August 15, 2014

जीवन- दर्शन

परम आनन्द का अनमोल सूत्र

विजय जोशी 

जीवन में आनन्द का अपना महत्त्व  है। पर यह भी दो प्रकार का होता है। पहला वह जो जतन करके आप खुद के लिए प्राप्त करते हैं। और दूसरा यह कि दूसरों के आनन्द का कारण बनते हुए उसके अंदर जो आनन्द की लहर बहती है उसका सुख आपके अंतस्तक पहुँचकर आपको अभिभूत कर दे। खुद का सुख अपना सुख होता है, लेकिन दूसरों के सुख से सुख पाने आनन्द अलभ्य, द्भुत और अविस्मरणीय होता है।
एक प्रोफेसर अपने धनवान् छात्र के पास एक बगीचे में टहलने निकले तो उस नौजवान को एक जोड़ी पुराने जूते राह में दिखे, जो संभवतया उस गरीब माली के थे, जो उस समय बगीचे में ही काम कर रहा था।
छात्र ने कहा- चलो हम एक खेल खेलते हैं। हम उसके जूते छूपाकर पेड़ की आड़ में छिपकर उसके चेहरे के भाव देखते हैं।
मेरे नौजवान दोस्त- प्रोफेसर ने कहा- हमें दूसरों के दु:ख में अपना सुख नहीं ढूँना चाहिए। तुम अमीर हो और अपनी दया के माध्यम से इसी गरीब से कई गुना अधिक खुशी प्राप्त कर सकते हो। उसके दोनों जूतों में एक-एक सिक्का रखकर उसका परिणाम देखो।
छात्र ने ऐसा ही किया और फिर दोनों झाड़ी के पीछे छुप गए। माली ने अपना काम समाप्त किया। अपना अधफटा कोट उठाते हुए जब पहला पैर जूते में डाला तो उसे कड़ी वस्तु का आभास हुआ। देखने पर वह सिक्का निकला। उसके चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता का भाव उभर आया।
उसने सब ओर देखा तथा किसी को न पाकर सिक्का जेब में रख लिया। अब दूसरे जूते की बारी थी और उसकी खुशी कई गुना बढ़ गई ,जब उसमें भी सिक्का निकला।
वह कृतज्ञता के भाव से अभिभूत हो गया। तुरन्त घुटनों के बल बैठते हुए उसने ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त किया। फिर अपनी पत्नी, बच्चों, दीन दुखियों और उस अनजान इंसान की सलामती के लिए प्रार्थना की, जिसने वह सिक्के सदाशतापूर्वक रखे थे।
छात्र की आँखों से अश्रु- धार बह निकली। उसके प्रोफेसर ने कहा- अब तुम उस पल से कई गुना अधिक आनन्दित हो जो जूते छुपाने पर तुम्हें प्राप्त होता।
छात्र ने कहा- आपसे मुझे एक शिक्षा मिली है और जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगावह यह- दूसरों के सुख के सामने स्वयं का सुख बहुत छोटा और अल्पकालीन है।
याद रखें पाने के बजाय देने का सुख अधिक संतोषप्रद और सुखदायी है। यदि आप जीवन में जीवन भर खुशी और प्रसन्नता की चाहत रखते हैं तो किसी असहाय और जरूरतमंद की सहायता करके देखिए।
दो पल को ही बैठ लें, किसी दुखी के पास
पूजा, कथा, नमाज से, यह ऊँची अरदास।

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