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Aug 1, 2025

साक्षात्कारःप्रेरणा देती हैं विज्ञान कथाएँ- डॉ. जयंत नार्लीकर

  - चक्रेश जैन

वर्ष 2008 में डॉ. जयंत नार्लीकर का इंदौर आना हुआ था। तब विज्ञान संचारक चक्रेश जैन ने ‘विज्ञान कथा’ विषय पर उनके साथ भेंटवार्ता की थी। प्रस्तुत है उनकी यह भेंटवार्ता...

सवाल: विज्ञान कथाएँ लिखने की प्रेरणा किससे मिली? 

जवाब: देखिए, प्रेरणा मुझे अपने गुरू फ्रेड हॉयल से मिली है। उन्होंने बहुत अच्छी विज्ञान कथाएँ लिखी हैं। उनकी पहचान एक विख्यात वैज्ञानिक के रूप में भी है। मैंने सोचा कि यदि एक वैज्ञानिक विज्ञान कथाएँ लिखे तो वह लोगों को विज्ञान की वास्तविकताओं के बारे में काफी अच्छी तरह से बता सकता है। 

सवाल: आपकी पहली विज्ञान कथा कौन-सी है? 

जवाब: मेरी पहली विज्ञान कथा ‘कृष्ण विवर’ (ब्लैक होल) थी। यह मैंने मराठी में लिखी है। मुम्बई की मराठी विज्ञान परिषद ने एक कथा प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसमें मैंने अपनी विज्ञान कथा भेज दी। मैं यह नहीं चाहता था कि आयोजकों पर मेरी लोकप्रियता का प्रभाव पड़े। इसलिए मैंने एक नकली नाम नारायण विनायक जगताप चुना। शायद वे मेरी हैंडराइटिंग से परिचित होंगे, ऐसा सोचकर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि वे इस कहानी को अपनी हैंडराइटिंग में लिखे। हुआ यह कि उस विज्ञान कथा को पहला पुरस्कार मिला। आयोजकों ने नारायण विनायक जगताप को पत्र लिखा कि आपको पुरस्कार के लिए चुना गया है। परिषद के अधिवेशन में आप आमंत्रित हैं, लेकिन आपको टीए-डीए नहीं दिया जाएगा। उसके बाद मैंने सोचा कि मैं अपने नाम से ही लिखूँ। 

मुम्बई से किर्लोस्कर नाम की एक पत्रिका निकलती है। तब उसके संपादक श्री मुकुन्दराव किर्लोस्कर थे। उन्होंने कहा कि आप हमारी पत्रिका के लिए विज्ञान कथाएँ लिखिए, तब मैंने पहली विज्ञान कथा लिखी। 

सवाल: ऐसी कोई घटना जिसने आपको विज्ञान कथा लिखने के लिए प्रेरित किया हो? 

जवाब: मेरी अधिकांश विज्ञान कथाएँ, हम जो कुछ देखते या अनुभव करते हैं, उन विषयों पर हैं। जैसे भोपाल में गैस त्रासदी हुई या कोई अभिनव कम्प्यूटर मिल गया तो उसका प्रभाव मन पर पड़ा और ऐसा लगा कि उसे कथा के रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाए।

सवाल: आपकी विज्ञान कथाओं की थीम क्या है? 

जवाब: मेरी कहानियों की कोई एक विशेष थीम नहीं है। मैं भविष्य की ओर देखता हूँ। विज्ञान का रूप आगे चलकर क्या होगा, उस रूप को लिखता हूँ। 

सवाल: आप कितनी विज्ञान कथाएँ लिख चुके हैं? 

जवाब: मैंने 25 से अधिक विज्ञान कथाएँ और उपन्यास लिखे हैं। हिंदी उपन्यास आगंतुक नाम से प्रकाशित हुआ है। इसकी मुख्य थीम है कि पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर भी जीवन हो सकता है। मेरा अंग्रेज़ी में एक उपन्यास दी रिटर्न आफ वामन नाम से है। इसमें पृथ्वी पर पहले भी कोई अति विकसित संस्कृति होने और उसके विनाश के कारणों की चर्चा की गई है। 

सवाल:  विज्ञान कथाओं का उद्देश्य क्या है? 

जवाब: देखिए, विज्ञान कथा लिखने के कई उद्देश्य हैं। पहला, स्वान्त: सुखाय है। लिखने से एक तरह का सुकून मिलता है। दूसरा, समाज में विद्यमान अंधविश्वासों को विज्ञान कथाओं के माध्यम से दूर किया जा सकता है। तीसरा, भावी विज्ञान के स्वरूप के बारे में लोगों को बताया जा सकता है।

सवाल: क्या विज्ञान कथाओं से अनुसंधान की नई दिशा या प्रेरणा मिलती है? 

जवाब: हाँ मिल सकती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल ने जो पहली विज्ञान कथा लिखी थी, उसमें उन्होंने कल्पना की थी कि अंतरिक्ष में वायु के विशाल मेघ हैं, लेकिन तब लोगों को विश्वास नहीं हुआ था कि इस तरह के मेघ हो सकते हैं। बाद में माइक्रोवेव टेक्नॉलॉजी से ऐसे मेघ दिखाई दिए। हो सकता है विज्ञान कथाओं से अनुसंधान को नई दिशा मिले। हालांकि, कोई नई कल्पना साइंटिफिक जर्नल में नहीं छप सकती, क्योंकि वह मनगढंत भी हो सकती है। 

सवाल: बच्चों को परी कथाओं से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। वे चांद-सितारों के जन्म-मरण, रोबोट आदि के बारे में जानना चाहते हैं। बच्चों के लिए किस तरह की विज्ञान कथाएँ होनी चाहिए? 

जवाब: दूरदर्शन पर कुछ वर्षों पहले स्टार ट्रैक नाम की विज्ञान कथा दिखाई गई थी। इसे सभी ने देखा, लेकिन बच्चों ने इसे बहुत पसंद किया। वे पूरे सप्ताह इस सीरियल का इंतज़ार करते थे। दरअसल, इस सीरियल में विभिन्न ग्रहों की रोमांचक यात्राओं की रोचक कहानी है। इन यात्राओं की कथाओं को कई विज्ञान लेखकों ने मिलकर लिखा है। इसमें अंतरिक्ष यान, लेज़र आदि के प्रयोगों के बारे में दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिक कल्पनाओं को बढ़ावा मिला। मुझे लगता है कि आधुनिक युग में बच्चों के लिए विज्ञान कथाएँ होनी चाहिए, जो उनका दिल बहला सकें और साथ ही उन्हें विज्ञान की ओर आकर्षित भी कर सकें। 

सवाल: आप यह सोचते हैं कि विज्ञान कथाएँ लोगों में विज्ञान में रुचि पैदा करती हैं? 

जवाब: मेरा अनुभव है कि पहले लोग विज्ञान कथाओं के बारे में यही सोचते थे कि वे केवल विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी हैं। उसमें मनोरंजन जैसी कोई चीज़ नहीं है। यदि अच्छी विज्ञान कथाएँ लिखी जाएँ तो इनसे लोगों के मन में विज्ञान के प्रति जो भय है, उसे दूर किया जा सकता है। 

सवाल: विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं। हमें इस दिशा में किस तरह के प्रयासों पर ज़ोर देना चाहिए?

जवाब: वास्तव में देखा जाए तो ये प्रयास अनेक दिशाओं में किए जा सकते हैं। टेलीविज़न, रेडियो आदि पर इस तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकते हैं। समाचार पत्रों में विज्ञान का एक पूरा पृष्ठ दिया जा सकता है, लोकप्रिय व्याख्यानों का आयोजन किया जा सकता है। रोज़मर्रा के वैज्ञानिक उपकरणों की जानकारी रोचक ढंग से दी जा सकती है। प्रदूषण, ऊर्जा संकट के दुष्परिणामों की तस्वीर भी लोगों के बीच रखी जा सकती है। कुल मिलाकर विज्ञान के वास्तविक चेहरे से लोगों को अवगत कराया जा सकता है।

सवाल: अच्छी विज्ञान कथाओं की कसौटी क्या है? 

जवाब: पहले यह बताता हूँ कि क्या नहीं होना चाहिए। विज्ञान कथाएँ ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसमें केवल परियों के जादू की चर्चा हो। उनमें भय और आतंक की घटनाओं का भी उल्लेख नहीं होना चाहिए। वास्तव में विज्ञान कथाएँ ऐसी होनी चाहिए जो विज्ञान के नियमों की जानकारी दें और भविष्य की ओर देख सकें। विज्ञान कथाओं के सकारात्मक पक्ष के बारे में यही कहा जा सकता है कि विज्ञान में हुई उन्नति से समाज पर जो प्रभाव पड़ेगा, उसे कथा के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाए। 

सवाल: हिंदी में विज्ञान कथाओं का अभाव क्यों है? 

जवाब: मैं सोचता हूँ, अधिकांश साहित्यकार ऐसे हैं जिन्होंने विज्ञान नहीं पढ़ा है। वे अत्यंत प्रभावशाली साहित्यकार भले हों, लेकिन विज्ञान सम्बंधी साहित्य को ज़रा डर से देखते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसी कोई नई बात है, जो साहित्य में नहीं बैठती। यह सोच धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। यह मराठी का परिदृश्य है। हिंदी में भी यही स्थिति है। कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार जिनकी कलम में ताकत है, यदि वे वैज्ञानिकों से चर्चा करके विज्ञान की जानकारी लें और उसे कथा या उपन्यास के रूप में लिखें, तो निश्चित रूप से विज्ञान कथा साहित्य समृद्ध होगा। मुझे ऐसा नहीं लगता कि विज्ञान कथाएँ लिखने के लिए विज्ञान में पीएच.डी. होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

Jul 1, 2022

विनोद साव से बातचीतः 'व्यंग्य' हिन्दी साहित्य का एक नवोन्मेष है

साक्षात्कारकर्ता : राजशेखर चौबे

साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में हिन्दी व्यंग्य ज्यादा प्रकाशित हो रहे हैं। व्यंग्यकारों की संख्या अब पहले जैसी उँगलियों में गिने जाने योग्य भर नहीं रहीं। व्यंग्य के आयोजन भी भरपूर हो रहे हैं। सम्मान पुरस्कार भी खूब बँट रहे हैं। बावजूद इनके हिन्दी व्यंग्य के मूल्यांकन को लेकर पशोपेश की स्थिति अभी भी बनी हुई है। प्रगतिशील आलोचकों का एक बड़ा वर्ग इसे विधा नहीं मानता;  इसलिए उनकी पत्रिका व आलोचना के एजेंडे से व्यंग्य बाहर है। इसे विधागत लेखन नहीं मानने के कारण लिखे जा रहे व्यंग्य की सम्यक् आलोचना नहीं हो पा रही है। साहित्य अकादमियों, परिषदों, सृजनपीठों ने विशाल व्यंग्य जगत् से अपना मुँह फेरे रखा है। ऐसे विश्वासघाती माहौल में व्यंग्य अपनी ट्रैक पर सबसे आगे तो दौड़ रहा है पर उसे प्रतियोगिता से बाहर माना जा रहा है। इन और ऐसे कई प्रश्नों पर हमारे दौर के चर्चित व्यंग्यकार विनोद साव से व्यंग्यकार राजशेखर चौबे की बातचीत यहाँ दी जा रही है, ताकि, हिन्दी साहित्य के इस सबसे असरदार नवोन्मेष पर विधा दुविधा और सुविधा पर खुलकर चर्चा हमारे पाठकों के सामने आ सके और कोई रास्ता खुल सके।   - संपादक

प्रश्न -  विनोद जी.. आप व्यंग्य के जाने माने लेखक हैं और पिछले तीन दशक से व्यंग्य लिख रहे हैं। आपके समय में व्यंग्य की क्या स्थिति थी ?

उत्तर - राजशेखर जी.. वर्ष 1990 से मैंने लिखना शुरू किया । मैंने देर से लेखन शुरू किया था तो मुझे लगा कि ‘देर से लेखन शुरू करने का एक बड़ा लाभ यह है कि अपनी आरंभिक रचनाओं के लिए शर्मिंदा होना नहीं पड़ता।’ सामयिक संदर्भ में लिखता था। विधा निश्चित नहीं थी । फिर अख़बारों ने मेरे कुछ सामयिक आलेखों को व्यंग्य बताकर छापा तब लगा कि मेरी रचनाएँ व्यंग्य की तरह बन रहीं है । बाद में मैंने उसी ‘स्पिरिट’ में लिखना शुरू कर दिया था। इस तरह मेरे व्यंग्य लेखन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

उस समय हिंदी व्यंग्य की स्थिति बहुत समृद्ध थी राजशेखर भाई। यह आजादी के बाद समृद्ध हुआ था। मुझ जैसे नए व्यंग्य लेखक के लिए व्यंग्य लिखना और छपना बड़ी चुनौती का काम था क्योंकि उस समय के सभी अखबारों व पत्रिकाओं में वही लेखक छपा करते थे जिन्हें हम आज व्यंग्य के शीर्षस्थ लेखक मानते हैं । उस समय व्यंग्य लिखना- मतलब सीधा अपने पुरोधाओं से मुठभेड़ करना था । हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी, के.पी.सक्सेना, शंकर पुण्ताम्बेकर, गोपाल चतुर्वेदी जैसे दर्ज़न भर स्तरीय लेखक धुआँधार लिख रहे और छप रहे थे। वे सभी अखबारों व पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन कर रहे थे और भारी संख्या में लिख रहे थे। नवभारत टाइम्स में शरद जोशी दैनिक स्तंभ ‘प्रतिदिन‘ लिखते थे। अब आप बताइए इन निष्णात स्थापित व्यंग्यकारों के बीच में कोई नया लेखक कैसे जगह पाए, कैसे छपे ? यह स्थिति कहानी और कविता के साथ वैसी  नहीं थी।; क्योंकि कहानी -कविता एक पत्रिका में कई - कई छपा करतीं थीं जबकि व्यंग्य के लिए केवल एक रचना का ही कोटा ही सुनिश्चित था और तब व्यंग्य की स्वतंत्र कोई पत्रिका निकलती भी नहीं थी। अख़बारों और साहित्यिक पत्रिकाओं का ही सहारा था। ऐसी स्थिति में किसी पत्रिका में एक रचना का भी छप जाना एक नए लेखक के लिए बड़ी उपलब्धि होती थी ।

प्रश्न - फिर आपने इन स्थितियों का सामना कैसे किया और अपनी जगह कैसे बनाई ?

उत्तर - मैंने एक बार रवीन्द्रनाथ त्यागी जी को पत्र लिखा कि आप लोग सभी जगह काबिज हैं। अब बताइए हम लोग कहाँ छपे?  इस पर त्यागी जी का जवाब आया ‘तो विनोद तुम क्या चाहते हो, हम लोग मर जाए।’ बाद में शरद जोशी के इस सूत्र को ध्यान में रखा कि ‘लाल डिब्बे पर भरोसा रखो।’ यह मानकर मैं निरंतर रचनाएँ लिखता रहा और पोस्ट बॉक्स में डालता रहा । व्यंग्य को स्थापित करने में अखबारों की भूमिका बड़ी रही । प्रायः सभी अखबारों में व्यंग्य के स्तंभ छपा करते थे । कई ऐसे अखबार भी हैं, जो व्यंग्य के दैनिक स्तंभ भी छाप रहे थे। व्यंग्य के लिए ज्यादा स्कोप अखबारों में तब भी रहा और आज भी है बल्कि व्यंग्यकार बिरादरी को इन समाचारपत्रों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जो भले ही लेखकों को पारिश्रमिक नहीं देते हैं पर उन्हें छापते तो हैं।

प्रश्न - विनोद जी  क्या वजह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं की तुलना में व्यंग्य को अखबारों ने हाथों- हाथ उठाया?

उत्तर -  राजशेखर जी..  ऐसा है कि अखबार सामयिक घटनाओं को महत्त्व देते हैं और व्यंग्य भी सामयिक घटनाओं पर ज्यादा लिखे गए;  इसलिए अखबारों ने सामयिक संदर्भों वाले व्यंग्यों को ज्यादा तवज्जो दी । पत्रकारिता जगत को साहित्य की सभी विधाओं में व्यंग्य जो है अपने ज्यादा करीब लगता रहा । पत्रकारों को व्यंग्य अपनी बिरादरी का लेखन लगता रहा । व्यंग्य विचारों से साहित्यमुखी रहा;  लेकिन अभिव्यक्ति में पत्रकारिता के तेवर लिए रहा । यह कह सकते हैं कि व्यंग्य ने साहित्य और पत्रकारिता के बीच सेतु का काम किया! इसलिए अन्य विधाओं की तुलना में व्यंग्य में यह तत्परता ज्यादा देखी गई कि कभी भी वह साहित्य के टेबल से उठकर पत्रकारिता के डेस्क पर आ जाता है । फिर आधुनिक हिन्दी में गद्य- व्यंग्य अपने आरंभिक काल से ही पत्रकारिता के साथ रहा है। भारतेन्दु युग में ही सुगठित और सुचिंतित स्वरूप में लिखे जा रहे व्यंग्य के तमाम लेखक पत्र- पत्रिकाओं से जुड़े थे या स्वयं द्वारा सम्पादित पत्र निकाल रहे थे। वह अंग्रेजों का शासनकाल था,  तब उनकी व्यवस्था की खिंचाई करने ऐसे छद्म और वक्रोतिपूर्ण लेखन से व्यंग्य लिखे जा रहे थे कि हुक्मरानों को पता भी न चले और लेखन का उद्देश्य भी सार्थक हो जाए।

प्रश्न - आपने जब व्यंग्य लेखन प्रारंभ किया उस समय का परिदृश्य और आज जब आप एक स्थापित लेखक हो चुके हैं, तो आज के परिदृश्य - इनमें आप क्या अंतर देखते है ?

उत्तर - हिन्दी व्यंग्य में व्यंग्य के तीन कालखंड निर्धारित किए जा सकते हैं – पहला - कबीर युग, दूसरा - भारतेन्दु युग, और तीसरा परसाई युग । आलोचना शास्त्र की दृष्टि से यह मान्य हो या ना हो;  पर अपनी सुविधा की दृष्टि से हम ऐसा कुछ निर्धारित कर सकते हैं । इन तीनों कालखण्डों में एक समानता यह देखी गई कि इनमें व्यंग्य का विद्रोही रूप उजागर और स्पष्ट हुआ। इन तीनों कालखण्डों के प्रणेता अपने समय के बड़े एक्टिविक्ट कहे जा सकते हैं। ये बड़े प्रतिक्रियावादी रहे;  पर रचनात्मक और सुधारवादी रहे। अपने- अपने युग के साहित्यिक वैचारिक प्रवर्तक और प्रवक्ता रहे। इन्होंने केवल व्यंग्य को लिखा नहीं;  बल्कि व्यंग्य को सामाजिक जागरण के लिए एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल किया। भारतेंदु और परसाई ने पत्रिकाएँ भी निकाली और विभिन्न सामाजिक संगठनों से भी जुड़े और अपने विचारों को आंदोलन का बड़ा रूप दिया ।

इनमें व्यंग्य का उत्तर आधुनिक काल परसाई का रहा और हम सभी आज भी परसाई और उनके समकालीन लेखकों के प्रभाव में चल रहे हैं । व्यंग्य लेखन का रूप जो दिख रहा है उसमें हम आज भी परसाई और शरद जोशी की शैली adopt किए हुए हैं।  इस प्रभाव में हम लोगों की पीढ़ी में व्यंग्य के क्षेत्र में जो नाम उभरकर आए उनमें ज्ञान चतुर्वेदी का लेखन प्रतिनिधि लेखन रहा और वे समकालीन व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनके साथ कैलाश मण्डलेकर, गौतम सान्याल, प्रेम जनमेजय, रमेश सैनी, डॉ. रमेश तिवारी, गिरीश पंकज, वीरेंद्र सरल, राजशेखर चौबे जैसे कई नाम व्यंग्य साहित्य में उभरते रहे और आज भी सक्रिय हैं। नए लोग भी अच्छा लिख रहे हैं।

देखिए.. तब और अब के व्यंग्यकारों के विषय या उनके लक्षित क्षेत्र में ये अंतर रहा है कि परसाई- युग पराधीनता और स्वाधीनता का संधि-युग था । स्वतंत्रता के बाद के मोहभंग की स्थितयाँ इन रचनाकारों के लक्ष्य में रहीं। जनआकांक्षा के अनुकूल व्यवस्था न पाकर इनका विद्रोह जागा और व्यवस्था पर प्रहार किया। ज्ञान चतुर्वेदी के दौर के जो लेखक उभरकर आए वे बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के थे और इस समय वैज्ञानिक अविष्कारों के कारण आई सूचना एवं संचार-क्रांति बाजारवाद, जनाधिक्य, सार्वजनिक उद्योगों के बदले निजी उद्योगों और विशेषकर कॉरपोरेट घरानों के बीच जनता का धन धंसा देने की कोशिश, बैंकों से हजारों करोड़ का ऋण लेकर उद्योगपतियों के चंपत होने और देश से बाहर भागने जैसे आर्थिक हादसे, संस्कृति के सेक्सी हो जाने वाले खतरे जैसे कई क्षेत्र हैं जहाँ समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं उस पर बदलते राजनीतिक परिवेश में लेखकों बुद्धिजीवियों पर हमले व हत्याएँ ये सब चुनौतियाँ पनप रही हैं.. जो आज के व्यंग्य और कथालेखन के लिए बड़े मुफीद माल हैं। इन्हें लक्षित कर व्यंग्य लिखे गए और निरंतर लिखे जाने चाहिए।

प्रश्न - हिन्दी व्यंग्य को मध्य भारत के लेखकों ने अधिक अपनाया, इसका क्या कारण आप देखते हैं?

उत्तर- आपका यह प्रश्न सही है क्योंकि देश भर में होने वाले व्यंग्य के आयोजनों में मैं जहाँ भी गया, लोगों ने यह प्रश्न मुझसे किया.. और यह सही है कि यहाँ परसाई, शरद जोशी, अजातशत्रु लतीफ घोघी व्यंग्य के स्थापक लेखक हुए और भी कई लेखक हुए उनकी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। आज ज्ञान चतुर्वेदी यहाँ लिख रहे हैं।  संभवत: उसका कारण इसकी भौगोलिक स्थिति हो सकती है – यह क्षेत्र देश के बीचोंबीच स्थित होने से देश भर के लोगों का आगमन तुलनात्मक रूप से यहाँ अधिक होता रहा। भिन्न भाषा, भिन्न संस्कृति और भिन्न आचार व्यवहार मध्य भारत में विपुल मात्रा में उपस्थित हुआ और व्यंग्य ने इसी भिन्नता के बीच सेंध लगाई और अपने लिये व्यंग्य, हास्य, विनोद लेखन के लिए कच्चा माल हासिल किया।

प्रश्न - हिंदी साहित्य का जो आलोचना- जगत् है,  उसमें व्यंग्य का स्थान तो बड़ा गौण दिखाई देता है। क्या आलोचकों ने व्यंग्य को दोयम दर्जे का लेखन माना है या साहित्य नहीं मानकर इसे कुछ लेखकों का खिलंदड़ा या मसखरा पन मानते है ?

उत्तर -  दरअसल.. व्यंग्य की आलोचना के लिए जो मनीषा चाहिए या फिर जिस बौद्धिक मानसिक स्तर की तैयारी होनी चाहिए जैसा कि श्रीलाल शुक्ल का मानना है, उसका हिन्दी आलोचकों के पास बड़ा अभाव रहा है। एक कारण यह हो सकता है और दूसरा कारण ऐसे सांगठनिक आलोचक जो अपने को प्रतिबद्ध मानते है इन्होंने व्यंग्य को विधागत लेखन नहीं माना और इसलिए यह उनकी आलोचना के एजेंडे में कभी नहीं रहा। यह हिन्दी आलोचना का दुर्भाग्य रहा कि परसाई, शरद जोशी जैसे लेखकों ने आधुनिक हिन्दी साहित्य को जो एक नवोन्मेष दिया, उसे अपनी संकीर्ण आलोचना पद्धति में वे नहीं समझ पाए। परसाई ने व्यंग्य को शूद्र से क्षत्री बनाया था। उसे आलोचक फिर से शूद्र बना देने पर तुले रहते है। ले देकर परसाई ने व्यंग्य लेखन की एक सुव्यवस्थित परम्परा का निर्माण कर उसे समृद्ध किया था, जिसे परसाई के समकालीन व्यंग्यकारों ने इस परम्परा को और मज़बूत किया था। पर इन रचनाकारों के समकालीन आलोचकों ने साहित्य की एक नई विकसित होती परम्परा को धो डाला। उन्हें ये भी भान नहीं हुआ कि अपनी हेकड़ी में वे अनजाने ही एक नवोन्मेष को खत्म करने की नादानी कर रहे हैं।  उनकी आलोचना- दृष्टि परसाई की सुपुष्ट की हुई परम्परा के खिलाफ हो गई है। वे नहीं जान पा रहे हैं कि वे क्या कर रहे हैं!

परसाई व्यंग्य के प्रथम पुरुष हैं और वसुधा पत्रिका के संस्थापक रहे । यह विडम्बना है कि उनकी पत्रिका ने ही व्यंग्य रचनाओं को नहीं छापा । इन आलोचकों ने परसाई को भी व्यंग्यकार नहीं माना उन्हें निबंधकार, कहानीकार बताकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की। परसाई के लेखन को केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण माना;  क्योंकि उनके ज्यादातर लेखन का आधार मार्क्सवादी चिंतन था। शरद जोशी भी उनके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रहे;  क्योंकि शरद जोशी मार्क्सवादी नहीं थे। देहरादून में जब मेरी मुलाकात रवीन्द्रनाथ त्यागी से हुई, तब उन्होंने यह चौंकाने वाली टिपण्णी की कि परसाई अगर मार्क्सवादी नहीं होते, तो शरद जोशी व्यंग्य के टॉप पर होते ।’

हिन्दी साहित्य में गद्य- व्यंग्य के बहाने विधा की एक ऐसी नई प्रवृत्ति जन्म लेकर सुन्दर साकार रूप ग्रहण कर रही थी जो देश की अन्यान्य भाषाओं में दुर्लभ थी। इस नवोन्मेष का श्रेय हिन्दी जगत को मिलने जा रहा था। देश की अन्य भाषाएँ परसाई, शरद जोशी की रचनाओं और श्रीलाल शुक्ल के ‘रागदरबारी’ व मनोहर श्याम जोशी के व्यंग्य से लबरेज उपन्यासों जैसी अनमोल कृतियों को अभिभूत होकर अचम्भे से देख रहीं थी और अपनी भाषाओं में हिन्दी व्यंग्य की तल्खी और तेवर को आजमाने की कोशिश कर रही थी, पर संकीर्ण और किताबी दिमाग से भरी हिन्दी आलोचना ने सब गुड़- गोबर करके रख दिया। यह हमारी वीभत्स राजनीति से प्रेरित उसी तरह की पैंतरेबाज़ी है जिसमें एक पार्टी अपने गुणों का बखान तो कर नहीं सकती पर हाँ दूसरी पार्टी और उसके नेताओं की मिट्टी-पलीद तो कर सकती है। यहाँ भी कर दिया। अब ‘व्यंग्यालोचन’ की गेंद व्यंग्यकारों के पाले में है ,इसी आपाधापी में से ही कोई रास्ता निकले तो निकले।

विश्व आलोचना साहित्य में अंग्रेजी के हास्य-व्यंग्य लेखकों का बड़ा नाम और स्थान रहा है पर हिन्दी साहित्य और हिन्दी फिल्में दोनों ही जगह में हास्य और विनोद प्रियता को सतही और अगंभीर प्रदर्शन माना गया।

आपने जो खिलंदड़ेपन की बात उठाई यह भी व्यंग्य का दुर्भाग्य है कि व्यंग्य के गहन सामाजिक सरोकारों से उठकर पत्नी साली सास या स्त्री की दयनीय स्थितियों को लक्षित कर भोंडा उपहास आज भी किया जा रहा है! ऐसे लेखकों को छापने वाले संपादक भी दोषी हैं!

प्रश्न - विनोद जी व्यंग्य के अतिरिक्त आपने कहानी, यात्रा- वृतांत, उपन्यास भी लिखे और पुरस्कृत हुए पर इन रचनाओं में आपके व्यंग्य का प्रभाव नहीं दिखता ।

उत्तर - उपन्यास में तो है! दो उपन्यास हैं – चुनाव और भोंगपुर-30 कि.मी. ये दोनों ही व्यंग्य उपन्यास हैं और मुझे ज्यादातर पुरस्कार इन्हीं दो कृतियों पर मिले हैं। विगत दिनों अपने समग्र लेखन के लिए ‘सत्पर्णी सम्मान’ दिया गया। आपके  इस प्रश्न के जवाब में आप सम्मान पत्र में लिखी गई इन पंक्तियों को उद्धृत कर सकते हैं – “छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन श्री विनोद साव, दुर्ग को उनके सुदीर्घ साहित्यिक अवदान के लिए ईश्वरी प्रसाद मिश्र स्मृति सप्तपर्णी सम्मान 2018 प्रदान करते हुए आनंद का अनुभव करता है. सर्वप्रथम एक व्यंग्य लेखक के रूप में चर्चित व प्रशंसित होकर उन्होंने कहानी विधा की और रुख किया। इसके समानांतर यात्रावृत्तांत लेखन में भी उनकी रुचि जागृत हुई। इस तरह तीन विभिन विधाओं में समान गति से लिखते हुए उन्होंने अपने सामर्थ्य का परिचय दिया। उनकी कहानियों के विषय निरूपण में संवेदनशीलता व शैली में सरसता है, जबकि यात्रा विवरण में वे बारीक़ विवरणों में जाते हैं और सुन्दर कोलाज पाठकों के सामने रखते हैं।  सम्मेलन, श्री विनोद साव को शुभकामनाएँ देता है कि उनकी लेखनी इसी तरह सक्रिय बनी रहे। ”

 सम्पर्कः 295/ए, रोहिणीपुरम, रायपुर , मो. 9425596643

Sep 3, 2021

बातचीत- मस्तानी आवाज़ की मलिका "उल्लास की नाव" में

उषा उथुप, विकास झा और सृष्टि से एक खास बातचीत

 - रचना श्रीवास्तव 

हिन्दी फिल्म संगीत के स्वर्णिम इतिहास में किशोर, रफ़ी, मुकेश, लता और आशा जी का युग अद्भुत था और इन महान हस्तियों के बीच अपने आप को स्थापित करना एक दुरूह काम था। इतिहास गवाह है की वे संगीत के कई दशक अपने नाम कर पाए क्योंकि उन सबकी अपनी-अपनी विशेषता थी। रफ़ी साहेब जहाँ ऊँचे सुरों में बड़ी सहजता और मिठास से गाते थे, किशोर दा की गंभीर आवाज़ और उसका चुलबुलापन उनको अनोखा बनाता था और मुकेश जी की मीठी आवाज़ आत्मा तक पहुँचती थी। लता जी की शहद में डूबी आवाज़ और पक्के रागों में उनकी पारंगता, उनको विशेष बनाती थी और आशा जी, मस्ती भरे गानों की रानी थीं। ऐसे में कुछ नया लेकर आना और इन सबके बीच अपनी पहचान बना पाना बहुत मुश्किल था पर 1971 में एक फिल्म आयी "हरे रामा हरे कृष्णा" और इसका टाइटल सॉन्ग गाया, एक नयी गायिका ने, जिनका नाम था "उषा उथुप"। हरे रामा हरे कृष्णा, बहुत जल्दी सबकी ज़ुबान पर चढ़ गया और आरडी बर्मन की धुन और ऊषा जी की आवाज़ देश विदेश के लोगों पर सर चढ़कर बोलने लगी। इस आवाज़ में एक अलग बात थी और जो इस आवाज़ के दीवाने हुए, बस इसी आवाज़ के दीवाने बनकर रह गए। कभी-कभी मुझे लगता है की उषा उथुप लेडी किशोर कुमार हैं क्योंकि उनकी आवाज़ में वही रौब है, वही शरारत है और वही अल्हड़पन और मस्ती है। उषा जी का "हरे रामा हरे कृष्णा" से शुरू हुआ संगीतमय सफर, "शालीमार", "शान"  और सात खून माफ़ से अब तक ज़ारी है। उनके गानों की दीवानगी आज भी बदस्तूर ज़ारी है। हर कलाकार का जीवन विविध रंगों से भरा होता है और हम जितना जानते हैं, दरअसल वही पूरा सच नहीं होता। उषा उथुप को एक इंसान और एक कलाकार के तौर पर और बेहतर समझने का प्रयास किया विकास झा जी ने उनकी आत्मकथा "उल्लास की नाव" के द्वारा। उषा जी की आत्मकथा "उल्लास की नाव" के बारे में मैंने उषा जी और विकास जी दोनों से बात की। बड़ी दिलचस्प बातें हुईं और बड़ा मज़ा आया इन दोनों से बात करके और मैं वही आप सबसे बाँट रही हूँ-               

विकास जी, उषा जी पर किताब लिखने का विचार आपको कैसे आया ?

मैं किशोरावस्था से ही उषा जी के गाने सुनता था। उस समय मुझे यह नहीं पता था कि मैं एक पत्रकार बनूँगा। उषा जी मेरे लिए बहुत पहले से ही सम्मानीय थीं। उनकी ऊर्जा, उनके सुर मुझको बहुत ही प्रभावित करते थे। जब मैंने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा तो मुझे लगा कि मैं उनका एक लम्बा सा साक्षात्कार लूँ। मैंने कई बार उषा जी के ऑफिस में फ़ोन किया पर अंजन दा हमेशा फ़ोन उठाते और कहते "दीदी बिजी हैं' या कहते दीदी रिकॉर्डिंग में हैं। मैं कलकत्ता आता और हर बार निराश होता। हर बार उषा जी से मिलना नहीं हो पाता तब मैं किसी और का साक्षात्कार ले कर या कोई और स्टोरी लिख कर वापस चला जाता। ऐसा करते-करते २० साल निकल गए। इसी समय में मैंने बहुत सी किताबें लिखीं। एंग्लो इंडियन का एक गाँव है उन पर मैंने एक किताब लिखी "माक्सेके गंज"। इसके बाद मैं फिर एक बार कलकत्ता आया और फिर उषा जी के ऑफिस में फ़ोन किया। इस बार नोबिन दा ने फ़ोन उठाया। उनको मैंने अपने २० साल की दास्तान सुनाई। उन्होंने कहा कि आप दीदी का नंबर लीजिये और उनसे बात कर लीजिये। बस यहीं से प्रारम्भ हुआ लिखने का सिलसिला। यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा की भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है क्योंकि इस इंतजार के समय में मैंने जो किताबें लिखी उससे मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। मुझे लगा ३००-४०० पन्ने की किताब तो मैं लिख सकता हूँ और शायद यही कारण है कि मैं 'उल्लास की नाव' लिख सका।

उषा जी, जब विकास कुमार जी आपके पास आये और उन्होंने कहा कि वह आपकी जीवनी लिखना चाहते हैं तो आपकी क्या

उषा जी के साथ किताब के लेखक विकास झा

प्रतिक्रिया थी
?


विकास जी ने जब यह कहा तो मुझे बहुत ख़ुशी हुयी थी। जब विकास जी ने मुझे बताया कि वह पिछले २० सालों से मुझसे  मिलने की कोशिश कर रहे थे तो इस बात का मुझे बहुत दुःख हुआ। मैंने उनको सॉरी भी बोला क्योंकि मुझको तो मालूम ही नहीं था कि कोई लेखक मुझसे मिलने की कोशिश कर रहा है। क्या था कि उस समय मोबाइल नहीं होते थे, मात्र एक लैंड लाइन था तो उस समय जो भी वहाँ बैठता था वही फोन उठाता था। उस समय वहाँ पर अंजन दास जी रहे होंगे और उन्होंने ही फ़ोन उठाया होगा और बात मुझ तक नहीं पहुँचाया होगा। शायद उन्होंने अपने मन में ही सोच लिया होगा कि क्यों करना है इतना सारा इंटरव्यू और वो वहीं पर इनको मना कर देते होंगे। वैसे मैं ऐसी नहीं हूँ कि आप सिर्फ मेरे मैनेजर से ही बात करें पर मेरे सभी मैनेजर बहुत अच्छे रहे हैं। यहाँ मैं यह भी सोचती हूँ कि समय-समय की बात है, जब तक भगवान नहीं चाहते हैं तब तक कोई काम नहीं होता है।

उषा जी, किताब बनने की यह पूरी यात्रा कैसी रही?

इसकी पूरी यात्रा बहुत ही सुखद रही। जब मैं विकास जी से जुड़ी, उसके बाद हमारे साक्षात्कारों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। हमने बहुत से विषयों पर बात की और मुझे इस किताब पर बहुत गर्व है। शायद विकास जी को ऐसा नहीं लग रहा होगा जैसा मुझको लग रहा है क्योंकि मुझ जैसी साधारण गायिका की किताब आयी और वो भी हिन्दी में। मेरी किताब का हिन्दी में आना मेरे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात है।

विकास जी जब आपसे प्रश्न पूछ रहे थे तो जीवन का कौन सा ऐसा लम्हा था जिसको बताने में आपको कष्ट हुआ ?

मैं ५१ सालों से गा रही हूँ। बहुत से लोगों ने मेरा साक्षात्कार लिया है। बहुत सी बातें थीं जिनको मैंने किसी को नहीं बताया। परन्तु जब मैं इनके साथ बात कर रही थी तब बहुत सहज लगा। विकास जी मुझसे हिंदी में बात करते थे
, इनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। विकास जी नोटबुक निकालते थे और उस पर लिखते जाते थे। जब पहली मुलाकात हुई तो मैंने उनसे कहा क्या आप डिक्टोफोन में रिकॉर्ड करेंगे? तो इन्होंने कहा, नहीं मैं पूरा हाथ से लिखूँगा। उनकी बात सुन कर मुझको बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि मुझको भी लिखना बहुत अच्छा लगता है। कागज़ और कलम से मुझको बहुत प्रेम है। आजकल कोई नहीं लिखता तो मुझको इनका लिखना बहुत अच्छा लगा। साक्षात्कार के प्रारम्भ में बहुत ही उबाऊ हिस्सा आया जहाँ मैंने साधारण प्रश्न जैसे कब काम करना प्रारम्भ किया, कहाँ से काम करना प्रारम्भ किया, कैसे शुरू किया इत्यादि। फिर मैंने कहा कि क्या मैं उन विषयों पर भी बात करूँ जिन पर आज तक मैंने बात नहीं किया है? जैसे अपने व्यक्तिगत जीवन में या व्यवसायिक जीवन में किन संघर्षों का सामना किया है? मैं हमेशा कहती थी की नहीं मैंने नहीं किया है परन्तु कभी भी मैंने यह नहीं बताया कि पोलियो के बुखार के बाद मुझको बहुत परेशानी हुई थी। मुझे लकवा हो गया था। जिसको कहते हैं हैमिपैरासिस।

इस बारे में कोई नहीं जानता। बहुत से लोगों को अपनी परेशानियों के बारे मैं बात करना बहुत ही अच्छा लगता है परन्तु मुझको नहीं लगता हालाँकि मुझे बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा पर मैंने उन परेशानियों में भी अच्छाई ढूंढने की कोशिश की। जब आपकी कोई जीवनी लिख रहा हो तो सबसे महत्त्वपूर्ण होता है उस पर विश्वास करना। मैंने विकास जी से अनुरोध किया कि आप इसको सेंसेशनल नहीं बनाएँगे। मुझको सेंसेशनल बाते करना अच्छा नहीं लगता। मुख्यमंत्री जतिन चर्टजी ने मुझे गाने से बैन कर दिया था पर आप कभी नहीं देखेंगी कि मैंने कभी उस घटना के बारे में बात की हो पर विकास जी से मैंने सारी बातें की क्योंकि मैं उन पर विश्वास करती हूँ। जो भी आपकी जीवनी लिख रहा है उस पर आपको विश्वास होना चाहिए, उसका आदर करना चाहिए और उसको आपसे और आपको उससे ईमानदार होना चाहिए।

मैंने और मेरी बहन इन्दिरा ने एक ही परिवार में शादी की है पर मेरी शादी ठीक नहीं चली पर मैंने कभी इस बारे में बात नहीं की। मुझे अच्छा नहीं लगता है ऐसी बातें करना पर विकास जी से बात की मैंने। मुझे उनसे बात करना बहुत सहज लगा। इस किताब में उन्होंने मेरे पूरे परिवार के बारे में बहुत ही गहराई से लिखा है।

आप हिन्दी इतनी अच्छी कैसे बोल लेती हैं ?

मुझे भाषाएँ अच्छी लगती है। मैं मुम्बई मैं पली बढ़ी हूँ, वहाँ मेरी दूसरी भाषा हिन्दी थी और हमारी पड़ोसी थीं ज़मीला। उनसे भी मैंने बहुत सीखा। उनके साथ ही पली हूँ। उनके साथ रह कर मैंने बहुत उर्दू भी सीखी है।

विकास जी, उषा जी की हिन्दी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

इस विषय में मैं एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगा। "उल्लास की नाव" के विमोचन के लिए पटना में एक कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम के बाद इनके सम्मान में एक छोटी सी पार्टी रखी थी। उस पार्टी में बिहार के चीफ सेक्रेटरी त्रिपुरारि शरण जी भी आये थे और बोले आपकी किताब हिन्दी में आयी है तो आप एक कागज़ पर हिन्दी में मेरा नाम लिख दीजिये। क्योंकि जब आप किताब पर हस्ताक्षर कीजियेगा तो मेरा नाम सही लिखा हो इसलिए कह रहा हूँ। मैं सोच में पड़ गया कि पता नहीं उषा जी लिख पाएँगी या नहीं पर यकीन मानिए, उषा जी ने एकदम सही लिख दिया तो त्रिपुरारि जी ने कहा, वाह मान गया आपको उषा जी आपके चरण छूता हूँ। तो देखिये इनकी हिन्दी कितनी अच्छी है।

विकास जी, आपने अपनी किताब में अलग-अलग विषय लिया है और उसका शीर्षक बहुत ही सुन्दर दिया है। क्या आपने नाम देकर चैप्टर लिखा है या चैप्टर लिख कर नाम दिया है ?

जवाब में हँसते हुए वे पूछते हैं, ये बताइये, माता-पिता बच्चे का नाम उसके जन्म से पहले रखते हैं या बाद में? बाद में ही न? तो मैंने भी शीर्षक बाद में ही रखा था। हमारी किताब का एक विषय है "पतंग उड़ाती लड़की' आप शायद नहीं जानती होंगी की उषा जी पतंग उड़ाने में बहुत माहिर हैं।

आपने किताब का नाम 'उल्लास की नाव' कैसे सोचा?

मैंने उषा जी को दो नाम भेजे थे, "उल्लास की नौका" तथा "उल्लास की नाव" और इन्होंने तुरंत कहा बस "उल्लास की नाव" ही ठीक है और किताब का नाम "उल्लास की नाव" पड़ गया।

विकास जी, इस किताब की विशेषता क्या है ?

जब मैंने किताब लिखने का विचार किया था तो ऊषा जी को पहले ही कह दिया था आप बहुत बड़ी और मशहूर गायिका हैं और ये बात सबको मालूम है। आपके इतने सारे प्रशंसक हैं और लोग यह जानते हैं इसलिए यदि यही मैं भी लिखूँ तो कोई खास बात नहीं होगी। लोगों को कमल में रूचि नहीं होती। उनको जानना होता है कि यह कमल जो खिला है उसके नीचे कितना कीचड़ है। कहने का मतलब यह कि जो कमल खिला है उसका संघर्ष कहाँ से प्रारम्भ हुआ है। मैंने उषा जी से यह भी कहा था कि आम तौर पर जीवनी एक अभिनन्दन ग्रंथ बन जाता है। मैंने कहा था कि मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। यदि आप इस बात के लिए राजी हैं कि इसमें उस कीचड़ की बात आये और इस कमल के संघर्ष की कहानी आये तो ही मैं इसको लिखूँगा। ऊषा जी बहुत ही ईमानदार हैं, उन्होंने मेरी बात के बारे में सोचा और फिर कुछ दिनों बाद मुझसे कहा कि मैं बहुत परेशान हूँ। तो मुझको लगा क्या मैंने कोई ऐसा प्रश्न पूछ लिया जो मुझको नहीं पूछना चाहिए था, क्या मुझसे कोई गलती हो गयी? तब इन्होंने कहा, नहीं आपसे कोई गलती नहीं हुई है और इसके बाद उषा जी ने ऐसी-ऐसी बातें बताई जो उन्होंने कभी किसी भी साक्षात्कार में नहीं कहा और वे सारी दुर्लभ बातें इस किताब में हैं। उषा जी ने सारी बातें खुल कर मुझको बताया और कहा कि यह अब आप पर है कि अब आप इसको कैसे लिखते हैं।

कुछ खट्टी-मीठी बातों का पिटारा है ये किताब मसलन इनके घर के प्रांगण में एक अमरुद का पेड़ था। उषा जी जब स्कूल से लौटती थीं तो घर से तकिया लाकर, अमरुद की जो वी बनाती हुयी डाल होती है उस पर लेट कर कॉमिक्स पढ़ती थीं। इसमें उषा जी से जुड़े सभी चरित्रों की कथा है और जब उन सब को आप जोड़ेंगे तो उषा जी की जीवनी बन जाएगी। इसमें जानी उथुप, ब्रिग्रेडियर उथुप, सासु माँ हैं, तुलसी अम्मा, हम्बी मामा, मद्रास पातुबा और मामा बलराम नादर इत्यादि सभी लोगों के बारे में लिखा है। मेरे लिए यह सभी लोग उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी की उषा जी। एक चिन्नी का चरित्र है जो उस समय मालगोट सिगरेट पीती थी और कहानियाँ सुनाती थीं। उषा जी बताती हैं कि वह उनके ननिहाल में आतीं थीं, उषा जी छोटी सी थीं और जब चिन्नी सिगरेट का छल्ला बनाती थीं तो ऐसा लगता था कि कहानी वहीं से निकल रही है और चिन्नी हर बार नयी कहानी सुनाती थी। उषा जी के गाने नौजवानों को बहुत पसंद हैं और उन नौजवानों में मैं भी था और इनके तराने गाते गाते मैंने "उल्लास की नाव" लिख दी।

अभी आपने "पतंग उड़ाती लड़की" के बारे में कुछ कहा था, उसके बारे में कुछ बताइये।

उषा जी पतंग का माँझा बनाने में बहुत उस्ताद हैं। उषा जी के पिता स्वर्गीय बैद्यनाथ सोमेश्वर स्वामी जी पुलिस कमिशनर थे। जिनका बहुत बड़ा बंगला था। दोपहर में जब सभी लोग सोते थे तो उषा जी अपने भाई बहनों के साथ खेलती थीं और घर में से कोल्ड ड्रिंक्स की काँच की बोतल को ला कर पीस कर उसका चूरा बनाती थीं, उसको धागे पर घिसती थीं। "नेवर नो हाउ मच आई लव यू" ये उषा जी का गाना है जिसे उन्होंने मद्रास में गाया था। वह इनका शुरूआती दौर था और उसी को लेकर यह चैप्टर बना।

उषा जी, आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगी ?

जी विकास जी सही कह रहे हैं। मेरे जैसा माँझा कोई नहीं बना सकता था। मैं काँच को चूरा बना के उसको मैदे के साथ मिला कर धागे पर घिसती थी। मेरे भाई कहते थे कि एक चरखी भर का माँझा बन गया और बनाओ। मेरे द्वारा बनाये गए माँझे से सारी पतंग कट जाती थी। सोच के देखिये क्या आज की कोई माँ अपने बच्चे को माँझा बनाने देगी?

उषा जी, "मल्लिगई पू मल्लिगई पू" एक चैप्टर है इसके बारे में कुछ बताइये।

"मल्लिगई पू" तमिल शब्द है। मेरा पहला तमिल गाना है पर है वो इंग्लिश में '
उषा जी के साथ सृष्टि झा
अंडर द मैंगो ट्री।।।।स्वीट मल्लिगई पू" बस इसी के
  नाम पर इस चैप्टर का नाम है। मल्लिगई का मतलब होता है मोगरा/बेला और पू का मतलब होता है फूल।

उषा जी, इस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद भी हो रहा है क्या आप उसके बारे मैं कुछ बताना चाहेंगी ?

जी हाँ इस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद विकास जी की बेटी सृष्टि करने जा रही हैं। जब मैं पहली बार इनकी बिटिया से मिली तो मुझे बहुत अच्छा लगा और उसका नाम भी बहुत अच्छा लगा। आगे की बात सृष्टि आपको बताएंगी-

सृष्टि, इस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए किस बात ने आपको प्रेरित किया ?

जब मेरे पापा कोई चैप्टर समाप्त करते थे तो मुझको पढ़ने के लिए देते थे तो यह कहना गलत न होगा कि मैंने इस किताब को सबसे पहले पढ़ा है। मैं उषा जी की कहानी सुनती थी और मुझको इससे लगाव हो गया था। जब मैं पहली बार उषा दीदी से मिली तो ऐसा लगा कि एक दोस्त हैं। हम दोनों में उम्र का बहुत अन्तर है पर यदि आप हमको साथ देखेंगी तो लगेगा की दो सहेलियाँ हैं। जब इस किताब का प्रचार हो रहा था तो उसी समय इस किताब के अंग्रेजी अनुवाद की चर्चा शुरू हो गयी थी। एक दिन मैं अपने कार्यालय से वापस आ रही थी तो मैंने पापा को कॉल किया और कहा कि मैं इस किताब का अनुवाद अंग्रेजी में  करना चाहूँगी। मुझे पापा के लिखने के तरीका का पता है तो मुझे लगा कि इस किताब की खुशबू बची रहे और अनुवाद भी हो जाये इसलिए मैंने "उल्लास की नाव" का अनुवाद करने का सोचा। जब मैं इसका अनुवाद कर रही थी तो पढ़ कर अकेले में हँसती थी।

अंग्रेजी की किताब का शीर्षक क्या होगा ?

जी अभी इस बारे में बात चल रही है। कुछ निर्णय नहीं लिया है परन्तु "उल्लास की नाव" के आस पास ही कुछ होगा।

उषा जी, "उल्लास की नाव" पढ़ने के बाद आपको लोगों की क्या प्रतिक्रिया मिली ?

बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया मिली। मेरे ज्यादातर लोग अंग्रेजी बोलने वाले हैं पर मेरे ऐसे दोस्त जो हिन्दी जानते हैं उन्होंने यह किताब पढ़ी और बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि किताब पढ़ कर उनको बहुत कुछ पता चला। उनको यह नहीं मालूम था कि मैं ब्राह्मण परिवार से आयी हूँ। मैं सभी भाषाओँ में गाने गाती हूँ तो उनको पता ही नहीं चलता था कि मैं कहाँ से हूँ। लोगों ने यह भी कहा की किताब का वह हिस्सा जहाँ मेरे ग्रैंडपैरंट्स के बारे में बाते की गयीं हैं उनको बहुत अच्छा लगा। एक व्यक्ति ने लिखा कि वो अपनी दोस्त के साथ मेरा शो देखने आता था। उस समय उनकी शादी नहीं हुई थी पर आज उनके पोते-पोतियाँ है। उन्होंने लिखा कि आपके संगीत के कारण ही हम इतने पास आये थे।

विकास जी, आपकी भाषा शैली बहुत ही प्रवाहवान है। उषा जी की जीवन इतनी सहजता से लिखना कितना आसान था और कितना कठिन?

भाषा के सन्दर्भ में मैं ऐसा मानता हूँ कि यह नदी-नाव संयोग है क्योंकि उषा जी का पूरा व्यक्तित्व बहुत अद्भुत है। मेरा उपन्यास है "मैकलेकसी गंज" उसमें भाषा कल्प कुछ अलग है। कर्नाटक के एक गाँव की कहानी है जिसमें भाषा एकदम विभिन्न है। एक लेखक के रूप में मेरा मानना है कि जो भी विषय होता है, उसके हिसाब से ही भाषा अपने रूप बदलती है।

"उल्लास की नाव- भाग २" लिखने का विचार है क्या ?

मैं तो उषा जी के लिए कहता  हूँ  जीवेत् वर्षम् शतम्। उषा उथुप जी १०० वर्ष की हों और मैं भी इस दुनिया में रहूँ कि भाग-२ लिख सकूँ:)

बस इसी अनुरोध के साथ बातचीत का सिलसिला यही रुकता है की आप सब पाठक "उल्लास की नाव" में आप एक बार ज़रूर बैठिये और कौन जाने, इसी नाव का एक यात्री, एक और उषा उथुप बनने के गुर सीख जाएँ! 

Aug 13, 2020

इम्यूनिटी बढ़ाने का नया धंधा

इम्यूनिटी बढ़ाने का नया धंधा
डॉ. सत्यजित रथ से साक्षात्कार
आजकल इम्यूनिटी को लेकर बहुत चर्चा है। काढ़ों, विभिन्न इम्यूनिटी उत्पादों के अलावा लगभग सारे पोषण-पूरकों में इम्यूनिटी शब्द जुड़ गया है। सारे मामले को समझने के लिए स्रोत ने प्रतिरक्षा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. सत्यजित रथ के सामने कुछ सवाल रखे। प्रस्तुत है उन सवालों के जवाब डॉ. रथ की ज़ुबानी...। सवालों का जवाब देने से पहले डॉ. रथ ने समस्या की पृष्ठभूमि स्पष्ट की।
आजकल भारत की सड़कों-गलियों का आम नज़ारा देखिए। हम दुकानों पर भीड़ लगा रहे हैं, धक्का-मुक्की कर रहे हैं और मास्क नहीं पहन रहे हैं। कभी-कभार मास्क को गले में पट्टे की तरह ज़रूर डाल लेते हैं। हम उन बातों पर बिलकुल कान नहीं दे रहे हैं, जो कोविड-19 के लिए ज़िम्मेदार वायरस SARS-CoV-2 के प्रसार को थाम सकती हैं और गंभीर रूप से बीमार लोगों की संख्या को कम कर सकती हैं। शारीरिक दूरी (सामाजिक दूरी नहीं), नाक-मुँह को ढँकना और बार-बार साबुन से हाथ धोना इस महामारी के दौरान कुछ सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिन्हें हम नहीं निभाते।
इसके बजाय हम क्या करते हैं? हम डरे हुए हैं कि ‘हम’, ‘मैं’ कोरोना के संपर्क में आ गया, तो बीमार होकर मर जाऊँगा। यानी हम संसर्ग (छूत) के विचार को उसके सामुदायिक संदर्भ से काटकर एक व्यक्तिगत भय में बदल देते हैं। हम हर उस चीज़ का ‘शुद्धीकरण’ करते हैं जिसे हम छूते हैं (जिसकी हमारे यहाँ परम्परा भी रही है), और हम खुद को और अपने साज़ो-सामान को ऐसी जादुई चीज़ों से नहलाते हैं, जो हमें व्यक्तिगत रूप से ‘सुरक्षित’ रखेंगी।
हमने निर्णय कर लिया है कि बाज़ार हमें बचाएगा। हमने निर्णय कर लिया है कि हममें से प्रत्येक को खुद को बचाना है और इसके लिए हमें बाज़ार से कोई जादू खरीद लेना है। हमने तय किया है कि ‘औरों’ या ‘अन्य लोगों’ को बचाना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है। हमने निर्णय किया है कि वास्तव में ‘अन्य लोग’ ही इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे गंदे और फूहड़ ‘अन्य’ हैं जो ‘हमारी’ तरह नहीं हैं। हम सचमुच ‘हममें’ से उन संक्रमित ‘बदनसीबों’ की परवाह करने की बजाय उनको बहिष्कृत कर देते हैं। यह वह पृष्ठभूमि जिसमें हमें ‘इम्यूनिटी वर्धकों’ की महामारी पर गौर करना होगा, जो हमें घेर रही है - जीवन शैली सम्बंधी उपदेशों के रूप में भी और उत्पादों के रूप में भी। तो कुछ सवालों के जवाब देकर बात को आगे बढ़ाते हैं।
सवाल- क्या इम्यूनिटी नाम की कोई एक सामान्य चीज़ है? या क्या समस्त इम्यूनिटी किसी सूक्ष्मजीव के लिए विशिष्ट होती है? आप इम्यूनिटी को मात्रात्मक रूप में कैसे परिभाषित करेंगे?
जवाब- सबसे पहले तो यह समझ लें कि शरीर का कोई एक हिस्सा नहीं है, जिसे इम्यूनिटी कहा जा सके। वास्तव में शरीर के कई हिस्से कई अलग-अलग ढंग से सूक्ष्मजीवों द्वारा प्रस्तुत चुनौती की प्रतिक्रिया देते हैं और इन सारे किरदारों के सामंजस्य का परिणाम होता है इम्यूनिटी। ये सारे किरदार अपना-अपना काम करते हैं। यानी इम्यूनिटी एक जुगाड़ू परिणाम है जो समन्वय से उभरती है, न कि पहले से निर्धारित कोई योजना होती है जिसे निष्ठापूर्वक क्रियांवित किया जाता है।
एक उपमा से शायद मदद मिले। किसी संगीत कार्यक्रम की उपमा से।
सुर बाँधने के लिए एक तानपुरा होता है। हो सकता है बीच-बीच में वह थोड़ा ज़ोर से या धीमे बजे और ऐसा होने पर गायक/वादक मुस्कराकर उसका स्वागत करेगा या भवें तान लेगा। थोड़े फेरबदल से वह तानपुरा नाटकीय परिवर्तन पैदा करेगा या माहौल को बरबाद कर देगा।
फिर तबला होता है, जो रफ्तार को पकड़ता है। एक ओर तो वह गायक की गति से तालमेल रखता है;  लेकिन बीच-बीच में अपना खेल भी दिखाता है। यदि इसे हटा दीजिए ,तो संगीत का पूरा परिदृश्य ही बदल जाएगा, चाहे गायक वही रहे।
गायक तो किसी राग की जोड़-तोड़ कर रही है, एक ऐसे ढाँचे पर जो उसके दिमाग में है। तानपुरा सुर का ख्याल रखता है और तबला रफ्तार का। लेकिन दोनों को ही पता नहीं कि गायक क्या कोशिश कर रही है और गायक को भी अंदाज़ नहीं है कि आज की महफ़िल में क्या सामने आने वाला है। वह तो आगे बढ़ते-बढ़ते जुगाड़ करती है, खुद को सुनती है, तानपुरे, तबले को सुनती है, मौसम और श्रोताओं को सुनती है, परिस्थिति की बारीकियों को सुनती है। राग के अनुशासन के तहत उसका संगीत इन सारे ‘उद्दीपनों’ से आकार पाता है।
इम्यूमिटी नामक शारीरिक प्रतिक्रिया भी इसी तरह पैदा होती है। एक ही संक्रमण में, कोशिकाएँ और अणु अलग-अलग उद्दीपनों को पहचानते हैं और अपने विशिष्ट तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। ये प्रतिक्रियाएँ एक-दूसरे में गूँथ जाती हैं, एक-दूसरे को तीव्र-मंद करती हैं, बदलती हैं और जो कुछ उभरता है वह इम्यून प्रतिक्रिया होती है। यह शरीर का एक तरीका है अंदर वाले सूक्ष्मजीव से निपटकर जीवित रहने का।
इनमें से कुछ कोशिकाएँ और अणु उद्दीपनों और ट्रिगर्स को पहचानते हैं और उन पर प्रतिक्रिया देते हैं। इनमें से कुछ उद्दीपन कई सारे सूक्ष्मजीवों, वायरसों और बैक्टीरिया में एक जैसे होते हैं। ये अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ अपने-आप में भी एक किस्म की इम्यूनिटी होती हैं। बहुत बढ़िया नहीं, लेकिन ठीक-ठाक तो होती हैं।
गायक अलग ढंग से प्रतिक्रिया देता है। वह कुछ आज़माइशी स्वरों से शुरू करता है, ताकि वह देख सके कि सब कुछ ठीक तरह से चल रहा है और इसके आधार पर वह उस बुनियादी संगीत को आकार देता है, जो वह निर्मित करने वाला है। लेकिन फिर वह आसपास नज़र दौड़ाता है (या अपने अंदर झाँकता है) और अपने संगीत को आकार देना शुरू करता है, हौले-हौले लेकिन बढ़ते आत्म-विश्वास और जटिलता के साथ। यह संगीत उस विशिष्ट मौके के लिए, वहाँ उपस्थित श्रोताओं के लिए और उस स्थान-विशेष के लिए होता है।
शरीर की कुछ कोशिकाएँ प्रवेश करने वाले सूक्ष्मजीव के विशिष्ट खंडों को, सिर्फ उस विशिष्ट सूक्ष्मजीव या उसके निकट सम्बंधियों पर उपस्थित आकृतियों को पहचानती हैं। पहचानने के बाद वे प्रतिक्रिया देती हैं;  लेकिन प्रत्येक आकृति जैसे लक्ष्य को पहचानने वाली कोशिकाओं की संख्या बहुत कम होती है। लिहाज़ा उनकी पहली सार्थक प्रतिक्रिया यह होती है कि वे बार-बार विभाजन करके अपनी संख्या बढ़ाती हैं और जब उनकी संख्या बढ़ती है । वे परिपक्व होती हैं, तो वे विशिष्ट रूप से उस आकृति (जिसने उन्हें जन्म दिया था) पर केंद्रित कामकाजी प्रतिक्रिया हासिल करके उसका क्रियान्वयन करती हैं। ये प्रतिक्रियाएँ शरीर को सूक्ष्मजीव से निपटने में मदद करती हैं। किसी गायक के समान ही ये कोशिकाएँ भी अपनी प्रतिक्रिया को उस मौके, उस स्थान और उस सूक्ष्मजीव के अनुसार आकार देती हैं। वे अनुकूलन करती हैं;  लेकिन उन्हें तानपुरा-तबला कोशिकाओं की मदद लगती है , ताकि वे अपने परिपक्व होते संगीत के बारे में जटिल निर्णय कर सकें और खुलकर पेश कर सकें।
तो क्या इम्यूनिटी नाम की कोई सामान्य चीज़ है? अपने संघटन में तो नहीं, सिर्फ उसके उभरते प्रभाव के रूप में होती है। क्या सारी इम्यूनिटी किसी सूक्ष्मजीव के लिए विशिष्ट होती है? जवाब हाँ भी है और नहीं भी। जो प्रतिक्रियाएँ मिलकर इम्यूनिटी का निर्माण करती हैं, उनमें से कुछ अन्य की अपेक्षा ज़्यादा विशिष्ट होती हैं;  लेकिन वास्तविक इम्यूनिटी तब प्रकट होती है, जब ये सब मिलकर काम करते हैं।
सवाल- क्या इम्यूनिटी को नापा जा सकता है? यदि हाँ, तो कैसे? और यदि नहीं, तो आप ऐसे उत्पादों की बात कैसे कर सकते हैं जो इम्यूनिटी बढ़ाने का दावा करते हैं? क्या कुछ ऐसे रसायन हैं जो प्रामाणिक इम्यूनिटी-वर्धक हैं? और इम्यूनिटी का सामान्य पोषण की हालत से क्या सम्बन्ध है?
जवाब-  हमने यहाँ जिस तरह की इम्यूनिटी की बात की है, उसे नापेंगे कैसे? ज़ाहिर है, ऐसा कोई इकलौता आसान माप नहीं हो सकता जिसका कोई वास्तविक अर्थ हो। हम यह नाप सकते हैं कि सारे घटक मौजूद हैं या नहीं। अधिकतर लोगों में ये मौजूद होते हैं। हम यह भी मापन कर सकते हैं कि क्या ये घटक एक सामान्य रूप में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। अधिकतर लोगों में ये करते हैं। लेकिन ये माप हमें यह नहीं बताएँगे कि क्या वास्तविक इम्यूनिटी उभरेगी। इस बात का अंदाज़ लगाने के लिए हमें यह देखना होगा कि क्या शरीर ने वास्तव में अतीत में कतिपय विशिष्ट सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध प्रतिक्रिया दर्शाई थी। क्या हमें ऐसी विगत इम्यूनिटी के अवशिष्ट प्रमाण मिल सकते हैं? अधिकतर लोगों में मिल सकते हैं।
क्या लोगों के बीच इन मापों में छोटे-मोटे अंतर दिखते हैं? क्या इन अंतरों का विभिन्न सूक्ष्मजीवों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं में कोई उल्लेखनीय असर दिखता है। हाँ; लेकिन क्या हम यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि इम्यूनिटी के इन तरह-तरह के मापों में अंतरों का किसी विशिष्ट सूक्ष्मजीव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया पर क्या असर पड़ेगा? नहीं। जैसा कि ऊपर संगीत के रूपक में बताया गया था, इसके बारे में अटकल लगाना भी लगभग असंभव है, निश्चित भविष्यवाणी तो दूर की बात है। यह बताना असंभव है कि इनपुट (यानी सूक्ष्मजीव) के कौन-से कारक इम्यूनिटी के परिणाम को बदल देंगे और वह बदलाव क्या होगा। दरअसल, ऐसी परिस्थिति में, यदि हम इम्यूनिटी के एक घटक को ‘समृद्ध’ करें, ‘बढ़ावा दें’ तो परिणाम ‘अलग’ होगा, ज़रूरी नहीं कि वह ‘बेहतर’ हो या ‘बदतर’ हो। तबला वादक बदल दीजिए और गायक की आवाज़ महफिल में एक अलग संगीत पैदा करेगी। शायद कुछ लोगों को बेहतर लगे, कुछ को नहीं।
यही हाल इम्यूनिटी के परिणाम का भी होगा, जो परिस्थिति-विशेष पर निर्भर करेगा। तो, जी नहीं, हम किसी भी विवेकशील अर्थ में इम्यूनिटी बढ़ाने की बात नहीं कर सकते। और यदि हम सार्थक ढंग से यह बात नहीं कर सकते, तो इम्यूनिटी बढ़ाने का दावा करने वाले उत्पादों के बारे में क्या कहा जाए? ऐसे अधिकतर इम्यूनिटी वर्धक उत्पाद दरअसल कुछ नहीं करते, अर्थात् इनका इम्यूनिटी के घटकों पर कोई असर नहीं होता, स्वास्थ्य पर लाभदायक असर की तो बात ही जाने दें।
तो ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं, ‘गनीमत है’;  क्योंकि यदि इन उत्पादों का इम्यूनिटी के घटकों पर सचमुच कोई असर होता, तो वह एक बड़ी समस्या होती। परिणामों को अच्छा या बुरा कहना तो आपके नज़रिए पर है। देखा जाए, तो इनमें से अधिकतर उत्पाद फील-गुड-विज्ञापन वाले उत्पाद हैं, जिन पर हम सिर्फ इसलिए भरोसा करते हैं ; क्योंकि हमने उनका दाम चुकाया है। यह भरोसा सच्चे उपभोगवादी पूँजीवाद के शिकार की निशानी है।
क्या हमें परेशान होना चाहिए कि लोग इन पर भरोसा करते हैं? क्या हमें चिंतित होना चाहिए कि लोग ऐसी चीज़ों पर विश्वास करते हैं, जिन्हें अंधविश्वास कहते हैं?
शायद नहीं, हम सबको जीते रहने के लिए, अपने मस्तिष्क की निजता में, तरह-तरह के सहारों की ज़रूरत होती है। लेकिन क्या उपभोगवादी पूँजीवादी ढाँचा चिंता का विषय नहीं होना चाहिए,  जो अनैतिक मुनाफ़ाखोरों को प्रोत्साहित करता है कि वे हमारी हताशाओं से पैसा कमाएँ? तो क्या ऐसा कुछ नहीं है जिसे खाकर/पीकर/करके हम अपनी इम्यूनिटी को समृद्ध कर सकें? ज़रूर है;  लेकिन वह नहीं है,  जिसके बारे में हम अब तक सोचते रहे हैं।
कुल मिलाकर, इम्यूनिटी के जिन घटकों की बात हम करते आए हैं, वे हमारे शरीर की कोशिकाएँ और अणु हैं। शरीर के किसी भी अन्य हिस्से की तरह ये भी तभी विकसित होते हैं और काम करते हैं, जब सूक्ष्म पोषक तत्त्व और विटामिन्स सहित अच्छा और संतुलित पोषण मिले, जब विषैले पदार्थों से अपेक्षाकृत मुक्त साफ़ कुदरती पर्यावरण हो, जब एक ऐसा समर्थक सामाजिक माहौल हो जिसमें हम काम करें, खेलें, एक-दूसरे के साथ दोस्ताना सम्बन्धों में जिएँ, और अपने-आप में मूल्यवान् महसूस करें। क्या यह ज़रूरी नहीं कि हम सब मिलकर काम करें कि यह सब, सबको, हर जगह उपलब्ध हो सके।
इन बातों पर आम प्रतिक्रिया होती है: ये सब अव्यावहारिक आदर्शवादी बातें हैं। आप तो यह बताइए कि जिस विकट परिस्थिति में हम फँस गए हैं (कोई नहीं कहेगा कि हमने खुद को फँसा लिया है) उसमें इम्यूनिटी को लेकर क्या किया जा सकता है। इस सवाल एकमात्र व्यावहारिक जवाब यह है कि यथासंभव अच्छे से खाएँ।
दुख की बात तो यह है कि उपभोक्ता पूँजीवाद हमारे लिए वास्तविक किफ़ायती भोजन से विटामिन और खनिज तत्त्व प्राप्त करना असंभव बना देता है। हममें से जो लोग इनका खर्च उठा सकते हैं, वे ये चीज़ें पूरक गोलियों के रूप में ले लेते हैं।
ऐसे पूरकों के बारे में भी एक सावधानी रखना ज़रूरी है। हर चीज़ की अति नुकसान कर सकती है। जैसे नमक अच्छा है, किंतु इसकी अधिकता शरीर के लिए समस्याएं पैदा कर सकती है। यही बात विटामिन व खनिज तत्वों पर भी लागू होती है। यह बात खास तौर से उन चीज़ों के बारे में सही है, शरीर जिनका संग्रहण करता है। जैसे विटामिन ए व डी का संग्रहण वसा में होता है। इसलिए सरल पूरकों के मामले में भी अति करना संभव है।
अलबत्ता, शरीर के ‘प्रतिरक्षा तंत्र’ के संदर्भ में इन सामान्य बातों में भी एक दिलचस्प पेंच है। शरीर के जिन घटकों की प्रतिक्रियाएँ अंतत: ‘इम्यूनिटी’ के रूप में प्रकट होती हैं, वे थोड़े विचित्र हैं। कारण यह है कि वे सूक्ष्मजीवों को पहचानकर प्रतिक्रिया देते हैं। सूक्ष्मजीव हमेशा तो शरीर में उपस्थित नहीं होते। विभिन्न सूक्ष्मजीव शरीर में आते-जाते रहते हैं और बार-बार ऐसा करते हैं। और जब वे शरीर में आते हैं, तो सूक्ष्मजीव अचानक पूरे शरीर में नहीं पहुँच जाते। वे शरीर के किसी हिस्से में, त्वचा के किसी बिंदु पर प्रवेश करते हैं। जैसे जहाँ घाव हो, या नाक में साँस के साथ, खानपान के साथ आँतों में। इस वजह से इम्यूनिटी के घटक ज़बर्दस्त यात्री होते हैं। वे हर समय, पूरे शरीर में भटकते रहते हैं, धक्कामुक्की करते हुए। और ऐसा करते हुए वे लगातार ‘ऑफ’ और ‘ऑन’ के बीच डोलते रहते हैं- जब कोई सूक्ष्मजीव न हो, तो वे ‘ऑफ’ रहते हैं और जब वे स्थानीय स्तर पर सूक्ष्मजीव से टकराते हैं, तो ‘ऑन’ होकर प्रतिक्रिया देते हैं। यह कोशिकाओं पर लगातार बदलते दबाव का द्योतक है। तब कोई अचरज की बात नहीं कि प्रतिरक्षा कोशिकाएँ इस गहमा-गहमी के जीवन में काफी क्षतियाँ-चोटें झेलती हैं और मर जाती हैं। इसका मतलब है कि शरीर को नई-नई प्रतिरक्षा कोशिकाएँ और अणु बनाने पड़ते हैं (और बनाता भी है)। यह, उदाहरण के लिए, मस्तिष्क की कोशिकाओं से काफी अलग है। मस्तिष्क की कोशिकाएँ इतनी जल्दी-जल्दी प्रतिस्थापित नहीं होतीं। लेकिन शरीर का अस्तर बनाने वाली कोशिकाएँ भी ऐसी ही होती हैं, जैसे त्वचा की कोशिकाएँ या वायु मार्ग, आँतों के अस्तर की कोशिकाएँ या लाल रक्त कोशिकाएँ जो पूरे शरीर में भटकती रहती हैं और ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन करती हैं। ये भी लगातार जल्दी-जल्दी प्रतिस्थापित होती हैं।
इसका मतलब है कि लगातार प्रतिस्थापन के लिए पोषण की ज़रूरतें काफी अधिक होती हैं। जैव विकास के लंबे दौर में शरीर में ऐसी क्रियाविधियाँ विकसित हुई हैं जो यह सुनिश्चित करती हैं कि भोजन के अभाव के समय भी इन कोशिकाओं का ठीक-ठाक रख-रखाव होता रहे। लेकिन यह बात प्रोटीन और कार्बोहायड्रेट जैसे स्थूल पोषक तत्त्वों पर ज़्यादा लागू होती है, ‘सूक्ष्म पोषक तत्त्वों’ पर नहीं। हम नहीं जानते कि यह फर्क क्यों पैदा हुआ होगा। लेकिन जादुई इम्यूनिटी-बूस्टर औषधियों के प्रवर्तकों के विपरीत हम तो बहुत कुछ नहीं जानते।
अलबत्ता, इम्यूनिटी की इस निजी सम्पत्ति अवधारणा की परीकथाओं से आगे बढ़कर थोड़ी ज़्यादा पेचीदा व दिलचस्प यह बात करते हैं कि कैसे व्यक्ति और समुदाय उन्हें संक्रमित करने वाले सूक्ष्मजीवों के साथ सुरक्षात्मक सामंजस्य बनाते हैं।
सवाल- आप किसी रोगजनक के प्रति इम्यून कैसे हो जाते हैं? क्या ऐसा हर व्यक्ति में होगा? क्या इम्यूनिटी एक से दूसरे व्यक्ति में प्रेषित की जा सकती है? कोई समुदाय इम्यूनिटी कैसे हासिल करता है?   
जवाब- हम किसी रोगजनक के प्रति इम्यून कैसे हो जाते हैं? एक उदाहरण लेकर बात करते हैं - जैसे SARS-CoV-2 और कोविड-19। यहाँ यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि मानव शरीर और संक्रमित करने वाले सूक्ष्मजीव की अंतर्क्रिया के बारे में ‘लड़ाई’ जैसी उपमा का उपयोग न करना बेहतर है। कई बार शरीर किसी वायरस को बर्दाश्त कर लेता है। कई बार वायरस शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने की बजाय उनके हमसफर बन जाते हैं, और कई बार शरीर की प्रतिक्रिया वास्तव में वायरस संक्रमण से ‘लड़ती’ नहीं है।
इतना कहने के बाद, वायरस संक्रमण को सीमित रखने के लिए शरीर के पास तीन प्रमुख तरीके होते हैं।
प्रत्यक्ष ‘वायरस-रोधी’ तरीकों के अलावा, शरीर वायरल, बैक्टीरियल, फंगल या अन्य घुसपैठियों से निपटने के लिए यह भी करता है कि उन्हें शरीर में किसी एक जगह कैद कर देता है (और उन्हें पूरे शरीर में फैलने से रोकता है)। आजकल की भाषा में ऐसी प्रतिक्रियाएँ संक्रमण को ‘कंटेनमेंट’ ज़ोन में ‘क्वारेंटाइन’ करने जैसी होती हैं। प्रतिक्रियाओं की इस श्रेणी को हम ‘शोथ’ या इंफ्लेमेशन कहते हैं।
तो चलिए प्रत्यक्ष वायरस-रोधी प्रतिक्रियाओं पर लौटते हैं। एक तरीका यह है कि शोथ के साथ-साथ एक प्रक्रिया शुरू होती है: अपनी खुद की कोशिकाओं को संदेश दिया जाता है कि वे कोशिका के अंदर ही वायरस-रोधी प्रक्रियाएँ शुरू करके वायरस का जीना हराम कर दें। इंटरफेरॉन-अल्फा और इंटरफेरॉन-बीटा यही करते हैं (और इन्हें कोविड-19 के उपचार में आज़माया भी जा रहा है)।
दो अन्य वायरस-रोधी प्रतिक्रियाएँ काफी कारगर होती हैं, शायद उपर्युक्त प्रतिक्रिया से भी ज़्यादा। लेकिन उन्हें शुरू होने में वक्त लगता है। ऐसा इसलिए है कि, जैसा कि हमने ऊपर देखा, शरीर की कुछ कोशिकाएँ प्रवेश करने वाले सूक्ष्मजीव के कुछ विशिष्ट टुकड़ों को पहचानती हैं- ऐसे आकार जो सिर्फ उसी सूक्ष्मजीव (या उसके निकट सम्बन्धियों) पर पाए जाते हैं। तो ये भी प्रतिक्रिया देना शुरू कर देती हैं, लेकिन दिक्कत यह होती है कि किसी भी लक्षित आकार के लिए जो कोशिकाएँ होती हैं, उनकी संख्या बहुत कम होती है। इसलिए ठीक-ठाक प्रतिक्रिया देने के लिए पहले इन्हें बार-बार विभाजित होकर अपनी संख्या बढ़ानी पड़ती है। संख्यावृद्धि करते हुए, वे परिपक्व होकर उस विशिष्ट आकार के विरुद्ध प्रतिक्रिया की क्षमता हासिल करती जाती हैं।
दूसरा है कि शरीर प्रोटीन या एंटीबॉडी बनाता है जो वायरस की सतह के ठीक उस हिस्से पर चिपक जाते हैं , जिसके ज़रिए वायरस कोशिका पर चिपकता है। परिणामस्वरूप, एंटीबॉडी से ढका वायरस कोशिका में घुस नहीं पाता। प्लाज़्मा उपचार और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसे तरीके यही करने की कोशिश करते हैं। SARS-CoV-2  के विरुद्ध अधिकतर टीकों से भी यही करने की उम्मीद है।
शरीर के पास वायरस को सीमित रखने का एक तीसरा तरीका यह है कि हाल ही में वायरस से संक्रमित कोशिकाओं को पहचानकर ‘किलर’ कोशिकाओं की मदद से उन्हें मार दिया जाए, इससे पहले कि वायरस अपनी प्रतिलिपियाँ बनाना शुरू कर सके।
इन दोनों तरीकों को अनुकूलक प्रतिक्रियाएँ कहते हैं;  क्योंकि ये प्रवेश करने वाले वायरस को ‘देखती’ हैं, अपने खज़ाने में उससे मिलते-जुलते तत्त्वों  को खोजती और तलाश करती हैं, फिर खजाने के उस तत्त्व को विस्तार देती हैं और उन्हें तैनात करती हैं - एंटीबॉडी के रूप में या किलर कोशिका के रूप में। यह विस्तारित खज़ाना शरीर में वायरस से निपट लेने के बाद भी बना रहता है।
तो, वायरस संक्रमण के समय हरेक व्यक्ति में शोथ व इंटरफेरॉन प्रतिक्रियाएँ मौजूद होती हैं। ये प्रतिक्रियाएँ संक्रमण के तुरंत बाद, चंद मिनटों से लेकर कुछ घंटों के अंदर, सक्रिय हो जाती हैं।
इसके विपरीत, अनुकूलक प्रतिक्रिया को शुरू होने में समय लगता है, खासकर यदि हमारे शरीर ने वह वायरस या उस जैसा कुछ पहले न देखा हो। कारण यह है कि शुरुआत में खजाने को विस्तार देने में समय लगता है (आम तौर पर दो दिन, कभी-कभी ज़्यादा)। दूसरी ओर, यदि वायरस किसी ऐसे शरीर में प्रवेश करता है, जिसके पास पहले से विस्तारित खजाना है जो उस वायरस को पहचान सके, तो अनुकूलक प्रतिक्रिया भी कुछेक मिनट या घंटों में शुरू हो जाती है। यही वजह है कि हम उसी वायरस से पुन:संक्रमण (या टीकाकरण) से हम ज़्यादा सुरक्षित होते हैं। यहाँ बता देना लाज़मी है कि चाहे हमारा सामना किसी वायरस से पहली बार हो, हमें उपर्युक्त प्रतिक्रियाओं की सुरक्षा हासिल होती है। बात सिर्फ इतनी है कि यदि पहले से विस्तारित खज़ाना मौजूद हो तो वह बेहतर और त्वरित सुरक्षा देता है।
अलबत्ता, ये विस्तारित अनुकूलक खजाने समय के साथ चुक भी सकते हैं। यदि वैसा होता है तो हम उस संक्रमण के प्रति उतने ही दुर्बल होते हैं , जितने पहली बार थे।
क्या प्रत्येक व्यक्ति घुसपैठी सूक्ष्मजीव के प्रति इस तरह इम्यून हो जाता है? हाँ, यह बात कमोबेश सही है, हालाँकि प्रतिक्रिया की मात्रा और अवधि में अंतर हो सकता है। क्या ऐसा सारे सूक्ष्मजीवों के संदर्भ में होता है? जी हाँ, लगभग, हालाँकि सूक्ष्मजीवी अपवाद भी होते हैं।
क्या हम यह इम्यूनिटी एक संक्रमित व्यक्ति से किसी अन्य वायरस-अनभिज्ञ व्यक्ति को दे सकते हैं? तथाकथित सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ या तो रक्त में एंटीबॉडी कहे जाने वाले प्रोटीन्स के रूप में होती है या वायरस को पहचानने वाली किलर कोशिकाओं के रूप में होती है। एक व्यक्ति से दूसरे को कोशिकाएँ प्रत्यारोपित करने की समस्याओं से तो हम अंग प्रत्यारोपण के संदर्भ में परिचित ही हैं। अधिकतर प्रत्यारोपण शरीर (के प्रतिरक्षा तंत्र) द्वारा अस्वीकार कर दिए जाते हैं। इसी तरह इम्यून कोशिकाओं को भी अस्वीकार कर दिया जाता है।
दूसरी ओर, हम एंटीबॉडी स्थानांतरित कर सकते हैं। प्लाज़्मा उपचार या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी उपचार इसी उम्मीद में किए जाते हैं। लेकिन एंटीबॉडी कुछेक सप्ताह में समाप्त हो जाती हैं, तो सुरक्षा भी लम्बे समय के लिए नहीं होती। कोशिकाएँ – एंटीबॉडी बनाने वाली कोशिकाएँ या किलर कोशिकाएँ – बेहतर साबित होंगी लेकिन उन्हें आसानी से स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। सबसे अच्छा तो यह होगा कि एक टीका हो जो शरीर को स्वयं की वायरस-रोधी प्रतिक्रिया निर्मित करने में मदद करे।
सवाल- हर्ड इम्यूनिटी क्या है?
जवाब- यह देखते हैं कि कोई वायरस समुदाय में कैसे फैलेगा। मान लीजिए एक व्यक्ति का संपर्क (मान लीजिए किसी दूर-दराज के घने जंगल में) वायरस से होता है और वह संक्रमित हो जाता है। इस व्यक्ति का शरीर अंतत: वायरस से निपट लेगा। लेकिन तब तक वायरस की प्रतिलिपियाँ किसी प्रकार से शरीर से बाहर निकलती रहेंगी- अक्सर शारीरिक तरल पदार्थों के माध्यम से- और यदि ये तरल पदार्थ उपयुक्त ढंग से अन्य लोगों के संपर्क में आ जाएँ तो वायरस नए व्यक्तियों में संक्रमण स्थापित कर सकता है। यानी वह प्रसारित हो गया। जब तक पहला व्यक्ति अपने शरीर से वायरस का सफाया करेगा, तब इन नए संक्रमित व्यक्तियों के शरीर में वायरस बन-बनकर कई और लोगों को संक्रमित करने लगेगा।
तो वायरस की ‘सफलता’ का एक निर्णायक कारक यह है कि वह एक संक्रमित व्यक्ति से कितने व्यक्तियों को सफलतापूर्वक संक्रमित कर सकता है। यदि यह संख्या 1 से कम है, तो प्रसार का हर चक्र उससे पहले वाले चक्र से कम लोगों को संक्रमित करेगा और संक्रमण बहुत अधिक नहीं फैल पाएगा। यह संख्या 1 से जितनी अधिक होगी संक्रमण उतनी तेज़ी से फैलेगा।
वायरस की दिक्कत (!) यह है कि यह संख्या (जिसे ङ कहते हैं) काफी हद तक इस बात पर निर्भर है कि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोग कितने संवेदनशील हैं। यदि संक्रमित व्यक्ति बहुत सारे लोगों के संपर्क में तो आता है; लेकिन यदि उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं, जो उस वायरस से पहले टकरा चुके हैं और जिनके शरीर में अनुकूलक खज़ाना विस्तार पा चुका है और वे अनुकूलित प्रतिरोधी हैं, तो अब वे ठीक से संक्रमित नहीं हो पाते, और परिणाम यह होता है कि वायरस का प्रसार अकार्यक्षम हो जाता है। यही स्थिति तब भी होगी जब एक बड़े अनुपात में लोगों का टीकाकरण हो चुका हो।
यदि समुदाय में काफी सारे लोग ‘अनुकूलित प्रतिरोधी’ हो जाते हैं तो वायरस का प्रसार कमोबेश थम जाएगा। इस स्थिति को ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। टीकाकरण से हर्ड इम्यूनिटी इसी प्रकार हासिल होती है। जैसे कि हम देख ही सकते हैं, अधिकांश संक्रमण देर-सवेर ‘सामुदायिक प्रतिरोध’ के बिंदु पर पहुँच जाएँगे। अर्थात हर्ड इम्यूनिटी एक प्राकृतिक नतीजा है। यह स्वीडन या जनाब बोरिस जॉनसन द्वारा डिज़ाइन की गई कोई नीतिगत रणनीति नहीं है। वैसे एक रणनीति के तौर पर इसके भरोसे रहना मूर्खता ही कही जाएगी।
सवाल यह है कि हर्ड इम्यूनिटी तक पहुँचने के लिए कितने लोगों को SARS-CoV-2 के खिलाफ अनुकूलक इम्यूनिटी हासिल करनी होगी। हमें पक्का पता नहीं है; विशिष्ट संक्रमण और सूक्ष्मजीव से सम्बंधित कई कारकों के चलते यह अनुपात बदलता रहता है। अलबत्ता, 50 से लेकर 80 प्रतिशत तक के आँकड़े सामने आए हैं। चूँकि SARS-CoV-2 के खिलाफ अनुकूलक प्रतिरोध फिलहाल करीब 20 प्रतिशत लोगों में रिकॉर्ड हुआ है, इसलिए अभी दुनिया हर्ड इम्यूनिटी के आसपास भी नहीं पहुँची है।
स्पष्ट है कि हर्ड इम्यूनिटी की स्थिर स्थिति हासिल होने के लिए ज़रूरी होगा कि वायरस के संक्रमण की वजह से बढ़िया सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया पैदा हो और यह प्रतिक्रिया (जैसे एंटीबॉडी) जल्दी खत्म नहीं होनी चाहिए। SARS-CoV-2 के मामले में जहाँ पहली शर्त तो काफी सारे संक्रमित लोगों में पूरी होती दिख रही है, लेकिन इस बात को लेकर अनिश्चितता है कि ये एंटीबॉडी कितने समय तक बनी रहेंगी। तो हो सकता है कि SARS-CoV-2 के खिलाफ हर्ड इम्यूनिटी थोड़ी अस्थिर-सी होगी। इसे स्थिरता प्रदान करने के लिए हमें टीके की ज़रूरत होगी, जो शायद अगले साल तक ही सामने आएँगे। (स्रोत फीचर्स)