पुस्तकः डिटेक्टिव मिरांडा , लेखक - समरेंद्र नाथ रॉय, मूल्य- 299/ ₹, प्रकाशक : रा. प्रकाशन ओ मुद्रण 93, महात्मा गांधी मार्ग, कोलकाता 700007
Aug 1, 2026
किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा यात्रा पुरातन से नूतन
Feb 1, 2026
कविता : ढाई आखर
- विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल)
उस दिन
दस्तक पर
जब दरवाजा खोला
एक संभ्रांत सुशील
माणिक मोती से जड़ी
सोने के फ्रेम में मढ़ी
एक रुआबदार पर रुखी
ऊपर से सुखी
पर शायद अंदर से दुखी
सेंट से महकती
अंतस में भटकती
एक भव्य महिला को पाया
मैंने अपना सिर खुजलाया
अभिवादन के लिये
जब उठा हाथ
वो मुस्कुराई मेरे साथ
और बोली
अरे तुमने मुझे नहीं पहचाना
भूल गए गुजरा जमाना
मैं तुम्हारी वही सहपाठी मित्र
याद करो मेरा चित्र
जो स्कूल में साथ पढ़ी थी
जीवन की सीढ़ी
कभी हमने साथ चढ़ी थी
मैं अचकचा गया
कहाँ वह पावन तरुणाई
और कहाँ यह वैभव की परछाई
तुम हंसती थीं तो
उस निष्पाप हँसी में
उल्लास के फूल झरते थे
जिसमें हम सब साथी
निर्मल मन से बहते थे
तुम्हारे तेवर जाने माने थे
इसलिए सब तुम्हारे दीवाने थे
पर अब
तुम वैसी कहाँ रहीं
वह सुदर्शनी काया
विशाल व्यक्तित्व में बदल गई
सूती फ्रॉक कीमती साड़ी में ढल गई
टूटी साइकिल मँहगी कार हो गई
और तुम्हें देखकर
जिंदगी खुद हैरान रह गई
तुमने जो सोचा वह सब पाया
तुम्हारी रग रग में बसी है माया
तुम बोलीं
मत भूलो पुराना कुछ भी
समय बीता पर अंतर घट रिता
मैं अब भी रखती हूँ तुम्हारी चाहत
केवल तुमसे मिलेगी मुझको राहत
मैंने कहा-
पुराना सब अब इतिहास है
टूटे तार पुनः जोड़ना
जीवन का उपहास है
ईश्वर ने हमें विवेक दिया
बदले में कुछ नहीं लिया
सिर्फ इसलिए कि
हम सत्य का मार्ग चुन सकें
उसी पर चलकर
जीवन के सपने बुन सकें
पर तुमने सुख सुविधा को चुना
आत्मा की आवाज को नहीं सुना
कहा भी गया है
कठिन होना जितना आसान है
सरल होना उतना ही कठिन
इसीलिए हम ज़मीर को मारकर भी
आसान मार्ग चुनते हैं
और लोग हम से सुख कम
दुख अधिक पाते हैं
इसलिए
अब तुन्हें अफ़सोस क्यों है
वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर
सब कुछ ज्यों का त्यों है
तुमने प्यार के मायने नहीं जाने
अपने कभी नहीं पहचाने
पहले ही आधे अक्षर में अटक
अधूरी रह गईं
ढाई आखर का प्यार तो
एक फूल है
जिसकी पँखुरी झर भी जाए
तो खुश्बू बनी रहती है
मन में आनंद की नदी सदा बहती है
तुम इसे व्याख्यान मत समझना
मेरी बात को रात में गुनना
आज मैं अपने परिवेश, परिवार
समाज और घर-बार
सबसे बेहद सुखी और संतुष्ट हूँ
उम्र के इस वानप्रस्थी दौर में
मोह छोड़ने की कोशिश में व्यस्त हूँ
मुझे किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं
जीवन मेरे लिए आनंद है बवाल नहीं
इसलिए मुझे
अपने में व्यस्त रहने दो
मन ने जो जो सोचा है
वह सब करने दो
और अंत में बस इतना कि
रहना चाहता हूँ आन से
और जाना चाहता हूँ
पूरे इत्मीनान से
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com
Nov 2, 2025
कविताः अपने आप से
याद है
उस दिन तुमने कहा था
कि मन नहीं भरा आपका
दुनिया से, जीवन से
इस सारी उहापोह और उलझन से
जो अब भी, करते हैं कविता
जीवन में भरते हैं, रंगों की सरिता
और यह भी कहा था
जिसे आप प्यार कहते हैं
महज एक स्वार्थ है
जहाँ हम
केवल अपने आप से प्यार करते हैं
और दूसरे
हमारी इच्छाओं का घट भरते हैं
तुम्हारी बात ने
मुझे अंदर तक हिलाया
मैं अंदर ही अंदर कुलबुलाया
फिर खुद ही खुद से बोला
अपना अंतरपट खुद ही खोला
हाँ तुम ठीक कहती हो
आम भाषा में
जिसे सब प्यार कहते हैं
सिर्फ एक स्वार्थ है, जहाँ हम
केवल अपने आप से प्यार करते हैं
और दूसरे
न चाहते हुए भी
हमारी मंशाओं को ढोते हैं
पर मेरे लिए तो
प्यार है
एक रंगों भरा विस्तृत आकाश
जिसमें समाया है निश्चल विश्वास
मुझे याद आ रहा है
बचपन में कभी, मैंने कहीं पढ़ा था
कि किसी जन्म में, हम जाने- अनजाने
जिन्हें तकलीफ पहुँचा देते हैं
वे ही अगले जन्म में
हमारे बनकर, फिर मिलने आते हैं
ताकि हम रिश्तों की अहमियत को
फिर से समझ सकें
और इस तरह
अपने पूर्व जन्म के कर्मों को
न सिर्फ धो सकें
बल्कि आगे के सफर में
स्नेह की फसलें भी बो सकें
कहा भी तो गया है कि
हम पूर्व जन्म के ऋण
इस जन्म में चुकाते हैं
और जन्म जन्मांतर के रिश्तों को निभाने
फिर से आते हैं
जिस दिन से
यह भेद मेरी समझ में आ गया
मेरा पूरा सोच ही बदल गया
और आगे का जीवन
फिर से सँवर गया
शायद वही दिन था
हाँ वही दिन था कि
मेरे लिए प्यार के मायने बदल गए
संशय के बादल नेपथ्य में फिसल गए
अब तो मैं, सभी को प्यार करता हूँ
हर अच्छाई पर, पूरे मन से मरता हूँ
अपने स्वार्थी मन को भी
अब नहीं पहचानता
कैसा होता है मतलबी जहाँ
यह भी नहीं जानता
रिश्तों में अब है मेरा गहरा यकीन
और मेरे इरादों के नीचे है ठोस जमीन
सच कहूँ तो
इतना जीवन जीने के बाद
बहुत कुछ खोने और पाने के उपरांत
मैं यह भी जान गया हूँ
समग्र सत्य को पहचान गया हूँ
कि उम्र के इस दौर में मुझे
व्यक्तिगत नहीं
समष्टिगत होकर जीना होगा
खुद की न सोचकर
दूसरों के दुखों को
शिव- सा पीना होगा
तभी तो कुछ होगा सार्थक
वरना यह तथाकथित
पद- प्रतिष्ठा, धन- दौलत, मान- सम्मान
ओहदों का गुमान
सब कुछ है निरर्थक
यही तो है
हाँ केवल यही तो है
जन्म- जन्मांतर से चला आ रहा
हम सबका शाश्वत धर्म
जिसे निभाना ही होगा
और शेष जीवन
दूसरों के लिए
पूरी शिद्दत की साथ
बिताना ही होगा
आमीन !
Aug 1, 2025
जीवन दर्शनः डॉ. अब्दुल कलाम : मानवता की मिसाल
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Jul 1, 2025
जीवन दर्शनः ज़ोहनेरिज़्म : एक कुख्यात अवधारणा
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Jun 1, 2025
जीवन दर्शनःटॉम स्मिथ संस्कार से सफलता
May 2, 2025
जीवन दर्शनः उसैन बोल्ट: परहित सरिस धरम नहीं भाई
पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Apr 1, 2025
जीवन दर्शनः व्यर्थ को करें विदा
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Mar 1, 2025
जीवन दर्शनः भूलने का विज्ञान- छिपा हुआ वरदान
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Feb 1, 2025
जीवन दर्शनःविचार से विजय
1. आपके विचार केवल आपके विचार हैं और आपके पास पूरी शक्ति और साहस है उन पर न केवल नियंत्रण की बल्कि सोच को स्वयं अनुसार ढालने की।
Jan 1, 2025
जीवन दर्शनः बनिये उत्साह का कारण
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Dec 1, 2024
जीवन दर्शनः रोवन एटकिंसन उर्फ़ मिस्टर बीन
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
Nov 1, 2024
आदरांजलिः रतन टाटा - संवेदनशीलता का सफ़रनामा
- विजय जोशी , पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
उठ गए दुनिया से लेकिन एक दुनिया हो गए
बुलबुले पानी के थे फूटे तो दरिया हो गए
सिद्धांतवादी एवं परोपकारी पारसी समुदाय के लिए मेरे मन में गहरी श्रद्धा है। आज से लगभग पन्द्रह दशक पूर्व जब ईरान से चलकर यह कौम भारत आई, तो नाव गुजरात के तट पर लगी और जब शरण हेतु संदेश भेजा, तो राजा ने इन्हें दूध से पूरा भरा गिलास भिजवा दिया, यानी कोई गुंजाइश नहीं। तब एक बुज़ुर्ग ने उसे चीनी मिलाकर लौटाया कि बगैर अतिरिक्त जगह के हम दूध में शकर की मिठास सदृश मिल-जुलकर रहेंगे।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस दौर में काठियावाड़ नरेश को दिए गए 3 वचनों पर वे आज भी कायम हैं :
पहला- धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे। सो आज तक हर पारसी जन्मजात पारसी ही है परिवर्तित नहीं।
दूसरा- यहाँ की भाषा अंगीकार करेंगे। सो आज तक हर पारसी की मातृभाषा भी गुजराती ही है।
तीसरा- देश के योगदान के प्रति समर्पण। सो देख लीजिए जे.आर.डी. टाटा से लेकर रतन टाटा तक इस समुदाय का योगदान। हिन्दू- मुसलमान जब मंदिर- मस्जिद बना रहे थे, टाटा परिवार ने प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान, कैंसर चिकित्सा जैसे मानवता समर्पित प्रोजेक्ट को धरती पर उतारा।
उद्देश्य स्टेटमेंट :
मानवता को समर्पित मूल्य इनकी आत्मा में रचे- बसे हैं, जन्मजात। इन्होंने अपनी कम्पनियों की इमारतों को व्यावसायिकता के बजाय मानवता आधारित मूल्यों की ठोस नींव पर खड़ा किया। टाटा ने अपने उद्देश्यों को दृष्टि में रख इस तरह उकेरते हुए स्थापित किया है
टी. (T ) : विश्वास (Trust)
ए. (A) : मानसिकता (Attitude)
टी. (T ) : प्रतिभा (Talent)
ए. (A) : क्षमता (Aptitude)
जे. आर. डी. टाटा ने जिन मूल्यों की आधारशिला रखी, रतन टाटा ने उसे उस इमारत का आकार दिया, जिसने मानवता को सुख, संतोष की छाया प्रदान की। देश एवं मानवीयता के प्रति योगदान के रतन टाटा के अनेकानेक उदाहरण हैं। सबका उल्लेख असंभव है, सो केवल कुछ के दिग्दर्शन का विनम्र प्रयास -
1. होटल ताज :
26/11 के आतंकी आक्रमण का मुख्य केंद्र था होटल ताज, जिसमें अनेक विदेशी मेहमान विद्यमान थे। तब टाटा कर्मचारियों ने जान जोखिम में डालकर, जब तक आखिरी अतिथि को सुरक्षित बाहर नहीं निकाल लिया, तब तक एक ने भी खुद की सुरक्षा के लिए एक बार भी नहीं सोचा। ऐसे कठिनतम समय में ऐसी अनोखी अद्भुत कर्तव्यपरायणता की कोई दूसरी मिसाल नहीं, सो इसे हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में केस स्टडी के रूप में संगृहीत कर लिया। और जब इस विषय पर टाटा प्रबंधन से बात की गई तो पता चला :
-ताज समूह कर्मचारी चयन हेतु उन छोटे- छोटे शहरों एवं कस्बों पर ध्यान केंद्रित करता है, जहाँ पारंपरिक संस्कृति आज भी सुरक्षित है।
- चयन में टॉपर्स के बजाय उन छात्रों को वरीयता दी जाती है, जो अपने माता, पिता, गुरुओं का सम्मान करते हैं।
- चयन उपरांत हर एक को यह पाठ कंठस्थ करवाया जाता है कि वे टाटा कर्मचारी मात्र न होकर मैनेजमेंट के सामने मेहमानों के राजदूत हैं।
2. मेक इन इंडिया :
रतन टाटा ने अपने जीवन में हर इंसान को जाति, भाषा, धर्म के परे जाकर मात्र इंसान समझा और सपने में भी कभी अपमानित नहीं किया।
1991 में अध्यक्ष बनते ही उन्होंने अपने सपने टाटा इंडिका कार को साकार किया, किंतु अपेक्षित बिक्री नहीं रही। 1999 में फोर्ड कंपनी के अध्यक्ष हेनरी फोर्ड ने कंपनी खरीदी में रुचि जाहिर करते हुए उन्हें डेट्राइट आमंत्रित करते हुए बैठक में अपमानित किया, तो रतन टाटा मीटिंग अधूरी छोड़कर तुरंत मुंबई रवाना हो गए, इस प्रण के साथ कि वे खुद की कार को ब्रांड स्थापित करेंगे।
उनका प्रण परवान चढ़ा तथा स्थापित हो गया। इस बीच फोर्ड कंपनी दिवालिया हो गई तथा टाटा ने लैंड रोवर एवं जैगुआर खरीद लेने की पेशकश की। अपने प्रयोजन को अमली जामा पहनाने हेतु हेनरी फोर्ड भारत आए, तो सबको लगा अपने अपमान का बदला लेने हेतु यही उचित अवसर है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। रतन टाटा ने उन्हें पूरा सम्मान देते हुए डील संपन्न की।
यही जज़्बा और लगन तो चाहिए मेक- इन- इंडिया मिशन को सफलता के शिखर तक ले जाने के लिए।
3. संवेदनशीलता :
साथियों के प्रति स्नेह, सदाशय, समर्पण के तो अनेक मर्मस्पर्शी प्रसंग हैं। टाटा मोटर के प्रमुख सुमंत मूलगाँवकर थे। प्रबंधन के उच्च अधिकारियों का लंच 5 सितारा होटल में हुआ करता था, जिसमें मूलगाँवकर सदा अनुपस्थित पाए जाते थे। एक दिन जब उनकी खोज की गई तो पता चला कि वे तो उन पलों में ढाबों में पहुँचकर वाहन चालकों से टाटा ट्रक की विशेषताओं एवं कमियों पर विमर्श किया करते थे तथा सुधार हेतु उनकी राय लिया करते थे। परिणाम स्पष्ट था: इन्हीं सुझावों के आधार पर जब सुधार हुआ, तो टाटा वाहन गाड़ी ड्राइवरों की पहली पसंद बन उभरे।
अब वह बात आती है, जो सबसे मार्मिक, हृदयस्पर्शी एवं उपकार के प्रतिदान की है, जो विश्व स्तर पर संवेदनशीलता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है और वह यह कि टाटा समूह ने तुरंत ही सुमंत मूलगांवकर (Sumant Moolagaonkar) के नाम के दो प्रथम अक्षर पर अपने ब्रांड का नाम किया सूमो (Sumo)
4. सेना के प्रति सम्मान :
यह प्रसंग भारतीय सेना के एक उच्च अधिकारी ने साझा किया, जो गणतंत्र दिवस परेड हेतु टाटा समूह के दिल्ली स्थित होटल में ठहरे थे। शाम को उन्होंने अपनी ड्रेस की इस्तरी हेतु जब इच्छा जाहिर की, तो तुरत- फुरत एक व्यक्ति ने उपस्थित होकर पहले तो उन्हें सेल्यूट किया, फिर पैर छुए तथा ड्रेस लेते हुए सेल्फी के लिये गुज़ारिश की। रात 9 बजे उन्हें रिस्पेशन मेज से रात्रि- भोज हेतु आमंत्रित किया गया और जब वे वहाँ पहुँचे, तो विस्मित होकर रह गए। सारे स्टाफ ने करतल ध्वनि के साथ एक गुलदस्ते के साथ उनका स्वागत किया।
अगले दिन तो अल्लसुबह उन्हें राष्ट्रपति भवन ले जाने के लिए बी.एम.डब्ल्यू. कार खड़ी थी। अंतिम दिवस भुगतान हेतु रिसेप्शन पर पहुँचे, तो पता चला कि वे होटल के विशिष्ट अतिथि हैं, सो कोई भुगतान नहीं। पूछने पर बताया गया: आप हमारे देश की रक्षा करते हैं, सो हमारे बेहद खास मेहमान हैं।
फील्ड में वापिस लौटने पर उन्हें ताज में ठहरने हेतु धन्यवाद सहित एक मेल मिला, जिसमें लिखा था कि ताज समूह द्वारा देश सेवा में रत सैन्य कर्मियों हेतु उनके होटल में ठहरने पर व्यावसायिक नहीं; अपितु सामर्थ्य के अनुसार राशि ही ली जाती है। है कोई अन्य ऐसा उदाहरण!
5. टाइटन आई प्लस :
भारी वाहनों के मुख्य निर्माता होने के नाते टाटा ने यह पाया कि माल मंज़िल तक शीघ्रतापूर्वक पहुँचाने तथा काम की धुन में ड्राइवर समूह अपनी नेत्र- ज्योति की उपेक्षा करते हैं। सो टाटा समूह ने आगे बढ़कर उनके यात्रा मार्ग पर निःशुल्क नेत्र परीक्षण का तरीका ईजाद किया। ढाबों पर खाद्य सामग्री की सूची अलग - अलग प्रकार के अक्षर अनुपात द्वारा चश्मों की जरूरत एवं प्रदायगी हेतु। चश्मा निःशुल्क नेत्र ज्योति की रक्षा तथा सुरक्षा हेतु। यही है गांधी के शब्दों में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के हित में उठाया गया कदम।
6. विमानन उद्योग :
हम सबको मालूम है कि भारतीय उड़ान सेवा का आगाज़ जे.आर.डी. टाटा के सौजन्य से हुआ था। वे एक बेहद कुशल पायलट एवं भारत में वायु सेवा के जनक थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर ‘एयर इंडिया’ की स्थापना की गई, जो लचर सरकारी व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।
अंततः रतन टाटा को ही आगे आना पड़ा, जिन्होंने इसे घाटे सहित खरीदा। अब यह धीरे - धीरे फिर से उभर रही है। यहाँ विशेष बात यह है कोई अन्य खासतौर पर पारिवारिक विरासत समर्पित राजनीतिज्ञ परिवार होता, तो इस एयर लाइन को परिवार के सदस्य का नाम देता, लेकिन टाटा ने ऐसा न करते हुए भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘एयर इंडिया’ नाम को पूरा सम्मान देते हुए बरकरार रखा है। कितना उदार दिल!
7. कोरोना काल :
कोरोना मानवीय इतिहास की भीषणतम त्रासदी के साथ उपस्थित हुआ। साक्षात् यमराज मानव समूह के समक्ष ले जाने हेतु उपस्थित थे। सब घरों में दुबके। सड़कों पर सन्नाटा। कोई किसी का नहीं, सिर्फ डॉक्टर समूह के, जो निरंतर पूरे प्राणपण से जुटे थे सबको बचाने के लिए। काम, घर, विश्राम सब केवल अस्पताल। इस कठिनतम परिस्थिति में कैसे जिएँ!
जानकर आश्चर्य होगा कि उन पलों में न केवल डॉक्टर समुदाय बल्कि साथी छात्र, पैरा मेडिकल स्टाफ के लिए भी मुंबई में टाटा प्रबंधन द्वारा होटल ताज से निःशुल्क गरमागरम भोजन- सामग्री की निरंतरता सुनिश्चित की गई।
8. दीन के दर्द का निवारण :
टाटा स्टील के चेयरमैन रतन टाटा ने जमशेदपुर में कंपनी के कर्मचारियों की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में एक कर्मचारी ने डरते - डरते एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण मसला उठाया। उसने बताया कि कर्मचारियों के शौचालयों की स्थिति बहुत खराब और अस्वच्छ है, जबकि अधिकारियों के शौचालय हमेशा साफ - सुथरे रहते हैं।
चेयरमैन महोदय ने एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा : इस स्थिति को सुधारने में कितना समय लगेगा?
अधिकारी ने जवाब दिया : इसके लिए एक महीना काफी होगा।
इस पर चेयरमैन ने कहा : मैं इसे एक दिन में कर देता हूँ। बढ़ई को बुलाओ।
अगले दिन बढ़ई आया, तो चेयरमैन ने उसे दोनों शौचालयों के ऊपर लगे बोर्ड हटाने और उनकी जगह बदलने को कहा। अधिकारियों के शौचालय पर ‘कर्मचारियों के लिए’ और कर्मचारियों के शौचालय पर ‘अधिकारियों के लिए’ का बोर्ड लगा दिया गया। साथ ही उन्होंने हर पंद्रह दिन में इन बोर्डों को बदलने का निर्देश दिया।
और क्या हुआ? अगले तीन दिनों में दोनों शौचालय बेहद साफ हो गए!
इससे हमें ये सीख मिलती है कि ‘नेतृत्व’ हमेशा पद से ऊपर होता है। समस्याओं को पहचानने के लिए तार्किक सोच और उन्हें हल करने के लिए रचनात्मक सोच की जरूरत होती है। यह प्रसंग बताता है कि कैसे रतन टाटा ने एक साधारण समस्या को एक रचनात्मक तरीके से हल किया। उन्होंने सिर्फ बोर्ड बदलकर लोगों की मानसिकता बदली और शौचालयों की स्वच्छता में सुधार किया। नेतृत्व का मतलब सिर्फ आदेश देना नहीं होता, बल्कि समस्याओं के मूल कारण को समझना और उन्हें रचनात्मक तरीके से हल करना होता है।
रतन टाटा का पशुओं से प्रेम भी अद्भुत था। इसीलिए वे डॉग लवर भी कहलाए। कुत्तों से तो उनका प्रेम इतना अधिक था कि होटल ताज के दरवाजे कुत्तों के लिए खोल दिये गए थे।
बात वर्ष 2018 की है। उनके परोपकारी कार्यों की सुगंध पूरे संसार में पहुँच चुकी थी। तब ब्रिटेन के शाही परिवार की ओर से प्रिंस चार्ल्स ने उन्हें “लाइफटाइम अचीवमेंट” अवार्ड से सम्मानित करने हेतु ब्रिटेन आमंत्रित किया। वे राजी भी हो गए। किंतु विदाई के पलों में उनके दो पालतू कुत्तों टैंगो एवं टीटो में से एक बीमार पड़ गया तथा उनके साथ रहने के लिए टाटा ने समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया।
सब यह जानकर हैरान रह गए कि टाटा ने शाही सम्मान के बजाय एक कुत्ते को प्राथमिकता दी। अनेकों के आग्रह के बावजूद उन्होंने अपना मन नहीं बदला।
और जब प्रिंस चार्ल्स को कारण पता चला, तो उन्होंने टाटा की सराहना करते हुए कहा : वे एक अद्भुत व्यक्ति हैं। उनके आदर्शों के कारण ही आज टाटा समूह सफल और स्थापित है।
उन्हींके मार्ग निर्देशन में जून, 2024 को मुंबई महालक्ष्मी में टाटा ट्रस्ट के लघु पशु चिकित्सा अस्पताल का उद्घाटन हुआ।
है न आज की आपाधापी और लाभ- हानि युक्त इस दौर में दिल को गहराई तक छू जानेवाली विचित्र किंतु सत्य बात।
10. रतन टाटा के अंतिम संदेश :
1. पहला यह कि दयालुता का कार्य उनके लिए करें जो आपके लिये कुछ भी नहीं कर सकते, लौटाना तो बहुत दूर की बात।
2. कोई भी सेवा कार्य प्रतिदान के आशा के बगैर करें।
3. अपने शब्द यानी वचन का सम्मान करें। अपनी बात से पलटें नहीं, चाहे कितनी भी कठिनाई हो। दिया गया वचन निभाना ही है।
निष्कर्ष : ये केवल कुछ ही उदाहरण हैं, रतन टाटा के देश के प्रति लगन, निष्ठा और समर्पण के। भावी इतिहास एक दिन अवश्य कहेगा कि इस धरती पर कभी रतन टाटा जैसे व्यक्तित्व भी पधारे थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन देश एवं मानवता को समर्पित कर दिया था। वस्तुत: वे व्यक्ति नहीं, विचार थे और विचार कभी मरा नहीं करते। चिता ने जो जलाया वह था उनका पार्थिव शरीर, पर जो अमर रहेगा, वह है उनका व्यक्तित्व एवं विचार।
मौत वो हो जिस पर जमाना करे अफसोस,
वरना तो इस दुनिया में आते हैं सभी जाने के लिए।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com
Oct 1, 2024
जीवन दर्शनः श्री कृष्ण से सीखें : सफलता के सूत्र
Sep 1, 2024
जीवन दर्शनः सम्मान अपनों का: सुखद सपनों का
( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो
फिर देखो किस कदर ये जिंदगी आसान हो जाये
जीवन उम्मीदों का अपार संसार है और यही हमारी यात्रा की नौका भी है और पतवार भी। लेकिन उम्मीदों से बहुत ज्यादा की आस पाल लेना दुख का कारण भी बन सकता है, यदि हम उस स्वावलंबन की लक्ष्मण रेखा लांघकर परावलंबन की सरहद में पहुँच जाएँ। जीवन में खुद की उम्मीद पूरा करने की आकांक्षा के दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने पाने का प्रयास करने से अधिक सुखकारी है।
इस संदर्भ में एक सुंदर वृत्तांत से मेरा सामना हुआ। पत्नी ने दिनभर की थकान के बाद रात के भोजन के समय थाली में दाल सब्जी के साथ किसी हद जली हुई रोटी पति को परोसी। पुत्र बड़े मनोयोग से सारा दृश्य निहार रहा था। उसके लिए आश्चर्य अभी प्रतीक्षा सूची में तब तक था, जब उसने देखा कि माँ सॉरी कह पाती, उसके पूर्व ही उसके पिता ने जली रोटी के साथ भोजन बिल्कुल आनंदपूर्वक ग्रहण करना आरंभ कर दिया।
पुत्र से रहा नहीं गया। उसने भोजन उपरांत पिता से देर रात्रि अकेले में धीमे स्वर में पूछा कि क्या उन्हें सचमुच में जली रोटी पसंद आई थी। और तब जिस सत्य से उसका साक्षात्कार हुआ उससे उसकी आँखें भर आईं ।
पिता ने कहा - तुम्हारी माँ सारे दिन काम करते हुए थक जाती है। गृहस्थी की गाड़ी खींचने में। सारा दिन काम करते- करते शाम तक थककर निढाल हो जाती है। उसके त्याग से परिपूर्ण प्रेम के सामने मुझे रोटी के जले होने का एहसास ही नहीं हुआ। ऐसे अवसर पर यदि मैं कुछ भी कटु शब्द कह भी देता, तो शायद अपनी नजर में खुद गिर जाता।
पिता ने अपनी बात आगे जारी रखी - सारा संसार और हमारा अपना जीवन अनेक कमियों से परिपूर्ण है। ऐसे में दूसरों में कमियाँ ढूँढकर हम अपनी कमियों पर परदा नहीं डाल सकते। सो श्रेष्ठ यही होगा कि हम सब जैसे भी हैं, एक साथ संतुष्टि का भाव अंतस् में समाकर प्रसन्नतापूर्वक जीने की कला सीखें।
बात बहुत सरल, सामायिक और सार्थक है। हमें दूसरों से आवश्यकता से अधिक उम्मीद रखने के बजाय अपनी कमियों की ओर अंदर झाँकते हुए सबके साथ जीने की कला को व्यक्तित्व में अंगीकार करना चाहिए। जीवन बहुत छोटा है। उसे दुख, अवसाद, असंतोष के साथ जीने के बजाय उपलब्ध की कद्र करते हुए जीने की कला सीखना चाहिए। याद रखिए, किसी से अत्यधिक उम्मीद भी अंततः निराशा का कारण बन सकती है।
जो चाहते हैं, उनसे प्यार करो, उनका सम्मान करो, उनकी कद्र करो। जो नहीं करते उनसे सहानुभूति रखो। याद रखो, जो आपको पसंद नहीं करते, उन पर समय बर्बाद मत कीजिए। जो चाहते हैं उनकी कद्र कीजिए, उनका सम्मान कीजिए। और कहिए:
कितने हसीन लोग हैं, जो मिलके एक बार
आँखों में जज़्ब हो गए दिल में समा गए। ■
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com
Jul 7, 2024
जीवन दर्शनः 3 इंडियट्स
Jun 1, 2024
जीवन दर्शनः इकीगाई (Ikigai) : सोच की खोज
Apr 1, 2024
जीवन दर्शनः मनवा भीतर क्यों ना झाँके
- विजय जोशी
- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
धरती पर आदमी का पदार्पण ईश्वर प्रदत्त समस्त सुख, सुविधा, संसाधन के साथ होता है एक निश्चित कर्तव्य बोध के साथ, जिसमें सहायक हैं बुद्धि, विद्या, विवेक की थाती। अब संपादन के भी दो अवयव हैं। पहला शरीर जिसे आप हार्डवेयर कह सकते हैं और दूसरा अंतस या आत्मा जिसे आप सॉफ्टवेयर कहा जा सकता है। अंतस कभी झूठ नहीं बोलता और दुविधा के पलों में हमें विवेकयुक्त सही सटीक परामर्श प्रदान करता है। पर बाहरी चकाचौंध से ग्रस्त आदमी क्षुद्र स्वार्थवश उसे अनसुना कर देता है। कहा भी गया है आदमी सबसे तो मिल सकता है, लेकिन अपने भीतर झाँकने से डरता है। यही है समाज में भले बुरे का वर्गीकरण।
एक बार भगवान विष्णु स्वरचित सृष्टि को परखने जब पृथ्वी पर जाने लगे तो लक्ष्मी ने उन्हें यह कहकर रोकने का प्रयास किया कि मनुष्य यदि धूर्त न निकलें तो ही लौटना अन्यथा उनके बीच ही रह जाना।
धरतीवासियों ने जब सुना कि विष्णु स्वयं पधार रहे हैं तो उनके आगमन पूर्व ही अपार भीड़ एकत्रित हो गई और उनके पदार्पण पर धर्म कर्म पालन के प्रश्नों के बजाय खुद की मनोकामना पूर्ति हेतु आग्रह करने लगे।
पुरुषों की इस लोभ लिप्सा से त्रस्त विष्णु ने बद्रीनाथ पर्वत की ओर प्रस्थान कर दिया लेकिन लोग वहाँ भी पहुँच गए तो वे दुखी होकर समुद्र मध्य द्वारिका में जाकर अदृश्य रूप से स्थापित हो गए; किंतु लज्जावश लक्ष्मीजी के पास नहीं लौटे।
फिर चिंतित होकर उन्होंने महर्षि नारद से पूछा : ये कैसे लोग हैं, , जो केवल लालच की रट लगाते रहते हैं और कर्तव्य पालन की उपेक्षा। इसलिए कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं चैन से रह सकूँ।
और फिर नारद ने , जो उत्तर दिया वह अद्भुत था : आप मनुष्य के हृदय में बस जाइए। , जो बहिर्मुखी, स्वार्थी होंगे उनकी दृष्टि भीतर तक न पहुँचेगी और , जो विवेकी तथा आत्मदर्शी होंगे वे आपको तुरंत ढूँढ लेंगे।
तब से ईश्वर मनुष्य के मन में ही समाए हुए हैं, पर अंदर झाँकने की फुर्सत ही किसे है।
मित्रों यही है वह मूलमंत्र जिसकी व्याख्या महात्मा गांधी ने की थी कि दुविधा के पलों में यदि हम इधर- उधर की बजाय केवल अपने अंदर ही झाँक सकें तो उत्तर अपने आप मानस पटल पर उभर जाएगा। पर उसके लिए चाहिए शुद्ध, निर्मल मन और सोच-
बाहर की तू माटी फाँके,
भीतर मनवा क्यों ना झाँके।
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Mar 7, 2024
जीवन दर्शनः महाभारत: मैं से मुक्ति
- विजय जोशी
( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
पौराणिक प्रसंग किसी भी धर्म ग्रंथ में समाहित हों, उनकी प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध हैं। इनमें एक ओर जहाँ सरल भाषा में अपनी बात आम जन तक पहुँचाने का भाव होता है, वहीं दूसरी ओर मंतव्य भी। इस दौर में कहें , तो शाब्दिक प्रसंग हार्डवेयर तथा संदेश सॉफ्टवेयर। सो एक मित्र से प्राप्त अद्भुत विचार।
महाभारत ग्रंथ से सभी परिचित हैं। यह मात्र दो परिवार या दो विरोधी संस्कृतियों के टकराव में सत्य की विजय का मंत्र ही नहीं, अपितु अंतस के युद्ध का सफ़रनामा भी है। आइए इसे पात्रों के माध्यम से समझा जाए :
1- धृतराष्ट्र: यह है हमारा मस्तिष्क जो सारी सूचनाओं को संगृहीत कर सोच को कार्यरूप में परिवर्तित करता है। निर्भर हम पर करता है कि अपने विवेक से सही निर्णय लेते हैं या स्वार्थनिहित फैसला।
2- संजय: हमारे वे मित्र या शुभचिंतक जो ठकुर सुहाती से ऊपर उठकर न केवल हमें सच्चाई से अवगत कराते हैं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।
3- कौरव: ये हैं अंतस् में उभरने वाली मोह माया रूपी वे भावनाँ जो हमें पथभ्रष्ट करने का पूरा प्रयास करती हैं। तुच्छ स्वार्थ या बाहरी आकर्षण की परत हमारी बुद्धि के कुमार्ग से कदमताल का प्रयोजन बनती हैं।
4- शकुनि: वे अवसरवादी मित्र जो हमें कुमार्ग की ओर ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।
5- पांडव: ये हैं हमारी पाँच इंद्रियाँ नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा यानी दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श, जो हमारी सहायता करती हैं नीर क्षीर उर्फ़ दूध और पानी को अलग कर निर्णय पर पहुँचने में। ईश्वर का अद्भुत उपहार बशर्ते हम इनका सदुपयोग कर सकें।
6- द्रौपदी: हमारी नैसर्गिक प्रतिभा, इच्छा, चाह या जुनून, जो हमारी 5 इंद्रियों वाली क्षमता को एक सूत्र में बाँधकर उद्देश्य प्राप्ति के साथ ही जीवन में आनंद का प्रयोजन भी बनती है। एक बात और कि यह कौरवी माया जाल से लड़ने हेतु हमारे संकल्प का सूत्र भी बनती है।
7- कृष्ण: तो फिर कृष्ण क्या हैं। यह है हमारी आंतरिक चेतना जो आजीवन हमारी सारथी बनकर साथ निभाती है। इसकी आवाज सुन कार्य करना हमारा नैतिक दायित्व और सफलता की कुंजी है।
8- कर्ण: परिवार के अग्रज होने के बावजूद राज्याश्रय के लोभ में कुमार्ग पथिक बन काल कवलित हो गए। यही है हमारा अहंकार जो पद, प्रतिष्ठा, पैसे की चमक मिलते ही सिर चढ़कर बोलने लगता है। कुपथ की ओर धकेल देता है।
अहंकार हमारे सारे गुण निगल जाता है। ईश्वर से विमुख कर देता है। कहा ही गया है EGO यानी Edging God Out। हृदय में कोई एक ही रह सकता है। अहंकार आते ही ईश्वर बाहर। यदि आपने इसे समाप्त नहीं किया , तो यह आपको समाप्त कर देगा।
कुल मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में महाभारत के माध्यम से उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का एक अद्भुत संदेश दिया है। यह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध एक जंग है, जो हमारे चेतन और अवचेतन मन दोनों के सार्थक जीवन जीने का प्रयोजन है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम कौन सा मार्ग अंगीकार करें।
अहंकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश
ना मानो , तो देख लो रावण, कौरव, कंस
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कविताः कितना कुछ कर जाती है औरत
धरती पर ईश्वर की छाया
सुंदरता की कोमल माया
अनगिन सुंदर सपन सुहाने
रच जाती है औरत
सचमुच में कितना कुछ
कर जाती है औरत.
सूरज से तपते ऊसर में
ठंडक बनकर के जीवन में
सावन की पहली बरखा सी
छा जाती है औरत
सचमुच में ...
रिसते अंतस के दर्दों पर
जीवन के जलते जख्मों पर
हमदर्दी का कोमल फाया
रख जाती है औरत
सचमुच में ...
जब समय कठिन हो
पल मुश्किल हों
, तो हसकर अभाव भी
सह जाती है औरत
सचमुच में ...
या जब मन उदास हो
कोई न पास हो
ऐसे क्षण में दुखते मन को
सहलाती है औरत
सचमुच में ...
खामोशी की भाषा में
बिना किसी भी आशा में
बिना कहे ही जाने क्या क्या
कह जाती है औरत
सचमुच में ...





















