August 15, 2014

इस अंक में

 उदंती.com अगस्त- 2014

सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनों को प्यार करता है। यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है। 
- श्री अरविंद

अनकही

उदंती...के छहः बरस का सफर...

 - डॉ. रत्ना वर्मा 

अगले माह सितम्बर 2014 को उदंती के सफर को छह वर्ष पूरे हो जाएँगे... 2008 अगस्त से उदंती. com  के नाम से  शुरू हुए इस सफर को जारी रखने में उंदती से निरंतर जुड़े रहने वाले सम्माननीय रचनाकारों की मैं हृदय से आभारी हूँ, जिनके सहयोग के बगैर यह सफर असंभव था। साथ ही उन असंख्य पाठकों का भी आभार जिनके सहयोग और प्रोत्साहन से ही उदंती लगातार प्रकाशित हो पा रही है।  विदेशों में बसे उन असंख्य हिन्दी- प्रेमी लेखकों और पाठकों का भी आभार जिनकी वजह से उदंती की पहचान एक अंतरराष्ट्रीय वेब पत्रिका www.udanti.com के रूप में उभर कर सामने आई है।
सामाजिक सरोकारों और जीवन की मूलभूत समस्याओं तथा आवश्यकताओं को लेकर प्रारंभ की गई इस पत्रिका के प्रत्येक अंक में आपने हर बार अलग- अलग रंग देखे हैं।  इन छह वर्षोँ में उदंती ने विभिन्न सामाजिक विषयों पर कई महत्त्वपूर्ण विशेष अंक भी प्रकाशित किए हैं जैसे- लोककला, पर्व- संस्कृति, पर्यावरण, प्रकृति, पर्यटन, धरोहर, छत्तीसगढ़ी फिल्म कही देबे संदेश, कृषि, आपदा, बाल साहित्य, आदि आदि... जिन्हें पाठकों से भरपूर सराहना मिली है।
मुझे खुशी है कि पिछले छह वर्ष से मैं सफलता पूर्वक इसका संपादन कर रही हूँ। यही नहीं अपने आरंभिक काल 2008 अगस्त से वेब पेज www.udanti.com के रूप में भी यह अब तक सफलता पूर्वक संचालित हो रही है। यद्यपि कई बार आर्थिक कठिनाईयों के चलते  पत्रिका के संयुक्तांक निकालने पड़े हैं। छोटी पत्रिकाओं के इस संकट को आप भलि-भाँति समझ सकते हैं।  यह बताते हुए मुझे दुःख हो रहा है कि उदंती में रचनात्मक रूप से सहयोग करने वाले अपने सम्माननीय लेखकों को मैं मानदेय नहीं दे पाती, फिर भी बगैर किसी शिकायत के मुझे देश ही नहीं विदेशों में बसे हिन्दीभाषी लेखकों का भरपूर सहयोग मिलता रहा है।
मैं छत्तीसगढ़ शासन की भी शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने पत्रिका जारी रखने में निरंतर अपना सहयोग प्रदान किया है। उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सामाजिक सरोकारों और जनजगरण के लिए निरंतर काम कर रही इस पत्रिका को इसी प्रकार आगे भी उनका प्रोत्साहन तथा सहयोग मिलता रहेगा।
उदंती से जुड़े उन समस्त पाठकों, लेखकों का शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ जिन्होंने पत्रिका को इन ऊँचाइयों तक पँहुचाने में मेरा साथ दिया। आगे भी यह साथ बना रहे, यही मंगल कामना है।                       

दो गज़लें

 गद्दारी मत कर

- डॉ श्याम सखा 'श्याम

1
हम जैसों से यारी मत कर
खुद से यह गद्दारी मत कर।

तेरे  अपने  भी  रहते हैं
इस घर पर बमबारी मत कर।

रोक छलकती इन आँखों को
मीठी यादें ख़ारी मत कर।

हुक्म-उदूली का ख़तरा है
फ़रमाँ कोई जारी मत कर।

आना-जाना साथ लगा है
मन अपना तू भारी मत कर।

खुद आकर ले जाएगा वो
जाने की तैयारी मत कर।

सच कहने की ठानी है तो
कविता को दरबारी मत कर।

'श्यामनिभानी है गर यारी
तो फिर दुनियादारी मत कर।

दर्द सुना जिसने...
2
कुछ भी कहना पाप हुआ
जीना भी अभिशाप हुआ।

मेरे वश में था क्या कुछ?
सब कुछ अपने आप हुआ।

तुमको देखा सपने में
मन ढोलक की थाप हुआ।

कह कर कड़वी बात मुझे
उसको भी संताप हुआ।

दर्द सुना जिसने मेरा
जब तक ना आलाप हुआ।

शीश झुकाया ना जिसने
वो राना प्रताप हुआ।

पैसा-पैसा-पैसा ही
सम्बन्धों का माप हुआ।

इतना पढ़-लिखकर भी 'श्याम
सिर्फ अगूँठा-छाप हुआ।

सम्पर्क: निर्देशक हरियाणा साहित्य अकादमी, अकादमी भवन, पी-16, सेक्टर-14, पंचकूला-134113
Email- shyamskha1973@gmail.com,मोबाइल-09416359019

विचार

    
    भूमंडलीकरण की आँधी में गुम होते गाँव

  अब विकास की 

  नई इबारत लिखी जाएगी

   - गिरीश पंकज 
पिछले दो दशकों से एक जुमला भारतीय साहित्य और नागरजीवन शैली का हिस्सा बन चुका है और वो है भूमंडलीकरण। इस जुमले की आड़ में बाजारवाद ने भी अपने पैर पसारे और उसका खमियाजा भुगतना पड़ा पूरे देश को। सबसे अधिक नुकसान हुआ गाँवों का। वे गाँव जो कभी हमारी संस्कृति के संग्रहालय हुआ करते थे, अब विकृति के प्रतीक बनते जा रहे हैं। सौ साल पहले इस देश में साढ़े सात लाख गाँव हुआ करते थे, मगर पिछली जनगणना में गाँवों की संख्या घट कर छह लाख हो गई है। जिस तेजी से शहरीकरण बढ़ रहा है, ये संख्या और घटेगी। कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले पचास सालों में ही एकाध लाख गाँव लुप्त हो जाएँ। इसका एक मात्र कारण यह है कि अब हमारा गाँवों से मोहभंग होता जा रहा है। गाँव हमें अपने पुरातन स्वरूप में बर्दाश्त  नहीं हो रहे हैं। हम सब आधुनिक बनने की हड़बड़ी में गाँवों की बलि देने पर आमादा हैं। आज नगर निगम, नगर पालिकाएँ और नगर पंचायतें कोशिश करती हैं कि आसपास के गाँव उनकी शहरी सीमा में आ जाएँ। आबादी के बढ़ते दबाव के कारण शहर गाँवों की तरफ फैल रहे हैं। पिछले सौ सालों में एक लाख गाँव जो लुप्त हुए, वे शहरी सीमा का हिस्सा बन कर विलुप्त हो गए। और अब वे नगरों और महानगरों के विहार या कॉलोनियों के रूप में पहचाने जाते हैं। उदाहरण के रूप में हम दिल्ली को देख सकते हैं, जहाँ अनेक गाँव अपने देसी ठाठ में जीते थे, मगर अब वे कहीं नहीं हैं। सरकारी रिकार्ड में उनके केवल नाम भर रह गए हैं। वहाँ गगनचुंबी इमारतें तन गई हैं या मॉल बन गए हैं। दिल्ली की ही तर्ज पर देश के अनेक गाँव धीरे-धीरे खत्म हो गए।
गाँवों के विलुप्त होने की मुहिम निरंतर जारी है। अनेक नगर निगमों और पालिकाओं ने सरकार से माँग की है कि उनको आसपास के गाँवों को शहरी सीमा में शामिल करने की अनुमति दी जाए। और अनुमतियाँ भी मिल रही हैं। गाँव के लोग खुश हो रहे हैं कि उनका शहरीकरण हो रहा है। गाँवों के लोग इस बात से प्रसन्न नहीं होते कि वे अपने प्यारे गाँव में रहते हैं या वे खेती करते हैं अथवा गौ पालन करते हैं। ये सब चीज़े उन्हें उबाऊ लगती हैं । गाँव के युवक अब खेती करना नहीं चाहते। गौ पालन उनके लिए सिरदर्द है। हाँ, शहरों में जा कर कोई छोटी-मोटी नौकरी करना मंजूर है। गाँव के कास्तकार खत्म हो रहे हैं। कुम्हार लुप्त हो रहे हैं। अनेक देशज कलाएँ खत्म हो चुकी हैं। क्योंकि अब गाँव-गाँव में सस्ता चीनी उत्पाद बिक रहा है। या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माल खपाए जा रहे हैं। पहले चीन हमें सीमा पर पराजित किया, अब वह हमारे घर में घुस कर हमें मार रहा है और हमें इसका आभास भी नही? आश्चर्य। गाँवों की अर्थक्षमता को ध्यान में रख कर एक-दो रुपये के पैकेट में भी सामान मिल रहा है। खेल-खिलौने मिल रहे हैं। कभी जो गाँव अपना साबुन बनाता था, अपने खिलौने बनाया करता था, अपनी जरूरत के कपड़े उत्पादित किया करता था, वाद्ययंत्र भी बना लिया करता था, वो गाँव अब इन सबसे दूर होता जा  रहा है। उसकी मौलिकता खत्म हो रही है। वह पराश्रित होता जा रहा है। उसे विदेशी या कहें कि  चीनी उत्पाद ही भाने लगे हैं। क्योंकि वह मेहनत नहीं करना चाहता। 
गाँधी, लोहिया, बिनोबा और जेपी जैसे चिंतकों ने लोग के महत्त्व को समझा था। समाजवाद और लोक स्वराज भारत इन सबका सपना था। भारत गाँवों का देश हैं, यह गर्व से बताया जाता था। लेकिन अब गाँव कहने भर के गाँव रह गए हैं। वहाँ उद्योगपतियों की नज़र हैं। वहाँ की नदियों का दोहन कल-कारखाने कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि न केवल नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, वरन गाँव भी बीमार होते जा रहे हैं। गाँवों के लोगों को आर्थिक प्रलोभन दे कर उनसे उनके गाँव छीने जा रहे हैं। आज से चौदह साल पहले जब तीन नए राज्य बने तो उनकी नई राजधानियों के लिए सैकड़ों गाँवों की बलि ले ली गई। रायपुर और आसपास के गाँव को मैंने लुप्त होते देखा है। विकास की यह कैसी अंधी चाल है कि वह गाँव उजाड़ देती है, वह पेड़ों की बलि ले लेती है, वह नदियों को पी जाती है, वह तालाबों को खत्म कर देती है? क्या हम संतुलित विकास की प्रविधियाँ नहीं खोज सकते? गाँवों को उनके मूल स्वरूप में रखते हुए क्या उन्हें नगर-जैसा नहीं बनाया जा सकता? गाँवों में खेती भी हो, गौ पालन भी हो। हाथकरघा भी चले। बढ़ई भी अपनी कला का विकास करे। लोक कलाकार भी अपने वाद्ययंत्रों के साथ अपनी कला का संरक्षित रख सके। क्या यह बहुत जरूरी है कि गाँवों को आधुनिक बनाने के चक्कर में हम उसे जड़ों से ही काट दें? वहाँ के उद्योगों को हतोत्साहित करें? जो खादी कभी लाखों लोगों को रोजगार देती थी, वो अब दम तोड़ रही है। स्वराज की लड़ाआ में गाँधी ने खादी को एक हथियार बनाया था। स्वदेशी की ऐसी मुहिम चली थी कि विदेशी वस्त्रों की होलियाँ जलती थी। उस खादी से दूर हो कर हम ब्राँडेड कपड़ों की ओर झुकते चले जा रहे हैं। स्वदेशीपन खत्म होता जा रहा है। पश्चिम इतना अधिक सम्मोहित कर रहा है कि गाँव-गाँव में लड़के-लड़कियाँ जींस और टॉप में नज़र आ जाएँगे। सलवार-कुरता तो पुरानी बात होती जा रही है।
इस तथाकथित आधुनिकीकरण ने सबसे पहले हमारे विचार को कुंद कर दिया है इसलिए अब अगर गाँवों में नवयुवक खेती नहीं करना चाहता, गौ पालन नहीं करना चाहता तो इसका सबसे बड़ा कारण पूरा परिवेश है जो पश्चिम की साजिश का शिकार होता जा रहा है। विदेश के कपड़े, विदेश के उत्पाद, विदेश का संगीत, विदेश की अप-संस्कृति को नागर और लोकजीवन का हिस्सा बनाया जा रहा है। यही कारण है कि गाँव-गाँव नहीं रहना चाहता। वह अपने आप से ऊब चुका है। वह खुद से मुक्ति के लिए बेताब है। कहीं गाँव खुद से ऊब रहे हैं तो कहीं विकास के नाम पर राज्य सरकारें गाँवों को नष्ट करने पर तुली हुई हैं। कहीं बाँधों के नाम पर, कहीं कारखानों के नाम पर गाँवों और ग्रामीणों का विस्थापन हो रहा है। भारत माँ यह सब देख कर रो रही है मगर वह कुछ कर नहीं सकती क्योंकि यह उत्तरआधुनिक काल है, यह भूमंडलीकरण का दौर है।
ऐसे संक्रमण काल में जब भाजपा सरकार  अस्तित्व में आई है तब लगता है कि एक पुरातन भारत को बचाते हुए विकास की नई इबारत लिखी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी सभाओं में  गंगा और गाँव की बातें किया करते थे। वे गाय के महत्त्व पर भी अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। वे गौ भक्त हैं। गाय और गाँव को अटूट सम्बन्ध हैं। कभी भारत में चालीस करोड़ गाएँ हुआ करती थी, जो अब घट कर सोलह करोड़ रह गई हैं। जिस तेजी से गायें कट रही हैं, और उसका मांस विदेश भेजा जा रहा है, उसे देखते हुए यही लगता है कि आने वाले समय में भारत में गाय बचाओ मुहिम चलाई जाएगी। मोदी सरकार से उम्मीद की जा सकती है कि वह गंगा की तरह अब गाँव और गाय पर ध्यान देगी। गाँव को बचाने का मतलब है अपनी संस्कृति को बचाना, अपनी कलाओं को बचाना, कुटीर उद्योगों को बचाना। अपनी अस्मिता को बचाना। गाँव नहीं बचेंगे तो यह भारत भारत नहीं रहेगा, इंडिया हो जाएगा। वैसे भी बीस फीसदी इंडिया तो बन ही गया है। भाजपा सरकार संस्कृति की बात करती है। राष्ट्रवाद उसका प्रिय जुमला है। तब ऐसी सरकार से देश उम्मीद कर सकता है कि वह गाँव बचाएगी, गायों को बचाएगी, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करेगी; क्योकि अभी नहीं तो कभी नहीं।

सम्पर्क: संपादक, सद्भावना दर्पण (मासिक )28 प्रथम तल, एकात्म परिसर, रजबंधा मैदान रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001 मो. 09425212720 Email- girishpankaj1@gmail.com

मुद्दा


     नासूर बन रहा है नशा

                - राजेश कश्यप  
नशा पूरे समाज के लिए नासूर बन चुका है। बीड़ी, सिगरेट, शराब से लेकर सुलफा, भाँ, चरस, गाँजा, अफीम, ब्राउन शुगर, हेरोईन, स्मैक, भुक्की तक नाना तरह के नशे सामान्य बात हो गई है। सामान्य धूम्रपान से लेकर स्वापक एवं मादक पदार्थों का सेवन लाखों-करोड़ों जिन्दगियों को तबाह कर रहा है। विडम्बना का विषय है कि अब तो सामान्य दवाओं का भी नशे के रूप में सेवन किया जाने लगा है। 'मोमोटिल’, 'कैरीसोमा’, 'पारवनस्पास,’ 'कफ-सीरपआदि अनेक दवाओं को नशे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इन दवाओं को निर्धारित मात्रा से अधिक लेने से व्यक्ति घातक नशे का शिकार हो जाता है। इसके बावजूद भी धडल्ले से इस तरह की कई दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में किया जा रहा है। दिल दहलाने वाली बात यह है कि इन सब नशों के आदि लोगों को नशे को कई गुना बढ़ाने के लिए चोट ठीक करने वाली मरहम 'आयोडैक्स’, अति जहरीली छिपकली की 'पूंछ’, 'स्नफिरस’, 'लिक्विड व्हाइट फ्लूड’, 'पेट्रोल’, 'पंक्चर सेल्यूशनआदि का सेवन करने से तनिक भी हिचक नहीं होती। असंख्य नशेड़ी तो अपने शरीर की नसों से लेकर चीभ और गुप्तांगों तक में सिरिंज के जरिए नशे की दवा चढ़ा लेते हैं। इसके अलावा अनेक ऐसे नशेड़ी हैं जो जानलेवा विषैले कीटों से स्वयं को बार-बार कटवाते हैं। क्या इससे बढ़कर नशे का जुनून और खौफनाक खेल हो सकता है?
नशे का साम्राज्य अनंत रूप में फैल चुका है। आज कोई भी घर ऐसा नहीं है, जो नशे से अछूता हो। कोई व्यक्ति भले ही नशे से अछूता मिल जाए लेकिन, घर नहीं मिलेगा। हर घर में कोई न कोई सदस्य किसी न किसी तरह के नशे का आदी मिल जाता है। अपवाद के तौरपर भी संभवत: नशे से अछूता कोई परिवार मिलेगा। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि नशे के मकडज़ाल में समाज किस कद्र फँस चुका है। सबसे बड़ी विडम्बना का विषय तो यह है कि इन घातक और खौफनाक नशों का शिकार बड़ी संख्या में देश के नौजवान हो चुके हैं। युवाओं को नशे की दलदल में तेजी के साथ धंसना, इस समय देश के समक्ष सबसे बड़ी विकट चुनौती बन चुकी है। गतवर्ष पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सार्वजनिक मंच से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति को सांकेतिक अनुरोध करते हुए कहा था कि आप अपनी हेरोइन को रोकिए, हमारे नौजवान तबाह हो रहे हैं।
एसोचैम ने वर्ष 2009  में 2000 किशोरों का अध्ययन किया था, जिसमें यह बात सामने आई थी कि पिछले पाँच वालों के दौरान 19 से 26 वर्ष के किशोरों के बीच में शराब का उपभोग 60 फीसदी बढ़ा है। महानगरों में रहने वाले किशोरों में 45 फीसदी से ज्यादा महीने में पाँच से छह बार पीते हैं। जबकि 70 फीसदी सामाजिक मौकों में पीते हैं। नवम्बर, 2011 में एसोचैम ने अपने एक अन्य सर्वेक्षण में पाया कि पिछले दस साल के दौरान 15 से 18 वर्ष के युवाओं के बीच पीने की आदत में 100 फीसदी का इजाफा हुआ है।
स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार शराब का इस्तेमाल करने की उम्र में निरन्तर कमी दर्ज की गई है। जहाँ वर्ष 1980 में 28 वर्ष की औसत उम्र में शराब पीनी शुरू की जाती थी, वहीं यह वर्ष 1997 में  19 वर्ष और वर्ष 2012 में मात्र 13 वर्ष की उम्र दर्ज की गई है। सर्वेक्षणों के अनुसार 46 प्रतिशत लोग 'टुलहोने के लिए, 32 प्रतिशत 'परेशानियोंके कारण, 18 प्रतिशत ''अकेलेऔर 15 प्रतिशत बोर होकर पीते हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुबई, चण्डीगढ़, हैदराबाद आदि महानगरों के 70 प्रतिशत युवाओं ने सर्वे में यह माना कि वे सामाजिक मौकों, परीक्षाओं से पहले, और बाद में सुकून के लिए या रात के समय एल्कोहल का सेवन करते हैं।
 मुंबई के हीरानंदानी अस्पताल के मनोवैज्ञानिक डॉ. हरीश शेट्टी का कहना है कि खाने की मेज पर शराब का परोसना अब सामान्य बात हो चुकी है। पिता को मेहमानों को शराब परोसते देखते हैं और माताएँ किटी पार्टियों में मजे से शराब पीती हैं तो भला बच्चों पर उसका असर कैसे नहीं होगा? दिल्ली के मैक्स हेल्थकेयर में चीफ  साइकिएट्रिस्ट डॉ. समीर पारिख और उनकीं टीम ने कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के दो बड़े स्कूलों के 100 छात्रों के बीच एक सर्वेक्षण किया तो बड़े चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। इनमें से 22 फीसदी बच्चों का मानना था कि पार्टी में एक पेग तो सभी लेते हैं, जबकि 26 फीसदी का मानना था कि 'कूलहोने का मतलब है तीन से चार पेग।  डा. पारिख का कहते हैं कि 13 से 17 वर्ष की उम्र में शराब पीना एक सामान्य -सी बात बनती चली जा रही है।
महानगरों में 'हैपी ऑवर किड्स’, 'हुक्का-बारबड़ी तेजी से उभरे हैं। अब तो कैफे और फास्ट फूड रेस्तरांओं में बीयर खुलेआम परोसी जा रही हैं। बार में तो शाम के शुरू में 'हैप्पी ऑवरबताकर शराब व बीयर को सस्ता कर दिया जाता है। ऐसे में स्कूल के बाद ट्यूशन पर जाने वाले बच्चों को यह नशा सहज सुलभ हो रहा है। विडम्बना का विषय है कि यह शौक लड़कियों में भी तेजी से बढ़ चला है। वर्ष 2011 में आईआईटी के कुछ छात्र और इंदौर के के.बी. पटेल विद्यालय की कुछ छात्राओं को प्रबन्धन द्वारा इसीलिए निकालना पड़ा; क्योंकि उन्हें शराब पीते और नशे में झूमते पकड़ा गया था। लखनऊ के कॉलेज में पढऩे वाले छात्र-छात्राओं द्वारा दुकानों व हाईवे के किनारे फ्राइड पनीर के साथ अंग्रेजी शराब पीते और बवाल मचाते अक्सर देखा जाने लगा है। यह सब राष्ट्रीय स्तर पर होने लगा है। देश के कोने-कोने से छात्र-छात्राओं और नौजवानों को नशे में झूमते, उत्पाद मचाते और अपनी जिन्दगी से खिलवाड़ करते बड़ी सहजता के साथ देखा जा सकता है।
सामान्य तौरपर देखने में आता है कि व्यक्ति सामान्यत: 'संगतमें फँसकर नशे का स्वाद चखता है। नशे की शुरूआत बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, हुक्के जैसे सामान्य नशे से होती है। जहां तक बीयर, शराब आदि का विषय है तो यह अक्सर विवाह, जीत, उपलब्धि, आमदनी, उद्घाटन, जन्मदिन आदि हर खुशी के अवसर पर प्रयोग की जाने लगी थी। लेकिन, बाद में यह लोगों की दिनचर्या का एक हिस्सा बनती चली गई। काफी लोग मित्रों की संगत में फँसकर नशे का शिकार हो गए। बच्चे भी कुसंगति का शिकार होने से बच नहीं पाते। महानगरों में हाई-सोसायटी और उच्च जीवन-शैली के दिखावे के तौरपर विभिन्न तरह के नशों का सेवन हो रहा है। लेकिन, सबसे अजीब बात यह है कि आज नशे का मूल कारक खुशी नहीं, बल्कि 'गम’, 'परेशानी’, 'तनाव’, 'अवसाद’, 'हार’, 'हीनता’, 'अति महत्त्वाकांक्षा’, 'उदासी’, 'नीरसताआदि बन गए हैं। आज की इस भागदौड़ में व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करने लगा है। उसके सामने जिम्मेदारियों व चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है और सपनों का अम्बार लगा है। लेकिन, उन्हें पूरा न होने का डर अथवा सामर्थ्य न पाकर दु:खी है। असफलताओं की टीस और चिड़चिड़ेपन से जीवन नीरस हो चला है। ऐसे में वह नशे का सहारा लेता है। नशा के आगोश में कुछ पलों के लिए वह अपनी सुध-बुध खोकर सपनों के संसार में खो जाता है। धीरे-धीरे यही सपनों का संसार उसे अच्छा लगने लगता है और वह बाहर निकलने का नाम नहीं लेता है। जब कोई उस संसार से निकालने की कोशिश करता है तो उसे लौटना गवारा नहीं होता। उसमें पुन: जिम्मेदारियों और चुनौतियों के पहाड़ों से टकराने का साहस पैदा नहीं हो पाता। ऐसे में मनौवैज्ञानिकों की भूमिका सबसे महत्त्व पूर्ण हो चली है।
नशा न तो कोरे उपदेश देने से छुड़ाया जा सकता है, न धमकाकर छुड़ाया जा सकता है, न मारपीट करके छुड़ाया जा सकता है और न ही चार दीवारियों में कैद करके छुड़ाया जा सकता है। नशा चाहे कोई भी हो, वह एक सौहार्दपूर्ण माहौल में भावनात्मक और सकारात्मक बातचीत के जरिए मनौवैज्ञानिक रूप से छुड़ाया जा सकता है। इसके साथ ही नशे के शिकार व्यक्ति की नियमित दिनचर्या को धीरे-धीरे तब्दील करके और नशे की तलब के समय उसकी प्रतिपूर्ति के लिए पौष्टिक पदार्थों अथवा सहयोगी दवाओं का इस्तेमाल करके, व्यक्ति को संबल और मजबूत आश्वासन देकर और उसकी समस्याओं एवं चुनौतियों के निराकरण में सहायक बनकर ही समस्या से निजात पाई जा सकती है। अक्सर देखने में आता है कि कई नशा-मुक्ति केन्द्रों में इन सब आचरणों एवं उपायों की बजाय एक कठोर कारागार और सश्रम कैदी की तरह व्यवहार किया जाता है। कई औरतें नशा छुड़वाने के चक्कर में तांत्रिकों और छोलाछाप डॉक्टरों की भभूत या दवाएँ व्यक्ति को बिना बताए उसके खाने में मिलाकर दे देती हैं। उसके कई बार बेहद खतरनाक परिणाम देखने को मिलते हैं।
शौकिया और उच्च जीवन-शैली जीने का दम्भ भरकर नशा करने वाले लोगों को भी मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाना होगा और उन्हें अहसास दिलाना होगा कि वे ऐसा करके जीवन की कितनी भयंकर भूल कर रहे हैं? उन्हें इस भूल का अहसास करवाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाने की सख्त आवश्यकता है। इसके साथ ही गैर-कानूनी तरीके से नशे का कारोबार करने वाले लोगों और गिरोहों पर भी सख्ती से लगाम लगाने की आवश्यकता है। नशे के साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए युवाओं को ही प्रेरित करना होगा और युवा शक्ति को ही नशे के नाश के लिए ब्रहा्रस्त्र के रूप में इस्तेमाल करना होगा।
संतोषजनक बात यह है कि जितने भी नशे के शिकार व्यक्ति हैं उनमें से अधिकतर इसे 'लतमानने लगे हैं और वे इससे छुटकारा पाने की चाह भी रखते हैं। नशे को 'लतया 'बीमारीमान लेना सबसे बड़ी बात है। इससे समस्या से छुटकारा पाना बेहद आसान हो जाता है। इसलिए, मनौवैज्ञानिक तरीके ही नशे का नाश कर सकते हैं?


संपर्क: स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक, म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर, गाँव टिटौली, जिला. रोहतक हरियाणा-124005, मो. 09416629889, Email : rajeshtitoli@gmail.com

सेहत

आधुनिक आइसक्रीम का रसायन शास्त्र

- डॉ. ओ.पी वर्मा



आइसक्रीम शब्द सुनते ही सबके मुँह में पानी आ जाता है। पल भर में विद्युत धारा की तरह एक ठंडा मीठी तरंग पूरे शरीर में प्रवाहित हो जाती है और मन प्रसन्न हो जाता है। शादी हो या जन्मदिन का समारोह हो, आइसक्रीम के बिना सब कुछ अधूरा ही माना जाता है। ऐसे रिसेप्शन्स में सबसे ज्यादा भीड़ आइसक्रीम की स्टॉल्स पर ही दिखाई देती है। आइसक्रीम विटामिन व कैल्शियम से भरपूर सबका पसंदीदा, शीतल और स्वास्थ्यप्रद व्यंजन है जो ताजा दूध, मक्खन, अंडे, फलों और सूखे मेवों तैयार किया जाता है।  आइसक्रीम बनाने वाले बड़े बड़े संस्थान भिन्न-भिन्न रंगों और फ्लेवर में अनेक प्रकार की आइसक्रीम बनाते हैं और लुभावनी पैकिंग में बेचते हैं। विज्ञापनों पर खूब पैसा बहाते हैं; परंतु क्या ये लोग सचमुच ताज़ा दूध, मक्खन, फलोंआदि से ही आइसक्रीम बनाते हैंयथार्थ कुछ और ही है जिसे आप सुन नहीं पाएँगे। सचमुच आज बहुराष्ट्रीय संस्थानों का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही है। आपके स्वास्थ्य से उन्हें कोई सरोकार नहीं।
मिल्क पाउडर
एक समस्या तो यह है कि आइसक्रीम बनाने के लिए जिन गायों के दूध से मिल्क पाउडर बनाया जाता है, उन्हें प्राय: सिंथेटिक इस्ट्रोजन हार्मोन के इंजेक्शन दिये जाते हैं; ताकि गायों का विकास तेजी से हो और ये दूध ज्यादा देने लगे। लेकिन क्या इसका असर हमारी नन्हीं लड़कियों के स्वास्थ्य पर नहीं पड़ेगा। हम देख रहे हैं कि आजकल आठ दस साल उम्र में ही लड़कियों के हिप्स और ब्रेस्ट डवलप हो रहे हैं और कैंसर का खतरा भी बढ़ रहा है। यह सब इन्हीं हार्मोन्स और रसायनों की नतीजा है।
शुगर
आइसक्रीम को मिठास देने के लिए चीनी के अलावा कई सस्ती आर्टिफीशियल शुगर्स जैंसे एसेपार्टेम, जाइलिटोल, सेक्रीन आदि भी मिलाई जाती है, जो आपकी सेहत को बहुत खराब करती हैं और इनसे आपको कैंसर भी हो सकता है। सभी बड़े ब्रांड्स आइसक्रीम बनाने के लिए शरीर के लिए घातक ट्रांसफैट युक्त हाइड्रोजिनेटेड वनस्पति घी, स्किम्ड मिल्क पाउडर, हाई फ्रक्टोज कोर्न सिरप, कृत्रिम मिठास या एस्पार्टेम और विषैले एडीटिव्ज जैसे कार्बोक्सिमिथाइल सेल्यूलोज, ब्यूटिरेल्डीहाइड, एमाइल एसीटेट आदि का इस्तेमाल करते हैं। अंडे की जगह सस्ता रसायन डाईइथाइल ग्लाइकोल प्रयोग किया जाता है, जिसका प्रमुख उपयोग रंग रोगन साफ करना हैं। आइसक्रीम का आकार बड़ा करने और ज्यादा मुनाफा कमाने हेतु इसमें हवा भी मिला दी जाती है, हालाँकि यह हवा हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाती है।
जहरीले आर्टिफीशियल फ्लेवर्स
चैरी आइसक्रीम बनाने के लिए एल्डीहाइड सी-17 नामक खतरनाक विष का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक ज्वलनशील रसायन है और रंग रोगन, प्लास्टिक तथा रबड़ बनाने के काम में आता है। आपकी सबसे पसंदीदा वनीला आइसक्रीम पिपरोनाल नामक जुएँ मारने की दवा से तैयार होती है। ड्राइ फ़्रूट्स के फ्लेवर के लिए बुटीरेल्डीहाइड नामक रसायन मिलाया जाता है। इसका प्रयोग रबर बनाने के लिए होता है।
चमड़ा और कपड़ा साफ करने का रसायन इथाइल एसीटेट आपकी आइसक्रीम को अनानास का फ्लेवर देता है। इथाइल एसीटेट हृदय, यकृत और फेफड़े के लिए बहुत हानिकारक है।  बनाना आइसक्रीम ऐमाइल एसीटेट से तैयार होती है, जो ऑयल पेंट बनाने के काम में आता है।
आपकी आइसक्रीम में मोनो और डाइग्लीसराइड्स, डाइसोडियम फोस्फेट, बैंजाइल ऐसीटेट, मोनो स्टिरेट, प्रोपाइलीन ग्लाइकोल, सोडियम बेंजोएट, पोलीसोर्बेट 80, पोटेशियम सोर्बेट, मोडीफाइड कोर्न सिरप और सोय लेसीथिन भी मिलाए जाते हैं। हालांकि एफ.डी.ए. ने इन रसायनों को  GRAS (generally recognized as safe)लिस्ट में रखा है; लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन्हें आइसक्रीम में मिलाना जरूरी है। क्या इन्हें मिलाए बिना आइसक्रीम नहीं बन सकती। यह भी विदित रहे कि एफ.डी.ए. के नियमों के अनुसार आइसक्रीम निर्माता को हर चीज लेबल पर लिखने की जरूरत नहीं है।
यह सब जानने के बाद क्या आप विभिन्न खतरनाक रसायनों से तैयार हुए इस व्यंजन को आइसक्रीम कहेंगे? इसे तो केमिकल ट्रीट, केमिकल शॉप, आइसकेम, आइसस्केम या केमिकल बम कहना ही उचित होगा। गृहणियों क्या यह सब जानने के बाद भी पति और बच्चों को  बाजार की आइसक्रीम खिलाना पसंद करोगी?    कभी नहीं ना। क्या इसका कोई समाधान है? जी हाँ बिलकुल है और वह है कि पूरा भारत बाजार की इस केमिकल आइसक्रीम का पुरजोर तरीके से बहिष्कार करे। आप अच्छी और स्वास्थ्यप्रद आइसक्रीम घर पर बना सकते हैं। देखिगा आपके बच्चे और पतिदेव भी आइसक्रीम बनाने में आपकी मदद करेंगे। मेरा दावा है यह इतनी स्वादिष्ट बनेगी कि आप बाहर की आइसक्रीम हमेशा के लिए भूल जाएँगे।
तो आइये कुछ आइसक्रीम घर पर बनाइये। आपके बच्चों तथा पति को घर पर बनी स्वास्थ्यप्रद और स्वादिष्ट आइसक्रीम खिलाइए-
केदार हिम
सामग्री
1. कंडेंस्ड मिल्क एक टिन 400 ग्राम ,2. बारीक पिसी ताजा अलसी 100 ग्राम, 3. दूध 1 लीटर
4. किशमिश चौथाई कप, 5. बारीक कटी बादाम 25 ग्राम, 6. नेचुरल वनीला एक छोटी चम्मच, 7. चीनी स्वाद के अनुसार, 8. कोको पावडर 50 ग्राम
बनाने की विधि
सबसे पहले दूध गर्म कीजिए। थोड़े से दूध लगभग (100-150 ग्राम) में अलसी के पावडर को अच्छी तरह मिला कर एक तरफ रख दें।  फिर दूध को धीमी-धीमी आँच पर 15-20 मिनट तक उबाल कर ठंडा होने के लिए रख दें। ठंडा होने पर दूध, चीनी, कंडेंस्ड मिल्क और अलसी के मिश्रण को हैंड ब्लेंडर से अच्छी तरह फेंटे। मेवे, वनीला मिला कर फ्रीजिंग ट्रे में रख कर जमने के लिए डीप फ्रीजर में रख दें। चाहें तो आधी जमने पर फ्रीजिंग ट्रे को बाहर निकाल कर एक बार और अच्छी तरह फेंट कर डीप फ्रीजर रख दें। अगले दिन सुबह आपकी स्वास्थ्यप्रद, प्रिजर्वेटिव, रंगों व घातक रसायन मुक्त केदार हिम तैयार है।
कंचन हिम
सामग्री
1. दूध  600  एम.एल.  2. कोडप्रेस्ड वर्जिन अलसी का तेल 60 एम.एल.3. उबाल कर ठंडा किया हुआ गाढ़ा दूध 100 एम.एल.4. प्राकृतिक शहद या चीनी स्वादानुसार 5. बारीक कटे मेवे 25 ग्राम   6. मध्यम आकार का एक आम (लगभग 350-400 ग्राम)  7. नीबू का रस एक चम्मच 
बनाने की विधि
सबसे पहले पनीर बनाइए। इसके लिए स्टील की पतीली में दूध गर्म की कीजि। उबाल आने पर उसमें नीबू का रस डालिये। नीबू डालते ही दूध फट जायेगा। अब फटे दूध को एक चलनी में डाल दें, ताकि उसका पानी निकल जाये। सिर्फ 4-5 मिनट बाद ही पनीर और गाढ़े दूध को एक बर्तन में लेकर बिजली से चलने वाले हैन्ड ब्लेंडर से अच्छी तरह फैंट लें और कॉटेज चीज़ बना लें। अब आम को छील कर छोटे-छोटे टुकड़े कर लीजिए । इसके बाद पनीर और दूध के मिश्रण में आम के टुकड़े, अलसी का तेल और शहद या चीनी मिला कर एक बार फिर अच्छी तरह फैंट लें और मिश्रण में कटे मेवे मिला कर फ्रीजर में जमने के लिए रख दें।
अगले दिन स्वास्थ्यवर्धक, ऊर्जावान और स्वादिष्ट कंचन हिम जम कर तैयार हो जाएगा। अपने परिवार के साथ इस कंचन हिम पर थोड़ा सा शहद डाल कर आनन्द लीजिए। 
नोट- अलसी का कोल्डप्रेस्ड तेल आप इस नंबर 9929744434 से मंगवा सकते हैं।

संपर्क: वैभव हास्पिटल और रिसर्च इंस्टिट्यूट, 7 बी- 43, महावीर नगर तृतीय, कोटा- राजस्थान, मो. 9460816360, Email- dropvermaji@gmail.com, http://flaxindia.blogspot.in

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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