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Apr 1, 2026

कविताः भूमि का शृंगार तरु है

  - पूर्णिमा राय

बरसों से एक निगाह

थोड़ी सी लापरवाह!

ढूँढ रही थी हमेशा

शीतल छाँव का गवाह!!


कड़ी धूप का था साया

चाहे वे तरुवर छाया!

चलते ही पगडंडी पर

स्मरण उसे था यह आया!!


ओ नन्हे ! मेरी बात ले मान

ना कर कभी तू इतना गुमान!

सूखे पेड़ को दे जा पानी

वर्ना नहीं बचे जिंदगानी!!


आज वह बूढ़ा हो गया था

यौवन नशे में खो गया था!

प्रकृति से मुँह फेरके वह तो

कंकर राह में बो गया था!!


सुप्त चेतना ने उसे जगाया

बूढ़े ने फिर जग को बताया!

पेड़ धरा की असली धरोहर

तरुवर ने ही विश्व सजाया!!


पौधों को हम पानी दें

बचपन और जवानी दें!!

भूमि का शृंगार तरु है;

मिलकर नयी रवानी दें।

■

Mar 5, 2021

पर्व-संस्कृति - खालसाई ओज का प्रतीक होला महल्ला

-डॉ. पूर्णिमा राय 

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ एक ओर त्योहारों को अनदेखा और नजर अंदाज किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर लोगों में आपसी सदभाव और मिलनसारिता के भाव धूमिल होने लग गए हैं। जब भी होली की बात आती है, तो एक अजीब सी सिहरन मन, देह, आत्मा को कंपित कर जाती है। एक अनोखा- सा एहसास मन को उद्वेलित करने लगता है। अकेलेपन की त्रासदी का शिकार जनमानस आनंद के पलों की अनुभूति हेतु व्याकुल होता है। उसके लिए एकमात्र त्योहार ही आनंद के स्रोत हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।  सामयिक जीवन में लोगों के पास इंटरनेट की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं। लोग आज घरों से तो क्या ..अपने कमरे से बाहर निकलकर अन्य स्थान पर जाने के लिए भी तैयार नहीं, तो फिर हम कैसे होली जैसे पावन, मादकतापूर्ण, ऋतुराज के संदेशवाहक फाल्गुन का आनंद उठा सकते हैं !

फगुआ, धुलेंडी, फाल्गुनी आदि नामों से सुसज्जित होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एवं भारतीय संस्कृति का एक मुख्य एवं सुप्रसिद्ध भारतीय त्योहार है। बसंत का संदेशवाहक होली पर्व संगीत और रंग का परिचायक तो है ही,साथ ही प्राकृतिक छटा भी पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देती है। होली का सामाजिक धार्मिक एवं आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व भी है। होली हास-परिहास और उल्लास के साथ-साथ सामाजिक समरसता, समानता, एकत्व एवं मित्रता का सन्देश देने वाला पर्व  है।

होली' संस्कृत शब्द 'होलक से संबंधित माना जा रहा है जिसका अर्थ  है 'आग पर भूनी हुई हरे चने, मटर आदि की फलियाँ'।  चैत्र मास में नई फसलें पकने को तैयार होती हैं।  भारतीय मान्यता के अनुसार नए अन्न का उपयोग करने से पहले अग्नि भेंट किया जाता है।  नए अनाज की बालियों को होली की अग्नि में भूनकर भगवान के प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।  इन भुनी बालियों को होला कहा जाता है। इसे होली के दिन खाया जाता है।  पंजाब क्षेत्र में गेहूं वैसाख के महीने में होली के आने के बाद या इसके दौरान काटा जाता है।  

पंजाब क्षेत्र में होली के मुल्तान शहर में प्रहलाद-पुरी मंदिर में जन्म लिया।  होली शब्द से होलिका और प्रहलाद का प्रसंग भी जुड़ा हुआ है । प्रह्लाद को मारने के लक्ष्य से उसकी बुआ होलिका का स्वयं जल जाना भक्त प्रहलाद की भक्ति भावना का जीवंत उदाहरण है।  अबीर, गुलाल और रंगों की महक बिखेरती होली कहीं लाठी से, कहीं फूलों से, तो कहीं अपनी वीरता एवं युद्ध कला का अभ्यास करते हुए सिंह वीरों के खालसाई जज्बे से भरे प्रदर्शन में दिखाई देती है।

होली के शुभावसर पर पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब में  मक्खन और दूध  एक मटकी में डालकर एक उच्च स्थान पर लटका दिया जाता  है, जिसे तोड़ने की परंपरा आज भी जारी है। एक पिरामिड के रूप में छह लोगों को एक दूसरे के कंधों पर अपने हाथों से खड़े होना होता है। जो लोग मटकी तोड़ने के लिए बने पिरामिड में भाग नहीं लेते, वे बाहर रहकर पानी और रंगों को जोर से उनपर फेंकते हैं। यह मान्यता है कि ऐसा करना भगवान श्रीकृष्ण के माखन चोरी प्रसंग की याद को तरोताजा करता है जब वह भी अपने गोप -ग्वालों के साथ ऊँचे पर टँगी मटकी से माखन चुराने के लिए लालायित रहते थे।

तेज पुंज, दशम नानक श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने  जनमानस में शक्ति भरने के लिए होला महल्ला की परंपरा आरंभ की थी। उन्होंने युद्ध-कौशल, युद्ध-अभ्यास में पारंगत करने के लक्ष्य से जनसमूह को सैन्य-शक्ति में परिवर्तित किया था।  होला-महल्ला में ‘होला; शब्द खालसाई बोली से लिया गया है और  ‘महल्ला’ अरबी भाषा का शब्द है।  जिसका अर्थ है  आक्रमण, अर्थात् युद्ध-कौशल का अभ्यास।

होला मोहल्ला पंजाब का प्रसिद्ध उत्सव है।  सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री आनन्दपुर साहिब में होली  के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है। यहाँ होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में सिक्ख शौर्य, कला प्रदर्शन एवं वीरता के करतब दिखाए जाते हैं।

‘वेखके आनंद आ गया,

जी सोहनाँ लगिया आनंदपुर मेला।

गुराँ दे दवारे आ गया,

जी होके कम्म तों पंजाब सारा वेहला।।’

खालसा का निर्माण स्थल आनंदपुर साहिब में हर वर्ष नित नवल उत्साह के साथ संगत ट्रक, ट्राली, बस रेलगाड़ी, पैदल, मोटर साइकिल आदि हरेक प्रकार के साधनों से केसरी और नीले दस्तार और चोला सजाकर होला मुहल्ला की पारंपरिक गुरु मर्यादा को बरकरार रखने एवं होली उत्सव काआनंद पाने के लिए पहुँच जाते हैं। आनंदपुर की नवेली दुल्हन की तरह सजावट की जाती है । सर्वप्रथम किले आनंदगढ़ पर फूलों की वर्षा होती है। पाँच प्यारे नगाड़े बजाते हैं। ‘जो बोले सो निहाल’ के नारों से धरती आकाश गुंजायमान होता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब की हजूरी में तख्त श्री केसगढ़ साहिब से आरंभ होकर विशाल नगर कीर्तन पारंपरिक ढंग से हरेक वर्ष की भाँति दुर्ग आनंदगढ़ से गुजरता हुआ हिमाचल  की सीमा के निकट चरण गंगा स्टेडियम में संपन्न होता है ।

बाजाँ वाला सत्गुरु, सानूँ है उडीकदा

छेती करो संगते जी, समाँ जावै बीततदा

चल गुरु घर करने दीदारे, गड्डी च जगा मलियै

दिन होले ते मोहल्ले वाला आया, आनंदपुर चलियै।।

 इस शुभावसर पर शस्त्रों से सज्जित गुरु के प्यारे सिंह साहिबान गतका खेलते,नेज़ेबाजी करते,घुड़सवारी दौड़ प्रतियोगिता करते,मार्शल आर्ट के खतरनाक प्रदर्शन करके अपने उत्साह ,वीरता एवं पराक्रम के साथ-साथ गुरु मर्यादा का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जिन्हें देखकर स्वत: ही तन मन से हरेक प्राणी गुरु रंग में सराबोर हो जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष सैंकड़ों  निहंग सिंह आते हैं , जिनमें एक विशेष आकर्षण एवं  प्रेरणा स्रोत श्री अवतार सिंह महाकाल नामक निहंग सिंह जी हैं । इन्होंने 2012 में गुरु कृपा से हेमकुंट साहिब की पैदल यात्रा की है। यह हर वर्ष 645 मीटर का दुमाला (जिसका वज़न 95 किलो/ 75 किलो) बाबा दीप सिंह जी के आशीष से पहनकर आते हैं। इनका लक्ष्य है कि युवक माँ-बाप की सेवा करें,गुरु मर्यादा में रहें,केश कत्ल न करें,गीदड़ की मानिंद जीवन न जिएँ;  बल्कि गुरु के सिंह बनें। मनमत से दूर रहकर गुरमत में रहें।

पंजाब में होली का विशेष आकर्षण और आनंद सही मायनों में आनंदपुर के होला मोहल्ले में शामिल होकर ही आता है।


सम्पर्कः
गोकुल एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर 143001

 drpurnima01.dpr@gmail.com

Aug 10, 2019

रक्षाबंधन

पावन प्रेम का प्रतीक 
- डॉ. पूर्णिमा राय
रक्षा बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार।
दिवस 'पूर्णिमा' कर सजे,रक्षाबंधन तार।।
आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय समाज में व्यापकता और गहराई से समाए हुए इस पर्व के दिन लड़कियाँ और महिलाएँ पूजा की थाली सजाकर अपने भाई को राखी बाँधने के लिए जाती है।अभीष्ट देवता की पूजा करने के बाद रोली या हल्दी का टीका लगाकर भाई की आरती उतारती है और दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती हैं।इसके बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन लेता है और उसे उपहार में कोई धनराशि या कोई अमूल्य वस्तु प्रदान करता है।
रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके ।
शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके।
राखी के रंग-बिरंगे धागे बहन-भाई के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करते हैं।बहन-भाई के प्रेम का सूचक यह त्यौहार देशकाल, भाषा-जाति की सीमाओं से परे गुरु- शिष्य कि रिश्ते को भी राखी के पवित्र धागों में बाँधता है। कहते हैं जब कभी शिष्य गुरुकुल से शिक्षा लेकर विदा होता था तो शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद पाने के लिए अपने आचार्य को राखी बाँधता  था। इतना ही नहीं गुरु भी शिष्य को राखी बाँधता था ताकि वह प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन में बखूबी अमलीजामा पहनाए।
राखी का उपहार,मुझे यह दे दो भिक्षा ।
महके आँगन -प्यार, बहन की हरदम रक्षा।।
दो परिवारों और फूलों को जोड़ने वाला पर्व रक्षाबन्धन कब शुरू हुआ कोई नहीं जानता; लेकिन पौराणिक मान्यता के अनुसार जब देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ तब देवता दानवों को हावी होते देखकर घबरा गए। देवता इंद्र उस समय बृहस्पति के पास गए उस वक्त इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र किया और अपने पति के हाथ में बाँध दिया। लोगों का विश्वास है कि इसी धागे की मंत्र शक्ति से देवता विजयी हुए। धन शक्ति हर्ष और विजय से समर्थ यह धागा रक्षा कवच का काम करता है।श्रीमद्भागवत् में वामन अवतार के अनुसार जब राजा बलि ने 100 यज्ञ पूरे कर लिए और स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयास किया तो इंद्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेश धारण करके राजा बलि से भिक्षा मांमाँने गए गुरु के बार-बार मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि भगवान विष्णु को दान में दे दी। उस वक्त भी श्रावण मास की पूर्णिमा का ही दिन था भगवान् विष्णु ने तीन पग में सारा आकाश -पाताल और धरती को नाप लिया एवं राजा बलि को रसातल में भेज दिया। राजा बलि ने अपनी दृढ़ भक्ति से भगवान विष्णु को अपने पास रहने का वचन ले लिया। जब भगवान विष्णु घर नहीं पहुँचे ,तो लक्ष्मी जी परेशान होकर नारद मुनि के पास गई। नारद मुनि ने उन्हें एक उपाय बताया।लक्ष्मी जी ने नारद मुनि के उपाय के अनुसार राजा बलि को रक्षाबंधन बाँधकर भाई बना लिया और अपने पति को वापस ले आई।
कहते हैं रक्षाबंधन का दिन केरल तमिलनाडु,महाराष्ट्र और उड़ीसा के यज्ञोपवीत ब्राह्मणों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है इस दिन में वह नदी या समुद्र के तट पर स्नान करने के बाद ऋषि यों का तर्पण कर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं अर्थात बीते समय की पापों को, कलुषित भावनाओं को त्याग कर नया जीवन जीने की प्रतिज्ञा करते हैं।
मनमोहक राखी चमक,फैली चारों ओर।
बहन-प्रेम के सामने,किसका चलता जोर।।
किसका चलता जोर,बदल गई मन भावना।
ये रेशम की डोर,फैलाये सद् भावना।।
देखें जो इतिहास,मिला कर्मवती को हक।
जागे मन विश्वास,धर्म भाई मनमोहक।।
मेवाड़ के राजा बहादुर शाह ने जब मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया तब रानी कर्मवती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को धर्म भाई बनाया था और अपने राज्य की रक्षा करने के लिए राखी और पत्र भेजा था। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी हिन्दू बहन कर्मवती की रक्षा की थी। सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिन्दू शत्रु पोरसको राखी बाँधी थी और मुँह बोला भाई बनाया था और वचन लिया था कि वह युद्ध में उसके पति सिकंदर को नहीं मारेगा इसी के फलस्वरूप पोरस ने युद्ध में सिकंदर के प्राणों की रक्षा की थी। महाभारत में भी रक्षाबंधन का उल्लेख हुआ है जब पांडव युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ।तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना को राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी कहते हैं द्रौपदी ने भी कृष्ण को राखी बाँधी थी और कुंती ने अभिमन्यु को राखी बाँधी थी।

वर्तमान संदर्भ में देखें तो आज रक्षाबंधन के त्योहार के प्रति जो जज्बा, जुनून, आस्था, विश्वास और प्रेम धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है। यही कहना चाहूँगी ,हर एक भाई से हरेक बहन से कि भाई -बहन का रिश्ता अपनी पवित्रता में असीम है, इस पवित्रता को कभी भी कलुषित मत होने दें। आज वक्त की कमी सबको खलती है; लेकिन वक्त भी उसी का होता है जो वक्त के साथ चलता है।अगर कभी बहन के पास समय ना हो ,तो भाई को खुद उसके पास जाना चाहिए और अगर कभी भाई समय ना दे पाए तो बहन को उसके प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करते हुए बिना किसी नोकझोंक के राखी बाँधने पहुँच जाना चाहिए। धन दौलत की चकाचौंध में रिश्तों के बीच में दूरियाँ आ रही है। धन दौलत कभी टिकता नहीं है पर जो बहन भाई का प्यार है वह अजर -अमर है।  यह ना सोचतेहुए कि मैं गरीब हूँ या मैं अमीर हूँ अपने भाई को क्या तोहफा दूँ या अपनी बहन को राखी के बदले में क्या उपहार दूँ।इन भावनाओं से ऊपर उठकर सच्चे मन की प्रेम भावना से रिश्तों को मजबूत बनाएँ।जिस प्रकार लक्ष्मण जी ने सीता माता की रक्षा की थी उसी प्रकार लक्ष्मण जैसा भाई बन जाए।हर एक बहन को तोहफे में धन नहीं चाहिए, उपहार नहीं चाहिए। उसे चाहिए माता-पिता की सेवा क्योंकि बहने विवाह के पश्चात दूर चली जाती हैं पर वह अपने भाई से यही चाहती हैं कि उनके माता-पिता को वह सभी सुख दे ताकि उनके माता-पिता कभी भी किसी के आगे हाथ झुकाने के लिए मजबूर ना हो जाए यही तोहफ़ा सबसे बड़ा तोहफा है। मेरा भाई भी मेरे लिए दुनिया का सबसे प्यारा भाई है तो यही कहूँगी-
भाई मेरा सबसे न्यारा, मैं उसकी प्यारी बहना।
दूर कभी मत जाना भैया, मुझको बस इतना कहना।।

सम्पर्कः 55 गोकुल एवेन्यू,मजीठा रोड,अमृतसर १४३००१
drpurnima01.dpr@gmail.com