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Apr 16, 2019

छत्तीसगढ़ में माता की उपासना

छत्तीसगढ़ में माता की उपासना
- सुशील भोले
सतबहिनिया माता की पूजा परंपरा...
छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति इस देश में प्रचलित वैदिक या कहें शास्त्र आधारित संस्कृति से बिल्कुल अलगहटकर एक मौलिक और स्वतंत्र संस्कृति है। आप सभी जानते हैं, कि नवरात्र में वैदिक मान्यता के अनुसार माता के नौ रूपों की उपासना की जाती है। जबकि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति में माता के सात रूपों की पूजा-उपासना की जाती हैजिन्हें हम सतबहिनिया माता के नाम से जानते हैं। यहाँ की संस्कृति प्रकृति पर आधारित संस्कृति है, इसलिए यहाँ प्रकृति पूजा के रूप में जंवारा बोने और उसकी पूजा-उपासना करने की परंपरा है।
हमारे यहाँ सतबहिनिया माता के जिन सात रूपों की उपासना की जाती हैउनमें मुख्यतः - शीतला दाईमावली दाईबूढ़ी माईठकुराईन दाई, कुंवर माईमरहीमाई, दरश माता आदि प्रमुख हैं।  इनके अलावा भी अलग- अलग लोगों से और कई अन्य नाम ज्ञात हुए हैंजिनमें -कंकालीन दाईदंतेश्वरीमाईजलदेवती माताकोदाई माता या अन्नपूर्णा माता आदि-आदि नाम बताए जाते हैं।
हमारे यहाँ सतबहिनिया माता की पूजा-उपासना आदि काल से होती चली आ रही है, इसीलिए यहाँ के प्राय: सभी गाँवशहर और मोहल्ले में शीतला मातामावली माता, सतबहिनिया माता आदि के मंदिर देखे जाते हैं। 
माँ गंगा मैया मंदिर, झलमला... 
छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर पर स्थित ग्राम पंचायत झलमला का प्रसिद्ध देवी मंदिर है। मंदिर ऐसा कि दर्शन मात्र से ही जीवन धन्य हो जाए। माता की अदभुत प्रतिमा को देखकर ही भक्त जनों का रोम-रोम पुलकित हुए बिना नहीं रहता।
प्राचीन कथा जुड़ी देवी माँ के मंदिर से..
धार्मिक स्थल माँ गंगा मैया की कहानी अंग्रेज शासन काल से जुड़ी हुई है। उस समय जिले की जीवन दायिनीतांदुला नदी के नहर का निर्माण चल रहा था, करीब 125 साल पहले। उस दौरान झलमला की आबादी महज 100 के लगभग थी, जहाँ सोमवार के दिन ही यहाँ का बड़ा बाजार लगता था। जहाँ दूर-दराज से पशुओं के विशाल समूह के साथ बंजारे आया करते थे। उस दौरान पशुओं की संख्या अधिक होने के कारण पानी की कमी महसूस की जाती थी। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बांधा तालाब नामक एक तालाब की खुदाई कराई गई। माँ गंगा मैय्या के प्रादुर्भाव की कहानी इसी तालाब से शुरू होती है।
बार-बार जाल में फंसती रही मूर्ति...
किवदंती अनुसार एक दिन ग्राम सिवनी का एक केवट मछली पकडऩे के लिए इस तालाब में गया, लेकिन जाल में मछली की जगह एक पत्थर की प्रतिमा फँस गई, लेकिन केवट ने अज्ञानतावश उसे साधारण पत्थर समझ कर फिर से तालाब में डाल दिया। इस प्रक्रिया के कई बार पुनरावृत्ति से परेशान होकर केवट जाल लेकर घर चला गया।
स्वप्न में कहा मुझे निकालें बाहर...
देवी माँ की प्रतिमा को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। केवट के जाल में बार-बार फंसने के बाद भी केवट ने मूर्ति को साधारण पत्थर समझ कर तालाब में ही फेंक दिया। इसके बाद देवी ने उसी गांव के गोंड़ जाति के बैगा को स्वप्न में आकर कहा कि मैं जल के अंदर पड़ी हूं। मुझे जल से निकालकर मेरी प्राण-प्रतिष्ठा करवाओ।
माता के स्वप्न के बाद प्रतिमा को निकाला बाहर...
स्वप्न की सत्यता को जानने के लिए तत्कालीन मालगुजार छवि प्रसाद तिवारी, केंवट तथा गांव के अन्य प्रमुख को साथ लेकर बैगा तालाब पहुँचा, उसके बाद केंवट द्वारा जाल फेंके जाने पर वही प्रतिमा फिर जाल में फंसी। प्रतिमा को बाहर निकाला गया, उसके बाद देवी के आदेशानुसार तिवारी ने अपने संरक्षण में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई गई। जल से प्रतिमा निकली होने के कारण गंगा मैय्या के नाम से जानी जाने लगी।
शक्ति लहरी सतधरा धाम दर्शन...
छत्तीसगढ की शक्तिपीठों में अब शक्ति लहरी सतधरा धाम का नाम भी प्रमुखता से जुड़ने लगा है। लगभग पिछले एक शताब्दी पूर्व से स्थापित माता के इस मंदिर में भक्तजनों का आना निरंतर बढता जा रहा है।
सात नदियों के एक साथ मिलने से सतधरा या सप्तधारा के नाम से जाने जाना वाला यह स्थल गरियाबंद जिला महासमुंद जिला और रायपुर जिला की सीमारेखा पर ग्राम हथखोज के अंतर्गत स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ महानदी, सोढुल नदी और पैरी नदी की तीन धाराओं के साथ सूखा नदी, सरगी नदी, केशवा नदी और बगनई नदी आपस में एक साथ मिलती हैं, इसीलिए इस विराट भू-भाग में फैले संगम को सप्तधारा या सतधराकहते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संभवतः समूचे छत्तीसगढ में नदियों का संगम स्थल इतना विस्तारित कहीं पर नहीं है, जितना विस्तारित यहाँ का संगम पाट है।

माता जी के यहाँ पर स्थापित होने के संबंध में बताया जाता है, कि माता की यह बिना शीश वाली प्रतिमा नदी में बहकर आयी है, एक यादव को यह प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी भैंसोथ को लेकर संगम स्थल पर जाया करता था, वहाँ उसकी भैंस एक स्थान विशेष पर हमेशा चमक जाती थी। यादव को आश्चर्य होता था कि आखिर भैंस यहाँ पर चमक या झिझक क्यों जाती है। उसने उस स्थल को ठीक से देखकर रेत में टटोलने लगा कि आखिर यहाँ है क्या? तब यह प्रतिमा उसके हाथों में आयी।
बताया जाता है, कि तब माता ने उस यादव को स्वप्न दिया कि मुझे यहाँ से निकालकर अन्य स्थल पर स्थापित करवा दो। उन्होंने बताया कि मुझे उठाकर ले जाते समय हर कदम पर एक-एक नारियल रखते जाना और जहाँ पर नारियल अपने आप फूट जाए उस स्थल पर मुझे स्थापित कर देना। वर्तमान में स्थापित जगह पर ही नारियल के फूटे जाने का जिक्र किया जाता है।
वर्तमान में यह स्थल देवी उपासना के प्रमुख पीठ के रूप में विकसित हो रहा है। राजिम से महासमुंद को जोड़ने वाले इस मार्ग पर स्थित सूखा नदी पर भव्य पुल बन जाने के कारण यहाँ से होकर गुजरने वालों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, इसका प्रतिफल मंदिर के दर्शनार्थियों के लिए भी सार्थक रहा है, उनकी संख्या में भी वृद्धि हुई है।
यहाँ पर प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर तीन दिनों का मेला भरता है। मेला का स्वरूप दिनों दिन बढता ही जा रहा है। इसी अवसर पर यहाँ सूखा लहरा लिया जाता है। बताया जाता है, कि संगम स्थल की रेत पर लोग लोट कर लहरा लेते हैं। जिसके भाग्य में होता है, वह उंगली के स्पर्श मात्र से काफी दूर तक लुढकते हुए चला जाता है, और निढाल होने के पश्चात ही रुकता पाता है।
माता के इस स्थल पर नवरात्र के दोनों ही अवसर पर ज्योति कलश की स्थापना की जाती है, जहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना को लेकर ज्योति प्रज्वलित करते हैं।
जंगल के बीच जतमाई माता का बसेरा... 
जतमई छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ आैर पर्यटन स्थलों में से एक है। ये प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यह स्थान अब देवी का एक चर्चित तीर्थ का रूप धारण कर चुका है। जतमाई छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 65 किमी की दूरी पर स्थित एक प्राकृतिक स्थल है आैर यह जंगल के बीचों-बीच बना हुआ है। जतमाई अपने कल कल करते प्राकृतिक सदाबहार झरनों के लिए भी प्रसिद्ध है। गरियाबंद जिले में प्रकृति की गोद में बसा, वनों से आच्छादित यह अत्यंत सुंदर स्थान है, जहाँ वर्षा ऋतु में कल कल करते झरने बहते रहते हैं। यही शहर के प्रदूषण से मुक्त शांत जगहों मेंसे एक जतमई धाम है। यहाँ माँजतमाई का प्रसिद्घ मंदिर है जो की पहाड़ों की देवी है। माता के मंदिर के ठीक सटी हुई जलधाराएं उनके चरणों को छूकर चट्टानों से नीचे गिरती हैं। इसमें युवा नहाने से नहीं चूकते हैं। स्‍थानीयमान्‍यताओं के अनुसार, ये जलधाराएं माता की सेविकाएं हैं जो देवी माँ के भक्‍तों को नहलाती हैं। यहाँ आने वाला हर शख्स यही कहता है कि वह जन्नत में आ गया।
बहुत मशहूर है यह स्थान...
वैसे तो यहाँ साल भर ही भक्तों की भीड़ आती है और माँ के दर्शनों का लाभ उठाती है, परंतु प्रतिवर्ष चैत्र और कुवांर के नवरात्र में मेला भी लगता है। जतमाई में दूर दूर से लोग माता के दर्शन करने आते हैं तथा पिकनिक का भी आनंद उठाते हैं। जतमई वनों के मध्य में स्थित होने के कारण एक खूबसूरत पिकनिक स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहाँ के झरने लोगों के मन मोह लेते हैं और लोग झरने में भीगने से आपने आप को रोक नहीं पाते हैं। जतमाई से लगा हुआ घटारानी भी जतमाई की तरह ही एक प्राकृतिक पर्यटन स्थल है। यहाँ भी जतमाई की तरह ही झरने बहते हैं और माँ घटारानी का मंदिर है, जतमाई के पास ही एक छोटा सा बांध भी है जिसे पर्यटक देखना नहीं भूलते।
सम्पर्कः संजय नगररायपुर, मो.
982699281

Nov 19, 2017

तरक्की के नए रास्ते पर छत्तीसगढ़ के किसान

 तरक्की के नए रास्ते पर
 छत्तीसगढ़ के किसान
-स्वराज्य कुमार

सिर्फ सोलह साल के किशोर छत्तीसगढ़ राज्य के किसान अपनी मेहनत से आज तरक्की के नए रास्ते बनाकर समृद्धि और खुशहाली की नई मंजिलों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। राज्य में धान का उत्पादन सिर्फ दस साल के भीतर दोगुने से भी ज्यादा हो गया, वहीं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर राज्य में किसानों की आमदनी वर्ष 2022 तक दोगुनी करने के लिए भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने योजनाबद्ध रणनीति के साथ एक व्यापक रोड मैप बनाकर काम शुरू कर दिया है। खेती को अधिक से अधिक लाभदायक बनाने के लिए इसमें कृषि उत्पादन, रेशम उत्पादन, उद्यानिकी फसलों की खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और मछलीपालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई उपाय और कई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। रोड मैप में बाजार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने, कृषि वानिकी के तहत बांस और अन्य लघु वनोपजों के उत्पादन और विपणन तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए भी इसमें कई महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा की गई है। खेती-किसानी की दशा और दिशा में लगातार एक सकारात्मक बदलाव आ रहा है। इससे छत्तीसगढ़ के किसान समृद्धि और खुशहाली के नए रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
रमन सरकार ने विगत तेरह साल में प्रदेश के किसानों की बेहतरी के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। ब्याज मुक्त ऋण सुविधा, कृषक जीवन ज्योति योजना के तहत तीन हॉर्स पावर से पांच हार्स पावर तक सिंचाई पम्पों के लिए सलाना 6000 यूनिट से 7500 यूनिट तक मुफ्त बिजली, सौर सुजला योजना के तहत अत्यंत किफायती मूल्य पर सोलर सिंचाई पंप, विद्युत कनेक्शन वाले सिंचाई पंपों की संख्या 94 हजार से बढ़ाकर तीन लाख 70 हजार तक पहुंचाना, सिंचाई योजनाओं का विकास और विस्तार, समर्थन मूल्य नीति के तहत सहकारी समितियों में वर्ष 2003-04 से 2015-16 तक छह करोड़ 22 लाख मीटरिक टन धान की खरीदी और किसानों को लगभग 65 हजार करोड़ रुपये  का भुगतान, इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अनुसार किसानों की समृद्धि उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। वर्ष 2007 की तुलना में 2016-17 में राज्य में एक करोड़ 20 लाख टन फसलों की पैदावार मिली है, जो वर्ष 2007 की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है। 
ब्याज मुक्त ऋण सुविधा से किसानों में नए उत्साह का संचार
किसानों की बेहतरी के लिए राज्य शासन द्वारा तैयार रोड मैप के अनुसार एकीकृत कार्ययोजना में किसानों के लिए ब्याज मुक्त अल्पकालीन कृषि ऋणों की वर्तमान राशि 3800 करोड़ रुपये  से बढ़ाकर पाँच वर्ष में 5772 करोड़ रुपये  तक ले जाने का लक्ष्य है। हमें इस बात को भी याद करना चाहिए कि राज्य-निर्माण के प्रारंभिक तीन वर्षो में किसानों को सहकारी बैंकों के जरिए से सहकारी समितियों में 13 से 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण मिलता था। डॉ. रमन सिंह की सरकार ने इन ब्याज दरों को वर्ष 2004-05 में 9 प्रतिशत, वर्ष 2006-07 में 7 प्रतिशत, वर्ष 2007-08 में 6 प्रतिशत, वर्ष 2008-09 में 9 प्रतिशत और 2012-13 में 1 प्रतिशत कर दिया। रमन सरकार ने किसानों के लिए ब्याज दर को वर्ष 2013-14 से शून्य प्रतिशत कर दिया। कृषि ऋणों की ब्याज दरों में भारी कमी होने और बाद में ब्याज मुक्त ऋण सुविधा मिलने पर किसानों में नए उत्साह का संचार हुआ है और सहकारी समितियों से ऋण लेने वाले किसानों की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी है। वर्ष 2001-02 में जब यह ब्याज दर 13 से 15 प्रतिशत थी, उस समय सिर्फ तीन लाख 96 हजार किसानों ने इस सुविधा का लाभ लिया था, जबकि वर्ष 2012-13 में ब्याज दर एक प्रतिशत होने पर ऋण लेने वाले किसानों की संख्या बढ़कर 9 लाख 45 हजार से ज्यादा हो गई और आज की स्थिति दस लाख से अधिक किसानों को ब्याज मुक्त ऋण सुविधा का लाभ मिल रहा है।
रमन सरकार ने इस वर्ष एक हजार 333 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के जरिए खरीफ़ मौसम में 3200 करोड़ रुपये  और रबी मौसम में 600 करोड़ रुपये  का ब्याज मुक्त ऋण वितरण का लक्ष्य है। इस बार खरीफ में अब तक इस लक्ष्य के विरूद्ध 1500 करोड़ रुपये  से ज्यादा ऋण वितरित किया जा चुका है। यह राशि उन्हें 60 प्रतिशत वस्तु (खाद और बीज) तथा 40 प्रतिशत नगद के रूप में दी जा रही है। पिछले साल 2016 में खरीफ मौसम के दौरान किसानों को 2800 करोड़ रुपये  के लक्ष्य के विरुद्ध 2855 करोड़ 26 लाख रुपये  का ऋण दिया गया था। वर्तमान में ब्याज मुक्त ऋण सुविधा का लाभ ले रहे लगभग दस लाख से ज्यादा किसानों के अलावा समितियों में अगले पांच साल में कम से कम पांच लाख नए किसानों को भी सदस्य के रूप में जोड़ने का लक्ष्य है, जिन्हें नए किसान क्रेडिट कार्ड दिए जाएँगे। यह रोड मैप कृषि और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा तैयार किया गया है। कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने अधिकारियों को इस रोड मैप के सभी प्रावधानों पर अमल के लिए तत्परता से कार्य शुरू करने के निर्देश दिए हैं। श्री अग्रवाल ने समय-समय पर स्वयं इसकी विस्तृत समीक्षा भी कर रहे हैं।
किसानों के लिए अलग से कृषि बजट
छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जिसने वर्ष 2012-13 से राज्य के मुख्य बजट के साथ किसानों के लिए अलग से कृषि बजट की शुरूआत की है। उसमें कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों में किसानों की सुविधा के लिए छह हजार 244करोड़ रुपये  का प्रावधान किया गया था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 10 हजार 676 करोड़ रुपये  तक पहुंच गया। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2017-18 में भी राज्य सरकार ने कृषि बजट में दस हजार करोड़ रुपये  से ज्यादा राशि का प्रावधान किया है। इसमें सिंचाई सुविधाओं के लिए 5242 करोड़ रुपये , कृषि विकास योजनाओं के लिए 2279 करोड़ रुपये , पशुपालन के लिए 517 करोड़ रुपये , सहकारिता के लिए 298 करोड़ रुपये  और मछलीपालन के लिए 100 करोड़ रुपये  की धन राशि निर्धारित की गई है। इस वर्ष के कृषि बजट के अनुसार 32 लाख से ज्यादा किसानों के लिए प्रति किसान लगभग 28 हजार रुपये  का औसत बजट प्रावधान है।
प्रदेश को अब तक चार कृषि कर्मण पुरस्कार
राज्य को वर्ष 2011 से 2016 की अवधि में भारत सरकार की ओर से चार बार कृषि कर्मण पुरस्कारों से नवाजा गया है। इनमें से तीन कृषि कर्मण पुरस्कार सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए और एक पुरस्कार दलहन के क्षेत्र में दिया गया है। राज्य में विगत 12 साल में चावल उत्पादन में 39 प्रतिशत, गेहूँ के उत्पादन में 24 प्रतिशत और दलहन-तिलहन के उत्पादन में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
खेती-किसानी की शिक्षा पर भी विशेष जोर
 प्रदेश की नयी पीढ़ी को आधुनिक खेती से जोड़ने के लिए कृषि शिक्षा पर भी विशेष रूप से जोर दिया जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर केे अंतर्गत वर्ष 2003-04 में जहाँ  सिर्फ चार सरकारी कृषि महाविद्यालय थे, वहीं इनकी संख्या वर्ष 2016-17 तक बढ़कर 12 हो गई । इस अवधि में शासकीय उद्यानिकी कॉलेजों की संख्या शून्य से बढ़कर दो और शासकीय कृषि इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या भी शून्य से बढ़कर दो हो गई । पशुधन खेती का मुख्य आधार हैं। इसे ध्यान में रखकर प्रदेश के युवाओं को पशुपालन और पशु चिकित्सा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा की सुविधा दिलाने के लिए रमन सरकार द्वारा वर्ष 2012 में दुर्ग जिले के ग्राम अंजोरा में कामधेनु विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, जिसका संचालन सफलतापूर्वक हो रहा है। खेती के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश में 20 कृषि विज्ञान केन्द्र भी संचालित हो रहे हैं।
राज्य तीन जलवायु क्षेत्रों में सीमांकित
 किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए राज्य सरकार के रोड मैप में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश को तीन अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों में सीमांकित करते हुए स्थानीय जलवायु विविधता के अनुरूप फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने की मंशा प्रकट की गई है। उत्तरी छत्तीसगढ़ पहाड़ी इलाकों में फैला हुआ है।  कृषि विशेषज्ञों के अनुसार वहाँ  की भौगोलिक परिस्थितियाँ  और शीतल जलवायु गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों के लिए काफी अनुकूल है। इसी तरह राजनांदगांव से मुंगेली तक काली मिट्टी वाले क्षेत्रों को रबी मौसम में चना और खरीफ मौसम में सोयाबीन उत्पादन क्षेत्र के रूप में चिह्नांकित किया गया। बस्तर और सरगुजा के सूदूरवर्ती इलाके परपंरागत रूप से जैविक खेती के लिए पहचाने जाते हैं। दंतेवाड़ा जिले में जैविक खेती के लिए शुरू की गई मोचोबाड़ीपरियोजना को अच्छी सफलता मिल रही है। राज्य में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की सर्वोत्तम व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रशंसा मिली है। किसानों की आमदनी दोगुनी करने के रोड मैप में इन बातों को ध्यान में रखकर रणनीति तय की गई है। इसमें यह भी ध्यान रखा गया है कि राज्य में धान को छोड़कर अन्य फसलों के लिए पर्याप्त प्रसंस्करण उद्योगों की कमी है। दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए समर्थन मूल्य पर उपार्जन की व्यवस्था को भी व्यापक बनाने की जरूरत है। प्रदेश के दो तिहाई से ज्यादा इलाकों में वर्षा आधारित खेती को भी रोड मैप में एक चुनौती के रूप में लेकर सिंचाई संसाधनों में वृद्धि पर भी जोर दिया गया है। रोड मैप में कहा गया है कि राज्य के प्रत्येक गांव के नजदीक से छोटे अथवा मँझोले बरसाती नाले गुजरे हैं, जो खेती के लिए वरदान साबित हो सकते हैं।
साढ़े तीन लाख से ज्यादा वन अधिकार
मान्यता पत्र धारकों को भी मिलेगा फायदा
अधिकारियों ने बताया कि राज्य में वन अधिकार मान्यता पत्र धारक तीन लाख 57 हजार से ज्यादा वनवासी परिवारों को तीन लाख 14 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्रों में खेती के लिए व्यक्तिगत पट्टे दिए गए हैं, वहीं आठ हजार 866 सामुदायिक पट्टे एक लाख 52 हजार हेक्टेयर रकबे में दिए गए हैं। वन अधिकार मान्यता पत्र धारक इन वनवासियों को खेती के लिए खाद और बीज, भूमि समतलीकरण तथा कृषि उपकरणों के लिए सहायता दी गई है। रोड मैप में उनकी आमदनी को भी दोगुनी करने के लिए विशेष प्रयासों पर बल दिया गया है और कहा गया है कि उन्हें उन्नत खेती से जोड़कर उद्यानिकी, कृषि वानिकी, पशुपालन और मुर्गीपालन योजनाओं का भी लाभ दिलाया जाएगा।
लगभग 37.46 लाख किसानों के खेतों में हो रहा मिट्टी परीक्षण
 राज्य के लगभग 37 लाख 46 हजार किसानों के खेतों में ग्रिड आधार पर मिट्टी परीक्षण भी किया जा रहा है। इस वर्ष 2017 तक सभी किसानों को मिट्टी स्वास्थ्य पत्रक (स्वायल हेल्थकार्ड) देने का अभियान भी चलाया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी परीक्षण कार्डो में की गई अनुशंसाओं के अनुसार खाद के उपयोग में दस प्रतिशत की बचत होगी और पैदावार में पाँच प्रतिशत की वृद्धि होगी।
कतार बोनी को बढ़ावा
रोड मैप में बताया गया है कि राज्य में वर्तमान में सिर्फ दो लाख 60 हजार हेक्टेयर में कतार बोनी से धान की बोआई की जाती है। अगले पांच साल में इसे पाँच लाख हेक्टेयर तक पहुँचाने के लिए विशेष अभियान चलाने का लक्ष्य है। इससे 60 हजार क्विंटल बीजों की बचत होगी। जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदेश के सभी बीस हजार गांवों में एक-एक चिमनी खाद गढ्ढों का निर्माण किया जाएगा। इससे लगभग दो लाख मीटरिक टन कम्पोस्ट खाद मिलेगी। जैविक खाद तैयार करने के लिए प्रदेश भर में ग्राम पंचायतों के स्तर पर पांच लाख वर्मी कम्पोस्ट टांके/नाडेप टांके बनवाए जाएँगे, जिनमें कम से कम 15 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद का उत्पादन हो सकेगा। प्रदेश में इस समय खेतों की मेड़ों पर अरहर, तिल, अरण्डी और रामतिल जैसी फसलों का वर्तमान रकबा सिर्फ दो लाख 02 हजार हेक्टेयर है, जिसे अगले पांच साल में पांच लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
करीब 3.60 लाख हेक्टेयर में होगी स्प्रिंकलर-ड्रिप सिंचाईरोड मैप के अनुसार अगले पांच साल में किसानों को लघु सिंचाई सुविधा देने के लिए तीन लाख 60 हजार हेक्टेयर में स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा देने का लक्ष्य है। किसानों को सरकारी अनुदान पर स्प्रिंकलर सेट दिए जाएँगे।
साढ़े चार लाख सिंचाई नलकूपों की होगी रिचार्जिंग
इसके अलावा राज्य में स्थापित चार लाख 50 हजार सिंचाई नलकूपों की रिर्चाजिंग पर भी इसमें जोर दिया गया है। इस उद्देश्य से बारिश के पानी को एकत्रित करने के लिए मनरेगा के तहत स्थानीय बरसाती नालों और छोटी नदियों में अगले पांच साल में दस हजार भूमिगत बंधारा बनवाए जाएँगे। इससे भूजल स्तर बढ़ेगा।
छोटे-बड़े नालों में हर एक किलोमीटर पर बनेगा चेकडेम
रोड मैप के अनुसार राज्य के छोटे-बड़े नालों में शृंखलाबद्ध तरीके से चेकडेम भी बनवाए जाएँगे। हर साल ऐसे नालों के किनारे 700 किलोमीटर की लंबाई में 700 से 725 चेकडेमों के निर्माण का लक्ष्य है। अर्थात हर एक किलोमीटर एक चेकडेम बनेगा। इनका निर्माण प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और राज्य पोषित योजना के जरिए किया जाएगा। जल संसाधन विभाग द्वारा राज्य में 495 एनीकट और स्टॉप डेम बनवाए गए हैं। अगले पाँच साल में इनके किनारों पर बिजली लाईन विस्तार करते हुए 44 हजार हेक्टेयर में उदवहन सिंचाई को बढ़ावा दिया जाएगा। शाकम्भरी योजना के तहत एक लाख दस हजार किसानों को सिंचाई पंप 75 प्रतिशत अनुदान पर देने का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
बाजार व्यवस्था को मजबूत बनाने कई बड़े निर्णय
किसानों को फसलों का उचित मूल्य दिलाने के लिए राज्य सरकार के रोड मैप में कृषि विपणन व्यवस्था को मजबूत बनाने की दृष्टि से भी कई बड़े निर्णय लिए गए हैं। इसके अंतर्गत प्रदेश की चिन्हांकित 14 कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ने, फल और सब्जी उपमंडियों की स्थापना, किसान उपभोक्ता बाजारों की स्थापना जैसे कई कदम उठाए जा रहे हैं। वनौषधियों और हर्बल प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जा रहा है। लाख कृमि पालन और लाख उत्पादन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश में दूसरे स्थान पर है। वर्ष 2022 तक प्रदेश के 54 हजार से ज्यादा किसानों को लाख की खेती से जोड़ने का लक्ष्य है। इसकी खेती 12 लाख से अधिक कुसुम, पलाश और बेर के वृक्षों में की जाएगी। राज्य के वनो में 19 प्रतिशत बांस के जंगल हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में 50 हजार नोशनल टन बांस का उत्पादन होता है, जबकि मांग 60 हजार नोशनल टन की है। रोड मैप में इसकी पूर्ति के लिए वनो के साथ-साथ किसानों की नीजि भूमि पर भी बांस रोपण को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य घोषित किया गया है। तेंदूपत्ता, साल बीज, हर्रा, महुआ, बहेड़ा, जैसी लघु वनोपजों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए भी रोड मैप में रणनीति तय की गई है।
लगभग 12 लाख हेक्टेयर तक पहुंचेगा उद्यानिकी फसलों का रकबा
 राज्य में उद्यानिकी फसलों का वर्तमान रकबा सात लाख 41 हजार हेक्टेयर है। इसे वर्ष 2021-22 तक बढ़ाकर 11 लाख 93 हजार हेक्टेयर तक पहुँचाने का लक्ष्य है। रणनीति में फलों की खेती को दो लाख 25 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 6 लाख 62 हजार हेक्टेयर, सब्जियों की खेती को चार लाख 14 हेक्टेयर से बढ़ाकर चार लाख 14 हजार हेक्टेयर, मसालों की खेती को 51 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर एक लाख 46 हजार हेक्टेयर और फूलों की खेती को 11 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 18 हजार हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। रोड मैप में उद्यानिकी किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और नर्सरियों के आधुनिकीकरण का भी लाभ दिलाने की रणनीति घोषित की गई है।

Jul 20, 2015

छत्तीसगढ़ की नाचा शैली को विश्व में मशहूर करने वाले

छत्तीसगढ़ की नाचा शैली को विश्व में मशहूर करने वाले

हबीब तनवीर
रंगमंच को एक नई शक्ल देने वाले प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। 1 सितंबर 192३ को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्मे हबीब को उनके बहुचर्चित नाटकों चरणदास चोर और आगरा बाजार के लिए हमेशा याद किया जाएगा जो उनके सबसे यादा लोकप्रिय और प्रभावशाली नाटक माने जाते हैं।
उनका पूरा नाम हबीब अहमद खान था ;लेकिन जब उन्होंने कविता लिखनी शुरू की तो अपना तखल्लुस तनवीर रख लिया और उसके बाद से वह हबीब तनवीर के नाम से लोगों के बीच मशहूर हो गए। उनके पिता हफीज अहमद खान पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे।
हबीब ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा रायपुर के लौरी म्युनिसिपल स्कूल से पास की थी तथा बीए नागपुर के मौरिश कालेज से किया। हबीब की एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हुई। केवल 22 साल की उम्र में वह 1945 में मुंबई चले गए जहाँ उन्होंने आकाशवाणी में काम किया। इसके बाद उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखे और कुछ में काम भी किया।
हबीब ने एक पत्रकार की हैसियत से अपने कॅरियर की शुरुआत की और रंगकर्म तथा साहित्य की अपनी यात्रा के दौरान कुछ फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखीं तथा उनमें काम भी किया।
 मुंबई में हबीब ने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ली और इप्टा का प्रमुख हिस्सा बने। एक समय ऐसा आया जब इप्टा के प्रमुख सदस्यों को ब्रिटिश राज के खिलाफ काम करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और तब इप्टा की बागडोर हबीब को सौंप दी गई। वर्ष 1954 में वह दिल्ली आ गए जहाँ उन्होंने कुदेसिया जैदी के हिन्दुस्तान थिएटर के साथ काम किया। इस दौरान वह बच्चों के थिएटर से भी जुड़े रहे और उन्होंने कई नाटक लिखे।  दिल्ली में तनवीर की मुलाकात अभिनेत्री मोनिका मिश्रा से हुई जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। यहीं उन्होंने अपना पहला महत्त्वपूर्ण नाटक आगरा बाजार किया।
हबीब साहब के नाम से मशहूर हबीब ने 1945 में ही चरणदास चोर नाम का नाटक लिखा जो कि 18वीं सदी के शायर नजीर अकबराबादी पर आधारित था। नजीर मिर्जा गालिब की पीढ़ी के शायर थे। इस नाटक के लिए उन्होंने पहली बार दिल्ली के पास ओखला गाँव में रहने वाले जामिया मिलिया इस्लामिया के विद्यार्थियों से काम करवाया और यही पहला अवसर था जब यह नाटक बंद जगह की बजाय खुले बाजार में मंचित किया गया।
1955 में तनवीर इग्लैंड गए और रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक्स आर्ट्स (राडा) में प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब उन्होंने यूरोप का दौरा करने के साथ वहाँ के थिएटर को करीब से देखा और समझा। दो साल तक यूरोप का दौरा करते रहे। इस दौरान उन्होंने नाटक से संबंधित बहुत-सी बारीकियाँ सीखीं।
अनुभवों का खजाना लेकर तनवीर 1958 में भारत लौटे और तब तक खुद को एक पूर्णकालिक निर्देशक के रूप में ढाल चुके थे। इसी समय उन्होंने शूद्रक के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक मृछकटिका पर केंद्रित नाटक मिट्टी की गाड़ी  तैयार किया। इसी दौरान नया थिएटर की नींव तैयार होने लगी थी और छत्तीसगढ़ के छह लोक कलाकारों के साथ उन्होंने 1959 में भोपाल में नया थिएटर की नींव डाली।
नया थिएटर ने भारत और विश्व रंगकर्म के मंच पर अपनी अलग छाप छोड़ी। लोक कलाकारों के साथ किए गए प्रयोग ने नया थिएटर को नवाचार के एक गरिमापूर्ण संस्थान की छवि प्रदान की। चरणदास चोर उनकी कालजयी कृति है। यह नाटक भारत सहित दुनिया में जहाँ भी हुआ, सराहना और पुरस्कार अपने साथ लाया।
हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी बोली को लेकर जो प्रयोग किया उसपर अशोक बाजपेयी कहते हैं कि-  पिछले पचास वर्ष में किसी का नाम लिया जा सकता है - जिसने छत्तीसगढ़ को अस्मिता दी, पहचान दी और छत्तीसगढ़ पर जिद करके अड़ा रहा और यह जिद सारे संसार में उन्हें ले गई तो वह हबीब तनवीर है। एक तो हिन्दी में ही नाटक करना कठिन है ऐसे में हम कभी नहीं सोचते थे एक बोली और वो भी हिन्दी की एक उपबोली में नाटक करें और उस नाटक को इस हद तक ले जाएँ , इतने बरस तक ले जाएँ- बोली जो निपट स्थानीय है और प्रभाव और लक्ष्य जो सार्वभौमिक है।  हबीब तनवीर ने एक तो पहली बार ये सिद्ध कर दिया बोली में भी समकालीन होना न केवल संभव है बल्कि बोली भी समकालीनता का ही एक संस्करण है। 
छत्तीसगढ़ की बोली को लेकर एक क्रांतिकारी काम हबीब तनवीर ने किया है जिन्होंने सिर्फ बोली ही नहीं बोली के साथ जो समूची जातीय स्मृति है, जो समूची लोक संपदा है जो उसके बिंब हैं जो उसकी मुद्राएँ है उन सबको गूंथकर कुछ ऐसा करना जो स्थानीय भी है और जो स्थानीयता से भी आगे जाता है। अधिकांश लोगों को छत्तीसगढ़ी ममझ में नहीं आती थी हिन्दी वालों को भी नहीं आती  है तो गैर हिन्दी वालों को क्या आती । लेकिन इससे उनके नाटक के प्रभाव में कभी कोई क्षति नहीं हुई कोई हानि नहीं हुई।
छत्तीसगढ़ की नाचा शैली में 1972 में किया गया उनका नाटक गाँव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद ने भी खूब वाहवाही लूटी।
हबीब साहब पहली बार विवादों में उस समय आए जब 90 के दशक में उन्होंने धार्मिक ढकोसलों पर आधारित नाटक पोंगा पंडित बनाया। उन्होंने 2006 में रवीन्द्र नाथ टैगोर के उपन्यास राज ऋ षि और नाटक विसर्जन पर आधारित फिल्म राजरक्त का निर्माण और निर्देशन किया। उन्होंने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल के साथ मिलकर नाटक चरणदास चोर  पर एक हिन्दी फिल्म का निर्माण भी करवाया जिसमें स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिका निभाई। अपने जीवन में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म गाँधी सहित कई अन्य फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया।
इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी पर भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ के नाचा का प्रयोग करते हुये गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामादकी रचना की। बाद में शयाम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।
हबीबजी के नाटक चरणदास चोर से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना। 2005 में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाक्यूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा गाँव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी सख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जाएगा।

हबीब तनवीर को 1969 में और फिर 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 1983 में पद्श्रमी और 2002 में पद्मभूषण मिला। 1972 से लेकर 1978 तक वे उच सदन रायसभा के सदस्य भी रहे। (संकलित)

Oct 20, 2014

परंपरा

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक जसगीत 
                   - संजीव तिवारी


छत्तीसगढ़ में पारंपरिक रूप में गाये जाने वाले लोकगीतों में जसगीत का अहम स्थान है। छत्तीसगढ़ का यह लोकगीत मुख्यत-  क्वाँर व चैत्र नवरात में नौ दिन तक गाया जाता है। प्राचीन काल में जब चेचक एक महामारी के रूप में पूरे गाँव में छा जाता था तब गाँवों में चेचक प्रभावित व्यक्ति के घरों में इसे गाया जाता था । आल्हा उदल के शौर्य गाथाओं एवं माता के शृंगार व माता की महिमा पर आधारित छत्तीसगढ़ के जसगीतों में अब नित नये अभिनव प्रयोग हो रहे हैं, हिंगलाज, मैहर, रतनपुर व डोंगरगढ, कोण्डागाँव एवं अन्य स्थानीय देवियों का वर्णन एवं अन्य धार्मिक प्रसंगों को इसमें जोड़ा जा रहा है, नये गायक गायिकाओं, संगीत वाद्यों को शामिल कर इसका नया प्रयोग अनावरत चालू है।
पारंपरिक रूप से माँदर, झांझ व मंजिरे के साथ गाये जाने वाला यह गीत अपने स्वरों के ऊतार चढ़ाव में ऐसी भक्ति की मादकता जगाता है जिससे सुनने वाले का रोम -रोम माता के भक्ति में विभोर हो उठता है । छत्तीसगढ़ के शौर्य का प्रतीक एवं माँ आदिशक्ति के प्रति असीम श्रद्धा को प्रदर्शित करता यह लोकगीत नसों में बहते रक्त को खौला देता है, यह आध्यात्मिक आनंद कीसी अलौकिक ऊर्जा तनमन में जगाता है ,जिससे छत्तीसगढ़ के सीधे- साधे सरल व्यक्ति की रग-रग में ओज उमड़ पडता है एवं माता के सम्मान में इस गीत के रस में लीन भक्त लोहे के बने नुकीले लम्बे तारों, त्रिशूलों से अपने जीभ, गाल व हाथों को छेद लेते हैं व जसगीत की स्वर लहरियों में थिरकते हुए 'बोलबम’ 'बोलबमकहते हुए माता के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए 'बाना चढ़ातेहैं वहीं गाँव के महामाया का पुजारी 'बैइगाआनंद से अभिभूत हो 'माता चढ़ेबम- बम बोलते लोगों को बगई के रस्सी से बने मोटे रस्से से पूरी ताकत से मारता है, शरीर में सोटे के निशान उभर पड़ते हैं पर भक्त बम बम कहते हुए आनंद में और डूबता जाता है और सोंटे का प्रहार माँदर के थाप के साथ ही गहराते जाता है ।
छत्तीसगढ़ के हर गाँव में ग्राम्या देवी के रूप में महामाया, शीतला माँ, मातादेवाला का एक नियत स्थान होता है जहाँ इन दोनों नवरात्रियों में जँवारा बोया जाता है एवं नौ दिन तक अखण्ड ज्योति जला जाती है, रात को गाँव के पुरूष एक जगह एकत्र होकर माँदर के थापों के साथ जसगीत गाते हुए महामाया, शीतला, माता देवाला मंदिर की ओर निकलते हैं -

अलिन गलिन मैं तो खोजेंव, मइया ओ मोर खोजेंव
सेऊक नइ तो पाएव, मइया ओ मोर मालनिया
मइया ओ मोर भोजलिया.........
रास्ते में माता सेवा जसगीत गाने वाले गीत के साथ जुड़ते जाते हैं, जसगीत गाने वालों का कारवाँ जस गीत गाते हुए महामाया मंदिर की ओर बढ़ता चला जाता है। शुरूआत में यह गीत मध्यम स्वर में गाया जाता है गीतों के विषय भक्तिपरक होते हैं, प्रश्नोत्तर के रूप में गीत के बोल मुखरित होते हैं -
कउने भिँगोवय मइया गेहूँवा के बिहरी
कउने जगावय नवराते हो माय......
सेऊक भिँगोवय मइया गेहूँवा के बिहरी
लंगुरे जगावय नवराते हो माय......
जसगीत के साथ दल महामाया मन्दिर पहुँचता है वहाँ माता की पूजा अर्चना की जाती हैं फिर विभिन्न गाँवों में अलग अलग प्रचलित गीतों के अनुसार पारंपरिक छत्तीसगढ़ी आरती गाई जाती है -
महामाय लेलो आरती हो माय
गढ़ हींगलाज में गढ़े हिंडोलना लख आवय लख जाय
माता लख आवय लख जाय
एक नहीं आवय लाल लंगुरवा जियरा के प्राण आधार......
जसगीत में लाल लँगुरवा यानी हनुमान जी सातो बहनिया माँ आदिशक्ति के सात रूपों के परमप्रिय भाई के रूप में जगह जगह प्रदर्शित होते हैं जहाँ माता आदि शक्ति लँगुरवा के भ्रातृ प्रेम व उसके बाल हठ को पूरा करने के लि दिल्ली के राजा जयचंद से भी युद्ध कर उसे परास्त करने का वर्णन गीतों में आता है। जसगीतों में दिल्ली व हिंगलाज के भवनों की भव्यता का भी वर्णन आता है-
कउन बसावय मइया दिल्ली ओ शहर ला, कउन बसावय हिंगलाजे हो माय
राजा जयचंद बसावय दिल्ली शहर ला, माता वो भवानी हिंगलाजे हो माय
कउने बरन हे दिल्ली वो शहर हा, कउने बरन हिंगलाजे हो माय
चंदन बरन मइया दिल्ली वो शहर हा, बंदन बरन हिंगलाजे हो माय
आरती के बाद महामाया मंदिर प्राँगण में सभी भक्त बैठकर माता का सेवा गीतों में प्रस्तुत करते हैं । सभी देवी देवताओं को आव्हान करते हुए गाते हैं - -
पहिली मय सुमरेव भइया चँदा- सुरूज ला
दुसरे में सुमरेंव आकाश हो माय......
सुमरने व न्यौता देने का यह क्रम लम्बा चलता है ज्ञात अज्ञात देवी देवताओं का आह्वान गीतों के द्वारा होता है । गीतों में ऐसे भी वाक्यों का उल्लेख आता है जब गाँवों के सभी देवी- देवताओं को सुमरने के बाद भी यदि भूल से किसी देवी को बुलाना छूट गया रहता है तो वह नाराज होती है गीतों में तीखें सवाल जवाब जाग उठते हैं - -
अरे बेंदरा बेंदरा झन कह बराइन मैं हनुमंता बीरा
मैं हनुमंता बीरा ग देव मोर मैं हनुमंता बीरा
जब सरिस के सोन के तोर गढ लंका
कलसा ला तोर फोर हॉं, समुंद्र में डुबोवैं,
कलसा ला तोरे फोर हाँ .......
भक्त अपनी श्रद्धा के फूलों से एवं भक्ति भाव से मानस पूजा प्रस्तुत करते हैं, गीतों में माता का शृंगार करते हैं ,मालिन से फूल गजरा रखवाते हैं । सातो रंगों से माता का शृंगार करते हैं - 
मइया सातो रंग सोला हो शृंगार हो माय.....
लाल लाल तोरे चुनरी महामाय लालै चोला तुम्हारे हो माय......
लाल हावै तोर माथे की टिकली लाल ध्वजा तुम्हारे हो माय....
खात पान मुख लाल बाल है सिर के सेंदूर लाल हो माय.....
मइया सातो रंग....
पुष्प की माला में मोंगरा फूल माता को अतिप्रिय है। भक्त सेउक गाता है-
हो माय के फूल गजरा, गूथौ हो मालिन के धियरी फूल गजरा
कउने माय बर गजरा कउने माय बर हार, कउने भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो शृंगार....
बूढ़ी माय बर गजरा धनईया माय बर हार, लंगुरे भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो शृंगार......
माता का मानसिक शृंगार व पूजा के गीतों के बाद सेऊक जसगीत के अन्य पहलुओं में रम जाते हैं तब जसगीत अपने चढ़ाव पर आता है माँदर के थाप उत्तेजित घ्वनि में बारंबारता बढ़ाते हैं गीत के बोल में तेजी और उत्तेजना छा जाता हैं -
अगिन शेत मुख भारत भारेव, भारेव लखन कुमारा
चंदा सुरूज दोन्नो ला भारेव, हूँ ला मैं भारे हौं हाँ
मोर लाल बराईन, तहूं ला मैं भरे हंव हाँ ....
गीतों में मस्त सेऊक भक्ति भाव में लीन हो, वाद्य यंत्रों की धुनों व गीतों में ऐसा रमता है कि वह बम- बम के घोष के साथ थिरकने लगता है, क्षेत्र में इसे देवता चना कहते हैं अर्थात् देवी स्वरूप इन पर आ जाता है । दरअसल यह ब्रह्मान्द जैसी स्थिति है ;  जहाँ भक्त माता में पूर्णतया लीन होकर नृत्य करने लगता है सेऊक ऐसी स्थिति में कई बार अपना उग्र रूप भी दिखाने लगता है तब महामाई का पुजारी सोंटे से व कोमल बाँस से बने बेंत से उन्हें पीटता है एवं माता के सामने 'हूम देवाताहै ।
भक्ति की यह रसधारा अविरल तब तक बहती है जब तक भगत थककर चूर नहीं हो जाते। सेवा समाप्ति के बाद अर्धरात्रि को जब सेऊक अपने अपने घर को जाते हैं तो माता को सोने के लि भी गीत गाते हैं -
पउढौ पउढौ मईयाँ अपने भुवन में, सेउक बिदा दे घर जाही बूढ़ी माया मोर
दसो अंगुरी से मईया बिनती करत हौं, डंडा ओ शरण लागौं पायें हो माय ......
आठ दिन की सेवा के बाद अष्टमी को संध्या 'आठेमें 'हूम हवनव पूजा अर्चना पंडित के .द्धारा विधि विधान के साथ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती के मंत्र गूँजते हैं और जस गीत की मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देती है। नवें दिन प्रात-  इसी प्रकार से तीव्र चढ़ाव जस गीत गाए जाते हैं ;जिससे कि कई भगत मगन होकर बाना, सांग चढ़ाते हैं एवं मगन होकर नाचते हैं। मंदिर से जवाँरा एवं जोत को सर पर ठाए महिलाएँ पंक्तिबद्ध होकर निकलती हैं।गाना चलते रहता है । अखण्ड ज्योति की रक्षा करने का भार बइगा का रहता है; क्योंकि पाशविक शक्ति उसे बुझाने के लि अपनी शक्ति का प्रयोग करती है ; जिसे परास्त करने के लिये बईगा बम -बम के भयंकर गर्जना के साथ नींबू चावल को मंत्रों से अभिमंत्रित कर ज्योति व जवाँरा को सिर पर लिये पंक्तिबद्ध महिलाओं के ऊपर हवा में फेंकता है व उस प्रभाव को दूर भगाता है। गीत में मस्त नाचता गाता भक्तों का कारवाँ नदी पहुँचता है ;जहाँ ज्योति व जवाँरा को विसर्जित किया जाता है । पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ सभी माता को प्रणाम कर अपने गाँव की सुख समृद्धि का वरदान माँगते हैं, सेऊक माता के बिदाई की गीत गाते हैं -
 सरा मोर सत्ती माय ओ छोड़ी के चले हो बन जाए

सरा मोर सत्ती माय वो .....

सम्पर्क:- 40, खण्डेलवाल कालोनी, दुर्ग (छ.ग.), मो. 09926615707