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Jul 25, 2012

जीवन- शैली

बूंदों में जाने क्या नशा है...
- सुजाता साहा
बारिश में जब आप रेन कोट या छतरी लेकर सड़क पर निकलते हैं तो ढेरों मुसीबतें झेलनी पड़ती है जो इस भीगे मौसम के नशे को फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए बूंदों में जाने क्या नशा है ... गाते हुए कुछ पल के लिए तन मन को भीगोने आए इस सुहाने मौसम को हाथ से फिसल कर जाने मत दीजिए।
बरसात... एक बहुत आनंदित करने वाला एहसास है। बारिश की बूंदे तन को ही नहीं, मन को भी भीतर तक भिगो देती हैं। पानी की बूंदे पेड़ों की पत्तियों को नहलाती हुई धरती के अंतस में समा जाती हैं। बारिश से नहाई धरती को देखकर प्रफुल्लित मन बरबस ही प्रकृति को करीब से निहारने के लिए मचल उठता है।
यह सब पढ़कर आप कह सकते हैं कि यह सब तो किताबी बातें हैं, कवि मन की कल्पनाएं हैं, क्योंकि जब भी आप इस खुशनुमा मौसम में बरसती बूंदों का आनंद लेने के लिए कहीं जाने के बारे में सोचते हैं तो सड़कों का हाल देखकर आपको रोना आ जाता होगा, क्यों सही कहा ना मैंने? 
लेकिन जहां जीवन में खूबसूरती है वही कुछ गंदगी भी है। सुख और दुख की तरह हमें दोनों को स्वीकार करके चलना पड़ता है। इसलिए जिस प्रकार बरसात अपने साथ हरियाली लाती है उसी प्रकार कई बाधाएं भी लाती है। जिस तरह आप बरसात में हरियाली को देखकर खुश होते हैं उसी प्रकार कीचड़ देखकर मन दुखी हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आप सिर्फ दूसरे पक्ष को ही देखें, आप इसके उजले पक्ष को देखना शुरु कीजिए फिर देखिए किस तरह आप प्रफुल्लित होकर गाने लगेंगे... बूंदों में जाने क्या नशा है, छम छम इठलाती बूंदे, तन मन पिघलाती बूंदे...।
बारिश का मौसम है तो आप सिर्फ सड़कों का रोना मत रोइए। और ऐसा मत सोचिए कि हम क्या कर सकते हैं। बल्कि हम ही बहुत कुछ कर सकते हैं। जरूरत है आपको थोड़ा सा अपने आप को बदलने की।
कुछ लोग बारिश का मौसम देखा और निकल पड़ें अपने कार में सैर करने को। रास्ते में गड्ढा दिखा तो कार की रफ्तर धीमी करने के बजाए तेजी से कार वहां से निकाल लेते हैं। नतीजन वहां चल रहे लोगों पर कीचड़ की छींटें पड़ी। अगर आप भी ऐसा करते हैं तो अपनी इस आदत को सुधार लीजिए।
जैसे जब हम अपनी चार पहियों वाली गाड़ी में बैठकर फर्राटे से पानी भरे गड्ढ़ों से गाड़ी दौड़ाते हैं तो राह चलते राहगीर की ओर तो देख ही सकते हैं। यदि देख सकते हैं तो क्यों न हम पानी वाली जगह पर गाड़ी की रफ्तार धीमी करके शालीनता का परिचय दें। इस काम में तो हम किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा ना। 
इसी तरह अकसर देखा गया है कि जब हम किसी परिचित के घर मिलने जाते हैं और वहां से विदा लेते वक्त बारिश शुरु हो जाती है तो मेजबान छाता, रेनकोट देकर अपनी शालीनता का परिचय देता है ताकि हम भीगे नहीं। लेकिन क्या हम उन चीजों को लौटाते वक्त भी उतनी ही तत्परता दिखाते हैं? या लिया हुआ सामान न लौटाने का आपने संविधान बना लिया है। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि उन चीजों को सही समय पर लौटाकर हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा सकते है। क्योंकि जिन्होंने आपको बारिश से भीगने से बचाया है उन्हें भी इस मौसम में इन सबकी जरूरत है। तो यह काम तो हमें ही करना होगा ना किसी दूसरे को नहीं।
कौन होगा जो अपने घर को साफ सुथरा नहीं रखना चाहता। तभी तो कई मेजबान कृपया जूता चप्पल बाहर उतारे कहने में संकोच नहीं करते। जो यह बात कहने का साहस नहीं जुटा पाते। इसका यह मतलब तो नहीं कि हम उनके साफ सुथरे घर और कालीन को कीचड़ से सने अपने जूते- चप्पल से रौंदते चले जाएं। कोई कहें या नहीं कहे हमें जूते चप्पल बाहर उतारकर ही अपनी समझदारी का परिचय देना चाहिए। यह हमारा उत्तरदायित्व है। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो बोलने के बावजूद भी अपने जूते चप्पल बाहर नहीं उतारते।
यह तो हुई बारिश में दूसरों का ख्याल रखने की बात अब थोड़ा सा अपना भी ध्यान रख लिया जाए। रिमझिम बारिश  हो और पकौड़े खाने न मिले तो फिर ऐसी बारिश का क्या मतलब। पर मौसम का बहाना लेकर तली हुई चीजें बाहर खाकर कहीं हम बीमारी को आमंत्रण तो नहीं दे रहे। बरसात तो खैर बहाना है तली, गरम चीजें खाने का, किन्तु इन दिनों बाहर खाना कितना नुकसानदायक हो सकता है इसे भी जरा सोच लें खासकर बच्चों के खानपान को लेकर लापरवाही तो बिल्कुल भी नहीं। तो बाहर का खाना न खाकर जान है तो जहान है को सार्थक कर ही सकते है। बाहर का ही नहीं घर में भी पकौड़े या अन्य तेल की चीजें जरूरत से ज्यादा खाकर कहीं हम अपनी सेहत के दुश्मन तो नहीं बन रहे और निरोगी काया के फार्मूले को झूठला रहे।
यह सब कहने यह मतलब नहीं कि आप बरसात में पकौड़े का मजा ही न लें। बिल्कुल लें बल्कि अपने दोस्तों और परिचितों को भी इसमें शामिल करें, क्योंकि बारिश में जब आप रेन कोट या छतरी लेकर सड़क पर निकलते हैं तो ढेरों मुसीबतें झेलनी पड़ती है जो इस भीगे मौसम के नशे को फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए बूंदों में जाने क्या नशा है ... गाते हुए कुछ पल के लिए तन मन को भीगोने आए इस सुहाने मौसम को हाथ से फिसल कर जाने मत दीजिए।

Apr 23, 2012

बातचीत

डॉ. सुनील कालड़ा से बातचीत पर आधारित

जिंदगी को संवारते हाथ

- सुजाता साहा
डॉ. सुनील कालड़ा
प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कार ने आज मनुष्य की उम्र को पछाड़ दिया है यही वजह है कि सितारें फिल्मी और माडलिंग की दुनिया में 50-55 की उम्र तक भी छाएं रहते हैं। उनके चेहरे और शरीर पर झुर्रियों के निशान ऐसे मिट जाते हैं कि उम्र का पता ही नहीं चलता। मेडिकल साइंस के आविष्कार प्लास्टिक सर्जरी ने अनुवांशिक विकृतियों को दूर करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ही है साथ ही बदसूरत चेहरे से निराश लोगों के लिए जीने के लिए आशा की किरण भी जगाई है।
पहले         बाद में
मनुष्य अपना रंग- रूप जन्म से ही लेकर आता है। उसके नाक- नक्श उसका सौंदर्य कुदरती होता है लेकिन कुछ बच्चे अनुवांशिक कारणों से कटे- फटे होंठ, टेठे मेढ़े दांत, चपटी नाक और बेडौल चेहरा लेकर पैदा होते हैं। जिसे अंधविश्वास के कारण हमारे समाज में पूर्वजन्म का अभिशाप, बुरे कर्म का नतीजा तथा भगवान की मर्जी मानते हुए ऐसे बच्चों को हेय दृष्टि से देखते हैं। अगर इन अनुवांशिक विकृतियों को बचपन में ही दूर न किया जाए तो बड़े होकर बच्चे हीनग्रंथि के शिकार हो जाते हैं। तथा समाज में सहज होकर उनके जीने की इच्छा खत्म हो जाती है।
आज मेडिकल साइंस ने इतनी अधिक तरक्की कर ली है कि उपरोक्त अनुवांशिक विकृति को भी आसानी से दूर किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित कालड़ा कॉस्मेटिक सर्जरी इंस्टीट्यूट एडवान्सड बर्न एंड ट्रामा सेंटर एक ऐसा अस्पताल है जहां डॉ. सुनील कालड़ा ऐसे बच्चों की जिंदगी को संवारने में लगे हैं।
डॉ. कालड़ा दिनभर में लगभग 15-20 ऑपरेशन करते हैं। उन्होंने विकृत हो चुके लगभग 1 लाख से ज्यादा लोगों के जीवन को खुशियों से भर दिया है लेकिन दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए डॉ. कालड़ा को बहुत लंबा संघर्ष करना पड़ा है।
6 जनवरी 1960 रायपुर में जन्मे डॉ. सुनील कालड़ा छत्तीसगढ़ के ही नहीं बल्कि देश के प्रसिद्ध प्लास्टिक सर्जनों में से एक जाने जाते हैं। अपने परिवार में डॉ. सुनील सबसे छोटे हैं। पिता आर. एल. कालड़ा, माता कृष्णा, दो बहनें शारदा व नीतू तथा बड़े भाई अनिल हैं। यूं तो डॉ. कालड़ा एक समृद्ध परिवार में पैदा हुए थे रायपुर के शारदा चौक के पास कालड़ा परिवार की साइकल दुकान थी।  साथ ही साथ ठेकेदारी का काम भी करते थे। लेकिन सुनील की पैदाइश के चार साल बाद ही उनके पिता का एक दुर्घटना में देहांत हो गया। मां जो पांचवी तक पढ़ी थीं उन पर परिवार का पूरा भार आ गया। और दो वक्त का भोजन भी मुश्किल से जुटने लगा। आर्थिक विपत्ति के इस संघर्ष ने कालड़ा परिवार को बजाए कमजोर करने के और मजबूत बना दिया। सुनील तब छोटे थे। दोनों बहनें ट्यूशन आदि करके और बड़े भाई किसी तरह 12वीं की शिक्षा के बाद नौकरी करने लगे।
इन सब मुसीबतों के साथ परिवार में जो सबसे बड़ी मुसीबत आई वह थी मां की बीमारी। मां को पथरी हो गया उनका असहनीय दर्द देखकर सुनील बेचैन हो जाया करते थे और इसी बीच उन्होंने निर्णय लिया कि वे डॉक्टर बनकर लोगों का दर्द दूर करेंगे। तब परिवार को भी लगा कि सुनील को डॉक्टर ही बनाएंगे। इस तरह सुनील ने रायपुर में एमबीबीएस और एमएस पास किया और सर्जरी की पढ़ाई के लिए दिल्ली चले गए। लेकिन डॉ. कालड़ा केवल कटे फटे होंठ ठीक करने वाले सर्जन नहीं बनना चाहते थे बल्कि वे सर्जरी के अन्य क्षेत्रों में भी महारत हासिल करना चाहते थे जिसे पूरा करने के लिए मुम्बई में प्रेक्टिस के दौरान वे स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की टीम के साथ रहकर सर्जरी की बारीकियां सीखने लगे। बगैर पैसा लिए लगातार अन्य डॉक्टरों के साथ काम करते हुए डॉ. कालड़ा ऐसे सर्जन बन चुके हैं जिनके पास हर उस बिगड़े हुए रंग- रूप का इलाज है जो कभी लाइलाज माना जाता था। हर तरह की सर्जरी में परिपक्वता हासिल कर लेने के बाद अंत में उन्होंने रायपुर में अपना अस्पताल खोल लिया।
पिछले दिनों अपने कुछ सवालों के साथ जब मैं उनके अस्पताल पहुंची तो बेहद व्यस्त होने के बाद भी उन्होंने बातचीत करना स्वीकार कर लिया।
डॉ. कालड़ा से मैंने पूछा प्लास्टिक सर्जरी को ही आपने क्यों अपनाया? 
उन्होंने बताया कि मैं सर्जरी के क्षेत्र में कुछ अलग करना चाहता था। मुझे प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र ने आकर्षित किया क्योंकि इसमें मुझे लोगों की जिंदगी बचाने के साथ- साथ उनकी जिंदगी संवारने का भी मौका मिल रहा था।
आपकी दिनचर्या क्या है और मरीजों से आपके संबंध कैसे हैं?
मरीज हैं तो हम हैं। मैं उन्हें पूरा सर्पोट करता हूं। उन्हें चिकित्सा सुविधा के मामले किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ न हो इसके लिए मैं स्वयं 24 घंटे अपनी सेवा देता हूं। मैं एक डॉक्टर हूं इसलिए हर पीडि़त व्यक्ति का सदैव तत्पर रहकर इलाज करना मेरा प्रथम कत्र्तव्य हैं जिसे मैं पूरा कर रहा हूं। ...और हां किसी भी बीमारी को दूर करने के लिए काउंसिलिंग जरूरी है। काउंसिलिंग के द्वारा ही अपने मरीजों का उत्साहवर्धन करता हूं। यही वजह है कि वे जब ठीक होकर घर वापस जाते हैं तो आत्मविश्वास से लबरेज होते हैं।
अनुवांशिक विकृतियों का इलाज क्या किसी खास उम्र में ही संभव है?
कटे फटे होंठ से पीडि़त बच्चों का ऑपरेशन 3 से 6 माह के बीच हो जाना चाहिए इसी तरह विकृत तालू से पीडि़त बच्चों का ऑपरेशन एक साल तक की आयु में होना चाहिए। पैरेंट्स खुद ही अपने बच्चों की कमी दूर करने के लिए हमसे कंसल्ट करते हैं।
कोई ऐसा केस जो आपके जेहन में आज भी ताजा है?
ऐसे तो बहुत से केस हैं परंतु रायपुर की रिज़वाना का केस मेरे लिए एक चुनौती था। रिजवाना हिपो (Fibrous Dysplacia) से पीडि़त थी। उसका चेहरा इतना विकृत था कि वह अपना चेहरा भी आईने में नहीं देखती थी और अपना चेहरा हमेशा कपड़े से ढकी रहती थी। बहुत जगह से निराश होकर आखिर में रिज़वाना मेरे पास आई। आज वह बिल्कुल स्वस्थ और सुंदर बन चुकी है। उसकी शादी हो गई और वह अपने बच्चों के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही है। एक लड़की ऐसी भी आई थी जिसके पास एश्वर्या राय के हर एंगल से दिखने वाले 200 फोटो थे वह कहती थी कि मुझे एश्वर्या जैसी ही नाक चाहिए। मैंने उसकी नाक वैसी तो नहीं बनाई क्योंकि उसका चेहरा बड़ा था जिस पर एश्वर्या की नाक फिट नहीं बैठती थी। इसलिए मैंने उसके चेहरे के अनुरूप नाक बनाई। इस तरह ऐसे बहुत से केस आते हैं कि उन्हें वैसी ही नाक, वैसी ही आंख आदि चाहिए। परंतु यह संभव नहीं क्योंकि हर किसी के चेहरे की बनावट अलग होती है उसपर क्या अच्छा लगेगा यह देखकर  ही उसके चेहरे बनावट में बदलाव किया जाता है। एक दूसरा मामला सेक्स चेंज का था। जिसमें माइकल नामक एक लड़का जिसका शरीर तो लड़के का था परंतु उसे लड़कियों की तरह रहना पसंद था। उसने अपना सेक्स बदलवाया। आज वह एलीना बनकर सबके सामने है। उसने खुद अपने बारे में मीडिया को जानकारी दी जबकि सेक्स चेंज जैसे मामलों को लोग छिपाना चाहते हैं। एलीना आज एक समाजसेविका के रूप स्थापित है।
आर्थिक रूप से इलाज में असमर्थ लोगों के लिए अस्पताल में क्या सुविधाएं है?
सबसे पहले मेरी कोशिश होती है कि पैसे के अभाव में कोई गरीब मेरे अस्पताल से निराश होकर न लौटे। मैं हर चेहरे को मुस्कुराता हुआ देखना चाहता हूं। आर्थिक रूप से असमर्थ लोगों के लिए ऑपरेशन मुस्कान, स्माइल ट्रेन, कृष्णा हेल्थ केयर फाउन्डेशन प्रोगेसिव क्लब के तहत उनका नि:शुल्क इलाज होता है।
आपके पास किस प्रकार के मरीज बड़ी संख्या में आते हैं?
मेरे पास ज्यादातर लोग अपने चेहरे की सुंदरता के लिए आते हैं जैसे असामान्य नाक की कास्टमेटिक सर्जरी, बाल प्रत्यारोपण, अनचाहे बाल हटाने, वक्ष को सही आकार देने, टैटू मिटाने, हाथ- पैर के कटे हिस्से को जोडऩे, चमकती त्वचा के लिए, चेहरे की झाईयां, दाग धब्बे, झुर्रिया मिटाने, आग से जले झुलसे शरीर को सही रूप में ढालने, आड़े तिरछे चेहरों को ठीक करवाने, आंखों को एक समान बनाकर सुंदरता प्रदान करवाने, तिल बनाने व हटाने, मोटापा कम करवाने वाले केस के साथ  लड़कियां गालों पर डिंपल व नाभी में न्यू लुक देने आती हैं। ऐसी भी लड़कियां आती हैं जो एश्वर्या राय और कैटरीना कैफ जैसी खूबसूरत फिल्मी हिरोइनों के फोटो दिखा कर कहती हैं कि हमारी नाक या हमारे होंठ इनके जैसे बना दीजिए।
डॉ. कालड़ा ने आगे बताया कि आज के दौर की पीढ़ी अपने जीवनसाथी को परफेक्ट चाहती है अगर कोई कमी है तो उसे  पहले दूर करना चाहते हैं। शहरी क्षेत्रों के अलावा गांवों में भी ऐसी जागरूकता आई हैं जिसमें युवक अपनी जीवन संगिनी को सुंदर बनाने के लिए कास्मेटिक सर्जरी की सहारा ले रहे हैं। 
लोग आधुनिकता के चलते हीरो- हीरोइन की तरह दिखना चाहते है और अपने अच्छे भले प्राकृतिक चेहरे को बदलना चाहते है यह कहां तक उचित है?
हम प्राकृतिक चेहरे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करते बल्कि खराब चेहरे को सुंदर बनाते है। और रही पूरे चेहरे की सर्जरी तो हम चेहरा बदलने से पूर्व उसकी छानबीन करते है कहीं कोई क्रिमिनल तो नहीं है जो अपना पहचान छुपाना चाह रहा हो, ऐसी दशा में हम सर्जरी नहीं करते लेकिन अगर किसी का चेहरा बुरी तरह बिगड़ गया हो, शादी में प्राब्लम आ रही हो, प्यार में धोखा या कोई और जैनविन प्राब्लम हो तो सर्जरी की जाती है।
प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में भारत दूसरे देशों के मामले में पिछड़ा हुआ माना जाता है आप क्या सोचते है?
पहले लोगों की सोच थी कि हीरे जवाहरात पहनने से खूबसूरती बढ़ती है परंतु जब चेहरा ही सुंदर ना हो तो कितने भी भारी गहनें क्यों न पहने जाएं आप सुंदर नहीं लग सकते। जबकि सुंदरता तो सादगी में होती है। अब लोग जागरूक हो रहे हैं वे सोने चांदी के गहने खरीदने के बजाए अपने चेहरे की खूबसूरती पर पैसा लगा रहे हैं। उदाहरण के लिए ब्राजील जैसे देश में लोग अपनी सुंदरता के प्रति काफी जागरूक हैं। वहां कॉस्मेटिक सर्जरी वाउचर मिलता है। जिसे लोग गिफ्ट के तौर पर देते हैं। ये चलन भारत में भी शुरु होना चाहिए।
अंत में मैंने डॉ. कालड़ा से उनके परिवार के बारे में पूछा उन्होंने बताया पत्नी डॉक्टर नीलिमा पैथालॉजिस्ट हैं, बेटी कृति एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं और बेटा हार्दिक अभी 10 वीं में है जिसका रूझान भी मेडिकल में है।
इस प्रकार अपने परिवार के साथ डॉ. कालड़ा व्यस्त दिनचर्या के बावजूद अपने अस्पताल में छोटी सी टीम के साथ कार्य करते हुए सुखी और संतुष्ट जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इलाज के बाद मरीज के चेहरे पर मुस्कान देखकर उन्हें असली संतुष्टि मिलती है।

मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है

डॉ. कालड़ा के अस्पताल में कुदरती कमी की वजह से हीनता से ग्रसित बहुत से लड़कियों और लड़कों का आत्मविश्वास लौट आया है। और वे सब आज सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ लोगों से हमने बातचीत की और जाना कि वे इलाज के बाद अब कैसा महसूस करते हैं। जिन्होंने अपनी आपबीती सुनाई उनके नाम बदल दिए गए हैं-
प्रिया ने 3 साल पहले अपने मोटे नाक की सर्जरी कराई थी। प्रिया का कहना है कि मोटे नाक की वजह से उसका मजाक बनाया जाता था लेकिन सर्जरी के बाद जब नाक को अलग शेप दिया गया तो मेरी खूबसूरती और मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ गया। इसी तरह रीता ने भी अपनी नाक की सर्जरी कराई रीता के माता- पिता ने बताया कि रीता की नाक चेहरे के अनुरूप काफी दबी हुई थी। जिस वजह से उसकी शादी में रुकावट आ रही थी। उसके अंदर हीन भावना आ गई थी। हमने करीब दो-ढाई साल पहले डॉ. कालड़ा से संपर्क किया और रीता की नाक को नया रूप दिया। उनके माता पिता गर्व से कहते हैं कि डॉ. कालड़ा की वजह से ही आज उनकी बेटी अपने ससुराल में सुखी जीवन व्यतीत कर रही है।
संध्या एक ऐसी मां जो डिजाइनर कपड़ों की शौकीन है परंतु उसकी बेटी श्रुती को वह डिजाइनर कपड़े नहीं पहना सकती थी क्योंकि उसके हाथ में चोट का निशान है। श्रुति हमेशा पूरी बांहों वाले कपड़े ही पहनती थी। 10 साल की उम्र में एक एक्सीडेंट में लगी चोट का निशान उसके हाथ में था। लेकिन हाल ही मैंने उस निशान को सर्जरी द्वारा ठीक करवाया। आज श्रुति भी डिजाइनर कपड़े पहन सकती है। अब उसे अपना हाथ छिपाने की जरूरत नहीं।
डॉ. कालड़ा से निम्न पते पर संपर्क किया जा सकता है- कालड़ा कॉस्मेटिक सर्जरी इंस्टीट्यूट एडवान्सड बर्न एंड ट्रामा सेंटर, राजकुमार कालेज के पास, चौबे कालोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)
उनका मोबाइल नंबर है- 9827143060 तथा ईमेल आईडी है- sunilkalda@rediffmail.com

पुरस्कार एवं सम्मान

डॉ. सुनील कालड़ा को उनके बेहतर कार्य के लिए कई पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। जिसमें प्रमुख है। शहीद वीर नारायण सिंह अवार्ड 2010, बी सी राय अवार्ड 2008, इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी अवार्ड 2010, जी न्यूज अवार्ड 2011, जी न्यूज ऑनर से सम्मानित 2003,  ट्राइबल वर्क के उत्थान के लिए प्रतिभा पाटिल से मुलाकात व सम्मान। जी24 घंटे विहान सम्मान 2011 और ऑपरेशन मुस्कान पर पुस्तक प्रकाशित।

ऑपरेशन मुस्कान

 ऑपरेशन मुस्कान एक ऐसी संस्था है जो पिछड़ी जनजातियों में व्याप्त जन्मजात विकृतियों का नि:शुल्क इलाज करता है। पूरे भारत में 75 विशेष पिछड़ी जनजाति अधिसूचित है जिसमें से छत्तीसगढ़ राज्य में 5 विशेष पिछड़ी जनजाति कवर्धा एवं बिलासपुर में बैगा, रायपुर एवं धमतरी में कमार, नारायणपुर में अबूझमाडिय़ा, कोरबा, जशपुर सरगुजा में पहाड़ी कोरबा एवं रायगढ़ तथा जशपुर जिले में बिरहोर विशेष पिछड़ी जनजाति के लोग निवासरत हैं। जन्मजात विकृतियों जैसे कटे- फटे होंठ, तालू की विकृति आदि का नि:शुल्क इलाज कराने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास है 'ऑपरेशन मुस्कान'।
अमेरिका के न्यूयार्क में चाल्र्स ब्राउन द्वारा 1999 में स्माइल टे्रन नामक समाज सेवी संगठन की स्थापना की गई है जिसका उददेश्य विश्व में कोई भी व्यक्ति कटे- फटे होंठ एवं विकृत तालू से पीडि़त न रहे। इस उद्देश्य को चरितार्थ करते हुए विश्व के 76 देशों में स्माइल ट्रेन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम का आगमन भारत में 2000 से एवं छत्तीसगढ़ में यह कार्यक्रम 1 जनवरी 2005 में हुआ है। छत्तीसगढ़ में स्माईल ट्रेन तथा अन्य सामाजिक संगठनों के माध्यम से 'ऑपरेशन मुस्कान' नामक अभियान के तहत डॉ. कालड़ा के क्लिनिक में नि:शुल्क ऑपरेशन कर पीडि़त लोगों के चेहरे में मुस्कान लाकर उनके जीवन में खुशियां भरने का एक बहुत बड़ा प्रयास है। 

संपर्क- रायपुर, मो. 9302233293 ईमेल sujatasaha06@gmail.com

Oct 23, 2010

जहां आज भी गूंज रहे हैं इतिहास और संस्कृति के गौरवशाली मल्हार

जहां आज भी गूंज रहे हैं इतिहास और संस्कृति के गौरवशाली मल्हार
-सुजाता साहा
देवनगरी मल्हार में प्राचीनता के अनुरूप दर्शनीय ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों का बाहुल्य है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण- पश्चिम में स्थित है मल्हार नगर। मल्हार का शायद ही ऐसा कोई पुराना घर या मकान हो, जिसकी दरो- दीवार पर पत्थर और लकड़ी की देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण न हों। यहां के कण- कण में ताम्र एवं पाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक गौरवशाली इतिहास और संस्कृति बिखरी पड़ी है। पातालेश्वर महादेव और डिडिनेश्वरी देवी के कारण आस्था का केंद्र भी है मल्हार नगर।
भगवान शिव ने मल्लासुर नामक असुर का संहार किया तो उन्हें मल्लारि की संज्ञा मिली। इसी मल्लारि नाम से बसे इस शहर का नाम कालांतर में मल्लाल और अब मल्हार हो गया है। मल्हार में मिले 1164 के एक पुराने कलचुरि शिला लेख में इसके मल्लालपत्तन होने की पुष्टि भी होती है।
देवनगरी मल्हार में प्राचीनता के अनुरूप दर्शनीय ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों का बाहुल्य है। पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन कार्यों से मल्हार में स्थित संस्कृति व इतिहास की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। इतिहासकार के अनुसार कलचुरी शासकों से पहले इस क्षेत्र में कई अभिलेखों में शरभपुर राजवंश के शासन का उल्लेख मिलता है। इसलिए मल्हार को प्राचीन राजधानी शरभपुर मानते हैं।
मल्हार में इस वर्ष से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन शाखा- नागपुर उत्खनन का कार्य करा रही है। यह काम तीन साल तक चलेगा। मल्हार के दक्षिण भाग में चल रहे उत्खनन में पुरावशेष और भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं, जो 6वीं शताब्दी के बताए जाते हैं। प्रारंभिक खुदाई में जो तस्वीर उभरी है उससे पता चलता है कि मल्हार में कल्चुरियों के समय किस तरह के मकान बने थे, जहां उस काल में बनीं नालियां, कुएं, बर्तन, औजार आदि की झलक दिखाई देती है।
मल्हार में खुदाई के दौरान करीब 25 सौ साल पहले के अवशेष मिल रहे हैं। ऊपरी सतह की खुदाई में चतुर्थ काल में विशेष प्रकार के मिट्टी के पात्र जिनमें ठप्पों से बना अलंकरण व स्वर्ण लेप व कुछ में अभ्रक का लेप है प्राप्त हुई हैं।। इसके अलावा पत्थर व ईंटों से बनी दीवार, चबूतरे, नाली, लौह निर्मित दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे कीलें, तेलकुप्पी, हंसिया, बरछी, भाला, तीर छुरी, कीमती पत्थरों के मनके, मिट्टी के मनके, मृदभांड के टुकड़े, पक्की मिट्टी के बने गोलादार आदि शामिल है।
1975 से 1978 के बीच मल्हार गांव परिक्षेत्र में सबसे पहले उत्खनन का काम सागर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व विभाग के प्रमुख प्राध्यापक केडी बाजपेयी द्वारा कराया गया था। इसके बाद पुरातत्व विभाग की ओर से यहां फिर खुदाई नहीं हुई थी।
विकसित नगर था मल्हार
मल्हार में दसवीं- ग्यारहवीं सदी से लेकर शरभपुरी और कलचुरी राजाओं के समय की निर्मित प्रतिमाएं और मंदिर हैं। लगभग उस काल के प्रचलित सभी धर्मों से संबंधित मूर्तियां एवं सामग्रियों का मिलना यहां के शासकों की धार्मिक सहिष्णुता एवं सभी धर्मों के प्रति आदर समभाव को भी प्रमाणित करती है।
मल्हार नगर उत्तर भारत से दक्षिण- पूर्व की ओर जाने वाले प्रमुख मार्ग पर होने के कारण धीरे- धीरे विकसित हुआ। तब यहां शैव, वैष्णव व जैन धर्मावलंबियों के मंदिरों, मठों व मूर्तियों का निर्माण बड़े स्तर पर हुआ। मल्हार में चतुर्भुज विष्णु की एक अद्वितीय प्रतिलिपी मिली है। उस पर मौर्यकालीन ब्राम्हीलीपि लेख अंकित है।
सातवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य विकसित मल्हार की मूर्तिकला में गुप्तयुगीन विशेषताएं स्पष्ट नजर आती हैं। मल्हार में बौध्द स्मारकों तथा प्रतिमाओं का निर्माण इस काल की विशेषता है। बुध्द, बोधिसत्व, तारा, मंजुश्री, हेवज्र आदि अनेक बौध्द देवों की प्रतिमाएं व मंदिर मल्हार में प्राप्त हुई हंै। छठवीं सदी के पश्चात यहां तांत्रिक बौध्द धर्म का भी विकास हुआ। जैन तीर्थंकरों, यक्ष- यक्षिणियों, विशेषत: अंबिका की प्रतिमांए भी यहां मिली हैं ।
मल्हार में पहले और अब तक हुई खुदाई से इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि यह क्षेत्र मौर्य काल से लेकर कल्चुरी काल तक एक उन्नत नगर के रूप में विकसित था। क्षेत्र ऐतिहासिक काल से लेकर कलचुरी काल तक विविध राजवंशों के आधीन था, जिनमें सातवान, शरभपुरीय, सोमवंश, पांडुवंश व कल्चुरी वंश शामिल हैं।
पतालेश्वर मंदिर (केदारेश्वर मंदिर)
दसवीं से तेरहवीं सदी तक के समय में मल्हार में विशेष रूप से शिव- मंदिरों का निर्माण हुआ। इनमें कलचुरी संवत् 919 (1167 ईसवीं) में निमर्ति केदारेश्वर मंदिर सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस मंदिर का निर्माण सोमराज नामक एक ब्राम्हण द्वारा कराया गया। काले चमकीले पत्थर की गौमुखी आकृति व जलहरी में चढ़ाया गया जल इसके आंतरिक छिद्रों से नीचे जाता रहता है। पौराणिक मान्यता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया यह जल पाताल लोक तक पहुंचता है, इसलिए इसे पतालेश्वर महादेव कहा गया है। मंदिर में गंगा, यमुना नदी की प्रतिमा के साथ ही शिव, पार्वती, गणेश, नंदी आदि के बेजोड़ अंकन हंै।
धूर्जटि महादेव का अन्य मंदिर कलचुरि नरेश पृृथ्वीदेव द्वितीय के शासन- काल में उसके सामंत ब्रम्हदेव द्वारा कलचुरी संवत् 915 (1163 ईसवी) में बनवाया गया। इस काल में शिव, गणेश, कार्तिकेय, विष्णु, लक्ष्मी, सूर्य तथा दुर्गा की प्रतिमाएं विशेष रूप से निर्मित की गयीं। कलचुरी शासकों, उनकी रानियों आचार्यो तथा गणमान्य दाताओं की प्रतिमाओं का निर्माण उल्लेखनीय है। मल्हार में ये प्रतिमाएं प्राय: काले ग्रेनाइट पत्थर या लाल बलुए पत्थर की बनायी गयीं हैं। स्थानीय सफेद पत्थर और हलके- पीले रंग के चूना- पत्थर का प्रयोग भी मूर्ति- निर्माण हेतु किया गया।
डिडिनेश्वरी मंदिर
कलचुरी काल में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित डिडिनेश्वरी देवी की प्रतिमा अंचल में सिद्धपीठ देवी के रूप में पूजी जाती है। प्रत्येक चैत्र व क्वांर नवरात्रि के दौरान यहां हजारों की संख्या में मनोकामना दीप जलते हैं। दूर- दराज से भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है और लोग मां के दर्शन कर जीवन धन्य करते हैं।
सांस्कृतिक विरासत का संग्रहालय
मल्हार में पुरातत्व विभाग का एक संग्रहालय है, जिसमें उत्खनन से प्राप्त बहुत सी सामग्री संग्रहित की गई है। इसमें शिव, गणेश, विष्णु के विभिन्न रूप के अलावा दुर्गा, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती, गंगा- यमुना की नदी, गरुड़, नृसिंह, हनुमानजी, सूर्य, नाग नागिन के जोड़े की आकर्षक प्रतिमाएं भी यहां आने वाले पर्यटकों को मल्हार के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराती हैं।
यहां पहुंचने एवं ठहरने के लिए रायपुर (148 कि. मी.) सबसे निकटतम हवाई अड्डा है जो मुंबई, दिल्ली, नागपुर, भुवनेश्वर, कोलकाता, रांची, विशाखापट्नम एवं चेन्नई से जुड़ा हुआ है। हावड़ा- मुंबई रेल मार्ग पर बिलासपुर (32 कि. मी) सबसे समीप रेल्वे स्टेशन है। बिलासपुर शहर से बस द्वारा भी मस्तूरी होकर मल्हार तक सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है। यहां से निजी वाहन भी उपलब्ध रहते है। मल्हार में सरकारी विश्राम गृह के अलावा आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनेक होटल ठहरने के लिये उपलब्ध हैं।

Jun 5, 2010

पानी बचाने के लिए बिल

- सुजाता साहा
पानी बचाने के लिए अब तक सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर वैसे ठोस प्रयास नहीं किए गए जो पानी की कमी को देखते हुए करना चाहिए था। लेकिन जब मामला बहुत ही गंभीर हो गया तो अब जाकर पानी की बर्बादी को रोकने के लिए सरकार ने पानी पर भी बिजली की तरह मीटर लगाने का प्रावधान रखने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरु कर दिया है।
लोग बिजली के बिल के रूप में जब मोटी रकम चुकाते हैं तब कहीं जा कर वे बिजली के महत्व को समझ पाते हैं और बिजली का खर्च सोच समझकर आवश्यकता के अनुसार करते हैं, लेकिन पानी के मामले में ऐसा नहीं है। इसी मामले को सुलझाने के लिए तथा अनावश्यक बहते पानी पर अंकुश लगाने के लिए बिजली की तरह ही पानी के लिए भी मीटर लगाए जाने पर विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा विचार किया गया है और कहीं- कहीं तो यह लागू भी हो गया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस बात को गंभीरता से लिया है।
केंद्र सरकार द्वारा उपयोग के आधार पर बिल भुगतान करने की पेयजल व्यवस्था को लेकर दी गई गाइड लाइन के अनुसार भिलाई नगर निगम ने कार्य भी शुरु कर दिया है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या केंद्र के मापदंड के मुताबिक बेहतर पेयजल व्यवस्था लागू हो पाएगी। मापदंड के अनुसार उस क्षेत्र में नल कनेक्शन सौ फीसदी रहना चाहिए। वाटर सप्लाई लीकेज रहित होना चाहिए। पानी की क्वालिटी निर्धारित मापदंडों के अनुरूप होनी चाहिए। नान रेवेन्यु वाटर कम से कम अर्थात 10 फीसदी से कम होनी चाहिए। निगम 24 घंटे पानी सप्लाई करने में सक्षम हो।
यह सोचना कि इन मापदंडों पर राज्य सरकारें खरी उतरेंगी या नहीं यह दूर की बात है फिलहाल तो खुश होना चाहिए कि इस योजना के लागू होने से पानी की महत्ता के प्रति लोग जागरूक हों।
क्योंकि अब यहीं एकमात्र सबसे कारगर तरीका बच गया है ताकि लोग पानी की मितव्ययता को समझ सकें। अब तक होता यही था कि घरों में पानी के उपयोग पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था। कितना भी पानी का उपयोग करे या फिर पीने के पानी से अपनी गाडिय़ां धोएं, घर का आंगन धोएं या फिर नल चालू है तो चालू ही रहने दें, उन्हें तो साल में पानी के लिए एक निर्धारित रकम ही नगर निगम को देनी पड़ती है।
लेकिन अब बिजली की तरह जब पानी का बिल भी उनके घर हर माह आयेगा तब तो वे पानी के महत्व को समझेंगे। इस प्रकार से लोग सोच समझकर बिल के भय से जरूरत के मुताबिक पानी का उपयोग कर सकेंगे।
अब सोचने वाली बात यह है कि पानी जैसी जीवनदायी आवश्यकता को लेकर पक्ष- विपक्ष राजनीति करेगा या इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए पानी बचाने की मुहिम में अपनी अह्म भूमिका निभाएगा। आप सब भी इस विषय पर जरा सोचें? कहीं ऐसा न हो कि राजनीतिक लाभ- हानि के फेर में पड़कर एक अच्छी सोच ठंडे बस्ते में चली जाए।

Sep 23, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

बेटी पुकारने में झिझक क्यों
- सुजाता साहा
छोटे पर्दे पर इन दिनों बेटियों को लेकर ढेर सारे कार्यक्रम चल रहे हैं - अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, बालिका वधू, 24/12 करोलबाग आदि, जिनमें हमारे देश में बेटियों की सामाजिक पारिवारिक स्थितियों के माध्यम से समाज की विभिन्न बुराईयों और कुरीतियों से लडऩे के लिए रास्ते निकाले जाने का बेहतर प्रयास किया जा रहा है। वहीं जब किसी कार्यक्रम में बेटियों को बेटा कहकर संबोधित किया जाता है तो मुझे गुस्सा आ जाता है।
हाल में स्टार टीवी पर एक नया कार्यक्रम शुरू हुआ है तेरे मेरे बीच में। फरहा खान द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के वर्तमान में मशहूर कलाकारों को बुलाया जा रहा है जिसमें उनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया जाता है। सलमान खान, शाहरूख खान, विजेन्द्र सिंह, प्रियंका चोपड़ा के बाद दो ग्लैमरस तारिकाओं को दर्शकों के सामने पेश किया गया बिपाशा बसु और शिल्पा शेट्टी।
आप सोच रहे होंगे कि इनके बारे में मुझे भी आता है गुस्सा  स्तंभ में बताने की क्या जरुरत पड़ गई?  मैं इस कार्यक्रम के बारे में नहीं बल्कि फरहा द्वारा इन दोनों तारिकाओं को बार- बार यह कहकर संबोधित करने पर, कि आप मिल रहे हैं अपने परिवार के दो बेटों से, पर आपत्ति दर्ज कराना चाहती हूं। आखिर फरहा को ऐसा कहने की जरुरत महसूस क्यों हुई? जबकि वह खुद भी एक काबिल बेटी है और बेटियों की मां है, फिर आज के दौर में जबकि बेटे और बेटी के बीच भेदभाव मिटाने के लिए कई धारावाहिक चल रहे हैं, वहां बेटियों को बेटा कहकर संबोधिन किया जाना कुछ अटपटा लगा। बेटा कहे जाने पर इन दोनों बेटियों ने भी आपत्ति दर्ज नहीं की। जबकि फरहा ने इसी कार्यक्रम में एक ऐसे परिवार को बुलाकर सम्मानित किया और एक लाख का चेक देकर उनकी सहायता की जो अपने माता- पिता व भाई का पालन- पोषण नौकरी करके कर रही है। इन दोनों तारिकाओं ने भी उनके दोनों नालायक बेटों को खरी- खोटी  सुनाई- शिल्पा ने कहा 'आपके बेटों की इज्जत बिल्कुल नहीं करती।' और बिपाशा ने कहा 'मेरे बेटे होते तो मैं मार- मार के निकालती।' कहने का तात्पर्य यह कि अगर आप मीडिया के माध्यम से नामी सितारों के जरिए एक अच्छा संदेश देने जा रहे हैं तो कम से कम ऐसा तो मत कहिए कि संदेश ही गलत जाए।
इस कार्यक्रम के बहाने मेरा गुस्सा उन लोगों के प्रति भी उभर के आ गया जिनके माता- पिता अपनी काबिल बेटी का परिचय-  यह हमारी बेटी नहीं बेटा है, कहते हुए कराते हैं। वे गर्व के साथ यह भी तो कह सकते हैं ये है हमारी होनहार बेटी, जिसने आज एक मुकाम हासिल किया या जिसने अपने परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ली है। कितना ही अच्छा हो कि माता- पिता और फरहा जैसी सेलीब्रिटीज गर्व से कहें मिलिए हमारी इन होनहार बेटियों से.....

Mar 21, 2009

पर्यावरण की होली न जलाएँ



पर्यावरण की होली न जलाएँ
एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना
नुकसान कर रहे हैं इसका अंदाजा है ?

- सुजाता साहा
पिछले वर्ष की बात है मैं होली के दो दिन पहले बाजार गई थी मुझे नहीं पता था कि उस इलाके में दो दिन पहले से ही सड़कों पर लोग होली खेलने निकल आते हैं। मैं स्कूटी से घर लौट रही थी तभी पीछे से कुछ शरारती लड़कों ने रंगों से भरा गुब्बारा मेरी ओर फेंका जिससे मेरा सफेद टी शर्ट रंगीन हो गई। होली के दिन रंग गुलाल से खेलना सबको अच्छा लगता है पर बीच सड़क पर इस तरह किसी जरुरी काम से जाते हुए लोगों पर रंग फेंकना कैसे अच्छा लग सकता है। ऐसे में किसे गुस्सा नहीं आएगा। होली की ऐसी शुरुआत हो जाए तो त्यौहार का सारा उत्साह खत्म हो जाता है।
आपको भी इस तरह के कुछ कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा होगा, जिसने आपके भी इस रंग- बिरंगे त्योहार का मजा ही किरकिरा कर दिया होगा। दरअसल समय के साथ-साथ होली मनाने के ढंग में ढेरों बुराईयां आ गई हैं। दोस्ती की जगह दुश्मनी ने ले ली है। असभ्य लोग गुलाल और रंगों की जगह कीचड़, गोबर, मिट्टी, वार्निश जैसे कई खतरनाक रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे हैं। कुछ लोगों ने होली के दिन हंसी ठिठोली करते हुए रंजोगम को भूल कर उल्लास के साथ मनाने की बजाय गंदे तथा अश्लील हंसी-मजाक के साथ अजब-गजब टाइटल देकर अपने मन की भड़ास निकालने का त्योहार बना दिया है।
रंगों से सराबोर हो जाने वाले त्योहार का सबसे दुखदाई पहलू यह है जब होली जलाने के नाम पर हम अपने पर्यावरण को नष्ट करने पर तुले होते हैं। वैसे तो हमारे देश में पर्यावरण बचाने के लिए हजारो स्लोगन बनाए गए हैं। वृक्ष बचाओ, जल बचाओ। लेकिन होलिका दहन के नाम पर हरे-भरे वृक्षों को काटकर आग की भेंट चढ़ा कर हम किस तरह हम अपने अंदर छुपी बुराईयों को जला पा रहे हैं यह सोचने वाली बात है। राह में पेड़ों को कटते देख कर व्यवस्था को गाली देते हुए निकल तो जाते हैं, पर उस कटते हुए पेड़ को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने के बारे में कभी नहीं सोचते। भले ही सरकार को कोसते हैं कि देखो कैसे अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे चुपचाप पेड़ को कटते हुए देख रहे हैं।
एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना नुकसान कर रहे हैं इसका सबको अंदाजा है पर नहीं फिर भी हम तो भई रंग के नाम पर गैलनों पानी बहायेंगे ही चाहे तो कल को पीने को पानी ही न मिले। सवाल यह है कि क्या पेड़ों को, पानी को बचाने का काम सिर्फ सरकार का है? इन बुराईयों को मिटाने में हम और आप क्यों कोई पहल नहीं करते?
अपनी-अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराने का ही नतीजा है कि इन हुडंदंगियों की वजह से पिछले कुछ वर्षों से शहरों में यह त्यौहार सन्नाटे का त्यौहार बन गया है। आइए हम सब मिलकर इस सन्नाटे को तोड़ें और आनंद के इस रंग में पर्यावरण की होली न जलाए।

Email- sujatasaha11@rediffmail.com