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May 1, 2026

खानपानः कॉफी के स्वाद निराले

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कॉफी शब्द कहाँ  से आया? कॉफी इथियोपिया से आई थी, जहाँ  के लोग इसे कहवा कहते थे। स्वर्गीय डॉ. के. टी. अचया ने वर्ष 1998 में ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से प्रकाशित अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि कॉफी के बीज अरब व्यापारियों द्वारा कुलीन वर्ग के उपयोग के लिए भारत लाए गए थे। अरबी लोगों ने दक्षिण भारत और श्रीलंका में कॉफी के बागान लगाए। और सूफी बाबा बुदान ने कर्नाटक के चिकमगलुर के पास कॉफी के पौधे उगाए। 

1830 की शुरुआत में, शुरुआती ब्रिटिश आगंतुकों ने दो प्रकार की कॉफी के कॉफी बागान लगाए – अच्छी ऊँची जगहों पर कॉफी अरेबिका के, और निचले इलाकों में कॉफी रोबस्टा के बागान। (चूँकि युरोप में कहवे का कारोबार अरब व्यापारी करते थे; इसलिए अरेबिका नाम पड़ा; और रोबस्टा, क्योंकि पश्चिम अफ्रीका की यह किस्म रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी है)। जैसा कि मैंने कॉफी पर अपने पूर्व लेखों में लिखा था, कॉफी एक स्वास्थ्यवर्धक पेय है, खासकर जब इसे गर्म दूध के साथ मिलाकर पिया जाता है। कई अमेरिकी लोग बिना दूध वाली (ब्लैक) कॉफी पीते हैं।

तमिलनाडु के कुंभकोणम शहर के कॉफी के शौकीन बाशिंदे अपनी कॉफी को कुंभकोणम डिग्री कॉफी कहते हैं। उनका दावा है कि उसके स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है। वे आगे कहते हैं कि यह कॉफी विशुद्ध अरेबिका कॉफी है और इसमें चिकरी पाउडर नहीं मिला होता है, जो आम तौर पर डिपार्टमेंटल स्टोर या कॉफी शॉप पर मिलने वाले कॉफी पाउडर या कॉफी के बीजों में होता है। इसी तरह, सिकंदराबाद की जिस कॉफी शॉप से मैं कॉफी खरीदता हूँ वहाँ  शुद्ध अरेबिका कॉफी पावडर के साथ-साथ चिकरी मिश्रित अरेबिका कॉफी पीने वालों के लिए चिकरी मिश्रित कॉफी पावडर भी मिलता है।

लेकिन चिकरी है क्या? यह भी कॉफी की एक किस्म है, और भारत चिकरी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। हमारे देश में यह सुदूर पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, सिक्किम) में उगाई जाती है। वहीं कुछ लोगों का ऐसा दावा है कि पोषण के मामले में चिकरी अरेबिका से बेहतर हो सकती है; क्योंकि इसमें कैफीन की मात्रा कम होती है। कैफीन एक अणु है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है, हालांकि इस सम्बंध में अब तक कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिले हैं।

आंध्र प्रदेश अराकू घाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अपनी विशेष कॉफी के लिए प्रसिद्ध है। अराकू कॉफी के बारे में दावा है कि यह न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी उपलब्ध सबसे अच्छी कॉफी है। यह शुद्ध अरेबिका कॉफी है। बहुत अच्छी किस्म की अरेबिका तमिलनाडु की शेवरॉय पहाड़ियों और कर्नाटक के मंजराबाद किले के आसपास के इलाकों में भी उगाई जाती है। भारत भर के बड़े शहरों में कई युवा स्टारबक्स की कॉफी खरीदते हैं और पीते हैं, और कैफे कॉफी डे (सीसीडी) से भी। स्टारबक्स सिर्फ शुद्ध अरेबिका कॉफी का उपयोग करता है, जबकि सीसीडी के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे शुद्ध अरेबिका का उपयोग करते हैं या मिश्रण का।

कॉफी की इन विभिन्न प्रमुख किस्मों को लेकर इतना शोर क्यों है? जवाब इतालवी आनुवंशिकीविद डॉ. मिशेल मॉर्गन्टे द्वारा किए गए हालिया आनुवंशिकी अध्ययन (नेचर कम्युनिकेशंस जनवरी 2024) से मिलता है जो बताता है कि कॉफी की कई कृष्य किस्में बेहतर स्वाद दे सकती हैं। दी हिंदू ने हाल में संक्षेप में अपने विज्ञान पृष्ठ पर यह बात बताई है और बीबीसी न्यूज़ के अनुसार कॉफी अरेबिका में आनुवंशिक परिवर्तन बेहतर महक दे सकते हैं। तो वक्त आ गया है कि भारतीय आनुवांशिकीविद भारतीय कॉफियों के जीन्स अनुक्रमित करके देखें। (स्रोत फीचर्स)

Feb 1, 2026

प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं?

सुनकर क्या करते हैं?

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

“क्या आप अपने पौधों को संगीत सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं, जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भाँप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं। 

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियाँ  पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियाँ, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति और हॉरमोन नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जाँचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएँ , पौधे अच्छे से लहलहाएँ गे। (स्रोत फीचर्स) ■

Oct 1, 2025

पर्यावरणः तेज़ आवाज़ औरडी आपके कान

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

हमारे सभी त्यौहार हमें खुशी-उल्लास देते हैं, लेकिन हमारा दीपों का यह त्योहार साथ में बहुत ज़्यादा शोर भी देता है। सल्फर डाईऑक्साइड जैसे हानिकारक उत्सर्जन को कम करने और पटाखे फोड़ने पर होने वाले शोर को कम करने के लिए ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल करने की लगातार अपील की जाती है। इन्हें सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत निर्देशों, जैसे लड़ियों वाले पटाखों के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध, के ज़रिए अनिवार्य किया है; लेकिन हर साल इस त्यौहार के मौसम में पटाखों की तेज़ आवाज़ें गूँजती रहती हैं।

लोगों की चिंता पटाखों के कारण होने वाले वायु प्रदूषण पर केंद्रित रहती है: लेकिन उतनी ही चिंता की बात यह है कि बहुत तेज़ आवाज़ या धमाके हमारी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पटाखों से इतर, साल भर होने वाले शोर या ध्वनि प्रदूषण पर अन्य तरह के प्रदूषण की तुलना में कम ध्यान दिया जाता है। ऐसा लगता है कि शोर को हमारे आसपास के पर्यावरण के हिस्से के रूप में अधिक आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है, खासकर तब जब यह शोर आप स्वयं पैदा कर रहे हों।

ध्वनि तरंगों के माध्यम से आगे बढ़ती है। इन तरंगों में ऊर्जा होती है। जितनी अधिक ऊर्जा होगी, उतनी ही ज़्यादा तीव्र तरंग होगी और उतनी ही तेज़ आवाज़ होगी। ध्वनि की तीव्रता मापने के लिए डेसिबल (डीबी) पैमाने का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक लघुगणकीय पैमाना है, इसलिए जब ध्वनि स्तर 10 डेसिबल बढ़ता है तो इसका मतलब होता है कि ध्वनि की तीव्रता दस गुना बढ़ गई है। डीबी पैमाने पर, मानव श्रवणशक्ति की शुरुआत 0 डीबी पर सेट की गई है। एक फुसफुसाहट की ध्वनि की माप इस पैमाने पर 30 डेसिबल आती है, और सामान्य बातचीत की ध्वनि की माप 60 डेसिबल।

तेज़ धमाके के साथ फूटने वाले पटाखे की ध्वनि तीव्रता, 10 फीट दूर मापने पर, 140 डेसिबल आती है। यह तीव्रता कान के कॉक्लिया (आंतरिक कान में एक सर्पिलाकार रचना जो ध्वनि तरंगों को विद्युत संकेतों में बदलती है) में मौजूद रोम कोशिकाओं को आसानी से नुकसान पहुँचा सकती है। कॉक्लिया कान के परदे के माध्यम से कंपन प्राप्त करता है और फिर रोम कोशिकाएँ उन्हें तंत्रिका संकेतों में बदल देती हैं। इन रोम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने से वे ध्वनि के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं। नतीजतन, रोम कोशिका द्वारा प्रतिक्रिया करने और तंत्रिका संकेतों को मस्तिष्क तक भेजने के लिए तेज़ या ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है। रोम कोशिकाएँ मध्यम आवाज़ के असर के बाद कुछ हद तक ठीक हो सकती हैं। लेकिन हमारी त्वचा कोशिकाओं के विपरीत, ये कोशिकाएँ पुनर्जनन में असमर्थ हैं। इसलिए बार-बार होने वाले आघातों से उबरना इन कोशिकाओं के लिए मुश्किल हो सकता है। नतीजतन, लगातार तेज़ शोरगुल के कारण सुनने की क्षमता घट सकती है।

छोटे बच्चों के संवेदनशील कानों के लिए तेज़ आवाज़ें एक गंभीर खतरा हैं, क्योंकि सुनने की क्षमता में मामूली कमी भी उनकी सीखने की क्षमता को कम कर सकती है। शोर के अत्यधिक संपर्क के कारण होने वाला ध्वनि आघात अक्सर कान बजने (टिनिटस) की समस्या पैदा करता है, जिसमें कहीं कुछ आवाज़ न होने पर भी आपको कानों में सीटी बजने सी आवाज़ सुनाई देती रहती है। यह ‘सीटी की आवाज़' क्षतिग्रस्त रोम कोशिकाओं की असामान्य विद्युत गतिविधि का संकेत है। आम तौर पर, यह आवाज़ कम हो जाती है, लेकिन लंबे समय तक लगातार शोर- शराबे के संपर्क में रहने से यह आपके जीवन का स्थायी लक्षण बन सकती है। बेशक, टिनिटस बुज़ुर्गों को भी हो सकता है, जो उम्र से सम्बंधित क्षति के कारण पैदा होता है।

लंबे समय तक मध्यम- तीव्रता वाली आवाज़ों (शोरगुल) के संपर्क में रहने से भी सुनने की क्षमता ठीक वैसे ही कम हो सकती है, जैसे तेज़ आवाज़ें सुनने से होती है। भारतीय शहरों की सड़कों पर यातायात का शोर एक दिन में 60 से 102 डेसिबल तक मापा गया है। साल 2008 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन में हैदराबाद शहर के यातायात पुलिसकर्मियों पर किया गया एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। अध्ययन में पाँच साल की सेवा के बाद सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मियों में सुनने की क्षमता में कमी पाई गई थी, ऐसे ही नतीजे सुब्रतो नंदी और सारंग धात्रक को भारत में व्यावसायिक शोर पर किए गए सर्वेक्षण में मिले थे। 

इयरप्लग जैसे निवारक उपाय सुनने की क्षमता में कमी के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। निर्माण उद्योग जैसे कुछ पेशों में ज़रूरत के अनुसार इयरप्लग अपनाए जा रहे हैं, लेकिन इसे और अधिक व्यापक बनाने की ज़रूरत है। शायद, ग्रीन पटाखों के चलन में आने के पहले ही, त्यौहार की रातों में इयरप्लग पहनना एक आम दृश्य बन जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

Sep 1, 2025

खान-पानः एक सेहतमंद सब्जी टमाटर

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

दुनिया भर के दैनिक आहार में टमाटर का एक जरूरी घटक बन जाना एक दिलचस्प कहानी है। योलांडा इवांस ने नेशनल जियोग्राफिक  पत्रिका के 5 जून, 2025 के अंक में मिथकों और लोककथाओं के माध्यम से टमाटर के बढ़ते चलन के बारे में लिखा है और बताया है कि कैसे टमाटर हमेशा से एक लोकप्रिय सब्जी नहीं था।

एक समय था जब इन्हें दुष्ट, बदबूदार और ‘ज़हरीला सेब’ माना जाता था। इन्हें अंधविश्वास और बीमारी से जोड़कर देखने का प्रमुख कारण यह था कि तांबे के बर्तनों में रखने पर इनकी अभिक्रिया लेड से होती थी। न्यू जर्सी के सलेम के किसानों द्वारा टमाटर पकाने के लिए एक अधिक उपयुक्त बर्तन के इस्तेमाल ने अमेरिका में लोगों की राय बदल दी।

टमाटर भारत की देशज वनस्पति नहीं थी; बल्कि ये 15वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों के साथ यहाँ आई थी। फिर 16वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने इन्हें अपनाया, और पूरे देश में इनकी खेती शुरू की और इन्हें अपने भोजन में शामिल किया; लेकिन लोग तब भी टमाटर को लेकर एहतियात बरतते थे। जैसा कि स्वतंत्र पत्रकार सुश्री सोहेल सरकार ने लिखा है, 1938 में चिकित्सक डॉ. तारा चितले और उनके सहयोगियों ने लोगों को सर्दी-ज़ुकाम, स्कर्वी और आयरन की कमी के इलाज में टमाटर के फायदों के बारे में समझाने की कोशिश की थी; लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया ठंडी ही रही।

बदलाव आखिरकार तब आया, जब ज़्यादा से ज़्यादा यात्रियों ने हमारे आहार में टमाटर शामिल करने की सिफारिश की, और भारत में राष्ट्रीय पोषण संस्थान के विशेषज्ञों ने हमारे दैनिक आहार में विटामिन और खनिजों के महत्त्व और टमाटर में इनकी प्रचुरता के बारे में बताया।

स्वास्थ्य लाभ- वनस्पति विज्ञान में टमाटर को एक फल माना जाता है। कैलिफोर्निया की आहार और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुश्री सिंथिया सास ने भी सेहत के लिए टमाटर के फायदे बताए हैं। इनमें से कुछ फायदे हैं - टमाटर एंटीऑक्सीडेंट से समृद्ध फल है, जो हृदय और मस्तिष्क को स्वस्थ रखते हैं। टमाटर का अधिक सेवन उच्च रक्तचाप को कम करता है (वरिष्ठ नागरिक ध्यान दें)। टमाटर में मौजूद सेल्यूलोज़ रेशेदार पदार्थ कब्ज की दिक्कत को दूर रखते हैं। टमाटर में लाइकोपीन नामक लाल कैरोटीनॉयड वर्णक 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को अल्जाइमर की समस्या से बचने में मदद कर सकता है। सुश्री सास की सलाह है कि टमाटर पकाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे अच्छी तरह से धुले हुए हों और धूल-जनित कीटाणुओं से मुक्त हों।

टमाटर की खेती पूरे भारत में की जाती है, और प्रति एकड़ 5,000 से 10,000 पौधे लगाए जाते हैं। तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जयशंकर का अनुमान है कि भारत में वर्ष 2022-2023 में 210 लाख टन टमाटर का उत्पादन हुआ था, जो चीन (680 लाख टन) के बाद दूसरे नंबर पर था। टमाटर की खेती करने वाले शीर्ष सात राज्य हैं: मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु। बैंगलुरु स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान टमाटर की विभिन्न किस्मों पर शोध कर रहा है। इनमें से एक है ‘अर्क रक्षक' जो कि एक रोग-प्रतिरोधी संकर किस्म है। दूसरी है ‘अर्क श्रेष्ठ' जो लंबे समय तक खराब न होने वाले टमाटर की पैदावार के लिए तैयार की जा रही है, ताकि इनका परिवहन (निर्यात) आसान हो सके।

आज, देश का लगभग हर घर अपने भोजन में टमाटर का उपयोग करता है। वर्तमान भारतीय व्यंजनों में टमाटर किसी न किसी रूप में शामिल है- चाहे टमाटर का सूप हो, चटनी हो, सालन हो या रसम, सैंडविच, बर्गर, पिज़्ज़ा हो या फिर सॉस के रूप में।

टमाटर का स्वाद चखने के बाद और यह जानने के बाद कि यह दुष्ट नहीं है, बल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं, चलिए टमाटर डालकर कुछ पकाएँ और मज़े से खाएँ! (स्रोत फीचर्स)  ■

May 2, 2025

स्वास्थ्यः कटहल के लाभ


  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

यदि आम को फलों का राजा कहा जाता है, तो कटहल को सभी फलों में डॉक्टर कहा जा सकता है। भारत और मध्य-पूर्व के लोग कटहल (Artocarpus heterophyllus) से बहुत पहले से परिचित हैं। कटहल का उपयोग आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति में स्वास्थ्यवर्धक के रूप में किया जाता रहा है। तमिल में ‘पला’, बंगाली में ‘कटहल’ और मलयालम में ‘चक्का’ कहलाने वाला कटहल भारत के दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिकतर भोजन का हिस्सा है, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह फल की तरह अधिक खाया जाता है। मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, और यहाँ से इसे मध्य पूर्व क्षेत्रों में निर्यात किया जाता है।
कटहल का पेड़ विशाल और घना) होता है। इसके फल पेड़ की पतली शाखाओं पर नहीं लगते बल्कि तने और मोटी शाखाओं के जोड़ के आसपास लगते हैं। यहाँ लगने से इसे बहुत बड़े आकार में बढ़ने में मदद मिलती है; केरल में 42 किलोग्राम का एक कटहल अब तक एक रिकॉर्ड है। कटहल का पका हुआ फल मीठा और स्वादिष्ट होता है। और कच्चे कटहल से कई तरह के व्यंजन बनते हैं। इसे मांस के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इसमें वसा और कोलेस्ट्रॉल कम होता है ।
सुपरफूड कटहल
इन सभी खूबियों के साथ-साथ, कटहल एक सुपरफूड के रूप में विश्वभर में लोकप्रिय हो रहा है। क्लीवलैंड युनिवर्सिटी की एक व्यापक समीक्षा बताती है कि कटहल प्रोटीन, विटामिन, खनिज और पादप रसायनों, के अलावा पोटेशियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे तत्त्वों से भरपूर है। ड्यूक युनिवर्सिटी की वेबसाइट पर वैज्ञानिक ब्रायना इलियट ने कटहल के पोषण सम्बंधी लाभों पर प्रकाश डाला है। वे बताती हैं कि पोषण की दृष्टि से कटहल की फांकें सेब और आम की तुलना में बेहतर हैं। कई संदर्भों का हवाला देते हुए वे बताती हैं कि कटहल का फल रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है; यकृत से लेकर अन्य अंगों में जमा वसा को घटाता है; और इसमें मौजूद कैरोटीनॉइड्स टाइप-2 डायबिटीज़ और हृदय रोगों के जोखिम को कम करते हैं। इसमें मौजूद विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ वायरल संक्रमण के जोखिम को कम करते हैं।
WebMed वेबसाइट भी इसके कई लाभ बताती है। इसके अनुसार, “कटहल ज़रूरी विटामिनों और खनिज से सराबोर है, विशेष रूप से यह विटामिन ‘बी’, पोटेशियम और विटामिन ‘सी’ का एक अच्छा स्रोत है।” कटहल मधुमेह के रोगियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। भारत में लगभग 21.5 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं। 2021 में, आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के ए. गोपाल राव और उनके साथियों ने न्यूट्रिशन एंड डायबिटीज़ जर्नल में एक रैंडम क्लीनिकल परीक्षण के नतीजे प्रकाशित किए हैं। इसमें बताया गया है कि कच्चे कटहल का आटा (जिसे कच्चे कटहल के गूदेदार हिस्से को सुखाकर, पीसकर बनाया जाता है) ग्लाइसेमिक नियंत्रण में कुशल है और चावल या गेहूँ जैसे मुख्य आहार का विकल्प बन सकता है। कटहल का आटे के रूप में इस्तेमाल उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, जहाँ कटहल की खेती नहीं होती। इस शोधपत्र के एक लेखक जेम्स जोसेफ एक कंपनी (jackfruit 365) चलाते हैं जो पूरे भारत में कटहल का आटा बेचती है।
कटहल मधुमेह रोगियों और स्वस्थ लोगों, दोनों के लिए दैनिक आहार का एक वांछनीय हिस्सा है। तो सब्ज़ी, अचार, फल या आटे किसी भी रूप में इसे इस्तेमाल करें और स्वस्थ रहें! (स्रोत फीचर्स) ■

Mar 1, 2025

विश्व कविता दिवसः अभिव्यक्ति में कविताएँ गद्य से बेहतर हैं

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

यूनिसेफ ने 21 मार्च के दिन को विश्व कविता दिवस के रूप में घोषित किया है। विश्व कविता दिवस मनाने का उद्देश्य काव्यात्मक अभिव्यक्ति (कविताओं) के माध्यम से भाषायी विविधता को बढ़ावा देना है। हर साल इस दिन के लिए कोई एक थीम चुनी जाती है। वर्ष 2022 में इस दिन की थीम ‘पर्यावरण' रखी गई थी। 2023 की थीम थी, ‘सदैव कवि, गद्य में भी (Always a poet, even in prose)' और 2024 की थीम ‘दिग्गजों के अनुभव पर बढ़ना (Standing on the shoulders of giants)'। 

कविता का उपयोग भावनाएँ जगाने के लिए, बिंब रचने के लिए, और विचारों को सुगठित और कल्पनाशील तरीके से व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इसमें लय होती है, छंद या मीटर होता है, भावनात्मक अनुनाद होता है। पाठक या गायक कवि की भावना को महसूस करते हैं और यह उनके दिल-ओ-दिमाग में प्रभावी ढंग से उतर जाती हैं। इसमें किफायत, अलंकरण और लय की समझ होती है। ये अक्सर गाई जा सकती हैं। जैसे, हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’; यह रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई एक कविता है, जिसे हम सभी जोश-ओ-खरोश से गाते हैं। वहीं, हममें से कई अपनी भाषा में दुख-दर्द भरे नगमे भी गुनगुनाते हैं, गाते हैं, सुनते हैं।

वर्ष 2022 का विश्व कविता दिवस लुप्तप्राय भाषाओं, इन भाषाओं में कविताओं, गद्य और गीतों पर केंद्रित था। दुनिया भर में, 7000 से अधिक भाषाएँ लुप्तप्राय हैं। यूनेस्को के अनुसार भारत में, 42 भाषाएँ लुप्तप्राय (10-10 हज़ार से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली) हैं। 2013 से, भारत ने अपनी लुप्तप्राय भाषाओं के बचाव और संरक्षण के लिए एक योजना शुरू की है। वेबसाइट ‘endangered languages in India (भारत में लुप्तप्राय भाषाएँ)’ पर इन लुप्तप्राय भाषाओं की सूची दी गई है। इस सूची में ‘ग्रेट अंडमानी’, लद्दाख में बोली जाने वाली ‘तिब्बती बलती’ और झारखंड की ‘असुर’ भाषाएँ शामिल हैं। मैसूर स्थित स्कीम फॉर प्रोटेक्शन एंड प्रिवेंशन ऑफ एन्डेंजर्ड लैंग्वैज (SPPEL) इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत है। 

2023 में विश्व कविता दिवस की थीम थी: आलवेज़ अ पोएट, ईवन इन प्रोज़। शेक्सपियर इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। उनके गद्य में भी काव्यात्मक लय थी। यहाँ  कुछ उदाहरण दिए गए हैं: ‘Brevity is the soul of wit'; और ‘my words fly up, but my thoughts remain below'। हिन्दी, उर्दू और तमिल में कई विद्वानों ने इसी तरह की कविताएँ/बातें लिखी हैं। 

जब हम गद्य में अपने मन की बात कह सकते हैं तो कविता क्यों लिखना? जहाँ गद्य में प्रयुक्त भाषा स्वाभाविक और व्याकरण-सम्मत होती है, वहीं काव्यात्मक भाषा आलंकारिक और प्रतीकात्मक होती है। ऑक्सफोर्ड स्कोलेस्टिका एकेडमी बताती है कि कविता साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक ऐसा रूप है जिसमें भाषा का उपयोग होता है। और एनसायक्लोपीडिया ब्रिटानिका कहता है, कविता में आप भाषा (के शब्दों) को अर्थ, ध्वनि और लय के मुताबिक काफी सोच-समझकर चुनते और जमाते हैं। कविता पढ़ते या सुनते समय, आपके मस्तिष्क का ‘आनंद केंद्र' सक्रियता से बिंबों का अर्थ खोजने और रूपकों की व्याख्या करने में तल्लीन हो जाता है।

वैज्ञानिक और कविता

‘Scientists take on poetry (साइंटिस्ट टेक ऑन पोएट्री)' नामक साइट बताती है कि गणितज्ञ एडा लवलेस, रसायनज्ञ हम्फ्री डेवी और भौतिक विज्ञानी जेम्स मैक्सवेल ने अपने काम के बारे में कविताएँ लिखी हैं। भारत में, वैज्ञानिक एस. एस. भटनागर ने हिंदी में कविताएँ लिखीं। वैसे सी. वी. रमन कवि तो नहीं थे; लेकिन वायलिन की संगीतमय ध्वनियों का वैज्ञानिक आधार जानने में उनकी रुचि थी और उन्होंने ‘एक्सपेरिमेंट विथ मेकेनिकली प्लेड वायलिन’ (यांत्रिक तरीके से बजाए जाने वाले वायलिन के साथ प्रयोग) शीर्षक से एक शोधपत्र लिखा था, जो 1920 में प्रोसिडिंग्स ऑफ दी इंडियन एसोसिएशन फॉर दी कल्टीवेशन ऑफ साइंस में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने भारतीय आघात वाद्य यंत्रों (ड्रम या ताल वाद्यों) की विशिष्टता का भी अध्ययन किया। तबला और मृदंग की ध्वनियों की हारमोनिक प्रकृति का उनका विश्लेषण भारतीय ताल वाद्यों पर पहला वैज्ञानिक अध्ययन था। 

इसी तरह, भौतिक विज्ञानी एस. एन. बोस तंतु वाद्य एसराज बजाया करते थे। बर्डमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर प्रकृतिविद सालिम अली ने भारत के पक्षियों पर कई किताबें लिखीं। और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर श्रीराम रंगराजन (जिनका तखल्लुस ‘सुजाता’ है) ने तमिल में बेहतरीन किताबें और लेख लिखे, जिन्हें उनके भाषा कौशल के कारण हर जगह सराहा जाता है। क्या ऐसे और वैज्ञानिक नहीं होने चाहिए जो संगीत पर कविताएँ और निबंध लिखें? (स्रोत फीचर्स)

Nov 1, 2024

जीव जगतः हिमालय के रंग- बिरंगे मैगपाई

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

दहियर या मैगपाई पक्षी कॉर्विडे (Corvidae) कुल के सदस्य हैं, जिसमें कौवा, नीलकण्ठ और रैवन आते हैं। आम तौर पर इस कुल के पक्षियों को कांव-कांव करने वाले और जिज्ञासु पक्षी के तौर पर देखा जाता है। दुनिया भर की लोककथाओं में अक्सर इन्हें शगुन-अपशगुन के साथ भी जोड़ा जाता है। जैसे कुछ युरोपीय संस्कृतियों में इन्हें चुड़ैलों का साथी माना जाता हैं। अंग्रेज़ी की एक तुकबंदी कहती है कि यदि एक अकेली मैगपाई दिखे तो बुरी खबर सुनने को मिलती है: “One for sorrow, two for joy; three for a girl, four for a boy; Five for silver, six for gold; Seven for a secret never to be told,” (हिंदी में यह कुछ इस तरह होगी: “एक यानी दुख, दो यानी खुशी; तीन यानी लड़की, चार यानी लड़का; पाँच यानी चाँदी, छह यानी सोना; सात यानी किसी को न बताने वाला राज़।” )

लेकिन यह तो सभी मानेंगे कि मैगपाई दिखने में आकर्षक होती हैं। और इसकी कुछ सबसे सजीली (रंग-बिरंगी) प्रजातियाँ हिमालय में पाई जाती हैं।


नीली मैगपाई की कुछ निकट सम्बंधी प्रजातियाँ कश्मीर से लेकर म्यांमार तक में दिखना आम हैं। सुनहरी चोंच वाली मैगपाई (Urocissa flavirostris, जिसे पीली चोंच वाली नीली मैगपाई भी कहते हैं) की आँखें शरारती लगती हैं, और यह समुद्रतल से 2000 से 3000 मीटर ऊँचे स्थलों पर मिलती है। इससे थोड़ी कम ऊँचाई पर हमें लाल चोंच वाली मैगपाई दिखाई देती हैं, और नीली मैगपाई निचले इलाकों पर पाई जाती है जहाँ बड़ी तादाद में इंसान रहते हैं।

ट्रेकिंग पथ

पीली और लाल चोंच वाली मैगपाई सबसे अधिक दिखाई देती हैं पश्चिमी सिक्किम के ट्रैकिंग पथ पर, जो समुद्र तल से 1780 मीटर की ऊँचाई पर स्थित युकसोम कस्बे से शुरू होता है और लगभग 4700 मीटर की ऊँचाई पर गोचे ला दर्रे तक जाता है जहाँ से कंचनजंगा के शानदार नज़ारे दिखते हैं। इस ट्रेकिंग में आपका सफर थोड़ी ऊँचाई पर उष्णकटिबंधीय आर्द्र चौड़ी पत्ती वाले वन से शुरू होता है, उप-अल्पाइन जंगलों से गुज़रते हुए ऊंचाई पर आप वृक्षविहीन, जुनिपर झाड़ियों वाली जगह पर पहुँचते हैं। बीच में कहीं-कहीं ऐसे जंगल भी मिलते हैं जिनके घने आच्छादन से आप ढंके होते हैं, और जहाँ आपको पक्षियों की हैरतअंगेज़ विविधता और आबादी दिखती है।

सिक्किम गवर्नमेंट कॉलेज के प्राणी शास्त्रियों द्वारा किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों से पता चला है कि इस क्षेत्र में पक्षियों की 250 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, और समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊँचाई पर आप हर पाँच मिनट के अंतराल पर लगभग 60 अलग-अलग पक्षियों को देख या सुन सकते हैं। सुनहरी चोंच वाली मैगपाई की कूक अक्सर इन पक्षियों के कलरव के साथ सुनाई देती है। इस मैगपाई का शरीर लगभग कबूतर जितना बड़ा होता है, लेकिन इसकी पूंछ 45 सेंटीमीटर लंबी होती है, जिससे इसकी कुल लंबाई 66 सेंटीमीटर हो जाती है। ज़मीन पर कीड़े-मकोड़ों-कृमियों की तलाश करते समय इसकी पूँछ ऊपर की ओर उठी रहती है; लेकिन पेड़ों से जामुन तोड़ते समय इसकी पूँछ नीचे की ओर झुक जाती है। इसकी उड़ान भी खास होती है: शुरुआत में थोड़े समय तक यह लगातार पंख फड़फड़ाती है, और फिर उसके बाद देर तक हवा में शांत तैरती रहती है।

फूलदार बुरुंश

सुनहरी चोंच वाली मैगपाई बुरूँश  वृक्ष पर उस जगह घोंसला बनाती है जहाँ शाखाएँ  दो में बंटती हैं। उसका घोंसला टहनियों पर जल्दबाज़ी में घास की मुलायम तह लगाकर बनाया गया लगता है। इन घोंसलों में मई-जून में तीन से छह अंडे दिए जाते हैं। चूज़ों का पालन-पोषण माता-पिता दोनों मिलकर करते हैं। अच्छी बात है, जैसा कि तुकबंदी में कहा गया है – ‘दो यानी खुशी’।

नीली मैगपाई और लाल चोंच वाली मैगपाई दिखने में बहुत हद तक एक जैसी दिखती हैं, बस एक थोड़ी छोटी होती है। नीली मैगपाई जंगलवासी पक्षी नहीं है, और अक्सर गाँवों के आसपास पाई जाती हैं। मैगपाई की सभी प्रजातियाँ या तो अकेले फुदकते हुए, या जोड़े में, या शोरगुल मचाते हुए 8-10 के झुंड में देखी जा सकती हैं।

जैसे-जैसे इंसानों की जंगलों में मौजूदगी बढ़ रही है, इस बात की चिंता बढ़ रही है कि ये पक्षी इस दखल का कितना सामना कर पाएँगे। बुरूँश झाड़ी के रंग-बिरंगे फूल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। पर्यटकों को ठहराने और उनकी सुविधाओं के लिए ग्रामीण अक्सर जलाऊ लकड़ी जैसे वन संसाधनों को दोहते हैं। आशा है कि कृषि की तरह पर्यटन भी एक वहनीय व्यापार करना सीखेगा। (स्रोत फीचर्स)

Oct 1, 2024

स्वास्थ्यः नारियल के फायदे अनेक

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

वर्ष 2014 में उमा आहूजा और उनके साथियों ने एशियन एग्री-हिस्ट्री पत्रिका में प्रकाशित एक शोधपत्र में बताया था कि नारियल के पेड़ों को मलेशिया (Malesia) जैव-भौगोलिक क्षेत्र मूल का माना जाता है। जैव-भौगोलिक क्षेत्र यानी वह क्षेत्र जिसमें वितरित जंतुओं और पादपों के गुणों में समानता होती है। मलेशिया जैव-भौगोलिक क्षेत्र में दक्षिण पूर्व एशिया (विशेष रूप से भारत), इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी और प्रशांत महासागर में स्थित कई द्वीप समूह आते हैं। इस पेपर में पुरातात्त्विक साक्ष्यों, पुरालेखों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों, और इसके उपयोग एवं इससे जुड़ी लोककथाओं के माध्यम से नारियल के इतिहास पर बात की गई है।
पुरातात्त्विक खुदाई के अलावा भारत में नारियल का उल्लेख शिलालेखों तथा धार्मिक, कृषि और आयुर्वेदिक महत्त्व के ग्रंथों में मिला है। इसके उपयोगों की बहुलता ने इसे जीवन-वृक्ष, समृद्धि-वृक्ष और कल्पवृक्ष (एक वृक्ष जो जीवन की सभी ज़रूरतें पूरी करता है) जैसे विशेषणों से नवाज़ा है। लेखक बताते हैं कि इसके खाद्य महत्त्व के अलावा इसके स्वास्थ्य, औषधीय और सौंदर्य लाभ भी हैं।
भारत में, नारियल मुख्य रूप से दक्षिणी राज्यों - केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है। 90% से अधिक नारियल का उत्पादन इन्हीं राज्यों में होता है। ऐसा इसलिए है; क्योंकि इन पेड़ों को गर्म और रेतीली मिट्टी की आवश्यकता होती है - ऐसी मिट्टी, जिसमें जल- निकासी बढ़िया हो और पोषक तत्त्व  भरपूर हों। साथ ही, इन्हें गर्म और आर्द्र जलवायु, और प्रचुर वर्षा की भी ज़रूरत होती है। 
उत्तर भारत की जलवायु मुख्यत: समशीतोष्ण है, जिसमें - जाड़े में अच्छी ठंड और गर्मियों में भीषण गर्म पड़ती है। इस क्षेत्र में अलग-अलग मौसम होते हैं और वर्षा भी असमान होती है, जो नारियल के पेड़ों की वृद्धि के लिए अनुकूल नहीं है। हालाँकि, पूर्वोत्तर के कुछ राज्य भी उपयुक्त तापमान और वर्षा के चलते नारियल उगाते हैं, लेकिन वहाँ की मिट्टी चिकनी है जो नारियल के पेड़ों के उगने के लिए आदर्श नहीं है।
नारियल की भूमिका
भगवान को प्रसाद में चढ़ाई जाने वाली कई वस्तुओं में नारियल का एक विशेष और उच्च स्थान है। इसका उपयोग धार्मिक और सामाजिक समारोहों में किया जाता है, वहाँ भी जहाँ इसकी खेती नहीं होती। नारियल के पेड़ का रत्ती भर हिस्सा भी बेकार नहीं जाता, सभी हिस्सों को किसी न किसी उपयोग में लिया जाता है। अपनी अनगिनत उपयोगिताओं और खाद्य, चारा एवं पेय के रूप में प्रत्यक्ष उपयोग के ज़रिए नारियल ने विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और भाषायी तौर पर जगह बना ली है।
दक्षिण भारत में नारियल दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक मंदिर को नारियल के पेड़ों से सजाया जाता है, इसके (श्री)फल भगवान को चढ़ाए जाते हैं और भक्तों को प्रसाद के रूप में थोड़ा सा खोपरा और नारियल पानी दिया जाता है। 
तरावट और स्वास्थ्य के मामले में नारियल पानी का कोई सानी नहीं है; यह तो अमृत ही है! और, मिठाई ‘कोलिक्कतई' (या ‘मोदक') का भी कोई सानी नहीं है, जो नारियल की ‘गरी' से बनाई जाती है! (यह भगवान गणेश की पसंदीदा मिठाई है)। इसके अलावा, तमिलनाडु में पले-बढ़े होने के कारण मुझे (मेरी इच्छा के विपरीत) मेरी दादी हर महीने अरंडी के तेल या नारियल के तेल से स्नान करने के लिए मजबूर किया करती थीं!
स्वास्थ्य लाभ
नारियल के कई फायदे हैं। वेबसाइट Healthline.com इसकी ‘गरी' में पाए जाने वाले कई पोषक तत्त्वों को सूचीबद्ध करती है: भरपूर वसा, भरपूर फाइबर, और विटामिन ए, डी, ई और के, जो अधिक खाने को नियंत्रित करते हैं और पेट को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। 
इसके तेल की बात करें तो कुछ समूहों का सुझाव है कि नारियल का तेल शरीर की धमनियों और नसों में रक्त प्रवाह को लाभ पहुँचाता है, इस प्रकार यह हमारे हृदय की सेहत के लिए फायदेमंद होता है। कुछ समूह यह भी सुझाव देते हैं कि इससे अल्ज़ाइमर रोग थोड़ा टल सकता है, हालांकि इस सम्बंध में अधिक प्रमाण की आवश्यकता है। 
एक वरिष्ठ नागरिक होने के नाते मैं नारियल तेल का उपयोग करता हूँ, इस उम्मीद में कि यह मुझे ऐसी स्थितियों से बचाएगा। मैं अक्सर अपने सुबह के नाश्ते में टोस्ट पर मक्खन की जगह नारियल का तेल ही लगाता हूँ। मेरी दादी देखतीं, तो प्रसन्न होतीं! (स्रोत फीचर्स)

Jul 7, 2024

खान - पानः आम फलों का राजा क्यों है?

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

देश में आम का मौसम जारी है, और इसी के साथ यह बहस भी कि आम की कौन सी किस्म सबसे बढ़िया है। तेलंगाना के लोगों का कहना है कि ‘बंगनपल्ली' और ‘बेनिशां' आम का कोई सानी नहीं है; आम की कोई भी अन्य किस्म इनके आसपास भी नहीं ठहरती। मेरी पत्नी और उनका परिवार गुजरात से है; उनका कहना है कि सबसे अच्छे आम रत्नागिरी या हापुस (Alphonso) हैं। और उत्तर प्रदेश के रहवासी मेरे दोस्त दसहरी आम के गुण गाते नहीं थकते।
आम के बगीचे लगाने, पैदावार और आम के शौकीन लोगों के हिसाब से भारत पहले नंबर पर है और फिर चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस, पाकिस्तान और मेक्सिको का नंबर आता है। हालांकि, दुनिया भर में पैदा होने वाले कुल आमों में से 54.2 प्रतिशत के योगदान साथ भारत आम उत्पादन में सबसे अव्वल है। हम न सिर्फ सबसे ज़्यादा आम खाते हैं, बल्कि निर्यात भी करते हैं। पिछले साल हमने 28,000 मीट्रिक टन आम निर्यात किए थे और इससे करीब 4 अरब रुपए कमाए थे।
डॉ. के. टी. अचया अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में बताते हैं कि आम मूलत: भारत का देशज है, जिसे उत्तरपूर्वी पहाड़ों और म्यांमार में उगाया जाता था, और पड़ोसी देशों में निर्यात किया जाता था। आजकल, आम के बगीचे उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लगाए जाते हैं; प्रत्येक राज्य के फलों का अपना विशेष स्वाद होता है।
पिछली गणना के अनुसार, भारत में आम की 1000 से अधिक किस्में हैं। इतनी विविध किस्मों का श्रेय जाता है आम के पौधों की आसान ग्राफ्टिंग को। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तीन केन्द्र आम अनुसंधान में अग्रणी हैं। इसके अलावा, नई दिल्ली स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी आम के पौधे के बुनियादी जीव विज्ञान को समझने के लिए उसके जीनोम का विश्लेषण कर रहा है। आम को फलों का राजा क्यों कहा जाता है?इसका कारण यह है कि आम न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि यह सबसे स्वास्थ्यप्रद भी है; अन्य फलों के मुकाबले एक आम से अधिक विटामिन A, B, C, E और K, तथा अन्य धात्विक यौगिक (मैग्नीशियम, कॉपर, पोटेशियम), और एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्वास्थ्य लाभ कई अन्य फलों से भी मिलते हैं, लेकिन आम सबमें अव्वल है क्योंकि इसमें अन्य की तुलना में विटामिन, खनिज और फाइबर सबसे अधिक होते हैं। इसलिए इसकी बादशाहत है।
अमेरिका के क्लीवलैंड क्लीनिक की वेबसाइट पर एक दिलचस्प लेख है, जिसका शीर्षक है: मैंगोलिशियस: आम के प्रमुख छह स्वास्थ्य लाभ (Mangolicious: the top six health benefits of mango)। ये लाभ हैं : 
1. यह आपका पेट दुरुस्त करता है; इसका उच्च फाइबर परिमाण कब्ज़ और पेट फूलने से निपटने में मदद करता है;
2. आम भूख को नियंत्रित करने में मदद करता है, जो आपको अपने स्वास्थ्यकर खाने के लक्ष्यों पर टिके रहने में मदद कर सकता है;
3. आम में मौजूद विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट बालों और त्वचा को स्वस्थ रखते हैं;
4. इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं; 
5. आम खाने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है; और
6. आम में मौजूद एक एंटीऑक्सीडेंट - मैंगिफेरिन - कुछ प्रकार के कैंसर को रोकने में मदद करता है। और तो और, हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने भी यह पता लगाया है कि मैंगिफेरिन अल्सर को कम करता है।
स्वाद, किस्में, उपलब्धता और स्वास्थ्य लाभ - इन सभी के मद्देनज़र चलिए हम सभी अपने-अपने पसंदीदा बादशाह आम का लुत्फ उठाएँ! (स्रोत फीचर्स)

Jun 1, 2024

वन- संपदाः हमारे पास कितने पेड़ हैं?

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चित्रः स्वाति बरणवाल

पृथ्वी पर कितने पेड़ हैं, कुछ साल पहले इसका विस्तृत विश्लेषण किया गया था। वृक्षों की गणना के इस विश्व स्तरीय प्रयास में ज़मीनी वृक्षों की गणना प्रादर्श के आधार पर की गई थी, और उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों के साथ रखकर उन आँकड़ों को देखा गया था। और फिर एक परिष्कृत एल्गोरिदम की मदद से आँकड़ों का विश्लेषण करके वृक्षों की कुल संख्या का अनुमान लगाया गया था। अध्ययन का अनुमान था कि हमारी पृथ्वी पर करीब तीस खरब पेड़ हैं। यह संख्या चौंकाने वाली है, क्योंकि यह पूर्व में वैज्ञानिकों द्वारा लगाए गए सभी अनुमानों से बहुत ज़्यादा है। अध्ययन का निष्कर्ष था कि विश्व में प्रति व्यक्ति औसतन 400 से थोड़े अधिक पेड़ हैं। उपग्रह चित्रों से यह भी पता चला कि ये पेड़ पृथ्वी पर किस तरह वितरित हैं।

पृथ्वी पर मौजूद कुल पेड़ों का 15-20 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण अमेरिकी वर्षा वनों में है। इसके बाद बारी आती है कनाडा और रूस में फैले बोरियल जंगलों या टैगा में शंकुधारी (कोनिफर) वनों की। शंकुधारी वृक्षों की इस प्रचुरता के परिणामस्वरूप, कनाडा का प्रत्येक बाशिंदा लगभग 9000 वृक्षों से ‘समृद्ध' है।

इसके ठीक विपरीत, मध्य पूर्वी द्वीप राष्ट्र बाहरीन के 15 लाख वासियों को मात्र 3100 पेड़ों का सहारा है। यहां प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में मात्र पाँच पेड़ हैं।

अन्य ऑक्सीजन स्रोत

यह गौरतलब है कि पृथ्वी के विशाल क्षेत्र अपेक्षाकृत कम पेड़ों वाले घास के मैदान हैं। कुल मिलाकर, घास उतनी ही ऑक्सीजन बना सकती है जितना कि दुनिया भर के पेड़। फिर, हमारे पास समुद्री सायनोबैक्टीरिया और शैवाल हैं - इन सूक्ष्मजीवों के प्रकाश संश्लेषण से उतनी ही ऑक्सीजन बनती है जितनी कि सभी स्थलीय पेड़-पौधों से।

पेड़ ऑक्सीजन बनाने के अलावा वातावरण से कार्बन हटाने में अहम भूमिका निभाते हैं। लाखों साल पहले उगे पेड़ दलदल में डूबने और दबने के बाद धीरे-धीरे कोयले में बदल गए, और इस तरह उन्होंने कार्बन को बहुत लंबे समय तक वायुमंडल में जाने से थामे रखा। बेशक, आप बिजली पैदा करने के लिए थर्मल पावर प्लांट में कोयले को जला कर कार्बन को वायुमंडल में वापस जाने से रोकने की पेड़ों की सारी मेहनत पर फटाफट पानी फेर सकते हैं, साथ ही साथ कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में छोड़कर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा सकते हैं।

भारत का वन आवरण

हमारे अपने देश के लिए अनुमान है कि भारत के प्रत्येक व्यक्ति पर लगभग 28 पेड़ हैं। उच्च जनसंख्या घनत्व और लंबे समय से हो रही वनों की कटाई के कारण यह संख्या इतनी ही रह गई है। बांग्लादेश, जिसका जनसंख्या घनत्व भारत से तीन गुना अधिक है, वहां प्रति नागरिक छह पेड़ हैं। नेपाल और श्रीलंका दोनों देशों में प्रति व्यक्ति सौ से थोड़े अधिक पेड़ हैं।

भारत की भौगोलिक विविधता के चलते प्राकृतिक वन क्षेत्र में बड़ा फर्क है। पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में, पूर्वोत्तर भारत में और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में नम उष्णकटिबंधीय वनों का घना आच्छादन, उच्च वर्षा और समृद्ध जैव विविधता देखी जाती है। अरुणाचल प्रदेश का अस्सी प्रतिशत भूक्षेत्र वनों से आच्छादित है; वहीं राजस्थान में यह वन आच्छादन 10 प्रतिशत से भी कम है।

भारत के एक-तिहाई हिस्से को वन आच्छादित बनाने की वन नीति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अभी काफी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। पुनर्वनीकरण के प्रयास इस लक्ष्य को हासिल करने में योगदान देते हैं, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है वनों की कटाई को रोकना। इस मामले में दक्षिणी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। भारत राज्य वन रिपोर्ट (ISFR) 2021 की रिपोर्ट के अनुसार वन आवरण में सबसे अच्छा सुधार करने वाले तीन राज्य हैं कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।  

Apr 1, 2024

स्वास्थ्यः ऊँचे पहाड़ जीवन के लिए बेहतर

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

समुद्र तल से 4570 मीटर की ऊँचाई पर बसा लद्दाख का कर्ज़ोक गाँव हमारे देश की सबसे ऊँची बस्ती है। आबादी है तकरीबन 1300। हिमाचल प्रदेश के कोमिक और हानले गाँव भी समुद्र तल से 4500 मीटर से अधिक की ऊँचाई बसे हैं। 

अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 64 लाख लोग (विश्व जनसंख्या के लगभग 0.1 प्रतिशत) समुद्र तल से 4000 मीटर या अधिक की ऊँचाई पर रहते हैं। इनमें से अधिकतर लोग 10,000 से अधिक वर्षों से दक्षिणी अमेरिका के एंडीज़ और एशिया के तिब्बत के ऊँचे मैदानी इलाकों में रहते आए हैं। कम ऊँचाई पर रहने वाले लोग जब अधिक ऊँचाई पर पहुँचते हैं तो वहाँ की अधिक ठंड और कम वायुमंडलीय दाब, जिसके कारण यहाँ ऑक्सीजन कम होती है, से तालमेल बनाने में कठिनाई होती है। तो सवाल यह है कि वहाँ रहने वाले लोग इसके प्रति कैसे अनुकूलित हैं और उन्हें क्या मुश्किलें पेश आती हैं?

उसमें जाने से पहले आर्थिक हालात पर एक नज़र डालते हैं। हिमालय जैसी जगहों पर बहुत कम लोगों के बसने का एक मुख्य कारण है अवसरों की कमी। अव्वल तो खेती के लिए खड़ी पहाड़ी ढलानों को सपाट या सीढ़ीदार आकार देने की आवश्यकता होती है। फिर, सिंचाई के लिए पानी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, जैसे-जैसे आप ऊँचाई पर जाते हैं तो मिट्टी को पोषण प्रदान करने वाले जीव (जैसे कवक और कृमि) कम होते जाते हैं।

ऊँचे इलाकों में मवेशियों, जैसे हिमालय में याक और एंडीज़ में लामा, अलपाका और विकुना, की चराई साल के केवल गर्म महीनों में संभव है। जहाँ संसाधन मिलते हैं वहाँ खनन किया जाता है। दुनिया की सबसे ऊँची बस्ती पेरु स्थित ला रिकोनेडा (ऊँचाई समुद्र तल से 5100 मीटर) में सोने की खान पता चलने के बाद हज़ारों लोग वहाँ बसना चाहते हैं। आजकल एडवेंचरस पर्यटन भी जीविका प्रदान करता है – समुद्र तल से 4950 मीटर की ऊँचाई पर स्थित नेपाल का लोबुचे गाँव माउंट एवरेस्ट फतह करने की कोशिश करने वाले पर्वतारोहियों को आश्रय देता है।

फेफड़ों की क्षमता

कम ऊँचाई पर रहने वाले लोग जब अधिक ऊँचाई पर जाते हैं तो उनकी आधारभूत चयापचय दर 25-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। आधारभूत चयापचय दर कैलोरी की वह मात्रा है , जो तब खर्च होती है जब आप कुछ ना करें, पूरे दिन बिस्तर पर पड़े रहें। उच्च आधारभूत चयापचय का मतलब है कि शरीर को अधिक ऑक्सीजन चाहिए होती है जबकि हवा कम है और ऑक्सीजन भी कम है। ऐसे कम ऑक्सीजन वाले माहौल में अनुकूलित होने में कुछ हफ्ते लगते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अधिक ऊँचाई के लिए अनुकूलित तिब्बतियों और एंडियन्स की आधारभूत चयापचय दर मैदानों में रहने वाले लोगों के बराबर ही होती है। फोर्स्ड वाइटल केपेसिटी (FVC) श्वसन सम्बंधी एक आंकड़ा होता है। यह हवा की वह अधिकतम मात्रा है जिसे आप गहरी सांस खींचने (फेफड़ों में भरने) के बाद ज़ोर लगाकर बाहर छोड़ सकते हैं। ऊँचाई पर रहने के लिए अनुकूलित पुरुषों में यह फोर्स्ड वाइटल कैपेसिटी 15 प्रतिशत अधिक और महिलाओं में 9 प्रतिशत अधिक होती है। और प्रति सेंकड श्वास के साथ छोड़ी गई हवा भी अधिक होती है।

दक्षिण अमेरिका के मूल निवासी केचुआ जाति (इन्का लोग इसी समूह के हैं) के लोगों का सीना गहरा होता है। अधिक ऊँचाई पर पैदा हुए और पले-बढ़े इन लोगों की फोर्स्ड वाइटल कैपेसिटी समुद्र के करीब रहने वाले इनके वंश के लोगों और रिश्तेदारों की तुलना में अधिक होती है।

लगता है कि जीवन की कठिन परिस्थितियाँ फिटनेस सुनिश्चित करती हैं। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जि़ले में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि 70-74 वर्ष की आयु में भी औसत रक्तचाप 120/80 बना रहता है।

अधिक ऊँचाई पर रहने से जुड़ी कठिनाइयों के साथ कुछ फायदे भी हो सकते हैं। मई 2023 में प्लॉस वन बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में मूलत: कम जीवनकाल वाले चूहों की एक नस्ल के साथ काम करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया कि एवरेस्ट बेस कैंप जैसी कम ऑक्सीजन वाली आबोहवा में ये चूहे 50 प्रतिशत ज़्यादा जीवित रहे!    ■

Feb 3, 2024

स्वास्थ्यः दिल के लिए... बैठने से बेहतर है

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

पूर्व में प्रकाशित एक लेख व्यायाम दिमाग को जवान रख सकता है में हमने चर्चा की थी कि व्यायाम हमारे मस्तिष्क को युवा रखता है। उसमें यह भी बात हुई थी कि नियमित व्यायाम और उचित आहार मस्तिष्क को युवा रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं; ठीक उसी तरह जैसे कोई नई भाषा सीखने या कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखने की प्रवृत्ति। 

हाल ही में युनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के जे. एम. ब्लोडेट और उनके साथियों ने युरोपियन हार्ट जर्नल में एक अध्ययन प्रकाशित किया है जिसके अनुसार वयस्कों में मृत्यु का प्रमुख कारण हृदय और रक्त-परिसंचरण सम्बंधी रोग हैं। दुनिया भर के 15,000 से अधिक लोगों का अध्ययन करने के बाद उनका सुझाव है कि मध्यम से द्रुत गति की गतिविधि फायदेमंद होती है। इनमें दौड़ना, तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ना और लगभग एक घंटे तक फुर्तीला व्यायाम करना जैसी साधारण गतिविधियाँ शामिल हैं। हममें से बहुत से लोग ऑफिस में काम के दौरान पूरा दिन अपनी मेज़ पर बैठे रहते हैं, और फिर घर पर टीवी देखते या लैपटॉप का उपयोग करते समय भी। इसलिए, हमारे हृदय और स्वास्थ्य में सुधार के लिए उपरोक्त आसान गतिविधियों के अलावा खेल या तैराकी करना भी उपयोगी होगा। इसके अलावा ‘कार्यात्मक भोजन' (जिनका उल्लेख पिछले लेख कार्यात्मक खाद्य पदार्थों के स्वास्थ्य लाभ में किया गया था) भी हमारे हृदय और स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

अच्छी नींद

न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया युनिवर्सिटी के शोधकर्ता बताते हैं कि अच्छी नींद भी हमारे दिल के लिए अच्छी है। एकाग्रता, नया सीखने और याददाश्त जैसे संज्ञानात्मक कौशल को बरकरार रखने में नींद मदद करती है। वहीं उचटती (या अल्प या खराब) नींद अपेक्षाकृत मामूली तनावों से भी निपटना अधिक मुश्किल बना सकती है और दुनिया को सटीक रूप से समझने की हमारी क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, रोचेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता बताते हैं कि नींद वयस्क मस्तिष्क से चयापचय सफाई को प्रेरित करती है; दूसरे शब्दों में, यह तंत्रिका-विष कचरे (जैसे बीटा-एमिलॉयड नामक प्लाक जो मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाओं के बीच संचार को बाधित करता है) को हटा देती है जो दिन भर की गहमा-गहमी के दौरान जमा हो जाते हैं।

हम वयस्कों को हर रात लगभग सात घंटे की नींद की ज़रूरत होती है। तो लाइट बंद कर दें, किताब पढ़ना बंद कर दें, टीवी बंद दें और अपने सेलफोन को साइलेंट मोड में रख दें, और विषाक्त पदार्थों की सफाई होने दें। और यदि हम सेवानिवृत्त लोग दोपहर के भोजन के बाद सोते हैं, तो हमें लगभग एक घंटे ही सोना चाहिए और फिर तेज़ चाल में सीढ़ियाँ चढ़ना चाहिए और एक या दो घंटे व्यायाम करना चाहिए। जो लोग खेल खेलते हैं वे शाम को भी ऐसा कर सकते हैं।

सोते समय, कौन-सी शारीरिक-स्थिति (मुद्रा) आपके लिए सबसे अच्छी है? इस बारे में स्लीप हेल्थ नामक वेबसाइट निम्नलिखित सलाह देती है। दाईं करवट सोएँ या बाईं करवट - यह आपकी सहूलियत पर निर्भर करता है। पीठ के बल सोने की बजाय करवट लेकर सोने से संभवत: दर्द से राहत मिल सकती है, खर्राटे भरने (और दूसरों की नींद में खलल डालने) का खतरा कम हो सकता है, और पीठ दर्द को कम करके रीढ़ की हड्डी के सीधे होने में सुधार हो सकता है। यह मस्तिष्क से कचरे (बीटा एमिलॉयड) को तेज़ी से हटाने में मदद करता है। किस करवट सोना है, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन गर्दन के दर्द, जकड़न और सिरदर्द को कम करने के लिए अपनी बाँह का नहीं, बल्कि तकिये का उपयोग करें। गद्दे का उपयोग करना भी मददगार होता है। यह पीठ, गर्दन, रीढ़ और पैरों को पर्याप्त सहारा देता है। तो स्वस्थ नींद लें और अच्छे सपने देखें - सात घंटे! (स्रोत फीचर्स)


Nov 6, 2023

जीव- जगतः ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक उल्लू

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारतीय चील-उल्लू (Bubo bengalensis) को कुछ वर्षों पूर्व ही एक अलग प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया था और इसे युरेशियन चील- उल्लू (Bubo bubo) से अलग पहचान मिली थी। भारतीय प्रजाति सचमुच एक शानदार पक्षी है। मादा नर से थोड़ी बड़ी होती है और ढाई फीट तक लंबी हो सकती है, और उसके डैनों का फैलाव छह फीट तक हो सकता है। इनके विशिष्ट कान सिर पर सींग की तरह उभरे हुए दिखाई देते हैं। इस बनावट के पीछे एक तर्क यह दिया जाता है कि ये इन्हें डरावना रूप देने के लिए विकसित हुए हैं ताकि शिकारी दूर रहें। यदि यह सही है, तो ये सींग वास्तव में अपना काम करते हैं और डरावना आभास देते हैं।

निशाचर होने के कारण इस पक्षी के बारे में बहुत कम मालूमात हैं। इनके विस्तृत फैलाव (संपूर्ण भारतीय प्रायद्वीप) से लगता है कि इनकी आबादी काफी स्थिर है; लेकिन पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता क्योंकि ये बहुत आम पक्षी नहीं हैं। इनकी कुल संख्या की कभी गणना नहीं की गई है। हमारे देश में वन क्षेत्र में कमी होते जाने से आज कई पक्षी प्रजातियों की संख्या कम हो रही है। लेकिन भारतीय चील-उल्लू वनों पर निर्भर नहीं है। उनका सामान्य भोजन, जैसे चूहे, बैंडिकूट और यहाँ तक कि चमगादड़ और कबूतर तो झाड़-झंखाड़ और खेतों में आसानी से मिल जाते हैं। आसपास की चट्टानी जगहें इनके घोंसले बनाने के लिए आदर्श स्थान हैं।

मिथक, अंधविश्वास

मानव बस्तियों के पास ये आम के पेड़ पर रहना पसंद करते हैं। ग्रामीण भारत में, इस पक्षी और इसकी तेज़ आवाज़ को लेकर कई अंधविश्वास हैं। इनका आना या इनकी आवाज़ अपशकुन मानी जाती है। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने लोककथाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है जो यह कहती हैं कि चील- उल्लू को पकड़कर उसे पिंजरे में कैद कर भूखा रखा जाए, तो यह मनुष्य की आवाज़ में बोलता है और लोगों का भविष्य बताता है।

उल्लू द्वारा भविष्यवाणी करने सम्बंधी ऐसे ही मिथक यूनानी से लेकर एज़्टेक तक कई संस्कृतियों में व्याप्त हैं। कहीं माना जाता है कि वे भविष्यवाणी कर सकते हैं कि युद्ध में कौन जीतेगा, तो कहीं माना जाता है कि आने वाले खतरों की चेतावनी दे सकते हैं। लेकिन हम उन्हें ज्ञान से भी जोड़ते हैं। देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू (उलूक) ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भारतीय चील- उल्लू से जुड़े नकारात्मक अंधविश्वास हमें इनके घोंसले वाली जगहों पर इनकी उग्र सुरक्षात्मक रणनीति पर विचार करने को मजबूर करते हैं। इनके घोंसले चट्टान पर खरोंचकर बनाए गोल कटोरेनुमा संरचना से अधिक कुछ नहीं होते, जिसमें ये चार तक अंडे देते हैं। इनके खुले घोंसले किसी नेवले या इंसान की आसान पहुँच में होते हैं। यदि कोई इनके घोंसले की ओर कूच करता है, तो ये उल्लू खूब शोर मचाकर उपद्रवी व्यवहार करते हैं, और घुसपैठिये के सिर पर पीछे की ओर से अपने पंजे से झपट्टा मारकर वार करते हैं।

खेती में लाभकारी

इन उल्लुओं की मौजूदगी से किसानों को निश्चित ही लाभ होता है। एला फाउंडेशन और भारतीय प्राणि वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि झाड़- झंखाड़ के पास घोंसले बनाने वाले भारतीय चील-उल्लुओं की तुलना में खेतों के पास घोंसले बनाने वाले भारतीय चील-उल्लू संख्या में अधिक और स्वस्थ होते हैं। ज़ाहिर है, उन्हें चूहे वगैरह कृंतक जीव बड़ी संख्या में मिलते होंगे। और उल्लुओं के होने से किसानों को भी राहत मिलती होगी।

इन उल्लुओं का भविष्य क्या है? भारत में पक्षियों के प्रति रुचि बढ़ती दिख रही है। पक्षी निरीक्षण (बर्ड वॉचिंग),  जिसे एक शौक कहा जाता है, अधिकाधिक उत्साही लोगों को लुभा रहा है। ये लोग पक्षियों की गणना, सर्वेक्षण और प्रवासन क्षेत्रों का डैटा जुटाने में योगदान दे रहे हैं। लेकिन यह काम अधिकतर दिन के उजाले में किया जाता है जिसमें उल्लुओं के दर्शन प्राय: कम होते हैं। उम्मीद है कि भारतीय चील-उल्लू जैसे निशाचर पक्षियों के भी दिन (रात) फिरेंगे। 

Nov 5, 2023

पर्यावरणः वनों की कटाई के दुष्प्रभाव

  -  डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन


 विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1990 के बाद से सदी के अंत तक, 11 अरब मनुष्यों का पेट भरने की खातिर 42 करोड़ हैक्टर वन अन्य भूमि उपयोगों (जैसे कृषि, औद्योगिक और जैव ईंधन वगैरह) में तबदील करके गंवा दिए गए हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत, चीन और अफ्रीका जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों पर होगा।

बढ़ते तापमान के कारण

खाद्य व कृषि संगठन द्वारा प्रकाशित वैश्विक वन संसाधन आकलन बताता है कि पृथ्वी पर 31 प्रतिशत भूमि वन से ढंकी है। जब पेड़ काटे जाते हैं तो वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड जमा होने लगती है, नतीजतन वैश्विक तापमान बढ़ता है। वनों की कटाई के कारण ग्रीनहाउस गैसों (CO2, CH4, N2O, SO2 व CFCs) का वैश्विक उत्सर्जन 11 प्रतिशत बढ़ा है। इस संदर्भ में हारवर्ड युनिवर्सिटी पब्लिक हेल्थ ग्रुप आगे बताता है कि वनों की कटाई के कारण डेंगू-मलेरिया जैसे रोगों के लिए ज़िम्मेदार कीटाणु बढ़ते हैं, जो मनुष्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

एनवॉयरमेंटल सोसाइटी ऑफ इंडिया के डॉ. एस. बी. कद्रेकर बताते हैं कि सिर्फ पेड़ ही नहीं बल्कि मिट्टी और पानी को भी बचाना होगा। वनों की कटाई में एक प्रतिशत की वृद्धि होने से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में 0.93 प्रतिशत की कमी आती है, जो पेयजल के लिए कुओं और छोटे नदी-नालों पर निर्भर होते हैं। इसके अलावा वाष्पोत्सर्जन से पेड़ वायुमंडल में पानी छोड़ते हैं, जो वर्षा के रूप में वापस ज़मीन पर गिरता है। इस तरह, वनों की कटाई के कारण दोहरी मार पड़ती है। पृथ्वी का लगभग 31 प्रतिशत थल क्षेत्र (3.9 अरब हैक्टर) वन से ढंका है। लेकिन कई देशों में खाद्य आपूर्ति, विकास और प्रौद्योगिकी के नाम पर वनों की अत्यधिक कटाई होती है।

भारत में स्थिति

भारत में कुल वनाच्छादन लगभग 8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 22 प्रतिशत है। इनमें से अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का 87 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है।

डॉ. पंकज सक्सेरिया बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने लकड़ी निर्यात करने के लिए वहाँ एक बंदरगाह स्थापित किया था। वर्तमान सरकार की नज़र इन द्वीपों पर अपनी नौसेना का विस्तार करने के लिए और लोगों को यहाँ न सिर्फ सैर-सपाटा करने बल्कि बसने के लिए आकर्षित के लिए है। इसलिए इन द्वीपों को बचाने के लिए काफी कुछ करने की ज़रूरत है।

जम्मू और काश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में क्रमशः 21,000, 24,000 और 16,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। भारत सरकार ने इन क्षेत्रों में अंडरपास और ओवरपास राजमार्ग बनाने के लिए वनों का काफी बड़ा हिस्सा काट दिया है। इसी तरह, गोवा में लगभग 2219 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। यहाँ की सरकार मुंबई और गोवा को फोर-लेन राजमार्ग से जोड़ने के लिए यहां अनगिनत पेड़ काट रही है। स्थानीय अधिकारियों द्वारा लगभग 31,000 पेड़ काटे जा चुके हैं।

इसी तरह, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) NH163 पर 45 किलोमीटर लंबी टू-लेन को फोर-लेन करने के लिए तैयार है। ऐसा करने के लिए वे तेलंगाना के चेवेल्ला मंडल में 9000 बरगद के पेड़ों को काटने के लिए तैयार हैं। ये विशाल बरगद के पेड़ सदियों पुराने हैं, जिन्हें निज़ाम और अन्य वन-प्रेमी समूहों ने लगाया था।

निष्कर्षत:, ये वनों की कटाई के कुछ बुरे प्रभाव हैं और हमें इसका विरोध करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स) 


Oct 1, 2023

कृषिः खीरा कुम्हड़ा, खरबूजा, तरबूज और लौकी, तुरैया - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

दुनिया के सभी भागों के लोग एक वनस्पति कुल, कुकरबिटेसी, से बहुत करीब से जुड़े हैं। इस विविधता पूर्ण कुल में तरबूज़, खरबूजा, खीरा और कुम्हड़ा-कद्दू शामिल हैं। जिन कुकरबिट्स की खेती कम की जाती है उनमें करेला, कुम्हड़ा, चिचड़ा, लौकी, गिलकी और तुरई शामिल हैं।

कुकरबिट्स आम तौर पर रोएँदार बेलें होती हैं। इनमें नर और मादा फूल अलग-अलग होते हैं , जो एक ही बेल पर या अलग-अलग बेलों पर लगे हो सकते हैं। इनके फल स्वास्थ्यवर्धक माने जाते हैं, जो विधिध रंग, स्वाद और आकार में मिलते हैं। ये भारत की भू-जलवायु में अच्छी तरह पनपते हैं। इनकी बुवाई का मौसम आम तौर पर नवंबर से जनवरी तक होता है, और गर्मियों में इनके फल पक जाते हैं।

कुकरबिटेसी कुल में मीठे तरबूज़ से लेकर कड़वे करेले तक का स्वाद है और छोटे चिचोड़े से लेकर बड़े आकार का कद्दू तक है। यह विविधता उनके मोज़ेक-सरीखे गुणसूत्रों के अवयवों में फेरबदल का परिणाम है। इसलिए, एक ही जीनस (कुकुमिस) के सदस्य होने के बावजूद खीरे में सात गुणसूत्र होते हैं और खरबूजे में बारह।

आलू के विपरीत, जो केवल 450 साल पहले पूरे विश्व में फैला, कुकुरबिट्स सहस्राब्दियों से दुनिया भर की खाद्य अर्थव्यवस्थाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ये समुद्री लहरों पर सवार होकर किनारों पर पहुँचे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल ढल गए। आधुनिक जीनोमिक तकनीकों की मदद से उनके मूल स्थान को पहचानने की आवश्यकता है।

खीरा भारत का स्वदेशी है। खीरा की जंगली प्रजातियाँ हिमालय की तलहटी में पाई जाती हैं। इन्हें रोमन लोग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व युरोप ले गए थे।

रेगिस्तानी खरबूज़े

राजस्थान के थार रेगिस्तान में स्थानीय लोग अल्प मानसून से जमा हुए पानी से तरबूज़-खरबूजे की जंगली किस्में उगाते हैं। कम गूदे और ज़्यादा बीज वाले ये फल छोटे होते हैं, जिन्हें सब्ज़ियों के रूप में पकाया जाता है।

हालिया अध्ययनों ने यह स्थापित किया है कि भारत में आज हम तरबूज़-खरबूज़े की जो किस्में देखते हैं, वे पालतूकरण (खेती) करने की दो स्वतंत्र घटनाओं की उत्पाद हैं। इन्होंने जंगली प्रजातियों की कड़वाहट और खट्टापन खो दिया है और इनके पत्ते, बीज और फल बड़े होते हैं। अफ्रीका में पाई जाने वाली खरबूज़े की प्रजातियों का स्वतंत्र रूप से पालतूकरण हुआ था, लेकिन अफ्रीकी खरबूज़ छोटा होता है और इसके स्वाद में थोड़ी कड़वाहट बरकरार है। तब कोई आश्चर्य नहीं कि पूरी दुनिया में उगाए जाने वाले तरबूज़े-खरबूजा भारतीय मूल के हैं।

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों के स्वाद में विविधता का असर करेले में दिखाई देता है। हाल ही में (800 साल पहले) थाईलैंड और पड़ोसी देशों में पाई जाने वाली करेले की देशी किस्में बड़ी, कम कड़वी और चिकनी और लगभग सफेद होती हैं। इसकी तुलना में, कँगूरेदार छिलके वाली भारतीय किस्में छोटी और अधिक कड़वी होती हैं, और काफी लंबे समय से उगाई जा रही हैं।

पोषण

करेला खनिज पदार्थों और विटामिन सी का समृद्ध स्रोत है। रोज़ाना 100 ग्राम करेले का सेवन औसत व्यक्ति के लिए आवश्यक विटामिन सी की पूरी (और आधे विटामिन ए) की आपूर्ति कर सकता है, जबकि इससे केवल 150 मिलीग्राम वसा ही मिलती है। सामान्य तौर पर, पोषण के मामले में कुकुरबिट्स वसा और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के ठीक उलट होते हैं। कुकुरबिट्स में लगभग 85-95 प्रतिशत पानी होता है और ये कम कैलोरी देते हैं।

आहार में शामिल होने और औषधीय महत्त्व होने के अलावा, कुकुबिट्स के दिलचस्प उपयोग भी हैं। गिलकी जब पककर सूख जाती है तो त्वचा की देखभाल के लिए स्पंज की तरह उपयोग की जाती है। सूखी लौकी (तमिल में सुरक्कई) सरोद, सितार और तानपुरा जैसे वाद्य यंत्रों में गुंजन यंत्र की तरह उपयोग की जाती है। (स्रोत फीचर्स)


Jul 1, 2023

स्वाथ्यः नींद क्यों ज़रूरी है?

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

जब मेरे जैसे अति-बुज़ुर्ग, बच्चे हुआ करते थे, तब हमें रात 8 बजे तक सो जाना पड़ता था। फिर सुबह 4 बजे उठकर मंजन करना, नहाना, फिर बचा-खुचा होमवर्क पूरा करना, नाश्ता करना और टिफिन बॉक्स लेकर स्कूल के लिए निकल जाना होता था।

स्कूल और खेलने के बाद हम शाम 6 बजे तक घर वापस आ जाते थे। वापिस आकर अपना होमवर्क करते, रेडियो सुनते, अखबार पढ़ते, रात का खाना खाते और रात 8 बजे तक बिस्तर पर गिरते और सो जाते। लेकिन अफसोस कि आजकल चीज़ें बदल गई हैं।

आईआईटी या आईआईएम जैसे पेशेवर संस्थानों में दाखिला पाने की चाह रखने वाले विद्यार्थियों के लिए सेवा निवृत्त प्रोफेसरों द्वारा चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस (जो अल्सुबह - आम तौर पर सुबह 4 या 5 बजे शुरू होती हैं) के चलते नींद का समय कम हो गया है; जबकि यह उनके लिए ज़रूरी है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन ने सिफारिश की है कि 6-12 साल के बच्चों को रोज़ाना 9-12 घंटे की नींद लेनी चाहिए। और 13-18 साल के किशोरों के लिए रोज़ाना 8-10 घंटे की नींद ज़रूरी है।

लेकिन हम देख रहे हैं कि आजकल के बच्चों को इतनी नींद नहीं मिल रही है, क्योंकि वे पूरे दिन कक्षाओं में रहते हैं। और तो और, उनके ‘प्रशिक्षक' भी पर्याप्त नींद नहीं ले पाते हैं, जो आम तौर पर 40-70 साल के होते हैं, और स्वस्थ जीवन के लिए उन्हें सात घंटे की नींद की ज़रूरत है।

हाल ही में डॉ. जे. एलन हॉब्सन ने नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक समीक्षा का आकर्षक शीर्षक दिया है: ‘नींद दिमाग की, दिमाग के द्वारा, दिमाग के लिए होती है' (Sleep is of the brain, by the brain and for the brain)। इसमें वे बताते हैं कि हमारी नींद के दो चरण होते हैं। एक जिसे रैपिड आई मूवमेंट (REM) कहा जाता है, और दूसरा गैर-REM कहलाता है। REM नींद कुल नींद के लगभग 20 प्रतिशत समय होती है और इसमें सपने आते हैं, जबकि गैर- REM नींद कुल नींद के लगभग 80 प्रतिशत समय होती है और इसे सुदृढ़ता लाने, याददाश्त को मज़बूत करने और नई चीजें सीखने के लिए जाना जाता है।

पोषण और नींद

यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की वेबसाइट मेडिसिन प्लस बताती है कि पोषण का सम्बन्ध स्वस्थ और संतुलित आहार लेने से है। भोजन और पेय आपको स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा और पोषक तत्व प्रदान करते हैं। पोषण सम्बन्धी इन बातों को समझने से आपके लिए भोजन के बेहतर विकल्प चुनना आसान हो सकता है।

यूएस का स्लीप फाउंडेशन बताता है कि आहार और पोषण आपकी नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं, और कुछ फल और पेय आपके लिए आवश्यक नींद लेने को मुश्किल बना सकते हैं। कैल्शियम, विटामिन A, C, D, E और K जैसे प्रमुख पोषक तत्त्वों की कमी के कारण नींद की समस्या हो सकती है।

रात के भोजन में उच्च ग्लायसेमिक सूचकांक वाले कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन (जैसे, पॉलिश किया हुआ चावल या मैदा, शकर) शराब या तम्बाकू के सेवन से व्यक्ति उनींदा बन सकता है। यह बार-बार जगाकर आवश्यक नींद की अवधि कम कर सकता है।

स्लीप फाउंडेशन आगे बताता है कि हमें मेडिटेरेनियन आहार अपनाना चाहिए, जिसमें वनस्पति आधारित खाद्य, वसारहित मांस, अंडे और उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थ शामिल हैं। ऐसा आहार न केवल व्यक्ति के हृदय की सेहत में सुधार करता है, बल्कि नींद की गुणवत्ता में भी सुधार लाता है।

खुशी की यह बात है कि अधिकतर भारतीय भोजन मेडिटेरेनियन आहार का ही थोड़ा बदला हुआ रूप है। और हमें यह सलाह भी दी जाती है कि अच्छी नींद लेने के लिए पर्याप्त भोजन करना चाहिए। तो आइए हम कामना करते हैं कि सभी को स्वस्थ और ‘अच्छी' नींद आए।  ■■

Apr 1, 2023

जीव जगतः हमिंगबर्ड- भारतीय शकरखोरा

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

एज़्टेक लोगों द्वारा हमिंगबर्ड को एक नाम दिया गया था ह्यूतज़िलिन यानी ‘सूर्य की किरण’। मूलत: अमेरिकी महाद्वीप के इस पक्षी की साढ़े तीन सौ प्रजातियों के इंद्रधनुषी रंगों ने अक्सर कवियों और आभूषण डिज़ाइनरों की कल्पना को पंख लगाए हैं।

हमिंगबर्ड आकार में छोटे होते हैं: मधुमक्खी हमिंगबर्ड बमुश्किल 5 सेंटीमीटर लंबी होती है और इसका वज़न 2 ग्राम होता है। वे अपने पंखों को एक सेकंड में 50 बार तक फड़फड़ा सकती हैं, जिसके कारण एक गुनगुनाहट (हम) जैसी आवाज़ पैदा होती है और यही आवाज़ उनके नाम को परिभाषित करती है। वे फूल से रस चूसते हुए शानदार ढंग से मंडरा सकती हैं, और यहां तक कि उल्टी दिशा में (पीछे की ओर) भी उड़ सकती हैं। वे मकरंद के लिए नलीनुमा फूल, जो चमकीले लाल या नारंगी रंग के होते हैं, जैसे लैंटाना और रोडोडेंड्रोन, को वरीयता देती हैं।

उनके पंखों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनके हाथ की हड्डियाँ बहुत लंबी होती हैं लेकिन बांह की हड्डियाँ बहुत छोटी होती हैं जो निहायत लचीले बॉल-एंड-सॉकेट जोड़ के माध्यम से शरीर से जुड़ी होती हैं। यह जोड़ आधा फड़फड़ाने के बाद पंखों को घुमाने के काबिल बनाता है, जिससे उनमें फुर्तीलापन आता है और पीछे की ओर उड़ना संभव हो पाता है।

समानताएँ

भारत में सनबर्ड्स या शकरखोरा पाई जाती हैं। हालांकि यह हमिंगबर्ड्स की सम्बंधी नहीं हैं, लेकिन अभिसारी विकास में ये दोनों पक्षी कई विशेषताएँ साझा करते हैं। सनबर्ड्स को नेक्टेरिनिडे कुल में रखा गया है। हालांकि थोड़ी बड़ी सनबर्ड थोड़े समय के लिए मधुमक्खियों की तरह मंडरा भी सकती हैं, और सुर्ख, नलीदार फूलों पर जा सकती हैं। वे जंगल के अंगार सरीखे रंग वाले (पीले-नारंगी) फूलों की महत्वपूर्ण परागणकर्ता हैं।

अलबत्ता खाते समय उन्हें बैठना पड़ता है। हमिंगबर्ड की तरह वे कीट पकड़ सकती हैं, खासकर अपने बच्चों को खिलाने के लिए। भारत में आम तौर पर बैंगनी सनबर्ड दिखने को मिलती हैं। इनके बड़े व चमकीले नर का रूप-रंग मार्च में अपने प्रजननकाल में शबाब पर होता है।

एक ही जगह रुककर उड़ने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है। द्रव्यमान के हिसाब से देखें, तो कशेरुकियों में, हमिंगबर्ड्स की चयापचय दर (प्रति मिनट कैलोरी खपत) अधिकतम होती है। इस ऊर्जा का अधिकांश भाग मकरंद से मिलता है। उनके पाचन तंत्र द्वारा तेज़ी से शर्करा उपभोग यह सुनिश्चित करता है कि वे ऊर्जा हाल ही में गटके गए मकरंद से लेते हैं।

इसके अलावा, समान साइज़ के स्तनधारियों की तुलना में उनके फेफड़े हवा से ऑक्सीजन अवशोषित करने में 10 गुना बेहतर होते हैं।

विरोधाभास देखिए कि मनुष्यों में अत्यधिक व्यायाम रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि त्वरित तौर पर ऊर्जा की आवश्यकता के लिए आपका शरीर ग्लूकोनियोजेनेसिस का सहारा लेता है – ग्लूकोनियोजेनेसिस यानी मांसपेशियों के प्रोटीन जैसे संसाधनों को ग्लूकोज़ में परिवर्तित करना। इसका एक नकारात्मक परिणाम यह होता है कि आप इतनी मशक्कत के बाद भी न तो मांसपेशियाँ बना पाते हैं और न ही वसा कम कर पाते हैं।

हमिंगबर्ड में अति गहन गतिविधियाँ करने पर क्या होता है? हाल ही के जीनोम अध्ययनों से पता चला है कि विकास के दौरान, हमिंगबर्ड में जब मंडराने की गतिविधि उभरने लगी तब ग्लूकोनियोजेनेसिस के लिए ज़िम्मेदार एक प्रमुख एंज़ाइम का जीन उनमें से लुप्त हो गया। प्रयोगशाला में संवर्धित पक्षी कोशिकाओं से इस जीन को हटाने पर इन कोशिकाओं की ऊर्जा दक्षता में वृद्धि दिखी।

नकल और नृत्य

तोते और कुछ सॉन्गबर्ड की तरह, हमिंगबर्ड भी किसी अन्य की आवाज़ निकाल (मिमिक्री कर) सकते हैं। जब हमिंगबर्ड के जोड़े को अलग-थलग पाला गया, तो इन दोनों द्वारा गाया गया गीत उनकी प्रजातियों द्वारा गाए जाने वाले मानक गीत से तनिक-सा अलग था।

गौरतलब बात यह है कि वे कान तक पहुंचने वाली ध्वनि और अपनी मांसपेशियों की हरकत का तालमेल बैठा सकते हैं - यानी नृत्य कर सकते हैं।

टफ्ट्स युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट अनिरुद्ध पटेल ने सिद्धांत दिया है कि आवाज़ की नकल करने के लिए गले की मांसपेशियों को नियंत्रित करने की क्षमता के लिए पहले ध्वनियों के साथ लय में थिरकने की क्षमता होना ज़रूरी है। हालांकि, हमिंगबर्ड हम मनुष्यों की तरह जोड़े या समूहों में नृत्य नहीं कर सकते हैं।  (स्रोत फीचर्स)

Mar 1, 2023

स्वास्थ्यः भविष्य के लिए मोटा अनाज

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन 
साइंस न्यूज़ में एक प्रशिक्षु एना गिब्स ने 9 मई 2022 के अंक में लिखा था, “आप जलवायु परिवर्तन को मानें या न मानें, लेकिन यह भविष्य में हमारे खान-पान को बदल देगा।” मनुष्य जितनी कैलोरी का उपभोग करते हैं, उसमें से आधा हिस्सा मक्का, चावल और गेहूंँ से आता है। हम अपनी 80 फीसदी पोषण सम्बंधी ज़रूरतों के लिए 13 फसलों पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अनियमित वर्षा और चरम मौसम की वजह से इनका उत्पादन घटेगा। हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सख्तजान प्रजातियों को विकसित करने की ज़रूरत है, और यही वजह है कि मोटे अनाज (मिलेट्स) महत्त्व प्राप्त कर रहे हैं।

मोटे अनाज गर्म क्षेत्रों में अनुपजाऊ मिट्टी में उगाए जाते हैं और छोटे दानों वाली भरपूर उपज देते हैं, जिनका उपयोग आटा बनाने में किया जाता है। मोटे अनाज के कुछ उदाहरण हैं बाजरा, ज्वार, रागी। कम उगाए जाने वाले कुछ मोटे अनाज हैं तिनई (कंगनी), समा या समई और सांवा, जिनका उपयोग ब्रेड, रस्क (टोस्ट) और बिस्किट बनाने में किया जाता है।

अग्रणी उत्पादक

मोटे अनाज 10,000 से अधिक वर्षों से एशिया और अफ्रीका के लोगों के मुख्य आहार रहे हैं। ये जलवायु को लेकर लचीले हैं; बहुत कम पानी और गर्म, शुष्क परिस्थिति में अच्छी तरह से पनपते हैं। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत सालाना लगभग 1.2 करोड़ मीट्रिक टन मोटे अनाजों का उत्पादन करता है। HelgiLibrary  के अनुसार, इनके उत्पादन में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, इसके बाद चीन और नाइजर का स्थान है।

खाद्य और कृषि संगठन ने वर्ष 2023 को मोटे अनाज का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारत के कृषि मंत्रालय ने मोटे अनाज के उपयोग पर केंद्रित योजनाओं और गतिविधियों की एक शृंखला तैयार की है, विशेषकर आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में। मंत्रालय पंजाब, केरल और तमिलनाडु में ‘सही खाओ मेलों’ के आयोजन की भी योजना बना रहा है। चेन्नई स्थित एम.एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन मोटे अनाज के उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने के लिए बहुत सक्रिय रहा है।

यह सही है कि हममें से अधिकांश लोग गेहूँ और चावल को मुख्य भोजन के रूप में खाते हैं, लेकिन ये मोटे अनाज के बराबर पौष्टिक नहीं होते हैं। इसलिए उन्हें ‘पोषक-अनाज’ नहीं कहा जाता है। मोटे अनाज में उल्लेखनीय मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन बी, और कई धात्विक आयन होते हैं जो चावल जैसे प्रमुख खाद्य पदार्थों में नहीं होते हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि इन लाभों को प्राप्त करने के लिए मोटे अनाज हमारे दैनिक भोजन में शामिल किए जाएँ।

मोटे अनाज का अर्थशास्त्र

बैंगलुरु स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान की प्रोफेसर और एम.एस. स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन की प्रमुख मधुरा स्वामिनाथन ने 31 जनवरी, 2023 को दी हिंदू में प्रकाशित अपने लेख में इस विषय के अर्थशास्त्र की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की है। वे बताती हैं कि अगर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में वितरित किए जाने वाले चावल और गेहूँ के लगभग 20 प्रतिशत हिस्से की जगह मोटा अनाज दिया जाए, तो इससे मध्याह्न भोजन से स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य को बहुत लाभ होगा। मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ाना और कृषि भूमि में गिरावट को पलटना संभव तो है लेकिन आसान नहीं होगा और इसके लिए बहुस्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। भारत सरकार, अनेक राज्यों ने मोटा अनाज मिशन शुरू किया है, जो स्वागत योग्य कदम है। (स्रोत फीचर्स)


Feb 1, 2023

वन्य जीवनः धनेश पक्षियों का आकर्षक कुनबा


- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
, सुशील चंदानी

हाल ही में नागालैंड में हुए धनेश (हॉर्नबिल) उत्सव में भारत की आगामी जी-20 अध्यक्षता के प्रतीक चिन्ह (लोगो) का आधिकारिक तौर पर अनावरण किया गया। नागालैंड का यह लोकप्रिय उत्सव वहाँ की कला, संस्कृति और व्यंजनों को प्रदर्शित करता है। यह हमारे देश के कुछ सबसे बड़े, सबसे विशाल पक्षियों के कुल की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है।

विशाल धनेश (Buceros bicornis) हिमालय की तलहटी, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी घाट में पाया जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश और केरल का राज्य पक्षी है। पाँच फीट पंख फैलाव वाले विशाल धनेश का किसी टहनी पर उतरना एक अद्भुत (और शोर भरा) नज़ारा होता है।

धारीदार चोंच वाला धनेश (Rhyticeros undulatus), भूरा धनेश (Anorrhinus austeni) और भूरी-गर्दन वाला धनेश (Aceros nipalensis) साइज़ में थोड़े छोटे होते हैं, और ये केवल पूर्वोत्तर भारत में पाए जाते हैं। उत्तराखंड का राजाजी राष्ट्रीय उद्यान पूर्वी चितकबरे धनेश (Anthracoceros albirostris) को देखने के लिए एक शानदार जगह है। मालाबार भूरा धनेश (Ocyceros griseus) का ज़ोरदार ‘ठहाका' पश्चिमी घाट में गूंजता है। सबसे छोटा धनेश, भारतीय भूरा धनेश (Ocyceros birostris), भारत में थार रेगिस्तान को छोड़कर हर जगह पाया जाता है और अक्सर शहरों में भी देखा जा सकता है- जैसे चेन्नई में थियोसोफिकल सोसाइटी उद्यान।

धनेश की बड़ी और भारी चोंच कुछ बाधाएँ भी डालती हैं - संतुलन के लिए, पहले दो कशेरुक (रीढ़ की हड्डियां) आपस में जुड़े होते हैं। नतीजा यह होता है कि धनेश अपना सिर ऊपर-नीचे हिलाकर हामी तो भर सकता है, लेकिन ‘ना' करने (बाएँ-दाएँ सिर हिलाने) में इसे कठिनाई होती है। मध्य और दक्षिण अमेरिका के टूकेन की भी चोंच बड़ी होती हैं। यह अभिसारी विकास का एक उदाहरण - दोनों ही पक्षियों का भोजन एक-सा है।

लंबे वृक्षों  को प्राथमिकता   

धनेश अपने घोंसले बनाने के लिए ऊँचे पेड़ पसंद करते हैं। इन पक्षियों और जिन पेड़ों पर ये घोंसला बनाते हैं उनके बीच परस्पर सहोपकारिता होती है। बड़े फल खाने वाले धनेश लगभग 80 वर्षावन पेड़ों के बीजों को फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धनेश की आबादी घटने से कुछ पेड़ (जैसे कप-कैलिक्स सफेद देवदार- Dysoxylum gotadhora) के बीजों की मूल वृक्ष से दूर फैलने में 90 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो वनों की जैव विविधता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

दक्षिण पूर्व एशिया के विशाल तौलांग वृक्ष का ज़िक्र लोककथाओं में इतना है कि इस वृक्ष को काटना वर्जित माना जाता है। यह हेलमेट धनेश (

Rhinoplax vigil) का पसंदीदा आवास है। इसके फलने का मौसम और धनेश के प्रजनन का मौसम एक साथ ही पड़ते हैं। पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान बीजों को फैलाने में धनेश के महत्व पर ज़ोर देता है, जिसके अनुसार इसके बीज धनेश द्वारा खखारकर फैलाए जाते हैं। एक कहावत है, “जब बीज अंकुरित होते हैं, तब धनेश के चूज़े अंडों से निकलते हैं।”

शिकार के मारे

दुर्भाग्य से, अवैध कटाई के लिए नज़रें लंबे पेड़ों पर ही टिकी होती हैं। इसलिए धनेश की संख्या में धीमी रफ्तार से कमी आई है, जैसा कि पक्षी-गणना से पता चला है। रफ्तार धीमी इसलिए है कि ये पक्षी लंबे समय तक (40 साल तक) जीवित रहते हैं। इनका बड़ा आकार इनके शिकार का कारण बनता है। सुमात्रा और बोर्नियो के हेलमेट धनेश गंभीर संकट में हैं क्योंकि इनकी खोपड़ी पर हेलमेट जैसा शिरस्त्राण, जिसे लाल हाथी दाँत कहा जाता है, बेशकीमती होता है। सौभाग्य से, विशाल धनेश का शिरस्त्राण नक्काशी के लिए उपयुक्त नहीं है।

दक्षिण भारत में धनेश की आबादी बेहतर होती दिख रही है। मैसूर के दी नेचर कंज़र्वेशन फाउंडेशन ने डैटा की मदद से दिखाया है कि प्लांटेशन वाले जंगल धनेश की आबादी के लिए उतने अनुकूल नहीं हैं जितने प्राकृतिक रूप से विकसित वर्षावन हैं, हालांकि कभी-कभी सिल्वर ओक के गैर-स्थानीय पेड़ पर इनके घोंसले बने मिल जाते हैं। धनेश का परिस्थिति के हिसाब से ढलने का यह स्वभाव भोजन में भी दिख रहा है; वे अफ्रीकन अम्ब्रेला पेड़ के फलों को खाने लगे हैं। ये पेड़ हमारे कॉफी बागानों में छाया के लिए लगाए जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)