मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Jul 1, 2026

उदंती.com, जुलाई - 2026

 वर्ष - 18, अंक - 12

प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, पत्ते-पत्ते में शिक्षापूर्ण पाठ हैं, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है। - हरिऔध

अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश - डॉ. रत्ना वर्मा

शिक्षाः आखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’? - बृजेंद्र दुबे

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान? - हिना श्रीवास्तव

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! - अपर्णा विश्वनाथ

कविताः शब्दमुक्त - आशा पाण्डेय

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक - डॉ. रत्ना वर्मा

शोधः क्या कृत्रिम बुद्धि बता सकती है आपकी सेहत का भविष्य?

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की  घाटी - सीताराम गुप्ता

ललित निबंधः  घिर घिर आये काले कजरारे मेघ - रविन्द्र गिन्नौरे

कविताः आषाढ़ के बादल - अर्चना अनुपम

व्यंग्यः प्रपंच - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कविताः पानी में बहुत नीचे तक -  मोती प्रसाद साहू

कहानीः लव यू मोर - डॉ. यशोधरा भटनागर

दो कविताएँः 1. उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी, 2. अमलतास बन जाऊँगी - गुंजन अग्रवाल ‘अनहद’

दो लघुकथाएँः 1- ईश्वर की खाँसी, 2- बच्चों की आँखें  - आनन्द हर्षुल

लघुकथाः उजली दुनिया - अन्तरा करवडे

किताबेंः अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

कविताः कुछ और... - रमेश कुमार सोनी


अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।

मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी  रंग - बिरंगे कपड़े  से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।

कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।

लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार   ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है।  विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।

यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी।  भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?

यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है,  तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

शिक्षाःआखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’?

जंगल मास्टर के साथ प्रकृति का
 अध्ययन करते बच्चे
 - बृजेंद्र दुबे

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गॉंव ऐसे हैं जहां के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा के ढेंकानाल के चार गाँव ऐसे हैं, जहाँ के बच्चे जंगलों की सैर कर जीव-जंतुओं और प्रकृति के बारे में हर हफ्ते कुछ नया सीखते हैं। जानिए क्या-क्या सीखते हैं ये बच्चे…

ओडिशा, ढेंकानाल (कंकड़हाड) : गाँव में हर बच्चे का सपना होता है कि बड़े होकर किसी बड़े शहर में जाएगा, वहाँ पढ़ाई करेगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा। और ये सपने साकार भी होते हैं; लेकिन इन सपनों के साकार होने के साथ-साथ एक चीज है जो पीछे छूट जाती है। वो है गाँव व आसपास के क्षेत्रों का इतिहास और भूगोल। और अगर गाँव व आस-पास के क्षेत्रों में ज्ञान का समुंदर हो, तो समझ लीजिए अकसर वहाँ के ज्ञान की लहरें उनसे दूर हो जाती हैं।   

ओडिशा के ढेंकानाल में कुछ गाँव ऐसे हैं, जो घने जंगलों से घिरे हुए हैं। इन जंगलों में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है और यहाँ इंसानों और जानवरों के बीच एक अनूठा रिश्‍ता है। यह रिश्‍ता आगे चलकर कमजोर नहीं पड़े, इसके लिए यहाँ बच्चों की एक अनोखी पाठशाला चलती है - “विज़डम वॉक”। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को समझने के लिए चलाई जाने वाली पाठशाला, किसी स्कूल में नहीं; बल्कि घने जंगलों में चलती है।  

दरअसल ढेंकानाल जिले में पहाड़ों से घिरे चार गाँव - दानापासी, हडगारी, कंटोल गाँव और बालीकुमा गाँव के बच्चों के लिए यह पाठशाला चलती है। इस पाठशाला की शुरुआत बालीकुमा गाँव से हुई थी। गाँव वाले मानते हैं कि यहाँ के युवा निर्माण- कार्य, औद्योगिक मजदूरी और होटल सेवा व अन्य नौकरियों के लिए बाहर चले जाते हैं। नतीजतन, जंगलों से जुड़ा उनका पारंपरिक ज्ञान उन तक पहुँचा नहीं पाता। ऐसे में इस ज्ञान के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति से जुड़ा यह ज्ञान आजीवन साथ रहे इसके लिए जंगल मास्टर बच्चों को विज़डम वॉक पर ले जाते हैं। 

कौन होते हैं ओडिशा के जंगल मास्टर? 

ओडिशा के इन गाँवों में एक नहीं, दो नहीं बल्कि कई दर्जन जंगल मास्टर हैं। ये जंगल मास्टर किसी स्कूल के टीचर नहीं; बल्कि यहाँ के बुजुर्ग हैं, जो अब अपने काम से रिटायर हो चुके हैं। यहाँ के आदिवासी समुदायों के कुछ बुजुर्ग गाँव के बच्चों को हर सप्ताहांत ‘विज़डम वॉक’ पर जंगल में ले जाते हैं। इन्‍हीं बुजुर्गों को जंगल मास्टर कहा जाता है।

क्या सिखाते हैं ढेंकानाल के जंगल मास्टर? 

जैसे हमारे दादा-नाना कहानियों के जरिए हमें लाइफ स्किल्स सिखाते हैं। ठीक वैसे ही यहाँ के जंगल मास्टर प्रकृति के बारे में बच्चों को रोचक ज्ञान देते हैं। जंगल की सैर के दौरान, यहाँ के बुजुर्ग बच्चों को दिखाते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में जंगल से मिले संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। कुछ उदाहरण जो जंगल मास्टर ने हमें बताए-    

पौधे, जो दूर कर देते हैं सिरदर्द 

कक्षा में बच्चों को पढ़ाते मास्टर जी
जंगल मास्टर बताते हैं कि इंद्रजाल और महाकालरे जैसे पौधों का उपयोग लोग सिरदर्द को ठीक करने के लिए करते हैं। वहीं महासिंदु वह औषधि है, जो हर प्रकार के दर्द से राहत देती है। 

मधुमेह और हृदय रोग व पेट की समस्या से दूर रखने वाले पौधे 

अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग मधुमेह, हृदय और पेट की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। जंगल मास्टर केवल इन पौधों के नाम ही नहीं बताते हैं; बल्कि कैसे इन पौधों की पत्तियों व छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है यह भी बताते हैं। 

त्वचा संबंधी रोगों में काम आने वाले औषधि-युक्त पौधे 

विज़डम वॉक पर नियमित रूप से जाने वाले 10 वर्षीय इंद्रमणि दास ने बताया कि उन्होंने सीखा कि कैसे जयसंदा का पौधा शरीर पर पड़ने वाले चकत्तों से राहत देता है और त्वचा की चोटों को ठीक करता है।

जंगल के पेड़ कैसे देते हैं बारिश के संकेत? 

विज़डम वॉक पर चर्चा करते हुए गाँव के सोहम दास ने बाताया कि बच्चों को अलग-अलग प्रकार के पौधों और जानवरों की पहचान करना और उन्हें मौसम का अंदाजा लगाना भी सिखाया जाता है। उन्‍होंने कहा, “हमें पता है कि अगर बारिश होने वाली होती है, तो दीमक पेड़ों से उतरना शुरू कर देती हैं। सूखे मौसम में अर्जुन के पेड़ की पत्तियों से पानी का टपकना भी बारिश के आने का संकेत देता है। ये सब बातें बच्चों को तो तभी पता चलेंगी, जब हम उन्हें बताएँगे।” 

किन पेड़ों से निकलता है नारियल पानी जैसा पौष्टिक पानी?  

सोहम दास ने आगे बताया कि इस दौरान बच्चों को दिखाया जाता है कि पीने के पानी के लिए किन पेड़ों का उपयोग किया जा सकता है और कैसे? उदाहरण के लिए, पलाश पेड़ की छाल में बने वी-आकार का कट लगाकर रस निकाल कर प्यास बुझाई जा सकती है। वहीं अटांडी लता के तने के सबसे मोटे हिस्से में एक सीधा कट लगाने से पानी निकलता है, जिसे इकट्ठा किया जा सकता है। ये पानी नारियल पानी जितना पौष्टिक होता है। इनके अलावा खजूर, बाँस और सियाली झाड़ी भी पानी देने वाले पौधे हैं।

विज़डम वॉक करते स्थानीय बच्चे 

विज़डम वॉक की हर सैर होती है दिलचस्प 

गाँव के रहने वाले दयाशंकर बहेरा बताते हैं कि बच्चे हर सैर पर कुछ नया खोजते हैं जो इसे दिलचस्प बनाता है। उन्‍होंने कहा, “हम उन्हें बताते हैं कि फल और अन्य खाद्य पौधे कहाँ मिलेंगे और हम छोटे-छोटे खेल खेलते हैं, जैसे पत्तियों को ढूँढना और उन्हें मालाओं में पिरोना।” 

दयाशंकर ने बताया कि किशोरों और युवा वयस्कों को जंगल के बारे में जानने में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी बच्चों को होती है। बच्चे न केवल हमारे ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में हमारी मदद करते हैं बल्कि प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक भी करते हैं। 

कब से शुरू हुई ओडिशा की विज़डम वॉक? 

दयाशंकर ने बताया कि बीते दो दशकों में लोगों का पलायन बढ़ा है। दूसरों को शहरों में नौकरी करते देख यहाँ के युवाओं का मन भी उधर ही लगने लगा और जंगलों से ध्‍यान लगभग हट गया। और तो और जिनका भविष्‍य अधर में लटक गया वो बुरी संगत में पड़ने लगे। ऐसे में यहाँ के बुजुर्गों को अहसास हुआ कि अगर इस ज्ञान को संजोकर रखना है तो बच्चों को छोटी उम्र से ही हमारी प्राकृतिक संपदा का महत्त्व बताना होगा। बस इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए बुजुर्गों ने बच्चों को जंगलों की जानकारी देना शुरू किया।  

दयाशंकर के अनुसार इस मुहिम ने औपचारिक रूप करीब सात साल पहले लिया जब गाँव वालों ने पद यात्रा शुरू कीं। शुरुआत में ये पद यात्राएँ गाँव तक सीमित रहती थीं और धीरे-धीरे ये यात्राएँ जंगल की ओर बढ़ गईं और फिर इसका नाम पड़ा विज़डम वॉक। उन्होंने बताया कि बच्चे अब जंगल जाने को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। उनमें से कई खुद ही जंगल में चले जाते हैं, और कुछ ने तो अपने आंगन में पेड़ उगाना भी शुरू कर दिया है। हम अपने वनों में रुचि लौटती देखकर उत्साहित है। (इंडिया वॉटर पोर्टल )

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान?

 - हिना श्रीवास्तव

सर्दियों की वह सुबह आज भी मेरी स्मृतियों में ज्यों की त्यों है। धूप अभी पूरी तरह फैली नहीं थी और छत पर बने छोटे से बाथरूम में गीज़र की हल्की भाप तैर रही थी। ठंड इतनी थी कि बिना गरम पानी के नहाने की कल्पना भी मुश्किल लगती थी। मैं उस वक्त कॉलेज के तृतीय वर्ष में थी और कॉलेज जाने के लिए ही तैयारी कर रही थी। मैं नहा ही रही थी कि अचानक गीज़र के भीतर से तेज़ आवाज़ आई। अगले ही पल उसकी जाली से तीखी आँच-सी निकलने लगी। उस क्षण मेरे हाथ-पाँव जैसे सुन्न हो गए। समझ ही नहीं आया कि क्या करूँ। एक पल को लगा, मानो पूरा बाथरूम आग की लपटों में घिर जाएगा।

उस क्षण मैं कुछ सेकंड के लिए जड़ हो गई। समझ नहीं पा रही थी कि पहले शरीर ढकूँ… या जीवन बचाऊँ। घबराकर मैंने जल्दी से दरवाज़ा खोला और किसी तरह बाहर आ गई। उस समय मेरे मन में बस एक ही विचार था- इस जगह से जितनी जल्दी हो सके निकल जाना चाहिए।

कुछ देर बाद जब मन थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने यह बात घर में बताई और कहा कि आग लगने पर भी कुछ क्षण तो मैं यह विचार कर रही थी कि पहले कपड़े पहनूँ कि जान बचाऊँ।

सबसे पहले माँ ने सुना। माँ ने मेरी बात पूरी होते ही कहा-“अरे पगली! ऐसी हालत में क्या सोचती? सीधे बाहर भाग आती। जान है तो सब है। कपड़े बाद में भी पहने जा सकते थे।”

उनकी आवाज़ में चिंता थी- वह चिंता, जो केवल माँ के स्वर में होती है।

थोड़ी देर बाद पिताजी ने भी यह बात सुनी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा- “नहीं, ऐसे कैसे बाहर आ जाती? इज़्ज़त सबसे बड़ी चीज़ होती है। थोड़ी चोट लग जाती, तो लग जाती; लेकिन बिना कपड़े पहने बाहर आना ठीक नहीं होता। तुमने सही किया कि पहले खुद को ढका।”

मैं चुपचाप दोनों की बातें सुनती रही। एक ही घटना थी, पर दो बिल्कुल अलग प्रतिक्रियाएँ। माँ के लिए जीवन सबसे बड़ा था , पिताजी के लिए सम्मान।

उस दिन पहली बार मैंने गहराई से महसूस किया कि स्त्री और पुरुष की सोच में अंतर केवल अनुभव का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का भी होता है। शरीर का नहीं, दृष्टि का भी होता है।

आज जब मैं स्वयं एक बेटी की माँ हूँ, तब उस घटना को याद करती हूँ , तो मन अपने आप माँ की ही ओर खड़ा दिखाई देता है। यदि मेरी बिटिया के साथ कभी ऐसी कोई स्थिति आए, तो मेरा उत्तर भी वही होगा- जो उस दिन मेरी माँ ने कहा था।

फिर भी मन के किसी कोने में यह प्रश्न आज भी शांत नहीं हुआ है कि क्या जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है, या सम्मान?

या फिर अन्तर्द्वंद्व से बचने के लिए आज भी मैं स्वयं को ये कहकर संतुष्ट कर लेती हूँ कि जीवन और सम्मान का यह प्रश्न स्वयं में ही सापेक्ष  है और इसे सापेक्षता के सिद्धांत के अनुप्रयोग के अंतर्गत ही देखा जाना चाहिए।

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो!

 - अपर्णा विश्वनाथ

किंचित सही; लेकिन समय निकालिए और समझिए कि अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण (Recycling) को समझना आज के समय में हर एक के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि घरेलू अपशिष्ट के जिम्मेदार हम सभी हैं। इसलिए हमारा यह कर्तव्य है कि घरेलू अपशिष्टों के सही निपटान में अपना सहयोग दें।

अपशिष्ट पुनर्चक्रण मुख्य रूप से उपयोग किए जा चुके कचरे—जैसे पॉलिथीन, प्लास्टिक की बोतलें, एल्युमीनियम व स्टील के डिब्बे, कागज़-गत्ता, काँच, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और पुरानी बैटरियों—को संसाधित (process) करके नए उपयोगी उत्पाद बनाने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया पर्यावरण को बचाने के लिए की जाती है।

पर्यावरण में हमारे चारों ओर का वातावरण, पेड़-पौधे, छोटे-बड़े जीव-जंतु सभी शामिल है। हमारे द्वारा फैलाए अपशिष्ट पदार्थ इनके लिए कितने नुकसानदेह और प्राणघातक भी है कभी सोचा है आपने ?

किचन और घर की सफाई में यह नजरअंदाज करते हैं कि क्या हमने अपने घर के कचरे को सही जगह फेंका है? ऑफिस जाते हाथ में कचरे की पॉलिथीन चुपचाप कहीं भी रख देते हैं। बस अपने घर से दूर। गृहणियाँ रात का बचा बासी खाना पॉलिथीन में भर कर बाहर फेंक आती हैं। पीछे उसका क्या हुआ, कहाँ गया कचरा कोई मतलब नहीं।

अपने आस-पास नजरें फेरें तो सड़क किनारे, मैदानों, पार्कों के आसपास भोजन की तलाश में पॉलिथीन चबाते गाएँ और अन्य जीव दिख जाएँगे। यह मासूम जीव पॉलिथीन या अन्य पैकटों में बंद खाना जब बाहर निकालने में असमर्थ होते हैं और कोई विकल्प नहीं दिखता तो विवशतावश पूरी पॉलिथीन ही खा जाते हैं। पॉलीथीन

हम क्या अनर्थ कर रहे हैं? यह घटना हैरतअंगेज से ज्यादा हम लोगों के लिए शर्मनाक है। क्योंकि इसकी जिम्मेदारी समाज में रह रहे हरेक व्यक्ति की है जो कर्तव्य विमुख है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभाता है।

घटना जनवरी माह 2026 छत्तीसगढ़ की है। तबीयत बिगड़ने से एक गौ माता और बछड़े को भिलाई से रायपुर के राज्य स्तरीय पशु चिकित्सालय लाया गया। स्थिति ऑपरेशन तक आई। दो वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर संतोष आदिल (MVsc surgery ), डॉ नम्रता सिंह तथा अन्य सहयोगी कर्मचारियों की मदद से गाय और बछड़े का ऑपरेशन किया गया। घंटो मशक्कत के बाद गाय के पेट से पच्चीस किलो और बछड़े के पेट से ग्यारह किलो पॉलिथीन बाहर निकाला गया। सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह क्या परिस्थिति कर दी हम मानवों ने। ऐसा अमानवीय,

गैर-जिम्मेदाराना रवैया इन मूक प्राणियों के प्रति कहाँ तक उचित है?

उन मूक प्राणियों के  बचने की उम्मीद क्या ही हम कर सकते हैं! हम जैसे मतलबपरस्त लोग प्रार्थना करने के हकदार भी नहीं हैं।

अगर यह घटना आपको नहीं झकझोरती तो शायद यह बात जरूर परेशान करेगी कि आपके घर जिस गाय का दूध आ रहा है वह गाय सड़कों, मैदानों में इधर उधर फैले पॉलिथीन नहीं खाई होगी ! क्या आपके घर आया दूध शुद्ध है ? पॉलिथीन युक्त है पॉलिथीन मुक्त है"।

इस घटना को यहाँ लिखने का मकसद डराना नहीं; बल्कि चेतावनी है समय रहते सँभलने की। खुद के स्वास्थ्य और अपने आस-पास रह रहे जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधे की सुरक्षा की। क्योंकि उनमें भी प्राण है ।

थोड़ी भी संवेदना बाकी है आपमें तो सोचिएगा जरूर ! कूड़ा-करकट खासकर पॉलिथीन अपने घरों से अलग-अलग समेटकर पुनर्चक्रण के लिए दें।

हम मार्च 18 को विश्व पुनर्चक्रण दिवस मनाते हैं। हर बार नई थीम के साथ।  2026 का विषय है : "अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! ” यह विषय आपको अपशिष्ट के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए प्रेरित करता है। अपशिष्ट को बेकार वस्तु समझने के बजाय, इसे कुछ नया बनाने के अवसर के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। कहते हैं ना एक पंथ दो काज। संवेदना और जिम्मेदारी एक सुंदर, स्वस्थ और टिकाऊ सामाजिक वातावरण के आधारस्तंभ हैं।

कविताः शब्दमुक्त

-  डॉ. आशा पाण्डेय

 मैं सुबह से शाम तक

खोजती रही एक शब्द,

कविता लिखने के लिए।


इस बीच,

मेरी खिड़की से

दिखाई देने वाली उस झोपड़ी से

दिखाई देती रही

वह सात-आठ साल की लड़की-

बाल्टी भर-भर कर पानी लाती हुई,

लकड़ियाँ बीनती हुई,

धुएँ से आँखें लाल करके

टेढ़ी- मेढ़ी रोटी बनाती हुई।

भूखे भाई को खिलाती हुई,

रोते भाई को गोद में लेकर

काम पर गई 

माँ का इंतज़ार करती हुई

वह लड़की।


मुझे थी तलाश 

एक सशक्त शब्द की,

जो डाल दे मेरी कविता में जान,

जिससे मैं झकझोर सकूँ

लोगों के सोए हुए अंतर्मन को।


मैं शब्दकोशों के पन्ने

पलट-पलट कर

खोजती रही एक शब्द,

किन्तु वह लड़की

लिख गई पूरी कविता-

बिना किसी शब्द के।

 सम्पर्कः कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र, ashapandey286@gmail.com


यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक

  - डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ यात्राएँ केवल जगह देखने के लिए नहीं होतीं - वे आत्मा को छूने, मन को शांत करने और प्रकृति से गहरे जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा रही अमरकंटक की। वह भी बारिश के मौसम में- जब हर पत्ता धुला हुआ लगता है, हर शाख बरखा की बूँदों से झुकी हुई और काले बादल मानों मेघदूत की तरह किसी का संदेश लेकर जाते हुए दिखाई देते हैं।  

मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मिलन-बिंदु पर स्थित एक सुंदर पहाड़ी क्षेत्र है में स्थित है अमरकंटक। यह छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ है और नर्मदा का उद्गम स्थल होने के कारण तीर्थराज के रूप में प्रसिद्ध है।  मैकल पर्वत की गोद में बसा यह स्थान किसी रहस्य और आध्यात्मिक शक्ति से भरा लगता है। एक ऐसी पावन भूमि जहाँ से न केवल नदियाँ बहती हैं, बल्कि आस्था, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम भी होता है। 

पूरे भारतवर्ष में ऐसे भौगोलिक क्षेत्र विरले ही देखने को मिलते हैं जहाँ एक ही स्थान से तीन नदियों का उद्गम हुआ हो। इतना ही नहीं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं- नर्मदा जी, जो पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है और अरब सागर में मिलती है; दूसरी सोन नदी, जो पूर्व की ओर बहकर गंगा से मिलती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है; और तीसरी जोहिला, जो दोनों के बीच से होती हुई आगे बढ़ती है और सोनभद्र में समा जाती है। है न यह सब अद्भुत और रहस्यमय? यही कारण है कि अमरकंटक को भारत के आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान मिला है।

पेंड्रा से अमरकंटक : हरियाली  और बादलों के संग 

तो ऐसे विशेष स्थान की ओर रायपुर से पेंड्रा तक रेल से हमारा सफर तो सहज रहा; लेकिन असली सौंदर्य तो वहाँ से अमरकंटक की ओर सड़क मार्ग से जाते समय दिखाई दिया। सच ही है बारिश की रिमझिम बूँदों के संग यात्रा का रोमांच ही कुछ और होता है।  पिछले वर्ष पहली जुलाई की  सुबह जब रेल से मैं और मेरी चित्रकार दोस्त सुनीता पेंड्रा स्टेशन पर उतरे तब रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश की हल्की फुहारों के साथ चारों ओर फैले साल के हरे- भरे घने जंगल और खूबसूरत घाटियों को निहारते हुए एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला।  

अमरकंटक की वादियों में पहुँचते ही आभास हुआ मानों प्रकृति हमारे स्वागत में कोई गीत गुनगुना रही हो । मिट्टी में एक खास प्रकार की भीनी खुशबू , जो पहाड़ और जंगल में  सिर्फ बारिश में ही उठती है। ठंडी हवाएँ और आसमान में उमड़ते- घुमड़ते बादल... सब कुछ सुखद अहसास से भरा हुआ था। 

रास्ते में हम बाते करते हुए जा रहे थे कि अमरकंटक कैसे मध्यप्रदेश के हिस्से में चला गया और छत्तीसगढ़ को नहीं मिल पाया। दरअसल जब साल 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, तब अमरकंटक को लेकर दोनों राज्यों में तनातनी की  स्थिति बनी रही। बटवारे के बाद नर्मदा मैया का उद्गम स्थल और मुख्य मंदिर परिसर तो मध्यप्रदेश में था; लेकिन पहाड़ों और जंगलों का एक बड़ा हिस्सा नए राज्य छत्तीसगढ़ में आ गया। धार्मिक महत्त्व और पर्यटन की वजह से दोनों ही राज्य इसे अपने क्षेत्र में शामिल करना चाहते थे। इससे यह उपेक्षित हो गया।  बढ़ता पर्यटन, अव्यवस्थित निर्माण और कचरे ने नर्मदा के उद्गम की पवित्रता पर असर डालना शुरू कर दिया। तब 2016 में दोनों राज्यों ने मिलकर इसे विशेष क्षेत्र घोषित कर एक संयुक्त प्राधिकरण बनाया। मकसद था- नर्मदा के उद्गम और आसपास के जलस्रोतों का संरक्षण करना पर्यटन को बढ़ावा देना साथ ही जंगल और पहाड़ को बचाए रखना।

.... हमारी बातों का सिलसिला चल ही रहा कि हम जंगल और पहाड़ियों के बीच बने एक शांत गेस्ट हाउस; जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था थी,  में कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।  काले बादलों से ढँके आसमान के नीचे गेस्ट हाउस की गैलरी में बैठकर गरमागरम चाय की चुस्कियों ने रेल यात्रा की थकान को सुकून में बदल दिया। शाम हो गई थी अंतः कहीं और जाने का विचार नहीं था परंतु चाय पीने के बाद हमें बताया गया कि इस समय नर्मदा कुंड में शाम की आरती चल रही होगी । बस फिर क्या था हम तुरंत ही तैयार हुए और निकल पड़े नर्मदा मैया के उद्गम स्थल की ओर, भला ऐसा शुभ अवसर कौन छोड़ता है। 

चूँकि इस बार अमरकंटक कई बरस के बाद आना हुआ था तो  मुख्य सड़क के चारो ओर का नजारा बहुत कुछ बदला- बदला सा था। बारिश का मौसम होने के कारण पर्यटक तो इस समय बहुत कम थे।  हमने देखा जगह-  जगह अनेक नए भवन, आश्रम और कुछ मंदिरों का निर्माण हो चुका था। ठहरने के लिए धर्मशाला, होटल, आदि में भी बहुत बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी। 

 रास्ते में नर्मदा नदी के जन्म को लेकर प्रचलित जनश्रुतियों पर भी बात होने लगी।   लोककथाओं  पौराणिक कथाओं में भी उनके जन्म और विवाह न होने को लेकर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं जैसे-  भगवान शिव ने अपने अश्रुओं से नर्मदा को जन्म दिया था, यह भी कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के समय अपने आशीर्वाद से नर्मदा को अवतरित किया। तभी तो नर्मदा मैया को “स्वयंभू नदी” माना जाता है। इसीलिए मान्यता है कि नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। इस तरह की अनेक कथाएँ सुनते- सुनाते हम कुछ ही किलोमीटर की दूरी तय कर नर्मदा कुंड पहुँच  गए। 

एक समय था कि जब नर्मदा कुंड और उसके आस- पास के मंदिरों का यह समूह दूर से ही नजर आता था पर अब गलियारे, रेलिंग और चबूतरे सब तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बन गए हैं। जूते उतारकर जब हम टाइलों वाले गलियारे से गुजरे तो भीगे फर्श पर फिसलने का डर था, पर मन में उमंग थी अतः मंदिर के समीप पहुँचे तो मंत्रोच्चारण के साथ आरती शुरू हो चुकी थी, अनेक भक्त जन वहाँ इकट्ठा थे। हम भी सबके बीच ध्यान मग्न होकर आरती में शामिल हो गए ....

अँधेरा घिर आया था और बारिश की बूँदे अब कुछ तेज हो गई थीं। उद्गम स्थल पर बना कुंड बहुत ही शांत, आध्यात्मिक और पवित्र अनुभूति से भरा हुआ था। आरती के बाद कुंड के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लगा जैसे जीवन की परिक्रमा नर्मदा मैया के सान्निध्य में पूरी हो रही हो। मंदिर परिसर में थोड़ी देर और ठहर, परिसर के चारो ओर घूमते हुए हम वापस गेस्ट हाऊस लौट आए। 

स्वाद और सुकून की रात

रात के भोजन में गरमागरम फुलके, नारियल की खुशबू से भरी बरबटी की सूखी सब्जी, आलू- गोभी की रसे वाली सब्जी, दाल-चावल और खीर - हर चीज़ स्वाद में लाजवाब। इस स्वादिष्ट भोजन ने दिन भर की भूख और थकान सब कुछ मिटा दिया। पेट तो भर गया, पर मन नहीं। खाने के बाद परिसर में आधे घंटे की चहलकदमी जरूरी हो गई थी, साथ में अमरकंटक के तब और अब में आए बदलाव पर गप-शप भी होती रही ताकि नींद आने में प्रकृति भी साथ दे।

दूसरा दिन : अमरकंटक की वादियों में भ्रमण

रात सुकून भरी नींद आई। चिड़ायों की चहचआहट और पत्तों  और शाखों पर गिरते बारिश की संगीतमय बूँदों की आवाज के साथ नींद खुली। जैसे ही कमरे के पीछे का दरवाजा खुला तो लगा मानों जंगल और पहाड़ के ऊपर उमड़ते – घुमड़ते बादल हमें सुबह की सैर के लिए आमंत्रित कर रहे हों। भला बादलों का आमंत्रण हम कैसे ठुकराते। 

और सच कहूँ... बारिश से भीगी हुई सुबह की यह सैर इस यात्रा में अनमोल रही। बादलों ने ठहर कर जैसे हमें अमरकंटक की शुद्ध और ताजी हवा में सांस लेने का मौका दे दिया। बारिश से धुली सड़क पर चलते हुए जंगल और पहाड़ से उठती सोंधी खूशबू, चारो ओर हरियाली की बिछी चादर, बारिश से भीगे पत्तों से गिरती बूँदें और पक्षियों का मधुर कलरव- सब मिलकर जैसे किसी अनकही कविता की रचना कर रहे थे।

कपिल धारा के रास्ते में चलते हुए आधे घंटे से अधिक समय तक सैर के बाद हम अपने ठिकाने पर लौट आए । आज का मौसम जैसे हमारे लिए ही खुला था, रात भर बरस कर बादल मानों सुस्ता रहे हों। बस फिर क्या था हम तैयार होकर नाश्ते के लिए जैसे ही डाईनिंग टेबल पर पहुँचे, उम्मीद से बिल्कुल विपरीत अमरकंटक की सादगी में इडली, डोसा, सांभर और नारियल की चटनी का दक्षिण भारतीय नाश्ता हमारा इंतजार कर रहा था। सब कुछ इतना स्वादिष्ट कि खाते हुए लगा कहीं हम केरल तो नहीं  पहुँच गए? दरअसल वहाँ का रसोइया दक्षिण भारतीय जो था। 

फिर शुरू हुई हमारी अमरकंटक के कुछ प्रमुख स्थलों की यात्रा: सबसे पहले पँहुचे माई की बगिया में- 

बरसों पहले माई की बगिया का जब भ्रमण किया था तो यहाँ जलधाराओं के कुंड प्राकृतिक रूप में थे, पर अब कुंड के चारो ओर क्रांकीट के मंदिर का निर्माण कर दिया गया है। किसी समय यहाँ साधु संत कुटिया में धुनी रमाए बैठे हुए नजर आते थे। पर अब नजारा कुछ अलग ही है।  फिर भी हरियाली से भरी इस बगिया में चलते हुए एक अलौकिक ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा अपनी सहेली गुलबकावली के साथ यहाँ खेलने आया करती थीं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नर्मदा नदी का वास्तविक उद्गम स्थल माई की बगिया ही है, और यहाँ से निकलने वाली जलधारा आगे जाकर नर्मदा मंदिर में मिलती है। एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय हुआ था और माई की बगिया में उनका विवाह मंडप भी सजाया गया था; लेकिन नर्मदा की जगह उसकी सहेली जोहिला दुल्हन बनकर बैठ गई। यह देखकर  नर्मदा रूठ गई और उल्टी दिशा में बहना शुरू कर दिया। किंवदंतियाँ तो कई प्रचलित है पर सच्चाई यही है कि यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही कई औषधीय पौधों, विशेष रूप से गुलबकावली के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसका उपयोग आँखों के रोगों के लिए आयुर्वेदिक दवाई बनाने में किया जाता है। 

माई की बगिया से लौटकर हमारे कदम नर्मदा कुंड के पास फैले प्राचीन मंदिरों के समूह की ओर बढ़ चले। यह वे मंदिर हैं, जो अमरकंटक की पहचान हैं और 11वीं शताब्दी के कलचुरी वंश के सुनहरे इतिहास की गवाही देते हैं। राजा कर्णदेव ने इनका निर्माण कराया था। इस परिसर में छह मंदिर और सूरज कुंड नामक एक कुंड भी है। कर्ण मंदिर, केशव नारायण मंदिर, मछेंद्रनाथ मंदिर और पातालेश्वर मंदिर त्रिपुरियों के कलचुरियों द्वारा निर्मित किए गए थे, जबकि पंच मठ और जोहिला मंदिर बाद के काल के हैं। इनकी स्थापत्य शैली में कलचुरी कला का अद्भुत संतुलन दिखता है- बारीक नक्काशी और पत्थरों पर उकेरे गए प्रतीक आज भी जीवंत प्रतीत होते हैं।

इन मंदिरों का संरक्षण भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। अब विभाग द्वारा परिसर को सँवारकर सुंदर बगीचे, पक्के रास्ते और गलियारे बना दिए गए हैं। पर्यटकों के लिए टिकट प्रणाली भी लागू है, ताकि धरोहर की देखभाल हो सके। ऐसा होने से प्रत्येक मंदिर में जाना और उन्हें करीब से देखना आसान हो गया है। मंदिरों के बीच विचरण करते हुए यही महसूस हुआ जैसे इतिहास फुसफुसा रहा हो- पत्थरों में गूँथा हुआ विश्वास, और आकाश को छूती हुई आस्था।

मंदिरों की सीढ़ियों और कुंड के पास कुछ चित्र खींचकर अगली यात्रा यानी कपिलधारा की ओर जलप्रपात  देखने के लिए निकल पड़े। लगभग 100 फीट ऊँचाई से गिरता यह जलप्रपात नर्मदा का पहला पड़ाव है। मन मोह लेने वाला दृश्य था। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ कपिल मुनि ने तप किया और सांख्य दर्शन की रचना की। बारिश के कारण नीचे बहते प्रपात तक जाना तो जोखिम भरा था, पर कुछ साहसी तब भी नीचे उतर चुके थे। प्रकृति की गोद में बसे  इस आलौकिक स्थान की पहाड़ियों के आस- पास सदियों पुरानी कई गुफाएँ हैं जहाँ बैरागी कभी तप किया करते थे। तभी तो यहाँ से जलप्रपात को देखते हुए ध्यान करने जैसा अनुभव होता है और आस- पास पहाड़ों और जंगल में  फैली दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ से हवा शुद्ध और ताजगी से भरी हुई।

जब हम यहाँ पहुँचे तो पर्यटकों की थोड़ी भीड़ थी,  वे सब प्रशासन द्वारा बनाए नए व्यू प्वाइंट से झरने के साथ चित्र खिंचवाने में लगे हुए थे। जब भीड़ कुछ छंट गई तो हम भी उसी स्थान से कपिल धारा को देखने पहुँच गए। हमने भी कुछ चित्र लिए । चारों ओर पहाड़ और जंगल से घिरे इस मनोरम स्थान में कुछ समय व्यतीत कर बढ़ चले अगले पड़ाव की ओर.....

हमारा अगला पड़ाव था ज्वालेश्वर मंदिर यहाँ भगवन शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है।  पुराणों में इस स्थान को महारुद्र मेरु भी कहा गया है।  यह भी माना जाता है कि भगवान शिव पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। ऐसा भी माना जाता है गंगोत्री का जल रामेश्वर में चढ़ाने में जितना पुण्य फल मिलता है उतना ही फल नर्मदा का जल ज्वालेश्वर महादेव में चढ़ाने से मिलता है।  इस विशाल शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है हमने भी ऊपर जाकर जल चढ़ाया और प्रणाम कर नीचे आ गए। 

तीसरे दिन सुबह भी बेहद खुशनुमा थी।  सुबह की सैर के लिए हमने आज दूसरा रास्ता चुना, थोड़ी चढ़ाई वाला।  लौटते हुए सुनीता ने वहाँ के जंगलों से कुछ जंगली फूल के पौधे चुन लिये। जिनमें गुलाब के कलम भी शामिल हैं। चूँकि कटीले गुलाब की डालियों को तोड़ पाना मुश्किल हो रहा था तो पास ही गाँव के एक घर में कलम काटने के लिए औजार माँगने के इरादे से आवाज लगाई। दुबली पतली सुंदर सी महिला ने बाहर आकर सवालिया निगाहों से हमें देखा तो झट हमने अपने आने का मकसद बता दिया । उस महिला ने तुरंत अपने पति को हमारी मदद के लिए भेज दिया । उस नौजवान ने अपनी कुल्हाड़ी से ढेर सारे गुलाब के कलम काटकर हमें दे दिए। सुनीता इस गुलाब के कलम को अपने नए स्टूडियो में लगाना चाहती है। पौधे लेकर हम लौट आए; क्योंकि तैयार होकर हमें  फिर कुछ और प्राकृतिक स्थानों  की ओर जाना था। 

लेकिन हमारी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। जैसे बादल हमसे कह रहे हों कि आज तो मुझे यहीं बैठकर आराम से निहारना होगा। और हुआ भी वही बारिश तेज हो गई और लगातार दिन भर होती रही। गरमा- गरम चाय का आनंद लेते हुए हम कमरे के पीछे गलियारे में बैठ बारिश का भरपूर आनंद लेते रहे। नाश्ता किया, भोजन लिया और दिन भर जंगल और पहाड़ों को बारिश में भीगते देखते रहे। 

आखिर इसी मौसम का आनंद लेने तो हमने अमरकंटक को चुना था । प्रकृति ने भी जैसे हमारा मन भाप लिया था। भला ऐसे मनोहारी दृश्य को देखकर सुनीता का चित्रकार मन कैसे न मचलता उसने तुरंत अपनी ड्राइंग कॉपी और पेन निकाली और रम गई,  लगा जैसे उसने प्रकृति को कागज पर उतार लिया हो ...और मैं इस अलौकिक अनुभव को शब्दों में ढालने के बारे में सोचती रही। 

धरमपानी और प्रकृति की गोद में विश्राम

दोपहर का भोजन लेकर हमने थोड़ी देर आराम किया और जब बारिश कुछ थमी, तो हम फिर निकल पड़े छतरी लेकर यह कहते हुए कि अब तो चाहे जितना बरसो चाहे हमें भी भिगो दो । थोड़ी देर वहाँ का स्थानीय बाजार घूमते रहे और जब बारिश पूरी तरह थम गई तो बताया गया कि आज तेज बारिश के कारण सोन मुड़ा, दूधधारा और कबीर चौरा आदि जाना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दूरी कुछ ज्यादा है और वहाँ से अँधेरा होने से पहले लौट भी नहीं सकते; लेकिन पास ही धरमपानी जा कर आराम से  वापस आया जा सकता था। 

धरमपानी, छत्तीसगढ़ की सीमा में स्थित एक रमणीय स्थान है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और पहाड़ों की अलोकिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह वास्तव में एक गर्म पानी का झरना है जिसे धुनी पानी भी कहा जाता है।  यह झरना औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है और माना जाता है कि इसमें स्नान करने से कई रोग ठीक हो जाते हैं।   

धरमपानी पहुँच कर तो आनंद ही आ गया। प्रकृति का बेहद खूबसूरत नजारा । हमने एक चट्टान पर बैठकर प्रकृति का शांत संगीत सुनते हुए पूरी शाम बिता दी।  दूर पहाड़ों पर बादलों की लुकाछिपी, हवाओं से झनकर आती आवाज, मानों कोई मघुर गीत गुनगुना रहा हो... रोज शाम आती थी, मगर ऐसी न थी, रोज रोज घटा छाती थी मगर ऐसी न थी.... यहाँ आकर बैठना जीवन की व्यस्तता से दूर, एक तरह का ध्यान का अनुभव करना था। सच है प्रकृति के साथ कुछ समय हर व्यक्ति को बिताना ही चाहिए। मन तो नहीं था पर अँधेरा घिरने वाला था अतः वहाँ से भी  लौटना ही पड़ा।  

प्रकृति, आत्मा और आस्था के मिलन की इस भूमि में तीन दिन तक समय बिताने के बाद ऐसा महसूस हुआ मानो सौन्दर्य से आच्छादित यह पवित्र तपोभूमि किसी ऋषि की कथा सुना रहा हो। प्रकृति जब अपने पूर्ण सौंदर्य में होती है, तब मनुष्य के सारे प्रश्न, सारी थकान और सारी बेचैनी जैसे खुद-ब-खुद शांत हो जाती हैं। अमरकंटक की बारिश में भीगी यह यात्रा एक तीर्थ से कहीं अधिक एक आध्यात्मिक अनुभव थी- एक ऐसा अनुभव जिसे न कैमरे में कैद किया जा सकता न शब्दों में समेटा जा सकता, पर आत्मा में हमेशा के लिए अवश्य दर्ज हो जाता है। कैमरे ने तस्वीरें तो कई ली; लेकिन सही माने में मन ने जो चित्र बनाए, वे कहीं गहरे तक अंकित हो गए हैं। बारिश में भीगते जंगल, प्राचीन मंदिरों की शांति और नर्मदा की पवित्रता ने हमें भीतर तक स्पर्श किया। सच है, नर्मदा केवल एक नदी नहीं, एक भाव है- जिसमें बहते ही मन पावन हो जाता है।

शोधः क्या कृत्रिम बुद्धि बता सकती है आपकी सेहत का भविष्य?

आम तौर पर किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिमों का अनुमान उसके स्वास्थ्य-सम्बंधी अतीत, वर्तमान जीवनशैली वगैरह के आधार पर लगाया जाता है। अब वैज्ञानिकों ने Delphi-2M नाम का एक नया एआई टूल तैयार किया है जो इस काम को ज़्यादा विश्वसनीयता और सटीकता अंजाम दे सकता है। यह टूल कैंसर, त्वचा रोग और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी गड़बड़ियों जैसी हज़ार से ज़्यादा बीमारियों का खतरा भांप सकता है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह खोज स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। अभी तक मौजूद एआई टूल्स केवल किसी एक बीमारी की संभावना बताते हैं, जैसे दिल की बीमारी या कैंसर। पूरी तस्वीर पाने के लिए डॉक्टरों को कई मॉडल इस्तेमाल करने पड़ते हैं; लेकिन Delphi-2M एक ही जगह पर सभी बीमारियों की पूरी जानकारी दे देता है।

यह टूल वैज्ञानिकों ने चैटजीपीटी जैसे चैटबॉट्स को चलाने वाले एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल में परिवर्तन कर बनाया है। जहाँ लार्ज लैंग्वेज मॉडल वाक्य में अगले शब्द का अनुमान लगाता है, वहीं Delphi-2M इंसान के स्वास्थ्य पर आने वाला खतरों का अनुमान लगाता है। इसमें उम्र, लिंग, बॉडी मॉस इंडेक्स, धूम्रपान व शराब की आदतें, मेडिकल इतिहास और जीवनशैली जैसी जानकारियाँ डाली जाती हैं।

इस टूल को यूके बायोबैंक के चार लाख लोगों के स्वास्थ्य डैटा से प्रशिक्षित किया गया है। इसके परीक्षण में पाया गया कि Delphi-2M के अनुमान एकल बीमारी वाले मौजूदा मॉडलों जितने ही सटीक हैं, बल्कि कई बार उनसे बेहतर भी निकले। यहाँ तक कि यह एक अन्य उन्नत एआई टूल से भी आगे निकल गया, जो खून में उपस्थित जैविक संकेतकों से बीमारियाँ पहचानता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ कई बीमारियों का अनुमान लगाने की क्षमता इसे काफी अनोखा बनाती है। यदि यह ब्रिटेन के बाहर अलग-अलग आबादी में भी सफल होता है तो यह डॉक्टरों को ज़्यादा खतरे में रहने वाले मरीज़ों को पहले ही पहचानने में मदद करेगा। इससे समय पर बचाव, जीवनशैली में सुधार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य योजनाएँ बनाना आसान हो जाएगा जो लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों से बचा सकती हैं; लेकिन एक स्वाभाविक सा सवाल उठता है। भारत जैसे देश में, जहाँ बीमारी हो जाने के बाद भी इलाज नहीं मिलता, वहाँ 10 साल बाद की भविष्यवाणी व्यक्ति को चिंता के अलावा और क्या दे पाएगी? (स्रोत फीचर्स)

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की घाटी

 - सीताराम गुप्ता

मानसरोवर यात्रा के दौरान दिल्ली से अल्मोड़ा, घारचूला, मांगटी, गाला, मालपा व लमारी होते हुए बुधि पहुँचते हैं। बुधि से गुंजी का सफ़र शुरू होता है। कभी गर्मी लगती है तो कभी ठंड। रास्ते के पहले भाग में खड़ी चढ़ाई है। पहले कुछ यात्रा पैदल तय की उसके बाद की कुछ यात्रा घोड़े पर सवार होकर। इतनी खड़ी चढ़ाई है कि घोड़े पसीना-पसीना हो जाते हैं। वैसे हमें क्या हक़ है कि हम निरीह पशुओं पर इतना अत्याचार करें वो भी धार्मिक यात्राओं के दौरान। पशुओं से काम लेने की भी एक सीमा होनी चाहिए। कल मैंने घोड़े की आँखों में ज़बरदस्त गुस्सा देखा था। लगता था विद्रोह करने ही वाला है। मैं सहम सा गया था। मैंने साथ चल रहे घोड़े के स्वामी परदेसी से घोड़े की आँखों में व्याप्त गुस्से का ज़िक्र किया।

     परदेसी ने बतलाया कि साथ वाले घोड़े-घोड़ियाँ आगे चले गए हैं और ये अकेला पीछे रह गया है इसी से गुस्से में है; लेकिन मैं स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था कि उसका गुस्सा मुझ पर भी था। इन ख़तरनाक रास्तों पर घोड़े, खच्चर आदि जानवरों का चलना ही मुश्किल है पीठ पर सवारी बिठाकर अथवा बोझ लादकर चलना तो बहुत ही कष्टप्रद है इसमें संदेह नहीं। ख़ैर चलते-चलते छियालेख पहुँच जाते हैं। छियालेख पहुँचकर वहाँ  हमने सबसे पहले पूरी-छोले खाई और चाय पी।  छियालेख के बाद रास्ता कुछ ठीक है; लेकिन चढ़ाई-उतराई का क्रम समाप्त हो गया। ऐसी कोई बात नहीं; लेकिन कुछ रास्ता अपेक्षाकृत कम ऊँचा-नीचा था। यहाँ के लोगों के लिए तो ऐसा रास्ता समतल मैदान जैसा ही समझो। इसके बाद फूलों की घाटी आती है। छियालेख और गर्ब्यांग के बीच स्थित है यह फूलों की घाटी।

     इसे फूलों की घाटी ही कहा जाता है; लेकिन यह वो फूलों की घाटी नहीं है जो पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध है और जो उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में बद्रीनाथ के पास पुष्पावती नदी के समीप राज्य के चमोली ज़िले में पड़ती है। यह फूलों की घाटी उत्तराखंड से होकर गुज़रने वाली कैलाश-मानसरोवर यात्रा के मार्ग में पड़ती है जो राज्य के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में स्थित फूलों की घाटी एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क का एक भाग है और ये यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित फूलों की घाटी एक स्वतंत्र पर्यटक स्थल नहीं है जहाँ पर्यटक इसे देखने के लिए आते हों और इसका कारण है मार्ग का अति दुर्गम होना।

     गढ़वाल मंडल में स्थित विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए गोविंद घाट से घंघरिया तक 16 किलोमीटर की यात्रा पैदल अथवा घोड़ों पर की जा सकती है। गोविंद घाट से घंघरिया तक हेलिकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है, जबकि कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित इस दुर्गम फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए लंबी ट्रैकिंग अपेक्षित है। पहले यहाँ तक पहुँचने के लिए तीन दिन की ट्रैकिंग अपेक्षित थी; लेकिन अब यहाँ पास तक सड़कें बनाई जा रही हैं। लोग बतलाते हैं कि सड़कें बनाने से यहाँ के फूलों और औषधी

य पौधों और दूसरी वनस्पतियों को नुकसान भी पहुँच रहा है। इस फूलों की घाटी को भी विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित फूलों की घाटी की तरह ही संरक्षित किया जाना चाहिए। मुझे इन दोनों ही फूलों की घाटियों को देखने का सुअवसर मिला है। दोनों का अपना-अपना विशिष्ट सौंदर्य है।

     छियालेख उच्च हिमालय का प्रवेश द्वार है क्योंकि यहीं से उच्च हिमालय का प्रारंभ होता है। यहाँ से चलने के कुछ देर बाद फूलों की घाटी आती है। अगस्त-सितंबर के महीनों में लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र में फैली छियालेख घाटी सैकड़ों प्रजातियों के मनमोहक फूलों से महक उठती है; क्योंकि यहाँ सामान्य पर्यटकों का आना असंभव है अतः केवल कैलाश-मानसरोवर यात्री अथवा स्थानीय व्यक्ति ही अपनी यात्रा के दौरान इस घाटी के अद्वितीय सौंदर्य का आनंद उठा सकते हैं। पहाड़ों की निचली ढलानों पर तथा घाटी से गुज़रने वाले रास्ते के आसपास विभिन्न प्रकार के असंख्य नन्हे-नन्हे फूल रंग-बिरंगी चादर-सी बिछी दिखलाई पड़ रही है। विविध आकार और वर्ण के फूल चारों और दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे-ऐसे रंग के फूल कि पहले कभी भी कहीं देखे ही नहीं। नीले, पीले, सफ़ेद, बैंगनी और न जाने कितने रंगों के ख़ूबसूरत फूल।

     कुछ फूलों का रंग तो ऐसा पारदर्शी नीला, कि लगता हैं मानो अभी-अभी नील मिले पानी में डुबोकर निकाले गए हों। सभी रंगों के फूलों में पर्याप्त विविधता है; लेकिन नीले रंग के फूलों में इतनी अधिक विविधता है कि रंगों की सूची बनाना भी संभव नहीं। इनमें से अनेक प्रजातियाँ औषधीय गुणों से भी युक्त हैं। फूल तो फूल उनके पौधों की पत्तियाँ भी विविधता व विशिष्टता लिए हुए ही हैं। एक बात ज़रूर है और वो ये कि फूल अपेक्षाकृत छोटे आकार के हैं। 

     बुधि कैंप में भी डेलिया व होलीहॉक्स व अन्य कई क़िस्म के फूलों के पौधे लगे हुए थे; लेकिन ये पूर्ण विकसित बड़े आकार के थे।   

 फूलों की घाटी और अन्य पेड़-पौधे व वनस्पतियाँ यात्रा मार्ग को अविस्मरणीय बना देती हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली – 110034, मोबा- नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


स्वास्थ्यः अच्छा खाएँ, पृथ्वी की सीमा में खाएँ

 अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं; लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह - पृथ्वी - की सेहत को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौज़ूँ है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं का उल्लंघन कर लिया है। यहाँ उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।

हम अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते है; लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं- भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है; बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत का मामला है। कैसे?

यदि आप इस पहलू को थोड़ा खँगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं- उसके उत्पादन में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए। 

मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है और  दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण,  जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)

मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं

पहला- गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा, वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहाँ यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।) 

दूसरा- प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागान से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेहूँ, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियाँ पकाना वगैरह। 

तीसरा- अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।

वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहाँ लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं के अंदर पूरी हो रही हैं। 

ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है ; लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियाँ, गिरियाँ, फलियाँ और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।

अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियाँ, फल, फलियाँ और गिरियाँ नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा, संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।

कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।

नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है; लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।

पृथ्वी की सीमा-रेखाएँ

2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने नौ सीमाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़) की पहचान की थी, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने का मतलब है हम सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएँ हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।

सरकारों को ढाँचे में बदलाव करने की ज़रूरत है - रेड मीट का उत्पादन लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।

यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालाँकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।

यहाँ एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएँ; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

ललित निबंधः घिर घिर आये काले कजरारे मेघ

 - रविन्द्र गिन्नौरे

  मानसून आने का उल्लास आस बाँधे उन किसानों की आखों से झलकता है जो जेठ की तपती हुई धरती माता के दुख से व्यथित होकर आसमान की ओर टकटकी लगाये बादलों की प्रतीक्षा करते हैं कि कब बादल छाए और बरसात हो। बादलों के छाते ही मोरों के पैर थिरक उठते हैं, पपीहे के बोल फूट पड़ते हैं, दादुरों का राग, झींगुरों का संगीत मुखरित हो उठता है। ऐसा मधुरम संगीत जिसके स्वागत के लिए वो अतिथि कितना अमृतमयी होगा। मानसून के आते ही धरा पर काले कजरारे मेघ छा जाते हैं, रिमझिम बरसात से चराचर जीवन धन्य हो उठता है। हर कवि ने प्रकृति के इस अनूठे कौतुक को अपने काव्य में पिरोया है। लोक गायकों ने अपने गीतों के माध्यम से इसकी यशोगाथा गाई है, जिनमें बादलों के लिए जीवन्त प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। संस्कृत कवियों ने बादलों को अमृतमयी व वात्सल्य से भरे कहा है तो कहीं उनके विद्रूप रूप को भी प्रस्तुत किया है। महाकवि जयदेव ने बादलों को ऐसे ही दूसरे रूप में प्रस्तुत करते हुए 'भामिनी विलास' में लिखा है -

 "धनी से अपने लिए धन लेने वाले का मुँह यदि काला हो, तो क्या विचित्रता है कि दूसरों के लिए भी समुद्रों से जल लेने वाले मेघ पूरा का पूरा ही काला हो जाता है-

“स्वार्थ धनानि धनिकात् प्रतिगृह्रतो यत् आस्यं, भजेन्मालिनता किमिद विचित्रम, गृहणः परार्थमपि वारिनिधेः पयोऽपिं, मेघोऽ‌यमेति सकलोऽपि च कालिमान्‌म।"

     पौराङ्गनाएँ कटाक्षों से मेघ के साथ विलास करती हैं। उज्यियिनी की उन्मादिनियाँ मेघ दर्शन से उन्मन्त हो जाती हैं। जनपद की वधुएँ कामपुरुष मेघ के अभिराम रूप का पान करती हैं, किन्तु यह सब निरर्थक नहीं है, उनका लक्ष्य कृषि फल प्राप्ति है। मेध कृषि प्रवर्तक हैं, यदि इनके आगमन में विलंब हो जाये तो संपूर्ण वन प्रकृति विस्फारित नेत्रों से आकाश की ओर एकटक निहारने लगती है। मेघ का सुधावर्षण उनके लिए प्राणद है। मेघदूत में कालिदास ने इसलिए ही कहा है-

"त्वरयत्यायतकृषिफलमिति भूविलासानभिज्ञैः

प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूधूलिचनैः पीयमानः।।"

    मानसून के आते ही विरहणी की दशा कैसी हो जाती है उनके विरह को संस्कृत कवियों ने चित्रित किया है। विरहणी वर्षा की शोभा को कातर दृष्टि से देख अपनी सखी से कहती है, "देखो आषाढ़ आ गया है, दसों दिशाओं में मेघ आच्छादित हो चुके हैं। कजरारे बादलों के साथ हवाएँ कैसी अठखेलियाँ कर रही हैं, पर है सखी मेरी आशा मुझे केवल धोखा दे रही है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाशास्ते ।

प्रिय सखि मम पुनराशा भ्रमयति भूरि ॥

      वैसे वर्षा का अनूठा सौंदर्य किसका मन नहीं मोह लेता है। पृथ्वी पर फैली हरियाली और काली घटाओं के बीच रह रह कर प्रदीप्त होती चपला बिजली की चमक अद्‌भुत दिखती है। फूलते हुए कदम्ब के पेड़ पर नाचते मोरों की थिरकन को देखने इंद्रवधू भी घरा पर आ उतरती है। कविवर नंददास ने अत्यंत सूक्ष्मता से बरसात के मौसम का हृदयग्राही चित्र अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से दिखाया है-

घन होति हरीरी मही को लखै, निरखै घन जो घनज्योति छटा ।

 अवलोकति इन्द्रवधू की पत्यारी,विलोकति है खिन कारी घटा । 

ताकि डार कदंबन की बरसे दरसे, उत नाचत मोर अटा ।

 अधऊरध आवत जात भयो, चित नागरि को नर कैसो बटा ।।

उमड़‌ते घुमड़‌ते बरसते काले बादलों के बीच चंचला बिजली रह रह कर थिरक उठती है, कहीं जल-वृष्टि के बाद निष्प्रभ हो श्वेत हो जाना, कैसा सुन्दर व्यतिरेक है। जिसको देख विरही पपीहा बोल उठता है ,कोयल कूक उठती हैं। कलरव करते पक्षियों के साथ दादुर भी सुर मिलाते हैं। विरही का मन इन आवाज़ों को सुन कम्पित हो उठता है। तारों की चमक देख विरहिणी कहती है कि मैं प्रीतम को मना करती रही, जिसके बिना मेरा तन विरह से जल रहा है। सावन के ये बादल मेरी विरहाग्नि को और बढ़ा रहे हैं।

 कविवर मतिराम ने विरहिणी की विषम व्यथा को उकेरते हुए कहा है-

उमड़ि घुमड़ि धन छोड़त अखंड धार, चंचला उठति तामें तरजि तरजि कै। 

बरही, पपीहा, भेक, पिग, खग टेरत हैं, धुनि सुनि प्राण प्राण उठे लरजि लरजि कै । 

कहै कवि राम लखि चमक खदोतन की, प्रीतम को रही मैं तो बरजि बरजि बरजि कै।

 लगे तन तावन बिना री मनभावन कै, सावन दुक्न आयो गरजि गरजि कै।।

         ग्रीष्म की भीषण ज्वाला को, वर्षा की सौंद‌र्यमयी अद्‌भुत छटा अपने आगोश में ले लेती है। धूल के बवंडर बरसात की श्वेत चाँदी सी बूँदों में मिल एकाकार हो जाते हैं। घरा पर सोंधी महक और शीतल प्राणद वायु से चहुंओर हर्षोल्लास हो उठता है। वर्षा जल ग्रहण करने के लिए चातक स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा करता है। मेंढ़क बादल गर्जना से होड़ लिये टर्राने लगते हैं। स्याह बाद‌लों के बीच कौंधती बिजली क्षण भर को दसों दिशाओं को प्रकंपित कर देती है। पहली वर्षा में बगुले भी पंक्तिबद्ध हो आकाश में विचरते बागों का सौंदर्य निहारने उड़ान भरने लगते हैं। ऋतुओं का वर्णन करने वाले कवि पद्‌माकर ने वर्षा का अनूठा चित्रण किया है-

दौरत ददेरी देत दादुर सूँ दू़दै दीह, 

दामिनी दमंकत दिसान में दसा की है, 

पहलन बूँदन बिलोक बगुलान बाग. 

बंगलान बेगिन बहार बरषा की है।

   घने काले बादल चारों ओर से उमड़‌ते घुमड़ते बरस घिर आए हैं, कविवर द्विजदेव की नायिका अपनी सखी से कहती है, सखी! ऐसी वर्षा मुझे विरह में विष बूँद- सी लगती है। वह उलाहना देते कहती है कि पापी पपीहा तुझे मेरी सौगंध, ऐसी छटा में अपना दाँव मत चूक, जो बार बार प्रीतम की टेर लगाए हुए मुझे सुना रहा है,

बाद‌लों को संदेश वाहक बनाते समय कालिदास का मन कितना व्यथित होगा! इस की कल्पना करना सहज नहीं है। कालिदास की इन्हीं भावनाओं पर कवि नागार्जुन ने मर्म कटाक्ष करते के हुए कहते हैं-

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का,

रोया यक्ष कि तुम रोए थे,

कालिदास, सच-सच बतलाना।

ravindraginnore58@gmail.com

कविताः आषाढ़ के बादल

 -  अर्चना अनुपम

क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम ?

गर्जना घनघोर कर रहे, 

करता है जैसे समंदर 

गर्जन-नाद..

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं.. 


क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम? 

जो भी हो.. 

हम केवल पुरुष ही माने तुम्हें ! 

चिड़िया चीं चीं यह बतियाती हैं.. 


हाँ, आषाढ़ के बादल! 

तुम पुरुष हो..

सावन तो बरस पड़ेगा, 

भादो बनकर किंतु छिप जाओगे

शरद- शिशिर में.. 

आषाढ के बादल तुम! 

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं.. 


क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम? 

क्या, अव्यक्त कुछ कहते हो..?

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं..! 


व्यंग्यः प्रपंच

  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ईमानदारी और पद! भला ईमानदारी और पद का क्या रिश्ता है? हाँ जी है! बड़े पद पर आसीन बड़े-बड़े घपले कर सकता है; क्योंकि यह उसका जन्मसिद्ध नहीं, पदसिद्ध अधिकार है। एक गरीब और भूखा आदमी रोटी चुराए, तो चोर कहलाएगा। बड़े पद पर बैठा व्यक्ति दूसरों का धन चुराए, लेखन चुराए, गबन करे, तो कर सकता है। इससे उसकी इज़्जत पर बट्टा नहीं लगता है। चोर के समर्थन में न्याय और शास्त्रों की दुहाई देने वाले उसके धत् कर्म की निन्दा न करके, जिसका माल चुराया है, उसे मामले को ठण्डे बस्ते में डालने की नसीहत देने लगेंगे। वह छाती ठोंककर चोरी स्वीकार कर लेगा। मामला खत्म! फेसबुक से लेकर विश्वविद्यालयों के भीतर तक बड़े पद पर बैठे छोटे कद वाले लोग कीचड़ में सने मिलेंगे। कोई उनको छेड़ेगा, तो वे उसके ऊपर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आएँगे।

बहुत सारे शब्दों का इस दौर में घोर अवमूल्यन हुआ है। उनमें दो शब्द प्रमुख हैं- इण्टरनेशनल और विश्व। गली मुहल्ले के स्कूल भी इण्टरनेशनल नाम रखकर मोटी फीस वसूलकर गर्व से सीना फुलाए हुए हैं और शिक्षा के नाम पर जाने कितने नौनिहालों का भविष्य चौपट कर रहे हैं। जेबी संस्थान के साथ विश्व शब्द का दुरुपयोग करके कितने ही ऐसे लोग रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय होने का मुगालता पाले हुए हैं। इनके संस्थान में कुछ दीजिए और बदले में आपको एक प्रमाणपत्र मिल जाएगा। आप बिना कुछ किए धरे अन्तरराष्ट्रीय हो जाएँगे। इनके मंच पर आने के पैसे, मंच पर लंच के पैसे, प्रमाण-पत्र के पैसे। कितना अच्छा है कि कोई भी अनाम गली से निकलकर इनके हाथों सम्मानित होकर रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय हो जाएगा। सौदा एकदम सस्ता है।

शैतान की आँत की तरह लम्बी कविता, कहानी कुछ भी लिखिए, बस रिकार्ड आपके नाम दर्ज हो जाएगा। श्रीमान् बुभुक्षित हर वर्ष कुछ महीनों के लिए देश- विदेश के दौरे पर निकलते हैं। वे कभी खाली हाथ नहीं लौटते। कुक्कुरमुत्ता की तरह फैली संस्थाओं के कई प्रमाण-पत्र उनके हाथों में होंते हैं।

प्रचार की भूख आदमी का विवेक छीन लेती है। किसी मंच पर बुलाकर अगर उनको दुलत्ती भी मार दी जाए, तो अगले दिन अखबार में छपा मिलेगा कि उनको अमुक संस्था ने सम्मानित किया है। किसी ने उनको गलती से अपना बैग भी थमा दिया, तो वे सम्मानित महसूस करेंगे। वह भी अखबार में जाकर सम्मान की खबर बन जाएगी। एक ऐसी ही खबर पर मैने श्री बेहया जी को टोका, तो गुर्रा उठे, ‘‘आप मुझसे जलते हैं। आपको धेले की अक्ल नहीं। मुझे कवि गोष्ठी में तहसीलदार साहब ने सम्मानपूर्वक बुलाया था, तो क्या यह मेरा सम्मान नहीं था? क्या मैं उनके बुलाने से सम्मानित नहीं हुआ?’’ 

'सम्मान' शब्द के अर्थ-अपकर्ष की जानकारी मिलने से मेरा ज्ञान बढ़ा। निरुत्तर होने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं था।

आह और वाह का अंतर! मंच पर कुछ अच्छे कवियों के बीच में वानर की तरह उछलकूद करने वाले कवि हर कहीं मिल जाएँगे। ये सड़े हुए चुटकुले सुनाकर काव्य की दुर्गति करने में कभी पीछे नहीं रहते। ताली बजाने की भीख माँगते ये कवि मंच के प्रपंच को भली प्रकार समझते हैं। पत्नी से लेकर मुहल्ले वाली और साली का, यहाँ तक कि किसी दिव्यांग की असमर्थता का उपहास करने में भी नहीं चूकते। चुटकुले को भी कविता का दर्जा देने का अभियान भी ये जोरों से चलाए हुए हैं। गम्भीर श्रोताओं पर भी ये अपनी ऊल-जलूल तुकबन्दी का ढेला फेंकने से बाज नहीं आते। 'वाह-वाह' न सुनें तो इनका चेहरा दयनीय हो जाता है, जबकि अच्छी कविता को सुनकर 'वाह-वाह' नहीं, बल्कि रसविभोर होकर 'आह!' निकलती है कि क्या खूब कहा है! ये वानर कवि मंच से बाद में उतरते हैं, इनकी कविता उससे भी पहले कला-कवलित हो जाती है।

चलते-चलते एक बात और कि किसी का लिखा पढ़ने की बजाय कुछ की रुचि केवल अपना पढ़वाने तक सीमित है। आप उनका लिखा सब पढ़िए, उन पर लिखिए. वे न आपका लिखा कुछ पढ़ेंगे, न आपके बारे में कुछ लिखेंगे; लेकिन सावधान! आप उनको अनपढ़ न कह देना! वे बड़े लेखक हो गए हैं।

कविताः पानी में बहुत नीचे तक

 -  मोती प्रसाद साहू 

जलकुंभियों का हरा वितान 

नीचे काला पड़ चुका पानी 

और निरूद्ध -सी मछलियाँ 

पहले यहाँ हुआ करता था 

साफ व स्वच्छ एक जलाशय 

स्नान- ध्यान के साथ 

तैरने वालों का मजमा 

अतिथि को छोड़ने आया करते थे 

गृहस्थ यहीं तक...।

'ओदकान्तं स्निग्धो जनोऽनुगन्तव्य:' 


पढ़ाई- लिखाई की प्रतिस्पर्धा में 

बहुत पीछे छूट गया बचपन


नयी पीढ़ी को समझाया गया 

तैरना एक जोखिम है 

और समय मूल्यवान …!

जिसे इस तरह

नष्ट नहीं किया जा सकता 


उनके पास डिग्रियाँ हैं 

कण्ठस्थ हैं 

जल के रासायनिक सूत्र 

तैरना नहीं आता उन्हें ...


बुरी ताकतों ने जमा ली जड़ें 

पानी में बहुत नीचे तक…!


सम्पर्कः अटल आवासीय विद्यालय , गुरमुरा -सोनभद्र उ. प्र.

motiPrasadSahu@gmail.com


कहानीः लव यू मोर

  - डॉ. यशोधरा भटनागर

बरामदे की दीवार पर टँगी घड़ी ने रात के नौ बजाए तो पिछले कुछ वर्षों से पूरे घर में पसरी खामोशी, कुछ पल के लिए ही सही, फिर भंग हो गई। यह खामोशी ही है जो अब इस घर में उनके साथ है। इस खामोशी ने ही उनके चेहरे पर अनेक छोटी-बड़ी रेखाएँ खींच दी हैं।

रतन जी ने धीरे से अपना चश्मा उतारा और उसके शीशे पोंछ कर, फिर पहन लिया। शीशे साफ होने पर धुंधलापन थोड़ा कम हो जाता है।

धीरे से स्मार्टफोन उठाया और एक इशारे से व्हाट्सएप खोला-ऊपर सबसे पहला नाम चमक रहा था-

बेटू

उसके नीचे-बिटिया रानी

और सबसे नीचे फैमिली ग्रुप -'अवर फैमिली’

उन्होंने एक-एक करके सभी को चैक किया। सभी पर उन्होंने मैसेज भेजे थे। किसी पर भी ब्लू टिक नहीं था। बेटू, बिटिया रानी, अवर फैमिली...सब 'लास्ट सीन' में बदल चुके थे।

   उन्होंने गला खँखारा जैसे सचमुच कोई उनके सामने बैठा हो और वे उससे बात करने के लिए अपने गले को तैयार कर रहे हैं। फिर टाइप किया-“खाना खा लिया बच्चो?”

कुछ क्षण यूँ ही स्क्रीन देखते रहे।

फिर खुद ही मैसेज डिलीट कर दिया।

     रात के साढ़े दस बज रहे हैं। इस समय कौन उनके मैसेज का जवाब देगा? सब अपने परिवार में व्यस्त होंगे।

 फिर ध्यान आया कि खामोशी के शोर में उलझ कर उन्होंने आज भी रात खाने का नागा कर दिया उन्होंने। पेट कुछ कुलबुला रहा है सो बेमन से उठ कर रसोई में गए। रोज़ की तरह चंदा खाना बन कर ढक कर रख गई थी। शारदा के जाने के बाद बिटिया उनके चाय-नाश्ते, भोजन आदि के लिए इसे रख गई थी। चंदा अपनी ड्यूटी पूरी मुस्तैदी से निभाती है।

  शारदा के रहते तो उसकी किचन में वह ही चाव से खाना पकाती थी और बड़े शौक से सबको खिलाती...साक्षात् अन्नपूर्णा थी वह!    

    उसके जाने के बाद सब कुछ बदल गया। अपने बच्चों से वो हमेशा से बहुत गहराई से जुड़े रहे हैं। उनका जी बच्चों में ही लगा रहता है।

  कभी-कभी शारदा उन्हें प्यार से डपटते हुए कह दिया करती थी-“इतना लाड़ न लड़ाओ बच्चों से कि खुद को ही भूल जाओ। कुछ समय बाद तो अपने-अपने जीवन में लग जाएँगे।”

और वे हँस देते थे-“अरे, अपने ही बच्चे हैं। हम ही इनके सारे लाड़ लड़ाएँगे और फिर वो भी तो हमें ऐसे ही याद करेंगे हमें।”

 जोरों का ठस्का लगा। उन्होंने जल्दी से पानी पिया। अम्मा कहा करती थीं- “कोई याद करत है तो ठस्का लगा जात है।”

इस समय कौन याद करेगा उनको!

 पानी पीकर चैन पड़ा पर मन को तनिक भी चैन न था। एक अजीब सी बेचैनी उनके अंदर घर करती जा रही थी। एक नज़र घर और घर की दीवारों पर डाली। हर जगह खामोशी चिपकी हुई थी।

   यूँ तो घर बहुत बड़ा नहीं है लेकिन उसमें सन्नाटा ज़रूरत से ज़्यादा फैल गया है। तीन बेडरूम हैं- एक उनका, एक बेटी सिया का, जिसकी गुलाबी दीवारों पर सिया के हाथों बने फैशन डिजाइनिंग के स्कैच सजे हुए हैं, तीसरा बेटे ईशान का, जिसकी ग्रे दीवारों पर फरारी कार दौड़ती दिख रही हैं।

  शारदा के जाने के बाद तीनों बेडरूम जस के तब ही हैं। उन्होंने कमरों की किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाया। अभी कुछ उलट-पुलट करने की कोशिश भी करते, तो उन्हें लगता कि सामान बदलने से स्मृतियाँ भी बिखर जाएँगी।

रात को सोने से पहले उन्होंने ईशान की डी.पी. खोली, विदेश के चमचमाते ऑफिस में शानदार कुर्सी पर बैठा उनका सूटेड-बूटेड बेटा बहुत खुश दिखाई दे रहा है। उसके चेहरे को छूने की असफल सी कोशिश कर,उसे ढेर सारा आशीर्वाद देकर फफक कर रो पड़े।

“बेटू! मेरा बच्चा! कितनी दूर चला गया है रे बेटा तू!”

फिर उनकी प्यार भरी उँगलियाँ सिया की डी.पी. की ओर बढ़ चलीं। सिया अपनी छोटी बच्ची के साथ मुस्कुरा रही थी। मेरी गुड़िया सिया भी मेरे कंधों पर चढ़ी कैसे खिलखिलाकर हँसती थी! पूरा घर उसकी हँसी से गूँज उठता था।

   उन्होंने फोटो को ज़ूम करते हुए बहुत धीरे से कहा-

“खुश रह मेरी लाडो…”

लेकिन ये शब्द उनके आस-पास ही सिमट रह गए।

शारदा के जाने के बाद ईशान ने ही उन्हें स्मार्टफोन देते हुए कहा था-“पापा, अब वीडियो कॉल कर लिया करो। अकेलापन नहीं लगेगा।”

रतन जी ने इसी आस से मोबाइल थामा कि चलो इससे बच्चे दूर होकर भी आँखों के सामने रहेंगे। अभी तक तो उन्होंने इससे एक दूरी बनाए रखी थी। आदमी के साथ में यह आ जाये तो बस इसी में घुसा रहता है। घर-संसार दीन दुनिया से बेखबर,घर -परिवार जाए चूल्हे में।

    अब पैंसठ की उम्र में अब तकनीक सीख रहे थे।

“इसमें तुम दिखोगे?”

उन्होंने बच्चे जैसी उत्सुकता से पूछा था।

“हाँ पापा, बस यह बटन टच कर देना।” ईशान ने हँसते हुए विडियो कॉल का बटन टच करते हुए कहा था।

  शुरू-शुरू में नियम से कॉल आते रहे ।सिया बच्चों की शरारतें दिखाती। ईशान रात को ऑफिस से लौटते हुए बात करता।

   रतन जी भी पूरे दिन इस कॉल का बड़ी उतावली से इंतज़ार करते रहते।

   सिर पर बचे-खुचे बालों को अच्छे से जमाते, पतले दाँतों वाली कंघी अपनी मूँछों पर भी चला लेते कि वीडियो कॉल में भी वो चुस्त-दुरुस्त, स्मार्ट दिखाई दें।

  लेकिन धीरे-धीरे कॉल कम होने लगे, सिर्फ “गुड मॉर्निंग” वाले फूल आने लगे। फिर वे भी बंद हो गए।

अब कभी-कभार कंपनी के विज्ञापन आते थे।

  इसके बाद भी रतन जी हर सुबह सुबह पाँच बजे उठकर सबसे पहले व्हाट्सएप देखते।      

आज भी तड़के उठकर स्मार्टफोन हाथ में ले स्क्रीन खोला था कि शायद सिया का…या बेटू का कोई संदेश आया हो। पर आजकल स्मार्टफोन का निष्ठुर स्क्रीन मूक ही बना रहता है।

 रतन जी कुछ क्षण स्क्रीन देखते हुए धीरे से बोले-"ये मोबाइल बड़ा अजीब होता है। लोग इसमें रहते तो हैं, पर साथ नहीं होते। मेरे बच्चे बहुत अच्छे हैं पर क्या करें सबकी अपनी व्यस्तता है। हाँ पर मैं रोज़ उन्हें मैसेज भेजूँगा जिससे उन्हें लगे कि उनकी माँ के जाने के बाद भी उनका अपना घर उनका इंतज़ार कर रहा है।”

  वे रोज़ कुछ भेजते-कभी सूर्योदय की तस्वीर, कभी कोई भजन, कभी लिख भेजते-“अपना ध्यान रखना”...।

   सिया कभी-कभी अँगूठे वाली इमोजी भेज देती। ईशान आठ-दस दिन बाद "पापा आय एम टू बिज़ी दीज़ डेज़। कॉल यू लेटर” लिख भेज देता।

      इन शब्दों के सहारे भी रतन जी कई दिन जी लेते। बेचारे बच्चे भी क्या करें? परदेश में सभी काम तो खुद करने पड़ते हैं। और अब भी हाल‌ ही में बेटू का प्रमोशन हुआ है। काम का प्रेशर भी कम थोड़े ही है। दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है।

  कल ही मिसरा जी डेरी पर मिल गए। इधर-उधर के हाल-चाल पूछने के बाद बोले- ''शर्मा जी यहाँ अकेलापन लगता होगा, कुछ दिन बच्चों के पास चले जाइए।”

“अरे बेटा-बहू तो बहुत बुलाते हैं पर…इस घर को छोड़कर जाने का मन ही नहीं होता।”

  लेकिन सच यह था कि पिछले तीन वर्षों में किसी ने उन्हें अपने पास रहने के लिए नहीं कहा था।

सिया के घर में जगह कम थी। ईशान विदेश में बस चुका था। इतनी दूर आना-जाना आसान नहीं है फिर टिकट भी कितना महँगा है!

कल ही मोहल्ले के वर्मा जी गुजर गए। उनका बेटा अमेरिका से नहीं आ पाया। अंतिम संस्कार पड़ोसियों ने किया।

  रतन जी का मन भी बहुत घबरा रहा है। आप-पास पसरे सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक मुखर हो गई। विचारों की कड़ियाँ टूटी तो देखा कि दाल पूरी तरह ठंडी हो गई थी और रोटी सूख कर पापड़ हो चुकी थी। थाली एक ओर खिसका एक घूँट में पूरा पानी गटक लिया; पर ठस्का नहीं लगा। सिया और बच्चे सो गए होंगे, बेटू की तो सुबह की भागम-भाग चल रही होगी। सुबह साढ़े छह बजे तक निकलता है ऑफिस के लिए तब जाकर ऑफिस समय पर पहुँच पाता है। सबर्ब में ही घर सस्ते मिलते हैं। ऑफिस घर से बहुत दूर है। ऊँहहह…फ़ोन साइड टेबल पर रखकर सोने की कोशिश की तो हँसते-बोलते बतियाते खुशमिजाज वर्मा जी का चेहरा आँखों के सामने घूम गया फिर अगले ही पल वर्मा जी की पार्थिव देह…और…उनका मन अजीब सी बेचैनी से भर गया।

वर्मा जी बहुत देर तक सो नहीं पाए।

उन्होंने व्हाट्सएप खोला। बेटू ऑनलाइन था। उन्होंने अपने अंदर की बेचैनी और घबराहट को शब्दों के बाँध में समेट कर ईशान को संदेश लिखा-“बेटा, अगर मुझे कुछ हो जाए तो आने में देर मत करना।”

बहुत देर तक वे स्क्रीन देखते रहे।

फिर लगा बच्चा परेशान हो जाएगा। घबराकर संदेश डिलीट कर दिया।

   बढ़ते जाड़े संग अब खाँसी भी लगातार बनी रहती थी।

डॉक्टर ने कहा था-“अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक इन्फेक्शन है। अपना ध्यान रखें और संभव हो तो किसी को साथ रखिए।”

 जो सात फेरे लेकर , सात जन्म निभाने आई थी वह ही छोड़कर चली गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद रतन जी ने हँसकर कहा- “यह स्मार्टफोन है न डॉक्टर साहब। सबको साथ रखता है।”

बुखार तेज़ था। साँस लेते समय सीने में दर्द उठ रहा था।

  उन्होंने मोबाइल उठाया। फैमिली ग्रुप खोला और बड़ी मुश्किल से टाइप किया-“आज तबीयत थोड़ी खराब है।" लेकिन ‘सैंड’ करने से पहले ही रुक गए।

   यह पढ़ कर सिया घबरा जाएगी। ईशान परेशान हो जाएगा।

मैसेज डिलीट कर दिया।

और “गुड नाइट” मैसेज भेज दिया ताकि बच्चे उनकी ओर से निश्चिंत रहें। फिर मोबाइल सीने से लगाकर लेट गए।

   सुबह दूधवाले ने कई बार घंटी बजाई, ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई, तो उसने अड़ोसी पड़ोसियों को इकट्ठा कर लिया। मेन गेट लाँघकर खिड़की से अंदर झाँका, तो रतन जी बिस्तर पर शांत भाव से लेटे हुए थे। दिल की धड़कनें थम चुकी थीं। एक हाथ सीने पर था। दूसरे हाथ में मोबाइल कसकर पकड़ा हुआ था। स्क्रीन की नीली रोशनी फैली उनकी हथेलियों में फैली हुई थी। व्हाट्सएप खुला था। फैमिली ग्रुप में उनका आख़िरी मैसेज चमक रहा था- “गुड नाइट। लव यू।''

उसके ठीक नीचे, कई घंटों बाद, दो मैसेज आए थे-

सिया : “गुड नाइट पापा। लव यू।”

ईशान : “टेक केयर पापा। विल‌ कॉल यू ऑन संडे। लव यू मोर।”

 सम्पर्कः 152 अलकापुरी, देवास, मध्य प्रदेश 455001, yashodharabhatnagar@gmail.com, मो. -9425306554