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Jan 1, 2023

दोहेः सुबह सुहानी धूप

 - शील कौशिक

चकाचौंध है शहर में, पर चुप हैं मनमीत।

हवा शहर की ले गई, गौरैया के गीत।।

 

सोई है संवेदना, सोए हैं सम्बन्ध।

वासंती अहसास का, कैसे हो अनुबन्ध।।

 

चिड़िया बैठी डाल पर, रस्ता रही निहार।

बिछुड़े साथी जब मिलें, आए तभी बहार।।

 

हवा निगोड़ी गुम हुई, कहाँ गयी बदजात।

बढ़ी निराशा वृक्ष की, चुप बैठे हैं पात।।

 

ऋतुपति की पदचाप सुन, उपवन करे पुकार।

कोयल-भँवरे, गुल-कली, दौड़े बाँह पसार।।

 

हुलस-हुलसकर कह रही, गेहूँ की हर बाल।

सखी! सयानी हम हुईं, कब पहुँचें ससुराल।।

 

पवन बसंती छू गई, जब से मेरा गात।

चंचल मन उड़ता फिरे, कहने को निज बात।।

 

रंग और मकरंद की, हुई खूब बरसात।

मद में डूबे सब करें, ऋतु बसंत की बात।।

 

पीत चुनरिया ओढ़कर, निखरा सरसों वेश।

हरियाला परिधान है,  दुल्हन- सा परिवेश।।

 

त्याग-भावना फूल की, देती है संदेश।

कुछ दिन का जीवन मिला, महकाओ परिवेश

 

ठिर-ठिर सर्दी आ गई, जमी धूप में खाट।

तेज हवा ज्यों ही चली, लगी धुंध की बाट।।

 

था-थैया कत्थक करे, सुबह सुहानी धूप।

कौतुक यह सब देखते, कैसा रूप अनूप।।

 

करके माथे पर तिलक, सकुचाती है धूप।

मैं भी भैया क्या करूँ, मैका लगे अनूप।।

 

कुहरे का पहरा लगा, प्रकृति हो गई मौन।

सूरज दादा हैं छुपे, टक्कर ले अब कौन।।

Aug 1, 2021

किताबें- मानवीय अनुभूतियों का आकाश

-डॉ. शील कौशिक

समीक्ष्य कृति: ‘उठो, आसमान छू लें’ (काव्य-संग्रह)
कवयित्री: सुदर्शन रत्नाकर 
प्रकाशन: अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली 
पृष्ठ संख्या: 108 मूल्य: 220 रुपये 

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‘
बाहरी आँखें जो कुछ देखती हैं, मन की आँखें  उन्हें महसूस करती है। तब हमारे भीतर हलचल मचती है। अनुभूत किए यही पल, भाव जब शब्द बन अभिव्यक्त होते हैं, तो कविता का रुप ले लेते हैं। मेरी आँखों ने भी समय के आँचल से बहुत कुछ समेटा, भावों के बवंडर भीतर उमड़ते रहे और समय-समय पर कविता बनते रहे,’  कविता की रचना प्रक्रिया के संदर्भ  यह कहना है कवयित्री सुदर्शन रत्नाकर जी का। इसमें कोई संदेह नहीं कि रचनाकार अपने समय और संदर्भों का साक्षी होता है और बदलते समय के साथ कवि का स्वर भी बदलता है।
हरियाणा साहित्य अकादमी से सूर पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ व सर्वप्रिय साहित्यकार सुदर्शन रत्नाकर वर्तमान परिदृश्य में किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं। ‘उठो, आसमान छू लें’ कवयित्री का चौथा काव्य-संग्रह है। 
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उठो, आसमान छूने लें’ में अधिकतर कविताएँ नारी-विमर्श की हैं। नारी-विमर्श शताब्दियों के अँधेरे-उजालों को चीरता हुआ वर्तमान समय तक चला आ रहा है। परिस्थितियों में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। नारी-विमर्श आज भी साहित्य केन्द्र में है। ‘जीवन भर जीती हैं’ कविता की पंक्तियाँ देखें- “शोषण के प्रश्न पर/ नहीं है कोई वर्ग भेद/ रीता-मीता हो/ या सीता-सावित्री/ सभी एक कटघरे में खड़ी हैं/ अपना-अपना न्याय मांगने/ जो उन्हें कभी नहीं मिलता/ सूनी आँखें/ सूना मन लिए/ वे जीवन भर जीती हैं।” 
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तुम्हारा क्या दोष था’ निर्भया के संदर्भ में कवयित्री के मन में गहरा संताप है, जो पीढ़ियों तक हुए स्त्री पर अत्याचार की याद दिलाता है- “तुम नारी की युग पीड़ा बन गई/ युगों से चली आ रही नारी पीड़ा का अंत नहीं- अहल्या ने सहा अभिशाप का दर्द/ सीता की हुई अग्नि परीक्षा/ द्रौपदी बनी साँझी पत्नी/ उर्मिला ने की विरह-तपस्या/ अन्याय सहो, तो अन्याय और होता है... इसीलिए बेचारगी का दामन छोड़ दो/ संकल्प दृढ़ हो, तो होता है पूरा/ जीवन पूरा जियो, नहीं अधूरा।”
‘
तुममें है’ एक प्रेरक कविता है जो स्त्री की अंतर्निहित शक्तियों को जागृत कर अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का जज़्बा पैदा करती है- “तुममें हैं/ सागर की गहराई/ आसमान की ऊँचाई/ पहाड़ की अटलता/ धरती-सी सहनशीलता/ सूर्य की उष्णता/ दुर्गा की शक्ति/ झरने की निर्मलता/ फिर कहाँ से आई दुर्बलता/ और कहलाईं तुम अबला।”
एक आम औरत के रूप में स्त्री सदा ही छली गई है, कविता ‘आम औरत’ की पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं –“औरत को पति का प्यार मिल जाए/ तो वह समर्पित पत्नी है/ ससुराल में अपनापन मिल जाए / तो आदर्श बहू है/ संतान का सुख और सम्मान मिले/ तो ममतामयी माँ है/ नहीं तो यह आम औरत/ एक बँधुआ मजदूर है/ जिसकी कोई रिहाई भी नहीं।”
     
स्त्री प्रेम, ममता, करुणा और समर्पण की मूरत है। स्त्री की पुरुष के सामने समर्पण की गाथा कहती कविता है  ‘पर कब तक’ - “चलो समझौता करते हैं/ तुम पहाड़ की नाईं जीते रहो/ मुझे बहने दो नदी की तरह... मैं पार कर लूँगी बाधाएँ/ कंकड़-पत्थर समेट लूँगी सब/ मैं कर सकती हूँ समर्पण भी/ पर बना रहेगा/ मेरा अस्तित्व/ मेरी अस्मिता जब तक।”
युवतियों के लिए प्रेरणादायी व शीर्ष कविता है, ‘उठो, आसमान छूने लें।’ कवयित्री संयुक्त रूप से आह्वान करती हैं, “अपनी शक्ति को पहचान/ उठ, आसमान छू ले/ वह तेरा भी है/ पंख फैला और उड़ान भर ले।”
पिता के संदर्भ में कवयित्री के मन में भावनाओं का स्रोता फूट-फूट पड़ता है। इस परिप्रेक्ष्य में कविता  ‘पिता तो बरगद हैं’ की पंक्तियाँ अवलोकनार्थ हैं- “मैं नया उगा कीकर का पेड़/ उनकी खामोश आँखों के ख़त/ पढ़ नहीं पाता/ बुलाने पर भी/ पिता के पास नहीं जाता... पर आज भी अपनी छाया के/ आगोश में लेने के लिए/ वे बाँहें फैलाए बैठे हैं/ लेकिन मेरी ही क्षितिज को छूने की/ अंतहीन यात्रा स्थगित नहीं होती।” इसी संदर्भ में एक और अत्यंत भावपूर्ण कविता ‘याद आते हैं’, की पंक्तियाँ देखिए- “मेरे लिए ख्वाहिशों का पिटारा थे पिता/ अभावों में जीते रहे/ पर मेरा आँचल भरते रहे/ वटवृक्ष की तरह स्वयं तपते रहे/ पर मुझे छाया देते रहे... पिता का जाना/ कितना दुखदाई होता है... वो जादू का पिटारा बिखर गया/ जो खुशियों से भरा रहता था/ वो जादूगर चला गया/ और मेरा जीवन-मंच रिक्त हो गया।” 
मधुमास के आगमन पर प्रकृति चित्रण कविता ‘उसने कहा था’, में देखते ही बनता है- “वृक्षों ने पीले वस्त्र उतार दिए हैं/ नई कोंपलों ने किया है/ उसका स्वागत... पीली दूब ने सिर उठाना शुरू कर दिया/ कह रही हो जैसे/ हर चुनौती है स्वीकार...  कलियों का मुस्कुरा कर आँखें खोलना... परी-सी तितलियों का साथ... भँवरों की गुंजार...” सभी कुछ मधुमास के आगमन पर होता है। 
बुद्ध होने का अर्थ है मोह, माया, ममता त्याग देना। ‘बुद्धत्व’ कविता की पंक्तियाँ प्रशंसनीय हैं- “उनके कंधे क्या झुके/ फिसल गए थे सारे अधिकार/ अगली पीढ़ी के मजबूत कंधों पर/ अनंत काल से चली आ रही परंपरा में/ पीढ़ी-दर-पीढ़ी/ स्थानांतरित होती रहती विरासत/ और हर पिता बुद्ध होता गया।”
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होते पर्यावरण व प्रकृति के अत्यधिक दोहन के फलस्वरूप कोरोना महामारी का प्रकोप अभी हाल ही में हमने भुगता है। प्रकृति से छेड़छाड़ का असर सुदर्शन जी दैनिक दिनचर्या में महसूस करती हैं, इस संबंध में उनकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति देखें कविता ‘गोरैया अब आती नहीं’  में-  “वह जो पूरे भूरे-पीले पँखों वाली नन्हीं गोरैया/ अब नहीं आती/ सूरजमुखी का पराग चुन-चुनकर नहीं खाती/ ना ही पेड़ की फुनगी पर बैठकर/ झूला झूलती है... मेरे घर अब धूप नहीं उतरती/ सूरजमुखी मुरझा गए हैं/ पत्तियाँ लहलहाती नहीं और/ दीमक लगे पेड़ की शाखाएँ सूख गई हैं ...इसलिए  गौरैया अब नहीं आती।”
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कविता का जन्म’ के संदर्भ में कवयित्री का कहना है कि-“डूबना होता है मन के गहरे सागर में/ उठते हैं तब संवेदनाओं के ज्वार/ मथे जाते हैं, जब व्यथाओं, पीड़ाओं के भाटे/ तब निकलते हैं, अथाह मोती/ विष और अमृत के पात्र/  विष कवि स्वयं पीता है/ और अमृत बाँटता है...तभी तो कविता का जन्म होता है।” 
दार्शनिक भाव की सरल लेकिन अनूठी कविता है ‘जीवन का सत्य’ -  “छोटा-सा बच्चा/ मुस्कुराता है, हँसता है, रोता है/ फिर खिलखिलाता है/ सुख-दुख वह जन्म के साथ लाता है/ जीवन का यही सत्य है/ जो वह सिखलाता है।” 
राजनीतिज्ञों पर तंज कसती संग्रह की एकमात्र कविता है ‘बहुत दिन से’ जिसमें नेता के आगमन पर कैसे दृश्य बदल जाता है, दर्शाया गया है। 
“
क्षत-विक्षत नगर के काया पर/ कहीं नई सड़कें/ तो कहीं पेबंद लगाए गए/ कफ़न  डालें जाने लगे/ गंदगी के ढेरों को फूल मालाओं से ढाँपा गया/ सब जानते हैं क्षत-विक्षत मुर्दों पर/ कफ़न डालने से लाशें तो ढक जाती हैं/ लेकिन उनसे आती दुर्गंध का क्या... सतर्क हो जाओ/ मत बदलो स्वयं को लाशों में...अपना अधिकार माँगों।”
वर्तमान में छीजते रिश्तों की धुंध चारों ओर दिखाई पड़ती है। परस्पर संवाद की परम्परा खत्म हो गई है। कवयित्री की पाठक के मन को उद्वेलित करती कविता है ‘रिश्तों के घनीभूत जंगल’ - “दोस्तों, जंगल बाहर ही नहीं होते/ मन के भीतर भी होते हैं/ गहरे जंगल/ भावनाओं के/ एहसासों के/ दुख, उदासी, पीड़ा के चुभते हैं कांटे/ खुशियों की शीतल छाया भी देते हैं जंगल/ काटना मत इन जंगलों को/ नहीं तो सूने हो जाएँगे/ मन के ये जंगल... और बिखर-बिखर जाएँगे/ रिश्तो के घनीभूत जंगल।”
विदेश में बसे मजदूर की मजबूरी की आँच पाठक महसूस कर सकते हैं कविता ‘बहुत याद आती है’ में- “सबकी बहुत याद आती है/ पिता के कंधे नहीं/ बच्चों की मनुहार नहीं/ अपनी धरती नहीं/ अपना आसमान नहीं/ जीना इतना आसान नहीं/ पर मुझे जीना है उनके लिए/ जिनके साथ बँधा है मेरा जीवन/ दूर रहकर आशाओं के दीप जलते रहें/ उनकी मुस्कानें बनी रहें/ अपने जीवन की सांसे बसाने को।”
    
प्रकृति के निरन्तर होते विनाश से सब कुछ बदल गया है। कवयित्री की स्मृतियों में बसा वह स्वच्छ, सरल वातावरण कहाँ  है अब? वह इसी असमंजस में है कि उसे फिर से कैसे पाए... “ठंडी हवाओं की छुअन/ वह रहटों का पानी/ वह पीपल की घनी छाँव/ अपने बचपन का गाँव/ कहाँ से लाऊँ मैं... अब आँगन ही नहीं/ त्रिंजन कहाँ होंगे/ पेड़ नहीं तो झूले कहाँ होंगे/ वैलेंटाइनडे के चाव में बसंत-तीज विलीन हो गए/ टेबल पर मां पिज़्ज़ा-बर्गर परोसती है...अब हर कोई जी रहा है/ अपने-अपने हिस्से की जिंदगी/ संवेदनहीनता के मुखोटे लगाए/ हर क्षण विष के घूँट पी रहा है।”
    
समग्रत: ‘उठो, आसमान छू लें’ संग्रह की कविताएँ अपने समवेत पाठ में समाज व जीवन के विभिन्न पहलुओं को सूक्ष्म भावों में पिरो कर प्रस्तुत की गई हैं। मुक्त छंद में लिखी इन कविताओं में एक ओर जहाँ वर्तमान की विसंगतियाँ/विडम्बनाएँ हैं, तो दूसरी ओर समृद्ध स्मृतियों का पिटारा है। सभी कविताएँ अनुभव की सान पर कसी गई हैं। इन कविताओं की भाषा सरल, सहज, बोधगम्य है। कविताओं में आंतरिक लय विद्यमान है, जो संप्रेषणीयता को सहज बनाती है। आशा ही नहीं धु्व विश्वास है कि समकालीन हिन्दी कविता परिदृश्य में यह कविता-संग्रह अपनी सार्थक उपस्थिति सुनिश्चित करेगा।

सम्पर्कः  
मेजर हाउस-17,हुडा सेक्टर-20, पार्ट-1,सिरसा125056 हरियाणा।
मो. 94168-47107, इमेल-sheelshakti80@gmail.com

May 15, 2020

पाँच लघुकथाएँ

1. तिलिस्म
-डॉ. शील कौशिक
 साल भर से अलग रह रहे विनय ने अनुष्का को कॉल किया,
“क्या कल तुम ओम सिने गार्डन में मिलने आ सकती हो?” यह पूछते हुए विनय का दिल जोरों से धड़क रहा था।
“हाँ,” अनुष्का के दिल में वैसी ही धड़कन बजी, वैसी ही चाहत उभरी।
“ठीक है, कल शाम को पाँच बजे।”
साल भर पहले पाश्चात्य सोच उन्हें विपरीत दिशा में ले गई थी।
वे दोनों इस नवनिर्मित सिने गार्डन के रेस्टोरेंट में गोल मेज के आमने-सामने एक दूजे पर नजर टिकाए बैठे हैं। विनय ने अनुष्का की पसंद की कोल्ड कॉफ़ी फ्रेंच फ्राइज़ के साथ आर्डर की और अपने लिए लिम्का। अनुष्का के मन में हूक-सी उठी और यह सोच कर आँखें नम हो गई कि विनय को आज भी उसकी पसंद का कितना ख्याल है।
“पता है तुम्हें! दीपक बहुत चालाक है... वह एक नम्बर का झूठा है... उसके कई लड़कियों के साथ अफेयर्स हैं... मैं भी उसके झांसे में आ गई,” यह कहते हुए अनुष्का के मुँह में कॉफ़ी की कड़वाहट घुल गई, ‘पर... तुम तो हमेशा समर्पित और ईमानदार रहे...’ ये शब्द उसके मुँह में ही रह गए । विनय को लिम्का में कुछ अतिरिक्त मिठास लगी।
“अनुष्का! सेम इज हेयर, वो मेरी कुलीग नेहा है न... बिलकुल बकवास है... एकदम लापरवाह... कहते हुए विनय का मुँह का स्वाद कसैला हो गया,‘पर... तुम तो बहुत केयरिंग... सब काम समय पर टिपटॉप रखने वाली,’ ये शब्द उसके मुँह में रह गये। अबकी अनुष्का को कॉफ़ी का घूँट मीठा लगा।
“वीनू ! (विनय के लिए अनुष्का का प्यार का सम्बोधन) पापा कह रहे थे कि...”
“हाँ अन्नू! (अनुष्का के लिए विनय का प्यार का सम्बोधन) मेरी मम्मी कह रही थी कि...
“चलो! फिर साथ घर चलें...” एक साथ सहमति के स्वर प्रस्फुटित हुए । सिने गार्डन के बराबर में खड़ी पुरानी बिल्डिंग की आभा द्विगुणित हो गई थी ।
2.अंतिम यात्रा
        मित्र के देहांत की सूचना से रोहन को गहरा धक्का लगा। उसे किसी तरह यकीन ही नहीं हो रहा था- “बिलकुल तंदुरुस्त था वह...कोई बीमारी नहीं...कोई हर्ट ब्लाकेज नहीं...फिर भी डॉक्टर कहते हैं हार्ट फेल हो गया... सब झूठ बोलते हैं... अरे! बहुत बड़े दिल वाला था मेरा दोस्त।”
पत्नी ने दिलासा देते हुए उनके यहाँ चलने को कहा। कुछ देर बाद वह सदमे से उबरा। उनका घर करीब चार किलोमीटर की दूरी पर था। पीछे बैठी उमा ने स्कूटी की इतनी धीमी चाल देख कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर रुक गई। वह हैरान थी... हमेशा तो ये स्कूटी इतनी तेज चलाते थे कि वह पीछे बैठी टोकती रहती थी- ‘थोड़ा धीरे चलाओ जी... ध्यान से चलाओ... आगे स्पीड ब्रेकर है जी, पर आज रोहन कभी स्कूटी के साइड वाले शीशे ठीक करने लग जाए... कभी स्पीड ब्रेकर नजदीक आते ही बिलकुल डैड स्लो स्पीड कर दे... अपने में खोया हुआ रोहन चले जा रहा था। उसके समक्ष मित्र के साथ बिताया एक-एक क्षण चित्रित हो उठा –“भाभी जी के साथ बस अभी की अभी आ जाओ और हाँ रास्ते से सेवकराम के यहाँ से पकोड़े लाना मत भूलना।” कोई भी ख़ुशी की बात होती तो वह पार्टी लेने वाली सूची में जोड़ता जाता और कहता, “ दस पार्टियाँ जमा। एक-एक करके बोझ उतारते जाओ वरना भार बढ़ जायेगा। चलो कुछ भार मैं तुम्हारा कम कर देता हूँ, जगह तुम्हारी और मेन्यु हमारा।” रूमाल निकाल कर उसने नम हो आई आँखों को पोछा। रास्ते में पड़े पोलिटेक्निक कालेज, मालगोदाम, रेल की पटड़ी एक-एक को रोहन ऐसे निहार रहा था जैसे अंतिम बार दर्शन कर रहा हो।
     उसे पता है कि मित्र का भरा-पूरा परिवार है। दो लड़कियाँ अपने-अपने घरबार की हो गई हैं। बेटा-बहू बेंगलूर में जॉब करते हैं। शहर से दूर यहाँ मियाँ-बीबी खुली और बड़ी कोठी में अकेले रहते हैं। कोठी का नाम भी क्या खूब रखा है-‘अपनी कोठी’। हर आने वाले को यह अहसास कराती कि यह उनकी अपनी ही कोठी है...यारों का ऐसा ही यार था वो, आत्मीयता से भरा। अब भाभी जी भी बेटे के पास चली जायेंगी। यह सोच कर उसका दिल बैठा जा रहा था।
पन्द्रह मिनट का वही रास्ता आज काटे नहीं कट रहा था। आखिर उमा से रहा न गया, “थोड़ी जल्दी करो जी, अंतिम यात्रा की तैयारी हो चुकी होगी, ले जाने का समय हो रहा है।”
“ मेरा दोस्त ही नहीं रहा तो मैं क्या करूँगा? इस रास्ते पर मेरी भी यह अंतिम यात्रा है उमा।” सारा दर्द उमड़ कर आँखों से बहने लगा हो जैसे...वह फूट-फूट कर रोने लगा।
3.खेल
पूर्वोत्तर क्षेत्र में यह माता का एक सुप्रसिद्ध मन्दिर है। भक्तों और दर्शनार्थियों की भीड़ से बेखबर आठ से दस वर्ष आयु की वे तीन लड़कियाँ मन्दिर के विशाल प्राँगण में छुपम-छुपाई खेल रही थीं। तभी गेरुआ वस्त्रधारी पण्डितजी ने आवाज लगाई, ‘सिया, इधर आ!’
 ‘पापा! अभी थोड़ी देर में आती हूँ, खेलकर।’
 ‘नहीं, अभी इधर आ, यजमान तेरी पूजा करने के लिए इन्तजार में बैठे हैं।’ पण्डितजी ने कड़ककर कहा।
  दोनों सहेलियों की ओर निहारती सिया पण्डितजी की ओर चल दी। उसकी आँखों से बेबसी झलक रही थी। उसकी दोनों सहेलियाँ भी खेल छोड़कर उसके पीछे हो लीं।
सिया पटड़े पर बैठ चुकी थी। उसके सामने बैठे नि:सन्तान दम्पती ने सर्वप्रथम उसके पाँवों को गंगाजल से धोया, साड़ी के पल्लू से पोछा, पैरों में आलता लगाया और हाथों में चूड़ियाँ पहनाकर माथे पर बिन्दी लगा सिर पर चुन्नी ओढ़ाई। उसकी गोद में वस्त्र, फल, मिठाई के साथ ही पाँच सौ का एक नोट रखा। इस बीच पण्डितजी निरन्तर मन्त्रोच्चार कर रहे थे। इन सब क्रियाओं से बेखबर माता का रूप धरे सिया कभी अपनी सहेलियों की ओर देखकर मुस्कराती रही और कभी इशारों में उनसे बतियाती रही। उन तीनों का मूक वार्तालाल जारी था।
 पूजा अब अन्तिम चरण में थी।
सिया उठने को अधीर हो उठी। उसने स्वचालित यन्त्र की तरह अपने गले से मालाएँ उतारकर उस दम्पती के गले में पहनाई... दोनों की झुकी पीठ पर आशीर्वाद की थपकी लगाई... गोद में रखे वस्त्र, फल, मिठाई और रुपये पिता की गोद में पटककर जल्दी से अपनी सहेलियों के साथ मन्दिर के प्राँगण में खेलने दौड़ गई।
 ‘बेटी, जल्दी आ, पूजा के लिए यजमान आए हैं...’ तभी दूसरी बच्ची मुन्नी के बापू की आवाज ने उनके खेलते पैरों पर ब्रेक लगा दिए।
4. हाईटेक रिश्ते
“दीदी इस महीने की 22 तारीख को आपकी भतीजी की रिंग सेरेमनी तय हुई है। प्रोग्राम लखनऊ में होना है, आप और जीजा जी तैयार रहना।” शिल्पा की भाभी ने फोन पर सूचित किया ।
“ठीक है।”
“देख लो दीदी! एक दिन पहले यहाँ घर आना पड़ेगा और यहाँ से इक्कीस को दिल्ली से सभी की एक साथ रिजर्वेशन होगी । इस तरह आपको चार-पाँच दिनों की छुट्टियों का इन्तजाम करना पड़ेगा।” भाभी ने खोल कर बताया।
“ठीक है।” शिल्पा ने सहज भाव से कहा।
फोन उधर से डिसकनेक्ट हो गया।
शिल्पा सोचने लगी भैया के घर में उनकी बिटिया की पहली शादी है, उन्हें तो आग्रहपूर्वक और हक से कहना चाहिए था कि आपको और जीजाजी को अवश्य चलना है। अभी से अपनी छुट्टियों का प्रबंध कर लो और तैयारी शुरू कर दो। लगता है भाभी बस ऊपर के मन से औपचारिकतावश ही जाने के लिए कह रही थीं...
तो हम भी कौन से जाने को तैयार बैठे हैं? इस गर्मी के मौसम में दो दिन का सफर... चार-पाँच छुट्टियाँ बेकार करना और फिर रितेश के बिजनेस का भी नुकसान होगा।
थोड़ी देर बाद फिर भाई का फोन आया, “तो आप दोनों का आना पक्का समझूँ? राजधानी में टिकट बुक करानी है, अभी तय करना होगा।”
“हाँ भाई, हमारे लायक और कोई काम हो तो वह भी बता देना।”
प्रत्युत्तर में दूसरी ओर से कोई आवाज़ न सुन कर शिल्पा बोली, “देख भाई क्यों बोझ मर रहे हो, नहीं ले जाना तो बेशक मत ले जाना। रही बात लोगों की, रिश्तेदारों की तो कह देना, हमने तो सादर बुलाया था... टिकट भी करा दी थी... जीजाजी को कोई जरूरी काम आन पड़ा।” यह कह कर शिल्पा ने सुख की साँस ली।
“हाँ यही ठीक रहेगा दीदी! आप लोग नहीं शामिल हो सकते, तो कोई बात नहीं... आपको रिंग सेरेमनी की वीडियो भेज देंगे।”
मोबाइल डिसकनेक्ट होते ही दोनों ही के सिर से जैसे मन का भार उतर गया हो।
 5.फेफड़ों की वर्कशॉप
रामकृष्ण दो दिन पहले ही गाँव से शहर अपनी पत्नी का इलाज कराने आया था। वह अपने दोस्त मधुदीप के यहाँ ठहरा था। गाँव में नित्य सवेरे खेतों में घूमने के आदी रामकृष्ण को यहाँ घुटन महसूस होने लगी। वह सुबह जल्दी उठा और इस पाश कालोनी में सैर करने निकल पड़ा। पर उसे ताजगी का अहसास न हुआ। तभी उसने एक ताजगी भरी हवा का झोंका महसूस किया और वह उस ओर बढ़ चला। उसे कुछ दूरी पर भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ों का झुरमुट दिखाई पड़ा। वह उनके समीप गया। चारों तरफ ऊँची दीवार और गेट देख कर ठहर गया लगता है। “यह तो कोई बड़ा पार्क है।” वह खुश हो गया। गेट के पास लगे बोर्ड को देख कर वह चौंका –“ हैं! ‘फेफडों की वर्कशॉप,’ मोटर-गाड़ी की वर्कशॉप तो सुनी है पर ये फेफडों...”
तभी एक आदमी हाथ में रजिस्टर लिए दौड़ कर आया, “ये लो साहब एंट्री भर दो।”
“एंट्री भर दो! मतलब।”
“एंट्री नहीं भरोगे तो पता कैसे चलेगा कि आप किस समय अंदर आए और कितनी देर पार्क में रहे?”
“क्यों! पाबंदी है क्या? जितनी मर्जी देर तक यहाँ रहूँ मैं! पार्क तो सार्वजनिक यानी सबके लिए होते हैं।”
“नहीं साहब! यहाँ ऐसा नहीं है, प्रत्येक मिनट के हिसाब से पैसा चुकाना पड़ता है।” 
“अजीब नियम है यह।” परस्पर उनकी बहस सुन कर एक सूटेड-बूटेड आदमी जो पार्क का मालिक लग रहा था, आया और बोला,
“ इसमें अजीब क्या है भाई! बच्चे स्कूल बैग के साथ आक्सीजन सिलेंडर ले जाते हैं, वह क्या मुफ़्त आता है?”
“बस रहने दो! ये शहर के चोचले हमें समझ नहीं आते, हमें ज्ञान मत दो, हम अज्ञानी ही भले।” यह कह कर वह पलटा और बुदबुदाया- हूँ...! ‘फेफड़ों की दुकान!’        

Sep 15, 2019

छूटा हुआ सामान

छूटा हुआ सामान


-डॉ. शील कौशिक 
 विवाह के बाद ससुराल से पहली बार मायके लौटी तनुजा का मन उड़ा जा रहा है। पहले दिन वह माँ-बाबूजी के ढ़ेरों प्रश्नों के उत्तर देती रही,कुछ छुपाती रही, कुछ मन खोल कर बताती रही आस-पड़ोस की ताई-चाची से आसीसें बटोरती रही। दूसरे दिन सुबह उठते ही माँ शुरू हो गई, “तनु बेटा! आज दामाद जी आने वाले हैं, अपने बैग में सामान जमा लो, जल्दी में कुछ छूट जाएगा।”
तनुजा को शीघ्रता से दरवाजे से बाहर निकलते देख माँ ने टोका, “ कहाँ जा रही है तनु?”
“अभी आई माँ,” यह कह कर वह निकल गई, अपने मोहल्ले में रह रही सहेली मीना के घर की तरफ । रास्ते में पड़ोस की ताई ने रोक लिया, “बिटिया कल तो तू ससुराल चली जाएगी...आ...मैंने खीर बनाई है...तुझे तो बहुत पसंद है ना...”कहते हुए ताई हाथ पकड़कर ले गई।
मीना उसे देखते ही फूल सी खिल उठी। खट्टी-मीठी बातें करते कब दो घंटे बीत गये, पता ही न चला। घर वापिस आई तो माँ रसोई में उसकी पसंद की हरी मैथी वाली मट्ठियाँ बना रही थी।
“बेटी अपना सामान इकठ्ठा कर लो, कुछ छूट गया तो तुम्हें ही परेशानी होगी।”
“माँ एक बार बाजार से जरूरी सामान लेने जा रही हूँ,” कह कर तनुजा बिना उत्तर सुने घर से बाहर निकल ही गई। बाजार में उन दुकानों पर पहुँची ,जहाँ से वह हेयर पिन व क्लिप, रबर बैण्ड, रिबन, चूड़ियाँ आदि खरीदती थी।
“अरी बिटिया! बहुत दिन बाद दिखाई पड़ी हो, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?” दुकान वाले काका बोले।
“काका ,अब मेरी शादी हो गई है, दो क्लिप, हेयर बैण्ड दे दीजिए।”
“बस यही, यह लो। और ये चूड़ियाँ हमारी तरफ से शादी का तोहफ़ा समझो बिटिया।” उसके बाद तनुजा ने सामने वाली दुकान से वही पेन खरीदा ,जो वह कॉपी-किताबों के साथ यहाँ से अक्सर खरीदा करती थी।
वापिस आई, तो माँ ने फिर याद दिलाया, “बेटी अपना सामान अटैची में जमा लो, दामाद जी ज्यादा देर नहीं रुकने वाले।”
“अच्छा माँ!” कहकर वह तुरंत पलटी और फिर दरवाजे से बाहर हो गई। उन गलियों से गुजरती हुई जहाँ वह छुपम-छुपाई व उछल-कूद करती थी, नीम के उस विशाल वृक्ष के पास पहुँचीI यहाँ वह सहेलियों संग झुला झूलती और सबसे ऊँची पींघ लेने के लिए मचल जाया करती थी। कितनी ही देर तक निहारती रही उस खामोश खड़े पेड़ को और यादों के झूलों में झूलती रही तनुजा। माँ के कठोर चेहरे की याद आते ही वह फिर घर की तरफ भागी।
 रसोई से उठती हुई खुशबू से पता लगा कि माँ रसोई में दामाद के लिए जरूर कोई पकवान बना रही है। वह चुपके से रसोई में गई। माँ साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। उसे देखते ही माथे पर त्योंरियाँ  चढ़ाकर गुस्से में बोली, “तेरे पाँव में टिकाव ना है, यहाँ-वहाँ उड़ती फिर रही है छोरी।”
फिर उसके मासूम से चेहरे को देखकर माँ की आँखें नम हो गई व भर्राई आवाज में बोली,
“कितनी बार कहा है तुझे, अपना सामान समेट ले बेटा!”
“माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ,” कह कर वह फफक-फफककर रो पड़ी और माँ के गले में झूल गई।