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Oct 3, 2018

आपातकाल- जेल डायरी के अंश

अटल जी के स्नेहिल अपनत्व की छाप
मेरे दिल में जीवन भर रहेगी
 बृजलाल वर्मा (संपादन डॉ. रत्ना वर्मा)
(गतांक से आगे)
आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट दिल्ली
27-1-1977
मैंने जो दरखास्त केन्द्र तथा प्रान्त को अपनी बीमारी के इलाज के लिए भेजे थे,  आज उसी के साथ एक पत्र लिखकर माननीय अटल जी तथा भंडारीजी को भी भेजा है जिसमें मैंने लिखा है कि- सरकार हमारे साथ क्यों ऐसा गलत व्यवहार कर रही है। उन्होंने कुछ थोड़े से लोगों को छोड़ दिया। इस समय विभिन्न जेलों में हमारे लगभग 90 प्रतिशत साथी बंद हैं। 14 से 25 साल तक के बच्चे और युवा हजारों की तादात में जेलों में सड़ रहे हैं, हम कुछ लोग यदि छूट भी गए तो क्या हम इन सबके के साथ न्याय कर पाएँगे? ऐसे में हमारा छूटना क्या शोभा देता है। यदि किसी को छोडऩे का ऑर्डर दिया भी जाता है तो उस आर्डर को जेलों तक पहुँचने में महीनों लग जाते हैं। लालफीताशाही पहले से कई गुना बढ़ गई है, भ्रष्ट्रचार, घूसखोरी, आतंक, अन्याय के विरूद्ध कोई भी बोलने वाला नहीं। जनता इन सरकारी अन्याय और अत्याचार को  देखकर भी चुप है, कोई आवाज नहीं उठा सकता। पर सरकारी तौर से चारों ओर यह प्रचारित किया जा रहा है कि इस देश में जनता ही मालिक है, यहाँ सब लोग बहुत सुखी हैं, गरीबी खत्म हो गई, मँहगाई खत्म हो गई, घूसखोरी, जमाखोरी, अन्याय का अंत हो गया है। कानून का शासन है। लोगों को इस आपातकालीन ने बहुत राहत दिया है तथा सभी प्रकार के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है, फसल अच्छी हुई, कल- कारखाने ठीक चल रहे हैं।
मैं कहता हूँ जब कानून ही ऐसा बना दिया गया हो तो भला कौन आवाज उठाने की हिम्मत करेगा। शासन के विरूद्ध जिसने भी आवाज उठाने की कोशिश की वह तुरंत जेल में बंद कर दिया जाता है। न कोई बोल सकता, न तालाबंदी कर सकता, न काम बंद कर सकता, न न्यायालय जा सकता, न सभा कर सकता, न अपनी बात अखबारों में छपवा सकता, न प्रदर्शन कर सकता और न रैली निकाल सकता।
जिस देश में जनता के सारे अधिकार छीन लिये गए हों, जिस देश की सारी अर्थव्यवस्था तहस- नहस हो गई हो,  बेकारी बढ़ गई हो, मुद्रास्फिति और भी खराब हो गई हो वहाँ अपनी इन्हीं नाकामियों को छिपाने के लिए इंदिरा सरकार ने चुनाव का ऐलान किया है और विरोधी दल को चुनाव की तैयारी का समय भी नहीं दिया। लोगों को आतंकित करके, डरा- धमकाकर उन्होंने अपना संगठन मजबूत किया, संसद व विधानसभा के सदस्यों को लालच व डर दिखाकर दल बदल करा लिया,  ऐसी स्थिति में चुनाव का यह नाटक, क्या यही प्रजातंत्र है? इन सबके बाद भी अब जनता को फैसला करना होगा कि वह क्या चाहती है। उसके सामने सिर्फ एक ही सवाल है कि वे ‘प्रजातंत्र चाहते हैं या एकतंत्र।‘तानाशाही चाहते हैं या जनता का राज्य?
मेरे पत्र के इन सब प्रश्नों को पढ़ कर अटलजी बीमार होते हुए भी मुझसे मिलने आ गए। और मुझसे कहा-हम सब दलों ने मिलकर जिस ‘जनता पार्टी’का निर्माण किया है वह इन सब ज्यादतियों का किस तरह से मुकाबला कर सकती है, यही अब हमें तय करना होगा। अब सिर्फ जनसंघ का प्रश्न नहीं रह गया है, अब तो सभी दलों का प्रश्न है। सभी राजनैतिक मीसा बंदियों को जल्द छोडऩा पड़ेगा। हम सब  मिल कर सरकार पर दबाब डालेंगे और अपने सभी साथियों को जेल से जल्द से जल्द बाहर करेंगे।
अटल जी के इस जवाब से मैं संतुष्ट हुआ। मैंने अपने प्रति हमेशा ही अटल जी का अत्यधिक प्रेम महसूस किया है। जब भी मेरे ऊपर कोई कठिनाई आती है, भले ही वे स्वयं बीमार क्यों न हों उसे हल करने में जुट जाते हैं। वे मुझसे बड़े प्यार से समझाते हैं कि उग्र मत हो, ईश्वर हमारा साथ देगा। चुनाव हम सब मिलकर ही लड़ेंगे। हमने जनता के सामने इंदिरा कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक  पार्टी ‘जनता पार्टी’सामने रख दिया। जनता हमें अब यह नहीं कह सकती कि हम आपस में बंटे हुए  हैं। अब तो सभी विरोधी दल के नेता, एक सिद्धांत, एक झंडा, एकचुनाव चिन्ह, एक प्रोग्राम को लेकर सामने आ गए हैं। मैं विश्वास के साथ कहता हूँ कि जनता हमारा साथ देगी और हम चुनाव जीतेंगे।
चुनाव अभियान का शुभारंभ
30 जनवरी महात्मा गाँधी के शहीद दिवस के दिन जनता पार्टी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की। अध्यक्ष मोरारजी देसाई तथा अटल बिहारी वाजपेयी ने  दिल्ली के रामलाल ग्राउण्ड से तथा जयप्रकाश जी ने पटना में यह अभियान शुरू किया। इसी दिन कई प्रान्तों में भी नेतागणों ने चुनाव अभियान शुरू किया। पर अभी भी कईप्रान्तों के मान्यता प्राप्त पार्टी कार्यकारणी के सदस्यों  तथा अध्यक्षों को छोड़ा नहीं गया है। चुनाव 14 मार्च तक होगा कहते हैं जबकि जनता पार्टी के सभी उम्मीदवार, नेता, प्रचारक, कार्यकर्ता जेलों में बंद है। ऐसे में चुनाव किस तरह हो पाएगा? मैं तो चुनाव का बहिष्कार करने के पक्ष में हूँ। मेरी राय में जब तक सभी राजनैतिक मीसा बंदियों को बिना शर्त नहीं छोड़ा जाता तब तक चुनाव नहीं लडऩा चाहिए। वर्तमान परिस्थतियों को देखकर तो मुझे यह भी शंका है कि वे सभी चुनाव अधिकारियों को यह हिदायत भी दे देंगी कि जनता पार्टी के सभी उम्मीदवारों की नामजदगी फार्म रद्द कर दो, न रहेगा की बाँस न बजेगी बाँसुरी। जिस प्रकार कम्युनिस्ट देशों में तानाशाही तरीके से चुनाव करवाए जाते हैं उसी तरह अब हमारे देश में भी चुनाव होगा ऐसा अंदेशा है। शहीद दिवस के दिन इस विषय पर विचार करना जरुरी है।
31-1-1977
आज मैं फिर इंतजार कर रहा हूँ अपनी रिहाई के कागज़ातों का, अगर नहीं आया तो मैं फिर से एक आखरी निवेदन सरकार को दूँगा, जिसमें यह तो माँग करूँगा ही कि या तो रिहा करो या मुझे इलाज के लिए जहाँ भी ठीक स्थान है, बंबई या बेंगलोर भेज दो, साथ ही यह भी कि मुझे मेरी बीमारी के संबंध में गलत जानकारी दे कर,  झूठा आश्वासन दिया जा रहा है और समाचार पत्रों में जिस तरह से गलत प्रचार किया जा रहा है उसपर भी कुछ न कुछ कदम उठाना पड़ेगा; क्योंकि यहाँ मैं इलाज के लिए जिस हालत में आया था, आज भी वैसा ही हूँ उल्टेहृदय रोग से और पीडि़त हो गया हूँ, जबकि गत 4-5 वर्षों से मैं इस रोग से मुक्त था।
आज पुन: समाचार-पत्रों में यह समाचार है कि ‘जनता पार्टी’प्रान्त के संचालन के लिए जो 9 व्यक्ति चुने गए हैं, उनमें से 60 प्रतिशत अभी भी जेलों में हैं। इसमें अखिल भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री संचालक कुशाभाऊ ठाकरे तथा मध्यप्रदेश जनसंघ के अध्यक्ष बृजलाल वर्मा के नाम भी हैं, जिन्हें छोडऩे का ऑर्डर होने के बाद भी नहीं छोड़ा गया।
 रामलीला ग्राउंड में अटल जी ने अपने भाषण में एक रहस्य खोला कि जब जनता पार्टी के लोग इंदिरा गांधी से मिलने गये और उन्होंने इंदिरा जी के सामने अपनी माँग रखी कि सभी राजनैतिक दलों के मीसाबंदी छोड़ क्यों नहीं दिए जाते, जबकि आप चुनाव कराने की इच्छा करती हैं, तो उनका जवाब था कि मैंने सभी प्रान्तों को आर्डर दे दिया है कि वे सभी मीसाबंदियों को छोड़ दें; परंतु वे (प्रान्त के लोग) मेरी बात नहीं सुन रहे हैं। उनका यह जवाब बड़ा विचित्र लगा,  साफ जाहिर था कि वे झूठ बोल रही हैं।
रामलीला ग्राउंड में आयोजित जनता पार्टी के पहले चुनावी आम सभा में एक लाख से भी अधिक लोग तीन घंटे तक, ठंड में बैठे हुए शांति से नेताओं की बातों को सुनते रहे। उन सबके बावजूद जबकि सभा में दिल्ली के बाहर से आने वाली जनता को सरकार ने जबरन रोका। शहर की बसों को रामलीला ग्राउंड की ओर जाने नहीं दिया गया। ओटोरिक्शा जिसमें लाउडस्पीकर लगाकर ऐलान किया जा रहा था उसे भी रोका गया। यह भीड़ इस बात का संकेत है कि जनता अब बदलाव चाहती है, वह आपतकाल के विरोध में जनता पार्टी का साथ देगी इस सभा से यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
जनता का आक्रोश साफ नजर आ रहा है। पटना में जयप्रकाश की सभा में भी लाखों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि जनता हमारे साथ है। इंदिरा कांग्रेस की तानाशाही जो 19 माह तक चली, जिस दौरान महँगाई, गरीबी, अव्यवस्था, भ्रष्ट्राचार, घूसखोरी, बेईमानी, नौकरशाही का नंगा नाच हुआ। आतंक, गैरकानूनी कार्य, अन्याय, जनता के मूलभूत अधिकारों को छीनना, संविधान में मनमाना परिवर्तन करना यह सब अब कोई भी बर्दाश्त नहीं करेगा।
अभी दो दिन पहले ही न्याय पालिका के अधिकारों पर भी कुठाराघाट किया गया है- खन्ना जो सबसे सीनियर जज थे, उसे चीफ जस्टिस न बनाकर उनके जूनियर बेग को, चीफ जस्टिस बना दिया गया, बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार 1963 में किया गया था, तब रे को चीफ जस्टिस बनाकर तीन सीनियर जजों के अधिकारों को खत्म किया गया था। उस समय भी उन तीनों जजों ने इसे अपना अपमान कहते हुए इस्तीफा दे दिया था, वैसे ही खन्ना ने भी इस्तीफा दे दिया, जो कि न्याय संगत ही है। उस वक्त यह कहा गया कि ये तीनों जज समय की प्रगति को ख्याल न करके फैसला करते हैं जो कि देशहित व जनहित में बाधक होता है। अब कह रहे हैं कि क्योंकि खन्ना 6 माह बाद रिटायर होगा इसलिए बेग को चीफ जस्टिस बनाया गया है।
 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो कि सबसे ज्यादा राष्ट्रवादी, राष्ट्र प्रेमी पार्टी है, उसे वे राष्ट्रद्रोही कहती हैं; क्योंकि वह कांग्रेस के खिलाफ है।
 20 सूत्रीय कार्यक्रम कांग्रेस पार्टी का नहीं इंदिरा का प्रोग्राम है। यहाँ तो इंदिरा ही पार्टी है, इंदिरा ही देश है। इंदिरा ही इंडिया यह कहा जा रहा है। व्यक्ति ही राज्य है, देश है, जनता या देश नहीं। अगर इंदिरा गाँधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला नहीं देता तो शायद आपातकाल नहीं लगता। वह अपने को जनता का प्रतिनिधि नहीं ;बल्कि उसका मालिक मान रही हैं, वह अपने को अदालत और संविधान तथा पार्लियामेन्ट से ज्यादा शक्तिशाली मानती हैं।
30 जनवरी को हमने गाँधी जी को याद करके उनके विचारों पर उनके कार्य करने की विधियों, उनके सत्य और अहिंसा के आचरण को याद किया ; लेकिन आज इंदिरा गाँधी उनके विपरीत कार्य करके देश में द्वेष, भ्रष्ट्रचार, भ्रम अविश्वास, दुर्भावना तथा गरीब अमीर में भेद पैदा करके वर्ग संघर्ष का एक रूप सामने खड़ा कर रहीं है और लोगों के दिलों में एकता के बजाय दुराभाव, देश प्रेम के बजाय व्यक्तिगत उपासना पर जोर दे रही हैं। तभी तो वे कहती हैं कि इंदिरा भारत है, इंदिरा नहीं तो भारत नहीं। देश की सत्ता और शक्ति एक व्यक्ति में समाहित हो गई है। जबकि गाँधी जी ने सत्ता को बिखेरा था, जन-जन, ग्राम-ग्राम में, क्योंकि यह किसानों का देश है, ग्रामों का देश है इसलिए ग्राम राज्य तथा गरीबों के राज्य जिसे आज के शब्दों में जनता का राज्य, प्रजा का राज्य, प्रजातंत्र कहते हैं। वे चाहते थे कि देश की सत्ता ग्राम के हाथों में रहे, देश की सत्ता विकेन्द्रित रहे, देश ग्राम पर निर्भर रहे। वे खुद तीसरे दर्जें पर चलते थे, सूत कातकर कपड़ा पहनते थे, एक कुटिया में रहते थे, अपना तथा अपने गाँव व आश्रम का कार्य खुद करते थे।
 हमें भी चाहिए कि हम अपनी पूंजी, हैसियत अपनी संस्कृति, अपने आदर्शों को देखकर समझकर आगे बढ़े, हम गरीब देश के वासी हैं, गाँव में किसान हैं, हमें गाँव की तरक्की करनी है, गाँव को बढ़ाना है, हर गाँव रिपब्लिक हो। अपने में स्वयं पूर्ण हो। सारी सत्ता का केन्द्र ग्राम हो, ऐसी व्यवस्था को गाँधी जी रामराज्य कहते थे। पर हम यह सब आज भूल गये हैं। लेकिन हमें आज उसी महात्मा, देश के उद्धारक, देश के निर्माता के आदर्शों पर चलना है। जनता पार्टी उन्हीं के आदर्शों पर चलते हुए, देश के सभी वर्गों को खासतौर से नौजवानों का आह्वान कर रही है कि वे संगठित होकर देश को भ्रष्ट्रचार, दुराचार, गरीबी तथा बेरोजगारी से बचाएँ और उत्थान के लिए आगे बढ़ें।
अब देखना यह है कि देश किस ओर जाता है। हमने तो देश को एक रास्ता दिया, गाँधी का रास्ता, सत्य और अहिंसा का रास्ता, कानून का रास्ता, प्रजातांत्रिक रास्ता।  'जनता पार्टीका निर्माण करके जयप्रकाश जी के मार्गदर्शन में इंदिरा गाँधी के इस तानाशाही राज को खत्म करना होगा ताकि एक प्रजातांत्रिक देश का निर्माण हो सके और देश के नागरिक अपने मूल अधिकारों को प्राप्त करके सुख पूर्वक रह सकें और हमें पूरा विश्वास है जनता आगे आएगी।    
अटल जी से मुलाकात व रिहाई के आदेश
1-2-1977
कल रात को करीब 9 बजे अटलजी मेरे पास आए, पहले उन्होंने मेरी रिहाई के बारे में बताया कि आज मध्यप्रदेश के चीफ सेक्रेटरी आ रहे हैं तथा ओम मेहता गृहमंत्री से चर्चा करके मेरा नाम उन्हें लिखवा दिया है तथा मेरी रिहाई कल हो जाने की आशा है।
तब मैंने उन्हें बताया कि मेरी रिहाई का आदेश भोपाल से बहुत पहले तथा रायपुर कलेक्टर से 25 जनवरी को दिल्ली के लिए डिस्पैच हो गया है, ऐसा समाचार है ; पर 31 तारीख भी बीत गई पर अभी तक वह आदेश यहाँ तक नहीं पहुँचा है। पूछने पर उनका जवाब होता था कि पत्र आने में 10-12 दिन का लगना मामूली बात है।  अटल जी से मैंने ठाकरेजी तथा दूसरे साथियों की रिहाई के बारे में जानना चाहा ,तो उन्होंने बताया कि बाकी सब भी छोड़े जाएँगे तथा ठाकरे जी भी जल्द ही छोड़े जा रहे हैं।
इसके बाद उन्होंने रामलीला ग्राउण्ड में हुई जनता पार्टी की पहली आमसभा जिसमें मोरारजी भाई तथा अटलजी मुख्य वक्ता थे, की जानकारी देते हुए कहा कि -आमसभा में जनता का उत्साह देखते ही बनता था। वे सरकार के आतंक की परवाह नहीं कर रहे हैं। कई बाधाओं जैसे पुलिस का भय तथा मोटर- गाडिय़ाँ को चारों ओर से बंद करने के बाद भी वहाँ एक लाख से ज्यादा लोग उपस्थित थे। वे ठंड में भी शान्त होकर हमें सुन रहे थे। इसी प्रकार पटना, कानपुर, जयपुर तथा अन्य कई स्थानों में, चरणसिंह व चंद्रशेखर की आमसभा भी अच्छी रही । पटना में जयप्रकाश जी की सभा में लोगों की अथाह उपस्थिति थी। दिल्ली में यह पहली और बड़ी ऐसी आमसभा थी जो सिर्फ एक पोस्टर से हुई। यह सब बड़ा आश्चर्यजनक  है? 

अटलजी का यह उत्साह से भरा कमेन्ट था। उनके उत्साह को देखते हुए मैंने अनुमान लगाया कि हमें  सम्पूर्ण देश में अच्छी सफलता मिलेगी। पाबंदी के बाद भी समाचार पत्रों ने अच्छा कवरेज दिया। लेकिन आकाशवाणी ने जनता पार्टी के मीटिंग की मात्र सूचना ही दी। शेष उन्होंने संजय गाँधी द्वारा की गई जनता पार्टी की आलोचना का प्रचार ही ज्यादा किया। यह सब देखते हुए शंका है कि हमें चुनाव प्रचार में आकाशवाणी और टेलिविजन में शायद ही स्थान मिलेगा। 
इधर राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तो बयान ही दे दिया कि वे राजनीति में भाग नहीं लेंगी, हाँ उनके पुत्र शायद कांग्रेस की ओर से प्रचार अगर नहीं करेंगे तो कम से कम उन्हें हर प्रकार से मदद करेंगे, ऐसा मेरा अनुमान है। अब सरदार आंग्रे साहब क्या करते हैं यह देखना होगा। अभी तक तो साथ हैं, हमारी 9 सदस्यों की कमेटी में भी प्रदेश के चुनाव संचालन के सदस्य हैं, वे अब जेल से छूट भी गये हैं। यदि सभी सक्रिय हो जाएँ तो हमें म.प्र. में अच्छी सफलता मिल सकती है।
 आज मुझे शाम लगभग 6 बजे तिहार सेंट्रल जेल नई दिल्ली के असिस्टेन्ट सुपरिनटेनडेन्ट ने मेरा डिटेन्शन का रिव्होकेशन आर्डर दिया,  जो कि 18-12-1976 को भोपाल से निकला था,  पर अभी तक व्यवस्थित पहुँच नहीं पाया था। वह आर्डर अब रायपुर कलेक्टर से वायरलेस द्वारा भेजी गई है। उसी आधार पर मुझे रिव्होकेशन आर्डर मिला।
मुझे ऐसा लगता है कि अटल जी गृहमंत्री ओम मेहता से मेरी रिहाई को लेकर एक दिन पहले मिले थे और भोपाल से चीफ सेक्रेटरी श्री सुशीलचंद्र वर्मा को भी बुलाया था, यह सब बातें एक साथ हुई। 20-10-1976 से आजतक लगातार मुझे जेल से छोड़े जाने का प्रयास मेरी तबियत को देखते हुए किया जा रहा था परंतु सरकार को किसी के जीवन- मरन से क्या लेना देना। उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझे पूरे समय जेल में रखा और मेरे इलाज में भी लापरवाही बरती। अटलजी ने मेरे लिए काफी प्रयत्न किया। उनका प्यार हमेशा मेरे साथ रहा। जब भी समय मिलता वे मुझसे जेल में मिलने आते रहे तथा मेरी सुविधाओं का ख्याल रखते रहे, उनके इस स्नेहिल अपनत्व की अमिट छाप मेरे दिल में जीवन भर रहेगी।
हमारे जनसंघ पार्टी के बहुत से प्रमुख नेता तथा हजारों कार्यकर्ता अभी भी जेलों में बंद है तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सदस्यगण भी नहीं छोड़े गए हैं। चूंकि इस संस्था को गैरकानूनी करार दिया गया है, जबकि उसके खिलाफ एक भी ऐसा चार्ज नहीं है, जिससे उन्हें गैरकानूनी कहा जाए। फिर भी इंदिरा जी को उन्हीं से डर है ; क्योंकि वह एक संगठित राष्ट्रवादी, देशभक्त संस्था है जो किसी भी अराष्ट्रीय अथवा असामाजिक कार्य, जो देश को विघटन की ओर ले जाएगी का विरोध करती है। वह भारत को एक समृद्धिशाली खुशहाल देश के रुप में देखना चाहती है जहाँ भारतीय संस्कृति के मूल्यों की रक्षा हो सके। यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मूल भावना है। पर इंदिरा गाँधी ऐसा नहीं चाहतीं। वे यूरोपीय सभ्यता तथा संस्कृति से ज्यादा प्रभावित हैं। उन्हें अपने देश की संस्कृति या सभ्यता से कोई प्यार या लगाव नहीं है। उन्हें तो सिर्फ अपना कद अपना महत्व बढ़ाना है।  अपने व्यक्ति की सत्ता को ही महत्व देना है। वे किसी से  प्रभावित है तो वह है रूस,  क्योंकि उसी ने उन्हें गद्दी पर बिठाने में सबसे ज्यादा मदद की है। इसी अहसान तले वे रूस से दबे हैं। वे पूर्णत: व्यक्तिवादी तानाशाह बनना चाहती हैं।
2-2-1977
कल शाम को जैसे ही मुझे जेल के अधिकारियों ने रिव्होकेशन आर्डर दिया, पूरे अस्पताल में बात फैल गई। थोड़ी देर बाद म.प्र. के एम.पी. पांडे तथा वर्माजी भी आ गए और उन्होंने जानकारी दी कि भोपाल में मीटिंग में क्या हुआ। उन्होंने रायपुर से मुझे उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा के बारे में भी जानकारी दी साथ ही यह भी बताया कि पुरुषोत्तम कौशिक जी रायपुर से चुनाव लडऩे के लिए तैयार नहीं हैं। जबकि मेरे ख्याल से वही सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। मेरा तो  स्वास्थ्य भी जेल में रहते हुए खराब है तथा लगातार 20-25 वर्षों से विधानसभा का सदस्य बनते रहा हूँ तो अब मेरी कहीं से भी उम्मीदवार बनने की इच्छा नहीं है। मेरे विचार से अब नौजवानों को, नए लोगों को सामने लाना चाहिए। सभी दलों ने एक होकर जिस ‘जनता पार्टी’का निर्माण किया है, उम्मीद है उसको सबकी मदद मिलेगी और हमारी पार्टी बहुमत से जीतेगी। मेरे ख्याल से पुरुषोत्तम कौशिक को रायपुर से चुनाव लड़ना चाहिए एक तो उनकी अभी उम्र कम है, नये हैं, उत्साही हैं, अभी-अभी उसका व्यक्तित्व भी जनता के सामने उभर कर आया है। यह सब मैं तो सोच रहा हूँ पर सभी बाते वहाँ पँहुचकर ही स्पष्ट हो पाएँगी, देखते हैं कि वे रायपुर से चुनाव लड़ने को राजी होते हैं या नहीं; क्योंकि रायपुर से किसी अच्छे प्रभावशाली उम्मीदवार को ही खड़ा करना होगा। यूँ तो हमें म.प्र. के सभी 40 सीटों पर ही अच्छे उम्मीदवार खड़ा करना है। 9 व्यक्तियों की जो समिति चुनाव संचालन तथा पार्टी संगठन के लिए बनी है, जिसमें ठाकरे साहब सरीखे अनुभवी व्यक्ति हमारे मार्ग दर्शन के लिए संयोजक बनाए गए हैं, ऐसे में स्थितियाँ बेहतर होंगी ऐसी उम्मीद मुझे है। मेरी तबियत को देखते हुए मैं जेल से छूटने के बाद  8-10 दिन आराम करना चाहता हूँ। क्योंकि तुरंत भाग-दौड़ करने से तबियत और बिगड़ सकती है, जिससे आगे काम करने में और कठिनाईयाँ आ सकतीं हैं। यद्यपि परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि मैं एक दिन भी आराम नहीं कर पाऊँगा ऐसा लग रहा है।
हमें मध्य प्रदेश में सरदार आंग्रे साहब का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना है, क्योंकि राजमाताजी तो अलग हो ही गई है तथा उनका लड़का विरोधी पार्टी में चला गया है। यह बात जरूर है कि उन्हें सरकार बहुत परेशान कर रही है आर्थिक रूप से, गलत-गलत आरोप लगाकर सता रही है, पर बेटे के मन में क्यों इतना डर व भय समा गया यह समझ से परे हैं ;क्योंकि वे एक खानदानी स्वाभिमानी माँ - पिता के बेटे हैं। सिंधिया खानदान को मैं इतना कमजोर नहीं मानता था पर वे भी सभी राजा महाराजाओं की तरह शासन के आगे दब गये।
 लगता है इसी करण उनकी माँ राजमाता ने भी राजनीति से चुप्पी साधने का फैसला कर लिया है। ऐसा घर की परिस्थिति के कारण हो सकता है पर जो भी हो मैं तो राजमाता के ही कारण ही जनसंघ में आया था, मेरे लिए अभी भी राजमाता के प्रति वही सम्मान व आदर है जो पहले था। मेरी हार्दिक इच्छा है कि वे पुन: विचार करें। फिलहाल हमें उनका फायदा नहीं मिलेगा, जबकि हम बहुत ही ज्यादा आपत्ति में हैं। मैं एक बार जाकर राजमाता जी से बात करने का प्रयत्न करूँगा कि वे हमें सहयोग दें।
जगजीवन राम ने दिया इस्तीफा
आज का दिन बहुत महत्त्वपूर्ण रहा कि जगजीवनराम जी ने कैबिनेट से तथा कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया सरकार पर उनका आरोप था कि इंदिरा गाँधी तानाशाह बन रही हैं, और गरीबी को खत्म करने के बजाय उनकी हालत और भी बद्तर कर रही हैं। हरिजन आदिवासियों का नाम लेकर अपना व्यक्तिगत फायदा उठा रही हैं। वे अपने अस्तित्व को ही ज्यादा महत्व दे रहीं हैं और अपने लड़के को सामने ला रही है। वे इमरजेंसी-मीसा लागू करके  नागरिकों के मूलभूत अधिकार खत्म करके देश का नाश कर रही हैं। वे कांग्रेस को अपने व्यक्तिगत हित में इस तरह उपयोग कर रही हैं मानो सभी कांग्रेसी उनके गुलाम हैं। वे पूरी सत्ता और संस्था को अपने लड़के का महत्व बढ़ाने में तन, मन, धन से लगी हैं। इस तरह कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का चुनाव के पूर्व इस्तीफा देना बहुत बड़ी खबर है। यही नहीं जगजीवन राम के साथ ही हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदनी सतपती तथा और भी कई प्रमुख लोगों ने एक साथ अपने पदों तथा कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। इससे कांग्रेस के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई तथा देश की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया। इस परिवर्तन से निश्चित तौर पर कांग्रेस जनों,  हरिजन वर्ग और खासतौर से यू.पी. और बिहार में  बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। 
मुलाकात का सिलसिला
3-2-1977
जेल से बाहर आते ही मैं आज दिल्ली में अपने लोगों से मिलता जुलता रहा। अटल जी से भी भेंट हुई। आज मैं सुबह उनके घर गया वहाँ पर त्यागीजी, आडवाणी जी संजय जी, सेकलेचा जी आदि कई महत्वपूर्ण नेताओं से मुलाकात हुई। चुनाव की रणनीति पर चर्चा चलती रही। बलरामपुर के लोग अटल जी को वहाँ से ही खड़े होने के लिए विवश करने आये थे। लेकिन अटल जी ने भी अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर नहीं की। यद्यपि आडवाणी जी ने भी उन्हें सलाह दी।
इन सबके बाद भी वातावरण ऐसा बन रहा है कि अटल जी को नई दिल्ली क्षेत्र से खड़ा करेंगे। यद्यपि दिल्ली के बहुत से उम्मीदवार हैं। जनता पार्टी अटल जी के व्यक्त्वि का फायदा देश दूसर कोने में भी ले सकती हैं।
 इस बैठक में हम सबने तय किया कि इस समय सभी सीटों पर जनता पार्टी चुनाव लड़ेगी भले ही कुछ पार्टियों से जैसे डी.एम.के. तथा अकाली दल के साथ समझौता करके ही क्यों न लड़ें। इस चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ सिर्फ एक ही उम्मीदवार खड़ा हो यही हम सबकी कोशिश रहेगी।
जगजीवनराम जी के आ जाने से जनता पार्टी को और बल मिल गया है और संजय गाँधी का युवक कांग्रेस लगभग निर्जीव-सा हो गया है।
इसी दौरान मैंने वीरेन्द्र सखलेचा तथा संजवेलकर जी से मध्यप्रदेश के सीटों के बारे में बात की। इसी चर्चा मैं खंडेलवाल जी से पहले ही कर चुका था। महाकौशल, छत्तीसगढ़ तथा रीवाँ की सीटों को लेकर जो भी मेरे सुझाव थे उससे वे  सहमत  थे।  मैंने अपनी राय 29 जनवरी को ही खंडेलवाल और सारंग जी को लिखित रूप से भेज दी थी। अब आगे क्या रणनीति बनती है यह वहाँ पँहुच कर ही मालूम चलेगी।
उस समय तक पुरुषोत्तम कौशिक जेल से छूटे नहीं थे ;इसलिए 29 तारीख की मीटिंग में उपस्थित नहीं हो पाए थे। इस दौरान सभी ओर से मुझ पर दबाव आ रहा है कि मैं महासमुंद सीट से चुनाव लड़ूँ , वह जनसंघ की सीट है और वहाँ की छह विधानसभा सीटों पर हमारा पूर्ण कंट्रोल है, दो सीटों पर समाजवाद का है। इस प्रकार से वह मेरे लिए ठीक है, ऐसा महासमुँद के लोगों का विचार है। अब देखे आगे क्या होता। मेरी इच्छा चुनाव लडऩे की बिल्कुल भी नहीं है, लेकिन साथी चाहते हैं कि मैं यह चुनाव अवश्य लड़ूँ,  हमारी जीत निश्चित है।
संपादन- डॉ. रत्ना वर्मा

Sep 9, 2018

आपातकाल- जेल डायरी के अंश

पं. दीनदयाल उपाध्याय पर डाक टिकट जारी करते हुए अटल जी के साथ बृजलाल वर्मा
बृजलाल वर्मा की जेल डायरी के अंश
(संपादन -डॉ.रत्ना वर्मा)
अटल जी जब भी आते
 मेरे लिए खाना लाते 
26 जून 1975 से इंदिरा गांधी द्वारा पूरे देश में आपात्काल लगाते ही कांग्रेस विरोधी राजनैतिक दलों के प्रमुख तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को देश भर के विभिन्न जेलों में बंद कर दिया गया। मेरे बाबूजी (स्व. श्री बृजलाल वर्मा ) भी उनमें से एक थे। आपात्काल के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने अपने जीवन की यादों को डायरी के रुप में लिखना आरंभ किया और उन 22 महीनों में उन्होंने अपने बचपन से लेकर शिक्षा, वकालत, परिवार और फिर राजनीतिक जीवन की घटनाओं को सिलसिलेवार लिखा है। यह जेल डायरी एक प्रकार से उनका जीवन-वृत्तान्त है। रायपुर के अलावा सिहोर, जबलपुर और दिल्ली की जेलों में भी रहे। जेल में रहते हुए उनकी तबियत खराब हो गई थी और उनका एक ऑपरेशन भी हुआ था। दिल्ली सेन्ट्रल जेल में रहते हुए वे इलाज के लिए आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट दिल्ली में भर्ती थे। उस दौरान अटल बिहारी बाजपेयी अक्सर उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने तथा राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चा करने आया करते थे। अपनी जेल डायरी में उन्होंने अटल जी का कई जगह उल्लेख किया है। कुछ अंश यहाँ अटल जी को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है-
आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट दिल्ली
18-12-1976
कल आल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट दिल्ली के स्पेशलिस्ट प्रो. सुरेन्द्र मानसिंह ने मेरी बीमारी की जाँच के बाद बताया कि आपके ऑपरेशन (प्रोस्टेट) के वक्त ही इसमें खराबी आ गई है; अत: फिर से जो नई तकनीक आई है, उससे ऑपरेशन करना पड़ेगा, लेकिन हम कह नहीं सकते कि हमें इसमें सफलता मिल ही जाएगी। उनके अनुसार वे पुन: ऑपरेशन के पक्ष में नहीं दिख रहे थे; इसलिए जवाब दे दिया कि दो चार दिनों के बाद मुझे छुट्टी दे दी जाएगी। मैंने सोचा था देर से ही सही भारत के इस सबसे बड़े और अच्छे अस्पताल में मेरा जब इलाज होगा, तो मेरी तकलीफ दूर हो जाएगी; पर यहाँ भी भाग्य ने मेरा साथ नहीं दिया। लगता है मुझे सारा जीवन इसी हालत में बिताना पड़ेगा।
मेरी बीमारी को लेकर परिवार वालों ने रायपुर में ऑपरेशन न कराने की बात कही थी। चीफ मिनिस्टर सेठी ने भिलाई अस्पताल में इलाज व ऑपरेशन के लिए भी कहा था, पर चूँकि वहाँ सरकारी अस्पताल नहीं है ,अत: यह संभव नहीं हो सका। भला एक मीसा बंदी स्वतंत्र रूप से प्राइवेट अस्पताल में कैसे इलाज करा सकता था? अंत में रायपुर में ही डॉ. तिवारी ने अपने ढंग से सावधानी बरतते हुए ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद असिस्टेण्ट डॉ. अग्रवाल (एम. एस.) ने बताया कि मेरे ऑपरेशन में बहुत परेशानी हुई है, पता ही नहीं चलता था कि प्रोस्टेट ग्लैन्ड कहाँ है? बड़ी मुश्किल से प्रोस्ट्रेट ग्लैन्ड दिखे और ऑपरेशन किया गया। खून भी बहुत बहा ,जो कि साधारण तौर से नहीं बहता। इसके बाद यूरिन बूँद-बूँद टपकता ही रहता था, जिसका इलाज मेरे ऑपरेशन में हुई गड़बड़ी के कारण संभव ही नहीं दिख रहा था।
अब मैं बड़ी आशा से आल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट दिल्ली में इलाज के लिए आया, पर यहाँ भी जवाब मिल गया कि वे मुझे अच्छा नहीं कर सकते। मैं तो सरकार को ही इसका दोषी मानता हूँ,  मेरे मन के मुताबिक जहाँ मेरा विश्वास था, वहाँ के अस्पताल या डॉक्टर से इलाज कराने से इंकार कर दिया जबकि चीफ मिनिस्टर हुक्म दे सकते थे, भिलाई में इलाज के लिए। जिस तरह से इस समय मेडिकल इंस्टिट्यूट दिल्ली में भेजा गया है उस समय भी भिलाई भेजा जा सकता था,  मेडिकल इंस्टिट्यूट दिल्ली भी पूर्ण रूप से सरकारी नहीं है, जब यहाँ इलाज हो सकता है तो भिलाई में क्यों नहीं हो सकता था। पर उन्हें तो मुझे तंग करना था, सताना था।
मेरे साथ जो हुआ, यह राजनैतिक बैर हैं, दुश्मनी है ,जो एक प्रजातांत्रिक देश में नहीं होना चाहिए, किसी भी शासन को अपने विरोधियों के साथ गलत व्यवहार या गलत सलूक नहीं करना चाहिए। विचारधाराओं में अंतर होता है, कार्य करने की रूपरेखा तथा देश को किस दिशा की ओर ले जाना है इसमें अंतर रहता है, लेकिन कोई व्यक्तिगत द्वेष या दुश्मनी नहीं होती। यह हमारा दुर्भाग्य है कि यह देश ऐसे लोगों के हाथ में पिछले 30 वर्षों से है जिसने देश को शासन को अपनी बपौती बना लिया है।
18-12-1976
आज अटल बिहारी वाजपेयी जी मुझसे मिलने अस्पताल आये। इससे पहले भी वे तीन-चार बार आकर मिल चुके हैं। उन्होंने बताया कि करुणानिधि सभी विरोधी दलों की मीटिंग करके इस मीसा तथा आपात्कालीन स्थिति का अंत करने हेतु चर्चा कर रहे हैं। सभी विरोधी दलों के नेताओं ने एक प्रस्ताव पास भी किया।  यह भी जानकारी दी कि इसी के बाद दूसरे दिन दिसंबर की 16 और 17 तारीख को पाटिल द्वारा बुलाई गई चारों विरोधी दलों कांग्रेस (पुरानी), जनसंघ, भारतीय लोक दल तथा समाजवादी पार्टी  के सभी प्रमुख लोग जो बाहर थे मिले और इस निश्चय पर पहुँचे कि हम सब एक दल में शामिल हो जाएँगे। अपनी-अपनी कार्यकारिणी में भी इसका प्रस्ताव पास कर लेंगे और उसका नाम 'जनता कांग्रेस’ होगा। इस नए दल का  झंडा दो रंग का होगा -ऊपर केसरिया नीचे हरा तथा बीच में हल और चक्र होगा। इस पर सब लोग एक मत हो गए। सिद्धांतों पर भी एकमत हो गए तथा कार्यक्रमों पर भी कोई मतभेद नहीं रहा। इसकी जानकारी जयप्रकाश जी को देने के लिए एक व्यक्ति चला भी गया है;  लेकिन इस नई पार्टी के अध्यक्ष, सेक्रेटरी के संबंध में साफ बात नहीं हुई । इस बारे में अटल जी से मालूम हुआ कि जहाँ तक मुझे जानकारी है, भारतीय लोकदल के मुखिया चौधरी चरणसिंह को ही अध्यक्ष बनाएँगे तथा जनसंघ के किसी नेता को जनरल सेक्रेटरी, बाकी सभी दलों के लोगों को भी एक- एक पद दिया जाएगा। इसका ऐलान होना अभी बाकी है, क्योंकि ऐलान करने में कांग्रेस कई तरह की बाधाएँ खड़ी कर सकता है। उन्होंने बताया कि समाचार पत्रों में भी यह जानकारी भेज दी गई है।  मीटिंग में सभी का रूख अच्छा था ।सभी एक होने के मत में थे। समाजवादी यह चाहते थे कि उनका नाम पार्टी के नाम के साथ आ जाए।
जनसंघ का रुख खुलकर सामने आया कि चाहे जो भी नाम हो, चाहे जैसा भी झंडा हो सबको एक मंच पर आना जरूरी है। अब देखना यह है कि इसका ऐलान कब किया जाता है
 चारों दलों में एकता तथा एक पार्टी वाली बात सबसे पहले चरणसिंहजी ने की थी, वे उस बात पर अड़े थे कि सब अपना-अपना अस्तित्व खत्म करके एक नया दल बना लें ,जिसमें मैं जरा भी कोई अडंग़ा नहीं डालूँगा, मुझे न कोई पद चाहिए न ही कोई शर्त ही रखूँगा; लेकिन जब इस पर सब राजी हो गए, तो उन्हीं ने पद के संबंध में सबसे ज्यादा अडंग़ा डालाकि किसे मिलाएँ और किसे न मिलाएँ। जनसंघ या आर.एस.एस. की क्या रूपरेखा होगी, इस पर बहुत ज्यादा तूल दिया । इसे लेकर जयप्रकाशजी को बड़ी पीड़ा हुई। उसी प्रकार से समाजवादी दल ने भी अपने प्रतिनिधित्व तथा अपनी पार्टी के प्रोग्राम व समाजवाद के नाम पर कई प्रकार का उल्लेख करके एकता में बाधा डाली। कांग्रेस (पुरानी)  ने भी अपने नाम को किसी भी कीमत में छोडऩा नहीं चाहा और यही कहते रहे कि सभी कांग्रेस में शामिल हो जाएँ। इन्हीं सबके कारण एकता होने में इतनी देर लगी। मैं समझ सकता हूँ कि इस कारण से हमारे समर्थक तथा पार्टी के लोगों को, जो जेल के भीतर और बाहर हैं, उन्हें भी बहुत पीड़ा हुई होगी। कई तो इन्हीं मतभेदों या विवाद के कारण इंदिरा कांग्रेस में चले गए। आम जनता में भी इस बात की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही।
 अगर हम चारों विरोधी दल इस आपात्काल व मीसा के विरोध में दृढ़ होकर एक पार्टी जल्द बनाकर ऐलान कर देते, तो लोगों को, कार्यकर्ताओं को बहुत बल मिलता और संगठन की शक्ति बहुत ज्यादा ताकतवर तथा प्रभावशाली होती। हमने अपने 30 वर्ष यूँ हीं गवाँ दिए और कांग्रेस (सत्ता) के खिलाफ एक अच्छा मोर्चा नहीं बना पाए, इसी से जनमानस में हमारा अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। जब भी हमने मोर्चा बनाया जैसे गुजरात, जबलपुर, भोपाल में लोगों ने साथ दिया, पर यह कमजोरी हम विरोधी दलों की ज्यादा है कि हमने अपना रूप जनता के सामने अच्छा नहीं रखा, इसीसे मात खाते रहें। अब  जयप्रकाश सरीखे नेता हमारे मार्गदर्शन के लिए आगे आएँ हैं। इसी तरह आचार्य जे.बी. कृपलानी, मुरारजी भाई और अटल जी जैसे स्वाभिमानी और प्रतिभाशाली जन नेता हमारे साथ हैं तथा सारा युवा वर्ग भी साथ में है, तो फिर काहे का डर। सब एक होकर एक बड़ी ताकतवर पार्टी  बन जाएँ, तो इस अन्यायी शासन, नौकरशाही और तानाशाही प्रवृत्ति  को खत्म करने से हमें कोई नहीं रोक सकता।
आखिर हमने प्रजातंत्र के लिए ही आजादी की लड़ाई लड़ी है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने प्रजातंत्र को ही आगे बढ़ाकर ग्राम स्वराज्य तक ले जाने पर जोर दिया और उसी नारे की बदौलत सारे ग्रामवासियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में तन- मन- धन से साथ दिया किग्राम स्वतंत्र होगा, प्रजातंत्र का असली रूप विकेन्द्रीकरण के रूप में ग्राम-ग्राम में घर-घर में दिखेगा।  संविधान के इस संशोधन ने तो हमारा सारा नागरिक मूलभूत अधिकार ही खत्म कर दिया है, साथ ही न्याय पालिका को भी भ्रष्टकरके उसके अधिकारों को छीनकर सारा अधिकार कार्यपालिका को देकर संविधान का पूरा असल ढाँचा ही बदल दिया।
22-12-1976
कल मुझे अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाना है। यहाँ  मुझे एक माह रखा गया और अंत में यही पाया कि पहले ही ऑपरेशन के वक्त जो गलती हुई है वह अब सुधारा नहीं जा सकता। दूसरे ऑपरेशन में रिस्क है; इसलिए नहीं किया गया। अब मुझे रबर का बैग हमेशा पहने रहने पड़ेगा। इस मीसा ने हमेशा के लिए मुझे एक  बीमारी दे दी है। वह जिंदगी भर मुझे याद रहेगी। इसे मैं अपना दुर्भाग्य कहूँ या सरकार की ओर से ज्यादती कहूँ,  क्योंकि मेरी इच्छा के मुताबिक जहाँ मुझे इलाज कराना था, वहाँ इलाज कराने नहीं दिया गया, जबकि मनुष्यता के नाते यह किया जाना चाहिए। पर इस सरकार में जो मुख्य पदों पर आसीन है, उन्हें मनुष्यता छू तक नहीं गई है और आम नागरिक को और खासतौर से अपने से विरोधी विचार वालों को तो वे आदमी समझते ही नहीं।
आज डॉ. मानसिंह  मुझसे मिलने आए और बड़ी हमदर्दी के साथ कहा कि 'मैं आपकी कुछ भी मदद करने में असमर्थ रहा, मुझे दु:ख है कि आप इतनी दूर आशा से आए, निराश होकर जा रहे हैं। ’ फिर उन्होंने मुझे यू.एस.ए. का पता तथा उसका विवरण भी दिया तथा लंदन का भी पूरा डिटेल दिया; क्योंकि वहाँ का जो यूरिन बैग आता है ,वह अच्छा रहता है, ज्यादा दिन टिकता है।  डॉक्टर मानसिंह ने एक अच्छे डॉक्टर होने का फर्ज अदा किया और मुझे भी पूर्ण संतोष हुआ कि उन्होंने मेरी जो जाँच की है ,उसमें न कोई जल्दबाजी की है और न किसी किस्म की लापरवाही ही की है।
मैंने अपने इस इलाज संबंधी बातों को लेकर गृह विभाग दिल्ली तथा अपने प्रान्त के मुख्यमंत्री पं. श्यामाचरण शुक्ला और चीफ सेक्रेटरी को भी पत्र भेजा है कि मुझे किसी और जगह, जहाँ इसका इलाज हो सकता है भेजा जाए, चाहे वह जसलोक अस्पताल  बंबई हो या फिर मुझे इलाज के लिए जेल से मुक्त कर दिया जाए ,जिससे मैं कहीं भी जाकर अपना इलाज करा सकूँ। देखे सरकार क्या करती है। मुझे तो उनसे कोई आशा नहीं है कि वे कुछ इस ओर ध्यान देंगे।
22-12-1976
 शाम को 5 बजे माननीय अटलजी मेरे पास पुन: आए और उन्होंने बतलाया कि डॉ. मानसिंह का कहना है किजो मेरी शिकायत प्रोस्टेट ग्लैन्ड संबंधी थी, उसे ठीक कर दिया गया है। यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है? इतना बड़ा डॉक्टर ऐसी झूठी बात इतने बड़े आदमी से कैसे कह सकता है। जबकि 4 घंटे पहले ही उन्होंने मुझे यही कहा कि वे उसे ठीक नहीं कर सकते, क्या अटलजी को सुनने में गलतफहमी हुई। देखें कल मैं उनसे तथा एम.एस. से मिलकर चर्चा करूँगा तभी बात साफ होगी।
 23-12-1976 को मेडिकल सुपरिटेण्डेण्ट ने मुझे बुलाया तथा मुझसे मेरी दरखास्तों के संबंध से बात की, जो कि मैंने होम मिनिस्ट्री सेंटर तथा म.प्र. के चीफ मिनिस्टर को भी दी है, इन्हीं के जरिये वहाँ भेजेंगे। कहा है तथा मुझे एक हफ्ता और अस्पताल में रहने के लिए कहा। 
23-12-1976
आज एम.एस. से मिलकर आने के बाद कुछ सुस्ती के कारण लेटा हुआ था, तभी करीब 11.30 बजे मेरे सामने राजमाता विजया राजे सिंधिया ग्वालियर मुझसे मिलने आईं। यहाँ एक और राजा बीमार है, उन्हें वे देखने आई थीं,  जब उन्हें मालूम हुआ कि मैं भी यहाँ हूँ, तो वे मेरे पास भी पहुँचीं। खड़े-खड़े ही उन्होंने दो तीन मिनट बात की और कहने लगी कि उन्होंने  राजनीति छोड़ दी है, ऐसा उनके गुरु ने आज्ञा दी है। मैंने इसका विरोध किया और कहा कि ऐसा हो नहीं हो सकता। आपको साथ में चलना होगा पर वे नहीं- नहीं ही कहती रहीं। मैंने जब कहा कि ईश्वर हमारा साथ देगा, ऐसा करना और सरकार की कार्यवाही के कारण डरकर चुप्पी साध लेना तथा गुरु की आज्ञा की आड़ लेने को मैं सिर्फ एक बहाना ही मानता हूँ। क्या गुरु इस प्रकार से आज्ञा देंगे ,जिसमें यह कहा जाएगा कि अन्याय, अत्याचार का विरोध करने के बजाय चुप बैठ जाओ। हम डरकर भय से, चुप्पी साध लें, वह कहाँ तक ठीक है। मैं दो तीन मिनट में क्या बात करता और मैं कटु बात भी नहीं कहना चाहता था; क्योंकि मैंने उन्हें पूज्य माना है और बड़ा माना है।
 एक समय था कि हमें उन्होंने ही आश्वासन, प्रोत्साहन व साहस दिया था कि हम एक अत्याचारी चीफ मिनिस्टर पं. द्वारका प्रसाद मिश्र को सत्ता से हटाने में कामयाब हुए थे। मैं राजमाता जी की आज्ञा व आदेश से ही जनसंघ में आया; क्योंकि मैंने नजदीक से जनसंघ को देखा था और पाया था कि यही एक ऐसा भारतीय दल है जहाँ लोग ईमानदारी से नि:स्वार्थ होकर जनहित को मुख्य रूप से ध्यान रखकर कार्य करते हैं। इसलिए मैं अपने सभी साथियों सहित, जनसंघ में खुशी-खुशी दाखिल हुआ। जनसंघ ने हम सब साथियों का उचित सम्मान किया, और अभी भी उनका स्नेह तथा सौजन्य हमारे साथ है। पर ऐसे नाजुक समय में राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राजनीति से अलग होने की बात कहना कुछ ठीक नहीं लगता। वे एक क्षत्रिय नारी हैं तथा समझदार हैं।  इस प्रकार से अत्याचार के आगे अपना सिर झुका देना, कायरता है और कायरता दुनिया में सबसे बड़ा पाप है, जिसे ईश्वर भी क्षमा नहीं करेगा। सार्वजनिक कार्यों में, राजनीति में उतार-चढ़ाव तो होते रहते हैं; पर इस उतार चढ़ाव में जिसने निर्भय होकर दृढ़ता से उसका मुकाबला नहीं किया, सामना नहीं किया, कायरता दिखलाई, वह मानव धर्म के विरुद्ध है, ऐसे ही कारणों से हिन्दू धर्म का नाश हुआ है, राष्ट्र में हमारी गौरवशाली परिपाटी थी, संस्कृति थी उसका हनन हुआ, जो हमारा चरित्र था ,उसका नाश हुआ है। अत: हम सबको मिलकर मुकाबला करना होगा। विश्वास है राजमाता जी अपना मत बदल लेंगी। 
मनुष्य की परीक्षा अच्छे दिनों में नहीं, खराब दिनों में ही, मुसीबतों में ही होती है। सुख के तो सभी साथी होते हैं; पर जो दु:ख में मुसीबत में साथ रहे, वही साथी है। यह बात जरूर है। शुरू में राजमाता जी ने जब शासन का विरोध किया था तो दृढ़ता तथा वीरता का परिचय दिया था और तब हम सब भी इनके साथ आ गए। अब जबकि देश की हालत अत्यंत शोचनीय है, हमारा अस्तित्व ही खतरे में है, हमारी स्वतंत्रता ही खत्म कर दी गई है, हमारे अधिकार से खत्म हो गए, तब इनका मुकाबला न करके उससे विमुख होना कायरता है।
(जनसंघ, कांग्रेस (0), भारतीय क्रांति दल,
समाजवादी पार्टी ने मिलकर बनाया एकदल)
भारतीय जनता पार्टी का जन्म प्रजातंत्र की रक्षा व तानाशाही को खत्म करने के लिए हुआ है। 'राष्ट्रपिता गाँधी जी’ के बतलाए मार्ग सत्य और अहिंसा पर चलते हुए, जिसमें उन्होंने कहा है कि जनहित, देशहित, प्रजा के अधिकारों की रक्षा के लिए मनुष्य को अपना सब कुछ बलिदान कर देना चाहिए। जब तक मनुष्य में आत्मशक्ति, स्वाभिमान, अत्याचार और अनाचार, अन्याय का विरोध करने की शक्ति नहीं है, वह मनुष्य नहीं जानवर है। जो मनुष्य अत्याचार, अन्याय देखकर चुप हैं, उससे ज्यादा पापी और कोई नहीं है। हमें अन्याय के प्रतिकार के लिए बलिदान देना होगा। सत्य और अहिंसा, कमजोरों का नहीं वीरों का अस्त्र है, निर्भय, ताकतवर व स्वाभिमानों का अस्त्र है।  जनता पार्टी का आधार यही है, इसी रास्ते से चलते हुए हमारी योजना बनेगी तथा कार्य होंगे। 
28-12-1976
आज शाम लगभग साढ़े छह बजे अटल जी पुनः मुझसे मिलने आए, पिछले सप्ताह वे दिल्ली से बाहर थे, अत: 5-6 दिनों से मिलने नहीं आ पाए थे; अन्यथा वे दो चार दिनों के अंतराल में मुझसे मिलने अस्पताल आ ही जाते हैं, साथ ही बहुत प्रेम से मेरे लिए कुछ न कुछ खाने की वस्तुएँ भी लाते हैं।  उनके दिल में मेरे प्रति कितना प्यार है, यह मुझे महसूस होता है। इतने बड़े भारतीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नेता का प्रेम पाकर मैं अपने को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ। उनका सहज, सरल स्वाभाविक रूप आत्मीयता व बड़प्पन का परिचय देता है। मैं उनका हमेशा आभारी रहूँगा। पिछली बार जब वे आए थे, तो उन्होंने मुझे चारों पार्टी के मिलने का शुभ समाचार दे ही दिया था। आज उन्होंने बताया कि इन चारो दलों के एक होने के संदर्भ में जो वैधानिक कार्यवाही, कार्यकारिणी समिति में पास करने को लेकर है, वह भी 15 दिनों में पूरी कर ली जाएगी।  कांग्रेस के नाम को लेकर लोगों में कुछ हिचक है; लेकिन देश व पार्टी के सामने जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं; उसे देखकर बीमारी दूर करने के लिए जिस प्रकार डॉक्टर की दी हुई कड़वी दवाई हम खुशी से पीते हैं ,उसी तरह इसे भी पी लेना होगा। सबका एक मन से एक होना देशहित में जरूरी है। झंडा दो रंग का केसरिया और हरा रहेगा ।जिसके बीच में चक्र और हल होगा। नाम होगा जनता कांग्रेस। आदर्श, गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य का होगा अर्थात राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक रूप से सत्ता का पूर्णरूपेण विकेन्द्रीकरण। प्रजातंत्र की रक्षा करना बुनियादी कदम होगा, जिसके लिए हम सभी चारों दलों को एक होना अत्यंत आवश्यक है।
करुणानिधि द्वारा पार्टी के मुद्दे तय करने के लिए जो मीटिंग बुलाई गई थी। उसमें कहा गया कि श्रीमती इंदिरा गाँधी से बात करें, उन्होंने यह भी बताया कि अशोक मेहता जी ने पार्टी की ओर से बात करने हेतु प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था, परंतु प्रधानमंत्री का जवाब निराशाजनक था। जानकारी मिली कि प्रधानमंत्री बात करने को राजी नहीं हैं तथा वे चाहती हैं कि यदि हम उनके किसी भी कार्यक्रम का विरोध न करते हुए उनका समर्थन करेंगे ,तब वे बात करेंगी। तब विरोधी पार्टियों ने इसका जवाब भी भेज दिया कि प्रधानमंत्री अगर बिना शर्त बात करने को तैयार हों ,तभी हम लोग (विरोधी दल) बात करने को तैयार हैं।
हमें आशा थी कि पिछले दिनों पवनार आश्रम में जो तीन दिवसीय सर्वोदय सम्मेलन आचार्य विनोबा भावे के निर्देशन में हुआ, उसमें कुछ हल निकलेगा पर; उन्होनें भी साफ जवाब दे दिया कि सर्वोदयी लोग राजनीति में भाग लिये बगैर जनहित का कार्य करेंगे। इस तरह आचार्य भावे ने अपने को इस मामले से अलग-थलग कर लिया। जबकि वे उक्त सम्मेलन का मसविदा तैयार करके इंदिरा गाँधी से मिलने के लिए भटकते रहे थे, पर इंदिरा गाँधी के पास उनकी बात सुनने के लिए वक्त नहीं था। इसके बाद दूसरे सम्मेलन की भी चर्चा चली पर उसकी भी सुनवाई नहीं हुई। फिर आचार्य जी ने गोवध रोकने के लिए आमरण अनशन का एलान किया, उनके समाचार पत्र में इस अनशन का समाचार प्रकाशित हुआ। इस पर पुलिस ने आश्रम को घेर कर तलाशी ली व समाचार पत्र जब्त कर लिया।  लेकिन विनोबा जी तब भी चुप रहे, और अब तो उन्होंने हमेशा के लिए अपने को तमाम  विचारों तथा तर्क करने से अलग कर लिया।
कम्युनिस्ट सी.पी.आई. भी कांग्रेस के साथ थी, लेकिन इंदिरा गाँधी ने मतलब निकलते ही उन्हें भी जवाब दे दिया। दोनों एक दूसरे का उपयोग करके अपना-अपना काम साधना चाहते थे, सी.पी.एम. ने अच्छा किया जो उन्होंने स्वयं को दूर रखा पर सी.पी.आई. ने सरकार को आँख मूंदकर समर्थन करके अपनी दुर्गति कर ली, आखिर में उसी सरकार ने उसे लात मार दिया। डी.एम.के. भी अब सँभल गया है, ऐसा लगता है ;पर देखे वह विरोध में कहाँ तक टिकता है। अकाली दल तो साथ में रहेगा ही।
 1970 में पुराने कांग्रेस से अलग जो पार्टी बनी, उस नई कांग्रेस ने सत्ता के बल पर इंदिरा कांग्रेस बना लिया और उसे ही असली कांग्रेस का रूप दे रही है, जो कि धोखा है और आमतौर से झूठा बयान है। हिन्दू  महासभा के नेता स्वामी श्रद्धानंद, महामना मालवीय, सावरकर जी जैसे लोगों ने वर्षों आजादी के नाम पर यातनाएँ सही हैं तथा  बलिदान दिया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक के लोग सन् 1921 से 1930 तक लगातार कांग्रेस आंदोलन में साथ रहकर जेल गये। उसके अधिष्ठïता हेडगेवार खुद आजादी के आंदोलन में जेल गये। ऐसे न जाने कितने हजारों लोगों ने बलिदान दिया पर इंदिरा गाँधी ऐसा व्यवहार कर रही हैं, मानों उन्होंने ही सारा बलिदान दिया और बाकी लोगों ने ब्रिटेन का साथ दिया।  जबकि सत्य यह है कि मुस्लिम लींग तथा कम्युनिस्टों ने 1942 में खुलकर अंग्रेजों का साथ दिया तथा गाँधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया। यह ऐतिहासिक सत्य है। उसे भी इंदिरा गाँधी छिपा रही हैं; क्योंकि वे उक्त दोनों दल के साथ मिलकर कार्य कर रही हैं। यह फरेब और झूठ ज्यादा दिन नहीं चलेगा, आज नहीं तो कल ये सारे तथ्य सामने आ ही जाएँगे।
आज इंदिरा गाँधी विरोधी दलों से बातचीत न करके यह कह रहीं हैं कि अपनी माँगों के लिए आपात्काल  के पहले विरोधी दलों ने जो कुछ भी किया, वह सब राष्ट्र विरोधी, गलतव देशद्रोह था, यह कहाँ तक उचित है। वे चाहती तो किसी भी मसले पर चर्चा करके अपना मत रख सकती हैं तथा जिन लोगों ने आगजनी, मारकाट, हिंसा की है उसे सजा दे सकती है, लेकिन अपनी माँगों को लेकर जो अहिंसक आंदोलन था, चाहे वह आंदोलन धरना के रूप में हो, प्रचार के रूप में हो, सभा के रूप में हो, प्रदर्शन या रैली के रूप में हो, उसे राष्ट्र विरोधी कहना बिल्कुल गलत है। एक समय था जब लोगों ने नाज़ी तरीका यूरोप में देखा था, वही सब अब भारत में भी दिखाई दे रहा है।  लेकिन वे जान लें कि प्रचार के सभी साधनों को अपने हक में करके सिर्फ अपना प्रचार कर, अपनी सत्ता मजबूत कर रहीं हैं वह ज्यादा दिनों तक टिकेगा नहीं।  
1-1-1977
आज प्रात: 9 बजे विद्याचरण शुक्ला (राज्यमंत्री केन्द्र शासन) मुझसे अस्पताल में मिलने आए। 15-20 मिनट  मुझसे बातचीत की और कहा कि मेरी बीमारी तथा मेरी समस्या के संबंध में वे अपने बड़े भाई पं. श्यामाचरण शुक्ला मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश से चर्चा करेंगे, जो कि आज-कल में दिल्ली आ रहे हैं। विद्याचरण का मत था कि ऐसी बीमारी की स्थिति में सरकार को मुझे रिहा कर देना चाहिए; क्योंकि जब कई अन्य मीसाबंदियों को, जो बीमार थे रिहा कर दिया गया है, तो फिर मुझे रिहा करने में क्या आपत्ति होनी चाहिए।
मुझे बीमार जानकर वे यहाँ आकर स्वत: मिले, यह उनकी मनुष्यता का परिचय देता है। साथ ही मेरे पिताजी तथा उनके पिताजी के समय से हमारे जो घरेलू संबंध थे, उस नाते भी उनका यहाँ आना उनकी सदाशयता को दर्शाता है। मुझे अच्छा लगा कि पार्टी विरोधी होते हुए भी मानवता के नाते वे मुझसे मिलने आए और मेरा हाल- चाल पूछा। केन्द्र तथा प्रान्त को मैंने अपनी बीमारी के इलाज संबंधित जो दरखास्त दीगई हैं, उसकी कॉपी देने की बात भी वे जाते- जाते कह गए। 
 इधर जेल में आते ही 30-12-1976 से 1-1-1977 तक मैं लगातार हृदय रोग से भी पीडि़त हूँ। 1973 के बाद  फिर से इस प्रकार दर्द हृदय में हुआ, इससे मैं बिस्तर पर पड़ गया था, चलना फिरना बंद हो गया था तथा डॉक्टरों ने 15 दिनों के लिए बिस्तर से उठकर चलने की पूर्ण मनाही कर दी थी।
इस समय भी मैं हृदय रोग के कारण बिस्तर पर पड़ा हूँ, डॉक्टर इलाज कर रहे हैं। जबकि रायपुर में प्रोस्टेट के आपरेशन में जो गलती हुई थी, उसके इलाज के लिए बैंगलोर या बंबई ले जाने की बात मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने सरकार को लिखकर भेज दी थी। लापरवाही के कारण व सही इलाज उपलब्ध न कराने के कारण मैं साल भर से परेशान हूँ। मुझे यह बीमारी जेल में हुई और जेल में रहते हुए ही आपरेशन हुआ, सरकार का फर्ज है कि वह मेरा स्वास्थ्य ठीक रखें। पर सही इलाज के लिए सही जगह भेजने में भी वह कोई रुचि नहीं दिखा रही है।
 7-1-1977
आज शाम अचानक जेल से एक अधिकारी आया और उसने जानकारी दी कि मुझे सरकार ने बिना शर्त एक माह के लिए पेरोल में छोडऩे का आर्डर भेजा है। मैं हृदय रोग से बिस्तर पर पड़ा था, मुझे डॉक्टरों ने 15 दिन तक बिस्तर पर पूर्ण आराम के लिए आज्ञा दी थी, मैं बहुत कमजोरी की हालत में पड़ा था, ऐसी स्थिति में कैसे यह पेरोल का आर्डर? जबकि मैंने पेरोल माँगा भी नहीं था और अब यदि चाहूँ तो भी मेरा स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि मैं अस्पताल से या कमरे से बाहर जा सकूँ। तब मैंने जेल अधिकारी को लिखकर भेजा कि मैं ऐसी हालत में पेरोल पर नहीं जा सकता, यह भी कि जब मैंने पेरोल माँगा नहीं है, तो क्यों दिया गया। जबकि सरकार को तो मैंने यह  लिखा है कि वह मेरा इलाज जहाँ भी इसकी व्यवस्था है, वहाँ कराए या फिर मुझे रिहा करे, जिससे मैं अपनी इच्छा अनुसार इलाज करा सकूँगा। ऐसा न करके वह अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए मुझे पेरोल दे रही है, वह भी एक माह के लिए। यह जानते हुए कि मैं अभी चलने फिरने लायक नहीं हूँ। अत: मैंने जेल सुपरिटेंडेंट को पेरोल में जाने से इंकार का खत लिखित में भेज दिया। साथ ही इसकी जानकारी अस्पताल मेडिकल सुपरिन्टेन्डेण्ट को भी लिखकर दे दिया।
आज ही बलौदा बाजार से मेरे साथी चक्रपाणि शुक्ला भी मेरी बीमारी का हाल सुनकर मिलने आए।
8-1-1977
हार्ट अटैक का समाचार सुनकर अटल जी आज फिर मुझसे मिलने आए। उन्हें इस बात का बड़ा सदमा लगा कि सरकार क्यों इस प्रकार से एक बीमार मीसा निरुद्ध के साथ गलत व्यवहार कर रही है। बिना इलाज की व्यवस्था किए पेरोल का ऑर्डर भेजना उन्हें भी अच्छा नहीं लगा। मेरे यह बताने पर कि  मैंने पेरोल में जाने से इंकार का पत्र सरकार को भेजा है, उन्हें भी ठीक लगा।  उनका भी यही कहना है कि या तो वे इलाज कराने जहाँ भी उचित व्यवस्था है, वहाँ भेजें; क्योंकि उन्हीं की लापरवाही तथा गलती के कारण मैं तकलीफ पा रहा हूँ या फिर रिहा करें, जिससे चाहे जहाँ जाकर इलाज करा सकें। अब देखें केंद्र सरकार की होम मिनिस्ट्री तथा प्रान्त के चीफ मिनिस्टर मेर पेरोल पर न जाने के निर्णय पर क्या रुख अख्तियार करती है।
बाद में जेल अधिकारियों से मुझे यह भी पता चला कि वे मुझे फिर से जबलपुर सेंट्रल भेजने का ऑर्डर 29-12-1976 को भेज चुके थे, फिर अनायास दो दिनों बाद उन्होंने  पेरोल का आर्डर क्यों भेजा ,यह समझ से परे है। अब जो भी हो वे हमें जैसा रखेंगे रहना पड़ेगा। पर यह पूरा विश्वास है कि इस तरह के  अत्याचार पूर्ण व्यवहार व तौर- तरीकों से कोई भी शासन ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकता।
9-1-1977
आज अटल जी का पत्र मिला कि उनकी भी तबियत कुछ खराब है, थोड़ा-थोड़ा रोज बुखार आ जाता है। मुझे बड़ी चिन्ता हुई। मैं सोचने लगा कि कम से कम हमारा एक मुख्य जिम्मेदार आदमी बाहर तो है ,जो कि हम लोगों की समस्या को हल करने में लगे हैं साथ ही अन्य विरोधी दलों तथा जयप्रकाश जी से सम्पर्क कर एक नए दल के निर्माण लगे हैं। आज वे भी बीमार हो गये।
आज यह समाचार भी मिला कि सरकार तथा विरोधी दल के बीच पिछले दिनों जो पत्र व्यवहार हुआ है उससे लगता है कि दोनों इस आपात्कालीन स्थिति  तथा मीसा के राजनैतिक बंदी के मसले को हल करने को तैयार हो गये हैं और बिना शर्त बात होगी यह तय हुआ है। यह एक शुभ संकेत है।
10-1-1977
शाम को 5 बजे तबियत खराब होने के बावजूद अटल जी फिर मुझसे मिलने आए, और सभी राजनैतिक गतिविधियों के बारे में बताया, मेरी तबियत के बारे में भी पूछा। उन्होंने बताया कि चारों दलों का मेल हो जाने में कोई कठिनाई नहीं है, कांग्रेस (पुरानी ) ने कार्यकारणी में एक मत से प्रस्ताव पास कर लिया है तथा मार्च में भारतीय स्तर पर एक सम्मेलन भी रखा है। बी.एल.डी. और समाजवादी भी अपनी कार्यकारिणी में प्रस्ताव पास कर ही कर लेंगे और हम तो राजी ही हैं। आसार अच्छे हैं।
कम्युनिस्टों को तो इंदिरा गाँधी ने अलग कर ही दिया है।  उनके रुख से अब सभी विरोधी दलों को पता चल गया कि इंदिरा गाँधी का राजनैतिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत चरित्र क्या है। वहाँ ईमानदारी की राजनीति नहीं है, सत्ता की राजनीति है।
11-1-1977
पिछले 8-10 दिनों से लगातार समाचार-पत्र में  इंदिरा गांधी द्वारा यह प्रचार किया जा रहा है कि विरोधी दल देश की प्रगति के लिए घातक है। साथ में वे यह भी कह रहीं हैं कि वह प्रजातंत्र को किसी भी हालत में खत्म नहीं करना चाहती। वे तथा रक्षामंत्री बंसीलाल लगातार यह नारा लगा रहे हैं कि देश तभी आगे बढ़ेगा जबकि केन्द्र का शासन शक्तिशाली रहेगा, केन्द्र को ज्यादा से ज्यादा अधिकार मिलेगा तथा संविधान  (फेडरल) संघीय न रहकर केन्द्रीय रूप हो जाए। हमारे देश के जितने भी महान महापुरुष  थे जैसे लोकमान्य तिलक, सुभाष चंद्र बोस, महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानंद, सरदार पटेल, चक्रवर्ती राज गोपालाचार्य, सी.आर.दास तथा सरदार भगत सिंह, आजाद आदि ये सभी राग द्वेष से दूर  निर्भय व्यक्ति थे, अन्याय के प्रतिकार में सबसे आगे रहते थे। वैसे महान लोग अब गिनती के ही रह गए हैं जैसे आचार्य जे.बी. कृपलानी, मोरार जी भाई तथा  अटल बिहारी वाजपेयी एवं चंद्रशेखर आदि। इन्हीं पर आज देश की आशाएँ टिकी हैं। जयप्रकाश नारायण पर सबकी निगाहें लगी हैं, वे यदि हमारे अगुवा तथा मार्ग दर्शक बन जाएँ, तो हमारे बहुत से कार्य सफल हो जाएँगे।
12-1-1977 मध्यप्रदेश की जेलों की याद
इंदिरा गाँधी यह कहकर लोगों में झूठा प्रचार कर रहीं हैं कि कुछ प्रमुख राजनैतिक नेताओं को छोड़कर सभी को छोड़ दिया है। तथा कुछ गिने- चुने लोग ही जेलों में 'मीसा’ के अंतर्गत बंद हैं। लेकिन सत्य यह है कि एक लाख से भी अधिक लोग जेल में हैं। जेलों में उनके साथ जिस तरह से व्यवहार हो रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। इस मामले में मध्यप्रदेश सरकार अन्य प्रान्तों की सरकार से आगे है। वहाँ तो कहीं न कहीं रोज राजनैतिक बंदियों पर लाठियाँ चलती है और शिकायत पर कुछ नहीं होता है। कोई फर्क नहीं। राजनैतिक बंदियों को किस क्लास में रखा जाए ,इसका कोई नियम नहीं। बहुत कम को ए.बी. क्लास दिया गया है। समाज व संस्थानों में जो अच्छे-अच्छे पदों पर है ,जैसे- डॉक्टर, वकील उन्हें सी क्लास दिया गया है। मेरे बारे में खुद आई.जी.जेल ने कहा कि आपके बारे में भी चीफ मिनिस्टर तथा मिनिस्टर कहते हैं कि उन्हें क्यों अन्य कैदियों से ज्यादा सहूलियत देते हो। यह बात मुझसे सिवनी जेल में आईजी ने कहा था।
सिवनी जेल में पं. रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्रा तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस, उनके भाई शरदचंद्र बोस रह चुके हैं वहीं मैं भी था और अपने को भाग्यवान मानता हूँ किजिन महान पुरुषों ने जहाँ अपना जेल जीवन बिताया ,वहाँ मुझे भी रहने का मौका मिला। जिस जेल में कभी प्रतिभाशाली तथा बड़े-बड़े नेताओं को रखने की व्यवस्था थी ,उसे आज तोड़-फोड़ कर एक साधारण जेल बना दिया गया है, वहाँ आज कोई भी सुविधा नहीं है। वही हाल जबलपुर जेल का भी है ,जहाँ कुछ ऐसे स्थान थे जहाँ राजनैतिक बंदियों तथा अंग्रेज बंदियों को रखने की जगह अलग से बनी थी, अस्पताल भी अच्छा था, उसकी भी व्यवस्था सरकार ने खराब कर दी। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के जेलों की जो हालत है, वह सभी प्रान्तों से बदत्तर है। 
18-1-1977
बंबई में आल इंडिया जनसंघ की कार्यकारिणी की बैठक, जो तारीख 22-23 को होगी, उसके लिए मैंने अटलजी के आदेश के अनुसार अपनी भी राय लिखी, तथा महामंत्री त्यागी जी को देने के लिए भेज दिया। यूँ तो मैंने पहले भी अटलजी तथा भंडारी जी से चारों दल, कांग्रेस (0) भारतीय क्रांति दल, समाजवादी तथा जनसंघ के एक होने के बारे में चर्चा कर चुका हूँ, वे मेरे अधिकतर विचारों से सहमत भी हैं, पर समाजवादी तथा भारतीय क्रांति दल जो अलग विचार रखते हैं ,उनपर भी मैंने अपनी राय लिखी है। पद पर तो कोई भी रहे कोई एतराज नहीं ,जब एक होना ही है ,तो कौन किस पद को सँभाले कोई अहम प्रश्न नहीं है। लेकिन सिद्धांतों पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा ,क्योंकि जैसा हम चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति के आधार पर हमारी योजना तथा कार्य करने की शैली बने। जहाँ तक भाषा का सवाल है ,तो हमारा देश ग्रामीणों, कृषकों का है और कम राजनैतिक सूझबूझ वाले हैं; इसलिए ऐसी भाषा का उपयोग करें कि हर ग्रामीण सहजता से उसे समझ सके।
हम समाजवादी शब्द का उपयोग  30-40 वर्षों से करते आ रहे हैं, लेकिन उसके  बाद भी हम उसका सही मतलब बतलाने में असफल रहे हैं, क्योंकि इसका उपयोग कम्युनिस्ट, फासिस्ट, हिटलर मुसौलनी, लेलिन, स्टेलिन माऊ और जवाहरलाल ने भी किया। सभी ने उसका अलग-अलग अर्थ लगाया। अब रूस को खुश करने के लिए इंदिरा गाँधी ने भी उसे अपने संविधान में जोड़ दिया है। अत: हम इसका उपयोग न करें तो अच्छा है, ऐसा मेरा सुझाव है, लेकिन समाजवादी इस पर जोर दे रहे हैं। जबकि हम समझाने की कोशिश कर रहे हैं यह राष्ट्रहित में नहीं है; क्योंकि हमारी जो राष्ट्रीयकृत संस्थाएँ भिलाई, राऊरकेला, दुर्गापुर तथा पेपर मिल, चावल मिल, अनाज का व्यापार है, वहाँ नौकरशाही का राज है। राजाओं का राज भले ही खत्म कर दिया गया है; लेकिन अब सरकारी आई.सी.एस. व बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों के रूप में नए राजा जगह-जगह बैठा दिए गए हैं। इन सबसे देश में सिर्फ गरीबी ही बढ़ रही है फायदा कुछ नहीं हो रहा है। इन्हीं सब कारणों से मैंने गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य वाली छोटे योजनाओं की बात लिखी है।  हम शब्दों और नारों के चक्कर में न पड़े तथा इन सरकारी नौकरशाही की योजनाओं व उनके विचारों में अपना समय नष्ट न करें। हम ग्रामीण देश के निवासी हैं, मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है, अत: इन सब बातों पर विचार करके ही योजना बनाएँ। अब देखना है कि आगे क्या होता है।
 एक पार्टी का ऐलान जयप्रकाश जी जल्दी ही कर देंगे ऐसा विश्वास है। 
(आगामी अंक में जारी)