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Apr 1, 2024

डायरी के पन्नों सेः मन्नत का वह धागा

  - शशि पाधा

अपनी कहानी कहाँ से शुरू करूँ ? जिन्दगी का सफ़र  जिस मोड़ पर शुरू हुआ, चलो  वहीं से शुरू करती हूँ -

वर्ष 1967 के दिसंबर महीने में मैं अपने कालेज के वार्षिक टूयर पर गई थी। सारी प्रिय सहेलियाँ, दो प्रोफेस्सर और एक बस। दिल्ली, आगरा, जयपुर, मथुरा -वृन्दावन जैसे प्रसिद्ध नगरों की सैर का कार्यक्रम था। उन दिनों जम्मू से कोई रेलगाड़ी नहीं चलती थी, इसीलिए यह सारा सफ़र बस से ही करना था। सफर कितना भी लंबा हो, अगर साथ मजेदार हो, तो कहना ही क्या! 

मैंने  अपने कपड़ों में अपनी भाभी से माँगी हुई दो साड़ियाँ, हलके रंग की लिपस्टिक भी पैक कर ली थी। साथ में धूप वाला काला  चश्मा भी। यह सब सभी सहेलियों ने मिल बैठ के तय किया था। सब मस्ती करने के मूड में थे। बस अभी जम्मू से निकली ही थी कि अन्ताक्षरी शुरू हो गई। खाना-पीना, गाना-बजाना करते हुए हम दिल्ली पहुँच गए।

दिल्ली में पहुँचते ही धीरे-धीरे लड़कियों के पर्स से लिपस्टिक निकलने लगी। किसी ने हल्की सी लगाईं और किसी ने ज़रा गहरी गुलाबी। सब के पास, तो माँगी हुई ही थी न, , जो भाभी-दीदी ने दे दी वही , तो लगानी थी। वैसे क्या फर्क पड़ता था। अपना, तो कोई आस-पास था नहीं, कौन देख रहा था। दिल्ली के प्रसिद्ध स्थानों को देख कर दो दिन के बाद हमारी बस आगरा पहुँची। 

 मेरी कहानी का पहला चैप्टर आगरा से ही  शुरू हुआ था । ताज महल, सिकंदरा, आगरा फोर्ट देखने के बाद हम सब फतेहपुर सीकरी पहुँच गए। दरगाह में माथा टेकने के बाद गाइड हमें एक  पेड़ के पास ले गया और लम्बी कहानी सुनाते हुए उसने कहा, “ यहाँ पर धागा बाँधने से सब के मन की मुराद पूरी होती है।” गाइड भी एक लड़का सा ही था। हम लड़कियों को देख कर शरारत से शब्दों में उसने कहा, “ जिसके मन में , जो कोई है, आज माँग लो। देखना वही मिलेगा।”

हमारी बस वहाँ से शहर की तरफ जा रही थी। कुछ लड़कियाँ एक- दूसरे की मन्नत के बारे में अनुमान लगा रहीं थी। जिनके मन का रहस्य पता था, उनका नाम लेकर छेड़- छाड़ चल रही थी। 

अचानक मेरे साथ बैठी मेरी सहेली ने मुझसे पूछा, “ शशि, तूने किसके लिए धागा बाँधा है? तू चुप रहती है पर ज़रूर कोई है तेरे दिल में। हैं ना? और उसके साथ बाकी लड़कियों  ने भी पूछना शुरू कर दिया। 

“ है न कोई, बता न- धागा किसके लिए बाँधा है ??” और पता नहीं क्या क्या बोलकर उन सब ने बस में शोर मचाना शुरू कर दिया। 

सच बताऊँ? मैं उस समय बस की खिड़की से बाहर देख रही थी। बाहर सड़क पर लाल कैप (फौज में पैराट्रूपर ही लाल रंग की कैप पहनते हैं)  पहने हुए  एक सुंदर- सा फौजी अफसर अपनी मोटर साइकल पर जा रहा था। एक स्मार्ट  फौजी अफसर को देखकर लड़कियों ने खिड़कियों से हाथ हिलाना शुरू कर दिया। बस की खिड़कियों से लड़कियों की हँसी सुनकर उसने एक नज़र हमारी ओर डाली और मुस्कराकर, हाथ हिलाते हुए  निकल गया।

 हाँ वैसे मैं स्वभाव से इतनी खुली -डुली नहीं थी, अधिकतर चुप ही रहती थी; लेकिन पता नहीं मुझे क्या सूझी, मैंने जोर से एलान कर दिया - “ वह , जो फौजी अभी -अभी गया है न, उसी  के लिए मन्नत का धागा बाँधा है । बस खुश?”

बस में हँसी का, जोदौर शुरू हुआ, वह कई घंटों तक चलता रहा। 

ओ! स्मार्ट फौजी? पर वो, तो हाथ हिलाकर चला गया-  छेड़छाड़ का दौर बड़ी देर तक चलता रहा।

यह बात 28 दिसंबर की है। मुझे याद है क्योंकि कुछ तारीखें भूलती नहीं -

30 दिसम्बर को हम अपने टूयर से वापिस जम्मू पहुँचे थे। 31 दिसम्बर की दोपहर माँ ने मुझे सोते हुए जगाया और कहा, “कमला बुआ को तुमसे कोई ज़रूरी काम है। मुन्ना तुझे बुलाने के लिए आया है। जरा चली जा।”

कमला बुआ का घर मेरे घर के पास ही था। वह अक्सर स्वेटर के डिज़ाइन बनाते हुए मुझसे पूछती रहती थीं। मैंने सोचा, कुछ यही पूछना होगा। मन, तो नहीं था, थकी भी थी, पर चली गई।

कमला बुआ आँगन में बैठी स्वेटर बुन रही थी। पास ही कुर्सी पर किसी को बैठे देख मैं ठिठक गई । बुआ ने पास बिठाया और स्वेटर के डिज़ाइन की बात करने लगीं । फिर उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा, “यह मेरा भतीजा है, कल ही आगरा से आया है। वहाँ फौज में कैप्टन है।”

मैंने उन्हें  नमस्ते कहा और जैसे ही जाने को उठी कैप्टन साहब ने कहा, ‘‘बैठ जाइए। बुआ बता रहीं थी कि आप भी आगरा गईं थी।’’

“हाँ!” कालेज टूयर के साथ।” -कुछ शर्माते हुए मैंने संक्षिप्त- सा उत्तर दिया और उठ खड़ी हुई। 

 “वहाँ कहाँ ठहरे थे आप लोग, क्या- क्या देखा?” उसने मुझे फिर रोक लिया था।

 मन में सोचा, न जान न पहचान। क्यों रुक जाऊँ? फिर भी खड़े- खड़े ही मैंने उस अजनबी के  प्रश्नों का ऊतर दिया। 

“देख शशि! यह डिज़ाइन ठीक से बन नहीं रहा है, ज़रा बैठकर तुम बुन के दिखाओ।” कहकर बुआ ने फिर से बिठा लिया।

मैं स्वेटर बुन रही थी और कैप्टन साहब बीच-बीच में आगरा, ताजमहल, आदि  की बात करते रहे। वो अधिकतर अंग्रेज़ी में बोल रहे थे और मैं हिन्दी में जवाब दे रही थी। (यह बात मुझे अभी तक याद है; क्योंकि मुझे , तो अंग्रेज़ी में बात करने की आदत नहीं थी और यह ठहरे फौजी)

दस-बारह सिलाइयों के बाद डिज़ाइन बन गया, तो मैं जाने को फिर से उठ खड़ी हुई। मैंने बड़े संकोच के साथ इन्हें नमस्ते कहा। हाँ! जाते जाते इन्होंने कहा था— It was good to talk to you.  

 घर आकर फिर से सोने की कोशिश करने लगी। अचानक मेरे मन-मस्तिष्क में  बिजली की तरह कुछ कौंधा-  कहीं यह वही फौजी अफसर , तो नहीं  जिसे आगरा में देख कर मैंने शरारत में अपनी सहेलियों से कह दिया था - इसके लिए मन्नत का धागा बाँधा है। अरे! मैं क्या सोच रही थी? यह कैसे हो सकता है????

हाँ! सच में वो वही था। पर यह कैसे हुआ, क्या संयोग था- मैं अभी तक नहीं जान पायी।

 बुआ का मन था कि मेरी शादी उनके परिवार में हो । स्वेटर का डिज़ाइन, तो बस बहाना था, वहाँ , तो मेरे भविष्य का डिज़ाइन तैयार हो रहा था।

6  जनवरी के दिन  इनके परिवार की ओर से  सगाई का संदेसा आया। मेरा पूरा परिवार बेहद खुश और मैं बेहद हैरान। 

ऐसा भी कभी होता है क्या? है न रोमांचक कहानी ????? ऐसा ही हुआ था।

शादी के कुछ दिन जब  मैंने आगरा वाली बात सुनाई , तो हैरान हो कर इन्होंने कहा, “ हाँ! वो मैं ही था। मैंने बस की नंबर प्लेट पर J&K लिखा देखा , तो हैरान हो गया था। जम्मू की बस और आगरा में?

थोड़ा रुक गया था मैं । खिड़की से कुछ लोग हाथ हिला रहे थे, तो मैंने भी जवाब दे दिया। क्या तुम भी उस बस में थी?”

हम दोनों एक दूसरे को देखकर खूब हँसे थे।

दो साल के बाद हम जब आगरा गए, तो दोनों ने फतेहपुर सीकरी के उस पेड़ पर बँधा मन्नत का धागा खोला और अटूट बंधन की प्रार्थना में एक बार फिर से नया धागा बाँध दिया। 

                        ■

Jun 5, 2021

डायरी- दुनिया को प्यार ही बचा सकता है

-डॉ. सुषमा गुप्ता

11 मई, 2021

एंड ..द सेकंड इनिंग

यह कितनी अजीब बात है कि अपने ठीक होने की खबर देना भी एक अजीब से शर्मिंदगी के भाव से भर रहा है। खराब होते होते तबियत तीसरे दिन ऐसी खराब हुई थी कि एक पल तो लगा, सब छूट जाएगा। कितने दोस्त, कितने कांटेक्ट सब फेल हो गए, कितने घंटे हॉस्पिटल नहीं मिला। मिला, तब भी बहुत सारी कॉम्प्लिकेशंस हुई। बहुत सारी तकलीफ़ों से गुज़रते -गुज़रते कितनी अजीब-सी बातें मन और दिमाग में चलती रही, यह सिर्फ मैं जानती हूँ। कितने लोग जो कुछ नहीं थे, उन्होंने बहुत प्यार भेजा, कोई जो खास थे,  उन्होंने हाल पता होते हुए भी जीने -मरने की सुध तक न ली। यही रिश्तों का गणित है, जो वक्त पड़ने पर निल बटा सन्नाटा में बदलने में पल नहीं लेता। अजीब- सा जीवन, अजीब से आसपास लोग!  इतना अविश्वास, डर, सदमा सब कुछ इस तरह से हावी होने लगा। ज़िंदा होते हुए भी, ज़िंदा होने का एहसास नहीं हो रहा था। बिटिया भी कोविड पॉजिटिव थी और अतुल (पति) तो मुझसे पहले से ही। उनकी खुद की हाल बहुत खराब थी, पर जिस तरीके से मेरी किडनी में इंफेक्शन फैलने के बाद तबियत बिगड़ी, वह अपनी तो सुध- बुध ही भूल गए और रात दिन हॉस्पिटल चक्कर काट, मुझे ही सँभालते रहे। इधर हम दोनों बेटी पर ध्यान देने लायक बिल्कुल नहीं थे,  तो प्रियम खुद की ज़रा भी परवाह न कर बहन को सँभालता रहा।

कैसा तो मुश्किल समय रहा और अभी भी सब तरफ़ यही सब हो रहा...

शुरुआत के 10 दिन में कौन-कौन परिवार से, अपनों से , पास पड़ोस से, दोस्तों से, चला गया सब मुझसे छुपाया गया। जैसे-जैसे तबियत थोड़ी सँभली, एक- एक करके इतने सब लोगों के जाने का पता चला कि मन जैसे खुद के ज़िंदा होने पर क्षुब्ध होने लगा। इतना काँपा कि बार-बार अपनों ने समझाया, बच्चे छोटे हैं, उन्हें तुम्हारी जरूरत थी ! शुक्र है ईश्वर का, तुम हो और ठीक हो। ईश्वर का शुक्र है, सच में बार-बार शुक्र है; पर ईश्वर कितना ...कितना नरसंहार और कब तक! क्यों इतनी त्राहि-त्राहि !

यह रूक जानी चाहिए, हर कोई दुःख में है, हर कोई तड़प रहा है, सब सहमे हुए हैं, सदमे में है फिर भी कुछ भी कहीं भी रुक नहीं रहा।

 एक दोस्त ने कहा जिसकी जितनी साँसें हैं उतनी साँसें तो लेकर ही जाएगा इसलिए  ज़्यादा मत सोचो। ज़्यादा सोचने से हासिल होगा भी कुछ नहीं। यह सोचो जब तक हो, तब तक आसपास के लोगों का कुछ अच्छा कर सको। वह बीस साल से दोस्त हैं, यूँ तो महीनों से बात नहीं होती; पर अगर हिम्मत टूटने लगती है और पुकार बैठूँ तो साथ देने हमेशा आता है, वह भी बिना कोई अहसान जताए। कोई ऐसा भी रहा जिसने फोन और ऐसे -ऐसे मैसेज भेजे,  इतनी मुस्कान दी कि मैं बार-बार पीड़ा भूल जाती, जबकि वह खुद भी बीमार था। कुछ बेहद प्यारी दोस्त ऐसे साथ बनी रहीं कि मैं उस अनमोल दुआओं जैसे प्रेम पर अचंभित हुई कि दुनिया में अभी भी  ऐसा निश्छल प्रेम बाकी है!

 नाम तो बहुत से हैं और बेहिसाब हैं, पर यहाँ इसलिए नहीं लिख रही कि गलती से भी मुझसे किसी का नाम छूट गया, तो उसके दिल को ठेस पहुँच सकती हैं,  इसलिए सबको ही बहुत मन से धन्यवाद कहना चाहती हूँ जिन्होंने इतना प्रेम इतनी दुआएँ दी।

 दुनिया में जब जब भी ऐसी विपदाएँ आई हैं, इंसान के साथ ने हीं इंसान की जान बचाई है, दुनिया को बचाया है, इंसानियत को बचाया है। जहाँ बहुत से लोग अब भी लाशों पर रोटियाँ सेंकने से नहीं रुक रहे, वहाँ ऐसे अनगिनत चेहरे भी हैं, जो रात दिन लोगों की मदद में लगे हैं। अतुल को भी देख रही हूँ कि तबियत खराब में भी वह जहाँ तक हो सकता है , जितना हो सकता है लोगों के लिए कुछ ना कुछ अरेंज कर ही रहे हैं।

आप सब भी अपने हिस्से के कर्म ही नहीं, उससे दो कदम बाहर जाकर, अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर जाकर भी जितना हो सके औरों के लिए करना, करते रहना ।

 यह दौर भी बीतेगा ।

 इसे बीतना ही होगा।

13 मई, 2021

कम्फर्ट ज़ोन

कभी आपने यह बात नोटिस की है, हमारे आसपास अधिकतर लोग अपने कम्फर्ट ज़ोन के अनुसार ही रिश्ते या कर्तव्य निभाते हैं। उससे ज़रा- सा बाहर आते ही या तो उनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति में बदल जाती है या लहज़े बदल जाते हैं। इतनी दुनिया देख लेने के बावजूद अब भी, कभी हैरानी होती है कभी सदमा भी लग जाता है, पर ज़िंदगी का सच यही है।

कंफर्ट ज़ोन.. आज तक मेरी समझ नहीं आया कि नेगेटिव वर्ड है या पॉजिटिव!

आज यह बात इसलिए कही कि जब मैं हॉस्पिटल में थी, तो एक बात बहुत शिद्दत से महसूस की, कि जहाँ बहुत सारे हेल्थ वर्कर्स और डॉक्टर्स बहुत रुखा बर्ताव कर रहे हैं, वहाँ बेशुमार ऐसे भी हैं, जो अपने प्रेम -भरे शब्दों से बहुत हौंसला दे रहे हैं। मेरे पास दिन के समय जो नर्स होती थी , वह बहुत प्यारी थी। अपनी निज़ी ज़िंदगी में बहुत सारी परेशानियों का सामना कर रही थी उसके बावजूद मुस्कान लिये सबका ख्याल रखती। कल नर्स डे पर उसकी परेशानियाँ लिखने लगी, जो मुझे उसने बाद के दिनों में एक दिन बहुत तकलीफ से गुज़रते हुए रोते हुए बताई थी, पर जाने क्यों नहीं लिख पाई, पर लिखूँगी जल्द ही।

आज तो मैं बात कर रही हूँ, अपने डॉक्टर शैलेंद्र की। शैलेंद्र पराशर। उम्र कोई चालीस के आसपास होगी उनकी। मेरे साथ बार-बार बहुत सारे कॉम्प्लिकेशंस आ रहे थे पर उनका धैर्य मेरे साथ देखने लायक था। मेरी वेन्स  इतनी पतली है कि एक एक्सपर्ट से एक्सपर्ट  इंसान को भी वेन्स ढूँढने में बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी और बहुत जल्दी-जल्दी स्वेलिंग आ रही है, इसलिए कैनुला भी  बदलना पड़ रहा था। जब चौथी बार कैनुला बदलने की नौबत आई तब नर्स से यह काम नहीं हो पाया तो डॉक्टर खुद न्यू बोर्न बेबी के समय यूज़ होने वाली टार्च लेकर बैठ गए मेरी वेन्स  ढूँढने के लिए। मेरा हाथ, हाथ में लेकर बहुत हौंसला देते रहे, उनकी आँखों में विश्वास और कम्पेशन ऐसा था कि कोई भी जीने की तरफ फिर से मुड़ जाए। मेरा लीवर बाय बर्थ वीक है मुझे माइल्ड से माइल्ड एंटीबायोटिक देते हुए भी सोचना पड़ता है ; क्योंकि मेरा बॉडी सिस्टम एक्सेप्ट ही नहीं करता। ऐसे में उन्होंने बहुत थोड़ी-थोड़ी डोज़ में मुझे दवाई धीरे-धीरे चढ़ाई ताकि मेरा इंटरनल सिस्टम उसे सह सके। उन्होंने खुद यह बात कही कि आप बीमार न पड़ा कीजिए, आप वन ऑफ द रेयरेस्ट केस हैं, जिनको बीमारी से ज़्यादा दवाइयों से नुकसान पहुँच सकता है, अगर वह स्टैंडर्ड प्रोसीजर के हिसाब से दे दी जाएँ तो। दिक्कत यह है कि मुझे मैक्सिमम दवाइयों से बहुत स्ट्रांग एलर्जी है।

 मुझे नहीं पता कि दवाइयों ने कितना काम किया शरीर में पर उनके बेहद अच्छे व्यवहार ने यक़ीनन बहुत-बहुत असर किया। मैंने कल उनके लिए कुछ भेजा जो अतुल ने बहुत आग्रह करके उनको दिया, क्योंकि वह ले ही नहीं रहे थे, कन्विंस किया  कि मैंने बहुत मन से भेजा है।

 यह बहुत बड़ी बात होती है जब कोई अपने कंफर्ट जोन से बाहर जाकर आपके लिए कुछ करता है। मैंने गिफ्ट भेजा; क्योंकि मेरे पास और कोई ज़रिया नहीं था कि मैं उनको बता सकूँ कि यह कितना मायने रखता है कि वह ऐसे हैं। आपके आस- पास भी जो ऐसे डॉक्टर हों, नर्सेस हों, उनको ज़रूर महसूस कराइएगा कि वह स्पेशल हैं, बहुत स्पेशल हैं। चाहे जैसे भी महसूस कराइए पर कराइए ज़रूर।

मैं बार-बार कहती हूँ। लोगों की तब भी मदद कीजिए, जब करना आपके लिए मुश्किल हो, यानी अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर जाकर लोगों की मदद कीजिए ।

यही इंसान होने की सच्ची पहचान है। प्रोफेशनल तो सब हैं ही।

17 मई, 2021

ईश्वर को अपनी पोथी फिर से बाँचनी चाहिए

मैं इन दिनों की बेबसी पर रोना चाहती हूँ;  पर मुझे रोना नहीं आता। कम से कम उन बातों पर तो बिल्कुल नहीं, जिन बातों पर रोना चाहिए। भीतर-भीतर किसी मरे हुए अवसरवादी गिद्ध का मातम है। यह सीधे तौर पर दुःख को न स्वीकार कर सर्दी की ठिठुरती रात में और कुछ इंतज़ाम न हो सका, तो चिता की आग से खुद को सेंकने जैसा मातम है। निस्संग होना, अपने में बंद हो जाना और दूसरों के दुःख के प्रति उदासीन हो जाना ,जिस दिन हम इसे उपलब्धि मान लेते हैं , तब हम इंसान की जीवित देह में मृत आत्मा लिये फिरते हैं।

हमें अपने न होनेमें ऐसे होने का क्या हक है !

 पर हम हैं, अपनी पूरी बेशर्मी के साथ उपस्थित, हर उस समय जब हमें अनुपस्थित होना था और हमेशा वहाँ अनुपस्थित, जहाँ हमारी उपस्थिति अनिवार्य थी। 

 धिक्कार है ऐसे गिद्ध प्रेम पर, जो भीतर भीतर पल रहा है। पर यह भीतर क्यों है !

 यह वह प्रश्न है, जिसमें हज़ारों सुया हैं, रात दिन बेधती हुई; पर ज़वाब कहीं से नहीं रिसता।

इन दिनों प्रेम में होना और मातम में होना एक ही बात हो गई है और यह बात ... बिल्कुल सही नहीं।

प्रेम में पीड़ा स्वीकार्य है, मातम नहीं। ईश्वर को अपनी पोथी फिर से बाँचनी चाहिए।

21मई 2021

सब कुछ नर है और सब कुछ स्वर्ग यानी कि सब कुछ यहीं है

 आपके आसपास लोग प्रेम प्यार देते हैं, स्नेह देते हैं सकारात्मक बातें करते हैं, तो आप एक स्वर्ग में हैं। आपके आसपास हर समय क्रिटिसिज्म रहता है, नीचा दिखाने की होड़ रहती है, एक दूसरे की भर्त्सना रहती है ,तो यक़ीनन आप एक नरक में हैं।

 मरने के बाद का स्वर्ग नर किसने देखा है! जो है, यहीं है।

सार्त्र का कोट है

हैल इज़ अदर पीपल

यह याद आता है फिर मुझे कि

अपनी देसी भाषा में इन्हें चार लोगभी कहते हैं

जैसे अभी पोस्ट कोविड बहुत लोग बड़े प्यार से कहते हैं अपना ध्यान रखो, बुरा समय निकल गया

 तो कुछ लोग इसी पंक्ति को ऐसे कहते हैं अरे शुक्र समझो, बच गई, कितने लोग तो लाख कोशिशों के बावजूद हॉस्पिटल से ज़िंदा वापस ना आ सके। तुम तो बहुत खुश किस्मत हो भई, हर किसी की किस्मत इतनी अच्छी नहीं।

 अब यह चाहे कितने भी अच्छे मन से बोला गया हो, लाइन वाकई अटपटी है

 आपको बिल्कुल समझ नहीं आता कि ऐसे में क्या रियेक्ट करो; क्योंकि सच्चाई तो यही है इस खुशकिस्मती में एक अजीब किस्म की शर्मिंदगी का भाव भी है। इतने अपनों  को जाते देख, इतना मौत का तांडव आसपास देखने के बाद, खुद को बस आप  सुन्न पाते हो। दिल बैठा जाता है और दिमाग नम्ब ।

 तो ऐसी पंक्तियाँ हिट करती हैं ज़ेहन को, फिर लगता है छोड़ो भी इस वक्त अपने हाथ में ज़्यादा कुछ है नहीं, तो किताबें पढ़ो और चादर तानक सो जाओ , उठो,  बच्चों के लिए अच्छा- सा खाना बनाओ, खिलाओ, खुद से जितना खाया जाए खाओ और फिर से किताबों में घुस जाओ। जिसकी मदद कर सकते हो, कर दो ,जो हाथ के बाहर हो उसके लिए दुआएँ दो, पर बोलो सँभल कर कि किसी का दिल इतना- सा भी ना दुखे।

बाकी दुनिया तो फिर दुनिया है और फिर अब बच गए हैं ,तो ठीक से ही जी लो। दुनिया को प्यार ही बचा सकता है। जितना बाँटो, उतना कम है।

25 मई, 2021

मन के डगमगाते डूबते जहाज के लिए

इस कठिन समय में मन को बाँधकर जबरदस्ती किताबों की तरफ मोड़ना भी एक बहुत बड़ा चैलेंज रहा। तबियत काफी महीनों से खराब रहने की वजह से लिखना पढ़ना पहले ही लगभग छूटा हुआ था; पर इस बार जब हॉस्पिटल से आई तो कुछ दिन बाद ही मैंने फोन में ऑडिबल ऐप डाल लिया और विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहासुनने लगी। 

इस त्रासदी भरे समय में इतना कुछ भयानक देख सुन रही थी और महसूस करके आई थी कि हर हाल में अपने दिमाग को खाली रहने से रोकना था। शरीर में बैठने की हिम्मत नहीं थी और आँखों में किताब पढ़ने की। ऐसे में यह बहुत ही कारगर तरीका रहा। आवारा मसीहा शरत चंद्र की जीवनी है। तकरीबन 22 घंटे की किताब है ऑडिबल पर। रोज़ लेटे-लेटे तीन चार घंटे तो सुन ही लेती थी। सुनते सुनते शरत चंद्र के जीवन के बारे में बहुत कुछ जाना, उनकी लेखन प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ समझा। एक आत्मचिंतन, आत्ममंथन अंदर-अंदर चलता रहा और सुनते-सुनते अपने आप ही दोबारा किताबें पढ़ने का मोह जाग गया। ज़रूरी नहीं कि यह ट्रिक सबके साथ काम करें पर ट्राई कीजिए। पढ़ने का मन न, हो तो समय का सदुपयोग किताबें सुनने से कीजिए। शायद खोया हुआ रिद्म वापस आ जाए। 

आवारा मसीहा सुनने के बाद कुछ चीज़े  ऑनलाइन ढूँढकर पढ़ी, पर जैसी बेसिक फितरत है -किताबों को हाथ में लेकर पढ़ने का जो सुकून है, वह आईपैड या लैपटॉप पर पढ़ने से नहीं आता ,तो एक बार फिर किताबों की तरफ़ मुड़ गई।

शुरुआत मानव कौल की अंतिमा से की। मानव कौल का लेखन मुझे प्रिय है। उनका ज़्यादातर लेखन डायरी शैली में होता है। अंदर-अंदर एक इंसान लगातार खुद से बात करता रहता है ,वहीं से कहानियाँ उपजती हैं और फैलती चली जाती हैं, शायद इसलिए मुझे उनका लेखन  पसंद आता है। अंतिमा एक सुंदर शुरुआत रही पढ़ने के लिए।

 इसके बाद उठाया चंदन पांडे का वैधानिक गल्प। यह मेरे पास पहले से आया रखा था; पर जाने कैसे भूल गई , तो अब पढ़ा गया। इसे मैंने कुछ घंटों में ही खत्म कर लिया। कुछ सालों पहले उत्तराखंड में एक पुलिस ऑफिसर गगनदीप सिंह ने एक लड़के को भीड़ से बचाया था ,अपनी जान की परवाह न करते हुए। यह उपन्यास उसी घटना के आसपास बुना गया है। सिस्टम किस कदर क्रूर और भ्रष्ट हैं!

 यह तो हम हमेशा से जानते ही हैं;  पर जब इस तरह की परतें खोलता हुआ कुछ पढ़ते हैं, तो हर बार मन कसमसाकर रह जाता है, टीस से भर जाता है कि कब बदलेगा यह सब। 

 तीसरी किताब उठाई हर्मन हेस की सिद्धार्थ यह मैंने कुछ महीनों पहले पापा को मँगाकर दी थी। उन्होंने पढ़कर वापस भी कर दी, पर मैं पढ़ना भूल गई। शायद यह इन्हीं दिनों में पढ़ी जानी थी, जब जीवन और मृत्यु के बीच में से निकलकर मन का हाल खुद भी थोड़ा लड़खड़ाया- सा हैं। यह गौतम बुद्ध की कहानी नहीं है यह एक ऐसे लड़के सिद्धार्थ की कहानी है, जो जीवन का अर्थ ढूँढता है। कठोर संन्यास से सामाजिक जीवन की तरफ मुड़ता है और सामाजिक जीवन से एक बार फिर से खुद के होने का अर्थ खोजता हुआ, अंततः सृष्टि के कण-कण से खुद के प्रश्नों का उत्तर पा जाता है। जिनका उत्तर बड़े-बड़े संन्यासियों से, उपदेश देने वालों से, समाज के कामयाब लोगों से, कहीं से न पा सका था। आखिरी के पन्नों में खुद से मिलने का, अध्यात्म का, ईश्वर का, अपने अंतस में पल रही अच्छाइयों और बुराइयों को स्वीकारने का भाव, जिस दृष्टि के साथ लेखक ने हमारे समक्ष रखा है , वह भीतर तक चेतना को झकझोरता है। आप एक ट्रांस में चले जाते हैं, चुप बैठे बहुत देर आत्मचिंतन की अवस्था में। चाहे तो आप इस किताब से बहुत कुछ ले सकते हैं।

पढ़ना छूट गया है, तो मन को कैसे भी बाँधकर फिर से शुरू कीजिए। इस भयानक समय में इससे सुकून- भरी शरणस्थली नहीं मिलेगी। नियम बनाइए कि दिन में 50 पन्ने तो पढ़ने ही है या एक दो घंटे या जो भी, पर एक नियम बनाइए और कैसे भी करके उसे फॉलो कीजिए। 

एक के बाद एक इतने अपने जा चुके हैं, जा रहे हैं कि मैंने मन को शतुरमुर्ग बना लिया है,  किताबों को धरती और उसके अंदर मुँह घुसा दिया। इस बात की शर्मिंदगी होनी चाहिए, पर अपनों के लिए जीना इतना ज़रूरी है कि मौत से पहले ही मर न जाएँ इसके लिए कोई तो ज़रिया बनाना ज़रूरी है।

मन मानता नहीं है, मन को मनाना पड़ता है।

यह बेहद मुश्किल समय है। जो शरीर से बच रहे हैं , वे मानसिक रूप से टूट रहे हैं। मन के डगमगाते डूबते जहाज के लिए किताबें एक सुंदर एंकर हैं।

लेखक के बारे में - जन्म- 21 जुलाई 1976, दिल्ली, शिक्षा- एम कॉम (दिल्ली यूनिवर्सिटी), एम बी ए (आई एम टी गाजियाबाद), एल-एल बी, पी-एच. डी., कार्य-अनुभव- कानून एवं मानव संस्थान की व्याख्याता- 2007-2014 (आई एम टी गाजियाबाद), सम्मान- हिन्दी सागर सम्मान-2017, प्रकाशन- समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में कुछ रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। प्रकाश्य- साझा संग्रह (जे एम डी प्रकाशन) नारी काव्य सागर, भारत के श्रेष्ठ युवा रचनाकार,हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में कहानी को प्रथम पुरस्कार, Email- suumi@rediffmail.com

Jul 14, 2019

गाँव जैसा मैंने देखा


गाँव जैसा मैंने देखा
-
बाबा मायाराम

18 -02 - 2019
गाँव में एक दिन
चेहरे, बिम्ब, पुराने लोग, टूटा स्कूल और गाँव
परसों के दिन मैं अपने गाँव में था। उस गाँव में जिसमें बचपन बीता। जहाँ पुराने पीढ़ी के लोग मुझे नाम से जानते हैं।
वहाँ घूमते हुए मेरे मानसपटल पर वे बिम्ब जिन्हें शब्दों में ढालता रहता हूँ, खाली समय में। आँखें मूँदे हुए जब नींद नहीं आती। ट्रेन से सफर करते हुए जब तेजी से वह दौड़ती जाती है।
जब कोई परिचित मिलता, मैं देखता रहता उसके चेहरे को, याद करता उन लोगों को जो नहीं रहे, वे पेड़ जो कट गए हैं। इमली के, आम के और नीम के। वो ढोंगा जहाँ रहती थी एक बुढ़िया, लाठी टेककर कमर पर हाथ धरे।
मिल गया बाराती, जिसका जन्म लौटती बारात को हुआ था। अब उसका परिवार भी बड़ा हो गया। उन पेड़ों पर नाम भी जो उनके घर के पास थे- जैसे चंपोवारे। यानी चंपा के पेड़ वाला घर। वो मुनीम की माँ, जिसने मुझे बरसों बाद चीह्न लिया था।
अनमने से लोगों में अचानक नया उत्साह आ गया था। वे याद करने लगे थे मेरे पिता को, जिन्होंने उनके ओसारे में बैठकर खूब बातें की थी। इलाज कराने ले गए थे अस्पताल। 
छोटी- छोटी गैल अब सड़क में बदल गई हैं। पर उनमें पानी बेतरतीब फैला पानी। फैल गया है गाँव भी। 
स्मृति पर जोर डालने से याद आया था कच्ची खपरैल वाला स्कूल। अब पक्का कांक्रीट व लेंटर वाला बन गया था। बनाता रहा उसका आकार, कहाँ क्लास लगती थी और कहाँ बैठते थे टीचर। और कहाँ था इमली वाला पेड़।
कौन थे साथ में पढ़ने वाले।
मैंने एक नजर दूर नदी पर डाली। पानी नहीं था, रेत पसरी थी। दूर हो गई थी गाँव से। वह सदानीरा थी।
कुछ खोया हुआ, कुछ मृत सा, कुछ नया और कुछ उजड़ा सा.. उजड़ा उस मायने में जहाँ मूल्य बदल गए।
असल में स्मृति बीते हुए और वर्तमान को जोड़ने की कड़ी है, शायद उसमें समय भी लगता है
19 - 02 - 2019
बदलते गाँव 
डाँग,  पक्का गोला और गैल
जब गाँव की याद करता हूँ तो जो छवि उभरती है- सुबह सवेरे की चिड़ियों की चीं-चीं- चूँ ची चिआऊ।
कुएँ के पनघट पर पनिहारों की भीड़- रस्सी बाल्टी की खट-पट। नहाना-धोनाऔर देवी की पूजा-पाठ।
गाँव की डाँग, जहाँ दिन में अँधेरा हुआ करता था। जंगल के कारण, उधर आने में डर लगता था।
नदी, जो कल-कल छल-छल बहते थीं। वहाँ बरौआ, कहार लोगों के खेत होते थे। हरी सब्जियों की खेती। पानी तो झिरिया खोदने से ऊपर ही निकल आता था।
गोला, गाँव के लोग पक्की सड़क को गोला कहते हैं। गैल, उसे कहते हैं जो कच्ची होती है। गड़बाठ उसे कहते हैं, जिसमें बैलगाड़ी चल सके यानी चौड़ी गैल।
खेत-हार में काम करते लोग, मवेशियों की नार ( मवेशियों का समूह, जिसे गाँव का चरवाहा चराने ले जाता था)। शाम को धूल उठाते गाय-बैल। 
गोबर से लिपे-पुते घर। कच्ची मिट्टी की दीवारें गेरू से रँगी। तीज-त्योहारों का अलग ही आनंद। 
इन दिनों होउरा ( हरे चना पौधा सहित भूँजना, यानी भुँजा चना) खूब खाया जाता था। 
अब इनमें से कई दृश्य गायब हो गए हैं। जंगल कट गए, नदी सूख गई, कुएँ भी सूख गए। 
मवेशी भी कम हो गए। होउरा अब भी मिलता है। मिट्टी की दीवारें और लिपे-पुते घर भी। गाँव अब भी है। गाँव संस्कृति भी कुछ हद तक। इसे बचाने की जरूरत है।
23 -03 - 2019
गाँवों में क्या बदला?
जब आज मैं सड़क से गाँवों से गुजर रहा था तो सोच रहा था इन गाँवों में क्या बदला।?
गेहूँ के खेत, पेड़, गाँव घर, दुकानें सब चलचित्र की तरह पीछे छूट रहे थे।
एक तो बदलाव यही दिख रहा था कि सड़क अच्छी बन गई है और वाहनों की बाढ़ आ गई है।
जब हम तीन-चार दशक पहले सड़कों पर चलते थे तो लोग पैदल और साइकिल पर चला करते थे।
मोटर साइकिल इक्का दुक्का दिखती थी और ट्रेक्टर भी बहुत कम। टेलिविजन तो बाद में आया।
कच्चे घर हुआ करते थे। अब ज़्यादातर पक्के हो गए हैं; लेकिन कुछ तो अब भी कच्चे हैं, बल्कि वैसी ही हालत में हैं जैसे सालों पहले थे।
मवेशी बहुत होते थे। खेतों में हल-बक्खर चलते थे। बैल उन्हें खींचते थे।
स्कूल कमबच्चे ज्यादा थे; लेकिन पढ़ाई आज से अच्छी होती थी और शिक्षक- छात्र दोनों पढ़ाई पर ज़ोर देते थे। यह कम ज़्यादा हो सकता है। 
पर शिक्षकों में पढा़ने का चाव था। स्कूल की इमारतें आज जितनी अच्छी नहीं थी।
सड़कों के किनारे पेड़ हुआ करते थे, जो कम दिखते हैं। खेतों में आम, जामुन, महुआ के पेड़ बहुत होते थे। 
यह तो हुआ बाहरी बदलाव, सोच भी बदली है। वह कई मायनों में एक जैसी है। शहर  और गाँव का फर्क कम हो रहा है।
09- 04 -2019
नगालैंड- नयापन भी और पुरानापन भी
पहाड़ियों के बीच बसे विरल गाँव। ऊपर से छोटे-छोटे माचिसनुमा दिखते घर। बाँस की दीवारें। घरों की कलात्मकता व डिज़ाइन।
चीड़ के पेड़ों की सरसराहट। सफेद व लाल फूल। झाड़ियाँ व वनस्पतियाँ। सुंदर भू दृश्य (लैंडस्केप)
कल -कल बहती नदियाँ, नाले और झरने और दूर-दूर ऊँची नीची चोटियाँ।
जींस-पेट, टोपी, सुंदर छतरियाँ और पुराने में रंगीन मनकों व गुरियों  की मालाएँ पहने बुज़ुर्ग महिलाएँ।
और कई तरह की खेती पद्धतियाँ- पहाड़ी झूम खेती, टैरेस, किचन गार्डन और कुदरती खेती (नेचुरल फार्मिंग)
तरह-तरह के भोजन, बेजोड़ स्वाद, हरी पत्तीदार सब्जियाँ व स्वादिष्ट सूप 
ज़्यादा खेती करने वाले, लघु कुटीर उद्योग, सुंदर पर्स, शाल, झोले, टोपी। व्यापारी, कुछ नौकरी पेशा वाले। साझा संस्कृति के साथ अलग-अलग पेशों के साथ फलने-फूलने वाला है नगालैंड।
16 – 04- 2019
गाँव को क्या चाहिए
नगालैंड के एक गाँव में करीब हफ़्ता भर रहने का मौका मिला।
वहाँ जंगल था, पीने के पानी के परंपरागत जलस्रोत थे, पौष्टिक अनाजों की खेती थी।
अच्छा स्कूल था। लड़कियों की शिक्षा, जो कि इस गाँव में थी।
परंपरागत हस्तकला थी। बाँस की शंक्वाकार टोकरियाँ, पीठ पर बाँधकर चलने वाली, और भी न जाने कितने सामान, दस्तकारी ऐसी कि देखते रह जाएँ। 
बुनकरी की सानी नहीं, मफ़लर, पर्स, झोले, मेखला, टेबल कवर इत्यादि।
खेल मैदान, पुस्तकालय, देसी बीज बैंक और स्थानीय सामग्री से बने घर।
मुर्गी पालन था।
एक आदर्श गाँव ही था यह। अगर हम इसे सूत्र में कहे ,तो हमें एक गाँव में अच्छा जंगल चाहिए। ये पेड़-पौधे चाहिए। जिससे  जल संरक्षण हो।
ऐसी खेती चाहिए ,जिससे मिट्टी बचे, मिट्टी का संरक्षण हो, यानी रासायनिक खादों व कीटनाशकों से बचा जाए, जो हमारी खेती को बंजर कर रहे हैं।
इसके लिए पौष्टिक अनाजों की देसी खेती , हाथ से श्रम वाली ज़रूरी है। 
दस्तकारी के कामों से परंपरागत कला व हुनर भी बचेंगे और आजीविका भी मिलेगी। इस सूची में और भी कुछ जोड़ा जा सकता है।
इस तरह एक गाँव अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है।
22- 04 - 2019
छत्तीसगढ़ यात्रा
सादगी व सुघड़ता के गाँव
किसी भी जगह की यात्रा में वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ लोगों की संस्कृति भी प्रभावित करती है।
छत्तीसगढ़ उन स्थानों में एक है ,जहाँ की सांस्कृतिक सभ्यता बहुत समृद्ध है। 
खासतौर से ग्रामीण छत्तीसगढ़ की।
शहरी व नगरीय सभ्यता अब एक जैसी हो गई है। चमचमाती सड़़कें, कारें और भव्य इमारतें। उन पर रेंगते -भागते लोग।
लेकिन छत्तीसगढ़ के दूरदराज़ के गाँव अब भी पुरानी गाँव की संस्कृति को सँजोए हुए है।
खपरैल वाले हवादार घर, गोबर से लिपे-पुते, आंगन में तुलसी पौधा, बाड़ी में मुनगा, नींबू और अमरूद।
कुर्ता, धोती की पोशाक, रंगीन गमछा, लुंगी।  महिलाएँ, रंगीन चटक साड़ी। और रेडियो पर छत्तीसगढ़ी गीत।
कड़ी धूप में काम करना, कर्मठ लोगों की चमड़ी की चमक, महिलाओं का सार्वजनिक कामों में बराबरी से हिस्सा लेना।
सुबह झाडू लगाने से लेकर शाम तक खाना पकाना, खिलाना और बाद में खाना, जैसे कड़े काम करना। 
मेहमानों की आव-भगत, लोटे में पानी, नीचे बैठकर पीतल की थाली में चावल, दाल और हरी भाजियों का साग, मुनगा का साग।
सादगी से रहना, तरह तरह के नृत्य गीत, तालाबों के पास बने पेड़ों की पूजा। तालाबों के साथ सुंदर भूदृश्य। जो आँखों में बस जाते हैं।
इतनी सारी ग्रामीण विशेषताएँ शायद ही कहीं मिले।
यह सब लिखते समय मुझे याद आ रहा है कोटा का मानपुर व सरईपाली गाँव जहाँ मुझे बहुत ही प्रेम से भोजन कराया गया था। 
30 – 06 – 2019 
बारिशगाँव औऱ खेत
बारिश का मौसम आ गया है। दो दिन शाम को  घुमड़े बादल बरसे। कल कुछ ज़्यादा ही।
अब खेती किसानी का काम शुरू हो गया है। धान के लिए थऱहा ( रोपा), जो पीला पड़ने लगा था, अब उसमें जान आ गई होगी। 
बारिश आते ही मुझे गाँव की याद आई।
बारिश के पहले लोग खपरैल वाले घरों की मरम्मत करते हैं। जहाँ -जहाँ नए खपरे चढ़ाने की ज़रूरत होती है, बदल देते हैं।
मिट्टी के खपरे लोग खुद ही बनाया करते थे। कई महिलाएँ इसमें पारंगत थीं। 
खपरों के नीचे ठाट ( बाँस या अरहर के ठंडलों से बनता था)  किया जाता था। इस काम में बच्चे भी खपरे लाने ले जाने का काम करते थे।
छतों पर चढ़कर यह काम करना होता था। कई बार बच्चों को भी चढ़ने का मौका मिलता था।
खेतों में धान रोपाई जिसे इधर लबोदा कहते हैं, का दृश्य बहुत सुंदर होता था। रंग-बिरंगी साड़ियों में महिलाएँ और पुरुष लोकगीत गाते हुए रोपा लगाते थे।
बैल-बक्खर चलता रहता था। बारिश होती रहती थी। गाय-बैल चरते चराते खुद को पानी से बचाने के लिए पेड़ों के नीचे छुपते थे।
कई लोग बारिश से बचने के लिए सागौन के पत्ते के छाते बनाते थे। छातों का चलन कम था।