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Jan 1, 2021

आलेख- सूरज का पर्दा

 सूरज का पर्दा

-रावी
   धरती जब सूर्य के सामने घूमते-घूमते सात नील दिन और उतनी ही रातों की यात्रा कर चुकी, तब उसके कुछ पुर्जे ढीले हो ग और उसमें कुछ मरम्मत की आवश्यकता हुई।

   धरती के शिल्पी देवताओं ने हिसाब लगाकर बताया कि इस मरम्मत के लिए पृथ्वी को तीन दिन और तीन रातों के बराबर समय तक के लिए अपनी यात्रा रोकनी पड़ेगी, और इसका यह अर्थ होगा कि पृथ्वी के एक गोलार्द्ध पर नियमित से छ गुना दिन-और दूसरे गोलार्द्ध पर छह गुनी रात होगी। सौर मंडल के अधिष्ठाता विवस्वान् देव ने अन्तरिक्ष के एक केन्द्रीय नक्षत्र में देवताओं की सभा की। समस्या यह थी कि आवश्यक मरम्मत के लिए धरती तीन दिन तक ठहरा दी जाए, इसमें तो कोई हानि नहीं; लेकिन इससे उसके एक गोलार्द्ध पर छ गुना दिन और दूसरे पर छ गुनी रात होगी। उससे धरती के प्राणियों विशेषकर मानवजन पर जो आतंक छा  जाएगा और प्रकृति की नियमितता पर उन्हें जो अविश्वास हो  जाएगा उसका परिणाम बहुत ही घातक होगा। आवश्यकता इस बात की थी कि धरती के जीवों को धरती के इस स्तम्भन का पता न लग पा और काम भी पूरा हो जा
   बड़े-बड़े प्रकाश-पुंज नक्षत्रों के अधिष्ठाता देवताओं ने अपनी-अपनी सेवाएँ  प्रस्तुत करते हुए अपना संपूर्ण बुद्धि-बल लगा देखा, पर वे इस समस्या का हल नहीं निकाल सके। उनमें से अनेक यह तो कर सकते थे कि अपने नक्षत्र का एक बड़ा प्रतिबिम्ब धरती के समीप लाकर उसके निम्नार्द्ध सूर्य से विमुख-भाग के सामने एक कृत्रिम सूर्य के रूप में सूर्य-की-सी गति से चालित करें और उस
गोलार्द्ध के निवासियों को उस दीर्घ रात्रि का पता न लगने दें,
पर सूर्य के सामने वाले गोलाई के निवासियों के लिए कुछ करने का साधन उनके हाथ में कोई नहीं था। अन्त में, जब सभी अगली पंक्तियों के देवता अपनी असमर्थता प्रकट कर चुके, तब सबसे अन्तिम पंक्ति में बैठा हुआ एक बहुत ही छोटा, ज्योतिहीन, वरुण नाम का मेघों का देवता उठा और उसने इस परिस्थिति को साध सेने के लिए अपनी सेवाएँ  प्रस्तुत कीं
   
बड़े देवताओं को वरुण के इस साहस पर आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसके प्रस्ताव को एक धृष्टतापूर्ण दुस्साहस समझा। किंतु वरुण ने विवस्वान् देव से विश्वासपूर्ण शब्दों में निवेदन किया कि वह धरती के शिल्पी देवताओं को अपना कार्य प्रारंभ करने की आज्ञा दें और उन्हें श्वासन दिया कि शेष अव्यवस्था को वह सहज ही सँभाल लेगा।

विवस्वान् देव की आज्ञा लेकर वरुण ने पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों के आकाश को घने मेघों से पाट दिया और ततक उन्हें वहीं रोके रखा, जबतक शिल्पी देवों ने धरती की मरम्मत का अपना काम पूरा न कर लिया। इतने दीर्घकाल तक मेघाच्छान्न-आकाश पृथ्वी के निवासियों के लिए एक अदृष्ट -पूर्व घटना थी, पर इसमें उनके लिए कोई अकल्पित-पूर्ण या आतंकित करने वाली बात नहीं थी। वरुण के इस कौशल से उन्हें दिन और रात के स्तम्भन का कोई पता नहीं लग पाया और वे अपने कृत्रिम दीप-प्रकाश में स्वाभाविक दिन-रात की भाँति काम करते रहे।

लघु का काम गुरु से और अन्धकार का काम प्रकाश से यदि होने लगे तो प्रकृति की व्यवस्था में लघु और अँधकार का स्थान ही कहाँ रह जाए ?

(साभार- मासिक पत्रिका- जीवन साहित्य, जनवरी-1953, वर्ष-14, अंक-1, सम्पादक –हरिभाऊ उपाध्याय, यशपाल जैन, सस्ता साहित्य मण्डल , नई दिल्ली से प्रकाशित, मूल्य एक प्रति-6 आना, वार्षिक- 4 रुपये)

Aug 13, 2020

भिखारी और चोर

भिखारी और चोर
-रावी
मेरी वाटिका के द्वार पर वह आया और बोला, ‘‘बाबूजी, अपनी बगीची से कुछ फूल मुझे ले लेने दीजिए।’’
फटेपुरानों कपड़ों से अस्तव्यस्त रूप में तन ढके उस तरुण बालक को ध्यानपूर्वक देखते हुए मैंने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’
‘‘भिखारी’’, उसका उत्तर था, और उसमें सन्देह का कोई स्थान न था।
‘‘भिखारियों को ऐसी चीज न माँगनी चाहिए। तुम चाहो तो मैं तुम्हें एक पैसा या एक रोटी दे सकता हूँ।’’ मैंने कहा।
‘‘ये तो मुझे दूसरों से पेट भरनेभर को मिल जाती है।’’ उसने कहा और असन्तुष्ट होकर चला गया।
अगले दिन माली ने सूचना दी कि बगीची में कुछ फूलों की चोरी हुई है। मैंने पहरे की व्यवस्था कर दी, किन्तु चोरी का क्रम न रुका। हर रात किसी समय कुछ फूल टूटकर गायब हो जाते।
एक दिन मैंने उसी लड़के को बाजार में देखा। सड़क किनारे बैठा वह फूलों की मालाएँ बना रहा था।
‘‘तुम चोर हो।’’ मैंने पास जाकर उसे पकड़ा।
‘‘बिलकुल नहीं बाबूजी, यह आप कैसी बात कहते हैं! मैं तो भिखारी हूँ। भीख के पैसे बचाकर कुछ फूल खरीद लाता हूँ और मालाएँ बनाकर उन्हें बेच देता हूँ। कुछ दिनों बाद मुझे भीख माँगने की जरूरत न रह जागी। मुझे चोर बताने का आपके पास कोई सबूत है?’’
बालक के स्वर में कड़क थी। उसकी चोरी का मेरे पास कोई सबूत नहीं था। कई लोग हमारी बातचीत सुन रहे थे। ऐसी बेसबूत की बात कहकर मैं उनकी दृष्टि में स्वयं को लज्जित अनुभव कर रहा था। चुप होकर मैं चल दिया।
कुछ दूर पहुँचकर मैंने देखा, ‘‘बालक मेरे पीछे आ गया है। एकान्त पाकर उसने मुझसे कहा, ‘‘बाबूजी, मैं हूँ तो वही भिखारी और आपकी भीख पर ही पनप रहा हूँ। अन्तर इतना है कि आप अपने हाथ से उठाकर देते तो दुनिया के सामने भी आपका कृतज्ञ होता, किन्तु अब अकृतज्ञ हूँ।’’
फूलों की हानि तो मेरे लिए कोई हानि नहीं थी, लेकिन एक बहुत बड़ी वस्तु मेरे हाथ से निकल गई थी।