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Aug 1, 2024

शोधः प्लास्टिकोसिस की जद में पक्षियों का जीवन

  -  अली खान

हालिया अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि प्लास्टिक के कारण समुद्री पक्षियों का पाचन- तंत्र खराब हो रहा है। बता दें कि यह पहली बार प्लास्टिक से होने वाली बीमारी का पता चला है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम प्लास्टिकोसिस रखा है। फिलहाल यह बीमारी समुद्री पक्षियों को हो रही है; किन आशंका है कि भविष्य में यह कई प्रजातियों में फैल सकती है।

प्लास्टिकोसिस उन पक्षियों को हो रहा है जो समुद्र में अपना शिकार ढूँढते हैं। शिकार के साथ ही उनके शरीर में छोटे और बड़े आकार के प्लास्टिक चले जाते हैं जिनसे उनके शरीर को नुकसान होने लगता है। धीरे-धीरे वे बीमार होकर मर जाते हैं। वैज्ञानिकों ने प्लास्टिकोसिस की वजह से शरीर पर पड़ने वाले असर को भी रिकॉर्ड किया है। 

इस शोध की रिपोर्ट हैज़ार्डस मटेरियल्स जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोध के मुताबिक प्लास्टिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि विभिन्न उम्र के पक्षियों में प्लास्टिक की उपस्थिति के संकेत पाए गए हैं। शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया में शीयरवाटर्स पक्षी का अध्ययन करने के बाद यह जानकारी दी है। अध्ययन में बताया गया है कि पक्षियों की आहार नाल के प्रोवेन्ट्रिकुलस नामक अंग की ग्रंथियों के क्रमिक क्षय के कारण यह रोग होता है। इन ग्रंथियों की कमी से पक्षी संक्रमण और परजीवियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ये भोजन को पचाने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

हकीकत यही है कि रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक थैलियों, बर्तनों व अन्य प्लास्टिक से उपजा प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक एक ऐसा नॉन-बायोडीग्रेडबल पदार्थ है जो जल और भूमि में विघटित नहीं होता है। यह लंबे समय तक हवा, मिट्टी व पानी के संपर्क में रहने पर हानिकारक विषैले पदार्थ उत्सर्जित करने लगता है। ये विषैले पदार्थ घुलकर पानी के स्रोतों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में यह लोगों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फैलाने का काम करता है। एक शोध से पता चला है कि प्लास्टिक के ज़्यादा संपर्क में रहने से खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है जिससे गर्भ में शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुँचता है। प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनाल रसायन शरीर में मधुमेह और यकृत एंज़ाइम को असंतुलित कर देता है। इसके अलावा प्लास्टिक कचरा जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे श्वसन, त्वचा और आंखों से सम्बंधित बीमारियाँ होने की आशंका बढ़ जाती है।

सवाल है कि प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम कैसे हो? सर्वप्रथम तो प्लास्टिक के खतरों के प्रति आम लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। साथ ही सरकारी प्रयासों को गति दी जानी चाहिए। इसमें आम लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी है। इसके बिना प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकेगा। (स्रोत फीचर्स) 

May 1, 2023

स्वास्थ्यः तलाशना होगा रसोई गैस का विकल्प

 - अली खान

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि रसोई गैस हमारी सेहत के लिए बेहद जोखिम भरी है। यह बात ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में सामने आई है। आज अधिकतर घरों में लोग खाना पकाने के लिए एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अब एलपीजी गैस का विकल्प तलाशने का समय आ गया है।

अब तक यही कहा जाता था कि कोयला और लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर इनसे निकलने वाला धुआँ साँस सम्बंधी बीमारियों को न्यौता है। इसके बनिस्बत एलपीजी धुआँ नहीं छोड़ती और हवा को प्रदूषित नहीं करती है। लेकिन अध्ययन के अनुसार एलपीजी गैस पर भी खाना बनाना न सिर्फ हमारी सेहत के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है। 

जब हम गैस जलाते हैं, तो ज़हरीले यौगिक बनते हैं तथा नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर ज़हरीले नाइट्रोजन ऑक्साइड बनते हैं। इससे दमा व अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। इसके अलावा ये रक्तप्रवाह में भी मिल सकते हैं। जो हृदय रोग, कैंसर और अल्ज़ाइमर वगैरह का खतरा पैदा कर सकते हैं। 

जब हम गैस चूल्हा जलाते हैं, तो असल में हम जीवाश्म ईंधन ही जला रहे होते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और फारमेल्डीहाइड भी बन सकते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड के उत्सर्जन से हवा में ऑक्सीजन कम होती है और खून में भी ऑक्सीजन नष्ट होती है। इससे हमें सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

रसोई गैस हमारी सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह है, इसका अंदाज़ा इससे बखूबी लगाया जा सकता है कि एंवायरमेंट साइंस एंड टेक्नॉलॉजी जर्नल में छपे अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका में बच्चों में दमा के 12.7 फीसदी मामले, यानी हर आठ में से एक मामले में वजह रसोई गैस से हुआ उत्सर्जन है। वहीं, 2022 में हुए एक अध्ययन में कहा गया था कि अमेरिका में रसोई गैस से कुल जितना कार्बन उत्सर्जन होता है वह पाँच लाख कारों से होने वाले उत्सर्जन के बराबर है। 

भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश है। यहाँ 2021 तक करीब 28 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे। इनमें हर साल 15 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, 2040 तक एलपीजी उपभोग बढ़कर 4.06 करोड़ टन हो जाएगा। बता दें कि भारत में एलपीजी में प्रोपेन गैस का प्रयोग होता है। इसके जलने से खतरनाक बेंज़ीन गैस निकलती है। लिहाज़ा, हमें ऐसे विकल्प तलाशने की ज़रूरत है जो अधिक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल हों। (स्रोत फीचर्स) ■■

Jun 1, 2022

प्रदूषणः प्लास्टिक का विकल्प खोजना होगा

 - अली खान

मौजूदा वक्त में सिंगल यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है। आज यह जलवायु परिवर्तन की बहुत बड़ी वजह बन रहा है। इसी के मद्देनज़र सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल पर 1 जुलाई 2022 से देश भर में प्रतिबंध लगने जा रहा है। लेकिन, सबसे बड़ी चुनौती तो प्लास्टिक के विकल्प तलाशने को लेकर है।

इस संदर्भ में सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की स्टेट ऑफ इंडियाज़ एन्वायरमेंट रिपोर्ट 2022 ने चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किए हैं। प्लास्टिक पर निर्भरता को देखते हुए यह प्रतिबंध लगाना इतना आसान नहीं होगा। वह भी तब जब इसका कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं खोजा जा सका है। रिपोर्ट में रोज़ाना निकलने वाले प्लास्टिक कचरे के आंकड़े शहरों की प्लास्टिक-निर्भरता को बखूबी बयां करते हैं। महानगरों की स्थिति तो और भी खराब है। भारत में रोज़ाना 25 हज़ार 950 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। वायु प्रदूषण के साथ-साथ दिल्ली इस मामले में भी पहले नंबर पर है जहाँ रोजाना 689.8 टन प्लास्टिक कचरा निकल रहा है। कोलकाता (429.5 टन प्रतिदिन) दूसरे और चेन्नई (429.4 टन प्रतिदिन) तीसरे नंबर पर है।

रिपोर्ट बताती है कि देश में पिछले तीन दशकों के दौरान प्लास्टिक के उपयोग में 20 गुना बढ़ोतरी हुई है। चिंता की बात यह है कि इसका 60 फीसदी हिस्सा सिंगल यूज़ प्लास्टिक का है। सीएसई की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1990 में प्लास्टिक का उपयोग करीब नौ लाख टन था और वर्ष 2018-19 तक बढ़कर 1.80 करोड़ टन से ज़्यादा हो गया। यही नहीं, सिंगल यूज़ प्लास्टिक का 60 फीसदी हिस्सा यानी लगभग 1.10 करोड़ टन अलग-अलग पैकेजिंग में इस्तेमाल किया जाता है। लगभग 30 लाख टन प्लास्टिक अन्य कार्यों में उपयोग होता है। 75 लाख टन से अधिक प्लास्टिक अलग-अलग तरह की परेशानी पैदा करता है।

लिहाज़ा, सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह से रोकना होगा। और सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने के लिए इसका विकल्प खोजा जाना निहायत ज़रूरी है।

आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर व्यक्ति प्रति वर्ष औसत 11 किलोग्राम प्लास्टिक वस्तुओं का इस्तेमाल करता है। विश्व के लिए यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति 28 किलोग्राम प्रति वर्ष है। देखा जाए तो आजकल लोग अपनी सहूलियत के तौर पर प्लास्टिक का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, एक प्लास्टिक बैग अपने वज़न से कई गुना अधिक वज़न उठाने में सक्षम होता है। इसी वजह से लोग कपड़े और जूट के थैले की बजाय प्लास्टिक थैली को तरजीह देते हैं।

लेकिन, हमें यह समझना होगा कि सिंगल यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य को बहुत प्रभावित करता है। दरअसल, इससे ज़हरीले पदार्थ निकलते हैं, जो मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। साथ ही, प्लास्टिक का इस्तेमाल जीव-जंतुओं के जीवन को भी खासा प्रभावित करता है। युनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के कारण लगभग 10 करोड़ समुद्री जीव-जंतु प्रति वर्ष असमय काल के गाल में समा जाते हैं। यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर प्लास्टिक जीव-जंतुओं के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करता है? बता दें कि प्लास्टिक की ज़्यादातर वस्तुएँ एक बार उपयोग में लेने के बाद खुले में फेंक दी जाती हैं। ये इधर-उधर जमा होती रहती हैं और जब बारिश होती है तो ये पानी के बहाव के संग नदी-नालों से होकर समुद्र में चली जाती हैं। प्लास्टिक की वस्तुएँ वर्षों तक समुद्र में पड़ी रहती हैं। इनसे धीरे-धीरे ज़हरीले पदार्थ निकलना शुरू हो जाते हैं जो जल को दूषित करते हैं। शोध से सामने आया है कि कई बार समुद्री जीव प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं। यह प्लास्टिक उनकी सांस नली या फेफड़ों में फंस जाता है और वे बैमौत मारे जाते हैं।

आज यह सर्वविदित है कि प्लास्टिक प्रदूषण ने धरती की सेहत को बिगाड़ने का काम किया है। प्लास्टिक को पूरी तरह खत्म करना तो संभव नहीं है। ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि इसके उपयोग को कम से कम किया जाए। साथ ही सरकारों को भी प्लास्टिक के विकल्प अतिशीघ्र तलाशने होंगे, ताकि प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम किया जा सके। इसके अलावा, समूचे देश में एक ऐसी मुहिम चलाने की आवश्यकता है जो प्लास्टिक, और खासकर सिंगल यूज़ प्लास्टिक, के खतरों के प्रति आम लोगों में जागरूकता और चेतना पैदा कर सके। लोगों की व्यापक भागीदारी के बगैर प्लास्टिक प्रदूषण पर कारगर नियंत्रण संभव नहीं है। (स्रोत फीचर्स)