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Mar 10, 2017

उदंती.com , मार्च 2017

उदंती.com ,  मार्च 2017

यदि अपने आप को किसी रंग में रंगना है, तो प्रेम के रंग में रंग; क्योंकि इस रंग में रंगा हुआ मनुष्य मृत्यु के बंधनों से छूट जाता है।     
                   - सनाई
  

जीवन के रंग....

जीवन के रंग.... 
- डॉ. रत्ना वर्मा
  भारतीय संस्कृति में साल भर चलने वाले पर्व और त्योहार मनुष्य को एक दूसरे से जोड़े रखने का उत्सव होते हैं। रंगों का पर्व होली भी मेल-मिलाप और भाईचारे का त्योहार है। इस दिन हम सब आपसी गिले-शिकवे भुलाकर गुलाल का टीका लगाकर एक रंगभरी नई शुरूआत करते हैं... पर यह सब पढ़ते हुए आपको ऐसा अहसास नहीं हो रहा कि ये सब किताबी बाते हैं, जो हम बच्चों के निबंध में लिखवाते हैं। तो क्यों न किताबी बातें न करके वास्तविक धरातल की बात करें, जो आपके हमारे जीवन से जुड़ी हुई हो...
  इस रंग-पर्व पर मुझे अपना बचपन याद आ रहा है- जब होली में हम अपने गाँव जाया करते थे। नई उमंग नया उत्साह और नया रंग। दीपावली में जिस तरह नए कपड़े पहनने और खूब सारे पटाखे फोड़ने का उत्साह होता था, उसी तरह होली में नई पिचकारी और बड़ी- बड़ी हाँडियों में गुनगुना पानी भरके रंग घोलने का अपना ही आनंद होता था।
  तब फिल्मी होली की तरह सफेद कपड़े पहनकर होली खेलने का रिवाज़ नहीं था, हाँ हमारे बाबूजी जरूर तब भी खादी का झक सफेद धोती कुर्ता ही पहने होते थे; क्योंकि वे रंगीन कपड़े पहनते ही नहीं थे। बचपन से उनकी यही एक छवि हमारी आँखों में बसी हुई है। होली के दिन जब गाँव वाले उनसे मिलने आते, बड़ी शालीनता से उनके माथे पर टीका लगाकर उनके पैर छूते थे। रंग डालने की हिम्मत वे नहीं कर पाते थे; लेकिन जब वे फाग गाने वाली मंडली के बीच गाँव की गुड़ी (गाँव का प्रमुख चौराहा ,जहाँ सभी प्रमुख समारोह होते थे)  पँहुचते तो उनके कपड़ों पर भी रंग और गुलाल के छींटे पड़ते थे, जो उनके सफेद कपड़ों पर बहुत उभर कर आते थे और उन्हें देखकर मन को बहुत अच्छा लगता था। हम सब बच्चे तो कोई पुराना रंग उतरा कपड़ा ही पहन कर होली खेलते थे।
  सुबह से ही गाँव के प्रमुख चौराहे में पूरा गाँव इकट्ठा होने लगता था। ढोल- नगाड़ों की धमक के बीच फाग गीतों की गूँज चारो ओर गूँजने लगती थी। फाग गाने वाली मंडली के बीच न जात- पात का भेद होता न अमीर- गरीब का, सब उस मंडली में शामिल होते। रंग- गुलाल से पुते चेहरे सारे भेद-भाव को मिटाकर सबको एक रंग में रँग देते थे। फगुआरों की टोली हो-हल्ला करते परिचित-अपरिचित सबको रँगते हुए मस्ती में डूबी होती और हम बच्चे अपनी- अपनी पिचकारी में रंग भरकर हर आने- जाने वालों पर रंग डालकर खुशी से झूम उठते थे।
  घर में होली मिलन के लिए आने वालों का रेला लगा होता था। सब गुलाल का टीका लगा कर बड़ों से आशीर्वाद लेते, गले मिलते और मुँह मीठा करके ही जाते। तरह-तरह के पकवानों की खुशबू भूख बढ़ा देती। रंग- गुलाल खेलते हम दिन भर गुजिया- मठरी खाते थकते ही नहीं थे। शाम होने को आती पर हमारी पिचकारी के रंग खतम ही नहीं होते। तब तक घर के भीतर से माँ की पुकार कई बार हो चुकी होती थी, कि अब रंग खेलना बंद करो, रात में नहाओगे तो ठंड लग जाएगी। मन मारकर हम रंग खेलना बंद करते। तब चूड़ी रँग से रँग घोला जाता था, जो चमड़ी पर ऐसा रँगता था कि उतरता ही नहीं था। कई-कई दिन लग जाते थे रंग उतारने में।
  ये तो हो गई बचपन की बातें। अब थोड़ी आज की बातें भी हो जाए... आज क्या है जो याद करने लायक है, जिसे आप सबसे साझा किया जा सके... रंग अब भी खेलते हैं, पकवान अब भी बनते हैं, पर न अब फगुआरों की टोली आती, न ढोल- मंजीरे बजते, न फाग गीत गाए जाते और न ही गाँव वाले एक जगह इकट्ठा होते और न ही बड़ों से आशीर्वाद लेने आते। दो-चार बहुत करीबी टीका लगाने आ गए तो बड़ी बात है, अन्यथा सब अपने अपने घरों में कैद.... बड़े- बुजुर्ग कहते हैं ना कि गाँव की हवा खराब हो गई है। शायद इसी सन्नाटे को हवा खराब होना कहते हैं।
  सच कहा जाए तो जीवन के रंग फीके पडऩे लगे हैं। हमारी संस्कृति में रचे बसे ये त्योहार हमारे जीवन में उत्साह, उमंग और विविध रंगों से जीवंत बनाए रखते थे। अब तो गाँव की क्या होली और क्या दीवाली। तरह-तरह के नशे ने युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बगैर नशा किए उनका कोई त्योहार नहीं मनता। ऐसे माहौल में गाँव जाना ही स्थगित होते चले जा रहा है।
  शहरों में तो होली यानी छुट्टी का माहौल। लोग चादर तान कर घर में सोते हैं और मानों उन्हें थकान उतारने का मौका मिल गया हो। हाँ सुबह सवेरे रंग-गुलाल के कुछ छींटे अवश्य पड़ जाते हैं। सोसायटी परम्परा के चलते अपनी-अपनी सोसायटी और परिवारों के बीच मिलन समारोह का आयोजन करके सब एक दूसरे पर रंग लागा लेते हैं और मुँह मीठा कर लेते हैं। कुछ लोग मिलजुल कर पार्टी आयोजित करके खुशियाँ मना लेते हैं। रही बात फाग गीतों और ढोल-नगाड़ों की तो ये सब अब रेडियो और टीवी में ही सुन कर खुश हो लेते हैं। और जो टीवी प्रेमी हैं वे घर बैठे हर चैनल में हर धारावाहिक में कलाकारों को नकली होली खेलते देखकर खुश हो लेते हैं।
  इधर कुछ सालों से एक और नई संस्कृति पनपते दिख रही है। पर्यटन की संस्कृति। कई बार होली के समय शनिवार -रविवार आ जाने से तीन- चार दिन की छुट्टी एक साथ मिल जाती है तो बहुत से परिवार इसका फायदा उठाते हुए किसी पयर्टन स्थल पर या जंगल की संस्कृति को करीब से देखने के लिए घूमने जाना पसंद करने लगे हैं। ठीक भी है गाँव के नशे वाले माहौल से तो प्रकृति के बीच कहीं छुट्टी पर चले जाना ही अच्छा है। ग़ालिब की तर्ज पर-
 हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल को बहलाने कोगालिब' ये ख्याल अच्छा है
 ख्याल कितना भी अच्छा हो पर हमारी संस्कृति ,हमारी तहज़ीब और हमारे त्योहारों के वास्तविक स्वरूप का विलुप्त होते चले जाना हमारे लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। तो क्यों नहीं इस माहौल को बदलने का प्रयास किया जाए। नोटबंदी की तरह शराबबंदी का हल्ला भी अब शुरू हो ही चुका है, जिसका सबको समर्थन करना चाहिए। नशे को लोगों के जीवन से समाप्त करके भाईचारे और प्यार का रंग भरने का समय आ गया है। आइए हम सब मिलकर सोचें और जीवन में खुशियों के रँग भरने का प्रयास करें।
होली की रंग भरी शुभकामनाओं के साथ-  

पर्व- संस्कृति:

   रंग नहीं जानते जाति धर्म  
            - गिरीश पंकज

रंग-संग खेलेंगे प्यार से जरा,
कह दो ये कह दो, संसार से ज़रा ।
रंग नहीं जानते हैं जाति-धर्म को,
रंग नहीं मानते हैं, छूत-कर्म को।
गले लग जाओ, हर मानव से तुम
भूल जाओ तुम, झूठे लाज शरम को।
ऊपर उठ जाओ, तकरार से ज़रा।  

प्रेम की बोली हो, मस्ती हो, ठिठोली हो. तब हर दिन ही होली हो।  यही सोच हमारे जीवन को रंगों से सराबोर कर सकती है।  होली, फाग अथवा रंगोत्सव, हमारी सांस्कृतिक विरासत की एक ऐसी कड़ी है, जिसके बिना हम अपने जीवंत समाज की परिकल्पना ही नहीं कर सकते। होली, महज रंगों का ही त्योहार नहीं है, वरन रंगों के माध्यम से हमारे जीवन के उल्लास और आपसी सद्भावना के लिए निरन्तर अभिप्रेरित करने की गौरवशाली परम्परा भी है। भगवान कृष्ण के समय का 'ब्रज', जैसे साल भर होली की प्रतीक्षा में ही व्याकुल रहा करता था; इसीलिए तो होली का दिन पास आते ही समस्त ब्रजवासी 'फगुआ' जाते थे। फागमय हो जाते थे। गोकुल, बरसाने, वृंदावन और मथुरा के गली-कूचों में रंगों का ऐसा इन्द्रधनुष बनता था, जिसकी छटा लोगों के अंतस में अमिट हो जाया करती थी। प्रेम और भाईचारे के रूप में।
और अब? खेद है कि रंगों की इन्द्रधनुषी छटा अब धूमिल पड़ती जा रही है। आज इस अमानवीय होते हाईटेक-परिवेश में जब आदमी की करुणा मरती जा रही है, उत्सवादि बेमानी और महज औपचारिक होते जा रहे हैं। न केवल औपचारिक होते जा रहे हैं, वरन् अलगाववादी भी हो गए हैं। आज सभी धर्मावलम्बियों के उत्सव-पर्व अजीब-सी दहशत भर देते हैं। त्योहार आता है और मन में यह कुशंका घर कर जाती है कि कहीं कोई दंगा-फसाद न हो जाए, कहीं कोई ऐसी अप्रिय वारदात न हो जाए,  जिससे
प्रेम और सद्भाव की महान परम्परा आहत हो जाए। समझदार और विश्वबंधुत्व की मंगलकामना करने वाले लोगों के रहते अप्रिय वारदातें नहीं हो पातीं ; लेकिन धर्म, जिन लोगों के लिए व्यक्तिगत या जातिगत आस्था का सवाल है, और धर्म जिनका पागलपन बन चुका है, ऐसे लोगों के चलते माहौल में कटुता बिखर ही जाती है। और, यहीं से शुरू होती हे, उत्सव को 'विद्वेष' बना देने की गैर मानवीय प्रवृत्ति।
हर धर्म, मजहब के तमाम पर्वोत्सव में आपसी सद्भाव की बातें निहित रहती हैं, लेकिन 'होली' का अपना विशेष महत्व है, क्योंकि इस पर्व का बुनियादी लक्ष्य ही यही है कि गुलाल-अबीर और इन्द्रधनुषी रंगों के आदान-प्रदान के साथ गले लगाते हुए, न केवल मन का सारा कलुष भी धो दिया जाए, वरन् आपसी प्रेम का ऐसा रंग भी चढ़ा दिया जाए, जो आजीवन छुटाए नहीं छूटे। होली को इसी रूप में लेना चाहिएलेकिन चाह कर भी ऐसा परिदृश्य तैयार कर पाने में हमें सौ फीसदी सफलता नहीं मिल पाई है। एकदम से हताशा की या भयावह स्थिति नहीं है, तथापि दरके हुए जीवन-दर्शन की बढ़ती कुरूपता को स्पष्ट देखा जा सकता है। महसूसा जा सकता है.. होली को एक सांस्कृतिक एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह लेने की ज़रूरत  है। होली केवल एक धर्म की धरोहर क्यों बने? इसे विराट रूप क्यों न दे दिया जाए ? जिस विश्व बंधुत्व की बात हमारे महापुरुष करते रहे हैं, वह इसी तरीके से तो आ पाएगा! होली ही क्यों, सभी त्योहारों का विभिन्न धर्मों के साथ ऐसा तालमेल हो जाना चाहिए कि लगे ही नहीं, त्योहार किसी धर्म विशेष की धरोहर है। त्योहारों का विराटीकरण हो जाने से हम नए युग-बोध से संपृक्त होकर एक ऐसे परिवेश की सृष्टि कर सकेंगे जिसकी समकालीन समाज को सख्त ज़रूरत है।
होली के साथ यह गुंजाइश कुछ और अधिक इसलिए भी बढ़ जाती है कि इसमें मानव जीवन के हास-उल्लास की भरपूर गुंजाइश रहती है। होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें आप किसी के मुख पर कालिख भी पोत सकते हैं, वह कुछ भी नहीं कहेगा, बशर्ते  वह रंग ही हो, कोलतार या कीचड़ न हो। बशर्ते वह भाँग हो, दारू नहीं। होली में आप किसी को भी रंगों की नदी डुबो दीजिए, 'बुरा न मानो होली है...' कह कर मज़ाक  भी कर लीजिए, कोई बुरा नहीं मानेगा। बशर्ते मज़ाक शालीन हो। होली के माध्यम से आप अपनी कुंठा का नग्न प्रदर्शन अथवा किसी का चरित्रहनन करने की घटिया कोशिश करेंगे, तो होली की मूल प्रवृत्ति आहत करने के बराबर है। होली को अंगरेजी  के 'होली' (पवित्र) के रूप में मनाया जाए, तो इस त्योहार की गरिमा और आनंद सौ गुना बढ़ जाए, जिसकी कमी बेहद खलती है। होली को अपनी
शैतानियों के प्रदर्शन का साधन बनाने की मानसिकता के कारण ही सभ्यजन होली के दिन बाहर निकलने से डरने लगे हैं। कब, कौन, कहां से निकल कर मुख में कीचड़, शरीर पर केंवाच, रंग भरे गुब्बारे आदि दाग कर आगे बढ़ जाए, कहा नहीं जा सकता। आप की इच्छा के विपरीत पूरी निर्लज्जता के साथ होली मनाने के मूड में मनचले लड़के कब आपका कपड़ा तार-तार कर दें, कब आपके सायकल-स्कूटर की हवा निकाल दें, प्रतिरोध करने पर आपको कब कोई अचानक पीट दे, कहना मुश्किल ही है। इस तरह के हादसे होते रहे हैं। इस तरह की हरकतों ने होली को एक 'डराने वाले त्योहार' के रूप में तब्दील कर दिया है।
इन तमाम पहलुओं को (कुछ छूट भी गए हैं) देखते हुए लगता है कि 'होली हमारे लिए एक कड़ुवा स्वाद' ले कर उपस्थित होती है, लेकिन कड़ुवाहट की कुछेक दुर्घटनाओं को छोड़ दें ,तो होली आज भी रस-रंग से सराबोर कर देने वाला त्योहार है। होली के आते ही मस्ती का ऐसा ज्वार उमड़ता है कि लोगबाग रोजमर्रा की परेशानियों को बिसरा कर रंगों के 'सागर' में एकरस हो जाते हैं। 'फाग-कबीरा' और ढपली के साथ थिरकती टोलियों को देखिए, लगता ही नहीं है कि ये लोग महँगाई या और इसी तरह की अनेक परेशानियों से घिरे हुए हैं। दरअसल होली हमारे अंतस् में ऐसा नवोमंग भर देती है कि हम होलीमय परिवेश में सब कुछ भूल कर जीवन को इस दर्शन से प्रतिबद्ध कर देते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है और इसके हर पल को आस्था-विश्वास और मनोरंजन के साथ जी लेना चाहिए।
'
हँसी जीवन का प्रभात है।' किसी महापुरुष का यह कथन होली के संदर्भ में भले ही न कहा गया हो, पर इससे जोड़कर ज़रूर  समझा जा सकता है। होली हँसी-ठिठोली का त्योहार है। मनहूसियत का इससे कोई वास्ता नहीं। इसलिए होली में हम लोग महामूर्ख सम्मेलन जैसे आयोजन भी करते हैं। इसके पीछे सोच यही है कि एकाध दिन तो हम अपनी 'तथाकथित' बुद्धिमानी को बलाए ताक रखकर जीवन जिएँ। एक-दूसरे को मूर्ख बना कर और खुद भी 'मूर्ख'बन कर जीवन को सरसता से भर दें। मूर्ख बनने और बनाने का सुख भी अलग किस्म का होता है। एक अप्रैल को मनाए जाना वाला 'अंतरराष्ट्रीय मूर्ख दिवस' क्या है? आदमी की, जीवन में मूर्खता के साथ हँसने-मुस्कराने के कुछ पल देने की कोशिश ही तो है। होली में हम लोग मूर्खता भरी हरकतें करते और झेलते हैं और बुरा भी नहीं मानते।
बस, इस होली को सम्प्रदायवाद से ऊपर ले जाने की आवश्यकता  है। होली सिर्फ हिन्दुओं का त्योहार बन कर क्यों रहे ! यह सभी धर्मावलंबियों का त्योहार क्यों न बने!! इसके लिए पहल उन जागरूक लोगों को ही करनी होगी, जो यह मान कर चलते हैं कि इस विशाल और धर्मनिरपेक्ष भारत में केवल हिंदू भर नहीं रहते, इस देश में अनेक धर्मों के मानने वाले लोग रहते हैं। अत: उत्सव-पर्वों के दौरान समस्त धर्मावलंबियों को एकजुट हुकर आनंदित होना चाहिए। 'होली-मिलन' जैसे सार्वजनिक आयोजनों में सभी धर्मों के लोगों को आमंत्रित किया जाना चाहिए। प्रेम और सद्भाव का ऐसा रंग चढ़ाया जाना चाहिए ,जो जीवन भर न उतर सके। न केवल होली, वरन समस्त त्योहारों को इसी तरह मनाने की आवश्यकता  है। तभी समाज में साम्प्रदायिक सद्भाव का 'इन्द्रधनुष'  रच पाने में हम सफल हो सकेंगे। होली के 'रंग' सबके गालों (वो चाहे काले हों, गोरे हों या चिकने हों। रंग जैसे धर्म निरपेक्ष होते हैं, उसी तरह हमारी दृष्टि भी होनी चाहिए। होली को इस नई सांस्कृतिक सोच से जोड़ कर देखेंगे, तो नए मूल्यों की रचना तो होगी ही, समाज में सुख-शांति का ऐसा माहौल बन जाएगा, जिसकी सबको अपेक्षा है। इस हेतु मिल-जुलकर पहल करने की ज़रूरत है। शुरूआत इसी होली से क्यों न हो?
संपादक-  सद्भावना दर्पण कार्यालय- २८ प्रथम तल, एकात्म परिसररजबंधा मैदान रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001, मोबाइल: 09425212720निवास- सेक़्टर-3, एचआईजी-2, घर नंबर- 2दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, 

भेद-भाव को मेटता होली का त्योहार

         भेद-भाव को मेटता होली का त्योहार
             - डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
फागुन में नीके लगें, छींटे औ' बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्योहार।।

शीत विदा होने लगा, चली बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली का त्योहार।।

पाना चाहो मान तो, करो मधुर व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली का त्योहार।।।

रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।
भेद-भाव को मेटता, होली का त्योहार।।।

तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्योहार।।।

भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।।

छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्योहार।।।

सरस्वती माँ की रहे, सब पर कृपा अपार।
हास्य-व्यंग्य अनुरक्त हो, होली का त्योहार।।।

आयो नवल बसंत सखी...

       आयो नवल बसंत सखी... 
                   - ज्योतिर्मयी पंत
जनमानस को नयी स्फूर्ति, उमंग ऊर्जा से भर देते हैं त्योहार;इसीलिए विश्व में त्योहार मनाने की परंपरा  बनी होगी.हमारे देश में हर क्षेत्र में विविध पर्व और त्योहार मनाये जाते हैं। इनमें होली इकलौता ऐसा पर्व है जिसके नाम से ही मन उमंग और उल्लास से भरने लगता है। यों तो होली पूरे देश में ही मनाई जाती है परन्तु उत्तराखंड की होली अति विशिष्ट है।इसे अन्य स्थानों की तरह कुछ दिन ही नहीं अपितु एक लम्बी अवधि तक मनाने की परम्परा है।
 कुमाऊँ क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही होली का आरम्भ हो जाता है और शिव रात्रि के बाद दिनों दिन उत्साह बढ़ता जाता है और फाल्गुन की एकादशी से तो पूर्ण रूप से होली मनाई जाती है।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी या आमलकी एकादशी के दिन चीर बंधन किया जाता है ।एक वृक्ष विशेष की बड़ी सी शाखा को  काटकर एक सुनिश्चित स्थान पर विधिपूर्वक गाड़ दिया जाता है।मोहल्ले के घरों के सदस्य इसमें लाल और सफ़ेद कपड़े की चीर बाँधते हैं।होली पर्यंत इसकी रक्षा की जाती है ।यहीं पर धूनी सी जलाकर लोग रात भर नाचते गाते हैं।
चीर बाँधते समय भी प्रश्नोत्तर रूप में गीत गाते हैं-
 कैले(किसने ) बाँधी चीर हो रघुनन्दन राजा
गणपति बाँधी चीर हो ...इस तरह सभी देवताओं का नाम लिया जाता है.बाद में परिवार के सभी सदस्यों का नाम की इन इन लोगों ने चीर बाँधी।
ज्योतिषीय गणना के आधार पर भद्रा रहित मुहूर्त में देवी देवताओं पर रंग छिड़का जाता है और सभी सदस्यों के लिए लाए गए सफ़ेद कपड़ों पर भी रंग के छींटें दिए जाते हैं।इसके बाद तो घर घर में होली की बैठकों की धूम मच जाती है।
होली की बैठकों में भी पहले देवताओं -गणेश, शिव शंकर ,विष्णु भवानी  की स्तुति वाले फाग गीत गाये जाते हैं ।
सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन
होली खेलें गिरिजापति  नंदन ।
.............................................
ऊँचे भवन पर्वत पर बस रही
अंत तेरा नहीं पाया मैया
........................................
शिव शंकर आज खेले होरी
.......... फिर राम और कृष्ण के जीवन पर आधारित गीत।

गायन शैली के आधार पर यहाँ दो तरह की होली होती है ।ठाड़ी यानी खड़ी होली;जिसमें पुरुष और  कहीं स्त्रियाँ भी खड़े होकर गोलाकार घूमते हुए नाचते हैं गीत  के बोलों के अनुसार  क़दमों की ताल और गति बदलती जाती है.ढोलक ,मंजीरे ,हुड़का, दमुआ की थाप  पर सभी बच्चे बूढ़े थिरकने लगते हैं।
बैठकी या बैठी होली  अधिकतर शास्त्रीय राग रागिनियों पर आधारित होती है ये महफ़िलें अक्सर शाम से शुरू होती हैं ।हारमोनियम, तबला,ढोलक, बाँसुरी, मंजीरे की संगत के साथ गायन होता हैएक गायक गाता है और सभी मन्त्र मुग्ध होकर सुनते हैंया एक गायक के गीत की पंक्ति पूरी होते ही दूसरे गायक की गायकी शुरू होती है ।कई बार तो एक ही गीत कई घंटों तक चलता रहता है और लोग तल्लीन होकर झूमने लगते हैं। कुछ ही गीतों में रात  बीत जाती है ...
आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो
और  
कौन गली गए श्याम...जैसे गीत तो निरंतर चलते रहते हैं।     
 गीतों  का विषय और क्रम भी नियम से ही होता है .पहले सभी देवी देवताओं की स्तुति वाले होली गीत फिर  धीरे धीरे जोश और उमंग में शृंगार रस पूर्ण....कृष्ण की रासलीला के  गीत और हँसी ठिठोली वाले गीत गाये जाते हैं. जिनमें देवर भाभीजीजा साली और पति पत्नी की नोंक -झोंक प्रदर्शित होती है.विरहिणी नायिकाओं के गीत भी गाए जाते हैं जो पक्षियों के माध्यम से प्रिय को सन्देश भेजती हैं....
ओहो मोहन गिरधारी
ऐसो अनारी  चूनर गयो फारी
हँसी हँसी दे गयो गारी
चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो
और भिगो गयो सारी..
एकाकी नायिका तोते से कहती है की बागों में बोलने से अच्छा ,वह पिया को सन्देश दे ....
हरा पंख मुख लाल सुआ
बोलिय झन बोले बागा में
कौन दिशा में बदल देखे कौन दिशा घनघोर
कहाँ सुखाऊँ पिया की पगारिया कहाँ सजाऊँ सेज.
होली के गीतों में  कुमाऊँनी, ब्रजभाषा और खड़ी बोली के गीत शामिल हैं ।  
 महिलाओं की होली बैठकें अक्सर दिन में होती हैं ।नाच गाना, हँसी- मजाक, स्वांग आदि इसके विशेष अंग होते हैं; जहाँ महिलाएँ निःसंकोच होकर मस्ती भरी बातें कर लेती हैं और रोज की जिंदगी के तनावों  से मुक्त होकर  ऊर्जा पाती हैं।
 होली जहाँ एक और रंगों का त्योहार है, वहीँ दूसरी और विशेष पकवानों का भी। इस अवसर पर गुजिया अवश्य बनाई जाती है। सूजी का हलवाआलू के गुटके (उत्तराखंड का विशेष व्यंजन ) पकौड़े व मिठाइयाँ, चाय, पान-सुपारी आदि से सभी मेहमानों का स्वागत होता है। मस्ती के आलम में ठंडाई, शरबत, पकौड़ों और मिठाइयों  में भाँग भी मिला दी जाती है, जिसे खाकर लोगों की हरकतें और हँसने- हँसाने का माध्यम  बन जाते हैं।
 फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका -दहन होता है। पहले दिन जो चीर बाँधी गई थीउसीका दहन होता है।वहाँ भी हलवा आदि व्यंजन बनते हैं और हर घर में प्रसाद के तौर पर बाँटा जाता है। अगले दिन छरडीमनाई जाती है। होलियारों की टोलियाँ ढोल-मंजीरों के साथ नाचती-गाती घर-घर में जाती है,जहाँ रंगों से होली खेली जाती है,.खूब भीगा- भिगोया जाता है। परम्परानुसार सबको जलपान कराया जाता है।
  फिर आशीर्वचन किया जाता है, जिसमें सभी देवी देवताओं, ग्राम देवताओं, इष्ट देवताओं का स्मरण कर घर के प्रत्येक  सदस्य का नाम लेकर उसकी सुख समृद्धि, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ  दी जाती हैं यथा ....
हो हो होलक रे
बरस दिवाली बरसे  फाग .हो  हो
जो नर जीवे खेले फाग  हो हो
आज का बसंत के का घरौ
फिर घर के सदस्य का नाम लेते हुए ....
आज का बसंत (अमुक)का घरौ..
सब परिवार जी वे  लाखे बरी (बरस= वर्ष )
फिर प्रत्येक घर के लोगों को उनके अनुसार पास होने, नौकरी पाने, शादी व्याह या वंश वृद्धि के आशीष दिए जाते हैं और सभी घरों की ओर टोलियाँ जाती हैं। अपरिचित लोगों से भी जान पहचान इस दिन हो जाती है। जिनसे किसी कारण अनबन हो गई हो, उन्हें भी रंग लगा कर गले लगाया जाता है भूल-चूक माफ़ होली मुबारक कहते हुए सभी से बिना भेद भाव  मिलजुल कर लोग दोपहर बाद ही अपने घर पहुँचते हैं  और स्नान के बाद भोजन होता है।
 इस तरह सारी बीती बाते भूल नयी ऊर्जा से लोग फिर अपने काम में लग जाते हैं। बदलते समय का असर हमारे त्योहारों पर भी पड़ा हैजहाँ एक ओर हम अपनी परंपरा से दूर हो रहे हैं ,नए पाश्चात्य त्योहारों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।होली ऋतु आधारित उत्सव है। सर्दी में जहाँ लोग घर में रहना पसंद करते हैं. बर्फ और शीत लहरों का मुकाबला करना पड़ता है.बसंत आगमन के साथ प्रकृति का भी रूप निखर उठता है। धूप गुनगुनी हो आती है, वृक्ष नव पल्लव धारण करते हैं। सरसों, पलाश अन्य पुष्प  भी रंगों की छटा बिखेर देते हैं पक्षी कलरव करते हैं भँवरे गुंजन तितलियाँ नाचती हैं, तो ऐसे में मानव मन शांत कैसे रह सकता है ? प्रकृति के उपहारों संग पर्व की खुशियाँ मिलकर मनाएँ.
 होली का रंग और उमंग भरा त्योहार सभी को मुबारक.

माफ़ करना माँ

           माफ़ करना माँ 
                      - सत्या शर्मा कीर्ति

पता है माँ
मेरी विदाई के वक्त
जो दी थी तुमने
अपनी उम्र भर की सीख
लपेटकर मेरे आँचल में।

चौखट
लाँघते वक्त
मैंने टाँग दिया उसे
वहीं तेरी देहरी पर

गवाह है
नीम का वो चबूतरा
तेरी बेवसी और
ख़ामोशी का

इसलिए मैं
चुराकर ले आई
तेरे टूटे और बिखरे
ख़्वाब

जिसमें मैं प्रत्यारोपित
कर सकूँ
उम्मीदों और हसरतों
की टहनियाँ ।

ताकि जब
मेरी बेटी विदा हो
मैं बाँध सकूँ
उसके आँचल में
आत्म सम्मान का
हल्दी -कुमकुम...


सम्पर्कः डी-2, सेकेण्ड फ़्लोर,महारणा अपार्टमेण्ट, पी पी कम्पाउण्ड, राँची-834001 (झारखण्ड)

प्रेम को होरहा न करो

   प्रेम को होरहा न करो 
            विद्यानिवास मिश्र 
 पहले मैं हिन्दी  के सुविज्ञ पाठक से निवेदन कर दूँ कि 'होरहा' क्‍या चीज है।हिन्दी  का पाठक हरे चने की सुगंधित तहरी से परिचित होगा, कुछ और नीचे उतरकर वह बूट से भी परिचित होगा, पर डंठल-पत्‍ती-समेत भूनकर और तब छील-छाल कर नए अधपके चने का बिना नमक-मिर्च के आस्‍वादन शायद उसने न किया हो। जिसने किया होगा, उसे 'होरहा' का अर्थ बताने की जरूरत नहीं। सिर्फ इतनी याद दिला देने की चीज रह जाती है कि यह मौसम होली के साथ-साथ होरहा का भी है।
देहातों में वन-महोत्‍सव की तीसरी वर्षी गुजर जाने के बाद भी ईंधन की समस्‍या हल करने के लिए अरहर ही काम में आ रही है, सो माघ का जाड़ खेपाने के पहले ही वह खप जाती है। इसलिए विधिवत रसोई का सरंजाम हो नहीं पाता। कचरस और मटर की छीमी पर ही दिन कटते हैं, फागुन चढ़ते-चढ़ते होरहा के रूप में भुने अन्‍न का सुअवसर प्राप्‍त हो पाता है। जिन भू-भागों में जड़हन (अगहनी धान) नहीं उपजती, वहाँ माघ दूभर हो जाता है और अभावों के साथ जूझने वाले किसान का जी 'होरहा' हो उठता है। इसलिए जब वह अपनी कमाई को नई फसल में इतनी प्रतीक्षा के बाद आँखों के सामने फलते देखता है तो उसके मन में मधुर प्रतिहिंसा जग उठती है और अधपके डाँठ काट-काटकर वह होरहा जलाने लगता है। इस महीने वह 'सम्‍मति मैया' (संवत माता) को फूँकने के लिए छानि-छप्‍पर कोरों-धरन (कडी़-बल्‍ली) खटिया के टूटे पाए और गोहरा (उपलों के डंडे) के अंबार चोरी कर-कर के जुटाता है। जलाने के लिए यह उल्‍लास उसमें जलते रहने का अवश्‍यम्‍भावी परिणाम है। इस साल मेरे गाँव के इर्द-गिर्द ओला पड़ा है; बाढ़ और सूखा की सुदृष्टि तो बरसों से यहाँ बनी हुई है, इस ओला में समूची खेती पथरा गई है, सरसों और मटर के फूलों से धरती भिन गई है; गेहूँ और जौ की बालियों के झुमकों की एक-एक लर (लड़ी) बिथुर गई है और आस की अंतिम साँस भी घट कर टूट गई है। रह गई है धाँय-धाँय जलती हताशा, जो सर्वस्‍व चले जाने पर निश्चिंत और निर्द्वंद्व होकर बैठ गई है। कल की फिक्र करते-करते किसानी थक गई है और इसलिए वह वर्तमान की बची-खुची उपलब्धि को फूँक डालने पर एकदम उतारू हो गई है डेहरी में अनाज भरा जाएगा या नहीं, खलिहान की राशि में गोवर्धन लोट-पोट करेंगे या नहीं, बेंग (बीजऋण) भरा जाएगा या नहीं, फगुआ के दिन पूड़ी के लिए दालदा आएगा या नहीं, इसकी उसे लेशमात्र भी चिंता नहीं; वह ओले की मार से कोना-अंतरा में बचे डाँठ का होरहा बना रही है, चिर युगों से क्षुधित उदर को जी-भर पाट लेने की उसे उतावली है, कौन जाने फिर यह देवदुर्लभ पदार्थ मिलेगा भी या नहीं, क्‍योंकि वह आज मुक्ति की राह पा चुकी है। किसानी की समस्‍त ममताएँ, धरती के प्रति सारा चिपकाव और देहली के लिए अशेष मोह सभी आज स्‍वप्‍न के तार की भाँति टूट गए हैं। प्रेमचंद के होरी के गोदान-वेला सच्चे माने में आज आई है, अंतर इतना ही है कि आज उस गोदान को संपन्‍न कराने के लिए उसकी धनिया के पास बछिया क्‍या छेरी तक का निकर (निष्‍क्रय-द्रव्‍य) नहीं है, उसके पास दान करने को केवल जली खेती का चिता-भस्‍म बच रहा है।

सुना है महाकाल के मंदिर में शिव को चिता-भस्‍म चढ़ाना जरूरी होता है, जो आज, गोदान, हम मुमूर्षु भारतीय होरी को करा सकें या नहीं, उसकी चिता से बटोर करके महाकाल के अधिष्‍ठाता दैवत के शीश पर दो मुठ्ठी गरम राख तो चढा़ ही सकते हैं। अबीर और गुलाल से ये देवता रीझने वाले नहीं। इन्‍हें फल के नाम पर कनक और मदार चाहिए, दोनों ही बौराने वाले फूल इन्‍हें पत्ती के नाम पर भाँग चाहिए, फल के नाम पर बैर (बदरी) जो इस मौसम का प्रतिनिधि भारतीय फल है। इन चीजों का अकाल इस देश में कभी भी न पड़ेगा और अपने शिव को प्रसन्न करने के लिए कम से कम हमें विदेश के आयात पर अवलंबित नहीं होना पड़ेगा। खैर ये तो जड़ प्रकृति की वस्‍तुएँ हुई, शिव की पूजा में मानवी कला के उपादान भी चाहिए। वे डमरू की घ्‍वनि-से शब्द-सृष्टि करने वाले और प्रत्‍येक युग-संध्‍या में तांडव रचने वाले नटराज हैं, कला उनके लिलार में लिखी है, वे चिता-भस्‍म वालों से कुछ और भी माँगते हैं, वे अपने उपासक प्रेत-कंकालों से नृत्‍य-संगीत भी माँगते हैं, यह न हो सके तो कम-से-कम अपने नृत्य पर ताल तो माँगते ही हैं। यह न मिले तो शिव शव हो जाएँ; इसलिए खेती-बार, घर-दुआर, तन-मन और राग-रंग सब कुछ होरहा करने से ही नहीं चलेगा सब कुछ गाँवा के और सब कुछ होम करके भी हमें ताल देना सीखना होगा, शिव के साथ नाचना सीखना होगा। हम न सीख सके तो हमारी विफलता होगी, हमारी भारतीयता को बहुत बड़ी चुनौती होगी। अभी बसंत-पंचमी के आस-पास अपने प्राचीन स्‍वतंत्रता दिवस तथा नए गणराज्‍य दिवस के समारोह में हमने लोक-नृत्‍य उत्‍सव धूमधाम से मनाकर अपनी क्षमता का परिचय दिया है। हमें इसे कायम रखना है।
हम यदि मसान की मस्‍ती कायम न रख सके तो हमारा शिव शव हो जाएगा, तब छिन्‍नमस्‍ता महाकाली उसके ऊपर तुरंत खप्‍पर लिए नाच मचाने लगेगी। उस शोणित-रंजित दृश्‍यपट से अपने क्षितिज को बचाने के लिए ही हमें आज यह चौताल उठाना है-
'शिवशंकर खेलैं फाग गौरा संग लिये'
गौरा को संग लेने पर कुछ कलमुँहों को आपत्ति होगी, पर वे यह नहीं जानते कि हमारे शिव अर्धनारीश्‍वर हैं, या यों कहा जाए कि उनके आधे अंग से तो प्रत्यक्ष रूप से और शेष का अप्रत्‍यक्ष रूप से, इस प्रकार उनके सर्वाड़्ग का स्‍वामित्‍व जगद्धात्री 'गौरा' के हाथ में ही है। हिमालय के अंक में बसी हुई अलका से दूर मैदानों में रहने वाले अभागों को शायद यह आपत्ति हो सकती है कि उनके शिव गंगाधर भी तो हैं। गंगा को उन्‍होंने अपने जटाजूट में धारण किया है। केवल इतना ही नहीं उन्‍होंने अपनी जटा खोलकर जगत को अमर जीवन दान भी किया है, उन्‍होंने तपती धरती को रसाधार देकर जिलाया है और कैलाश छोड़कर गंगा की मध्‍यबिंदु काशी में अपना आसन जमाया है। इसलिए 'हरहर' के साथ 'गंगे' की टेर लगाने वाले बनारसी फक्‍कड़ों की इस आपत्ति को एकदम उड़ाया नहीं जा सकता।
इस पर कुछ विचार करने की जरूरत है। होरी अपने तन-मन-धन की होरी करके मुक्तिधाम में 'हरहर' को बोल लगाते समय 'गंगे' पर अटक जाता है। उसे लगता है कि उसके शिवशंकर बहुत श्‍वसुरालय-प्रेमी हो गए हैं, क्‍योंकि उसकी गंगा दिन-ब-दिन कृश से कृशतर होती जा रही हैं। य‍ह शिव की ओर से कुछ सरासर ज्‍यादती हो रही है। विष पीनेवाले शिव से इस विलास-लीनता की अपेक्षा नहीं की जाती थी। पर कदाचित वे विषपाई शिव ये नहीं हैं। ये इस नए कल्‍प में कुछ बदल गए हैं, इन्‍होंने शंकराचार्य की भाँति किसी अमरुक के शरीर में प्रवेश कर लिया है, और अब ये गंगा और गंगातीरवासियों का दुख एक दम बिसरा चुके हैं।
पर जाने दीजिए इस पुराण-पचड़े को। यह पुराणपंथी भी पुरानी, शिव भी पुराने, किसी नए मनमोहन की चर्चा चलाइये। यों तो इस म‍हीने में बूढ़े बाबा भी देवर लगते हैं, पर जो नवेलियों को भी नवल लग सके, ऐसे नंदलाल की रसीली बातें कीजिए, जिसकी साँवली सलोनी मूर्ति आज बसंती रंग में नख-शिख सराबोर हो उठी है। हाँ यह दूसरी बात है कि हमारा यह बाँका छैला भी परकीया के पीछे ही अधिक पागल है, यहाँ तक कि उसे अपने पीतांबर के लिए चीनांशुक के बिना काम नहीं चलता और वह अपनी 'उज्‍ज्‍वल नीलमणिता' खोकर लाल-लाल रह गया है। उसे इतनी भी अपने गाँव-घर की सुधि नहीं है कि आज होली के दिन जब गाँव का गाँव इस नए बसंत में होरहा हो चुका है, तब बीतते संवत्‍सर की चिताधूलि उड़ाने के लिए उसे बार-बार फेरी लगाना है फागुन में छाने वाली घनघटा चीरकर उसे एक किरण झलकानी है, द्वार-द्वार दुख की लरजती छाया में उसे आनंद की धूप-छाँह खेलती है, और न जाने किस युग से चला आता हुआ यह गीत उसे गाना है -
सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलैं होरी
आनंद लाने के लिए बाँकी जवानी को अपने 'घर की वर बात' विलोकनी होगी, नहीं तो घर एकदम उजड़ चुका है, सुरमा लगाने वाले रंगी बुढ़ऊ से कोई उम्‍मीद वैसे ही नहीं है, अब आशा है तो उसी अल्हड़ मनमोहन से जो न जाने कहाँ-कहाँ रँगरेली करके अनमने और सूखे भाव से रीति निभाने के लिए मधुरात के ढुलते प्रहर में अपनी थकित और निराश प्रेयसी के पास फाग खेलने आता है, दुख में पगी हुई नवेली इस सूखे स्नेह को दूर से झारती हुई कहती है,
"चाल पै लाल गुलाल सौं , गेरि गरै गजरा अलबेली।
वों बनि बानक सौं ' पद्माकर आए जो खेलन फाग तौ खेलों।
पै इक या छवि देखिबे के लिए मों बिनती कै न झोरिन झेलौं।'
रावरे रंग रँगी अँखियान में, ए बलवीर अबीर न मेलों।"
'फाग खेलने की मनाही नहीं है, पर तुम्हारी आँखों में जो किसी दूसरी बड़भागिनी का रंग चढ़ा हुआ है, उसी को अपने में पाकर मेरी आँखें निहाल हैं, उसमें फिर अपनी यह अबीर न मिलाओ, इतनी ही विनती है। मैं तो होरहा हो ही रही हूँ, अब प्रेम को होरहा न करो।'
मैं गँवार अनपढ़ किसान ठीक यही बात अपना होरहा भूनते-भूनते सोचता हूँ कि मेरी बात कौन समझेगा। मानता हूँ, लोकगीतों का फैशन चल गया है, आधी रात बेला अब दिल्ली शहर के बीच भी फूलने लगा है और जिसमें ग्राम्‍यता की झीनी पालिश पर हृदय शहराती, रजत बोलपटों से ऐसे पनघट वाले रूमानी गीत हर एक बँगले में लहराने लगे हैं और विहंगम कवियों की वाणी भी ग्राम्या की छवि निहारने लगी है। परंतु क्‍या इन अभिनयों में मेरी अभिव्‍यक्ति और तिरोहित नहीं हो रही है। मेरी विथा को कोई ओढ़ना नहीं चाहता, पर मेरे 'शैवलेनापि रम्‍यं' सरसिज को अपने फूलदान में सजाने के लिए अलबत्‍ता शौकिनों में लड़ाई छि‍डी़ हुई है, गालियों की धूम मची हुई है। मैं तो इस उधेड़-बुन में देखता हूँ कि होरहा की आग हवा के झोंकों में बुझ गई है। अधझुलसा रहिले (चने) का डाँठ धुँअठ भर गया है। कड़े छिलके के भीतर छिपे हुए दाने के दुधार बने हुए हैं, उनके रस तक आँच पहुँच न सकी। परंतु मेरे अंतर की अधपकी फल, बाहर की ज्‍वाला की लहक पाकर ही एकदम राख हो गई है। उसका एक दाना भी कोयला हुए बिना नहीं रहा सक है, क्‍योंकि उसके पास चने का-सा कड़ा छिलका नहीं रहा, जो उसकी रक्षा कर सके। बस इसके अनुताप में गुनगुनाता बच रहा है -
'नहिं आवत चैन हाय जियरा जरि गइले
(हिन्दी समय से)