी।

राजा रतन सिंह के राज्य में राघव चेतन नाम का एक प्रसिद्ध संगीतकार था। राघव चेतन को जादूगरी की महारत भी हासिल थी। वह सदैव अपने प्रतिद्वन्द्वियों पर जादू द्वारा जीत हासिल करता था। जब राजा को यह जानकारी मिली तो वह बड़ा नाराज हुआ और उसे दण्ड स्वरूप राज्य से बहिष्कृत कर दिया। इस बात का बदला लेने के लिए राघव चेतन दिल्ली चला गया और सुल्तान अलाउद्धीन खिलजी से रानी पद्मिनी के सौन्दर्य का बखान किया तो खिलजी रानी को देखने के लिए रावल रतन सिंह के मेहमान बनकर चित्तौड़ पहुँच गया।

राजपूती मान-मर्यादा के अनुसार रानी किसी पराये मर्द को अपना मुँह नहीं दिखाते हुए घूँघट में ही रहती थी। खिलजी वंश में दिल्ली सल्तनत का अलाउद्धीन खिलजी दूसरा शासक हुआ। राघव चेतन द्वारा रानी पद्मिनी का सौन्दर्य वर्णन सुनकर अलाउद्धीन खिलजी रानी को देखने के लिए अतिथि के रूप में रतन सिंह के महल में पहुँच गया। खिलजी द्वारा विशेष आग्रह पर ही जब वह रानी पद्मिनी का मुँह नहीं देख सका तो उसने उसी दिन राजा रतन सिंह को बन्दी बना लिया। रानी पद्मिनी ने अपने सेनापति गोरा और भतीजे बादल के साथ मिलकर एक योजना बनाई। जिसके अनुसार रानी अपनी सात सौ सहेलियों के साथ खिलजी के पास जाएगी। यह प्रस्ताव खिलजी ने स्वीकार कर लिया; लेकिन सात सौ सहेलियों के स्थान पर सात सौ वीर सैनिक पालकियों में बैठ गए और रानी के स्थान पर वीर सेनापति गोरा बैठा। खिलजी के पास पहुँचते ही रानी अर्थात गोरा ने रतन सिंह से मिलने की इच्छा प्रकट की। बड़ी सुरक्षा के साथ रानी यानी गोरा को राजा रतन सिंह से मिलवाया गया और रतन सिंह को वहॉं से छुड़वाकर बादल के साथ चित्तौडग़ढ़ लौट आए। सेनापति गोरा वहीं वीरगति को प्राप्त हो गया। यह सब देखकर खिलजी ने चित्तौडग़ढ़ पर आक्रमण कर दिया; किन्तु रतन सिंह के किले के द्वार नहीं तोड़ सका। उसी समय खिलजी के सैनिकों द्वारा किले के चारों ओर घेराबन्दी कर ली गई ताकि बाहरी आवागमन बन्द हो जाए। इससे थोड़े दिनों बाद जब किले में खाने पीने की समस्या आने लगी तो राजा को दरवाजा खोल देना पड़ा। राजा का अन्तिम आदेश था कि वीर सिपाही मरते दम तक लड़ते रहेंगे। इसी युद्ध में राजा भी वीरगति को प्राप्त हो गया। जब रानी पद्मिनी ने यह समाचार सुना तो उसने आत्मदाह कर लिया उसके साथ महल की सौलह सौ महिलाओं ने भी अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी बलिदान को जौहर कहा गया है।

मेवाड़ की इसी वीरभूमि पर राणा प्रताप और मुगलों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा के पास सात सौ सैनिक ही जीवित बचे। थोड़े ही समय के बाद कुम्भलगढ़, गोगुन्दा, उदयपुर और निकटवर्ती स्थानों पर मुगलों का आधिपत्य हो गया। महाराणा ने गुरल्ला युद्ध की योजना बनाई और मुगलों को मेवाड़ से बाहर का  मुँह दिखा दिया। यद्यपि अकबर ने महाराणा को अधीन करने के लिए 1578 में हल्दीघाटी युद्ध के बाद सन् 1577 से 1582 के मध्य एक लाख सैनिकों द्वारा आक्रमण करवाया गया; किन्तु फिर भी राणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

राजपुताने के इतिहास में दिवेर का भीषण युद्ध भी विशेष महत्त्व रखता हैं। महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व महाराज कुमार अमर सिंह कर रहे थे। दिवेर थाने पर आक्रमण किया गया। हजारों मुगल रजपूती अस्त्र-शस्त्रों से रण क्षेत्र में धराशायी हो गए। कहा जाता है कि जब रणभूमि में महाराज कुमार ने सुल्तान खान मुगल को बरछे से आक्रमण किया, तो बरछा सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ आरपार हो गया। एक अन्य रणवीर ने अपनी तलवार का वार उसके हाथी पर किया, तो उसका पैर कट गया। महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सिर पर तलवार का वार किया तो घोड़े समेत उसका वध कर दिया गया। इस प्रकार इन वीरोचित घटनाओं से मुगल भयभीत हो गए। लगभग 36 हजार बचे हुए मुगल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण किया और दिवेर युद्ध में मुगलों का आत्मबल टूट गया। फलस्वरूप मेवाड़ भूमि पर बनाई गई सभी 36 थानों, ठिकानों तथा कुम्भलगढ़ के किले को रातोंरात खाली कर भाग गए। दिवेर युद्ध के बाद राणा प्रताप ने कुम्भलगढ़, गोगुन्दा, बस्सी, चावण्ड, जावर, भदारिया, मोही, माण्डलगढ़ आदि विशेष ठिकानों पर अपना अधिकार बना लिया। राज्य विस्तार के इस अभियान में राणा ने चित्तोड़ को छोड़कर मेवाड़ के सारे ठिकानों को पुन: स्वाधीन करा लिया।

वस्तुत: दिवेर का युद्ध राणा प्रताप के लिये यादगार व निर्णायक युद्ध रहा। इस युद्ध के बाद मुगल इतने भयभीत हो गये कि अकबर की सेना ने भी मेवाड़ पर होने वाले आक्रमण लगभग बन्द कर दिये। ऐसा बताया जाता है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद राणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उसके भाई ताराचन्द मालवा से दण्ड के 25 लाख रुपये और दो हजार अशर्फियाँ  लेकर उपस्थित हुए तभी दिवेर युद्ध की योजना बनाई गई। इस धनराशि से 25 हजार सैनिकों को 12 साल तक खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाई जा सकती थी। उसी समय 40 हजार सैनिकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार की गई।

राजपुताने के रणवीरों का इतिहास बड़ा ही क्रान्तिकारी और चमत्कार पूर्ण रहा है। रणवीरों ने अपनी आन-बान-शान की रक्षा के लिए जो उत्सर्ग किया है वह रोंगटे खड़े कर देने वाला हैं। रणवीरों की शौर्यगाथाओं से मेवाड़ का इतिहास भरा पड़ा है। चित्तौड़ के जयमाल मेड़तिया ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट दिया था। करौली के जादौन राजा जब सिंहासन पर बैठते थे तो एक साथ दोनों हाथ जिन्दा शेरों पर रखते थे। जोधपुर के राजा जसवन्त सिंह के बारह वर्षीय पुत्र पृथ्वी सिंह ने औरंगजेब के खूँखार शेर का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया था। राणा सांगा के शरीर पर अस्सी घाव थे। एक हाथ और एक पैर और एक आँख नहीं होने पर भी सौ से अधिक युद्ध लड़कर अपना शौर्य प्रस्तुत किया था। आलाजी भाटी का मुगलों से युद्ध करते समय सिर कट गया था फिर भी कई दिनों तक युद्ध भूमि में लड़ते रहे। रायमलोत कल्ला का शीश धड़ से अलग हो गया फिर भी लड़ते- लड़ते घोड़े पर बैठे हुए पत्नी के पास पहुँच गए तभी रानी ने गंगाजल के छींटो से धड़ को शान्त किया। जयमल राठौड़ पैर कटने के बाद भी कल्ला जी के कन्धों पर बैठकर युद्ध भूमि में लड़ते रहे।

रणबाँकुरे राजपूतों के बलिदान की शौर्यगाथाओं को सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते है। धन्य है वे रणवीर जिन्होंने अपनी मान मर्यादा की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग कर राजस्थान की वीर भूमि को धन्य किया।

सम्पर्क: पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी, पोस्ट-आगूचा, जिला-भीलवाडा, राजस्थान- 311022, मो. 8005691877