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Aug 1, 2026

किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा यात्रा पुरातन से नूतन

  - विजय जोशी, पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल

पुस्तकः डिटेक्टिव मिरांडा , लेखक - समरेंद्र नाथ रॉय, मूल्य- 299/ ₹,  प्रकाशक :  रा. प्रकाशन ओ मुद्रण  93, महात्मा गांधी मार्ग,  कोलकाता 700007

 इस दौर में उत्सुकता से सरोबार खोजी लेखन असंभव नहीं पर कठिन अवश्य है। अंग्रेजी में तो शरलॉक होम्स, मारियो पुज़ो, जेम्स हेडली चेज़ से लेकर जेफ्री आर्चर यानी आज तक फिक्शन कला जीवंत है। हिंदी में भी एक समय इब्ने सफ़ी के कर्नल विनोद की जासूसी की कहानियां आज तक सबके जेहन में हैं, गो अब उस लेखन की रफ्तार थम चुकी है।
 ऐसे में तकनीकी माहौल में रचे बसे लेखक समरेंद्र नाथ रॉय, पूर्व निदेशक, भेल द्वारा अनूठी शैली में रचित खोजी मानसिकतायुक्त संग्रह "डिटेक्टिव मिरांडा" पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक में समाहित हैं प्राचीन, विगत, पौराणिक दर्शन से वर्तमान व आधुनिकता की कहानियां. ऐसी अनेक रुचिकर में से कुछ कहानियों की एक बानगी 
 आरंभ नायक डिटेक्टिव मिरांडा, सहायक सोफिया, सिपाही लोबो चरित्र के माध्यम से पुर्तगाली दौर (1510 - 1961) से आज तक का गोआ जिसमें भूत, प्रेत, भ्रम, ड्रग तस्करी टेकनीक व खोज की कहानियां समेटी गईं हैं।
 इनमें लेखक द्वारा तर्क बनाम अंधविश्वास से परे जाकर  भूतों या परा आत्मा या आत्मा के संदर्भ में तो गीता की बखूबी व्याख्या की गई है : न हन्यते हन्यमाने शरीरे एवं अव्यक्तादीनि भूतानि। जीवन एक प्रतीक्षालय है जहां अपने सारे झोले छोड़कर आत्मा एक दिन लौट जाती है, पर समाप्त नहीं होती : मृत्योर्मा अमृतं गमय
 और इस संदर्भ में अब्राहम लिंकन, विंस्टन चर्चिल, नेपोलियन बोनापार्ट, चार्ल्स डिकन द्वारा तक इसकी उपस्थिति के एहसास को अवचेतन मन में स्वीकारने की बात बताई गई है। 
 एक अन्य अध्याय में निहित है गुजरात में द्वारिका प्रवास के दौरान इतिहास, विश्वास, समुद्र तट वायुमंडल में कृष्ण के प्रभामंडल के आभास को समेटते हुए आज की दुग्ध क्रांति का विवरण। जर्सी गाय के सौजन्य से सर्वप्रथम उत्पादकता वृद्धि व गुणता जिसके तहत आज प्रदेश इस गौरव गाथा का नायक है।
 महानगरों की रात्रि का अनुभव कराता है चेप्टर मिडनाइट मसाला जहां एक रेडियो जॉकी की ज़ुबानी नर्स, ऑटो चालक, चोर व संवेदनशील इंसान की कथा व व्यथा दोनों को समेटा गया है रुचिकर हास्य व्यंग्य शैली में। 
हां एक और रुचिकर चेप्टर है मक्खन पर, जिसकी कथा द्वापर के बाल माखन चोर से वर्तमान तक आती है, जिसमें उसका उपयोग स्वाद व सेहत से इतर काम निकलने के लिए लोगों के अहं की संतुष्टि व स्वार्थ प्रयोजन समाहित है। 
  समापन खंड आदि से अनंत सनातन के उद्भव को समर्पित है। जहां अन्य धर्मों के आरंभ की काल गणना सहज उपलब्ध है, वहीं सनातन की काल से परे उत्पत्ति को समाहित किया गया है। राम "सभ्यता की सर्वोच्च आकांक्षा" तो कृष्ण "जटिलता के साथ जीने की कला" का दर्शन व्याप्त है। कल्पना बनाम तथ्य।
 कल्पनाशीलता सहित प्राचीन इतिहास एवं पौराणिक दर्शन को तथ्यपरक कल्पनाशीलता के साथ अंजुरी में भरकर समर्पित किया गया है। एक कल्पना युक्त रोचक शैली पुस्तक, जिसे रा. प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित किया गया है। मुद्रण उत्तम एवं त्रुटिरहित। 

Feb 1, 2026

कविता : ढाई आखर

- विजय जोशी  (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल)

उस दिन

दस्तक पर

जब दरवाजा खोला

एक संभ्रांत सुशील

माणिक मोती से जड़ी

सोने के फ्रेम में मढ़ी

एक रुआबदार पर रुखी

ऊपर से सुखी

पर शायद अंदर से दुखी

सेंट से महकती

अंतस में भटकती

एक भव्य महिला को पाया

मैंने अपना सिर खुजलाया

अभिवादन के लिये

जब उठा हाथ

वो मुस्कुराई मेरे साथ

और बोली

अरे तुमने मुझे नहीं पहचाना

भूल गए गुजरा जमाना

मैं तुम्हारी वही सहपाठी मित्र

याद करो मेरा चित्र

जो स्कूल में साथ पढ़ी थी

जीवन की सीढ़ी

कभी हमने साथ चढ़ी थी


मैं अचकचा गया

कहाँ  वह पावन तरुणाई

और कहाँ  यह वैभव की परछाई

तुम हंसती थीं तो

उस निष्पाप हँसी में

उल्लास के फूल झरते थे

जिसमें हम सब साथी

निर्मल मन से बहते थे

तुम्हारे तेवर जाने माने थे

इसलिए सब तुम्हारे दीवाने थे


पर अब 

तुम वैसी कहाँ  रहीं

वह सुदर्शनी काया

विशाल व्यक्तित्व में बदल गई

सूती फ्रॉक कीमती साड़ी में ढल गई

टूटी साइकिल मँहगी कार हो गई

और तुम्हें देखकर

जिंदगी खुद हैरान रह गई

तुमने जो सोचा वह सब पाया

तुम्हारी रग रग में बसी है माया


तुम बोलीं

मत भूलो पुराना कुछ भी

समय बीता पर अंतर घट रिता

मैं अब भी रखती हूँ तुम्हारी चाहत

केवल तुमसे मिलेगी मुझको राहत


मैंने कहा-

पुराना सब अब इतिहास है

टूटे तार पुनः जोड़ना

जीवन का उपहास है

ईश्वर ने हमें विवेक दिया

बदले में कुछ नहीं लिया

सिर्फ इसलिए कि

हम सत्य का मार्ग चुन सकें

उसी पर चलकर

जीवन के सपने बुन सकें

पर तुमने सुख सुविधा को चुना

आत्मा की आवाज को नहीं सुना

कहा भी गया है

कठिन होना जितना आसान है

सरल होना उतना ही कठिन

इसीलिए हम ज़मीर को मारकर भी 

आसान मार्ग चुनते हैं

और लोग हम से सुख कम

दुख अधिक पाते हैं


इसलिए

अब तुन्हें अफ़सोस क्यों है

वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर

सब कुछ ज्यों का त्यों है

तुमने प्यार के मायने नहीं जाने

अपने कभी नहीं पहचाने

पहले ही आधे अक्षर में अटक

अधूरी रह गईं

ढाई आखर का प्यार तो

एक फूल है

जिसकी पँखुरी झर भी जाए

तो खुश्बू बनी रहती है

मन में आनंद की नदी सदा बहती है


तुम इसे व्याख्यान मत समझना

मेरी बात को रात में गुनना

आज मैं अपने परिवेश, परिवार

समाज और घर-बार

सबसे बेहद सुखी और संतुष्ट हूँ

उम्र के इस वानप्रस्थी दौर में

मोह छोड़ने की कोशिश में व्यस्त हूँ

मुझे किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं

जीवन मेरे लिए आनंद है बवाल नहीं


इसलिए मुझे

अपने में व्यस्त रहने दो

मन ने जो जो सोचा है

वह सब करने दो

और अंत में बस इतना कि

रहना चाहता हूँ आन से

और जाना चाहता हूँ

पूरे इत्मीनान से

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,

 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com


Nov 2, 2025

कविताः अपने आप से

  - विजय जोशी 

याद है

उस दिन तुमने कहा था

कि मन नहीं भरा आपका

दुनिया से, जीवन से

इस सारी उहापोह और उलझन से

जो अब भी, करते हैं कविता

जीवन में भरते हैं, रंगों की सरिता

और यह भी कहा था

जिसे आप प्यार कहते हैं

महज एक स्वार्थ है

जहाँ हम

केवल अपने आप से प्यार  करते हैं

और दूसरे

हमारी इच्छाओं का घट भरते हैं

 

तुम्हारी बात ने

मुझे अंदर तक हिलाया

मैं अंदर ही अंदर कुलबुलाया

फिर खुद ही खुद से बोला

अपना अंतरपट खुद ही खोला

हाँ तुम ठीक कहती हो

आम भाषा में

जिसे सब प्यार कहते हैं

सिर्फ एक स्वार्थ है, जहाँ हम

केवल अपने आप से प्यार करते हैं

और दूसरे

न चाहते हुए भी

हमारी मंशाओं को ढोते हैं

पर मेरे लिए तो

प्यार है

एक रंगों भरा विस्तृत आकाश

जिसमें समाया है निश्चल विश्वास

मुझे याद आ रहा है

बचपन में कभी, मैंने कहीं पढ़ा था

कि किसी जन्म में, हम जाने- अनजाने

जिन्हें तकलीफ पहुँचा देते हैं

वे ही अगले जन्म में

हमारे बनकर, फिर मिलने आते हैं

ताकि हम रिश्तों की अहमियत को

फिर से समझ सकें

और इस तरह

अपने पूर्व जन्म के कर्मों को

न सिर्फ धो सकें

बल्कि आगे के सफर में

स्नेह की फसलें भी बो सकें

कहा भी तो गया है कि

हम पूर्व जन्म के ऋण

इस जन्म में चुकाते हैं

और जन्म जन्मांतर के रिश्तों को निभाने

फिर से आते हैं

जिस दिन से

यह भेद मेरी समझ में आ गया

मेरा पूरा सोच ही बदल गया

और आगे का जीवन

फिर से सँवर गया

 

शायद वही दिन था

हाँ वही दिन था कि

मेरे लिए प्यार के मायने बदल गए

संशय के बादल नेपथ्य में फिसल गए

अब तो मैं, सभी को प्यार करता हूँ

हर अच्छाई पर, पूरे मन से मरता हूँ

अपने स्वार्थी मन को भी

अब नहीं पहचानता

कैसा होता है मतलबी जहाँ

यह भी नहीं जानता

रिश्तों में अब है मेरा गहरा यकीन

और मेरे इरादों के नीचे है ठोस जमीन

 

सच कहूँ तो

इतना जीवन जीने के बाद

बहुत कुछ खोने और पाने के उपरांत

मैं यह भी जान गया हूँ

समग्र सत्य को पहचान गया हूँ

कि उम्र के इस दौर में मुझे

व्यक्तिगत नहीं

समष्टिगत होकर जीना होगा

खुद की न सोचकर

दूसरों के दुखों को

शिव- सा पीना होगा

तभी तो कुछ होगा सार्थक

वरना यह तथाकथित

पद- प्रतिष्ठा, धन- दौलत, मान- सम्मान

ओहदों का गुमान

सब कुछ है निरर्थक

 

यही तो है

हाँ केवल यही तो है

जन्म- जन्मांतर से चला आ रहा

हम सबका शाश्वत धर्म

जिसे निभाना ही होगा

और शेष जीवन

दूसरों के लिए

पूरी शिद्दत की साथ

बिताना ही होगा

                आमीन !


Aug 1, 2025

जीवन दर्शनः डॉ. अब्दुल कलाम : मानवता की मिसाल

  - विजय जोशी 

 - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

- ऊँचे व्यक्तित्व की सबसे पहली पहचान है आचरण में सरलता, सादगी, गरिमा एवं गंभीरता. लेकिन होता है इसके सर्वथा विपरीत। पद, प्रतिष्ठा, पैसा उसके चरित्र में पतन का मार्ग का कारण भी बन जाता है, जब व्यक्तित्व पर गुरूर के बादल छा जाते हैं। सारे  प्रसिद्ध व्यक्तियों में एक बात समान दिखाई देती है और वह है उनका निर्मल, निश्चल आचरण, अनासक्त कर्म योगी- सा व्यक्तित्व।
 - डॉ. कलाम का नाम उन राष्ट्रपतियों में गिना जाता है जिनका सम्मान देस- परदेस सब जगह एक समान रहा। उनके सचिव पी. एम. नायर ने उनकी यादों को जिस प्रकार साझा किया है वह हमारी बहुत बड़ी अमानत है एवं उनकी पुस्तक “कलाम इफेक्ट” में संगृहीत किया गया है।
- प्रथम: उन्हें विदेश प्रवास पर राष्ट्राध्यक्षों द्वारा बहुमूल्य भेंट मिला करती थी। लौटने पर कलाम उनकी फोटोग्राफी कर तोषालय में जमा करवा दिया करते थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि राष्ट्रपति भवन से जाते समय एक पेंसिल तक अपने साथ नहीं ली।
- दूसरा : वर्ष 2002 में रमज़ान का अवसर आया तब तक राष्ट्रपति भवन में इफ़्तार के परंपरा थी। उन्होंने खर्च की तहकीकात की जो 22 लाख रुपये था। उन्होंने इफ़्तार पार्टी निरस्त करते हुए समस्त राशि अनाथालयों को भोजन, कपड़े आदि प्रदान करने में खर्च की। अनाथालय चुनने का कार्य भवन कर्मचारी समिति द्वारा किया गया। मजेदार बात तो यह थी कि इस कार्य हेतु अपने वेतन में से 1 लाख रुपये की राशि भी पूर्णतः गोपनीय तरीके से दान दी। वे एक सच्चे मुसलमान थे; लेकिन उनके दौर में वहाँ कभी इफ़्तार का आयोजन नहीं हुआ।
- तीसरा: वे ‘सर’ संस्कृति के विरुद्ध थे। एक बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से चर्चा के दौरान जब उन्हें असहमति के विचार मिले, तो उन्होंने कतई बुरा नहीं माना। अवाक नायर ने बताया कि राष्ट्रपति ने कहा कि उनके विचार यदि सहमति सम्मत हुए तो स्वीकार भी करेंगे।
- चौथा: उन्होंने तमिलनाडु स्थित अपने गृहनगर से 50 रिश्तेदारों को दिल्ली दर्शन हेतु बुलाया। प्राइवेट बस सेवा का खर्च वहन किया। किसी सरकारी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया गया। भोजन सहित सारा खर्च उन्होंने उठाया। अनूठी बात तो यह थी कि उनके भाई जो उनके साथ ही ठहरे थे उसका खर्च भी कलाम उठाना चाहते थे। ऐसी सादगी इतिहास में कहाँ मिलेगी। उनकी नम्रता के सामने सारी कर्मचारी नतमस्तक थे।
- पाँचवाँ: विदाई के समय समस्त कर्मचारी सपरिवार उपस्थित थे सिवाय नायर के जिनकी पत्नी एक दुर्घटना के कारण आने में असमर्थ थी। अगले दिन सबने देखा कि नायर के घर पर राष्ट्रपति कलाम उनकी पत्नी का हालचाल जानने पधारे। नायर लिखते है इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा जब राष्ट्रपति ने किसी कर्मचारी के परिवार के प्रति इतना संवेदनशील उदाहरण प्रस्तुत किया हो।
- उपर्युक्त केवल कुछ उदाहरण ही हैं पर आज के ऊपरी दिखावे वाले समाज में हर एक के लिए आगत लंबे समय तक एक गहन संदेश के वाहक हैं। ऐसी शख़्सियत परिचय की नहीं; अपितु परिचय उनका मोहताज होता है।

Jul 1, 2025

जीवन दर्शनः ज़ोहनेरिज़्म : एक कुख्यात अवधारणा

  - विजय जोशी  

(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से
मैं एतिबार न करता तो क्या करता
 पिछले दिनों तथ्यों को तोड़ मरोड़कर  भारत को बदनाम करने के परिप्रेक्ष्य में जॉर्ज सोरोस का कुख्यात नाम सुर्खियों में रहा है। झूठ को सफाई के साथ इस हद तक परोसने का गोबेल्स (द्वितीय विश्वयुद्ध) प्रयास कि सच ज़मींदोज़ हो जाए, उसे कहते हैं ज़ोहनेरिज़्म।
- इस कुख्यात शब्द को गढ़ा गया था जेम्स के. ग्लासमेन द्वारा जिसका अर्थ है : वैज्ञानिक रूप से अनभिज्ञ जनता को गलत निष्कर्ष पर ले जाने के लिए सच का दुरुपयोग।
- ज़ोहनेरिज़्म की अवधारणा है लोगों को भ्रमित करने के लिए सरल तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के बारे में।
- 1997 में युवा छात्र नाथन ज़ोहनर ने अपने सहपाठियों के सामने अपना विज्ञान मेला प्रोजेक्ट प्रस्तुत किया, जिसमें एक अत्यधिक जहरीले रसायन को इसके रोजमर्रा के उपयोग से प्रतिबंधित करने की माँग की गई , जो था हाइड्रोजन मोनोऑक्साइड।
- अपनी पूरी प्रस्तुति के दौरान ज़ोहनर ने अपने दर्शकों को वैज्ञानिक रूप से सही सबूत प्रदान किए कि इस रसायन पर प्रतिबंध क्यों लगाया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि डाइहाइड्रोजन मोनोऑक्साइड:
- गैस के रूप में होने पर गंभीर जलन होती है।
- धातु का विघटन और जंग लगना।
- अनगिनत लोगों की मौत।
- सेवन से अत्यधिक पेशाब और सूजन।
- यदि इस पर निर्भर हैं तो रसायन आपको मारने में सक्षम।
- फिर उन्होंने अपने सहपाठियों से पूछा कि क्या वे वास्तव में इस पर  प्रतिबंध चाहते हैं।
- उपस्थित 50 बच्चों में से 43 बच्चों ने इस स्पष्ट रूप से जहरीले रसायन पर प्रतिबंध लगाने के लिए मतदान किया। हालाँकि  इस रसायन को आमतौर पर बिल्कुल भी जहरीला नहीं माना जाता है।
- वास्तव में डाइहाइड्रोजन मोनोऑक्साइड तो पानी के अलावा और कुछ नहीं है।
- नाथन ज़ोहनर का प्रयोग पानी पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास नहीं था; बल्कि यह बात साबित करने के लिए कि लोग वास्तव में कितने भोले-भाले हो सकते हैं।
- साथ ही ज़ोहनर ने अपनी बात कहने के लिए जिन बिंदुओं का इस्तेमाल किया, वे सभी तथ्यात्मक रूप से 100% सही थे। उसने सही तथ्यों को छोड़कर सारी जानकारी को अपने पक्ष में कर लिया।
- पत्रकार जेम्स के. ग्लासमैन ने ‘ज़ोहनेरिज़्म’ शब्द का प्रयोग वैज्ञानिक रूप से अज्ञानी जनता को गलत निष्कर्ष पर ले जाने के लिए एक सच का ‘दुरुपयोग’ करने के लिए किया।
- यह तथ्य कि लोग गुमराह हो सकते हैं और इतनी आसानी से गुमराह हो सकते हैं ,अत्यधिक परेशान करने वाला है। यह आपके विचार से कहीं अधिक बार होता है, खासकर जब राजनेता, षड्यंत्र सिद्धांतकार आदि लोगों को झूठे दावों पर विश्वास करने के लिए सिद्ध तथ्यों का उपयोग करते हैं।
- हमारे देश में इस कुख्यात अवधारणा का सर्वाधिक उपयोग किया गया है खासतौर पर राजनेताओं द्वारा जनता को मूर्ख बनाकर लोक लुभावन नारे तथा फ्रीबीज़ के मायाजाल में उलझाकर सरकार बना लेने तक में। गो यह बात दूसरी है कि उसी भोली- भाली जनता को ही आगे चलकर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है और देश गड्ढे में। कीमत चुकानी पड़ेगी आगत पीढ़ी को। 
बदन पे जिस के शराफत का पैरहन देखा
वो आदमी भी यहाँ हम ने बदचलन देखा

Jun 1, 2025

जीवन दर्शनःटॉम स्मिथ संस्कार से सफलता

  - विजय जोशी  - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जीवन में हर एक का धरती पर आगमन होता है , ईश्वर प्रदत्त गुणों और मूल्यों सहित। आदमी से अपेक्षा रहती है कि वह अपने आगमन को सार्थक कर योगदान देते हुए विदा हो। किन्तु सोचिए भौतिक सुख के मायाजाल की खोज में उलझे हममें से कितने विवेक का सही उपयोग कर पाते हैं। सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का मार्ग कठिन है पर अंततः जीवन में वही सफलता का सोपान बनता है।
- मृत्यु के समय व्यक्ति टॉम स्मिथ ने अपने बच्चों को बुलाया और अपने पद- चिह्नों पर चलने की सलाह दी , ताकि उनको अपने कार्य में मानसिक शांति मिले।
- उसकी बेटी सारा ने कहा : डैडी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आप एक पैसा भी छोड़े बिना मर रहे हैं। जिनको आप भ्रष्ट बताते हैं वे अपने बच्चों के लिए सम्पत्ति छोड़कर जाते हैं। हमारा तो घर भी किराये का है। आप जाइए। हमें अपना मार्ग स्वयं बनाने दीजिए।
- कुछ क्षण बाद उनके पिता ने अपने प्राण त्याग दिए।
- तीन साल बाद सारा एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में इंटरव्यू देने गई। कमेटी  चेयरमैन ने पूछा : तुम कौन सी स्मिथ हो?
- सारा ने उत्तर दिया : मैं सारा स्मिथ हूँ। मेरे पिता टॉम स्मिथ अब नहीं रहे।
- चेयरमैन ने उसकी बात काट दी : हे भगवान, तुम टॉम स्मिथ की पुत्री हो।
- टॉम स्मिथ के बारे पूछने पर वे कमेटी सदस्यों से बोले : वे स्मिथ थे, जिन्होंने मेरे सदस्यता फ़ार्म पर हस्ताक्षर किए और उनकी अनुशंसा से ही मैं वह स्थान पा सका , जहाँ आज हूँ। उन्होंने यह स्वार्थरहित होकर किया था। हम दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे। फिर भी यह किया था।
- फिर वे सारा की ओर मुड़े :  तुम स्वयं को इस पद पर चुना हुआ मान लो। तुम्हारा नियुक्ति पत्र तैयार है।
- सारा स्मिथ कम्पनी में कॉरपोरेट मामलों की प्रबंधक बन गई। दो साल बाद कम्पनी चेयरमेन की इच्छा किसी योग्य को अपना पद देने की हुई। उन्हें ऐसा व्यक्ति चाहिए , जो सत्यनिष्ठ और ईमानदार हो। सलाहकार ने उस पद के लिए सारा स्मिथ को नामित किया। 
- एक इंटरव्यू में जब सारा से उसकी सफलता का राज पूछा गया , तो उसने मार्मिक उत्तर दिया : मेरे पिता ने मेरे लिए मार्ग खोला था। उनकी मृत्यु के बाद ही मुझे पता चला कि वे भले ही निर्धन थे, लेकिन सत्यनिष्ठा में वे बहुत धनी थे।
- फिर उससे पूछा गया कि वह रो क्यों रही है। उसने उत्तर दिया : मृत्यु के समय मैंने ईमानदार होने के कारण पिता का अपमान किया। मुझे आशा है वे जहाँ भी हैं , मुझे क्षमा कर देंगे। मैंने कुछ नहीं किया। उन्होंने ही मेरे लिए यह सब किया था।
- अन्त में उससे पूछा गया : क्या तुम अपने पिता के पद- चिह्नों पर चलोगी। 
- उसका उत्तर था : मैं अब अपने पिता की पूजा करती हूँ। मेरे लिए भगवान के बाद उनका ही स्थान है।
- निष्कर्ष : मित्रों आप भी चिंतन करें कि क्या आप टॉम स्मिथ की तरह हैं। ईमानदारी, आत्मनियंत्रण और पापों से डरना ही किसी व्यक्ति को धनी बनाते हैं, मोटा बैंक खाता नहीं। सो अपने बच्चों के लिए संस्कार रूपी एक अच्छी  विरासत छोड़कर जाइए

May 2, 2025

जीवन दर्शनः उसैन बोल्ट: परहित सरिस धरम नहीं भाई

 - विजय जोशी 

 पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जो भी पुरुष नि:ष्पाप, निष्कलंक, निडर है
उसे प्रणाम. कलियुग में वही हमारा ईश्वर है
     जीवन में आगे बढ़ने के लिए भाग्य से अधिक आवश्यक है लगन, परिश्रम एवं प्रतिबध्दता। कहा भी गया है : सकल पदारथ हैं जग माहीं / करमहीन नर पावत नाहीं। किंतु असफलता के दौर में मनुष्य भाग्य को कोसने लगता है। यह तो हुई एक बात।
    दूसरी यह कि सफलता के पलों में वह  स्वयं ही सारा श्रेय लेते हुए खुद को ख़ुदा समझने का भ्रम पाल लेता है और अपने सगे, संबंधियों, सखाओं के मान सम्मान को तिलांजलि दे देता है। जिस सीढ़ी का इस्तेमाल कर आगे बढ़ा उसे हटा देता है ताकि दूसरे उसके कद की बराबरी न कर सकें। यह हुई दूसरी बात; लेकिन यह सार्वभौम सत्य भी नहीं। कुछ बिरले ऐसे भी होते हैं जो अपनी संपत्ति, सुख,  संपदा सबके साथ साझा करते हैं। ऐसे ही एक व्यक्तित्व की बानगी का प्रयास
     सेंट लियो उसैन बोल्ट (जन्म 21 अगस्त 1986), जमैका के अंतरराष्ट्रीय धावक और आठ बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हैं। वे 100 / 200 मीटर एवं 4x100 मीटर रिले दौड़ के विश्व रिकार्डधारी हैं। इन सभी तीन दौड़ों का ओलंपिक रिकॉर्ड भी बोल्ट के नाम है। 1984 में कार्ल लुईस के बाद 2008 ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक में बोल्ट एक ओलंपिक में तीनों दौड़ जीतने वाले और एक ओलंपिक में ही तीनों दौड़ में विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले पहले व्यक्ति बन गये। इसके साथ ही 2008 में वे 100/ 200 मीटर स्पर्धा में ओलंपिक खिताब पाने वाले भी पहले व्यक्ति बने।
   दौड़ में उनकी उपलब्धियों के कारण मीडिया की ओर से उन्हें 'लाइटनिंग बोल्ट' का उपनाम मिला; लेकिन बात यहाँ उनकी विश्व रिकार्ड उपलब्धियों से इतर उस भाव या जज़्बे की है, जिसके लिए उन्हें मानवता के इतिहास में सदा सर्वदा याद रखा जाएगा एवं आने वाले अनंत काल तक प्रेरणा पुंज के रूप में याद रखा जाएगा। 
   दरअसल हुआ यूँ कि प्रसिद्धि के चरमोत्कर्ष के पलों में भी वे अपने माता पिता को कभी नहीं भूले और जिसके तहत उसैन बोल्ट ने अपने माता-पिता के गाँव को समुचित सुविधाओं वाले एक आधुनिक शहर में बदल दिया।
    यह सब तब शुरू हुआ जब उसैन बोल्ट शहर में अपने माता-पिता के लिए एक घर खरीदना चाहते थे। तथापि उनके माता-पिता ने यह कहते हुए इस विचार को खारिज कर दिया कि वे गाँव नहीं छोड़ना चाहते। वे अपने पड़ोसियों और दोस्तों को नहीं छोड़ना चाहते थे।
      बोल्ट ने शहर वाली सुविधाएँ गाँव में उपलब्ध कराने, बच्चों के लिए एक स्कूल, मनोरंजन सुविधाएँ, स्वास्थ्य केंद्र और खेल के मैदान जैसे सामाजिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करके गाँव को आधुनिक बनाने का फैसला किया ताकि इसे सभी के लिए अधिक रहने योग्य बनाया जा सके। और यह सब पूरे समर्पण के साथ गर्वरहित भाव के साथ विनम्रतापूर्वक किया।
   और इस तरह उसैन ने केवल अपने माता-पिता के ही नहीं, बल्कि गाँव के सभी लोगों के जीवन को बेहतर बना दिया। है न कितने आश्चर्य की बात। इस दौर में तो विचित्र, किंतु सत्य।
एक स्वरूप में समा गईं किस भांति सारी सिद्धियाँ,
कब था ज्ञान मुझे  इतनी सुंदर होती हैं उपलब्धियाँ ।   ■

Apr 1, 2025

जीवन दर्शनः व्यर्थ को करें विदा

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

कल हम न होंगे न कोई गिला होगा
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिलसिला होगा
जो लम्हे हैं चलो हंसकर बिता लें
जाने ज़िंदगी का कल क्या फैसला होगा
√) जीवन बहुत छोटा किंतु बहुत हसीन है। कितनी सार्थक सुविधा के साथ ईश्वर ने हमें धरती पर भेजा है। सुंदर, सुगठित शरीर, बल, बुद्धि, विद्या, विवेक सहित ताकि हम प्राप्त पलों का भरपूर आनंद लेते हुए कर्मों से धरा पर अपने आगमन को सार्थक करते हुए विदा हों। यह तो हुई पहली बात।
√) दूसरी बात यह कि होता क्या है। वास्तविकता के धरातल पर छोटी मोटी बातों को तूल देते हुए व्यर्थ के वाद विवाद, मान अपमान की मिथ्या धारणा को धारण करते हुए हम प्राप्त सब कुछ गंवा देते हैं।
√) एक बुज़ुर्ग महिला गंतव्य पर पहुँचने के लिये सार्वजनिक बस में एक सीट पर बैठ गई। अगले ही स्टॉप पर लदे हुए भारी- भरकम अनेक बेग सहित एक अभद्र युवा महिला ने साथ वाली सीट पर आसान ग्रहण कर लिया। और इस तरह सहयात्री के लिये परेशानी का सबब बन गई। 
√) लेकिन पूर्ववर्ती महिला बिना किसी शिकायती लहजे या दुर्भावना के सहज शांतचित्त ही बनी रही। यह आश्चर्यजनक घटना देखकर एक अन्य सहयात्री ने उस भद्र महिला से पूछा : जब उस अभद्र महिला ने इतना कुछ किया , तो आपने शिकायत क्यों नहीं की।
√) अब चकित होने की बारी प्रश्नकर्ता की थी जब उत्तर मिला : इतनी छोटी सी बात या घटना के लिए असहज होने जैसी कोई बात नहीं। हमारी यात्रा छोटी सी है। अगले स्टॉप पर ही मुझे उतर जाना है। जीवन में अनेक ऐसे अवसर आएँगे, किंतु अनर्थ के वाद विवाद को जन्म देने या उत्तेजित होने के बजाय उचित तो यही होगा कि हम अपने खुद के जीवन के माधुर्य को बलिदान न होने दें। यही कारण है कि मैं न तो रुष्ट हुई और न ही बदले में बदतमीजी को स्वीकार किया। कुल मिलाकर संदेश स्पष्ट था :
जहाँ चोट खाना, वहीं मुस्कुराना 
मगर इस अदा से कि रो दे ज़माना
√) अब इस प्रसंग को वास्तविक जीवन से जोड़िए। हममें से हर एक धरती पर उतरा है एक निश्चित समय या पलों की थाती लेकर और यह अवधि इतनी सीमित है कि इसे बर्बाद करने के बजाय प्राप्त पलों का सदुपयोग करते हुए शांतचित्त से प्रसन्नतापूर्वक जीने में ही हमारी भलाई निहित है बनिस्बत हर छोटी मोटी बात पर व्यर्थ के वाद विवाद में उलझकर अपने मानस की शांति खोने में। याद रखिये हमारा बड़प्पन क्षमा कर देने में है बजाय ईर्ष्यालु होने के, क्योंकि ऐसे प्रसंग दुःखद से अधिक तो हास्यास्पद आपदा समान होते हैं और समय के अपव्यय के सूचक। 
जिनका काम सियासत है वो सियासत जानें
अपना पैगाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे

Mar 1, 2025

जीवन दर्शनः भूलने का विज्ञान- छिपा हुआ वरदान

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

   उपरोक्त शीर्षक कुछ अटपटा सा लगता है। पर इसका भी निहितार्थ है। सतही तौर पर इस कथन से सहमत नहीं हुआ जा सकता, किंतु उचित परिप्रेक्ष्य में देखें तो सब समझ में आ जाएगा। तो आइए देखें इसका सकारात्मक पहलू।
    दिल और दिमाग मनुष्य को ईश्वर की अद्भुत देन है। दिल जहाँ हमारे संवेदना समायुक्त पहलू को संवारता है, वहीं मस्तिष्क तौल मोल कर उचित निर्णय में सहायक होता है। मस्तिष्क में सारी जानकारी सीमा रहित संग्रहित होती है। यह तो हुआ सुखद पक्ष, लेकिन अति मात्रा में संग्रहित डेटा उसे बोझिल करने का सबब भी बनता है। इसके निराकरण हेतु हमें भूलने की सुविधा उपलब्ध है।
कई बार हम उस व्यक्ति का नाम भूल जाते हैं जिससे हम कुछ दिन पहले मिले थे। स्मृति अनुभूति की आधारशिला है, जो हमें स्मृति को संग्रहीत कर पुनः प्राप्त करने की अनुमति देती है। फिर भी स्मृति के पार्श्व में एक बेहद आकर्षक अवयव भी छुपा है : भूल जाना।
  जिस तरह बेतरतीब कार्य प्रणाली से सफलता संदिग्ध हो जाती है, उसी तर्ज पर आँकड़ों से बोझिल अप्रासंगिक जानकारी मस्तिष्क की गति को कुंद कर देता है। इनके हटने पर ही सब कुछ सुव्यवस्थित होकर नई जानकारी की जगह बनाई जा सकती है।
 वास्तविक प्रसंग : न भूल पाने का दर्द कैसा होता है यह मुझे ज्ञात  हुआ  एक पूर्व वरिष्ठतम पद से सेवानिवृत्त हुए उच्च अधिकारी से जिनकी याददाश्त अद्भुत थी। सब कुछ संग्रहित, लेकिन दुर्भाग्य यह कि जैसे ही कोई व्यक्ति उनके समक्ष किसी कार्य से उपस्थित होता था उनके मानस पटल पर उस व्यक्ति का विगत का पूरा इतिहास स्वयमेव उपस्थित हो उचित निर्णय लेने के मार्ग में अवरोध बनकर आ खड़ा होता था। नीतिगत सापेक्ष (Objective) निर्णय पर  व्यक्तिगत जानकारी के परिप्रेक्ष्य में विषय परक (Subjective) दुविधा का असमंजस। सोचिए कितनी दुविधा और सोच का संकट। 
   सभी आयु समूहों में भूलने का एक मुख्य कारण ध्यान न देना भी है। जानकारी को विश्लेषित कर बनाए रखने की हमारी क्षमता हमारी मानसिकता पर भी निर्भर करती है। जब हम किसी विशेष उत्तेजना या कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने में विफल होते हैं, तो उससे जुड़ी जानकारी स्मृति में ठीक से उभर नहीं पाती है, जिससे भूलने की स्थिति पैदा हो जाती है। उदाहरण के लिये यदि आप किसी परिचित मार्ग पर चले हैं और आपको स्थलों को पार करने या कुछ निश्चित मोड़ों को याद नहीं कर पा रहे हैं, तो यह संभवतः इसलिए है क्योंकि आपका ध्यान कहीं और था। नकारात्मक विचार या दर्दनाक घटनाएँ अपनी भावनात्मक प्रबलता के कारण स्मृति से मिटने का विरोध कर सकती हैं, जिससे आगे बढ़ने के प्रयासों के बावजूद भूलना चुनौतीपूर्ण हो जाता है
 भूलना अक्सर स्मृति की विफलता के रूप में भी देखा जाता है, जो कतई सही नहीं है। वास्तव में जिस तरह मृत शाखाओं को काटने से एक पेड़ को पनपने में मदद मिलती है, उसी तरह भूलने से हमारी स्मृति प्रणाली अवांछित जानकारी को त्यागने और बदलती  मांगों के अनुरूप ढलने में सक्षम होती है। अगली बार जब आप खुद को किसी जानकारी को याद करने में असमर्थ पाएँ तो उपरोक्त तथ्यों को याद रखें। 
    निष्कर्ष : इसे ही कहा जाता है भूलने का विज्ञान : छिपा हुआ वरदान, जो आपको मानसिक रूप से सक्रिय, सचेत और स्वस्थ रखता है। 

Feb 1, 2025

जीवन दर्शनःविचार से विजय

 

  - विजय जोशी  - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

1. आपके विचार केवल आपके विचार हैं और आपके पास पूरी शक्ति और साहस है उन पर न केवल नियंत्रण की बल्कि सोच को स्वयं अनुसार ढालने की।

2. हम क्यों कष्ट भोगते हैं। मात्र इसलिये कि हम दूसरों यह अधिकार दे देते हैं कि वे हमें न केवल, नियंत्रित कर सकें अपितु उससे भी आगे बढ़कर कि हम कैसा सोचते तथा अनुभव करते हैं।
3. याद रखिए अपने जीवन की कहानी के आप ही सृजनकर्ता उर्फ़ लेखक हैं। औरों को इसे नष्ट करने का अधिकार मत दीजिए।
4. एक बार सोचकर देखिए कोई अन्य आपको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता, जितना आपके अपने विचार। 
5. यह भी कि कोई आपके घाव नहीं भर सकता, जितना आपके विचार। 
6. आप दूसरों में यह परिवर्तन नहीं कर सकते कि वे आपके साथ कैसा व्यवहार करते हैं; किंतु यह अवश्य कर सकते हैं कि ऐसे अवसरों पर हम कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं । 
7. क्षमा: लोगों को इस बात के लिए मत क्षमा कीजिए कि वे इसके लायक हैं, वरन् इसलिए कि आप जीवन में आनंद के हकदार हैं। 
8. हर सुबह जब उठें, तो यह और केवल यह सोचें :
           सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः 
            सर्वे भद्राणि पश्यन्तु  मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत् 
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने। हे भगवन हमें ऐसा वर दीजिए!)
निष्कर्ष : इस तरह अपनी हर सुबह सकारात्मक सोच को मन, मस्तिष्क एवं हृदय में समाहित करते हुए कीजिए। याद रखिए- आज की भाषा में  शरीर तो केवल हार्डवेयर (Hardware)  है, जबकि आपका सोच सॉफ्टवेयर (Software) उसे संचालित करता है।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Jan 1, 2025

जीवन दर्शनः बनिये उत्साह का कारण

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

     पेरिस के ऑपेरा हाउस में वर्षों पूर्व घटित इस कहानी ने मुझे कई बार अंदर तक छुआ है, जब एक मशहूर गायक का कार्यक्रम आयोजित किया गया था और जिसके टिकट काफी समय पूर्व ही बिक चुके थे। लोगों में प्रस्तुति को  लेकर बहुत उत्सुकता थी तथा हॉल समय पूर्व ही खचाखच भर चुका था।
    उन्हीं पलों में कार्यक्रम आरंभ होने से ठीक पहले आयोजक ने मंच पर आकर यह घोषणा की कि हमारे आज के मशहूर गायक अचानक बीमार हो गए हैं; अतः स्टेज पर नहीं आ पाएँगे, लेकिन उनके स्थान पर एक अत्यंत प्रतिभाशाली नौजवान अब अपने संगीत की प्रस्तुति देंगे।
       यह सुनते ही भीड़ बैचेन हो गई; किन्तु इसके बावजूद नए कलाकार ने बगैर हतोत्साहित हुए पूरी तन्मयता के साथ शोर- शराबे के बीच अपना संगीत पेश किया। समाप्ति पर किसी ने भी ताली नहीं बजाई।
     तभी एक चमत्कार हुआ और वह यूँ कि भीड़ में से एक बच्चा अचानक खड़ा होकर बोला : अद्भुत, अद्भुत, अद्भुत। मैं मानता हूँ आपका संगीत बेहद सुंदर था और यह कहते हुए उसने अपने दोनों हाथों से ताली बजाकर नए कलाकार का अभिनंदन किया। तभी एक और चमत्कार हुआ और वह यह कि पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
       बात का संदर्भ यह है कि हममें से हर एक को जीवन ऐसे अवसर देता है, जिसे सार्थक कर पाना हमारे वश में होता है और उन पलों में ऐसे ही लोगों की जरूरत रहती है< जो धारा के विरुद्ध खड़े होकर अच्छे तथा सच्चे लोगों का उत्साह बढ़ा सकें। सो अगली बार न तो सोचिए और न ही किसी भेड़ चाल के अनुगामी बनकर अवसर की अस्मिता को व्यर्थ कीजिए। अच्छाई का पूरा सम्मान करते हुए उसके साथ खड़ा हो जाइए एकला चालो की तर्ज पर।
भलाई कर भला होगा, बुराई कर बुरा होगा।
कोई देखे न देखे पर ख़ुदा तो देखता होगा ।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Dec 1, 2024

जीवन दर्शनः रोवन एटकिंसन उर्फ़ मिस्टर बीन

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

ये कह के दिल ने मेरे हौसले बढ़ाए हैं
ग़मों की धूप के आगे खुशी के साए हैं 
- जीवन में हर चीज़ पर हमारा अधिकार नहीं होता। भले ही वह हमारा व्यक्तित्व हो या अन्य कुछ। अपनी नैसर्गिक अच्छाइयों एवं कमियों के साथ हमारा धरती पर आगमन होता है। सफलता की एकमात्र शर्त सिर्फ यही है कि एक ओर जहाँ हम अपनी अच्छाइयों का लाभ उठाएँ, वहीं दूसरी ओर कमियों का साहस के साथ सामना करते हुए विजय प्राप्त करें।
- रोवन एटकिंसन मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे और बचपन में हकलाने की वजह से उन्हें बहुत तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा। स्कूल में भी उनके लुक की वजह से उन्हें चिढ़ाया और मजाक उड़ाया जाता था। सब उन्हें एलियन जैसा समझते थे। जल्द ही उन्हें एक अजनबी के तौर पर पहचाना जाने लगा और वे एक बहुत ही शर्मीले एवं एकाकी बन गए, जिनके ज़्यादा दोस्त नहीं थे; इसलिए उन्होंने विज्ञान की तरफ़ रुख किया।
- उनमें कुछ भी ख़ास नहीं था, लेकिन उन्होंने सभी को गलत साबित कर दिया। फिर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद उन्हें अभिनय से प्यार होने लगा, लेकिन बोलने की बीमारी के कारण वे असफल रहे। उन्होंने किसी भी टीवी शो में आने से पहले इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने अपने सपने को पूरा करने एक अभिनेता बनने का फैसला किया। एक कॉमेडी ग्रुप में दाखिला लिया, लेकिन उनकी हकलाहट उनके रास्ते में आ गई।
- बहुत से टीवी शो ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। वह बहुत निराश महसूस करते थे, लेकिन कई अस्वीकृतियों के बावजूद उन्होंने खुद पर विश्वास नहीं छोड़ा। उन्हें लोगों को हँसाने का बहुत शौक था और जानते थे कि वह इसमें बहुत अच्छे हैं। उन्होंने अपने मूल कॉमेडी स्केच पर अधिक ध्यान केंद्रित करना शुरू किया और उन्हें एहसास हुआ कि जब भी वह कोई किरदार निभाते हैं, तो धारा प्रवाह बोल सकते हैं।
- उन्होंने अपनी हकलाहट पर काबू पाने का तरीका ढूँढ लिया और इसका इस्तेमाल अभिनय के लिए प्रेरणा रूप में किया। अपनी पढ़ाई के दौरान रोवन एटकिंसन ने मिस्टर बीन के नाम से जाने जाने वाले अजीब, असली और किरदार का सह-निर्माण किया।
- उन्हें अन्य शो में भी सफलता मिली। जिसने बीन को विश्व स्तर पर प्रसिद्ध बना दिया और अपनी शक्ल और बोलने की बीमारी के कारण आने वाली सभी बाधाओं के बावजूद साबित कर दिया कि बिना किसी हॉलीवुड चेहरे के आप दुनिया के सबसे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक बन सकते हैं। 
- यही है रोवन एटकिंसन की सफलता की प्रेरणादायी कहानी, जो यह सीखाती है कि जीवन में सफल होने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीजें हैं जुनून, कड़ी मेहनत, समर्पण और कभी हार न मानना अपनी भावनाओं और कमजोरियों की परवाह किए बिना।
- निष्कर्ष : कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण पैदा नहीं होता। डरो मत। लोग अपनी कमजोरियों और असफलताओं के बावजूद हर दिन अद्भुत चीजें हासिल कर सकते हैं। इसलिए जाओ और अपने पास मौजूद जीवन के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ करो।
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

Nov 1, 2024

आदरांजलिः रतन टाटा - संवेदनशीलता का सफ़रनामा

  - विजय जोशी , पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

उठ गए दुनिया से लेकिन एक दुनिया हो गए

बुलबुले पानी के थे फूटे तो दरिया हो गए

   सिद्धांतवादी एवं परोपकारी पारसी समुदाय के लिए मेरे मन में गहरी श्रद्धा है। आज से लगभग पन्द्रह दशक पूर्व जब ईरान से चलकर यह कौम भारत आई, तो नाव गुजरात के तट पर लगी और जब शरण हेतु संदेश भेजा, तो राजा ने इन्हें दूध से पूरा भरा गिलास भिजवा दिया, यानी कोई गुंजाइश नहीं। तब एक बुज़ुर्ग ने उसे चीनी मिलाकर लौटाया कि बगैर अतिरिक्त जगह के हम दूध में शकर की मिठास सदृश मिल-जुलकर रहेंगे।

   सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस दौर में काठियावाड़ नरेश को दिए गए 3 वचनों पर वे आज भी कायम हैं :

पहला- धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे। सो आज तक हर पारसी जन्मजात पारसी ही है परिवर्तित नहीं।

दूसरा- यहाँ की भाषा अंगीकार करेंगे। सो आज तक हर पारसी की मातृभाषा भी गुजराती ही है।

तीसरा- देश के योगदान के प्रति समर्पण। सो देख लीजिए जे.आर.डी. टाटा से लेकर रतन टाटा तक इस समुदाय का योगदान। हिन्दू- मुसलमान जब मंदिर- मस्जिद बना रहे थे, टाटा परिवार ने प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान, कैंसर चिकित्सा जैसे मानवता समर्पित प्रोजेक्ट को धरती पर उतारा।

उद्देश्य स्टेटमेंट :                   

   मानवता को समर्पित मूल्य इनकी आत्मा में रचे- बसे हैं, जन्मजात। इन्होंने अपनी कम्पनियों की इमारतों को व्यावसायिकता के बजाय मानवता आधारित मूल्यों की ठोस नींव पर खड़ा किया। टाटा ने अपने उद्देश्यों को दृष्टि में रख इस तरह उकेरते हुए स्थापित किया है

       टी. (T ) : विश्वास (Trust)

       ए. (A)  : मानसिकता (Attitude)

       टी. (T )  :  प्रतिभा (Talent)

       ए.  (A)    :  क्षमता (Aptitude)

     जे. आर. डी. टाटा ने जिन मूल्यों की आधारशिला रखी, रतन टाटा ने उसे उस इमारत का आकार दिया, जिसने मानवता को सुख, संतोष की छाया प्रदान की। देश एवं मानवीयता के प्रति योगदान के रतन टाटा के अनेकानेक उदाहरण हैं। सबका उल्लेख असंभव है, सो केवल कुछ के दिग्दर्शन का विनम्र प्रयास -

1. होटल ताज :

    26/11 के आतंकी आक्रमण का मुख्य केंद्र था होटल ताज, जिसमें अनेक विदेशी मेहमान विद्यमान थे। तब टाटा कर्मचारियों ने जान जोखिम में डालकर, जब तक आखिरी अतिथि को सुरक्षित बाहर नहीं निकाल लिया, तब तक एक ने भी खुद की सुरक्षा के लिए एक बार भी नहीं सोचा। ऐसे कठिनतम समय में ऐसी अनोखी अद्भुत कर्तव्यपरायणता की कोई दूसरी मिसाल नहीं, सो इसे हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में केस स्टडी के रूप में संगृहीत कर लिया। और जब इस विषय पर टाटा प्रबंधन से बात की गई तो पता चला :

-ताज समूह कर्मचारी चयन हेतु उन छोटे- छोटे शहरों एवं कस्बों पर ध्यान केंद्रित करता है, जहाँ पारंपरिक संस्कृति आज भी सुरक्षित है।

- चयन में टॉपर्स के बजाय उन छात्रों को वरीयता दी जाती है, जो अपने माता, पिता, गुरुओं का सम्मान करते हैं।

- चयन उपरांत हर एक को यह पाठ कंठस्थ करवाया जाता है कि वे टाटा कर्मचारी मात्र न होकर मैनेजमेंट के सामने मेहमानों के राजदूत हैं।

2. मेक इन इंडिया :

   रतन टाटा ने अपने जीवन में हर इंसान को जाति, भाषा, धर्म के परे जाकर मात्र इंसान समझा और सपने में भी कभी अपमानित नहीं किया। 

   1991 में अध्यक्ष बनते ही उन्होंने अपने सपने टाटा इंडिका कार को साकार किया, किंतु अपेक्षित बिक्री नहीं रही। 1999 में फोर्ड कंपनी के अध्यक्ष हेनरी फोर्ड ने कंपनी खरीदी में रुचि जाहिर करते हुए उन्हें डेट्राइट आमंत्रित करते हुए बैठक में अपमानित किया, तो रतन टाटा मीटिंग अधूरी छोड़कर तुरंत मुंबई रवाना हो गए, इस प्रण के साथ कि वे खुद की कार को ब्रांड स्थापित करेंगे।

   उनका प्रण परवान चढ़ा तथा स्थापित हो गया। इस बीच फोर्ड कंपनी दिवालिया हो गई तथा टाटा ने लैंड रोवर एवं जैगुआर खरीद लेने की पेशकश की। अपने प्रयोजन को अमली जामा पहनाने हेतु हेनरी फोर्ड भारत आए, तो सबको लगा अपने अपमान का बदला लेने हेतु यही उचित अवसर है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। रतन टाटा ने उन्हें पूरा सम्मान देते हुए डील संपन्न की।

 यही जज़्बा और लगन तो चाहिए मेक- इन- इंडिया मिशन को सफलता के शिखर तक ले जाने के लिए।

3. संवेदनशीलता :

  साथियों के प्रति स्नेह, सदाशय, समर्पण के तो अनेक मर्मस्पर्शी प्रसंग हैं। टाटा मोटर के प्रमुख सुमंत मूलगाँवकर थे। प्रबंधन के उच्च अधिकारियों का लंच 5 सितारा होटल में हुआ करता था, जिसमें मूलगाँवकर सदा अनुपस्थित पाए जाते थे। एक दिन जब उनकी खोज की गई तो पता चला कि वे तो उन पलों में ढाबों में पहुँचकर वाहन चालकों से टाटा ट्रक की विशेषताओं एवं कमियों पर विमर्श किया करते थे तथा सुधार हेतु उनकी राय लिया करते थे। परिणाम स्पष्ट था: इन्हीं सुझावों के आधार पर जब सुधार हुआ, तो टाटा वाहन गाड़ी ड्राइवरों की पहली पसंद बन उभरे।

  अब  वह बात आती है, जो सबसे मार्मिक,  हृदयस्पर्शी एवं उपकार के प्रतिदान की है, जो विश्व स्तर पर संवेदनशीलता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है और वह यह कि टाटा समूह ने तुरंत ही सुमंत मूलगांवकर (Sumant Moolagaonkar) के नाम के दो प्रथम अक्षर पर अपने ब्रांड का नाम किया सूमो (Sumo)

4. सेना के प्रति सम्मान :

   यह प्रसंग भारतीय सेना के एक उच्च अधिकारी ने साझा किया, जो गणतंत्र दिवस परेड हेतु टाटा समूह के दिल्ली स्थित होटल में ठहरे थे। शाम को उन्होंने अपनी ड्रेस की इस्तरी हेतु जब इच्छा जाहिर की, तो तुरत- फुरत एक व्यक्ति ने उपस्थित होकर पहले तो उन्हें सेल्यूट किया, फिर पैर छुए तथा ड्रेस लेते हुए सेल्फी के लिये गुज़ारिश की। रात 9 बजे उन्हें रिस्पेशन मेज से रात्रि- भोज हेतु आमंत्रित किया गया और जब वे वहाँ पहुँचे, तो विस्मित होकर रह गए। सारे स्टाफ ने करतल ध्वनि के साथ एक गुलदस्ते के साथ उनका स्वागत किया।

   अगले दिन तो अल्लसुबह उन्हें राष्ट्रपति भवन ले जाने के लिए बी.एम.डब्ल्यू. कार खड़ी थी। अंतिम दिवस भुगतान हेतु रिसेप्शन पर पहुँचे, तो पता चला कि वे होटल के विशिष्ट अतिथि हैं, सो कोई भुगतान नहीं। पूछने पर बताया गया: आप हमारे देश की रक्षा करते हैं, सो हमारे बेहद खास मेहमान हैं।

   फील्ड में वापिस लौटने पर उन्हें ताज में ठहरने हेतु धन्यवाद सहित एक मेल मिला, जिसमें लिखा था कि ताज समूह द्वारा देश सेवा में रत सैन्य कर्मियों हेतु उनके होटल में ठहरने पर व्यावसायिक नहीं; अपितु सामर्थ्य के अनुसार राशि ही ली जाती है। है कोई अन्य ऐसा उदाहरण!

5. टाइटन आई प्लस : 

   भारी वाहनों के मुख्य निर्माता होने के नाते टाटा ने यह पाया कि माल मंज़िल तक शीघ्रतापूर्वक पहुँचाने तथा काम की धुन में ड्राइवर समूह अपनी नेत्र- ज्योति की उपेक्षा करते हैं। सो टाटा समूह ने आगे बढ़कर उनके यात्रा मार्ग पर निःशुल्क नेत्र परीक्षण का तरीका ईजाद किया। ढाबों पर खाद्य सामग्री की सूची अलग - अलग प्रकार के अक्षर अनुपात द्वारा चश्मों की जरूरत एवं प्रदायगी हेतु। चश्मा निःशुल्क नेत्र ज्योति की रक्षा तथा सुरक्षा हेतु। यही है गांधी के शब्दों में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के हित में उठाया गया कदम।

6. विमानन उद्योग : 

  हम सबको मालूम है कि भारतीय उड़ान सेवा का आगाज़ जे.आर.डी. टाटा  के सौजन्य से हुआ था। वे एक बेहद कुशल पायलट एवं भारत में वायु सेवा के जनक थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर ‘एयर इंडिया’ की स्थापना की गई, जो लचर सरकारी व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

   अंततः रतन टाटा को ही आगे आना पड़ा, जिन्होंने इसे घाटे सहित खरीदा। अब यह धीरे - धीरे फिर से उभर रही है। यहाँ विशेष बात यह है कोई अन्य खासतौर पर पारिवारिक विरासत समर्पित राजनीतिज्ञ परिवार होता, तो इस एयर लाइन को परिवार के सदस्य का नाम देता, लेकिन टाटा ने ऐसा न करते हुए भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘एयर इंडिया’ नाम को पूरा सम्मान देते हुए बरकरार रखा है। कितना उदार दिल!

7. कोरोना काल :

     कोरोना मानवीय इतिहास की भीषणतम त्रासदी के साथ उपस्थित हुआ। साक्षात् यमराज मानव समूह के समक्ष ले जाने हेतु उपस्थित थे। सब घरों में दुबके। सड़कों पर सन्नाटा। कोई किसी का नहीं, सिर्फ डॉक्टर समूह के, जो निरंतर पूरे प्राणपण से जुटे थे सबको बचाने के लिए। काम, घर, विश्राम सब केवल अस्पताल। इस कठिनतम परिस्थिति में कैसे जिएँ!

   जानकर आश्चर्य होगा कि उन पलों में न केवल डॉक्टर समुदाय बल्कि साथी छात्र, पैरा मेडिकल स्टाफ के लिए भी मुंबई में टाटा प्रबंधन द्वारा होटल ताज से निःशुल्क गरमागरम भोजन- सामग्री की निरंतरता सुनिश्चित की गई।

8. दीन के दर्द का निवारण :

     टाटा स्टील के चेयरमैन रतन टाटा ने जमशेदपुर में कंपनी के कर्मचारियों की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में एक कर्मचारी ने डरते - डरते एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण मसला उठाया। उसने बताया कि कर्मचारियों के शौचालयों की स्थिति बहुत खराब और अस्वच्छ है, जबकि अधिकारियों के शौचालय हमेशा साफ - सुथरे रहते हैं।

चेयरमैन महोदय ने एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा : इस स्थिति को सुधारने में कितना समय लगेगा?

 अधिकारी ने जवाब दिया : इसके लिए एक महीना काफी होगा।

इस पर चेयरमैन ने कहा : मैं इसे एक दिन में कर देता हूँ। बढ़ई को बुलाओ।

अगले दिन बढ़ई आया, तो चेयरमैन ने उसे दोनों शौचालयों के ऊपर लगे बोर्ड हटाने और उनकी जगह बदलने को कहा। अधिकारियों के शौचालय पर ‘कर्मचारियों के लिए’ और कर्मचारियों के शौचालय पर ‘अधिकारियों के लिए’ का बोर्ड लगा दिया गया। साथ ही उन्होंने हर पंद्रह दिन में इन बोर्डों को बदलने का निर्देश दिया।

  और क्या हुआ? अगले तीन दिनों में दोनों शौचालय बेहद साफ हो गए!

  इससे हमें ये सीख मिलती है कि ‘नेतृत्व’ हमेशा पद से ऊपर होता है। समस्याओं को पहचानने के लिए तार्किक सोच और उन्हें हल करने के लिए रचनात्मक सोच की जरूरत होती है। यह प्रसंग बताता है कि कैसे रतन टाटा ने एक साधारण समस्या को एक रचनात्मक तरीके से हल किया। उन्होंने सिर्फ बोर्ड बदलकर लोगों की मानसिकता बदली और शौचालयों की स्वच्छता में सुधार किया। नेतृत्व का मतलब सिर्फ आदेश देना नहीं होता, बल्कि समस्याओं के मूल कारण को समझना और उन्हें रचनात्मक तरीके से हल करना होता है।

9. पशुओं से प्रेम :

  रतन टाटा का पशुओं से प्रेम भी अद्भुत था। इसीलिए वे डॉग लवर भी कहलाए। कुत्तों से तो उनका प्रेम इतना अधिक था कि होटल ताज के दरवाजे कुत्तों के लिए खोल दिये गए थे। 

 बात वर्ष 2018 की है।  उनके परोपकारी कार्यों की सुगंध पूरे संसार में पहुँच चुकी थी। तब ब्रिटेन के शाही परिवार की ओर से प्रिंस चार्ल्स ने उन्हें  “लाइफटाइम अचीवमेंट” अवार्ड से सम्मानित करने हेतु ब्रिटेन आमंत्रित किया। वे राजी भी हो गए। किंतु विदाई के पलों में उनके दो पालतू कुत्तों टैंगो एवं टीटो  में से एक बीमार पड़ गया तथा उनके साथ रहने के लिए टाटा ने समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया।

सब यह जानकर हैरान रह गए कि टाटा ने शाही सम्मान के बजाय एक कुत्ते को प्राथमिकता दी। अनेकों के आग्रह के बावजूद उन्होंने अपना मन नहीं बदला।

और जब प्रिंस चार्ल्स को कारण पता चला, तो उन्होंने टाटा की सराहना करते हुए कहा : वे एक अद्भुत व्यक्ति हैं। उनके आदर्शों के कारण ही आज टाटा समूह सफल और स्थापित है।

  उन्हींके मार्ग निर्देशन में जून, 2024 को मुंबई महालक्ष्मी में टाटा ट्रस्ट के लघु पशु चिकित्सा अस्पताल का उद्घाटन हुआ।

  है न आज की आपाधापी और लाभ- हानि युक्त इस दौर में दिल को गहराई तक छू जानेवाली विचित्र किंतु सत्य बात।

10. रतन टाटा के अंतिम संदेश : 

1. पहला यह कि दयालुता का कार्य उनके लिए करें जो आपके लिये कुछ भी नहीं कर सकते, लौटाना तो बहुत दूर की बात।

2. कोई भी सेवा कार्य प्रतिदान के आशा के बगैर करें।

3. अपने शब्द यानी वचन का सम्मान करें। अपनी बात से पलटें नहीं, चाहे कितनी भी कठिनाई हो। दिया गया वचन निभाना ही है।

 निष्कर्ष :  ये केवल कुछ ही उदाहरण हैं, रतन टाटा के देश के प्रति लगन, निष्ठा और समर्पण के। भावी इतिहास एक दिन अवश्य कहेगा कि इस धरती पर कभी रतन टाटा जैसे व्यक्तित्व भी पधारे थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन देश एवं मानवता को समर्पित कर दिया था। वस्तुत: वे व्यक्ति नहीं, विचार थे और विचार कभी मरा नहीं करते। चिता ने जो जलाया वह था उनका पार्थिव शरीर, पर जो अमर रहेगा, वह है उनका व्यक्तित्व एवं विचार।

मौत वो हो जिस पर जमाना करे अफसोस,

वरना तो इस दुनिया में आते हैं सभी जाने के लिए।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Oct 1, 2024

जीवन दर्शनः श्री कृष्ण से सीखें : सफलता के सूत्र

 - विजय जोशी . - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

कृष्ण का जीवन अद्भुत था। वे सामाजिक समरसता के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। निर्बल के पक्ष में न केवल खड़े रह कर न केवल उसे सबल बनाया, बल्कि समाज में पुनर्स्थापित भी किया। उनके जीवन से सफलता अर्जन के 10 सूत्रीय बिंदुओं पर प्रकाश का विनम्र प्रयास : 
1. प्रेम में निःस्वार्थता : निर्मल, निश्छल वासना रहित औदार्य पूर्ण प्रेम। सम्बंधों को बगैर किसी चाहत या प्रतिदान के साथ जीवन जिया। प्रेम में  दिया ही अधिक लिया कुछ भी नहीं।
2. सुदृढ़ मित्रता एवं निष्ठा : इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि जहाँ एक ओर वे कंस के अत्याचारों के विरुद्ध ग्वाल बाल सखाओं के साथ खड़े रहे, तो दूसरी ओर अन्याय झेल रहे पांडवों के पक्ष में खड़े रह उन्हें न्याय प्रदायगी के सोपान बने।
3. भरोसा एवं समर्पण : आस्था, वफ़ादारी और विश्वास एक विश्वसनीय मित्र की सर्वोच्च पहचान है, जिसमें वे खरे उतरे।
4. धार्मिकता से परिपूर्ण : उदार धर्म भाव सहित सबके साथ उचित व्यवहार। सबसे प्रेम, वैर रहित आचरण।
5.  समानता एवं आदर : सामाजिक प्रतिष्ठा को परे रखते हुए हर एक से समान भाव से आदरपूर्ण व्यवहार।
6.  करुणा एवं दया : किसी से कोई शत्रुता का भाव नहीं। शत्रु को भी मित्र मानते हुए पहले संवाद, समझाइश और फिर समस्या निराकरण के पश्चात क्षमा कर देने वाला भाव।
7.  मोह रहित  संबंध : जिन्हें हम प्रेम करते हैं उनसे पूरा स्नेह और उचित देखभाल, लेकिन सीमा से परे का लगाव या अधिकार भाव नहीं।
8.  संवाद में स्पष्टता : अपने अनुभव या ज्ञान को तरीके से साझा करने के साथ- साथ अपनी बात को सटीक तथा सार्थक तरीके से समझाने की कला।
             कहने को तो हर बात कही जाती है,  कहने का सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है। 
9. आनंद और उत्सव : जीवन के हर पल को आनंदपूर्वक जीने की कला। मित्र परिवार सगे सम्बंधियों के साथ एकजुटता का भाव
10.  शाश्वत प्रेम : रिश्तों में शर्त रहित स्नेह प्राप्त करने के लिए निर्मल मन से प्रयास।
निष्कर्ष : जीवन का सत्व और तत्त्व :
 - छोटी उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्री कृष्ण। 
- छोटी- सी बाँसुरी को दोनों हाथों से पकड़ते हैं।
- बस इतना ही अंतर है- ‘पराक्रम और प्रेम’ में।
-  इसलिए रिश्तों में ‘पराक्रम’ नहीं ‘प्रेम’ होना चाहिए।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,  मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Sep 1, 2024

जीवन दर्शनः सम्मान अपनों का: सुखद सपनों का

 - विजय जोशी 

( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो

फिर देखो किस कदर ये जिंदगी आसान हो जाये

  जीवन उम्मीदों का अपार संसार है और यही हमारी यात्रा की नौका भी है और पतवार भी। लेकिन उम्मीदों से बहुत ज्यादा की आस पाल लेना दुख का कारण भी बन सकता है, यदि हम उस  स्वावलंबन की लक्ष्मण रेखा लांघकर परावलंबन की सरहद में पहुँच जाएँ। जीवन में खुद की उम्मीद पूरा करने की आकांक्षा के दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने पाने का प्रयास करने से अधिक सुखकारी है।

  इस संदर्भ में एक सुंदर वृत्तांत से मेरा सामना हुआ। पत्नी ने दिनभर की थकान के बाद रात के भोजन के समय थाली में दाल सब्जी के साथ किसी हद जली हुई रोटी पति को परोसी। पुत्र बड़े मनोयोग से सारा दृश्य निहार रहा था। उसके लिए आश्चर्य अभी प्रतीक्षा सूची में तब तक था, जब उसने देखा कि माँ सॉरी कह पाती, उसके पूर्व ही उसके पिता ने जली रोटी के साथ भोजन बिल्कुल आनंदपूर्वक ग्रहण करना आरंभ कर दिया।

पुत्र से रहा नहीं गया। उसने भोजन उपरांत पिता से देर रात्रि अकेले में धीमे स्वर में पूछा कि क्या उन्हें सचमुच में जली रोटी पसंद आई थी। और तब जिस सत्य से उसका साक्षात्कार हुआ उससे उसकी आँखें भर आईं ।

पिता ने कहा - तुम्हारी माँ सारे दिन काम करते हुए थक जाती है। गृहस्थी की गाड़ी खींचने में। सारा दिन काम करते- करते शाम तक थककर निढाल हो जाती है। उसके त्याग से परिपूर्ण प्रेम के सामने मुझे रोटी के जले होने का एहसास ही नहीं हुआ। ऐसे अवसर पर यदि मैं कुछ भी कटु शब्द कह भी देता, तो शायद अपनी नजर में खुद गिर जाता।

पिता ने अपनी बात आगे जारी रखी - सारा संसार और हमारा अपना जीवन अनेक कमियों से परिपूर्ण है। ऐसे में दूसरों में कमियाँ ढूँढकर हम अपनी कमियों पर परदा नहीं डाल सकते। सो श्रेष्ठ यही होगा कि हम सब जैसे भी हैं, एक साथ संतुष्टि का भाव अंतस् में समाकर प्रसन्नतापूर्वक जीने की कला सीखें।

 बात बहुत सरल, सामायिक और सार्थक है। हमें दूसरों से आवश्यकता से अधिक उम्मीद रखने के बजाय अपनी कमियों की ओर अंदर झाँकते हुए सबके साथ जीने की कला को व्यक्तित्व में अंगीकार करना चाहिए। जीवन बहुत छोटा है। उसे दुख, अवसाद, असंतोष के साथ जीने के बजाय उपलब्ध की कद्र करते हुए जीने की कला सीखना चाहिए। याद रखिए, किसी से अत्यधिक उम्मीद भी अंततः निराशा का कारण बन सकती है।

जो चाहते हैं, उनसे प्यार करो, उनका सम्मान करो, उनकी कद्र करो। जो नहीं करते उनसे सहानुभूति रखो। याद रखो, जो आपको पसंद नहीं करते, उन पर समय बर्बाद मत कीजिए। जो चाहते हैं उनकी कद्र कीजिए, उनका सम्मान कीजिए। और कहिए:

कितने हसीन लोग हैं, जो मिलके एक बार

आँखों में जज़्ब हो गए दिल में समा गए। ■

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Jul 7, 2024

जीवन दर्शनः 3 इंडियट्स

  - विजय जोशी - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

प्रथम दृष्टया शीर्षक आपको अटपटा लगेगा, क्योंकि आदमी का आकलन हम अमूमन उसकी आदतों को देखकर करते हैं। पर यह सदा सही नहीं हो सकता। आदत और चरित्र इंसानी जीवन के दोनों अलग अलग आयाम हैं। आदत जहाँ एक ओर ऊपरी हार्डवेयर पक्ष है, वहीं चरित्र उसका अंतर्मन यानी सॉफ्टवेयर पक्ष। दोनों समानुपाती भी हो सकते हैं और  विरोधाभासी भी। मैं स्वयं इस हेयरलाईन यानी बाल बराबर फर्क से अनजान था, जब तक कि एक बेहद सुलझी उलझनभरी पहेली से मेरा साक्षात्कार हुआ, जो इस प्रकार है : 
1. श्रीमान ‘अ’ : इसकी दोस्ती थी खराब राजनैतिक व्यक्तियों से। यह ज्योतिषियों की राय पर आश्रित रहा करता था। पत्नियाँ थीं दो। स्वयं था चेन स्मोकर तथा सुरा सुंदरी प्रेमी।
2. श्रीमान ‘ब’ : इसे दो बार अपनी बुरी आदतों के कारण नौकरी से निकाला गया। बहुत देर तक सोया रहा करता था तथा अफ़ीम प्रेमी होने के साथ ही सुरा सुंदरी के साथ अपनी शाम रंगीन किया करता था।
3. श्रीमान ‘स’ : यह था युद्ध में वीरता पदक से सम्मानित सैनिक, जिसने कभी धूम्रपान तक नहीं किया था। शराब तो छुई तक नहीं। पत्नी को कभी धोखा नहीं दिया तथा खुद एक कलाकार एवं पेंटर था।
   अब बताइए किसे श्रेष्ठ मानेंगे। हम सबका एक ही उत्तर होगा। है न आश्चर्यजनक बात। अब खुद देखिए कि आदत के आधार पर आदमी का आकलन कैसे गलतफहमी पैदा कर सकता है। देखिए कौन थे ये व्यक्ति : 
- प्रथम पुरुष थे अमेरिका के 32 वें राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट।
- दूसरे व्यक्ति थे ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल।
- अंतिम व्यक्ति जर्मनी के शासक एडोल्फ हिटलर।
     याद रखिए जीवन में हर एक आदमी महत्त्वपूर्ण है। उन्हें आँकने या परखने का प्रयास मत कीजिए, बल्कि खुले मन से स्वीकार कीजिए। उबलता पानी एक ओर जहाँ अंडे को कड़ा कर देता है, वहीं आलू को नर्म तथा मुलायम। यह सब इस बात पर निर्भर है कि तनावपूर्ण परिस्थितियों में हम हर अलग अलग आदमी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। जीवन आनंद का मार्ग है। उसका सहजता एवं सुगमतापूर्वक मजा लीजिए। हर आदमी को उसकी विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में अपनाइए बगैर माइक्रोस्कोपिक परीक्षण के। फिर किसी के भी आकलन का अधिकार भला हमें किसने और कब दिया है।
हर बशर मौला नहीं है, हर बशर गांधी नहीं है
वस्त्र हर रेशम नहीं है, सूत हर खादी नहीं है
सत्य की कसौटी पर मत कसो तुम आदमी को
आदमी है आदमी, सोना नहीं, चाँदी नहीं

Jun 1, 2024

जीवन दर्शनः इकीगाई (Ikigai) : सोच की खोज

 - विजय जोशी  
 पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जब आदमी अकेला या कहें खुद के साथ होता है तो तो कई बार उसके मन में अनेक प्रश्न उभरते हैं जैसे मैं क्या हूँ, मैं क्यों हूँ, मेरी  खुशियाँ किस चीज़ में है, क्या मैं अपने वर्तमान से खुश हूँ आदि आदि। ये जिज्ञासाएँ ही जीवन में मस्तूल का कार्य करती हैं, बशर्ते हम शांतिपूर्वक समाधान सोचें और खोजें।
        पिछले दिनों एक ऐसा ही एक अनुभव मिला  मुझे पारसी जीवनशैली आधारित फिल्म मस्का को हाल ही में दुबारा देखने के दौरान, जब एक नए  जीवन दर्शन इकीगाई (Ikigai) से मेरा साक्षात्कार हुआ, जिसमें एक भटकाव भरा जीवन जीते हुए नायक अंत में एक ठहराव पर आ पाता है। इकीगाई में एक सफल, सुचारु, सुखी जीवन जीने का अद्भुत सूत्र समाहित है, जो चार भागों में विभक्त है इस प्रकार: 
1. पसंदगी (Passion) : जीवन में राह या कैरियर चुनते समय यह जानना बेहद जरूरी है कि हमें वास्तव में क्या पसंद है, क्योंकि यही तो हमें सतत उत्साह, उमंग एवं ऊर्जा से सरोबार रखेगा।
2. क्षमता (Competence) : उपरोक्त के साथ यह ज्ञात होना भी आवश्यक है कि हम किसमें अच्छे हैं तथा किस कार्य का संपादन अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिसके अभाव में पसंदगी भी अर्थहीन हो जाती है। दोनों का तादात्म्य एवं संतुलन ही प्रगति की पहली सीढ़ी है। 
3. उपलब्धि (Achievement) : ज़िंदगी में पैसे महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। हमारा सम्पूर्ण जीवन यापन इस पर आधारित है। सो प्रथम दोनों आयाम आर्थिक पैमाना तय करने में मददगार होंगे। इसकी उपेक्षा संभव ही नहीं।
4. सामाजिक (Social) : मानव एक समाजिक प्राणी है। यह अवयव है एक वृहद व्यवस्था का। सो इसका प्रभाव भी सन्निहित है इसमें। प्रथम समस्त आयाम निरर्थक हैं यदि समाज को जरूरत ही न हो आपके अवदान की। सो समाज के खाके में ठीक से बैठ पाने की दशा ही सफलता सुनिश्चित करेगी। इस आधार को नकारा नहीं जा सकता।
उपरोक्त दर्शन की खोज जापान के ओकीनावा द्वीप निवासी अकिहीरो हेसगावा ने करते हुए इसका महत्त्व उद्घाटित किया था जिसका सार है : 
-  जीवन को उपयोगी बनाना
- जो काम कर रहे हैं उसे पसंद करना
- अपने काम में आनंद लेना
- खुद के अस्तित्व को अर्थ प्रदान करना
- आसपास अच्छे वातावरण का सृजन
- और इस प्रकार जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करते हुए खुशी के साथ जीना
उपरोक्त बातें ही जापानियों के जीवन को सार्थक सिद्ध करती हैं। हम हिंदुस्तानी इन पलों में कम से कम आत्म निरीक्षण का प्रयास तो कर ही सकते हैं।
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Apr 1, 2024

जीवन दर्शनः मनवा भीतर क्यों ना झाँके

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

   धरती पर आदमी का पदार्पण ईश्वर प्रदत्त समस्त सुख, सुविधा, संसाधन के साथ होता है एक निश्चित कर्तव्य बोध के साथ, जिसमें सहायक हैं बुद्धि, विद्या, विवेक की थाती। अब संपादन के भी दो अवयव हैं। पहला शरीर जिसे आप हार्डवेयर कह सकते हैं और दूसरा अंतस या आत्मा जिसे आप सॉफ्टवेयर कहा जा सकता है। अंतस कभी झूठ नहीं बोलता और दुविधा के पलों में हमें विवेकयुक्त सही सटीक परामर्श प्रदान करता है। पर बाहरी चकाचौंध से ग्रस्त आदमी क्षुद्र स्वार्थवश उसे अनसुना कर देता है। कहा भी गया है आदमी सबसे तो मिल सकता है, लेकिन अपने भीतर झाँकने से डरता है। यही है समाज में भले बुरे का वर्गीकरण।

     एक बार भगवान विष्णु स्वरचित सृष्टि को परखने जब पृथ्वी पर जाने लगे तो लक्ष्मी ने उन्हें यह कहकर रोकने का प्रयास किया कि  मनुष्य यदि धूर्त न निकलें तो ही लौटना अन्यथा उनके बीच ही रह जाना।

     धरतीवासियों ने जब सुना कि विष्णु स्वयं पधार रहे हैं तो उनके आगमन पूर्व ही अपार भीड़ एकत्रित हो गई और उनके पदार्पण पर धर्म कर्म पालन के प्रश्नों के बजाय खुद की मनोकामना पूर्ति हेतु आग्रह करने लगे।

      पुरुषों की इस लोभ लिप्सा से त्रस्त विष्णु ने बद्रीनाथ पर्वत की ओर प्रस्थान कर दिया लेकिन लोग वहाँ भी पहुँच गए तो वे दुखी होकर समुद्र मध्य द्वारिका में जाकर अदृश्य रूप से स्थापित हो गए; किंतु लज्जावश लक्ष्मीजी के पास नहीं लौटे।

      फिर चिंतित होकर उन्होंने महर्षि नारद से पूछा : ये कैसे लोग हैं, , जो केवल लालच की रट लगाते रहते हैं और कर्तव्य पालन की उपेक्षा। इसलिए कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं चैन से रह सकूँ।

      और फिर नारद ने , जो उत्तर दिया वह अद्भुत था : आप मनुष्य के हृदय में बस जाइए। , जो बहिर्मुखी, स्वार्थी होंगे उनकी दृष्टि भीतर तक न पहुँचेगी और , जो विवेकी तथा आत्मदर्शी होंगे वे आपको तुरंत ढूँढ लेंगे।

     तब से ईश्वर मनुष्य के मन में ही समाए हुए हैं, पर अंदर झाँकने की फुर्सत ही किसे है।

      मित्रों यही है वह मूलमंत्र जिसकी व्याख्या महात्मा गांधी ने की थी कि दुविधा के पलों में यदि हम इधर- उधर की बजाय केवल अपने अंदर ही झाँक सकें तो उत्तर अपने आप मानस पटल पर उभर जाएगा।  पर उसके लिए चाहिए शुद्ध, निर्मल मन और सोच-

बाहर की तू माटी फाँके, 

भीतर मनवा क्यों ना झाँके।  

                                                   ■

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Mar 7, 2024

जीवन दर्शनः महाभारत: मैं से मुक्ति

  - विजय जोशी

( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

पौराणिक प्रसंग किसी भी धर्म ग्रंथ में समाहित हों, उनकी प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध हैं। इनमें एक ओर जहाँ सरल भाषा में अपनी बात आम जन तक पहुँचाने का भाव होता है, वहीं दूसरी ओर मंतव्य भी। इस दौर में कहें , तो शाब्दिक प्रसंग हार्डवेयर तथा संदेश सॉफ्टवेयर। सो एक मित्र से प्राप्त अद्भुत विचार।

  महाभारत ग्रंथ से सभी परिचित हैं। यह मात्र दो परिवार या दो विरोधी संस्कृतियों के टकराव में सत्य की विजय का मंत्र ही नहीं, अपितु अंतस के युद्ध का सफ़रनामा भी है।  आइए इसे पात्रों के माध्यम से समझा जाए : 

1- धृतराष्ट्र: यह है हमारा मस्तिष्क जो सारी सूचनाओं को संगृहीत कर सोच को कार्यरूप में परिवर्तित करता है। निर्भर हम पर करता है कि अपने विवेक से सही निर्णय लेते हैं या स्वार्थनिहित फैसला।

2- संजय: हमारे वे मित्र या शुभचिंतक जो ठकुर सुहाती से ऊपर उठकर न केवल हमें सच्चाई से अवगत कराते हैं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।

3- कौरव: ये हैं अंतस् में उभरने वाली मोह माया रूपी वे भावनाँ जो हमें पथभ्रष्ट करने का पूरा प्रयास करती हैं। तुच्छ स्वार्थ या बाहरी आकर्षण की परत हमारी बुद्धि के कुमार्ग से कदमताल का प्रयोजन बनती हैं।

4- शकुनि: वे अवसरवादी मित्र जो हमें कुमार्ग की ओर ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

5- पांडव: ये हैं हमारी पाँच इंद्रियाँ  नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा यानी दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श, जो हमारी सहायता करती हैं नीर क्षीर उर्फ़ दूध और पानी को अलग कर निर्णय पर पहुँचने में। ईश्वर का अद्भुत उपहार बशर्ते हम इनका सदुपयोग कर सकें।

6- द्रौपदी: हमारी नैसर्गिक प्रतिभा, इच्छा, चाह या जुनून, जो हमारी 5 इंद्रियों वाली क्षमता को एक सूत्र में बाँधकर उद्देश्य प्राप्ति के साथ ही जीवन में आनंद का प्रयोजन भी बनती है। एक बात और कि यह कौरवी माया जाल से लड़ने हेतु हमारे संकल्प का सूत्र भी बनती है।  

7- कृष्ण:  तो फिर कृष्ण क्या हैं। यह है हमारी आंतरिक चेतना जो आजीवन हमारी सारथी बनकर साथ निभाती है। इसकी आवाज सुन कार्य करना हमारा नैतिक दायित्व और सफलता की कुंजी है।

8- कर्ण: परिवार के अग्रज होने के बावजूद राज्याश्रय के लोभ में कुमार्ग पथिक बन काल कवलित हो गए। यही है हमारा अहंकार जो पद, प्रतिष्ठा, पैसे की चमक मिलते ही सिर चढ़कर बोलने लगता है। कुपथ की ओर धकेल देता है। 

 अहंकार हमारे सारे गुण निगल जाता है। ईश्वर से विमुख कर देता है। कहा ही गया है EGO यानी Edging God Out। हृदय में कोई एक ही रह सकता है। अहंकार आते ही ईश्वर बाहर। यदि आपने इसे समाप्त नहीं किया , तो यह आपको समाप्त कर देगा।

 कुल मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में महाभारत के माध्यम से उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का एक अद्भुत संदेश दिया है। यह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध एक जंग है, जो हमारे चेतन और अवचेतन मन दोनों के सार्थक जीवन जीने का प्रयोजन है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम कौन सा मार्ग अंगीकार करें। 

अहंकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश

 ना मानो , तो देख लो रावण, कौरव, कंस

                     ■

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कविताः कितना कुछ कर जाती है औरत

 

 - विजय जोशी

धरती पर ईश्वर की छाया

सुंदरता की कोमल माया

अनगिन सुंदर सपन सुहाने

रच जाती है औरत


सचमुच में कितना कुछ

कर जाती है औरत.

 

सूरज से तपते ऊसर में

ठंडक बनकर के जीवन में

सावन की पहली बरखा सी

छा जाती है औरत

             सचमुच में ...

 

रिसते अंतस के दर्दों पर

जीवन के जलते जख्मों पर

हमदर्दी का कोमल फाया

रख जाती है औरत

           सचमुच में ...

 

जब समय कठिन हो

पल मुश्किल हों

, तो हसकर अभाव भी

सह जाती है औरत

             सचमुच में ...

 

या जब मन उदास हो

कोई न पास हो

ऐसे क्षण में दुखते मन को

सहलाती है औरत

             सचमुच में ...

 

खामोशी की भाषा में

बिना किसी भी आशा में

बिना कहे ही जाने क्या क्या

कह जाती है औरत

           सचमुच में ...