बरामदे की दीवार पर टँगी घड़ी ने रात के नौ बजाए तो पिछले कुछ वर्षों से पूरे घर में पसरी खामोशी, कुछ पल के लिए ही सही, फिर भंग हो गई। यह खामोशी ही है जो अब इस घर में उनके साथ है। इस खामोशी ने ही उनके चेहरे पर अनेक छोटी-बड़ी रेखाएँ खींच दी हैं।
रतन जी ने धीरे से अपना चश्मा उतारा और उसके शीशे पोंछ कर, फिर पहन लिया। शीशे साफ होने पर धुंधलापन थोड़ा कम हो जाता है।
धीरे से स्मार्टफोन उठाया और एक इशारे से व्हाट्सएप खोला-ऊपर सबसे पहला नाम चमक रहा था-
बेटू
उसके नीचे-बिटिया रानी
और सबसे नीचे फैमिली ग्रुप -'अवर फैमिली’
उन्होंने एक-एक करके सभी को चैक किया। सभी पर उन्होंने मैसेज भेजे थे। किसी पर भी ब्लू टिक नहीं था। बेटू, बिटिया रानी, अवर फैमिली...सब 'लास्ट सीन' में बदल चुके थे।
उन्होंने गला खँखारा जैसे सचमुच कोई उनके सामने बैठा हो और वे उससे बात करने के लिए अपने गले को तैयार कर रहे हैं। फिर टाइप किया-“खाना खा लिया बच्चो?”
कुछ क्षण यूँ ही स्क्रीन देखते रहे।
फिर खुद ही मैसेज डिलीट कर दिया।
रात के साढ़े दस बज रहे हैं। इस समय कौन उनके मैसेज का जवाब देगा? सब अपने परिवार में व्यस्त होंगे।
फिर ध्यान आया कि खामोशी के शोर में उलझ कर उन्होंने आज भी रात खाने का नागा कर दिया उन्होंने। पेट कुछ कुलबुला रहा है सो बेमन से उठ कर रसोई में गए। रोज़ की तरह चंदा खाना बन कर ढक कर रख गई थी। शारदा के जाने के बाद बिटिया उनके चाय-नाश्ते, भोजन आदि के लिए इसे रख गई थी। चंदा अपनी ड्यूटी पूरी मुस्तैदी से निभाती है।
शारदा के रहते तो उसकी किचन में वह ही चाव से खाना पकाती थी और बड़े शौक से सबको खिलाती...साक्षात् अन्नपूर्णा थी वह!
उसके जाने के बाद सब कुछ बदल गया। अपने बच्चों से वो हमेशा से बहुत गहराई से जुड़े रहे हैं। उनका जी बच्चों में ही लगा रहता है।
कभी-कभी शारदा उन्हें प्यार से डपटते हुए कह दिया करती थी-“इतना लाड़ न लड़ाओ बच्चों से कि खुद को ही भूल जाओ। कुछ समय बाद तो अपने-अपने जीवन में लग जाएँगे।”
और वे हँस देते थे-“अरे, अपने ही बच्चे हैं। हम ही इनके सारे लाड़ लड़ाएँगे और फिर वो भी तो हमें ऐसे ही याद करेंगे हमें।”
जोरों का ठस्का लगा। उन्होंने जल्दी से पानी पिया। अम्मा कहा करती थीं- “कोई याद करत है तो ठस्का लगा जात है।”इस समय कौन याद करेगा उनको!पानी पीकर चैन पड़ा पर मन को तनिक भी चैन न था। एक अजीब सी बेचैनी उनके अंदर घर करती जा रही थी। एक नज़र घर और घर की दीवारों पर डाली। हर जगह खामोशी चिपकी हुई थी।
यूँ तो घर बहुत बड़ा नहीं है लेकिन उसमें सन्नाटा ज़रूरत से ज़्यादा फैल गया है। तीन बेडरूम हैं- एक उनका, एक बेटी सिया का, जिसकी गुलाबी दीवारों पर सिया के हाथों बने फैशन डिजाइनिंग के स्कैच सजे हुए हैं, तीसरा बेटे ईशान का, जिसकी ग्रे दीवारों पर फरारी कार दौड़ती दिख रही हैं।
शारदा के जाने के बाद तीनों बेडरूम जस के तब ही हैं। उन्होंने कमरों की किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाया। अभी कुछ उलट-पुलट करने की कोशिश भी करते, तो उन्हें लगता कि सामान बदलने से स्मृतियाँ भी बिखर जाएँगी।
रात को सोने से पहले उन्होंने ईशान की डी.पी. खोली, विदेश के चमचमाते ऑफिस में शानदार कुर्सी पर बैठा उनका सूटेड-बूटेड बेटा बहुत खुश दिखाई दे रहा है। उसके चेहरे को छूने की असफल सी कोशिश कर,उसे ढेर सारा आशीर्वाद देकर फफक कर रो पड़े।
“बेटू! मेरा बच्चा! कितनी दूर चला गया है रे बेटा तू!”
फिर उनकी प्यार भरी उँगलियाँ सिया की डी.पी. की ओर बढ़ चलीं। सिया अपनी छोटी बच्ची के साथ मुस्कुरा रही थी। मेरी गुड़िया सिया भी मेरे कंधों पर चढ़ी कैसे खिलखिलाकर हँसती थी! पूरा घर उसकी हँसी से गूँज उठता था।
उन्होंने फोटो को ज़ूम करते हुए बहुत धीरे से कहा-
“खुश रह मेरी लाडो…”
लेकिन ये शब्द उनके आस-पास ही सिमट रह गए।
शारदा के जाने के बाद ईशान ने ही उन्हें स्मार्टफोन देते हुए कहा था-“पापा, अब वीडियो कॉल कर लिया करो। अकेलापन नहीं लगेगा।”
रतन जी ने इसी आस से मोबाइल थामा कि चलो इससे बच्चे दूर होकर भी आँखों के सामने रहेंगे। अभी तक तो उन्होंने इससे एक दूरी बनाए रखी थी। आदमी के साथ में यह आ जाये तो बस इसी में घुसा रहता है। घर-संसार दीन दुनिया से बेखबर,घर -परिवार जाए चूल्हे में।
अब पैंसठ की उम्र में अब तकनीक सीख रहे थे।
“इसमें तुम दिखोगे?”
उन्होंने बच्चे जैसी उत्सुकता से पूछा था।
“हाँ पापा, बस यह बटन टच कर देना।” ईशान ने हँसते हुए विडियो कॉल का बटन टच करते हुए कहा था।
शुरू-शुरू में नियम से कॉल आते रहे ।सिया बच्चों की शरारतें दिखाती। ईशान रात को ऑफिस से लौटते हुए बात करता।
रतन जी भी पूरे दिन इस कॉल का बड़ी उतावली से इंतज़ार करते रहते।
सिर पर बचे-खुचे बालों को अच्छे से जमाते, पतले दाँतों वाली कंघी अपनी मूँछों पर भी चला लेते कि वीडियो कॉल में भी वो चुस्त-दुरुस्त, स्मार्ट दिखाई दें।
लेकिन धीरे-धीरे कॉल कम होने लगे, सिर्फ “गुड मॉर्निंग” वाले फूल आने लगे। फिर वे भी बंद हो गए।
अब कभी-कभार कंपनी के विज्ञापन आते थे।
इसके बाद भी रतन जी हर सुबह सुबह पाँच बजे उठकर सबसे पहले व्हाट्सएप देखते।
आज भी तड़के उठकर स्मार्टफोन हाथ में ले स्क्रीन खोला था कि शायद सिया का…या बेटू का कोई संदेश आया हो। पर आजकल स्मार्टफोन का निष्ठुर स्क्रीन मूक ही बना रहता है।
रतन जी कुछ क्षण स्क्रीन देखते हुए धीरे से बोले-"ये मोबाइल बड़ा अजीब होता है। लोग इसमें रहते तो हैं, पर साथ नहीं होते। मेरे बच्चे बहुत अच्छे हैं पर क्या करें सबकी अपनी व्यस्तता है। हाँ पर मैं रोज़ उन्हें मैसेज भेजूँगा जिससे उन्हें लगे कि उनकी माँ के जाने के बाद भी उनका अपना घर उनका इंतज़ार कर रहा है।”
वे रोज़ कुछ भेजते-कभी सूर्योदय की तस्वीर, कभी कोई भजन, कभी लिख भेजते-“अपना ध्यान रखना”...।
सिया कभी-कभी अँगूठे वाली इमोजी भेज देती। ईशान आठ-दस दिन बाद "पापा आय एम टू बिज़ी दीज़ डेज़। कॉल यू लेटर” लिख भेज देता।
इन शब्दों के सहारे भी रतन जी कई दिन जी लेते। बेचारे बच्चे भी क्या करें? परदेश में सभी काम तो खुद करने पड़ते हैं। और अब भी हाल ही में बेटू का प्रमोशन हुआ है। काम का प्रेशर भी कम थोड़े ही है। दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है।कल ही मिसरा जी डेरी पर मिल गए। इधर-उधर के हाल-चाल पूछने के बाद बोले- ''शर्मा जी यहाँ अकेलापन लगता होगा, कुछ दिन बच्चों के पास चले जाइए।”
“अरे बेटा-बहू तो बहुत बुलाते हैं पर…इस घर को छोड़कर जाने का मन ही नहीं होता।”लेकिन सच यह था कि पिछले तीन वर्षों में किसी ने उन्हें अपने पास रहने के लिए नहीं कहा था।
सिया के घर में जगह कम थी। ईशान विदेश में बस चुका था। इतनी दूर आना-जाना आसान नहीं है फिर टिकट भी कितना महँगा है!
कल ही मोहल्ले के वर्मा जी गुजर गए। उनका बेटा अमेरिका से नहीं आ पाया। अंतिम संस्कार पड़ोसियों ने किया।
रतन जी का मन भी बहुत घबरा रहा है। आप-पास पसरे सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक मुखर हो गई। विचारों की कड़ियाँ टूटी तो देखा कि दाल पूरी तरह ठंडी हो गई थी और रोटी सूख कर पापड़ हो चुकी थी। थाली एक ओर खिसका एक घूँट में पूरा पानी गटक लिया; पर ठस्का नहीं लगा। सिया और बच्चे सो गए होंगे, बेटू की तो सुबह की भागम-भाग चल रही होगी। सुबह साढ़े छह बजे तक निकलता है ऑफिस के लिए तब जाकर ऑफिस समय पर पहुँच पाता है। सबर्ब में ही घर सस्ते मिलते हैं। ऑफिस घर से बहुत दूर है। ऊँहहह…फ़ोन साइड टेबल पर रखकर सोने की कोशिश की तो हँसते-बोलते बतियाते खुशमिजाज वर्मा जी का चेहरा आँखों के सामने घूम गया फिर अगले ही पल वर्मा जी की पार्थिव देह…और…उनका मन अजीब सी बेचैनी से भर गया।
वर्मा जी बहुत देर तक सो नहीं पाए।
उन्होंने व्हाट्सएप खोला। बेटू ऑनलाइन था। उन्होंने अपने अंदर की बेचैनी और घबराहट को शब्दों के बाँध में समेट कर ईशान को संदेश लिखा-“बेटा, अगर मुझे कुछ हो जाए तो आने में देर मत करना।”
बहुत देर तक वे स्क्रीन देखते रहे।
फिर लगा बच्चा परेशान हो जाएगा। घबराकर संदेश डिलीट कर दिया।
बढ़ते जाड़े संग अब खाँसी भी लगातार बनी रहती थी।
डॉक्टर ने कहा था-“अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक इन्फेक्शन है। अपना ध्यान रखें और संभव हो तो किसी को साथ रखिए।”
जो सात फेरे लेकर , सात जन्म निभाने आई थी वह ही छोड़कर चली गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद रतन जी ने हँसकर कहा- “यह स्मार्टफोन है न डॉक्टर साहब। सबको साथ रखता है।”
बुखार तेज़ था। साँस लेते समय सीने में दर्द उठ रहा था।
उन्होंने मोबाइल उठाया। फैमिली ग्रुप खोला और बड़ी मुश्किल से टाइप किया-“आज तबीयत थोड़ी खराब है।" लेकिन ‘सैंड’ करने से पहले ही रुक गए।
यह पढ़ कर सिया घबरा जाएगी। ईशान परेशान हो जाएगा।
मैसेज डिलीट कर दिया।
और “गुड नाइट” मैसेज भेज दिया ताकि बच्चे उनकी ओर से निश्चिंत रहें। फिर मोबाइल सीने से लगाकर लेट गए।
सुबह दूधवाले ने कई बार घंटी बजाई, ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई, तो उसने अड़ोसी पड़ोसियों को इकट्ठा कर लिया। मेन गेट लाँघकर खिड़की से अंदर झाँका, तो रतन जी बिस्तर पर शांत भाव से लेटे हुए थे। दिल की धड़कनें थम चुकी थीं। एक हाथ सीने पर था। दूसरे हाथ में मोबाइल कसकर पकड़ा हुआ था। स्क्रीन की नीली रोशनी फैली उनकी हथेलियों में फैली हुई थी। व्हाट्सएप खुला था। फैमिली ग्रुप में उनका आख़िरी मैसेज चमक रहा था- “गुड नाइट। लव यू।''
उसके ठीक नीचे, कई घंटों बाद, दो मैसेज आए थे-
सिया : “गुड नाइट पापा। लव यू।”
ईशान : “टेक केयर पापा। विल कॉल यू ऑन संडे। लव यू मोर।”
सम्पर्कः 152 अलकापुरी, देवास, मध्य प्रदेश 455001, yashodharabhatnagar@gmail.com, मो. -9425306554



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