मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label कृष्णानंद कृष्ण. Show all posts
Showing posts with label कृष्णानंद कृष्ण. Show all posts

Feb 1, 2023

लघुकथाः औकात

- कृष्णानंद कृष्ण

पद के मद में आकंठ डूबे श्यामसुंदर दास ने कभी किसी को तरजीह नहीं दी। सबको एक ही लाठी से हांकते रहे। क्या घर, क्या बाहर सब जगह एक ही जैसा व्यवहार। चाहे वो मातहत कर्मचारी हो या पदाधिकारी या दोस्त, सबको वे अपनी रियाया से ज्यादा महत्त्व नहीं देते थे। कोई कुछ कहता या सुझाव देता तो उसे डांट देते और कहते–‘‘तुमको समझ में नहीं आता है तो चुप रहा करो। जाओ! खाओ–पीओ और मौज करो। यह तो मेरे प्रताप का फल है, भोगो।’’ और हो–हो कर के हँस देते। सारे के सारे लोग हाँ में हाँ मिलाते रहते।

एक बार उनकी सल्तनत को थोड़ा- सा झटका लगा। उन्होंने अपने सिक्योरिटी ऑफिसर को पीकदान उठाने का इशारा किया, किंतु उसने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। वह चुपचाप अपने मातहतों को हिदायतें देता रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था। सामने बैठे एक उच्च पदाधिकारी ने आगे बढ़कर पीकदान बढ़ा दिया।

‘‘ ऐ मिस्टर! आपको कुछ बुझाता–वुझाता है कि नहीं? तू कइसे कंपीट कर गया जी? ’’ कहते हुए उन्होंने उस अधिकारी को डाँटा।

‘‘मैंने कुछ समझा नहीं।’’ उसने उत्तर दिया।

‘‘लगता है, तुमको सब कुछ समझाना पड़ेगा।’’ उनकी त्योरियाँ चढ़ गई थीं।

सामने खड़े उच्चधिकारी ने नव–नियुक्त सिक्योरिटी ऑफिसर को समझाना चाहा। उसकी लल्लो–चप्पो वाली बातों पर वह बिदक उठा। उसने संयत स्वर में कहा, ‘‘ माइंड योर ओन बिजनेस प्लीज!’’

‘‘ऐ सक्सेरिया साहब, अभी इसको यहाँ का बिजनेस रूल नहीं मालूम है। जब समझ जाएगा तब सब ठीक हो जाएगा। नया खून है न!’’ कहते हुए उन्होंने पान की पीक पिच्च से उगल दी।

‘ऐ मिस्टर! जरा थरमस इधर बढ़ाइए तो।’’

उनकी बातों पर ध्यान न देते हुए वह चुपचाप खड़ा रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। तमककर बोले,‘‘अरे! आप ही से कह रहा हूँ। आप बहरे–वहरे नहीं न हैं?’’

इस बार सिक्योरिटी ऑफिसर के चेहरे का रंग बदला। उसने थोड़ी–सी तल्ख आवाज में कहा, ‘‘मैं सिक्योरिटी ऑफिसर हूँ। चपरासी नहीं हूँ। मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ।’’

‘‘लगता है, आप हमें जानते नहीं हैं।’’कहते हुए उनका चेहरा तमतमा उठा।

‘‘जानता हूँ। अच्छी तरह पहचानता हूँ। इसलिए कि आपका सिक्योरिटी ऑॅफिसर हूँ।’’ उसने दृढ़तापूर्वक कहा।

उसकी दृढ़–इच्छाशक्ति के सामने वे निरुत्तर थे। चुपचाप उठकर भीतर कमरे में चले गए। बाहर सन्नाटा पसर गया था।

Jul 10, 2020

जागरूक

जागरूक
- कृष्णानंद कृष्ण
रात का सन्नाटा कुत्तों के लड़ने की आवाज से टूट जाता है। कुछ लोग धनगाँव एक्सप्रेस की प्रतीक्षा में  इधरउधर बैठे हुए हैं। रात गहरा गई है। कुछ मज़दूर ट्राफिक गोलम्बर पर सोये हुए हैं।
सिनेमा रोड से एक आदमी ट्रैफिक गोलम्बर की तरफ आता है। लड़खड़ाती चाल से पियक्कड़ तथा मैले कपड़े और अस्तव्यस्त केशों को देखकर पागल का अहसास होता है।
गोलम्बर के पास आकर वह रुकता है। सोये हुए लोगों को गौर से देखता है। फिर गिनती शुरू करता हैएक, दो, तीन .....दस....पंद्रह और अचानक रुक जाता है।
सोये हुए लोगों को एक बार फिर गिनता है। इर देखता है फिर चिल्लाने लगता है– ‘‘किसके आर्डर सोया है तुम लोग यहाँ? कौन है इस शहर का मालिक? हमको जवाब दो ,ये लोग लावारिस के माफिक यहाँ क्यों सोए हुए हैं?’’
कोई कुछ नहीं बोलता है। वह आक्रोश की मुद्रा  में मुट्ठियाँ हवा में उछालता है, ‘‘मैं पूछता हूँ ....कौन है यहाँ का मालिक...देखता क्यों नहीं....मेरे मासूम बच्चे भूखे फुटपाथ पर सोये हुए हैं।और सामने होटल के नीचे लड़ते कुत्तों को देखकर ठहाका लगाता है, बुदबुदाता है, ‘‘साले, तुम लोगों में भी भाईचारा नहीं रह गया क्या?’’
‘‘का हो काका, मस्ती बाँनू ?’’ एक रिक्शा वाला पूछता है। वह चिल्लाता है, ‘‘कमीनो, उड़ाओ मेरा मज़ाक, खूब उड़ाओ मेरा मज़ाक... लेकिन तुम लोग दो बजे रात को यहाँ किसके आर्डर से बैठे हो ? बताओ वो लोग गोलम्बर पर क्यों सोया है ? मैं जानता हूँ, तुममे से कोई कुछ नहीं बोलेगा। तुम्हारी जबान जो बंद है।’’
गोलम्बर पर सोये लोगों की ओर देखकर वह फिर चिल्लाता है, ‘‘आओ मेरे बच्चों, आओ ..... मैं तुम्हारे हक की लड़ाई लड़ूँगाकोई कुछ नहीं बोलता है। वह एक बार फिर चारों तरफ चौकन्नी नज़र से देखता है, फिर शुरू हो जाता है, ‘‘ठीक है मेरे बच्चो, तुम आराम से सोओ। मैं तुम्हारे हक की लड़ाई लड़ूँगा, अकेलेऔर सामने से आती एक काली कार के सामने खड़ा हो जाता है। हवा में मुट्ठियाँ भाँजते हुए चिल्लाता है, ‘‘तुम लोग देखता नहीं, मेरे बच्चे सोये हुए हैं....गाड़ी रोको....नहीं तो उनकी नींद टूट जायेगी।’’
गाड़ी का दरवाजा एक झटके से खुलता है। दो आदमी बाहर आते हैं और उसे पकड़कर गोलम्बर पर पटक जाते हैं।
वह गोलम्बर पर सोये लोगों के बीच में पड़ा बड़बड़ाता है
‘‘सालों.... तुम खूब नींद से सोओ... लेकिन मैं तुम्हारे हक की लड़ाई लड़ूँगा।...अकेले ....अकेले...।’’