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Jul 1, 2025

कविताः तोते

  - हरभगवान चावला

तोते पानी से भरे तालाब ढूँढ रहे हैं

कि तालाब के ऊपर से उड़ान भर सकें

तोते अमरूद के बाग़ ढूँढ रहे हैं

कि उन्हें पसंद हैं लाल गूदेदार अमरूद

तोते नीम के पेड़ ढूँढ रहे हैं

कि तपती दोपहरी में उन पर सुस्ता सकें

तोते बमों के धमाकों और बारूद की गंध से

डरे और चीख़ते हुए सब तरफ़ उड़ रहे हैं

वे ख़ुद गवाह हैं -

यहीं इसी दुनिया में हुआ करते थे

पानी से भरे तालाब

अमरूद के बाग़

और नीम के पेड़

बदहवास तोते अब बिजली के खंभों से

और इमारतों से टकराते हैं लगातार

तोते अब तेज़ी से कम हो रहे हैं दुनिया में।


Apr 1, 2024

कविताः बकरी

 - हरभगवान चावला





बकरी - 1

बकरी ने कभी शहर नहीं देखा था 

पर उसने जाये थे, जितने भी मेमने 

वे सब शहर गए थे 

और कभी लौटकर नहीं आए थे ।

बकरी - 2

अचानक किसी दिन 

बकरी के देखते-देखते 

ग़ायब हो जाता है 

उसका बच्चा 

बकरी उसे खोजती है 

हर संभावित जगह पर 

नहीं मिलता तो 

उसकी जान की ख़ैर मनाती है

और मनाती ही रहती है 

उसके मर जाने के बाद भी ।

सम्पर्कः 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

Jun 1, 2023

कविताः जब नदी भूली रास्ता

 




 - हरभगवान चावला

नदी अभी बच्ची थी

हठी थी

पहाड़ पिता की गोद छोड़

निकल गई टहलने अकेली

फिर वह रास्ता भटक गई

उसने न कोई शहर देखा था

न रेलवे स्टेशन

न राजमार्ग

न कोई अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर

न किसी से उसकी पहचान ही थी

वह कभी अपने घर नहीं लौटी

ओ मनुष्यो!

ओ पशुओ!

ओ पक्षियो!

ओ वनस्पतियो!

उस ज़िद को शुक्रिया कहो

जिसने नदी को पिता की गोद से उतारा

उस पल को भी शुक्रिया कहो

जब नदी भूली अपना रास्ता।

सम्पर्कः 406, सेक्टर- 20, सिरसा, 125055,  (हरियाणा)

Mar 1, 2023

कविताएँः 8 मार्च महिला दिवस - ग्रामीण स्त्रियाँ


 - हरभगवान चावला

1.

थककर लेटीं ग्रामीण स्त्रियाँ

पति या पुत्र की पदचाप सुनते ही

तुरन्त उठकर यूँ बैठ जाती हैं

कि कहीं पकड़ा न गया हो

उनके लेटने का गुनाह।

2.

ग्रामीण स्त्रियों की नींद में

जाग्रति हमेशा मौजूद रहती है

नींद में भी उन्हें ख़याल रहता है

कि कहीं कटड़ा न पी जाए

रात में अपनी माँ का सारा दूध

कि कहीं साँड चर न जाएँ खेत

कि कहीं राख होने से बची न हो कोई चिंगारी

कि कहीं किवाड़ की साँकल खुली न रह गई हो

कि कहीं नशे की झोंक में फिसल न जाए पति

कि कहीं भूखा तो नहीं सो गया हो कोई बच्चा

बार-बार जागती है ग्रामीण स्त्रियों की नींद पर

ग्रामीण स्त्रियाँ नींद न आने की शिकायत नहीं करतीं।

3.

ग्रामीण स्त्रियों को सुनती है

रात में होने वाली बारिश की

सबसे पहली बूँद की आवाज़

सबसे पहले वे चूल्हा ढकती हैं

फिर उपलों को भीतर घसीटती हैं

फिर सँभालती हैं बाहर छूटे कपड़े

बस इतनी ही देर वे बारिश से

सब्र करने की मनुहार करती हैं।

4.

जैसे-जैसे बढ़ती है

ग्रामीण स्त्रियों की उम्र

इनकी गोद बड़ी होती जाती है

आँखें उदास।

सम्पर्कः 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

Nov 1, 2022

लघुकथाः प्यारी अम्मा

- हरभगवान चावला

   पिछले कुछ दिनों से अम्मा के बाएँ घुटने में बहुत दर्द था। गाँ
व के डॉक्टर की दवाई का जब असर नहीं हुआ तो पंकज उसे शहर के डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने कैल्शियम की भारी कमी बताते हुए दवाई दी और साथ ही हिदायत भी कि महीने भर चलना फिरना नहीं है, ज़्यादा से ज़्यादा बाथरूम तक जा सकती हैं बस! गाँव लौटने के बाद दो दिन तक वह सचमुच घर से बाहर नहीं निकली। तीसरे दिन पंकज ने पाया कि अम्मा घर पर नहीं है। पता चला कि पड़ोस में सपना के घर गई है। वापस आने पर पंकज ने पूछा तो अम्मा ने कहा- अब दर्द कुछ ठीक है। सपना को मोठ की बड़ियाँ बनानी नहीं आतीं। वही बनाना सिखाने गई थी।

    - क्या अम्मा तुम भी! अपनी सेहत का ख़याल करो सबसे पहले। क्या ज़रूरत थी?

    अम्मा उस समय चुप हो गई, पर अगले कुछ दिनों में पंकज ने पाया कि वह अक्सर कहीं न कहीं चली जाती है। कभी कहीं किसी की तबीयत पूछने, कभी किसी के घर चूल्हा न जलने की बात पता चलते ही दो चार सेर गेहूँ पहुँचाने, किसी के यहाँ  सेवइयाँ बनवाने, किसी के सर पर तेल मालिश करने। पता नहीं कितने काम थे अम्मा के लिए!

    एक दोपहर पंकज ने घर में प्रवेश किया, ठीक उसी समय उसके पीछे-पीछे दर्द से कराहती अम्मा ने भी चौखट लाँघी। उससे चला नहीं जा रहा था। उसने अपने घुटने पर पंकज का पुराना अँगोछा कसकर बाँध रखा था। पंकज को देखते ही उसने कराह कंठ में दबा ली। सोहन अम्मा को कंधे का सहारा देकर अंदर ले आया। अम्मा के बैठते ही उसने किंचित ग़ुस्से से पूछा- आज कहाँ गई थी अम्मा? इतना दर्द है फिर भी...

    - आज मदन के पिता का श्राद्ध था। वो जो झुग्गियाँ बनाकर ग़रीब-गुरबे रह रहे हैं न, उनको खाना खिलाना था उन्हें और बेचारी मदन की घरवाली अकेली थी, भला सारा काम कैसे सँभालती वो, इसलिए ज़रा...

   - तो सारे गाँव की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है? अपनी उम्र और सेहत तो देखो।

    - गाँव मुझसे उम्मीद करता है, सबको नाउम्मीद कर दूँ कि जाओ भई मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आने वाली। और मेरी सेहत को क्या हुआ है? दर्द ही तो है, वो तो घर बैठी रहूँ तब भी होता है। पर तू नाराज़ होता है तो...

    पंकज के भीतर जैसे कोई बादल घुमड़कर बरसने के लिए छटपटाने लगा। अम्मा के लिए इतना प्यार उमड़ा कि उसने हल्की-फुल्की अम्मा को बाँहों में उठाकर घुमा दिया- ओ मेरी प्यारी अम्मा, इसीलिए तो सारा गाँव तुम्हें अपनी अम्मा मानता है, जहाँ तुम्हारा जी करे, जाओ। मैं कौन रोकने वाला।

   पंकज ने अम्मा को उतारकर चारपाई पर बैठा दिया और आँखों को अम्मा से छुपाता तेज़ी से घर से बाहर निकल आया।

सम्पर्कः 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

Aug 1, 2022

कविताः युद्ध के मोर्चे से चिट्ठियाँ

- हरभगवान चावला

युद्ध के मोर्चे से आने वाली चिट्ठियों में 

अलग-अलग तरह की गंध होती थी 

किसी चिट्ठी में बारूद की गंध 

किसी में जंगल की बारिश की 

किसी में रास्ते की धूल की 

किसी में दर्द निवारक दवा की 

किसी चिट्ठी में ख़ून की गंध 

किसी में बंकरों की सीलन की 

इन चिट्ठियों में आवाज़ें भी थी-

गोलियों की 

बमों की 

चीखों की 

कराहों की 

इन चिट्ठियों में 

मातमी सन्नाटा भी सुनाई देता था 

इन चिट्ठियों को पाने वाले 

हमेशा आशंकित रहते थे 

कि कहीं उनकी लिखी 

चिट्ठियों की जगह

कोई चिट्ठी न आ जाए 

उनके बारे में 

वे कामना करते थे 

कि बंद हो युद्ध और  

चिट्ठियों का सिलसिला 

और उनके सामने आ खड़े हों प्रत्यक्ष 

मोर्चे पर तैनात उनके अपने।

सम्पर्कः 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 (हरियाणा)

Jun 1, 2022

कविताः पेड़ से बातचीत

- हरभगवान चावला

आज मैंने उस पेड़ से बात की

जिसकी छाया में बैठ मैं सालों पढ़ा

मैं तब बच्चा था और पेड़ बूढ़ा

आज मैं बूढ़ा था और पेड़ जवान

हम दोनों ने एक दूसरे का हाल जाना

और पाया कि दोनों मज़े में ही हैं

पेड़ को बस एक ही दुख था

कि अब पंछी बहुत कम आते हैं

मैंने अपने दुख के बारे में सोचा तो पाया

हम दोनों का दुःख कितना मिलता था

हम एक दूसरे के गले लग देर तक

बीते दिनों को याद करते रहे

हम कई बार हँसे, कई बार रोए

हमने बहुत बातें कीं और थक गए

हमारी बातों को किसी ने नहीं सुना

कहते हैं जिन बातों को कोई नहीं सुनता

उन बातों को ईश्वर सुनता है चुपचाप

पेड़ और मैं किसी ईश्वरीय सत्ता में

यक़ीन नहीं करते थे, इसके बावजूद

हम दोनों ने महसूस की ईश्वर की मौजूदगी

जो हँसता और रोता रहा था हमारे साथ

हम दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराए

और आँखों ही आँखों में एक दूसरे से कहा-

अरे, ईश्वर तो बिल्कुल हम जैसा निकला!

सम्पर्क- 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)


Feb 1, 2022

तीन लघुकथाएँ

 - हरभगवान चावला

1. पहाड़
      मैं पहाड़ से लौटने लगा तो पहाड़ ने मेरे साथ चलने की ज़िद पकड़ ली। मैंने लाख कहा मैदान में कुछ भी नहीं पहाड़ जैसा, तुम वहाँ रह कैसे पाओगे? उसने कहा- तुम हो न, रह लूँगा। घर आने के बाद कुछ दिन वो घर से बाहर नहीं निकला। एक दिन गया तो घंटे भर में लौट आया। बोला- कैसे लोग हैं तुम्हारे शहर में, पूरे शहर में एक भी दरख़्त नहीं और लोग हैं कि मज़े में हैं। कोई किसी से बात भी नहीं करता।
       मैंने ग़ौर किया कि उसकी साँवली हो गई देह पसीने  में नहा गई थी। मैंने कहा- तुमसे पहले कहा था कि मैदान में कुछ भी पहाड़ जैसा नहीं है, अब तुमने देख लिया न! लौट जाओ अपने घर।
      - तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।
वह मेरी किताबों के पास बैठा रहता एकदम चुपचाप। मैं उसकी कैफ़ियत पूछता तो वह मुस्कुरा देता, पर मैं महसूस कर रहा था कि उसके भीतर का जल सूख रहा है और पथरीलापन उसके चेहरे पर झलकने लगा है। किसी दिन यह निर्जीव पत्थर हो कर रह जायेगा। मैंने फ़ैसला किया कि इसे इसके घर छोड़ कर आऊँगा। एक दिन मैंने उससे कहा- चलो आज हम तुम्हारे घर चलेंगे।
    - तुम चल रहे हो न?
    - हाँ।
   - रास्ते में छोड़कर चले तो नहीं जाओगे?
    - नहीं।
        उसने लपककर मेरी उँगली पकड़ ली। हम दोनों चले जा रहे थे। बहुत गर्मी थी, पर थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई झरना पैरों को भिगो जाता या फुहार तन को शीतल कर जाती। जब भी ऐसा होता, पहाड़ मेरे मुख की तरफ़ देखता और मेरी उँगली पर उसकी पकड़ और मज़बूत हो जाती।


2. हरसिंगार

   वे दोनों बहुत लम्बे अरसे के बाद मिल रहे थे। सुबह का वक्त था। दोनों हरसिंगार के फूलों का झड़ना देख रहे थे। लड़की ने अपनी हथेलियाँ फैला दीं और बर्फ़ के फाहों जैसे फूलों को हथेलियों पर गिरने दिया। फिर उसने अपना सिर ऊपर उठा दिया। फूल उसके चेहरे पर गिरते रहे- चमकती धूप में फुहारों की तरह। वह बहुत ख़ुश थी, क्योंकि भयावह लम्बी लड़ाई के बाद लड़का सही सलामत लौट आया
 था। लड़की ने कहा, "मैं हमेशा तुम्हें लेकर डरती रही और हमेशा तुम्हारी सलामती की दुआ करती रही। कितने ख़त लिखे मैंने तुम्हें।"
    "मैंने तुम्हारे हर ख़त का जवाब देने की कोशिश की, पर कभी-कभी ऐसा नहीं भी हो पाया। हर समय तुम मुझे याद आती रहीं।"
    "जानती हूँ। तुम्हें पता है, तुम्हारा हर ख़त मुझे ज़ुबानी याद है।"
     "और मुझे तुम्हारा।"
  "मैं तुमसे सपने में मिलती थी। आज भी लग रहा है कि सपना देख रही हूँ। मैं कभी इस सपने को टूटते नहीं देखना चाहती थी। मैं आज भी जागने से डरती हूँ।"
   "और मैं सोने से डरता हूँ। युद्ध में जो कुछ हुआ, मुझे डरावने सपने जैसा लगता है। बम फट रहे हैं, गोलियाँ चल रही हैं, मैं भाग रहा हूँ लाशों से टकराता। पेड़ों के पत्तों पर ख़ून जमा है। चीख़ें हैं, लोग मर रहे हैं बेगानी जगह लावारिस मौत। ओफ़्फ़, यह सब नहीं होना चाहिए। आदमी युद्ध के लिए पैदा नहीं हुआ। वह पैदा हुआ है शांति के साथ मेहनत करने के लिए, प्रेम के साथ जीने के लिए। जो कुछ मैंने अपनी आँखों से देखा, अब अक्सर सपने में देखता हूँ। इसलिए डरते-डरते सोता हूँ कि कहीं ..."
      लड़की ने अपना हाथ लड़के के मुँह पर रख दिया। लड़के ने उस हाथ को कसकर पकड़ लिया। दोनों कुछ देर यूँ ही बैठे रहे- ख़ामोश और संजीदा। अचानक लड़का अपनी हथेलियों से हरसिंगार के फूलों को लड़की के पैरों के पास सरकाने लगा। लड़की के दोनों पाँव फूलों से ढक गये। मंत्रमुग्ध सी लड़की देखती रही, देखती रही और फिर उन फूलों को अंजुरी में भरकर लड़के के चेहरे पर उछाल दिया। आधे फूल लड़के की झोली में आ गिरे और आधे लड़की की झोली में।

3. मगरमच्छ 

पोता जब पढ़ने के लिए बाहर चला गया तो सतवंती के लिए घर का माहौल असह्य हो गया। अब तक वह पोते के मोह में सब सहती आई थी। उसने तय किया कि बस अब और नहीं। ज़मीन बेटे के नाम करवा उसने ख़ुद वृद्धाश्रम जाने की इच्छा जताई। उसे लगता था, यह बात सुनकर बेटा नाराज़ होगा और उसे वृद्धाश्रम जाने से रोकेगा, पर बेटे ने सिर्फ़ इतना कहा, "अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो ठीक है।"
 सतवंती वृद्धाश्रम में थी। बेटा महीने, दो महीने में वहाँ जाकर माँ का हालचाल पूछ आता, लेकिन यह सिलसिला साल भर भी नहीं चला। अब तो बेटे को माँ को देखे सात साल होने को आए थे। कभी-कभी आश्रम से फ़ोन आता और थोड़ी देर बाद एक आदमी आकर कुछ रुपये उससे ले जाता। उस दिन भी आश्रम से फ़ोन था। प्रबंधक ने बताया, "आपकी माँ की मौत हो गई है सर! क्या आप उनके अन्तिम संस्कार के लिए उनकी पार्थिव देह लेने आ रहे हैं?"
  "ओह, इस समय मैं देश से बाहर हूँ। क्या आप अपने स्तर पर अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कर सकते हैं?" उसने बहाना बनाते हुए एक पल भी नहीं लगाया।
 "अगर किसी वृद्ध के परिजन उपलब्ध नहीं हों तो हम अपने स्तर पर अन्तिम संस्कार करते ही हैं।" "बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। आप अन्तिम संस्कार करवा दीजिए और अन्तिम संस्कार का वीडियो मुझे भिजवा दीजिए।"
  "जी ठीक है।"
  अब यह उच्च अधिकारी अपने पुराने शहर से दूर एक और शहर में पदस्थ है। वह अक्सर अपने अधीनस्थ अलग-अलग अधिकारियों के सामने अपने मोबाइल में माँ के अन्तिम संस्कार का वीडियो चलाता है और कहता है, "आज मैं जो भी हूँ, अपनी माँ की वजह से हूँ, पर कितना बदनसीब हूँ मैं कि विदेश में होने के चलते माँ को मुखाग्नि भी नहीं दे पाया।" यह कहते ही उसकी आँखों से आँसू निकल आते हैं। जब भी ऐसा होता है, वह किसी विशाल मगरमच्छ को अपने भीतर रेंगते हुए महसूस करता है।

लेखक के बारे में - जन्मतिथि: 20 नवम्बर, 1958, जन्मस्थान: गाँव बिज्जुवाली, जिला सिरसा (हरियाणा), शिक्षा: एम.ए. (हिंदी), एम.फिल.। सम्प्रति: राजकीय महिला महाविद्यालय, रतिया से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन।
लेखन: पाँच कविता संग्रह ‘कोई अच्छी खबर लिखना’, ‘कुंभ में छूटी औरतें’, ‘इसी आकाश में’, ‘जहाँ कोई सरहद न हो’, ‘इन्तज़ार की उम्र’, कहानी संग्रह ‘हमकूं मिल्या जियावनहारा’ व लघुकथा संग्रह ‘बीसवाँ कोड़ा’। इसके अलावा सारिका, हंस, कथादेश, जनसत्ता, वागर्थ, रेतपथ, अक्सर, जतन, कथासमय, दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून, हरिगंधा आदि में रचनाएँ प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएँ छपी हैं। पुरस्कार/ सम्मान:  कहानी तथा लघुकथा के लिए कथादेश द्वारा पुरस्कृत, कविता संग्रह ‘कुंभ में छूटी औरतें’ को वर्ष 2011-12 के लिए तथा कविता संग्रह ‘इसी आकाश में’ को वर्ष 2016-17 के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। सम्पर्क- 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

Dec 1, 2021

तीन कविताएँ : बच्चों और बड़ों के घर

- हरभगवान चावला

1.

बच्चे छोटे-छोटे घर बनाते हैं 

उन घरों में होती है 

रिश्तेदारों, पड़ोसियों,दोस्तों 

और राहगीरों के लिए भी जगह 

बड़े बहुत बड़े घर बनाते हैं 

उन घरों में स्वयं उनके लिए भी 

पर्याप्त जगह नहीं होती ।

2.

मिट्टी और तृण-तिनकों से बने 

बच्चों के घरों में 

ख़ूब सारे दरवाज़े होते हैं 

और खिड़कियाँ

कि कोई कहीं से भी 

अंदर-बाहर आ-जा सके 

निर्बाध 

बड़ों के बनाए घर 

घर नहीं, क़िले होते हैं ।

3.

बड़ों के बनाए घरों में 

मौजूद रहती हैं सारी सुविधाएँ

नहाने-धोने, खाने-पीने

बैठने-सोने, पढ़ने-लिखने के लिए 

उपलब्ध रहती हैं जगहें 

पूजा पाठ के लिए 

बना होता है मंदिर 

बच्चों को इनमें से 

किसी की ज़रूरत नहीं होती 

वे अपने घरों में 

धुआँ निकालने के लिए 

एक बड़ा सुराख रखते हैं बस ।

Aug 1, 2021

लघुकथा- आसमान

  - हरभगवान चावला

     गाँव की ग़रीबी से भागकर वह लड़का शहर के एक ढाबे में काम करने लगा था। खाना परोसते, बर्तन धोते रात के ग्यारह-बारह बज जाते। ढाबे के साथ जुड़ा एक कमरा था। उसी कमरे में वह और उसका लंगड़ा मालिक सो जाते। एक रात मालिक की नींद खुली तो उसने देखा कि लड़का कमरे में नहीं था। कहाँ चला गया लड़का- उसने सोचा। वह उसे देखने बाहर निकला। लड़का आसपास दिखाई नहीं दिया। ज़्यादा दूर वह जा नहीं पाया। कमरे में वापस आकर वह रोने लगा। दरअसल वह उस पर इतना आश्रित हो गया था कि अब उसके बिना रह पाना उसे बहुत मुश्किल लगता था। बाक़ी बची रात में वह सो नहीं पाया। बस बिसूरता रहा और लड़के की सलामती की दुआ करता रहा। सूरज अभी निकला नहीं था कि लड़का लौट आया। मालिक के भीतर ख़ुशी और क्रोध एक साथ उमड़े। उसने उसका कुर्ता पकड़ कर झिंझोड़ दिया, ‘कहाँ चला गया था तू इस लंगड़े को छोड़कर? क्या कसूर किया मैंने?’

          ‘मैं आपको छोड़कर भला कहाँ जाऊँगा?’

          ‘फिर क्या कर रहा था रात भर?’

          ‘आसमान देख रहा था।

          ‘क्या?’

          ‘वाह क्या चाँदनी थी! मुझे नहीं मालूम था कि ये पूरे चाँद की रात है। दो साल से मैंने आसमान ही नहीं देखा था। लड़का अपने काम में लग गया था और मालिक उज़बक की तरह उसे देखता जा रहा था।