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Apr 1, 2026

लघुकथाः मकड़ी

  - डॉ. सुषमा गुप्ता

उसने अखबार से नज़र उठाई। पहले मरी हुई मकड़ी को देखा फिर मुझे। वो भी घूरकर।

 मैंने सकपकाकर सफाई दी, “मुझे हत्या नहीं करनी थी। इसकी हत्या का मेरा कोई इरादा भी नहीं था; पर मैं डरी हुई थी। यह मकड़ी मेरे बिस्तर के बहुत पास थी। मुझे मकड़ी से डर लगता है।”

“मकड़ी तुमसे ताकतवर थी?”

“अरे नहीं! कमज़ोर-सी थी। एकदम ज़रा- सी।”

मेरी इस बात पर उसने व्यंग्य- भरी मुस्कान के साथ मुझे देखते हुए कहा, “यह कितनी विरोधाभासी बात है। वह तुमसे कमज़ोर थी और तुम्हें उससे डर लग रहा था!” 

मेरी पेशानी पर कुछ बल उभर आए। मैंने ऊहापोह से कहा, “उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी…शायद…”

उसने गहरी साँस छोड़ते हुए हाथ का अखबार नीचे पटक दिया और बेहद निराश होकर कहा, “डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं।”

मेरी नज़र अख़बार की हैडलाइन पर अटक गई।

“भ्रष्टाचार के विरोध में रैली निकालते, यूनिवर्सिटी के छात्रों पर प्रशासन ने निर्ममता से लाठियाँ भाँजी।” ■

327suumi@gmail.com

May 2, 2025

दो लघुकथाः

- डॉ. सुषमा गुप्ता

1. संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण

2 मार्च 2021

पिताजी बहुत बीमार हैं। आप सभी की दुआओं की बहुत ज़रूरत है।

(अस्पताल में लेटे बीमार पिता जी की फोटो के साथ उसने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया।)

3 मार्च 2021

पिताजी की हालत लगातार बिगड़ रही है। तन, मन,धन से जितना कर सकता हूँ, सब कर रहा हूँ।”

(इस बार उसने अपने थके निराश चेहरे की फोटो के साथ स्टेटस अपडेट किया।)

5 मार्च 2021

पिताजी नहीं रहे। मैं अपनी सब कोशिशें करके भी हार गया। मेरा संसार लुट गया।

(श्मशान से पिता की चिता के आगे अपने आँसुओं से भरे चेहरे के साथ उसने स्टेटस एक बार फिर अपडेट किया)

16 मार्च 2021

पिताजी की आत्मा की शांति के लिए बहुत बड़ी पूजा रखी और 51 पंडितों को भोज कराया।

(हार चढ़ी पिताजी की फोटो के सामने कुछ पंडित खाना खा रहे हैं और उन्हें खुद खाना परोसते हुए की फोटो के साथ इस बार का स्टेटस अपडेट हुआ।)

शाम ढले वह अपनी प्रोफाइल पर आए ढेरों कमेंट पढ़ रहा था, जिनमें उसे एक बेहद संवेदनशील आज्ञाकारी बेटे के खिताबों से नवाज़ा गया था।

साथ वाले कमरे में माँ खाँस-खाँस के दोहरी होती हुई अब भी इंतज़ार कर रही है कि बेटा खत्म हुई दवाइयाँ फिर से कब लाकर देगा। पति के खाली बिस्तर की तरफ देखते हुए उसकी आँखें भीग गई हैं।

काँपती आवाज़ में माँ ने बेटे को आवाज़ दी, दवाइयों की गुहार की। बेटे ने मुँह बनाया और झिड़कते हुए कहा-“बहुत व्यस्त हूँ मैं। पापा के मरने के बाद जो इतना तामझाम फैला है अभी वह तो समेट लूँ। समय मिलता है तो लाकर दूँगा।”

कहकर एक बार फिर से वह फोन में व्यस्त हो गया। पाँच मिनट में नया स्टेटस अपडेट हुआ।

“पिताजी के बाद अब माँ की हालत बिगड़ने लगी है। हे ईश्वर! मुझ पर रहम करो। मुझ में अब, और खोने की शक्ति नहीं बची है।”

2. ज़िंदा 

    का 

   बोझ

वह शराब के नशे में धुत जब भी घर आता ज़ोर से चिल्लाता, “अरी कहाँ मर गई?”

भागती-सी गुलाबो जाती और कमरे का दरवाज़ा बंद हो जाता।

बहुत बड़ा नाम था पीर साहब का पूरे इलाके में । लोगों ने अल्लाह का दर्ज़ा तक दे डाला था और गुलाबो को पीर रानी का। पीर साहब वैसे तो डेरे पर ही रहते थे पर महीने में दो-चार बार घर भी आ जाते। जिस रात वह घर आते, बच्चियों को रात भर, रह-रह के कमरे से माँ की दर्दनाक चीखें सुनाई देती। अगले दिन माँ के शरीर पर ज़ख्म दिखते तो बच्चियाँ अपनी उम्र के हिसाब से सवाल पूछती और गुलाबो उनकी उम्र के हिसाब से ही जवाब देकर उन्हें समझा भी देती।

आज गुलाबो को सुबह से ही तेज़ बुखार था। रात गए फिर पीर साहब की गरज सुनाई दी, “गुलाबो......”

तेरह साल की जूही भागकर गई, “जी बाबा”

पीर साहब ने उसे पर ऊपर से नीचे तक भरपूर नज़र डाली फिर बेहद प्यार से बोले,

“अरे तू इतनी बड़ी कब हो गई? आ ...अंदर आ.. बैठ मेरे पास।”

दरवाजा फिर बंद होने ही वाला था कि गुलाबो दौड़ती हाँफती पहुँची। पल भर में सब समझ गई। खींचकर जूही को कमरे से बाहर कर दिया और ख़ुद अंदर होकर दरवाज़ा बंद कर लिया। पीर साहब का चिल्लाना और माँ की दर्दनाक चीखें बाहर तक सुनाई देने लगी। अचानक चीखों का स्वर बदल गया।

सुबह दालान में ज़माने भर का मजमा लगा था। पीर साहब नहीं रहे। पीर रानी की सबसे विश्वस्त नौकरानी ने सबको खबर पहुँचाई , कोई लूट के इरादे से घर में घुसा और हाथापाई में पीर साहब का गला रेत गया।

लोगों ने ख़ूब कोसा उस अनजान लुटेरे को। दोज़ख रसीद करने की बद्दुआएँ दे डालीं। औरतों के झुंड के झुंड आ रहे थे। खूब प्रलाप हो रहा था ।

छाती-पीटती अम्मा बोली, “हाय गुलाबो! कैसे उठाएगी तू बेवा होने का बोझ!”

गुलाबो मन ही मन बुदबुदाई....“इसके तो ज़िंदा का बोझ ज़्यादा था अम्मा। इसकी लाश में बोझ कहाँ ... ”   ■

Sep 1, 2024

तीन लघुकथाएँ

 - डॉ. सुषमा गुप्ता       

1-भेड़ें 

“चल कम्मो”

“कहाँ ?”

“बाबा जी के डेरे।”

“क्यों?”

“माथा टेकना है।”

“क्यों ?”

“अरे सब टेक रहे हैं।”

“क्यों ?”

“अरे इतने लोग टेक रहे हैं। बाबा जी बहुत पहुँचे हुए होंगे तभी तो न”, शानो जोर देकर बोली।

“अरी हाँ कम्मो। बाबा जी के चरण छूके मेरी नंद के इस साल लड़का हुआ।” शान्ता ने मोहर लगाई।

“अरे! मेरे तो जेठ का लकवा ठीक हो गया उनके दर्शन से”, रजनी ने भी खूब पुलिंदा बाँधा ।

“हैं! सही में ! खूब तेज होगा बाबा जी में फिर तो! चलो-चलो मैं भी चलती हूँ। ऐसे संत पुरुष के दर्शन से तो जन्म धन्य हो जाएगा।”

यूँ ही पचास औरतें और पीछे हो ली।

थोड़ी देर बाद डेरे के पब्लिसिटी डिपार्टमेंट से अपनी-अपनी पेमेंट लेकर शानो, शान्ता, रजनी तीनों चलती बनी।

बाबा जी की जय-जयकार दूर-दूर तक गूँज रही था।

2- कैमिस्ट्री

“कल मेरी कमर में बहुत दर्द था। “मोहनदास पटरी पर बैठे, रामदीन मोची से अपना जूता ठीक करवाते हुए उससे बोले।

“चमड़ा कितना महँगा हो गया है” रामदीन ने जूता सिलते हुए कहा।

“सुबह मुझे दफ्तर जाना है पैंशन लेने । लाइन बहुत लम्बी होगी। रामदीन इतने दर्द में मैं कैसे खड़ा रह पाऊँगा?” मोहनदास बाबू ने अपनी व्यथा सुनाई।

“ये जूते अब और ज्यादा ठीक नहीं हो सकते। तला बिल्कुल घिस चुका है” रामदीन सपाट स्वर में बोला।

“मेरी तो पिंडलियाँ भी सूज जाती है बहुत देर खड़े रहने से। तुझे पता है बैठने को भी कुछ नहीं होता है वहाँ ।”

“अबकी तो जैसे-तैसे ठीक कर दिए हैं पर अब नए ले लो।”

“हम्मम..” पैसे पकड़ा कर मोहनदास घर की तरफ चल दिए।

घर का गेट मोची की दुकान से साफ दिखता था।

बाहर खड़ी बहू ने उन्हें घूरकर देखा और मुँह बनाकर भीतर चली गई। वे वहीं बरामदे में अखबार लेकर बैठ गए ।

“आप मना क्यों नहीं करते बाबू जी को।

रोज़ किसी न किसी फ़िजूल कारण से रामदीन मोची की दुकान पर जा बैठते हैं। शोभा देता है क्या इस उम्र में यूँ रात-दिन छोटे लोगों में संगत करना।”

“सीमा बेकार हंगामा न करो। बाबूजी रिटायर हो चुके है, तो काम तो कुछ वैसे भी नहीं है । माँ के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं । अब तुम और मैं तो दफ्तर चले जाते हैं तो समय काटने उसी से बतिया आते है।”

“समय काटने को ये मोची ही रह गया । पार्क भी तो जा सकते है”, वह तमातमाकर बोली।

“हाँ जा तो सकते है , पर इस उम्र में अब आदत तो छूटने से रही।”

“आदत? मतलब? मोची से बात करने की आदत!”

“अरे मोची से नहीं माँ से। माँ तुम्हारे आने से पहले चल बसी तो तुमने माँ बाबूजी की कैमिस्ट्री नहीं देखी। पापा अपना सारे दिन का लेखा-जोखा रोज़ दफ्तर से आकर माँ को सुनाते थे और माँ अपनी धुन में घर के दुखड़े सुनाती रहती। दोनों की बातों में कोई ताल-मेल न होता। फिर भी अनवरत लगे रहते दोनों अपनी-अपनी समस्याएँ सुनाने में। सो वही सुकून अब बाबू जी को रामदीन के पास मिलता है। दुनिया में कहीं कुछ हो रहा हो। वह अपनी जूतों की दुनिया में मस्त रहता है।”

सीमा ने एक नज़र बरामदे में बैठे बाबू जी को देखा फिर गेट से दिखते रामदीन पर नज़र गई।

बैठक में लगी अपनी सास की बड़ी सी तस्वीर की तरफ़ देख मुस्कुराकर बुदबुदाई- “वाह! कैमिस्ट्री हो तो ऐसी।”

3- दरकती उम्मीद

“बाबा मुझे और भी मरीज देखने हैं , खाना खा लीजिए ।”

“नहीं खाना मुझे । पहले मेरे घरवालों से मेरी बात करवाओ”

“अरे बाबा, कितनी बार बोलूँ, आपके घर पर कोई फोन नहीं उठा रहा। ये रखा है खाना । जब खाना हो, आवाज लगा देना।” ये कह कर नर्स गुस्से में झुँझलाती दूसरे मरीज की तरफ बढ़ गई।

बाबा की आँखें छलक आईं।

आशा सब चुपचाप देख रही थी। उन‌ बुज़ुर्ग के साथ वाले बैड पर उसकी सासु माँ थी। आशा से बाबा की छलकती आँखें देखी न गई।

वह बेहद प्यार से बोली, “ बाबा आपका कसूर नहीं है। ये अस्पताल वाले इतना बेस्वाद खाना देते है कि स्वस्थ भी बीमार पड़ जाएँ। “

आशा उन्हें हँसाने के इरादे से बोली और फिर खूब सारे झूठे-सच्चे किस्से सुना कर उन्हें खाना खिला ही दिया। वह बाबा इतने बुज़ुर्ग थे कि अपने काँपते हाथों से खुद खाने में असमर्थ थे।

“बिटिया ये मेरी, मेरे घर बात नहीं करा रहे। आज मेरे पोते का जन्मदिन है। वह मेरे फ़ोन का इंतज़ार कर रहा होगा। तुम बात करा दोगी?” उन्होंने बेहद कातर स्वर में कहा।

“जी बाबा ज़रूर,  नम्बर बोलिए ?”

“वह तो बिटिया याद नहीं ।” उन्होंने काँपती आवाज में कहा ।

“कोई बात नहीं बाबा, मैं नर्स से लेकर आती हूँ।”

आशा ने वार्ड की रिसेप्शन पर जाकर पूछा

“सिस्टर, बैड नम्बर दस के मरीज के घर का फोन नम्बर दे दीजिए।”

“अरे मैडम कोई फ़ायदा नहीं होगा फ़ोन मिलाकर। हम बात कर चुके हैं।‌ इनका सपुत्र ...अपने सुपुत्र के जन्मदिन की पार्टी मना रहा है । आज इनका डिस्चार्ज था। उसने कह दिया कि एक दिन का एक्स्ट्रा बिल भर देंगे; पर आज समय नहीं है उनके पास, इन्हें ले जाने का। इसलिए इनसे बात भी करने से मना कर दिया उन्होंने कि फिर आज ही जाने की जिद करेंगे।”

स्तब्ध आशा ने बाबा को मुड़कर देखा‌। वे बड़ी उम्मीद से उसी की तरफ देख रहे थे। आशा ने हताशा से आँखें मूँद लीं।   ■

Aug 1, 2024

कविताः शहीद

  -  डॉ. सुषमा गुप्ता







हमारे देश के सच्चे

 जाँबाजों के परिवारों 

के नाम ...

दो दिन हल्ला मचाके 

सब भूल जाएँगे.. 

दर्द क्या है 

उस बेवा से पूछो जिसकी

आँखों से अब सावन न जाएँगे ।

चार दिन शहीद शहीदी के 

सब नारे लगाएँगे... 

इंतजार क्या है

उन बच्चों से पूछो

 जिनके खिलौने अब न आएँगे।

अखबारों में बड़े दावे 

टीवी पे चर्चाएँ कराएँगे...

सूनापन उन माँ बाप से पूछो 

जो रुख़सती पे अब कंधा न पाएँगे ।

दो मुल्कों की सियासत में 

इनके नाम आएँगे ...

पर किसी को भी नहीं परवाह 

ये उजड़े घर 

कभी न मुस्कुराएँगे ...

कभी न मुस्कुराएँगे ।

सम्पर्कः 327/सेक्टर 16A, फरीदाबाद-121002 (हरियाणा) , ई मेल : 327suumi@gmail.com

Jan 1, 2023

तीन लघुकथाएँ- 1. वर्तमान का दंश, 2. खूबसूरत, 3, पहेली

  -  डॉ . सुषमा गुप्ता

1. वर्तमान का दंश

"और हीरो! क्या चल रहा है लाइफ में?"कईं सालों बाद मुम्बई से दिल्ली अपने छोटे भाई के घर आए रामनाथ जी ने अपने सत्रह साल के भतीजे से पूछा।

"कुछ खास नहीं ताऊजी, बस आई.आई.टी की तैयारी कर रहा हूँ।"

"अरे पढ़ाई वढ़ाई तो चलती रहती है। तू तो ये बता तेरी गर्लफ्रैंड्स कितनी है?"

उन्होंने हँसते हुए पूछा।

"अरे क्या ताऊजी, आप भी न। मैं नहीं पड़ता इन चक्करों में।"

"हट! ज़िन्दगी खराब है तेरी फिर। अबे जवानी में ये सब नहीं करेगा तो बुढ़ापे में करेगा क्या। पूछ अपने बाप से

 स्कूल कॉलेज में कैसे लड़कियों की लाइन लगती थी मेरे पीछे। साले घर की इज्जत का तो ख्याल रख।"

रामनाथ जी ज़ोर से हँसते हुए बोले।

"मुझे है न ख्याल घर की इज्जत का ताऊजी।"-बाहर से आती मिताली बोली।

"क्या मतलब?"

"मतलब ये, मेरे है न खूब सारे बॉय फ्रैंड्स। आप चिंता मत करो। मैं हूँ न खानदान की परम्परा निभाने को।"-मिताली दाँत दिखाती हुई चहकी।

रामनाथ जी की हँसी में ब्रेक लग गया और चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा।


2. खूबसूरत

देर रात हम समंदर किनारे बैठे थे।

देर मतलब.. बहुत देर।

यही कोई रात का डेढ़ बजा होगा। समंदर की लहरें उफान पर थी।

मैं नीली डेनिम शॉर्ट्स और सफेद स्पैगिटी में, अपने घुटने मोड़कर बैठी, उँगली से रेत पर आड़ी- तिरछी आकृतियाँ बना रही थी।

ब्लैक शॉर्ट्स और ब्लैक सैंडो पहने वो वहीं पास में, रेत पर लेटा, सिर के नीचे दोनों हाथ टिकाए, एकटक आसमान देखता हुआ बोला, “रात बहुत काली है। है ना!”

मैंने शुतुरमुर्ग की तरह झट से गर्दन उठाकर आसमान की तरफ देखा और फिर आसपास।

उसके स्लीपर और मेरे सैंडल साथ रखे थे, रेत पर कुछ इस तरह  कि लहर बार-बार आती और उन्हें चूमकर वापस चली जाती। यही खेल, लहर कभी-कभी हमारी देह के साथ भी करती थी।

उसकी बात के जवाब में मैंने कहा, “चाँद नजर आ रहा है?”

वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया।

रेत में पड़ी एक टूटी सीप उठाकर मैंने उस पर फेंकते हुए कहा- “इतना फिल्मी होने की ज़रूरत नहीं है। मुझे नहीं, आसमान में देखो।”

उसको फिल्मी कहने के बाद मैंने खुद भी उँगली का इशारा उसकी तरफ करते हुए, आसमान के चाँद की तरफ उँगली घुमाते हुए कहा, “उसको कह रही हूँ। उसकी रोशनी देखते हो? उसकी चाँदनी से लहरों पर पड़ने वाली झिलमिलाहट को देखो। तुम कहते हो कि रात काली है। मैं कहती हूँ कि यह अद्भुत रोशनी देखो जो छन- छनकर नीचे बिखर रही है। कितना कुछ इसमें जगमगा रहा है। अक्सर जिन चीजों के लिए कहा जाता है कि वह सिर्फ़ दिखाई देती हैं, अगर ध्यान से महसूस करो, तो वह सुनाई भी देती हैं। तुम इस समय न सिर्फ रोशनी को देख सकते हो; बल्कि सुन भी सकते हो। कैसे घुँघरू – घुँघरू  बजती चाँदनी , लहरों पर नृत्य कर रही है। और यह जादू सिर्फ रात में होता है दिन में नहीं।”

उसने करवट लेकर मेरी तरफ पलटते हुए कोहनी मोड़कर अपनी हथेली पर गाल टिकाते हुए कहा, “तुम्हें और क्या-क्या दिख रहा है?”

“मुझे दिख रहा है कि यह बात पुरानी है कि हर रात के बाद सुबह होती है। बात अब यह है कि रात अपने आप में खूबसूरत होती हैं। दुःख की रोशनी हमारे भीतर बिल्कुल अलग तरह का उजास भरती है। हमें भीतर से एनरिच, एनलाइट करती है। और फिर हम तो उदास फितरत के लोग हैं जानेमन । हमें तो इसी की गलबहियाँ में रस आता है।”

उसने मुस्कुराते हुए पूछा , “मेरे साथ चलोगी?”

मैंने हँसते हुए कहा, “डूब मरने के अलावा मेरे पास और भी बेहतर बिगाड़ हैं ज़िंदगी के।”

फिर घुँघरू- सी चाँदनी में हँसी खनकती रही।

रेत पर कदमों के दो जोड़ी निशान देर तक उभरते मिटते रहे।

3. पहेली

इच्छाओं के खोखले  बाँस में पाँच छेद करके बाँसुरी बना ली,  हालाँकि सुर अभी साधने नहीं आए; पर मेरी अंतिम इच्छा यही है कि कभी साधने आएँ भी ना।

चप्पल बड़ी होती जा रही थी, पैर उतने का उतना ही था। यह बात मुझे हैरान करने लगी। एक रोज़ नदी किनारे चप्पल उतारकर नदी में पैर डालते हुए मैंने उससे यह बात कही। उसने कुछ देर चप्पल को देखा, कुछ देर मेरे पैर को और गंभीर होकर कहा-“तुम्हारा पैर सिकुड़ता जा रहा है, चप्पल नहीं बड़ी हो रही।”

उसके यह कहने के बाद, मैंने भी एक बार चप्पल को देखा और फिर बहुत देर अपने पैर को फिर उसकी तरफ देख कर कहा- “मन अगर पैर की जगह है, तो पैर कहाँ हैं!”

Jun 5, 2021

डायरी- दुनिया को प्यार ही बचा सकता है

-डॉ. सुषमा गुप्ता

11 मई, 2021

एंड ..द सेकंड इनिंग

यह कितनी अजीब बात है कि अपने ठीक होने की खबर देना भी एक अजीब से शर्मिंदगी के भाव से भर रहा है। खराब होते होते तबियत तीसरे दिन ऐसी खराब हुई थी कि एक पल तो लगा, सब छूट जाएगा। कितने दोस्त, कितने कांटेक्ट सब फेल हो गए, कितने घंटे हॉस्पिटल नहीं मिला। मिला, तब भी बहुत सारी कॉम्प्लिकेशंस हुई। बहुत सारी तकलीफ़ों से गुज़रते -गुज़रते कितनी अजीब-सी बातें मन और दिमाग में चलती रही, यह सिर्फ मैं जानती हूँ। कितने लोग जो कुछ नहीं थे, उन्होंने बहुत प्यार भेजा, कोई जो खास थे,  उन्होंने हाल पता होते हुए भी जीने -मरने की सुध तक न ली। यही रिश्तों का गणित है, जो वक्त पड़ने पर निल बटा सन्नाटा में बदलने में पल नहीं लेता। अजीब- सा जीवन, अजीब से आसपास लोग!  इतना अविश्वास, डर, सदमा सब कुछ इस तरह से हावी होने लगा। ज़िंदा होते हुए भी, ज़िंदा होने का एहसास नहीं हो रहा था। बिटिया भी कोविड पॉजिटिव थी और अतुल (पति) तो मुझसे पहले से ही। उनकी खुद की हाल बहुत खराब थी, पर जिस तरीके से मेरी किडनी में इंफेक्शन फैलने के बाद तबियत बिगड़ी, वह अपनी तो सुध- बुध ही भूल गए और रात दिन हॉस्पिटल चक्कर काट, मुझे ही सँभालते रहे। इधर हम दोनों बेटी पर ध्यान देने लायक बिल्कुल नहीं थे,  तो प्रियम खुद की ज़रा भी परवाह न कर बहन को सँभालता रहा।

कैसा तो मुश्किल समय रहा और अभी भी सब तरफ़ यही सब हो रहा...

शुरुआत के 10 दिन में कौन-कौन परिवार से, अपनों से , पास पड़ोस से, दोस्तों से, चला गया सब मुझसे छुपाया गया। जैसे-जैसे तबियत थोड़ी सँभली, एक- एक करके इतने सब लोगों के जाने का पता चला कि मन जैसे खुद के ज़िंदा होने पर क्षुब्ध होने लगा। इतना काँपा कि बार-बार अपनों ने समझाया, बच्चे छोटे हैं, उन्हें तुम्हारी जरूरत थी ! शुक्र है ईश्वर का, तुम हो और ठीक हो। ईश्वर का शुक्र है, सच में बार-बार शुक्र है; पर ईश्वर कितना ...कितना नरसंहार और कब तक! क्यों इतनी त्राहि-त्राहि !

यह रूक जानी चाहिए, हर कोई दुःख में है, हर कोई तड़प रहा है, सब सहमे हुए हैं, सदमे में है फिर भी कुछ भी कहीं भी रुक नहीं रहा।

 एक दोस्त ने कहा जिसकी जितनी साँसें हैं उतनी साँसें तो लेकर ही जाएगा इसलिए  ज़्यादा मत सोचो। ज़्यादा सोचने से हासिल होगा भी कुछ नहीं। यह सोचो जब तक हो, तब तक आसपास के लोगों का कुछ अच्छा कर सको। वह बीस साल से दोस्त हैं, यूँ तो महीनों से बात नहीं होती; पर अगर हिम्मत टूटने लगती है और पुकार बैठूँ तो साथ देने हमेशा आता है, वह भी बिना कोई अहसान जताए। कोई ऐसा भी रहा जिसने फोन और ऐसे -ऐसे मैसेज भेजे,  इतनी मुस्कान दी कि मैं बार-बार पीड़ा भूल जाती, जबकि वह खुद भी बीमार था। कुछ बेहद प्यारी दोस्त ऐसे साथ बनी रहीं कि मैं उस अनमोल दुआओं जैसे प्रेम पर अचंभित हुई कि दुनिया में अभी भी  ऐसा निश्छल प्रेम बाकी है!

 नाम तो बहुत से हैं और बेहिसाब हैं, पर यहाँ इसलिए नहीं लिख रही कि गलती से भी मुझसे किसी का नाम छूट गया, तो उसके दिल को ठेस पहुँच सकती हैं,  इसलिए सबको ही बहुत मन से धन्यवाद कहना चाहती हूँ जिन्होंने इतना प्रेम इतनी दुआएँ दी।

 दुनिया में जब जब भी ऐसी विपदाएँ आई हैं, इंसान के साथ ने हीं इंसान की जान बचाई है, दुनिया को बचाया है, इंसानियत को बचाया है। जहाँ बहुत से लोग अब भी लाशों पर रोटियाँ सेंकने से नहीं रुक रहे, वहाँ ऐसे अनगिनत चेहरे भी हैं, जो रात दिन लोगों की मदद में लगे हैं। अतुल को भी देख रही हूँ कि तबियत खराब में भी वह जहाँ तक हो सकता है , जितना हो सकता है लोगों के लिए कुछ ना कुछ अरेंज कर ही रहे हैं।

आप सब भी अपने हिस्से के कर्म ही नहीं, उससे दो कदम बाहर जाकर, अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर जाकर भी जितना हो सके औरों के लिए करना, करते रहना ।

 यह दौर भी बीतेगा ।

 इसे बीतना ही होगा।

13 मई, 2021

कम्फर्ट ज़ोन

कभी आपने यह बात नोटिस की है, हमारे आसपास अधिकतर लोग अपने कम्फर्ट ज़ोन के अनुसार ही रिश्ते या कर्तव्य निभाते हैं। उससे ज़रा- सा बाहर आते ही या तो उनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति में बदल जाती है या लहज़े बदल जाते हैं। इतनी दुनिया देख लेने के बावजूद अब भी, कभी हैरानी होती है कभी सदमा भी लग जाता है, पर ज़िंदगी का सच यही है।

कंफर्ट ज़ोन.. आज तक मेरी समझ नहीं आया कि नेगेटिव वर्ड है या पॉजिटिव!

आज यह बात इसलिए कही कि जब मैं हॉस्पिटल में थी, तो एक बात बहुत शिद्दत से महसूस की, कि जहाँ बहुत सारे हेल्थ वर्कर्स और डॉक्टर्स बहुत रुखा बर्ताव कर रहे हैं, वहाँ बेशुमार ऐसे भी हैं, जो अपने प्रेम -भरे शब्दों से बहुत हौंसला दे रहे हैं। मेरे पास दिन के समय जो नर्स होती थी , वह बहुत प्यारी थी। अपनी निज़ी ज़िंदगी में बहुत सारी परेशानियों का सामना कर रही थी उसके बावजूद मुस्कान लिये सबका ख्याल रखती। कल नर्स डे पर उसकी परेशानियाँ लिखने लगी, जो मुझे उसने बाद के दिनों में एक दिन बहुत तकलीफ से गुज़रते हुए रोते हुए बताई थी, पर जाने क्यों नहीं लिख पाई, पर लिखूँगी जल्द ही।

आज तो मैं बात कर रही हूँ, अपने डॉक्टर शैलेंद्र की। शैलेंद्र पराशर। उम्र कोई चालीस के आसपास होगी उनकी। मेरे साथ बार-बार बहुत सारे कॉम्प्लिकेशंस आ रहे थे पर उनका धैर्य मेरे साथ देखने लायक था। मेरी वेन्स  इतनी पतली है कि एक एक्सपर्ट से एक्सपर्ट  इंसान को भी वेन्स ढूँढने में बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी और बहुत जल्दी-जल्दी स्वेलिंग आ रही है, इसलिए कैनुला भी  बदलना पड़ रहा था। जब चौथी बार कैनुला बदलने की नौबत आई तब नर्स से यह काम नहीं हो पाया तो डॉक्टर खुद न्यू बोर्न बेबी के समय यूज़ होने वाली टार्च लेकर बैठ गए मेरी वेन्स  ढूँढने के लिए। मेरा हाथ, हाथ में लेकर बहुत हौंसला देते रहे, उनकी आँखों में विश्वास और कम्पेशन ऐसा था कि कोई भी जीने की तरफ फिर से मुड़ जाए। मेरा लीवर बाय बर्थ वीक है मुझे माइल्ड से माइल्ड एंटीबायोटिक देते हुए भी सोचना पड़ता है ; क्योंकि मेरा बॉडी सिस्टम एक्सेप्ट ही नहीं करता। ऐसे में उन्होंने बहुत थोड़ी-थोड़ी डोज़ में मुझे दवाई धीरे-धीरे चढ़ाई ताकि मेरा इंटरनल सिस्टम उसे सह सके। उन्होंने खुद यह बात कही कि आप बीमार न पड़ा कीजिए, आप वन ऑफ द रेयरेस्ट केस हैं, जिनको बीमारी से ज़्यादा दवाइयों से नुकसान पहुँच सकता है, अगर वह स्टैंडर्ड प्रोसीजर के हिसाब से दे दी जाएँ तो। दिक्कत यह है कि मुझे मैक्सिमम दवाइयों से बहुत स्ट्रांग एलर्जी है।

 मुझे नहीं पता कि दवाइयों ने कितना काम किया शरीर में पर उनके बेहद अच्छे व्यवहार ने यक़ीनन बहुत-बहुत असर किया। मैंने कल उनके लिए कुछ भेजा जो अतुल ने बहुत आग्रह करके उनको दिया, क्योंकि वह ले ही नहीं रहे थे, कन्विंस किया  कि मैंने बहुत मन से भेजा है।

 यह बहुत बड़ी बात होती है जब कोई अपने कंफर्ट जोन से बाहर जाकर आपके लिए कुछ करता है। मैंने गिफ्ट भेजा; क्योंकि मेरे पास और कोई ज़रिया नहीं था कि मैं उनको बता सकूँ कि यह कितना मायने रखता है कि वह ऐसे हैं। आपके आस- पास भी जो ऐसे डॉक्टर हों, नर्सेस हों, उनको ज़रूर महसूस कराइएगा कि वह स्पेशल हैं, बहुत स्पेशल हैं। चाहे जैसे भी महसूस कराइए पर कराइए ज़रूर।

मैं बार-बार कहती हूँ। लोगों की तब भी मदद कीजिए, जब करना आपके लिए मुश्किल हो, यानी अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर जाकर लोगों की मदद कीजिए ।

यही इंसान होने की सच्ची पहचान है। प्रोफेशनल तो सब हैं ही।

17 मई, 2021

ईश्वर को अपनी पोथी फिर से बाँचनी चाहिए

मैं इन दिनों की बेबसी पर रोना चाहती हूँ;  पर मुझे रोना नहीं आता। कम से कम उन बातों पर तो बिल्कुल नहीं, जिन बातों पर रोना चाहिए। भीतर-भीतर किसी मरे हुए अवसरवादी गिद्ध का मातम है। यह सीधे तौर पर दुःख को न स्वीकार कर सर्दी की ठिठुरती रात में और कुछ इंतज़ाम न हो सका, तो चिता की आग से खुद को सेंकने जैसा मातम है। निस्संग होना, अपने में बंद हो जाना और दूसरों के दुःख के प्रति उदासीन हो जाना ,जिस दिन हम इसे उपलब्धि मान लेते हैं , तब हम इंसान की जीवित देह में मृत आत्मा लिये फिरते हैं।

हमें अपने न होनेमें ऐसे होने का क्या हक है !

 पर हम हैं, अपनी पूरी बेशर्मी के साथ उपस्थित, हर उस समय जब हमें अनुपस्थित होना था और हमेशा वहाँ अनुपस्थित, जहाँ हमारी उपस्थिति अनिवार्य थी। 

 धिक्कार है ऐसे गिद्ध प्रेम पर, जो भीतर भीतर पल रहा है। पर यह भीतर क्यों है !

 यह वह प्रश्न है, जिसमें हज़ारों सुया हैं, रात दिन बेधती हुई; पर ज़वाब कहीं से नहीं रिसता।

इन दिनों प्रेम में होना और मातम में होना एक ही बात हो गई है और यह बात ... बिल्कुल सही नहीं।

प्रेम में पीड़ा स्वीकार्य है, मातम नहीं। ईश्वर को अपनी पोथी फिर से बाँचनी चाहिए।

21मई 2021

सब कुछ नर है और सब कुछ स्वर्ग यानी कि सब कुछ यहीं है

 आपके आसपास लोग प्रेम प्यार देते हैं, स्नेह देते हैं सकारात्मक बातें करते हैं, तो आप एक स्वर्ग में हैं। आपके आसपास हर समय क्रिटिसिज्म रहता है, नीचा दिखाने की होड़ रहती है, एक दूसरे की भर्त्सना रहती है ,तो यक़ीनन आप एक नरक में हैं।

 मरने के बाद का स्वर्ग नर किसने देखा है! जो है, यहीं है।

सार्त्र का कोट है

हैल इज़ अदर पीपल

यह याद आता है फिर मुझे कि

अपनी देसी भाषा में इन्हें चार लोगभी कहते हैं

जैसे अभी पोस्ट कोविड बहुत लोग बड़े प्यार से कहते हैं अपना ध्यान रखो, बुरा समय निकल गया

 तो कुछ लोग इसी पंक्ति को ऐसे कहते हैं अरे शुक्र समझो, बच गई, कितने लोग तो लाख कोशिशों के बावजूद हॉस्पिटल से ज़िंदा वापस ना आ सके। तुम तो बहुत खुश किस्मत हो भई, हर किसी की किस्मत इतनी अच्छी नहीं।

 अब यह चाहे कितने भी अच्छे मन से बोला गया हो, लाइन वाकई अटपटी है

 आपको बिल्कुल समझ नहीं आता कि ऐसे में क्या रियेक्ट करो; क्योंकि सच्चाई तो यही है इस खुशकिस्मती में एक अजीब किस्म की शर्मिंदगी का भाव भी है। इतने अपनों  को जाते देख, इतना मौत का तांडव आसपास देखने के बाद, खुद को बस आप  सुन्न पाते हो। दिल बैठा जाता है और दिमाग नम्ब ।

 तो ऐसी पंक्तियाँ हिट करती हैं ज़ेहन को, फिर लगता है छोड़ो भी इस वक्त अपने हाथ में ज़्यादा कुछ है नहीं, तो किताबें पढ़ो और चादर तानक सो जाओ , उठो,  बच्चों के लिए अच्छा- सा खाना बनाओ, खिलाओ, खुद से जितना खाया जाए खाओ और फिर से किताबों में घुस जाओ। जिसकी मदद कर सकते हो, कर दो ,जो हाथ के बाहर हो उसके लिए दुआएँ दो, पर बोलो सँभल कर कि किसी का दिल इतना- सा भी ना दुखे।

बाकी दुनिया तो फिर दुनिया है और फिर अब बच गए हैं ,तो ठीक से ही जी लो। दुनिया को प्यार ही बचा सकता है। जितना बाँटो, उतना कम है।

25 मई, 2021

मन के डगमगाते डूबते जहाज के लिए

इस कठिन समय में मन को बाँधकर जबरदस्ती किताबों की तरफ मोड़ना भी एक बहुत बड़ा चैलेंज रहा। तबियत काफी महीनों से खराब रहने की वजह से लिखना पढ़ना पहले ही लगभग छूटा हुआ था; पर इस बार जब हॉस्पिटल से आई तो कुछ दिन बाद ही मैंने फोन में ऑडिबल ऐप डाल लिया और विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहासुनने लगी। 

इस त्रासदी भरे समय में इतना कुछ भयानक देख सुन रही थी और महसूस करके आई थी कि हर हाल में अपने दिमाग को खाली रहने से रोकना था। शरीर में बैठने की हिम्मत नहीं थी और आँखों में किताब पढ़ने की। ऐसे में यह बहुत ही कारगर तरीका रहा। आवारा मसीहा शरत चंद्र की जीवनी है। तकरीबन 22 घंटे की किताब है ऑडिबल पर। रोज़ लेटे-लेटे तीन चार घंटे तो सुन ही लेती थी। सुनते सुनते शरत चंद्र के जीवन के बारे में बहुत कुछ जाना, उनकी लेखन प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ समझा। एक आत्मचिंतन, आत्ममंथन अंदर-अंदर चलता रहा और सुनते-सुनते अपने आप ही दोबारा किताबें पढ़ने का मोह जाग गया। ज़रूरी नहीं कि यह ट्रिक सबके साथ काम करें पर ट्राई कीजिए। पढ़ने का मन न, हो तो समय का सदुपयोग किताबें सुनने से कीजिए। शायद खोया हुआ रिद्म वापस आ जाए। 

आवारा मसीहा सुनने के बाद कुछ चीज़े  ऑनलाइन ढूँढकर पढ़ी, पर जैसी बेसिक फितरत है -किताबों को हाथ में लेकर पढ़ने का जो सुकून है, वह आईपैड या लैपटॉप पर पढ़ने से नहीं आता ,तो एक बार फिर किताबों की तरफ़ मुड़ गई।

शुरुआत मानव कौल की अंतिमा से की। मानव कौल का लेखन मुझे प्रिय है। उनका ज़्यादातर लेखन डायरी शैली में होता है। अंदर-अंदर एक इंसान लगातार खुद से बात करता रहता है ,वहीं से कहानियाँ उपजती हैं और फैलती चली जाती हैं, शायद इसलिए मुझे उनका लेखन  पसंद आता है। अंतिमा एक सुंदर शुरुआत रही पढ़ने के लिए।

 इसके बाद उठाया चंदन पांडे का वैधानिक गल्प। यह मेरे पास पहले से आया रखा था; पर जाने कैसे भूल गई , तो अब पढ़ा गया। इसे मैंने कुछ घंटों में ही खत्म कर लिया। कुछ सालों पहले उत्तराखंड में एक पुलिस ऑफिसर गगनदीप सिंह ने एक लड़के को भीड़ से बचाया था ,अपनी जान की परवाह न करते हुए। यह उपन्यास उसी घटना के आसपास बुना गया है। सिस्टम किस कदर क्रूर और भ्रष्ट हैं!

 यह तो हम हमेशा से जानते ही हैं;  पर जब इस तरह की परतें खोलता हुआ कुछ पढ़ते हैं, तो हर बार मन कसमसाकर रह जाता है, टीस से भर जाता है कि कब बदलेगा यह सब। 

 तीसरी किताब उठाई हर्मन हेस की सिद्धार्थ यह मैंने कुछ महीनों पहले पापा को मँगाकर दी थी। उन्होंने पढ़कर वापस भी कर दी, पर मैं पढ़ना भूल गई। शायद यह इन्हीं दिनों में पढ़ी जानी थी, जब जीवन और मृत्यु के बीच में से निकलकर मन का हाल खुद भी थोड़ा लड़खड़ाया- सा हैं। यह गौतम बुद्ध की कहानी नहीं है यह एक ऐसे लड़के सिद्धार्थ की कहानी है, जो जीवन का अर्थ ढूँढता है। कठोर संन्यास से सामाजिक जीवन की तरफ मुड़ता है और सामाजिक जीवन से एक बार फिर से खुद के होने का अर्थ खोजता हुआ, अंततः सृष्टि के कण-कण से खुद के प्रश्नों का उत्तर पा जाता है। जिनका उत्तर बड़े-बड़े संन्यासियों से, उपदेश देने वालों से, समाज के कामयाब लोगों से, कहीं से न पा सका था। आखिरी के पन्नों में खुद से मिलने का, अध्यात्म का, ईश्वर का, अपने अंतस में पल रही अच्छाइयों और बुराइयों को स्वीकारने का भाव, जिस दृष्टि के साथ लेखक ने हमारे समक्ष रखा है , वह भीतर तक चेतना को झकझोरता है। आप एक ट्रांस में चले जाते हैं, चुप बैठे बहुत देर आत्मचिंतन की अवस्था में। चाहे तो आप इस किताब से बहुत कुछ ले सकते हैं।

पढ़ना छूट गया है, तो मन को कैसे भी बाँधकर फिर से शुरू कीजिए। इस भयानक समय में इससे सुकून- भरी शरणस्थली नहीं मिलेगी। नियम बनाइए कि दिन में 50 पन्ने तो पढ़ने ही है या एक दो घंटे या जो भी, पर एक नियम बनाइए और कैसे भी करके उसे फॉलो कीजिए। 

एक के बाद एक इतने अपने जा चुके हैं, जा रहे हैं कि मैंने मन को शतुरमुर्ग बना लिया है,  किताबों को धरती और उसके अंदर मुँह घुसा दिया। इस बात की शर्मिंदगी होनी चाहिए, पर अपनों के लिए जीना इतना ज़रूरी है कि मौत से पहले ही मर न जाएँ इसके लिए कोई तो ज़रिया बनाना ज़रूरी है।

मन मानता नहीं है, मन को मनाना पड़ता है।

यह बेहद मुश्किल समय है। जो शरीर से बच रहे हैं , वे मानसिक रूप से टूट रहे हैं। मन के डगमगाते डूबते जहाज के लिए किताबें एक सुंदर एंकर हैं।

लेखक के बारे में - जन्म- 21 जुलाई 1976, दिल्ली, शिक्षा- एम कॉम (दिल्ली यूनिवर्सिटी), एम बी ए (आई एम टी गाजियाबाद), एल-एल बी, पी-एच. डी., कार्य-अनुभव- कानून एवं मानव संस्थान की व्याख्याता- 2007-2014 (आई एम टी गाजियाबाद), सम्मान- हिन्दी सागर सम्मान-2017, प्रकाशन- समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में कुछ रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। प्रकाश्य- साझा संग्रह (जे एम डी प्रकाशन) नारी काव्य सागर, भारत के श्रेष्ठ युवा रचनाकार,हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में कहानी को प्रथम पुरस्कार, Email- suumi@rediffmail.com

Mar 5, 2021

हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा की ओर से आयोजित लघुकथा-प्रतियोगिता परिणाम

अतीत में खोई हुई वर्तमान की चिट्ठियाँ 

( प्रथम पुरस्कार-1)

- डॉ. सुषमा गुप्ता

चार साल की बच्ची का मन मासूम था। अपने घर की खिड़की से अक्सर वह सामने वाले घर की बालकनी में कुछ खेल होते देखती थी। एक रोज़ उसने सामने वाली दीदी से पूछा
आपने सामने क्या फेंका?’
दीदी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। कुछ सोचकर उन्होंने कहा-‘वह सामने वाले घर में मेरा दोस्त रहता है। कभी मैं उसे कुछ कहना भूल जाती हूँ, तो इस तरह लिख कर संदेश दे देती हूँ। दोस्तों में ऐसे संदेश देना चलता रहता है।

उस नन्ही बच्ची को यह बात बहुत सुंदर लगी। उसने नया-नया अक्षर- ज्ञान लेना शुरू किया था। उसका एक ही दोस्त था, साथ वाले घर में रहने वाला दो साल का नन्हा बंटी। वह सोचने लगी उसको संदेश भेजती हूँ, पर यह सोचकर उदास हो गई कि उसको अभी पढ़ना नहीं आएगा। अगले ही पल यह सोचकर मुस्कुरा दी कि तो क्या हुआ ,मैं ही पढ़कर सुना दूंगी।
उसने एक कागज़ पर जितने अक्षर सीखे थे, सब लिख दिए और अपने आँगन से उसके आँगन में फेंक दिया, फिर अपने गेट से निकलकर तेज़ी से उसके घर की तरफ गई। उसके आँगन में पड़ी अपनी चिट्ठी को देख ,खुशी से चहकती हुई, उसके घर के अंदर गई।
वह टीवी के सामने बैठा कार्टून देख रहा था। लड़की ने उसका हाथ थामकर कहा-‘तेरे लिए कुछ है।

नन्हे बंटी ने बाल-सुलभ जिज्ञासा से तुतलाहट भरी आवाज़ में पूछा ‘त्या ?’
लड़की हाथ पकड़क उसको बाहर की तरफ़ खींचने लगी, ‘आ दिखाती हूँ।

छोटे-छोटे दो कंगारू फुदकते हुए बाहर आँगन की तरफ बढ़ गए। आँगन में शहतूत का पेड़ भी था, काले शहतूत का पेड़। चिट्ठी उड़कर उस पेड़ के नीचे जा गिरी थी।
हवा तेज़ थी। अनगिनत पके शहतूत, पेड़ के नीचे पड़े थे। काले धब्बों से ज़मीन पटी हुई थी । चिठ्ठी  उड़कर उन काले शहतूतों से लिपट गई थी। लड़की ने आहिस्ता से उसको उठाकर देखा। शहतूत के धब्बों से कागज़ जामुनी हो गया था और बहुत से अक्षर उस रंग में घुलकर काले हो, लुप्त हो चुके थे। बच्ची का मन बुझ गया। इतने मन से उसने वह चिट्ठी लिखी थी हालाँकि उसको याद था कि उसने उसमें क्या लिखा है पर...

इतनी छोटी उम्र में भी उसको यह तो पता था कि नन्हा बंटी उस चिट्ठी को पढ़ नहीं पाएगा, चिट्ठी उसी को पढ़कर सुनानी थी। उसके बावजूद खो गए शब्द उसके लिए किसी खोई हुई अपनी सबसे सुंदर गुड़िया से कम नहीं थे, जिसका दु:ख बहुत बड़ा था।
लड़की की नन्ही-नन्ही हिरनी -जैसी आँखों में बड़े-बड़े आँसू तैर गए। छोटा लड़का तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा था। वह टुकुर-टुकुर बस देख रहा था।  जब छोटी लड़की रोने लगी, तो उस छोटे लड़के के दिल में भी कुछ हलचल हुई। उसने धीरे से उसको हिलाकर अपनी मीठी तोतली ज़ुबान में पूछा
त्या हुआ!

काले जामुनी धब्बों से भरी हुई चिट्ठी जो उस लड़की की नन्ही हथेली में रखी थी, उसने लड़के के आगे कर दी। लड़के को तब भी समझ ना आया कि हुआ क्या है। उसने फिर पूछा- ‘त्या हुआ?’

लड़की ने मुट्ठी बंद की और अपने घर की तरफ दौड़ गई। सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर फूट-फूट कर रोने लगी।

शब्दों के गुम जाने के बाद दिल टूटने की यह उसकी ज़िंदगी की पहली घटना थी।

काँटा  (प्रथम पुरस्कार-2)

-राम करन

 बारहों महीने वे व्यस्त रहते। मैं सुबह उन्हें खेत में जाते देखता और शाम को खेत से आते। कभी वे खुरपा-खुरपी, कभी हँसिया, कभी कुदाल, कभी फावड़ा आदि लेकर जाते। एक दिन मैंने पूछ लिया –कितना जोतते हैं?’

पाँच... पाँच बीघे,’ वे बोले।

तब तो खाने की कमी नही होती होगी,’ मैने पूछा।

हाँ, नही होती,’  वे बोले।

बेचना पड़ता होगा?’ मैंने पूछा।

नही। बेचने भर का नही होता,’ वह सहजता से बोले।

लेकिन मैं चकित था। मैने पूछा –पाँच बीघे का अनाज खा जाते हैं?’

वे बोले –अरे गल्ले पर है। खेत मेरा नहीं है।’

आपका कितना बीघा है?’

उन्होंने ने हाथ से कुछ नहीं’ का इशारा किया। मैने पूछा-भाई-पाटीदार के पास भी नही होगा?’

वे बोले –नही, किसी के पास नही है।’

लेकिन खेती सब करते हैं.... सब किसान हैं,’ मैंने कहा।

वे मुस्कराए और बोले –हाँ।’

तब तो अनुदान-सहायता कुछ नही मिलता होगा?’

कहाँ से मिलेगा? जब किसी के नाम पर एक धुर भी नहीं है।

दादा-परदादा से ही ऐसे...

हाँ। दादा-परदादा का भी खेत नहीं था।

लेकिन गाँव के दूसरे लोगों के पास तो पाँच-पाँच दस-दस बीघा है।

उन्हें भगवान ने दिया है।

मतलब आपको भगवान ने नहीं दिया?’

हाँ, ऐसा ही है।

मैं उनको और खँगालने लगा। मैंने पूछा –भगवान ने आपको क्यों नहीं दिया?’

अब नहीं दिया तो नहीं दिया। क्योंहीं दिया ये वही जाने,’ वे मुस्कुरा कर बोले।

अच्छा आपको लगता है कि भगवान ही सबको देता है? देता है तो भेदभाव क्यों?’ मैंने उन्हें टटोला।

इस बार वे झल्लाए, ‘भगवान के नाम पर संतोष तो करने दीजिए...कहाँ सिर फोड़ लूँ...। मैं समझ गया कि काँटा बहुत गहराई में है।

विद्या  (द्वितीय पुरस्कार)

-महेश शर्मा

कोचिंग के लिए निकलने ही वाला था कि मम्मी ने टोक दिया – पहले दादी को किसी डॉक्टर को दिखा लाओ! सुबह से तकलीफ में हैं!

मैं मन ही मन बुरी तरह से झल्ला उठा –

मेडिकल के प्रि-एक्जाम की कोचिंग है यह - कोई मज़ाक नहीं है! पापा इतनी महँगी फीस कैसे भर रहे हैं, यह सोचकर कभी-कभी बहुत ग्लानि होती है - इसलिए अब एक मिनट भी फालतू खर्च करना मुझे बर्दाश्त नहीं है! हर हाल में यह एक्जाम क्रेक करना है मुझे!

मैंने स्कूटर का रूख एक प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ मोड़ दिया। सरकारी अस्पताल की कतार में खड़े रह कर सारा दिन बर्बाद नहीं करना है मुझे!

और यह मम्मी ने सिर्फ हज़ार रुपये क्या सोचकर पकड़ा दिये मुझे? किस माने में जी रहे हैं ये लोग! अरे तीन सौ रुपये तो डॉक्टर की फीस ही होगी – फिर आजकल बिना ब्लड-यूरिन टेस्ट करवाए कोई डॉक्टर इलाज कहाँ शुरू करता है – तो पाँच-छह सौ उसमे लग जाएँगे – फिर दवाइयाँ!! अगर पैसे कम पड़ गए तो क्या करूँगा?

तभी पीछे सीट पर बैठी दादी ने एक अलग ही रट लगानी शुरू कर दी – डॉक्टर के नहीं जाना मुझे – नाभि खिसकने का दर्द है यह – उस चूड़ी वाली बुढ़िया के पास ले चल!

दादी की इस दक़ियानूसी सोच से मेरा पारा चढ़ने लगा – मैंने उन्हें लाख समझाने की कोशिश की; लेकिन सब बेकार! उनकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा!

बाज़ार की उस तंग सी गली में वह चूड़ियों की एक छोटी सी दुकान थी।

उस बुढ़िया ने वहीं भीतर फर्श पर बिछी एक दरी पर दादी को लिटा कर उपचार शुरू कर दिया – मैं अपना मुँह फेर कर खड़ा हो गया – नहीं देखना था मुझे यह सब!!

दस मिनट बाद मुस्कुराती हुई दादी ने मेरे कंधे को थपथपाकर चलने का इशारा किया! मैंने थोड़ी बेरुखी से पूछा – कितने पैसे देने हैं इस चूड़ीवाली को!

दादी अभी कुछ कहती कि उस बुढ़िया ने अपने झुर्रीदार चेहरे पर उभर आई हँसी को काबू में करते हुए कहा – अरे बेटा, यह तो विद्या है – इसके पैसे नहीं लेने चाहिए – पाप लगता है!

जाओ तुम पढ़-लिखकर  खूब बड़े आदमी बनो!

वाजिब कीमत  (तृतीय पुरस्कार)

-सन्दीप तोमर

  दिन गटर के भर जाने से मास्साहब की घर में पानी की निकासी बन्द हो जाती, मास्साहब ही क्या पूरी गली के घरों का आलम यही होता। मास्साहब बालेश्वर को बुला खरपच्ची से गटर खुलवाते। बालेश्वर इस काम की मुँहमाँगी कीमत वसूलता। उसका पेशा ही वही था। मासाहब्ब आए दिन गटर बन्द होने से दुःखी थे। आखिर उन्होंने मोटे पाइप को मुख्य सड़क की गटर लाइन से जोड़ समस्या का निदान कर लिया। अब वे  निश्चिन्त थे। कुछ दिन पहले ही छत का पाइप अवरूद्ध होने पर उन्हें बालेश्वर का ध्यान आया। मास्साहब बालेश्वर के बैठने के ठिये से उसे बुला लाए थे। बालेश्वर ने पाइप लाइन खोलने के तीन हजार रुपये माँगे। मास्साहब ने कहा-भाई, ये काम इतने का नहीं है। फिर इसमें गटर जैसी कुछ गंद भी नहीं, छत का पानी ही आता है।

मास्साहब, इतना ही जानते हो तो खुद कर लो। मेरी क्या जरूरत है।

मास्साहब ने पुरानी पहचान, अपने व्यवहारउसकी पूर्व में की सहायता की दुहाई भी दी; लेकिन उस पर उनका कोई असर न पड़ा। आखिर मास्साहब को मुँह माँगी कीमत पर काम करवाना पड़ा। बालेश्वर आधे-पौने घण्टे में काम निपटा पैसे लेकर जा चुका तो मास्साहब बहुत देर तक दिहाड़ी का हिसाब-किताब लगाते रहे। 

इस घटना को बामुश्किल महीना भी नहीं हुआ कि माहमारी के चलते, शहर में आपातकाल जैसी स्थिति हो ग। मास्साहब को ख्याल आया कि कैसे मजदूर, गरीब इस दौर में गुजर-बसर कर रहे होंगे। वे इस सोच में डूबे थे, अचानक डोरबेल बजने पर उनका ध्यान भंग हुआ। दरवाजा खोला तो देखा, बालेश्वर सामने था। मास्साहब को देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। 

कहो, कैसे आये बालेश्वर?’

साहब, सब काम-धाम बन्द है, खाने तक को पैसे नहीं हैं, कुछ मदद कर देते तो...।

उसकी बात भी पूरी नहीं हुई थी, मास्साहब की आँखों के सामने छत का पाइप खुलवाने की  पूरी घटना चलचित्र की तरह घूम ग। वे बोले-बताओ, क्या करूँ?’

कुछ पैसे मिल जाते, तो बच्चो के लिए राशन ...।

अरे पास ही मेरा विद्यालय हैं, वहाँ बना-बनाया खाना आता है, मैं साथ चलकर दिलवा देता हूँ।

उसने सकुचाते हुए बना-बनाया खाना ले जाने में लाचारी जाहिर की, मास्साहब के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान आ ग। जेब से चार पाँच-पाँच सौ के नोट उसके हाथ पर थमाते हुए बोले-लो, पास की दुकान से घी-तेल, आटा, दाल ले लेना; लेकिन एक बात है, उस दिन के काम के तीन हजार रुपये वाकई ज्यादा थे।

बालेश्वर ने गर्दन झुकाते हुए पैसे लेने को हाथ आगे बढ़ा दिया।

विशमास्टर : ए कोरोना वॉरियर

( सांत्वना पुरस्कार-1)

- मार्टिन जॉन

वह अपने घर के बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल में कोविड-19 के ताज़ा स्टेट्स देखने में मशगूल था कि मेन गेट पर एक बाइक आकर रुकी । ई-कार्ट के विशमास्टर को बाइक से उतरते देख उसने फटाफट अपने हाथों को बरामदे में ही रखे सेनिटाइर से सेनिटाइ किया, मास्क लगाया और गेट के पास ज़रूरत से ज़्यादा दूरी बनाकर खड़ा हो गया ।

    कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियाँ कुछ दिनों तक बंद रहने के बाद  पिछले पखवाड़े से खुल गई थीं । अब वह ज़रूरत के बहुत सारे उपयोगी सामान ऑर्डर प्लेस कर मँगवा लेता है । इन सामानों की ख़रीदारी के लिए घर से बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं रही। बिग बास्केट, जमोटा, अमेज़न, फ्लिपकर्ट के खुल जाने से वह बेहद प्रसन्न था; क्योंकि इस सुविधा से  ‘स्टे होम, स्टे से’ का एक हद तक पालन हो जा रहा था ।

     विशमास्टर एक हाथ में पैकेट लिये दूसरे हाथ से गेट खोलने जा ही रहा था कि वह जोर से चिल्लया , अरे , फिर तुमने गेट को छू लिया ...हाथ मत लगाओ ! उसकी आवाज़ की कर्कशता ने  विशमास्टर पर डंडे जैसा प्रहार किया। वह सहम गया ।

  सॉरी सर ..एक्सट्रीमली सॉरी !

हर बार यही कहते हो और हाथ लगा देते हो ! उसके स्वर के रूखेपन के एहसास से विशमास्टर एक पल के लिए थम गया ।

आगे ख्याल रखूँगा ।...पैकेट ले लीजि सर !

अरे भाई , बाउंड्री पर रख दो न !अपनी जगह से हिले बगैर उसने उसी लहज़े में कहा ।

जी सर ! ...फीडबैक दे दीजिगा प्लीज !

‘हाँ , हाँ दे दूँगा !

विशमास्टर पैकेट से भरे बड़े और वजनी बैग कंधे से लटका कर जैसे ही बाइक स्टार्ट करने को उद्यत हुआ, उसने यूँ  ही पूछ डाला , तुम लोगों को डर नहीं लगता ?

डर ?विशमास्टर ने हेलमेट के पारदर्शी काँच से अपनी आँखों को फैलाकर उसके चेहरे पर टिकाया , लगता है सर।...लेकिन... 

लेकिन क्या ?’

उसके आगे झुकते नहीं !....झुक जाएँगे तो आप सब की सेवा कैसे कर पाएँगे !

ज़वाब सुनकर वह झेंप-सा गया। मन ही मन बुदबुदाया ‘नाहक ही ऐसा बेतुका सवाल पूछ डाला’।

इफ यू डोंट माइंड .......एक बात कहूँ सर ? विशमास्टर ने हेलमेट उतारकर अपने हाथों  में ले लिया। अपने बुझे और मायूस चेहरे पर ‘सर्विस विद स्माइल’ के तहत  मुस्कान लाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा , सेफ्टी और सोशल डिस्टेंसिंग  मेन्टेन करना तो ज़रूरी है सर।.......लेकिन इतना भी नहीं कि उससे  इंसानियत का खात्मा हो जाए!                                                                                वह  झटके से बाइक स्टार्ट कर पलक झपकते आँखों से ओझल हो गया  और दे गया शालीन पलटवार से  शर्मिंदगी का वायरस जिसके चपेट में आकर वह यथावत् खड़ा रह गया ।

राजा-बेटा ( सांत्वना-2)

-अनिता ललित

 क्या माँ! तुम सुबह से रात तक अकेली काम में लगी रहती हो। विकी को बोलो तुम्हारी मदद किया करे। सिमरन माँ से कहने लगी।

अरे! क्यों तू उसके पीछे पड़ी है...मदद करे! मदद करे! क्या हो गया है तुझे? पढ़ाई कर रहा है वो बेचारा। मैं कर रही हूँ न। सदा की तरह, माँ का अपना रटा-रटाया जवाब था। अच्छा ये बता! तू इस बार इतनी खीझी हुई क्यों है? जब से ससुराल से आई है, बात-बात पर विकी से गुस्सा हो रही है। लगता है, लॉकडाउन का कुछ ज़्यादा ही असर हुआ है तुझपर। पहले तो कभी नहीं टोकती थी इतना। किसी बात पर झगड़ा हुआ है क्या उससे? मुस्कुराते हुए माँ ने पूछा।

नहीं माँ! ऐसा कुछ नहीं है ... अनमनी -सी होकर सिमरन बोली, उसे भी काम करने की आदत होनी चाहिए न, तुम्हारा हाथ बँटाना चाहिए। अब इतना छोटा भी नहीं रहा। कहते हुए सिमरन कपड़े उठाने चली गई।

थोड़ी ही देर बाद विकी के कमरे से कुछ शोर की आवाज़ सुनाई दी। सिमरन विकी को डाँट रही थी कि वो जाकर चाय बनाए , और विकी था कि चादर ताने पड़ा था। माँ ने बीच-बचाव करते हुए कहा, अरे क्या सिमु! सोने दे उसे! क्यों तू उसके साथ ज़बरदस्ती कर रही है? कुछ सालों में अपने आप समझ आ जाएगी। तेरी भाभी आएगी तो देखना, सब करेगा... माँ हँसते हुए बोली।

नहीं करेगा! तब भी कुछ नहीं करेगा! राजा-बेटा है न तुम्हारा! बल्कि तब तो और भी नहीं करेगा! वो इसलिए, क्योंकि तुमने तो उससे कभी कुछ कराया नहीं! और अगर करेगा  ... तो भी तुम्हें ही बुरा लगेगा कि देखो! पत्नी के लिए कैसे चाय बनाने पहुँच गया, कभी मुझे तो एक गिलास पानी तक नहीं पिलाया! तब तुम... हाँ माँ! तुम! तुम इसके और इसकी पत्नी के बीच में दीवार बनकर खड़ी हो जाओगी, उनके गले में एक काँटे की तरह फँस जाओगी और फिर... दोनों का जीना दूभर हो जाएगा; इसलिए बहुत ज़रूरी है, कि इन लाटसाहब से अभी से काम कराओ। ...चलो! उठो विकी!  ... विकी की चादर खींचते हुए सिमरन चीखती जा रही थी, मानों उसे कोई दौरा पड़ गया हो। उसकी साँस फूलने लगी थी।

और अवाक् खड़ी माँ, सिमरन के इस रूप में छिपे उसके गुस्से और दर्द को शिद्दत से महसूस कर पा रही थी। उसने हौले से सिमरन का हाथ थामा और गंभीर आवाज़ में बेटे से बोली, विकी! बहुत देर हो चुकी है! सूरज सिर पर चढ़ आया है। दस मिनट में उठकर बाहर आ जाना।