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Jan 1, 2024

निबन्धः क्या आपने मेरी रचना पढ़ी है?

  - हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

हमारे साहित्यिकों की एक भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो, वही गंभीर बना है, गंभीर तत्त्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ भी वह लिखता हैं, उसके विषय में निश्चित धारणा बनाए बैठा है कि वह एक क्रांतिकारी लेख है। जब आए दिन ऐसे ख्यात-अख्यात साहित्यिक मिल जाते हैं, जो छूटते ही पूछ बैठते हैं, "आप ने मेरी अमुक रचना तो पढ़ी होगी?" तो उनकी नीरस प्रवृत्ति या विनोदप्रियता का अभाव बुरी तरह प्रकट हो जाता है। एक फिलॉस्फर ने कहा है कि विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक-सा होता है। आप दुर्दांत डाकू के दिल में विनोद प्रियता भर दीजिए, वह लोकतंत्र का लीडर हो जाएगा; आप समाज-सुधार के उत्साही कार्य कर्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजैक्शन दे दीजिए, वह अख़बारनवीस हो जाएगा। और यद्यपि कठिन है, फिर भी किसी युक्ति से उदीयमान छायावादी कवि की नाड़ी में थोड़ा विनोद भर दीजिए, वह किसी फ़िल्म कंपनी का नामी अभिनेता हो जाएगा।  

एक आधुनिक चीनी फिलासफर को दिन-रात यह चिंता परेशान करती रही थी कि आख़िर प्रजातंत्र के नेताओं और डिक्टेटरों में अंतर क्या है। यदि आप सचमुच गंभीरतापूर्वक छान-बीन करें तो रूज़वेल्ट और स्टालिन में कोई मौलिक अंतर नहीं मिलेगा। या दूर की बात छोड़िए।  गाँधी और जिन्ना में कोई अंतर नहीं है ....जहाँ तक शक्ति- प्रयोग का प्रश्न है। गांधी की बात भी कांग्रेस के लिए क़ानून है और जिन्ना की बात भी मुस्लिम लीग के लिए वेद-वाक्य है। फिर भी एक डेमोक्रेट है और दूसरा डिक्टेटर। क्यों? चीनी फिलॉसफर ने चार वर्ष की निरंतर साधना के बाद आविष्कार किया कि डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है, पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं। उनको आप जहाँ भी देखें और जब भी देखें, उन की भृकुटियाँ तानी हुई हैं, मुट्ठियाँ बँधी हुई हैं, ललाट कुंचित है, अधरोष्ठ दाँतों की उपांत रेखा के समानांतर जमा हुआ है-- मानो ये अभी दुनिया को भस्म कर देना चाहते हैं। अगर इन शक्तिशाली डिक्टेटरों में हँसने का थोड़ा-सा भी माद्दा होता, तो दुनिया आज कुछ और हो गई होती।

जब-जब मैं कलकत्ते के चिड़ियाघर में गया हूँ तब-तब मुझे ऐसा लगा है कि संसार के जीवों में सबसे अधिक गंभीर और चिंतामग्न चेहरा उस चिड़िया घर में रखे हुए एक बनमानुष का है। उसको देखते ही जान पड़ता है कि संसार की समस्त वेदना को, वह हस्तामलक की भाँति देख रहा है और अपनी सुदूर पातिनि दृष्टि से इन आने-जाने वाले दर्शकों के करुण भविष्य को वह प्रत्यक्ष देख रहा है। मैंने बाद में पढ़ा है कि अफ़्रीका के हब्शियों में यह विश्वास है कि यह वनमानुष मनुष्य की बोली बोल भी सकते है और संसार के रहस्य को भली-भाँति समझ भी सकते हैं; परन्तु इस डर से बोलते नहीं कि कहीं लोग पकड़कर उन्हें ग़ुलाम न बना लें। यह बात मुझे जब तक नहीं मालूम थी, तब तक मैं समझता था कि यह कलकत्ते वाला बनमानुष ही बहुत गंभीर और तत्व-चिंतक लगता है। अब मैंने अपनी राय में संशोधन कर लिया है; वस्तुतः संसार के सभी बनमानुष गंभीर और तत्वदर्शी दिखाई देते हैं!

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि आदिम युग का मनुष्य ... जबकि वह वानरी योनि से मानवी योनि में नया-नया आया था ... कुछ इस कलकतिये बनमानुष की ही भाँति गम्भीर रहा होगा। मगर यह भी कैसे कहूँ? ज़ेब्रा और गैण्डा भी मुझे कम गंभीर नहीं लगते तथा गधे और ऊँट भी इस सूची से अलग नहीं किए जा सकते। फिर भी इनकी तुलना बनमानुष से नहीं की जा सकती। अंतत: गधे और बनमानुष की गम्भीरता में मौलिक भेद है। गधा उदास होता है और इसलिए नकारात्मक है; पर बनमानुष सोचता हुआ रहता है और इसलिए उसकी गंभीरता में कुछ तत्त्व है, कुछ सार है। गधे की गम्भीरता प्रोलितारियत की उदासी है और बनमानुष की गंभीरता वर्गवादी मनीषी की। दोनों को एक श्रेणी का नहीं कहा जा सकता।

परन्तु इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि आदि मानव कुछ गंभीर, कुछ तत्त्व चिन्तक और कुछ उदास ज़रूर था और उसकी उदासी वर्गवादी विचारक की उदासी की जाति की ही रही हो, ऐसा भी हो सकता है। सच पूछिए तो शुरू-शुरू में मनुष्य कुछ साम्यवादी ही था। हँसाना-हँसाना तब शुरू हुआ होगा जब उसने कुछ पूँजी इकट्ठी कर ली होगी और संचय के साधन जुटा लिए होंगे। मेरा निश्चित मत है कि हँसना-हँसाना पूंजीवादी मनोवृत्ति की उपज है। इस युग के हिंदी साहित्यिक जो हँसाना नापसंद करते हैं, उसका कारण शायद यह है कि वे पूंजीवादी बुर्जुआ मनोवृत्ति की मन-ही-मन घृणा करने लगे हैं। उनकी युक्ति शायद इस प्रकार है---चूँकि संसार के सभी लोग हँस नहीं सकते, इसीलिए हँसी एक गुनाह है और चूँकि संसार के सभी लोग थोड़ा बहुत रो सकते हैं, इसीलिए रोना ही वास्तविक धर्म है। फिर भी अधिकतर साहित्यिक रोते नहीं, केवल रोनी सूरत बनाए रहते हैं। जिसे थोड़ी-सी भी गणित सिखाई गई हो, वह बहुत आसानी से इस आचरण की युक्ति-युक्तता समझ सकता है। मैं समझ रहा हूँ।

यह तो स्वयंसिद्ध बात है है कि दुनिया में दुःख- सुख की अपेक्षा अधिक है अर्थात् रोदन हास्य से अधिक है। अब सारी दुनिया के रोदन को बराबर-बराबर बाँट दीजिए और हँसी को भी बराबर-बराबर बाँट दीजिए। स्पष्ट है कि सब को रोदन हास्य से ज़्यादा मिलेगा, अब रोदन में से हास्य घटा दीजिए। कुछ रोदन ही बचा रहेगा। इसका मतलब यह हुआ कि जो कुछ मिलेगा उससे फूट-फूटकर तो नहीं रोया जा सकता; पर चेहरा ज़रूर रुआँसा बना रहेगा। यह युक्ति मुझे तो ठीक जँचती है।

लेकिन युक्ति का ठीक जँचना साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में सब समय प्रमाण-स्वरूप ग्रहण नहीं किया जाता। रहस्यवादी आलोचक यह नहीं मानते कि युक्ति और तर्क ही सब कुछ है। मैंने आलोचक शब्द के विशेषण के लिए रहस्यवादी शब्द किसी को चौंका देने की मंशा से व्यवहार नहीं किया है। बहुत परिश्रम के बाद मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि हिंदी में वस्तुतः रहस्यवादी कवि हैं ही नहीं। यदि कोई रहस्यवादी कहा जा सकता है, तो वह निश्चय ही एक श्रेणी का आलोचक है। जहाँ तक हिन्दी बोलने वालों का सम्बन्ध है, रहस्यवादी साधू और फ़क़ीर तो बहुत हैं; पर वे सब साधना की दुनिया के जीव हैं, साहित्य की दुनिया में रहस्यवादी जीव यदि कोई है, तो वे निश्चय ही एक तरह के आलोचक हैं। और जब कभी मैं रहस्यवादी शब्द की बात सोचता हूँ तो काशी के भदैनी मोहल्ले की सड़क पर साधना करने वाला रहमत अली फ़क़ीर मेरे सामने ज़रूर आ जाता है। यह फ़क़ीर मन वचन और कर्म तीनों से विशुद्ध रहस्यवादी था। 'आवनिकेत' वह ज़रूर था; पर उसके बड़े-से-बड़े निन्दक को भी यह कहने में ज़रूर संकोच होगा कि वह 'स्थिरमति' भी था।

सो, मैंने एक दिन देखा कि यह रहमत अली शून्य की ओर आँखें उठाए हुए किसी अदृश्य वस्तु पर निरन्तर प्रहार कर रहा है। लात, मुक्के, घूँसे-एक, दो, तीन,.... लगातार। दर्शक तो वहाँ बहुत थे कुछ सहमे हुए, कुछ भक्तियुक्त, कुछ 'योंही से' और  गंभीर। एकाध मुस्करा भी रहे थे। इन्हें देखकर ही मुझे रहस्यवादी आलोचकों की याद आई। सारा काण्ड कुछ ऐसा अजीब था की विनोद की एक हल्की रेखा के सिवा तत्त्वज्ञान पहुँचा देने का और कोई साधन ही नहीं था। तब से जब मैं देखता हूँ कि कोई शून्य की ओर आँखें उठाए है और किसी अदृश्य वस्तु पर निरंतर प्रहार कर  रहा है, तब मुझे रहस्यवाद की याद आए बिना नहीं रहती। सो यह रहस्यवादी दल युक्ति नहीं माना करता। 'युक्ति' शब्द में ही (यूज+ति) किसी वस्तु से योग का सम्बन्ध है। और यह मान लिया गया है कि योग दृश्य वस्तु से ही स्थापित किया जा सकता है। अदृश्य के साथ योग कैसा?

आसमान में निरंतर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है और मैं निश्चित जानता हूँ कि रहस्यवादी आलोचना लिखना कुछ हँसी-खेल नहीं है। पुस्तक को छुआ तक नहीं और आलोचना ऐसी लिखी कि त्रैलोक्य विकम्पितः -यह क्या काम साधना है! आए दिन साहित्यिकों के विषय में विचार होता ही रहता है और इन विचारों पर विचार लिखने वाले बुद्धिमान लोग गम्भीर भाव से सिर हिलाकर कहते हैं-आख़िर साहित्य कहें किसे? बहसें होती हैं, अख़बार रँगे जाते है, मेरे जैसे आलसी आदमी भी चिंतित हो जाते हैं और अंत में सोचता हूँ कि 'साहित्यिक' तो साहित्य के सम्बन्धी को ही कहते हैं न? सो सम्बन्ध तो कई तरह के हैं। बादनारायण एक है। आपके घर अगर बेर का फल है, मेरे घर बेर के पेड़, तो इस सम्बन्ध को पुराने पंडित 'बादनारायण' सम्बन्ध कहेंगे। साहित्य से सम्बन्ध रखने वाले जीव पाँच प्रकार के हैं-लेखक, पाठक, सम्पादक, प्रकाशक और आलोचक। सबके क्षेत्र अलग-अलग हैं। पढ़नेवाला आलोचना नहीं करता, आलोचना करने वाला पढ़ता नहीं---यही तो उचित नाता है। एक ही आदमी पढ़े भी और लिखे भी, या पढ़े भी और आलोचना भी करे या लिखे भी और इत्यादि-इत्यादि, तो साहित्य में अराजकता फैल जाय। इसीलिए जब एक लेखक दूसरे लेखक से पूछता है कि आपने मेरी अमुक रचना पढ़ी है, तब जी में आता है कि कह दूँ, “डाक्टर के पास जाओ। तुम्हारे दिमाग़ में कुछ दोष है”; पर डॉक्टर क्या करेगा? विनोद का इंजैक्शन किसी फैक्टरी ने अभी तक तैयार नहीं किया। इसीलिए, मुस्कराकर चुप लगा जाता हूँ। मेरे एक होमियोपैथ मित्र का दृढ़ मत है कि विनोद की कमी दूर करने के लिये कोई इंजैक्शन तैयार किया जा सकता है। वे इस बात का प्रयत्न भी कर रहे हैं कि किसी हँसोड़ की छाया किसी तरह अल्कोहल में घुलाकर उस पर से विनोद की दवा तैयार करें और चिकित्सा की और साहित्य की दुनिया में एक ही साथ शान्ति कर दें। पर वह अभी प्रयोगावस्था में ही हैं। तब तक मुझे भी सब सहना पड़ेगा और सहे भी जा रहा हूँ। ■

(डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी उत्कृष्ठ  समालोचक,  मौलिक निबंधकार एवं सांस्कृतिक विचारधारा के उपन्यासकार थे)


Feb 1, 2022

निबंध - वसंत आ गया है

 - हजारी प्रसाद द्विवेदी

(यह निबन्ध उस समय लिखा गया है जब द्विवेदी जी ‘शांति निकेतन’ में निवास करते थे।)

जिस स्थान पर बैठकर लिख रहा हूँ, उसके आस-पास कुछ थोड़े-से पेड़ हैं। एक शिरीष हैं, जिस पर लंबी-लंबी सुखी छिमियाँ अभी लटकी हुई हैं। पत्ते कुछ झड़ गए हैं और कुछ झडऩे के रास्ते में हैं। जरा-सी हवा चली नहीं कि अस्थिमालिकावाले उन्मत्त कापालिक भौरव की भाँति खडख़ड़ाकर झूम उठते हैं। ‘कुसुम जन्म ततो नव पल्लवा:’ का कहीं नाम-गन्ध भी नहीं है। एक नीम है। जवान है, मगर कुछ अत्यन्त छोटी किसलयिकाओं के सिवा उमंग का कोई चिह्न उसमें भी नहीं है। फिर भी यह बुरा मालूम नहीं होता।

मसें भीगी हैं और आशा तो है ही। दो कृष्णचूड़ाएँ हैं। स्वर्गीय कविवर रवीन्द्रनाथ के हाथ से लगी वृक्षावली में यह आखिरी हैं। इन्हें अभी शिशु ही कहना चाहिए। फूल तो इनमें कभी आए नहीं, पर वे अभी नादान हैं। भरे फाल्गुन में इस प्रकार खड़ी हैं मानों आषाढ़ ही हो। नील मसूण पत्तियाँ ओर सूच्यग्र शिखांत। दो-तीन अमरूद हैं, जो सूखे सावन भरे भादो कभी रंग नहीं बदलते—इस समय दो-चार श्वेद पुष्प इन पर विराजमान हैं; पर ऐसे फूल माघ में भी थे और जेठ में भी रहेंगे। जातीय पुष्पों का एक केदार है; पर इन पर ऐसी मुर्दनी छाई हुई है कि मुझे कवि- प्रसिद्धियों पर लिखे हुए एक लेख में संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई है।

एक मित्र ने अस्थान में एक मल्लिका का गुल्म भी लगा रखा है, जो किसी प्रकार बस जी रहा है। दो करबीर और एक कोविदार के झाड़ भी उन्हीं मित्र की कृपा के फल हैं, पर वे बुरी तरह चुप हैं। कहाँ भी उल्लास नहीं, उमंग नहीं और उधर कवियों की दुनिया में हल्ला हो गया, प्रकृति रानी नया शृंगार कर रही है, और फिर जाने क्या-क्या। कवि के आश्रम में रहता हूँ। नितांत ठूँठ नहीं हूँ; पर भाग्य प्रसन्न न हो तो कोई क्या करे?

दो कांचनार वृक्ष इस हिन्दी भवन में हैं। एक ठीक मेरे दरवाजे पर और दूसरा मेरे पड़ोसी के। भाग्य की विडम्बना देखिए कि दोनों एक ही दिन के लगाए गए हैं। मेरा वाला ज्यादा स्वस्थ और सबल है। पड़ोसी वाला कमजोर, मरियल। परन्तु इसमें फूल नहीं आए। और वह कम्बख्त कन्धे पर से फूल पड़ा। मरियल-सा पेड़ है, पर क्या मजाल कि आप उसमें फूल के सिवा और कुछ देखें! पत्ते हैं नहीं और टहनियाँ फूलों से ढक गई हैं।

मैं रोज देखता हूँ कि हमारे वाले मियाँ कितने अग्रसर हुए?  कल तीन फूल निकले थे। उसमें दो तो एक संथाल बालिका तोड़कर ले गई। एक रह गया। मुझे कांचनार फूल की ललाई बहुत भाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन फूलों की पकौडिय़ाँ भी बन सकती हैं। पर दुर्भाग्य देखिए कि इतना स्वस्थ पेड़ ऐसा सुना पड़ा हुआ है और वह कमजोर, दुबला लहक उठा! कमजोर में भावुकता ज्यादा होती होगी!

पढ़ता-लिखता हूँ। यही पेशा है। सो दुनिया के बारे में पोथियों के सहारे ही थोड़ा-बहुत जानता हूँ। पढ़ा हूँ, हिन्दुस्तान के जवानों में कोई उमंग नहीं है, इत्यादि-इत्यादि। इधर देखता हूँ कि पेड़-पौधे और भी बुरे हैं। सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसंत आ गया। पर इन कमबख्तों को खबर ही नहीं। कभी-कभी सोचता हूँ कि इनके पास तक सन्देश पहुँचाने का क्या कोई साधन नहीं हो सकता?

महुआ बदनाम है कि उसे सबके बाद वसंत का अनुभव होता है; पर जामुन कौन अच्छा है। वह तो और भी बाद में फूलता है। और कालिदास का लाडला यह कर्णिकार? आप जेठ में मौज में आते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि वसंत भागता-भागता चलता है। देश में नहीं, काल में। किसी का वसंत पन्द्रह दिन का है तो किसी का नौ महीने का। मौजी है अमरूद। बारह महीने इसका वसंत ही वसंत है। हिन्दी भवन के सामने गंधराज  पुष्पों की पाँत है। ये अजीब है, वर्षा में ये खिलते हैं लेकिन ऋतु विशेष के उतने कायल नहीं हैं। पानी पड़ गया तो आज भी फूल ले सकते हैं।

कवियों की दुनिया में जिसका कभी चर्चा नहीं हुई, ऐसी एक घास है- विष्णुकान्ता। हिन्दी भवन के आँगन में बहुत है। कैसा मनोहर नाम है! फूल और भी मनोहर होते हैं। जरा-सा तो आकार होता है, पर बलिहारी है उस नील में मेदुर रूप की। बादल की बात छोडि़ए, जरा-सी पुरवैया बह गई तो इसका उल्लास देखिए। बरसात के समय तो इतनी खिलती है कि मत पूछिए। मैं सोचता हूँ कि इस नाचीज लता को सन्देश कैसे पहुँचता है? थोड़ी दूर पर वह पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है। मगर उसे किसने बताया कि वसंत आ गया है? मैं थोड़ा-थोड़ा समझता हूँ। वसंत आता नहीं, ले आया जाता है। जो चाहे और जब चाहे अपने पर ले आ सकता। वह मरियल कांचनार ले आया है। अपने मोटेराम तैयार कर रहे हैं, और मैं?

मुझे बुखार आ रहा है। यह भी नियति का मजाक ही है। सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसन्त आ रहा है, और मेरे पास आया बुखार। अपने कांचनार की ओर देखता हूँ और सोचता हूँ, मेरी वजह से तो यह नहीं रुका है

Nov 1, 2021

ललित निबंधः आलोक पर्व की ज्योतिर्मयी देवी लक्ष्मी

-हजारी प्रसाद द्विवेदी

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आद्याशक्ति महालक्ष्मी है। वह सत्व, सज और तम तीनों गुणों का मूल समवाय है। वही आद्याशक्ति है। वह समस्त विश्व में व्याप्त होकर विराजमान है। वह लक्ष्य और अलक्ष्य, इन दो रूपों में रहती है। लक्ष्य रूप में यह चराचर जगत ही उसका स्वरूप है और-अलक्ष्य रूप में यह समस्त जगत् की सृष्टि का मूल कारण है। उसी से विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। दीपावली को इसी महालक्ष्मी का पूजन होता है। तामसिक रूप में वह क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, कालरात्रि, महामारी के रूप में अभिव्यक्ति होती है, राजसिक रूप में वह जगत् का भरण-पोषण करने वाली ‘श्री’ के रूप में उन लोगों के घर में आती है, जिन्होंने पूर्व-जन्म में शुभ कर्म किए होते हैं, परन्तु यदि इस जन्म में उनकी वृत्ति पाप की ओर जाती है, तो वह भयंकर अलक्ष्मी बन जाती है। सात्त्विक रूप में वह महाविद्या, महावाणी भारती वाक् सरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होती है। मूल आद्याशक्ति ही महालक्ष्मी है।

शास्त्रों में भी ऐसे वचन मिल जाते हैं, जिनमें महाकाली या महासरस्वती को ही आद्याशक्ति कहा गया है। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की पद्धति से परिचित नहीं होते, वे साधारणतः इस प्रकार की बातों को देखकर कह उठते हैं कि यह ‘बहुदेववाद’ है। यूरोपियन पंडितों ने इसके लिए ‘पालिथीज़्म’ शब्द का प्रयोग किया है। पालिथीज़्म या बहुदेववाद से एक ऐसे धर्म का बोध होता है, जिसमें अनेक छोटे-देवताओं की मण्डली में विश्वास किया जाता है। इन देवताओं की मर्यादा और अधिकार निश्चित होते हैं। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की थोड़ी भी गहराई में जाना आवश्यक समझते हैं, वे इस बात को कभी नहीं स्वीकार कर सकते। मैक्समूलर ने बहुत पहले बताया था कि वेदों में पाया जानेवाला ‘बहुदेववाद’ वस्तुतः बहुदेववाद है ही नहीं, क्योंकि न तो वह ग्रीक-रोमन बहुदेववाद के समान है, जिसमें बहुत-से देव-देवी एक महादेवता के अधीन होते हैं और न अफ्रीका आदि देशों की आदिम जातियों में पाए जानेवाले बहुदेववाद के समान है, जिसमें छोटे-मोटे अनेक देवता स्वतन्त्र होते हैं। मैक्समूलर ने इस विश्वास के लिए एक शब्द सुझाया था- हेनोथीज्म, जिसे हिन्दी में ‘एकैकदेववाद’ शब्द से कुछ-कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के धार्मिक विश्वास में अनेक देवता की उपासना होती अवश्य है, पर जिस देवता की उपासना चलती रहती है, उसे ही सारे देवताओं से श्रेष्ठ और सबका हेतुभूत माना जाता है। जैसे जब इन्द्र की उपासना का प्रसंग होगा, तो कहा जाएगा कि इन्द्र ही आदि देव हैं, वरुण, यम, सूर्य, चन्द्र, अग्नि सबका वह स्वामी है और सबका मूलभूत है। पर जब अग्नि की उपासना का प्रसंग होगा तो कहा जायेगा कि अग्नि ही मुख्य देवता है और इन्द्र, वरुण आदि का स्वामी है और सबका मूलभूत देवता है, इत्यादि।

परन्तु थोड़ी और गहराई में जाकर देखा जाये तो इसका स्पष्ट रूप अद्वैतवाद है। एक ही देवता है, जो विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। उपासना के समय उसके जिस विशिष्ट रूप का ध्यान किया जाता है, वही समस्त अन्य रूपों में मुख्य और आदिभूत माना जाता है। इसका रहस्य यह है कि साधक सदा मूल अद्वैत सत्ता के प्रति सजग रहता है। अपनी रुचि और संस्कारों और कभी-कभी प्रयोजन के अनुसार वह उपास्य के विशिष्ट रूप की उपासना अवश्य करता है, परन्तु शास्त्र उसे कभी भूलने नहीं देना चाहता कि रूप कोई हो, है वह मूल अद्वैत सत्ता की ही अभिव्यक्ति। इस प्रकार हिन्दू शास्त्रों की इस पद्धति का रहस्य यही है कि उपास्य वस्तुतः मूल अद्वैत सत्ता का ही रूप है। इसी बात को और भी स्पष्ट करके वैदिक ऋषि ने कहा था कि जो देवता अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी महादेव को मैं प्रणाम करता हूँ!

आज से कोई दो हज़ार वर्ष पहले से इस देश के धार्मिक साहित्य में और शिल्प और कला में यह विश्वास मुखर हो उठा है कि उपास्य, वस्तुतः देवता की शक्ति होती है। यह नहीं है कि यह विचार नया है, पहले था ही नहीं, पर उपलब्ध धार्मिक साहित्य और शिल्प और कला-सामग्री में यह बात इस समय से अधिक व्यापक रूप में और अत्यधिक मुखर भाव से प्रकट हुई दिखती है। इस विश्वास का सबसे बड़ा आवश्यक अंग यह है कि शक्ति और शक्तिमान् में कोई तात्विक भेद नहीं है, दोनों एक हैं।

चन्द्रमा और चन्द्रिका की भाँति वे अलग-अलग प्रतीत होकर भी तत्त्वतः एक हैं-अन्तर नैव जानी मश्चन्द्र-चन्द्रिकयोरिव। परन्तु उपास्य शक्ति ही है। जो लोग इस विश्वास को अपनी तर्कसम्मत सीमा तक खींचकर ले जाते हैं, वे शक्त कहलाते हैं। जो शक्ति और शक्तिमान् के एकत्व पर अधिक ज़ोर देते हैं, वे शाक्त नहीं कहलाते। मगर कहलाते हों या न कहलाते हों, शक्ति की उपास्यता पर विश्वास दोनों का है। जिन लोगों ने संसार की भरण-पोषण करनेवाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम ‘महालक्ष्मी’ स्वीकार किया है। दीपावली के पुण्य-पर्व पर इसी आद्याशक्ति की पूजा होती है। देश के पूर्वी हिस्सों में इस दिन महाकाली की पूजा होती है। दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। केवल रुचि और संस्कार के अनुसार आद्याशक्ति के विशिष्ट रूपों पर बल दिया जाता है। पूजा आद्याशक्ति की ही होती है। मुझे यह ठीक-ठीक नहीं मालूम कि देश के किसी कोने में इस दिन महासरस्वती की पूजा होती है या नहीं। होती हो, तो कुछ अचरज की बात नहीं होगी। दीपावली का पर्व आद्याशक्ति के विभिन्न रूपों के स्मरण का दिन है।

यह सारा दृश्यमान जगत् ज्ञान,इच्छा और क्रिया के रूप में त्रिटुपीकृत है। ब्रह्म की मूल शक्ति में इन तीनों का सूक्ष्म रूप में अवस्थान होगा। त्रिपुटीकृत जगत की मूल कारणभूता इस शक्ति को ‘त्रिपुरा’ भी कहा जाता है। आरम्भ में जिसे महालक्ष्मी कहा गया है उससे यह अभिन्न है। ज्ञान रूप में अभिव्यक्त होने पर सत्त्वगुणप्रधान सरस्वती के रूप में

, इच्छा रूप में रजोगुण प्रधान लक्ष्मी के रुप में और क्रिया रुप में तमोगुण-प्रधान काली के रुप में उपास्य होती है। लक्ष्मी इच्छा रूप में अभिव्यक्त होती है। जो साधक लक्ष्मी रूप में आद्याशक्ति की उपासना करते हैं, उनके चित्त में इच्छा तत्त्व की प्रधानता होती है, पर बाकी दो तत्त्व-ज्ञान और क्रिया-भी उसमें सहायक होते हैं। इसीलिए लक्ष्मी की उपासना ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापरा’ होती है, अर्थात् वह ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित इच्छा-शक्ति की उपासना होती है। ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापरा’ का मतलब है कि यद्यपि इच्छा-शक्ति ही मुख्यतया उपास्य है, पर पहले ज्ञान की सहायता और बाद में क्रिया का समर्थन इसमें आवश्यक है। यदि उल्टा हो जाये, अर्थात् इच्छा शक्ति की उपासना क्रियापूर्वा और ज्ञानपरा हो जाए, तो उपासना का रूप बदल जाता है। पहली अवस्था में उपास्या लक्ष्मी समस्त जगत् के उपकार के लिए होती है। उस लक्ष्मी का वाहन गरुड़ होता है। गरुड़ शक्ति, वेग और सेवावृत्ति का प्रतीक है। दूसरी अवस्था में उसका वाहन उल्लू होता है। उल्लू स्वार्थ, अन्धकारप्रियता और विच्छिन्नता का प्रतीक है।

लक्ष्मी तभी उपास्य होकर भक्त को ठीक-ठीक कृतकृत्य करती है। तब उसके चित्त में सबके कल्याण की कामना रहती है। यदि केवल अपना स्वार्थ ही साधक के चित्त में प्रधान हो, तो वह उलूकवाहिनी शक्ति की ही कृपा पा सकता है। फिर तो वह तमोगुण का शिकार हो जाता है। उसकी उपासना लोकल्याण-मार्ग से विच्छिन्न होकर बन्ध्या हो जाती है। दीपावली प्रकाश का पर्व है। इस दिन जिस लक्ष्मी की पूजा होती है, वह गरुड़वाहिनी है-शक्ति, सेवा और गतिशीलता उसके मुख्य गुण हैं। प्रकाश और अन्धकार का नियत विरोध है। अमावस्या की रात को प्रयत्नपूर्वक लाख-लाख प्रदीपों को जलाकर हम लक्ष्मी के उलूकवाहिनी रूप की नहीं, गरुड़वाहिनी रूप की उपासना करते हैं। हम अन्धकार का, समाज से कटकर रहने का, स्वार्थपरता का प्रयत्नपूर्वक प्रत्याख्यान करते हैं और प्रकाश का, सामाजिकता का और सेवावृत्ति का आह्वान करते हैं। हमें भूलना न चाहिए कि यह उपासना ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित होकर ही सार्थक होती है...