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Sep 1, 2022

हिन्दी दिवसः जब भाषाएँ मरने लगती हैं

  - डॉ. आशीष अग्रवाल

विलुप्त होती हुई भाषा का प्रतीक

अमेरिका की एक अश्वेत 90 वर्षीय प्रसिद्ध लेखिका ने एक बार एक छोटी सी कथा सुनाई थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि अमेरिका में रहने वाली एक वृद्धा थी, जो बहुत ही ज्ञानवान् थी, परंतु अब वृद्धावस्था के कारण वह वृद्ध महिला, अपनी दोनों आँखें खो चुकी थी। वह वृद्ध महिला, अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान के कारण, पूरे शहर में पहचानी जाती थी, परंतु फिर भी कुछ युवक उसका उपहास उड़ाते रहते थे। एक बार कुछ युवा उसके पास पहुँचे और उनमें से एक बोला - ‘देखो मैडम, मेरे हाथ में एक चिड़िया है, तुम्हें बताना है कि यह जीवित है या मृत है?’ महिला तो कुछ देख नहीं सकती थी, इस कारण वह क्या बोलती और इसीलिए चुप रही। लेकिन कुछ क्षण बाद उस महिला ने अपनी चुप्पी तोड़ी और वह बोली - ‘बेटा, मुझे यह तो नहीं पता कि तुम्हारे हाथ में जो चिड़िया है, वह जीवित है या मृत है, परंतु मैं यह अवश्य बता सकती हूँ कि इस चिड़िया का जीना या मरना तुम्हारे ही हाथ में है।’ उन युवाओं को उस वृद्ध महिला की ये बातें समझ में नहीं आईं और वे खिल्ली उड़ाते हुए वहाँ से चले गए। वहीं बराबर में कुछ और अमेरिकी विद्वान् लोग बैठे थे। वे इस गूढ़ रहस्य को समझ गए और उन्होंने बताया कि उस अंधी वृद्ध महिला के कहने का अर्थ यह था कि यह जो चिड़िया है, यह अमेरिका की विलुप्त होती हुई भाषा का प्रतीक है और यह जो युवा हैं, वे इस चिड़िया (भाषा) की रक्षा करने वाले या फिर उसकी हत्या करने वाले हो सकते हैं।’

भाषाओं को खत्म करने की एक मुहिम

जिस किसी भी देश में भाषाओं को जबरदस्ती थोपा गया है, वहाँ यह भी देखा गया है कि यदा-कदा उस भाषा को बोलने वालों ने अपना विरोध दर्ज कराया है और उस विरोध को दबाने/ खत्म करने के लिए सरकारों ने बर्बरता भी की है। जब आप जबरदस्ती किसी को अपनी मातृभाषा को भुलाकर, विदेशी भाषा को अपनाने का जोर डालेंगे, तो कुछ ना कुछ प्रतिकार (रिएक्शन) तो होगा ही, फिर आप (सरकार) उसी प्रतिकार को, हिंसा का नाम देकर, उसे दबाने के लिए और अधिक हिंसक हो जाएँगे। क्या यह उचित है? इस सब के पीछे अमेरिका जैसे बड़े देश में प्रचलित सैकड़ों भाषाओं को खत्म करने की एक मुहिम की ओर इशारा किया गया है। और केवल अमरीका ही क्यों, भारत जैसे सैकड़ों देशों में, पुरानी और लोकप्रिय भाषाओं की हत्या की जाती रही है, और शायद एक ही भाषा को बढ़ावा दिया जाता रहा है। जब किसी लोकप्रिय क्षेत्रीय भाषा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो उसके साथ-साथ क्या समाप्त हो जाता है, कभी आपने सोचा है? मैं आपको बताता हूं -

उसके साथ समाप्त होती है आत्मीयता।

उसके साथ समाप्त होता है आपसी संवाद का साधन।

उसके साथ समाप्त होता है एक साथ जुड़ा रहने का कारण।

उसके साथ समाप्त होती है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता।

उसके साथ समाप्त होती है अपने सुख और दुख को व्यक्त करने की सहजता।

उसके साथ समाप्त होते हैं उस भाषा के गीत, गाने, दोहे, कहावतें और व्याकरण।

बड़ी रूखी और उदासीन- सी लगती है विदेशी भाषा

और बस, फिर हम किसी एक भाषा में (जो हमारे ऊपर थोपी गई है) आपसी वार्तालाप करने लगते हैं। ये आपसी बातचीत, कई बार, बड़ी रूखी और उदासीन सी लगती है। इसमें अपनी भाषा की वह मिठास नहीं पाई जाती, इसलिए हमारा वार्तालाप भी अधूरा रह जाता है। अपनी भाषा के द्वारा, भावनात्मक एकता को प्रकट करना बड़ा सरल होता है। थोपी गई भाषा को हम पूरी तरीके से समझ भी नहीं पाते और इस कारण वार्तालाप के दौरान कुछ बातें बिना समझे और सुने ही हो जाती हैं। शायद यह, प्रगति की एक कीमत है जो हमें चुकानी पड़ती है। शायद हम अपने आप को प्रगतिशील कहलाना पसंद करते हैं और इसलिए अपनी क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय भाषाओं को छोड़कर, उन भाषाओं में लिखना, पढ़ना, बोलना प्रारंभ कर देते हैं, जो हमारे ऊपर शासन करने वालों ने, (शायद एक षडयंत्र के अंतर्गत), थोप दी थीं। यह बेहद ही दुखद बात है। भाषा बहुत ही संवेदनशील होती है, सही से बोली जाए, तो अमृत का काम करती है और गलत बोली जाये तो तीरों का काम करती है।

अपनी कर्ण प्रिय भाषा को मरने ना दें

अपनी प्रिय भाषा को खोने का दर्द सबसे अधिक वृद्ध लोगों को होता है, जिनका पूरा जीवन उस भाषा के सहारे ही कटा है और जब अगली पीढ़ी को उस भाषा के साथ, घटिया और नए-नए प्रयोग करते हुए देखते हैं, या उस भाषा को इस्तेमाल करने से बचते हुए देखते हैं, तो उनके मन को बहुत ठेस पहुँचती है। हमारे देश की सबसे अधिक बोले जाने वाली हिन्दी भाषा के साथ भी वर्षों तक ऐसा ही अन्याय हुआ है। अब पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी भाषा ने, अपनी, लगभग खोई हुई पहचान को, दोबारा से प्राप्त करना प्रारंभ कर दिया है।  हम सभी हिन्दी- भाषी प्रदेशों के लोगों का यह कर्तव्य है कि हम अपनी इस कर्णप्रिय (कानों को अच्छी लगने वाली) भाषा को मरने ना दें। वृद्ध लोगों ने तो अपने प्रयास कर लिए, अब युवाओं के हाथों में  वह चिड़िया है (हिन्दी जैसी अनेक भाषाएँ हैं), जिनका जीना और मरना, युवाओं के हाथों में है। 14 सितंबर 1949

को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद, हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए, साल 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हर वर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हिन्दी भारत की राजभाषा अवश्य बनी, परन्तु राष्ट्रीय भाषा बनते- बनते रह गई। हमारा प्रयास होना चाहिए कि अपनी मातृ भाषा हिन्दी को, राष्ट्रभाषा का दर्जा मिले।

जब तलक जिंदा कलम है, हम तुम्हें मरने न देंगे

प्रसिद्ध कवि श्री गोपाल दास नीरज ने लिखा था-

 जब तलक जिंदा कलम है, हम तुम्हें मरने न देंगे।

 खो दिया हमने तुम्हें तो, पास अपने क्या रहेगा।

कौन फिर बारूद से, सन्देश चन्दन का कहेगा।

  मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे।’

कितनी सुन्दर कविता है ये। क्या मैंने ठीक कहा? अगर हाँ, तो आइए अपनी प्रिय हिन्दी भाषा को मरने ना दें। हिन्दी, विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत और अन्य देशों (जैसे फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल, पाकिस्तान, कैनेडा और संयुक्त अरब अमीरात) में भी, बड़ी संख्या में लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। देवनागरी लिपि में 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं। इसे बाईं  से दाईं ओर लिखा जाता है। आइए अपनी प्रिय मातृभाषा हिन्दी में काम करना (लिखना एवं पढ़ना) प्रारम्भ करें, कम से कम अपने हस्ताक्षर तो आप हिन्दी भाषा में कर ही सकते हैं।

 सम्पर्कः बी-120, साकेत, मेरठ

Nov 1, 2021

आलेखः बड़ा महत्त्वपूर्ण है शब्दों का चयन

-डॉ. आशीष अग्रवाल

शब्दों में कमाल की ऊर्जा होती है

हमारे मुँह से बोले हुए शब्द हमारे व्यक्तित्व के बारे में बताते हैं। आपने अकसर  कुछ लोगों को क्रोधित होते हुए देखा होगा। क्रोध के आवेश में वे लोग, ना जाने क्या-क्या बोल जाते हैं, और वो, जिस व्यक्ति पर क्रोधित हो रहे होते हैं, (चाहे वो उनके घर में, उन्हीं के ऊपर आश्रित कोई व्यक्ति हो, या फिर उनका अधीनस्थ कर्मचारी हो), वे सभी लोग जिनके लिए ऐसे शब्द बोले गये हैं, उन कटु शब्दों को सदैव याद रखते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग काफी कम बोलते हैं और सोच-समझकर बोलते हैं, इसलिए उनके द्वारा बोले गए मीठे और मधुर शब्दों का प्रभाव, सुनने वाले व्यक्ति के हृदय पर हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। इसी वजह से कहा जाता है कि ‘शब्दों का चयन बड़ा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शब्दों में कमाल की ऊर्जा होती है’। उस ऊर्जा का प्रयोग आपको कैसे करना है, किसी को प्रेरित करने के लिए या किसी को हतोत्साह करने के लिए, ये आपको निर्णय लेना है । इसीलिए, आप चाहें तो कम बोलें, परंतु हमेशा सधे हुए, संतुलित और अच्छे शब्दों का ही प्रयोग करें। अमरीका के प्रसिद्धइन्वेस्टमेंट गुरु’ श्री वारेन बफेट ने एक बार कहा था कि बोलना भी शेयर बाजार में निवेश (इन्वेस्टमेंट) करने जैसा है। जैसे आप सोच-समझ कर, संतुलित मात्रा में अपना पैसा चुनिंदा स्टॉक्स / शेयर्स में लगाते हैं, उसी प्रकार बोलते समय, आपको बहुत सोच-समझ कर, केवल चुनिंदा शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

शब्दों को ब्रह्म स्वरूपमाना जाता है।

आज हमारे पास ईश्वरीय वाणी, वेदों, उपनिषदों, महा ग्रंथों एवं महाकाव्यों के रूप में उपलब्ध है। ईश्वर द्वारा बोली गई बातें, आज भी हमारा मार्ग दर्शन करती हैं। हम आज भी, भाषा की मर्यादा को, अपने पुरातन ग्रंथों को पढ़कर सीख सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि शब्द, ब्रह्मांड में सदैव गूँजते रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि कुछ व्यक्तियों के स्वर्गवास हो जाने के बाद भी हम उनको याद रखते हैं, उसका एक कारण है कि उस व्यक्ति के मधुर बोल / शब्दआज तक हमारे मन-मस्तिष्क और हमारे कानों में गूँजते रहे हैं। इसीलिए कबीर दास जी ने कहा था कि मीठी वाणी बोलिए, जो मन का आपा खोए, औरों को भी शीतल करे, स्वयं भी शीतल होय मीठी-वाणी शहद के सामान होती है जो हमारे मन को शांति देती है, जबकि कटु-वचन तीर के समान कानों से प्रवेश करके, हमारे मन-मस्तिष्क और शरीर को पीड़ा पहुँचाते हैं।

उत्साहित / हतोत्साह करने वाले शब्द

ऐसा कहा जाता है कि आपके द्वारा बोले गए शब्द, किसी बच्चे / छात्र को सफल भी बना सकते हैं और असफल भी। अगर आप उसे सफल बनाना चाहते हैं तो इसके लिए बस आपको सकारात्मक सोच और उत्साहित करने वाले शब्दों का प्रयोग करना होगा। और दूसरी ओर, आपके द्वारा बोले गए कटु और हतोत्साह करने वाले शब्द, उसी बालक को जीवन भर के लिए असफलता की गर्त में धकेल सकते हैं। और हाँ, आपको यह भी स्मरण रखना चाहिए, कि किसी बच्चे / छात्र केसफल हो जाने के बाद’, उसकी प्रशंसा में कहे गए हजारों शब्दों से अच्छा है कि उस बच्चे / छात्र के संघर्ष के दिनों' में, आप उसको उत्साहित करने के लिए जो ‘कुछ शब्द’ बोलें, यही ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न शोध इस बात को सिद्ध (साबित) कर चुके हैं कि अपने जीवन में असफल हुए बच्चों की असफलता, उन बच्चों के मां-बाप द्वारा बोले गए कटु शब्द ही थे, जो उनके लिए श्राप बन गए। दूसरी ओर, अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने वाले बच्चों के माता-पिता द्वारा बोले गए उत्साहित करने वाले शब्द, उन बच्चों के लिए वरदान स्वरूप बन गए थे।

वाणी के कारण ही लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं

आपने अनुभव किया होगा कि, दो व्यक्तियों / पड़ोसियों के द्वारा, किसी समस्या के समाधान हेतु किया जा रहा वार्तालाप, एक लड़ाई का रूप भी ले सकता है, और वही वार्तालाप एक सौहार्दपूर्ण तरीके से, उस समस्या का समाधान भी कर सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शब्दों के विवेकपूर्ण उपयोग से, हम एक वातावरण (माहौल) को अच्छा भी बना सकते हैं और शब्दों के अमर्यादित प्रयोग  से ही, उसी वातावरण को दूषित माहौल में भी बदला जा सकता है। या यूँ कहूँ की हमारे शब्दही किसी उत्सव का कारण हैं और हमारे शब्दही किसी युद्ध का कारण भी बन सकते हैं। आपने अनुभव किया होगा कि किसी व्यक्ति को मीठा बोलते हुए देखकर, अनायास ही हमारे मुँह से निकल जाता है कि तुम्हारी वाणी में माँ सरस्वती का वास है। इसके अतिरिक्त, हमारे देश में, मीठी वाणी की तुलना कोयल से भी की जाती है और कड़वी बोली की तुलना कौवे से। आपको यह भी याद होगा कि, ऐसा माना जाता है कि कटु-शब्द या कटु-वाणी के कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ था। अच्छे व्यवहार और मीठी बोली के कारण दो पड़ोसी देश आपस में प्रेम पूर्वक भी रह सकते हैं और दुर्व्यवहार के कारण आपस में युद्ध भी कर सकते हैं। आज हमारे पड़ोस में या हमारे परिवारों में, कटु शब्दों / वाणी के कारण ही लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं। हमें इस ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।

जेनरेशन गैप’ भी एक कारण

हम सब सामाजिक प्राणी हैं, और भारतीय होने के नाते, संयुक्त परिवार में रहा करते हैं, और आप सब का अनुभव रहा होगा कि पहलीऔर तीसरीपीढ़ी के बीच में जो गहरा प्रेम है, उसका कारण भी शायद प्रिय-शब्दही हैं और पहलीऔर दूसरीपीढ़ी के बीच में जो दूरी है, उसका कारण भी कटु-शब्दही हैं। अगर आप, उस ‘पीढ़ी-का-अंतर’ (जेनरेशन गैप) जैसे विदेशी सोच-विचारों को दूर करना चाहते हैं तो अवश्य ही अपने माता-पिता से मर्यादित, करुणापूर्ण एवं प्रेमपूर्ण शब्दों में ही बातें करें। वैसे भी, यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो आपको पुरानी और नई पीढ़ी के बीच, एक ‘सही-संतुलन’ बना कर ही रखना पड़ेगा और इस बहाने आप नई और पुरानी पीढ़ी के बीच इस दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे ‘अंतर’ को कम भी कर पाएँगे ।

कलयुगमें वाणी का महत्त्व

आज कलयुगके समय में, शब्दों (वाणी) का महत्व और अधिक बढ़ गया है। आज अगर हम 'कलयुग' को घोर कलयुगहोने से बचाना चाहते हैं, तो हमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एवं द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की बातें (वाणी) को फिर से सुनना और समझना होगा। उनके द्वारा कही गई बातें 'ब्रह्म वाक्य' हैं और उन बातों (वाणी) को हम तक पहुँचाने का एक ही मार्ग है - शब्द या वाणी। अंतरात्मा की आवाज को भी अमृतवाणी ही कहा जाता है, परंतु इस अमृतवाणी को सुनने के लिए हमें साधना करनी होगी, जो कि ‘योग’ द्वारा ही संभव है। वैसे भी, ‘योग साधना’ करने से हमारे सोने, जागने, उठने, बैठने, खाने, पीने और वाणी (बोलने) इत्यादि पर अनुशासन आ जाता है, इसलिए योग अपनाइये और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना सीखिए।

सम्पर्कः १२०, साकेत, मेरठ