March 10, 2017

भारतीय नारी:

      प्रतिबंधों की दहलीज़ से बाहर... 
                          - डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
ज्योतिष्कृणोति सूनरी’ जैसी वैदिक उक्तियों के माध्यम से प्राचीन काल से ही भारतीय नारी के उदात्त व्यक्तित्त्व के दर्शन होते हैं । गृहिणी अपनी कार्य कुशलता से सारे घर को वैसे ही आनन्द के प्रकाश से भर देती है जैसे उषा दिवस को । सुन्दर ,संस्कारित परिवार श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते हैं और सजग , सुशिक्षित समाज समूचे राष्ट्र को सुखी , समृद्ध बनाता है । इस प्रकार स्त्री किसी भी राष्ट्र के विकास की धुरी है । भारतीय समाज ने इस तथ्य को समझा , स्वीकार किया । यही कारण है कि भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष को गृहस्थी रूपी रथ के दो पहिए माना गया । एक के भी पुष्ट हुए बिना इस रथ का सुचारू रूप से सञ्चालन संभव ही नहीं इस अवधारणा के साथ स्त्री को अपने सर्वांगीण विकास के पूर्ण अवसर प्रदान किए गए ।
पुत्री, पत्नी, भगिनी, माता के रूप में वह अत्यंत सम्मान की पात्र रही। ‘मातृ देवो भव’ कहकर दीक्षांत समारोह में माता को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया। प्राचीन काल से ही भारत में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा का विशेष प्रबंध था। अथर्व वेद के अनुसार बालिकाओं को गुरुकुल में रहकर विधिवत ब्रह्मचर्य का पालन और वेदाध्ययन करना होता था । साथ ही उन्हें ललित कलाओं एवं यथारुचि अन्य विषयों की शिक्षा भी प्रदान की जाती थी। ‘ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’-अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम के उपरान्त कन्या युवा पति को प्राप्त करती थी । उन्हें अपने पति का स्वयं वरण करने का अधिकार भी था। विवाह संस्कार में पति के साथ पत्नी की ओर से भी वचन लिए और दिए जाने की परम्परा आज भी प्रचलित है । नियोग तथा विधवा-विवाह के प्रचलन का भी उल्लेख मिलता है। उदात्त-चरित्र,नैतिक आदर्शों से परिपूर्ण, विदुषी नारियाँ भारतीय संस्कृति का गौरव रही हैं । विश्वावारात्रेयी ,घोषा ,यमी, वैवस्वती आदि नारियाँ वैदिक मन्त्रों की द्रष्टा हुईं । आम्भृण ऋषि की पुत्री वाक् ‘वाक्सूक्त’ की दृष्टा हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला जैसी नारियों का नाम तो स्वर्णाक्षरों में अंकित है ही , मंडन मिश्र की पत्नी भारती का नाम भी सर्व विदित है।
भारतीय नारी पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने के साथ आवश्यकता पड़ने पर कैकेयी सदृश पति के साथ युद्ध भूमि में भी उतर कर अपनी तेजस्विता से अभिभूत करती है। आदर्श माता , भगिनी, सहचरी, पत्नी के रूप में स्त्री के प्रति समाज द्वारा प्रदत्त सम्मान की पराकाष्ठा ‘यत्रनार्यस्तु पूज्यन्ते’ के रूप में हुई। स्त्रियों का सम्मान निरंतर प्रगति का तथा अवमानना कुल तथा समाज के लिए घातक कहे गए। परस्पर संतुष्ट पति-पत्नी सदैव प्रसन्नता तथा कल्याण का कारण कहे गए हैं, अन्यथा विनाश अवश्यम्भावी है।
शनैः-शनैः सामाजिक पतन के साथ ही ‘स्त्रीशूद्रोनाधीयताम्’ की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई। पराधीनता और संस्कृतियों के घाल-मेल ने पूज्या को भोग्या के स्थान पर ला पटका। पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह के साथ बाल विधवाओं की दयनीय दशा पतनोन्मुख समाज की निकृष्टतम सोच का परिणाम हो गई ।विद्यालयों के द्वार बालिकाओं के लिए बंद हो गए । अशिक्षा के दंश ने तत्कालीन स्त्री को अवश कर दिया, जिसके विष से उबरने में अभी और न जाने कितना समय लगे।
चकित हूँ, कि नितांत विपरीत परिस्थितयों में भी भारतीय नारी ने अपने आदर्श रचे। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण इन देवियों ने भारतीयता की सुगंध को बनाए रखा। कृष्ण-भक्ति से भावित मीरा का चरित्र अपनी पावनता और समर्पण से अभिभूत करता है। किन्तु मीरा, रानी दुर्गावती से भी पूर्व सन 1260 ई. के प्रारम्भिक चरण में काकतीय नरेश गणपति की युवा पुत्री रुद्रमाम्बा ने अपनी सूझ-बूझ से काकतीय साम्राज्य का सुचारू रूप से संचालन किया। केलदि राज्य की रानी चेन्नम्मा ने वीर मराठा छत्रपति शिवाजी के पौत्र राजाराम को उनकी विपत्ति के समय आश्रय देकर औरंगज़ेब से वैर लेना स्वीकार किया, तो कित्तूर की महारानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। 30 दिसंबर, 1824 को उनका अंग्रेजों से निर्णायक युद्ध हुआ जिसमे वह वीरता से लड़ीं , किन्तु भीतरघात से पराजय का मुख देखना पड़ा। अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले सबसे पहले शासकों में उनका नाम आदर से लिया जाता है । महारानी अहल्याबाई होलकर का नाम तो भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है ही। 19 नवम्बर,1835 में बनारस में मोरोपंत ताम्बे और भागीरथी बाई के घर जन्मी मनु ने झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के रूप में अनेक कुरीतियों के साथ-साथ अंग्रेजों के भी दाँत खट्टे किए । इस तरह कि शत्रु को भी उन्हें ‘मखमली दस्तानों में फौलादी अँगुलियों वाली’ अत्यंत वीर महिला स्वीकार करना पड़ा |
वहीं 3 जनवरी, 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव में जन्मी सावित्री बाई फुले एक समाजसेविका, कवयित्री तथा वंचितों की आवाज़ के रूप में सम्मान पाईं। इसी वर्ष 3 जनवरी को गूगल ने अपने आँचल में मातृवत प्यार से समाज को समेटे सावित्री बाई फुले के चित्र को डूडल के रूप में प्रयुक्त कर वैश्विक स्तर पर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया, श्रद्धांजलि दी। पंजाब की बीबी हरनाम कौर ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए बालिकाओं की शिक्षा के लिए उत्कृष्ट कार्य किया। न्1883 ई. में ही कादम्बिनी गांगुली और चंद्रमुखी बसु प्रथम महिला स्नातक बनीं। लीला ताई पाटिल, मैडम भीकाजी कामा, प्रीतिलता, दुर्गा देवी, जगरानी देवी, विद्यावती देवी, हजरत महल, और जीनत महल के नामों का उल्लेख किए बिना भी यह चर्चा अधूरी रहेगी।
साहित्य के क्षेत्र में सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी, अमृता प्रीतम आदि अनेक विदुषी नारियों ने अपने लेखनी से अभिभूत किया। प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मल्लिका साराभाई, सोनल मानसिंह, अनुष्का शंकर, सुष्मिता सेन, प्रियंका चोपड़ा आदि ने अपने-अपने क्षेत्र में समूचे विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाई। माँ सारदामणि, भगिनी निवेदिता से लेकर दादी जानकी, माँ अमृतानन्दमयी जैसी दिव्य आत्माओं ने आत्मा से परमात्मा की डोर को जोड़ा तोमहान गणितज्ञ एवं खगोल विद सुश्री लीलावती की परम्परा को कर्नाटक प्रदेश के बैंगलोर में जन्मी शकुंतला देवी ने खूब निभाया।
राजनीतिक विरासत को सँभालते हुए विजयलक्ष्मी पंडित, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी जैसी महिलाओं ने अपनी विद्वत्ता और नेतृत्व कुशलता का परिचय दिया। विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त प्रांत की प्रथम महिला मंत्री, सोवियत रूस में राजदूत तथा संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। सरोजिनी नायडू सन 1947-49 तक उ.प्र. की राज्यपाल रहीं तथा सुचेता कृपलानी सन् 1963-67 तक उ.प्र. की मुख्यमंत्री रहीं। इसी परम्परा के निर्वहन में वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में स्व. इंदिरा गांधी, मीरा कुमार, प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, मेनका गांधी सहित अनेक सशक्त महिलाओं ने अपने अथक परिश्रम एवं सूझ-बूझ से वैश्विक पटल पर अपनी अलग छवि का निर्माण किया।
भारतीय आरक्षी सेवा में किरण बेदी ने महिलाओं के लिए संभावनाओं के द्वार खोले तो पद्मा बंदोपाध्याय , हरिता कौर देओल, कैप्टन सौदामिनी देशमुख, दुर्गा बनर्जी ने भारतीय सेनाओं में अपनी क्षमताओं के प्रदर्शन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। आज प्रायः सभी सशस्त्र सेनाओं की ओर भारतीय महिलाओं के कदम तेजी से बढ़ रहे हैं । विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का प्रदर्शन एवं प्रतिभागिता चकित करती है। मेहर मूसा अन्टार्कटिका पहुँचने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं, तो कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स के नाम से भला कौन परिचित नहीं है। आज भारतीय ही नहीं विदेशी अनुसंधान केन्द्रों में भी कार्य करने वाली भारतीय महिलाओं की अच्छी संख्या है।
प्रतिबंधों की दहलीज से बाहर निकले भारतीय नारी के कदमों ने धरा-गगन नापने में ज़रा भी कोताही नहीं की। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने परचम गाड़े न्यायमूर्ति अन्ना चांडी, चीफ इंजीनियर पी. के. गेसिया, संघ लोक सेवा आयोग की प्रथम महिला अध्यक्ष श्रीमती रोज मिलियन बेथ्यू आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण बनीं। सुरेखा चौधरी ने रेल चालक का दायित्व बखूबी निभाया। आज विमान से ऑटो तक का संचालन लड़कियाँ सफलता पूर्वक कर रही हैं।
खेलों के क्षेत्र में भारतीय महिलाओं ने अभी हाल में हुए ओलम्पिक में पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। पी.टी. उषा, हरमन प्रीत कौर, बछेंद्री पाल, संतोष यादव, मैरीकोम, गीता देवी, आशा अग्रवाल, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा ,दीपा करमाकर, कर्णम मल्लेश्वरी, साक्षी, कमलजीत संधू, पी. वी .सिंधू दुति चंद, मिताली राज, स्मृति मंधाना, तेजस्विनी सावंत, दीपा मलिक तथा और भी अनेक नाम ऐसे हैं जिन्होंने विश्व स्तर पर भारत को प्रतिष्ठा दिलाई ।
उद्यमिता के क्षेत्र में भी आज भारतीय नारी किसी से कम नहीं । इंदिरा नूई, चंदा कोचर, किरण मजूमदार शा, सुनैना गिल, निसाबा गोदरेज, नंदिनी पीरामल, प्रिया पॉल, प्रीता रेड्डी, सुधा मूर्ति, चित्रा कृष्णन, रेणुका रामनाथ, शोभना भरतिया तथा शिखा शर्मा आदि महिलाएँ भारतीय उद्योग जगत की नामचीन हस्तियाँ हैं, वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाए हैं।
कहना न होगा, कि कदम दर कदम संघर्षों पर विजय प्राप्त करती भारतीय नारी उत्कर्ष की पराकाष्ठा को भी पुनःप्राप्त करेगी। दिनों दिन बढ़ती बलात्कार, दुर्व्यवहार की घटनाओं का समाधान उसे स्वयं निकलना होगा। पारिवारिक स्तर पर माँ, बहन, पत्नी के रूप में किसी भी अनाचार का सशक्त, एकजुट विरोध और सामाजिक स्तर पर वर्ग, जाति, राजनीति से परे संगठित स्त्री शक्ति किसी भी चुनौती का सामना करने में पूर्णतः समर्थ है। दुआ करती हूँ कि ऐसा संभव हो सके।
सम्पर्कः 604, प्रमुख हिल्स, छरवाडा रोड, वापीजिला- वलसाड (गुजरात) 396191, मो-9824321053

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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