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Aug 1, 2026

दो संस्मरणः

- अंजू खरबंदा

 1.कपड़े सुखाना भी एक कला है

हाँ, बिल्कुल है! सच्ची! किंग्जवे कैम्प में गली में लोहे की तारें या रस्सियाँ बंधी रहती थीं कपड़े सुखाने के लिए। कुछ महिलाएँ तो जल्दबाज़ी में कपड़े सूखने डालतीं, पर कुछ बड़े ही सिस्टेमैटिक वे में कपड़े सुखातीं।

एक तार पर पुरुषों की सफेद झक्क बनियानें बड़े ही करीने से चमचमातीं, तो दूसरी तार पर पुरुषों की हल्के रंग की कमीज़ें! बीच-बीच में आकर उन्हें अलटा-पलटी करना। फिर एक पंक्ति में जेंट्स के फाटे वाले कच्छे (उस समय यही ट्रेंड हुआ करता था) और दूसरी तार पर पतलूनें। फिर आती लेडिज कपड़ों की बारी। रंग-बिरंगी खूबसूरत सलवार-कमीज।

चुन्नी सुखाना तो हम बच्चों के लिए मानो खेल ही होता। दो बच्चे चुन्नी के दो-दो सिरे लंबाई में पकड़ लेते और गाने- गाते हुए चुन्नी सुखाते।

मेरी एक दीदी चुन्नी सुखाने को चैलेंज की तरह लेती। खूब अच्छे से चुन्नी सुखाना, कोई सिलवट न रहने पाए, उसका कोना-कोना अच्छे से चेक करना कि गीला न रह गया हो। फिर खूब जतन से उसे तह करके सँभालकर रखना। उस ज़माने में हम लोगों के घरों में अलमारियाँ नहीं हुआ करती थीं। हर कपड़े को करीने से तह करके ट्रंक में रखा जाता था।

कई साइज़ के अलग-अलग ट्रंक हुआ करते थे।

सबसे बड़ा ट्रंक मेरी दादी के दहेज का था। उसमें घर भर की रजाइयाँ रखी जाती थीं और दादी के दहेज के पीतल के बड़े बर्तन, जिन्हें साल भर में एक बार कलई जरूर करवाया जाता। वह ट्रंक इतना बड़ा था कि जब सालाना सफाई के लिए उसे बाहर धूप में रखा जाता, तो हम पाँचों भाई-बहन उसमें घुस जाते। तब दादी से खूब डाँट पड़ती।

"नामुराद ओत्रो! ट्रंक भज पोसी!"

और नए कपड़ों का ट्रंक, जिसे मेरी दादी हाथ तक लगाने नहीं देती थीं, जब खुलता, तो हम आसपास मजमा लगाकर खड़े हो जाते और कौतूहल से पूछते,"दादी, हम ये नए कपड़े कब पहनेंगे?"

दादी हर बार एक ही जवाब देतीं, "जब कोई शादी-ब्याह होगा, तब पहनना।"

और कपड़े वहीं पड़े-पड़े छोटे हो जाते और हम मन मसोसकर रह जाते।

सर्दियों में रजाई के उछाड़ यानी गिलाफ धोने-सुखाने में बड़ी मशक्कत हुआ करती थी। बड़े-बड़े गिलाफ धोना कोई बच्चों का हँसी-खेल न था। उसे सोडे के पानी में उबालना, साबुन से कुच-कुच करके धोना, पानी में तब तक अघालना, जब तक साबुन अच्छे से न निकल जाए। फिर नील लगाना। उसके बाद दो लोग आ जाते मैदान में। गिलाफ के दोनों सिरे पकड़कर खूब ज़ोर लगाकर निचोड़ते, ताकि खुली धूप में अच्छे से सूखकर कड़क हो जाए।

वाह! सफेद झक्क रजाई के गिलाफ! आनंद ही आ जाता उसे ओढ़कर।

मेरी दादी की आदत थी एक बड़े थाल में पानी डालकर उसी में एक-एक कपड़ा बड़े जतन से रगड़तीं, फिर उस कपड़े को साथ रखी पानी की बाल्टी में डालती जातीं। थाल का पानी मटमैला हो जाता, पर क्या मजाल जो दादी उस पानी को फेंक दें। जब तक उसमें साबुन की ज़रा-सी भी झाग शेष रहती, दादी उसी में कपड़े रगड़ती रहतीं। आखिरकार उस साबुन वाले पानी का उपयोग घर के पोछे आदि धोने में लाया जाता।

कपड़े धोना यानी पूरी दिहाड़ी उसी में गई।

आजकल तो कपड़े मशीन में डाले और निश्चिंत हो गए। धन्य थे पहले के लोग, जो शरीर से इतना काम लेते थे कि उन्हें न तो किसी जिम की आवश्यकता पड़ी, न ही कभी किसी मेड की!

2 . बाबू मोशाय

लंबा, ऊँचा, गौरवर्णीय बंगाली लड़का। पान की गिलौरी मुँह में दबाए जब बोलता, तो इतनी जल्दी-जल्दी बोलता कि आधी बात उसके मुँह में ही रह जाती।

"चटर्जी भैया, धीरे बोलिए न! आपकी आधी बात तो मुझे समझ ही नहीं आई।"

मैं उनकी बात न समझ पाने पर अक्सर शिकायत करती। मेरी बात सुनकर फिस्स से हँस पड़ते। जब वे हँसते, तो उनके गालों में गड्ढे पड़ जाते। उनकी गहरी काली आँखों पर नज़र जाती, तो यूँ लगता मानो वे भी खिलखिलाकर हँस रही हों... सुंदर, मोहक, मनभावन हँसी।

मेरी बात में शिकायत का लहजा पाकर वे अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर देखते। अपने हाथों से होंठों पर उतर आई पान की लाली पर धीरे से हाथ फेरते। उनका दिल होता, तो अपनी बात फिर से दोहराते, नहीं तो हँसकर निकल जाते। पीछे वाला सोचता ही रह जाता कि बंदे ने बोला, तो बोला क्या। उनकी बोलचाल में बंगाली शब्द बहुत होते, जो हम दिल्ली वालों को भला कहाँ समझ आने वाले थे।

वे दिखने में मस्तमौला टाइप के व्यक्ति थे। जाने उनकी कौन-सी क्वालिटी देखकर उन्हें नौकरी पर रखा गया था। न काम करते, न किसी को करने देते। जब देखो, मजमा लगाकर बैठ जाते और सबका हाथ देखने लगते।

हाँ! हाथ देखते हुए उनका खिलंदड़पन एकाएक दार्शनिक व्यक्तित्व में तब्दील हो जाता। उन्हें हस्तरेखाओं की भरपूर जानकारी थी। बड़ी गहराई से हाथों की रेखाएँ पढ़ा करते।

उन्हें रत्नों की भी बेहद गहरी समझ थी और उनकी खूब पहचान भी थी। एक नज़र देखते ही समझ जाते कि कौन-सा रत्न असली है और कौन-सा सिर्फ पत्थर!

एक बार मैंने भी उत्सुकतावश अपना हाथ दिखाया। मेरा हाथ देख उन्होंने जो-जो भी बताया, उसे सुनकर मैं खूब हँसी; पर भविष्य में एक-एक बात शत-प्रतिशत सच साबित हुई। जब-जब उनकी बात सच सिद्ध होती, तब-तब वे शिद्दत से याद आते। बीस-तीस बरस आगे का भविष्य बातों ही बातों में बता देने वाला वह शख्स पता नहीं आज कहाँ है।

उनकी मीठी यादें मेरी ज़िंदगी के ख़ज़ाने का अनमोल हिस्सा हैं और उनसे अपनी शादी के लिए बंगाल से मँगवाई एक बंगाली साड़ी भी, जिसे आज भी सबसे ज़्यादा खुशी से पहनती हूँ।

सम्पर्कः 207, द्वितीय तल, परमानंद कॉलोनी, दिल्ली – 110009, मो. 9582404164

May 1, 2026

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

 - अंजू खरबंदा

ढक्का गाँव की एक गली से

गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी

पार्क की एक बेंच पर बैठी

दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…

मग्न थीं वे

अपने सुख-दुःख बाँटने में,

जैसे समय ठहर गया हो

उनकी बातों के आसपास!

उम्र के इस पड़ाव तक

आते-आते

कितने विषय होंगे उनके पास,

कितनी कहानियाँ, 

कितनी उपलब्धियाँ!

जो किसी किताब में दर्ज नहीं!

उनके चेहरे की झुर्रियों ने

सहे होंगे जीवन के

अनगिनत थपेड़े,

हर लकीर एक किस्सा 

कहती होगी,

इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते

एक लंबा इतिहास

बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,

उम्र बढ़ने के साथ-साथ

तजुर्बा भी गहराता गया,

कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर

जीवन को गति देती रहीं 

वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

Nov 2, 2025

चिंतन- मननः जीवन की सुंदरता

 - अंजू खरबंदा  

मनुष्य का मन एक अद्भुत साधन है- विचारों का महासागर। इसी से सभ्यताएँ जन्म लेती हैं, इसी से ज्ञान का प्रवाह होता है और इसी से जीवन दिशा पाता है; लेकिन जब यही मन अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगे, तो सृजन का स्रोत ही पीड़ा का कारण बन जाता है। यही स्थिति है ओवरथिंकिंग की!

‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ (भगवद्गीता – अध्याय 2, श्लोक 66)

इसका विस्तृत अर्थ है –‘जिसका मन अशांत है, उसे सुख कहाँ से प्राप्त हो सकता है?’

यह श्लोक गीता का अत्यंत गूढ़ संदेश देता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब तक मन स्थिर और शांत नहीं होगा, तब तक कोई भी व्यक्ति सच्चे सुख, ज्ञान या आनंद को अनुभव नहीं कर सकता। बाहरी वस्तुओं से मिलने वाला आनंद क्षणिक होता है, किंतु मन की शांति ही स्थायी सुख का स्रोत है; इसीलिए ओवरथिंकिंग के संदर्भ में यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है। जब मन निरंतर विचारों, चिंताओं और कल्पनाओं में उलझा रहता है, तो वह 'अशांत' हो जाता है। उस अशांत मन में सुख, आनंद या स्वास्थ्य का निवास संभव नहीं। गीता का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि मन को शांत करना ही जीवन को सुंदर बनाना है। जब विचारों का शोर कम होता है, तभी भीतर की आत्मा की आवाज़ सुनाई पड़ती है।

इस तरह कहा जा सकता है कि ओवरथिंकिंग मन की जड़ता है। जिस प्रकार कोई मशीन लगातार चलते-चलते थक जाती है और धीमी पड़ जाती है, उसी प्रकार निरंतर चिंतन मन को बोझिल और निष्क्रिय बना देता है। इसका परिणाम है- अनिद्रा, सिरदर्द, चिंता, चिड़चिड़ापन और कई शारीरिक बीमारियाँ। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि अधिकतर बीमारियों की जड़ मानसिक असंतुलन और तनाव ही है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इससे बचा कैसे जाए? 

उत्तर सरल है जितना छोड़ना सीखेंगे, उतना स्वस्थ रहेंगे। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि हर परिस्थिति को वह नियंत्रित नहीं कर सकता। कई बार हालात को स्वीकार करना ही समाधान होता है। यदि हम हर छोटी घटना पर बार-बार विचार करेंगे तो मन पर बोझ बढ़ेगा; लेकिन यदि उन्हें सहज भाव से छोड़ देंगे, तो मन हल्का रहेगा। सोचिए, पर उतना ही जितना ज़रूरी हो।

सोचना मानवीय क्षमता है और जीवन के विकास का आधार भी! योजनाएँ बनाना, निर्णय लेना, भविष्य के लिए तैयारी करना-ये सब सोच पर ही निर्भर है; लेकिन जब यही सोच आवश्यकता से अधिक हो जाए, तो यह क्षमता विनाशकारी रूप ले लेती है। जैसे नमक भोजन का स्वाद बढ़ाता है पर आवश्यकता से अधिक होने पर स्वाद बिगाड़ भी देता है, ठीक वैसे ही सोच भी सीमित हो तो लाभकारी होती है और असीमित हो तो हानिकारक!

आधुनिक मनोविज्ञान यह बताता है कि ‘स्वस्थ मन ही स्वस्थ शरीर की चाबी है।’ यदि मन संतुलित, शांत और प्रसन्न है तो शरीर में भी सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इसलिए ध्यान, योग, प्राणायाम, संगीत, लेखन या प्रकृति के बीच समय बिताना ओवर थिंकिंग को कम करने के सरल उपाय हो सकते हैं। अंततः जीवन का सार यही है वर्तमान क्षण को जीना! जो बीत गया उसे पकड़कर बैठना व्यर्थ है, और जो आने वाला है उसकी अनिश्चितताओं पर चिंता करना भी निरर्थक है । संतुलित विचार ही जीवन की दिशा बदलते हैं। याद रखिए 'मन को जितना हल्का रखेंगे, जीवन उतना ही सुंदर और स्वस्थ होगा।'

उपनिषद् का एक संदेश है : ‘शान्तो दान्त उपरतः तितिक्षुः समाहितो भवति’ (जो शांत, संयमी और सहनशील है, वही समाहित होकर सत्य को प्राप्त करता है।)

अतः स्वस्थ मन केवल स्वस्थ शरीर की ही नहीं, बल्कि मुक्त आत्मा की भी चाबी है। जब मन ओवरथिंकिंग के बोझ से मुक्त होता है, तभी भीतर का सच्चिदानंद स्वरूप प्रकट होता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है मुक्ति का मार्ग भीतर से ही निकलता है :

* छोड़ना एक साधना है। जिस बात का हल नहीं, उसे मन में बार-बार दोहराना केवल बोझ है।

* ध्यान और मौन विचारों की धारा को थामते हैं और आत्मा को चमकने का अवसर देते हैं।

* योग और प्राणायाम मन को अनुशासन में रखते हैं जैसे घोड़े की लगाम।

* सत्संग और अध्यात्म हमें यह स्मरण कराते हैं कि हम केवल शरीर-मन नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा हैं।

जैसे नदी अंततः सागर में मिलकर अपनी बेचैनी खो देती है वैसे ही मन जब आत्मा में विलीन होता है तब उत्तम स्वास्थ्य और सुख प्रकट होता है।

Dec 1, 2024

संस्मरणः मेरी, वे दो शिक्षिकाएँ

  - अंजू खरबन्दा

1-बत्रा आंटी

सरकारी विद्यालयों में पहली से पाँचवीं तक एक ही अध्यापिका रहती थी। हर कक्षा उत्तीर्ण होने के साथ- साथ वह अध्यापिका भी हमारे साथ अगली कक्षा में आ जाती । मेरी प्रथम अध्यापिका रही बत्रा आंटी ।

हाँ हम उन्हें आंटी ही पुकारा करते। बुआजी बताती हैं कि पहले उन्हें बहनजी कहा जाता था, वक्त बदला, तो वे आंटी कहलाने लगी और काफी बाद में जाकर वह मैडम कहलाईं।

उस समय हम लोग टाट- पट्टी पर बैठा करते थे। एक कक्षा में कुछ- कुछ  दूरी पर चार- टाट पट्टियाँ बिछी थीं। रोल नंबर के अनुसार हमारी बारी होती कक्षा की सफाई की । रोज दो लड़कियाँ इस कार्य को दक्षता से करतीं व बत्रा आंटी की शाबाशी पातीं । उनकी शाबाशी पाना मानो मैडल जीतना! पूरा दिन खुशी व गर्व से बीतता कि आज हमारे हिस्से उनकी शाबाशी आई ।

बत्रा आंटी सुबह जब कक्षा में प्रवेश करतीं, तो सब बच्चे खड़े होकर अभिवादन स्वरूप जोर से चिल्लाते-"कक्षा स्टैंड"

वह प्यारी सी मुस्कान बिखेरती हुई कहती

"बैठ जाओ!’’

फिर शुरू होता क्रम अपनी- अपनी तख्ती दिखाने का ।

मोतियों जैसी लिखावट होने के कारण मुझे हमेशा शाबाशी ही मिलती। लिखावट में मुझे पुरस्कार भी मिला था। उस समय पुरस्कार स्वरूप टूथब्रश और पेन मिला करते थे। 

हमारे समय चार विषय ही हुआ करते- गणित, विज्ञान, हिंदी और सामाजिक विज्ञान।

पहाड़े याद करने के लिए हम सभी बच्चे जितना दम लगाकर बोल सकते, उतनी जोर- जोर से चिल्लाते हुए पहाड़े बोलते-

दो एकम दो

दो दूनी चार 

दो तिया छह....

फिर हिंदी के दोहे याद कर खूब जोर- जोर से बोले जाते, ताकि अच्छे से कण्ठस्थ हो जाएँ। लगभग सभी कक्षाओं से ऐसी ही आवाजें आया करतीं ।

खुले- खुले हवादार कमरे और खिड़की के बाहर लगे हरे- भरे वृक्ष। बड़ा ही रमणीक दृश्य होता था, सरकारी स्कूल का उस वक्त।

बत्रा आंटी के साथ मेरा गहरा लगाव रहा । उनका सरल व्यवहार व प्रेमपूर्वक सभी बच्चों पर ध्यान देना इसका कारण हो सकता है। मुझे स्वतंत्रता शब्द बोलने में बड़ी मुश्किल आई तब बत्रा आंटी ने मेरे हाथ में चॉक देते हुए कहा- ‘‘बार- बार बोर्ड पर लिखो और ध्यान से पढ़ते हुए ये शब्द दोहराओ।" 

जाने कौन- सा जादू हुआ कि कुछ ही देर में मैं स्वतंत्रता शब्द बिना अटके बोलने लगी ।

मैं पाँचवीं में थी, जब मेरी मम्मी का देहांत हुआ। स्कूल आकर मैं चुपचाप खिड़की के पास खड़ी रहती, तब बत्रा आंटी मेरे पास आती, स्नेह से अपना हाथ मेरे सिर पर रखती, मेरा नन्हा- सा हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम मुझे प्यार से समझाती । 

आज भी उनका चेहरा आँखों के सामने है । वह जहाँ भी हो खुश रहें स्वस्थ रहे, प्रभु से यही कामना है ।

2- सुमन शर्मा मैम

लम्बी, गोरी, खूबसूरत, हल्के  घुँघराले बालों का ढीला- सा जूड़ा और तिस पर गुलाब का फूल लगाए,  दुनिया का सबसे दिलकश चेहरा! ऐसी थी हमारी सुमन शर्मा मैम ।

उनका साड़ी बाँधने का तरीका ऐसा कि उन पर से नजर ही न हटती। जो उन्हें देखता, बरबस देखता ही रह जाता। उनका सम्मोहन ही था कि क्लास की शैतान से शैतान लड़कियाँ भी उनकी क्लास में चुपचाप बैठकर पढ़तीं।

जब वह बोलती, तो मानो फूल झरते, जब वह मुस्कुराती, तो मानो फिजा खिल उठती और जब वह किसी बात पर हँस पड़ती, तो मानो हवाएँ गीत गाने लगतीं ।

वह हमें हिंदी पढ़ाया करती । उनके पढ़ाने का अंदाज ऐसा कि हम एकटक उन्हें ही निहारा करते । किताब हाथ में थामे, जब वह अपना हाथ हिलाते हुए पाठ समझाती, तो हम सभी सम्मोहित हो उन्हें सुनते।

जब वह पहाड़ों के बारे में विस्तृत वर्णन करती, पहाड़ साक्षात् आँखों के आगे आ खड़े होते। जब वह नदियों के बारे में पढ़ाती, नदियाँ आस पास लहराने लगतीं! जब कोई कहानी सुनाती, उसके पात्र हमसे बातें करने लगते। जब कोई कविता कहती, ऐसा समाँ बँध जाता कि कोई सुध- बुध ही न रहती। 

बाकी विषयों की क्लास में हम घंटी बजने की प्रतीक्षा करते; परंतु सुमन मैम की क्लास में कब घंटी बज जाती, होश ही न होता।

उन्हें निहारते, उनसे पढ़ते न जाने कब उन जैसा बनने का सपना मन में पलता चला गया और आज.... उनसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान व उनकी तरह ही पढ़ाने का तरीका मेरे कितने काम आ रहा है, यह सोचकर खुद पर हैरान होती हूँ। उन्हीं की तरह, गहराई तक जाना और तब तक समझाना, जब तक कि खुद को व बच्चे को तसल्ली न हो जाए । 

जब बच्चे मुझसे कहते हैं, आप जब पढ़ाते हो, तो आँखों के आगे पूरा सीन क्रिएट हो जाता है, तब सुमन मैम और भी याद आती हैं।

Oct 1, 2024

किताबेंः सवेदनाओं से साक्षात्कार

 -  अंजू खरबन्दा 

 संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण (लघुकथा-संग्रह): डॉ. सुषमा गुप्ता, पृष्ठः 120 , मूल्य पेपर्बैकः 260 रुपये, संस्करणः 2024 , प्रकाशकःप्रवासी प्रेम पब्लिशिंग इंडिया, 3/186, राजेन्द्रनगर,सेक्टर-2, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद-201005

निशांतर के अनुसार श्रेष्ठ लघुकथाएँ वे ही हैं,  जिनको पढ़ने के बाद पाठक चौंकें नहीं; वरन् सोचने को मजबूर हो। हो सकता है, कभी-कभी लघुकथाएँ पाठकों को अपनी समाप्ति पर स्तब्ध कर जाएँ; परंतु यह स्तब्धता की स्थिति सहज और स्वाभाविक ढंग से आनी चाहिए; क्योंकि सहज स्तब्धता ही पाठकों को गंभीर चिंतन में परिवर्तित कर सकेगी।
सुषमा गुप्ता का सद्य प्रकाशित लघुकथा-संग्रह मेरे सामने है। ‘दहलीज’ के अन्तर्गत ‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ पढ़ते हुए मन भीग गया। सोशल मीडिया हमारे जीवन में इतना अधिक प्रवेश कर गया है कि रिश्तों से अधिक हम उसे महत्त्व देने लगे हैं। वास्तविकता की दुनिया से दूर एक झूठी दुनिया बसा ली गई है, जिसमें सहानुभूति पाने के लिए पिता की जलती चिता की फोटो तक अपलोड कर दी जाती है। जीवित माँ की दवाइयों से अधिक चिंता सोशल मीडिया पर आए लाइक कमेंट्स की होने लगी है। डायरी शैली में लिखी ये लघुकथा गहरे तक मन को बींध जाती है। 
‘अंतिम विदा’ लघुकथा पढ़ते हुए मन बेहद भावुक हो उठा। सत्तर बरस का साथ जब छूटता है, तो खुद को सँभालना कितना मुश्किल हो जाता है न! दादाजी का यह कहना- “साड़ी सुंदर- सी लाए हो न!” यह वाक्य मन को गहरे तक भिगो देता है। आज के युग में नई पीढ़ी को ये बातें शायद अजीब लगें; पर मन से जुड़े रिश्ते मिठास से भरपूर होते हैं। ये समाज के लिए एक आदर्श स्थापित करते हैं।  ‘दर्द के पंख’  केवल लघुकथा नहीं, बल्कि दर्द को उकेरती एक टीस है, जो गहरे तक ह्रदय में धँसी है। भाई का यूँ एकाएक चले जाना! जैसे एक युग का समाप्त हो जाना। वह भाई, जिसके अंग- संग एक-एक पल बीता, जिसकी हँसी-ठिठोली से घर गुलज़ार था, जिसकी कमाई के एक हिस्से पर साधिकार कब्जा था, जिसके हर राज़ में शरीक थी बहन! उस बहन के सामने जवान भाई का चले जाना! यह लघुकथा पढ़ते हुए कब  आँसू छलक आए, पता ही नहीं चला!
‘मोहपाश’ लघुकथा का अंत पढ़ते हुए जी धक्क से रह गया। माता पिता के सामने उनकी औलाद चली जाए, तो माता पिता जीते-जी मर जाते हैं। यह सदमा इतना गहरा होता है कि इससे उबरना नामुमकिन-सा लगने लगता है। हर पल आँखें दरवाज़े पर ही टिकी रहती है इंतज़ार में!उसका इंतज़ार, जो अब कभी नहीं आएगा। मोहपाश में बँधा इंसान एक पल को भी इससे निकल ही कहाँ पाता है!
‘परिपक्व बचपन’ लघुकथा में बिन माँ की दो नन्ही सी बच्चियाँ है। बिन माँ के बच्चे अपना बचपन बहुत जल्दी खो देते हैं। इस लघुकथा में मुझे मेरा अक्स दिखलाई पड़ा। बड़ी बेटी कब छोटे भाई बहनों की माँ बन जाती है वह खुद भी कहाँ जान पाती है। बचपन की शरारतें कब उसे छूकर चुपचाप निकल जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
‘कैमिस्ट्री’ लघुकथा मोहनदास और रामदीन के वार्तालाप से से शुरु होती है। दोनों के वार्तालाप में कोई तालमेल नहीं दिखता। मोहनदास जी कमर दर्द से परेशान हो अपनी व्यथा सुना रहे है और रामदीन मोची चमड़ा महँगा होने की बात कर रहा है। दोनों बस अपना अपना राग आलाप रहें हैं। दूर खड़ी बहू ससुर मोहनदास को मोची के पास बैठा देख नाराजगी जताती है, तब पुत्र जिस केमिस्ट्री की बात बताता है, उसे सुन एकाएक हँसी आ जाती है, जिसके साथ एक गम्भीरता भी लिपटी है-खुद को अभिव्यक्त करने की। इस लघुकथा की खुशबू फ़िज़ा में बिखर जाती है। 
‘आत्मा का गठजोड़’ लघुकथा पिता और बेटी के खूबसूरत रिश्ते को उकेरती लघुकथा है। बेटियों को हमेशा माता-पिता की चिंता ही लगी रहती है। बेटी विदेश में हो तब यह चिंता और अधिक बढ़ जाती है। बीमार पिता की चिंता में बेटी उन्हें अपने साथ विदेश ले जाना चाहती है पर पिता! वे अंतिम समय तक इसी घर में रहना चाहते हैं क्योंकि यहाँ उनकी पत्नी की प्यारी यादें उनके अंग संग हैं। सबसे बड़ी बात अब वे अधिक जीना ही नहीं चाहते; ताकि जल्द से जल्द अपनी प्रिया तक पहुँच सकें। अकेलेपन की व्यथा को दर्शाती एक मार्मिक लघुकथा है यह! 
‘दरकती उम्मीद’ लघुकथा वृद्ध विमर्श को चित्रित करती देती हृदयस्पर्शी रचना है। दादा अस्पताल में भर्ती है और आज जनके पोते का जन्मदिन है। वह नर्स से बार-बार अनुरोध करते हैं घर में बात करवाने के लिए। साथ वाले बेड के मरीज की बहू आशा उन्हें किसी तरह बहलाकर खाना खिलाती है। बाद में नर्स से सच्चाई जानकर वह अचंभित है कि वृद्ध का बेटा अपने बेटे के जन्मदिन में इतना मगन है कि अस्पताल में पड़े पिता के लिए उसके पास फुरसत ही नहीं।
अब  बात करूँगी सुषमा गुप्ता की मानवेतर लघुकथाओं की। ‘जात’ में लैबरो और शैफर्ड के बीच हुई बातचीत गहरे तक सोचने को विवश करती है। लैबरो का यह कहना- “पागल हो गया है क्या बे। हम इंसान हैं क्या?  जो ऐसी बातों पर अपनी ही प्रजाति को नोचें मारें! खबरदार ऐसा कुछ किया तो।! हम कुत्ते हैं…’’   यह मनुष्य जाति पर गहरा कटाक्ष  है।
‘अपनी अपनी बरसात’ लघुकथा गहरे तक मन को छूती है। इसका सीधा प्रभाव पाठक पर पड़ता है। रोजमर्रा की बातचीत में किसी न किसी बात पर हम नेताओं के बारे में बात करते ही रहते हैं; लेकिन इस लघुकथा में फौजी और नेता के बारे में दो ‘छतों’ में आपस में हुई बातचीत गहरे तक अपना प्रभाव छोड़ती है। यह लघुकथा यहाँ खत्म होकर भी खत्म नहीं होती। पाठक देर तक इस लघुकथा में ही डूबता-उतराता रहता है और यही है लघुकथा का असली प्रभाव! इस तरह हम देखते है कि प्रभावोत्पादकता कथ्य व शिल्प दोनों के आधार पर होती है। कथ्य प्रकटीकरण का यह कौशल, जो सुषमा गुप्ता में है, कम ही लेखकों में देखने को मिलता है।
यह लघुकथा संग्रह पढ़ते हुए मन कभी उद्वेलित हुआ कभी व्यग्र हुआ, कभी विक्षुब्ध हुआ कभी बेचैन! इस संग्रह ने कई रंग समेटे है। कभी आँखें भर- भर आती हैं कभी होंठों पर मुस्कान तिर आती है।

Jun 1, 2023

पर्यावरणः पत्ता- पत्ता सूख चुका था, पेड़ बिचारा करता क्या

  - अंजू खरबंदा

1. लघु लेख

धूप का जंगल, नंगे पाँवों, एक बंजारा करता क्या 

रेत का दरिया, रेत के झरने, प्यास का मारा करता क्या

बादल- बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को

पत्ता- पत्ता सूख चुका था, पेड़ बिचारा करता क्या?

शायर अंसार कम्बरी जी की ये पंक्तियाँ घोर पर्यावरणीय संकट की समस्या पर प्रकाश डालती है। जैसा कि हम सब जानते हैं औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है और इसका सीधा सा कारण ग्लोबल वार्मिंग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल 2 से 4 लाख लोगों की मौत का कारण वायु प्रदूषण है। भारत में सबसे बड़ी प्रदूषण आपदा 1984 में भोपाल में घटी। इसकी यादें आज भी भारतीय मानस पटल पर हैं।

हाल ही में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया कि प्रदूषण के कारण दिल्ली में सालाना 10000 से 30000 जानें जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक नई रिपोर्ट में दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में दसवें स्थान पर भारत है, जिसमें दिल्ली का प्रथम स्थान है।

यू. एस. ए. के लॉस एंजलिस में तो इतना बुरा हाल है कि एक स्कूल के खेल के मैदान पर चेतावनी लिखी गई है :

‘सावधान अअत्यधिक धुएँ की स्थिति में व्यायाम न करें, ना गहरी साँस ले।'

हम विकास की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं ;परंतु यह सोचने की बात यह है कि ऐसा तीव्र अंधाधुंध विकास किस काम का, जिसका लाभ अपने निवासियों व विश्व को लाभदायक रूप में न मिल सके।

 हम यह क्यों भूल जाते हैं कि विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं किया जा सकता, इसमें अंततः मनुष्य की ही हार है। व्यक्ति बिना हवा पानी व स्वच्छ पर्यावरण के जिंदा नहीं रह सकता, अगर हम अब भी अपनी भूल को स्वीकार नहीं करते, तो हम जिन नागरिकों के लिए विकास तीव्र कर रहे हैं, शायद वे उस विकास को देखने के लिए जिंदा ही न रहें;  क्योंकि

"जब आखिरी पेड़ कट जाएगा, 

आखिरी नदी के पानी में जहर घुल जाएगा 

और आखिरी मछली का शिकार हो जाएगा, 

तब इंसान को एहसास होगा कि वह पैसे नहीं खा सकता। "

 लघुकथा

पीर 

"तुम लोग फिर आ धमके?"

"अरे हर वर्ष तो तुम बड़े प्रफुल्लित हो उठते थे हमारे आने से! ये अचानक इस वर्ष क्या हो गया!"

"हाँ होता था प्रफुल्लित... करता था बेकरारी से इंतजार!  तुम्हारे आते ही वीरान वादियाँ जो गुलजार हो उठती थीं, उदास फिज़ाएँ जो महकने लगती थीं, पूरे बरस शून्य तकते निरुत्साह दुकानदारों के चेहरे पर उत्साह की रंगीनियाँ जो छा जाती  थीं... ।"

"थी... माने?"

सीने पर एक घूँसा- सा पड़ा, उसके इन शब्दों ने पर्यटकों को स्तब्ध कर दिया; पर उनके प्रश्न पर ध्यान दिये बिना वह अपनी ही रौ में बोले चला जा रहा था

"...और इस इंतजार के बदले मुझे क्या मिला?

कूड़े के ढेर, प्लास्टिक की खाली बोतलें, चिप्स के रैपर और... और...!"-कहते कहते पर्वत की साँस उखड़ने लगी और जुबान लड़खड़ाने लगी ।

"जाओ चले जाओ यहाँ से! स्वार्थी कहीं के! मैं बेवकूफ!अशर्फियाँ लुटाकर कोयलों पर मोहर लगाता रहा! तुम खुद तो रोगी जीवन जीने के आदी हो और आज मुझे भी... मुझे भी रोगी बनाकर छोड़ा तुमने!"

एक पल को रुका और विरक्त स्वर में आक्रोश से भर बोला-"अब तुम्हारे आने से यहाँ रौनक नहीं मनहूसियत फैलने लगती है!"

सम्पर्कः 207 द्वितीय तल, भाई परमानंद कालोनी, दिल्ली

Sep 1, 2022

यात्रा संस्मरणः गढ़ मुक्तेश्वर- गंगा मैया की आरती का अद्भुत नजारा

 - अंजू खरबंदा

गंगा जयंती के पावन अवसर पर गढ़ मुक्तेश्वर, जिसे गढ़ गंगा भी कहा जाता है, जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परमानन्द कालोनी के पास स्थित ढक्का गाँव से हर माह बस द्वारा किसी न किसी तीर्थ स्थान पर जाने का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। सखी मुकेश के घर जाना हुआ, तो बातों ही बातों में पता चला कि वे लोग कल गढ़ गंगा जा रहे हैं। मेरे ये पूछने पर कि क्या कोई सीट खाली है, तो मुकेश मुझे अपने उन परिचित के घर लेकर गई, जिनके पास सीट की जानकारी थी। उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले ही किसी ने अपनी एक सीट कैंसिल की है। मुझे लगा मानो ये मेरे लिए गंगा मैया के बुलावे का ही संकेत था, मैंने झट उसी समय अपने लिए सीट बुक करा ली।

सारी संगत अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे ढक्का स्कूल के पास स्थित मदर डेयरी के पास एक घने वृक्ष के नीचे एकत्र हो गई ... काफ़ी इंतजार के बाद बस साढ़े दस बजे आई और लगभग पौने ग्यारह बजे हम लोग रवाना हुए। बस ‘कश्मीरी गेट’ बस अड्डे ,

अक्षरधाम से गाजियाबाद होती हुई सवा दो बजे जिला हापुड़ स्थित गढ़ मुक्ततेश्वर पहुँची । रास्ते भर संगत ने खूब भजन कीर्तन किया। कुछ महिलाओं को तो सैकड़ों भजन कंठस्थ थे। वे भजन गाने में इतनी रम जाती कि बस के छोटे से कॉरिडोर में ही मगन हो नाचने लगती। सभी भजनों के साथ ताली बजा आनंद में डूबे हुए थे। मेरे लिए इस तरह का ये पहला अवसर था... भजनों की लय ताल कानों में रस घोल रही थी।

जब हम गढ़ गंगा पहुँचें, मई की कड़कती धूप सिर पर थी, पर गंगा मैया के दर्शन की उमंग ने कड़ी धूप के अहसास को  हम पर बिलकुल भी भारी नहीं पड़ने दिया। बस वाले ने पार्किंग में बस रोकी, वहाँ से गढ़ गंगा की दूरी कम से कम पौन किलोमीटर होगी। संगत में लगभग हर उम्र की महिलाएँ थी - पच्चीस से लेकर सत्तर वर्ष तक की! सभी के चेहरे पर गंगा मैया के दर्शन का जोश साफ दिखलाई पड़ रहा था। पौना किलोमीटर रास्ता जैसे पल भर में कट गया... कइयों ने रिक्शा पर जाने की बात कीपरन्तु सभी को पैदल देख वे भी साथ हो लीं। बाजार से गुजरते हुए बैंड बाजे के साथ नाचते- गाते लोग दिखे, बाद में पता चला कि गंगा जयंती के अवसर पर गंगा तीरे रात आठ बजे होने वाले भव्य कार्यक्रम की तैयारी का ये एक हिस्सा है।

गंगा मैया के नजदीक पहुँचते ही सभी के चेहरे यूँ खिल गएमानो कोई खोया खजाना मिल गया हो। सभी ने वहाँ बिछे तख्तपोश पर सामान रखा... दो तीन महिलाओं को सामान की निगरानी का निर्देश दे बाकी महिलाएँ गंगा मैया की गोद में अठखेलियाँ करने को पूरे जोश- खरोश से दौड़ी।

सभी ने एक दूसरे का हाथ थाम खूब डुबकियाँ लगाईं। कुछ महिलाओं ने दस, कुछ ने बीस, कुछ ने पचास तो मुकेश तथा एक बुजुर्ग माँजी ने तो पूरी एक सौ आठ डुबकियाँ लगाई। एक बार स्नान कर मन नहीं भरा, तो डुबकियों का दूसरा दौर चला। काफ़ी देर तक गंगा मैया की गोदी में खेल एक- एक कर सभी घाट पर आए, कपड़े बदले। पहले कुछ महिलाएँ अपनी साड़ी या दुपट्टे से घेरा बना लेती और एक- एक कर बाकी महिलाएँ उस घेरे में कपड़े बदल लेतींलेकिन इस बार एक बढ़िया बदलाव देखने को मिला... वहाँ पर महिलाओं की सुविधा के लिए थोड़ी- थोड़ी दूरी पर एलम्युनियम के छोटे- छोटे बॉक्स बना दिए गए हैं, ताकि उन्हें कपड़े बदलने में कोई परेशानी न हो।

कपड़े बदल शृंगार कर सभी महिलाओं ने पंडित जी के पास बैठ पूजा अर्चना की, उन्हें दान दक्षिणा दी फिर सभी ने गंगा मैया में दीपक प्रवाहित कर घर-संसार के लिए सुख समृद्धि की कामना की।

सुबह से घर से निकले थे, अब पेट में चूहे भी दौड़ने लगे... घाट पर उपयुक्त जगह ढूँढ सभी ने इत्मीनान से बैठ घर से लाया भोजन किया। अब चाय की तलब जगी, तो बाजार की ओर चल दिए, एक टपरी पर बैठ गर्म- गर्म चाय का आनंद लिया और फिर बाजार की रौनक देखने चल दिए। आमने- सामने खूब सारी दुकानें सजी हुई थीं... चूड़ियाँ, मंगलसूत्र, सिंदूर, मोतियों की माला, मूर्तियाँ, खिलौने, लकड़ी से बना सामान, चाबी के छल्ले और भी जाने क्या- क्या! पूरा बाजार मनमोहक सामानों से अटा पड़ा था। महिलाएँ शॉपिंग न करेंतो बाजार बंद न हो जाएँ! सो सभी महिलाओं ने अपनी- अपनी पसंद के हिसाब से सामान खरीदा और वापिस घाट पर आ गईं।

समय देखा, अभी तो पाँच ही बजे थे। आरती शुरू होने में अभी डेढ़ घंटा बाकी था। कुछ महिलाएँ घाट की सीढ़ियों पर बैठ गपशप में मशगूल हो गईं, तो कुछ घाट पर रखे तख्तपोशों पर अधलेटी हो सुस्ताने लगीं। मैं और मुकेश घाट पर चहलकदमी करते हुए गंगा मैया को जीभर निहारती रहीं। छह बजने को थे... जहाँ हम सभी बैठे थे, वहाँ पीछे की ओर विशाल शामियाना लगा हुआ था, लाउडस्पीकर की तेज आवाज ने हमारा ध्यान उस ओर खींचा। हम लोग वहाँ गए, तो देखा खूब सारी कुर्सियाँ पड़ी थीं, बड़े बड़े कूलर चल रहे थे और पानी की फुहार फेंकने वाले विशाल पंखे ठंडी- ठंडी हवा दे रहे थे। सामने भव्य स्टेज सजाया जा रहा था और कुछ आर्टिस्ट एक विशाल मगरमच्छ को पेंट कर रहे थे, कुछ पल को समझ न पाई कि ऐसा क्यों किया जा रहा है, फिर मेरा ध्यान सामने लगे बड़े बोर्ड पर गया, जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में ‘माँ गंगा जन्मोत्सव समारोह’ लिखा हुआ था, बाईं ओर गंगा मैया मगरमच्छ पर विराजमान थी और दायीं ओर भोले भंडारी का चित्र बना हुआ था, तब पहली बार मुझे पता चला कि गंगा मैया की सवारी मगरमच्छ है।

मैं अभी इसी ध्यान में खोई थी कि तेज आवाज सुन आसमान की ओर ध्यान गया, तो क्या देखा कि एक पैराशूट द्वारा फूलों की वर्षा की जा रही है। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे देवता स्वयं पुष्प वर्षा कर रहे हों।

ऐसा सुंदर नजारा था कि शब्दों में बयान करना कठिन है... तभी सामने बने घंटाघर की घड़ी ने साढ़े छह बजाए और सभी आरती के लिए गंगा मैया की ओर दौड़े।

अद्भुत नजारा था, पल भर को लगा साक्षात् स्वर्ग के द्वार पर खड़ी हूँ, फूलों से सजा पंडाल, सामने गंगा मैया की तेज धाराओं का मधुर संगीत, पीतल के घंटे की कर्णप्रिय ध्वनि के बीच विशाल दीपों द्वारा आरती का भव्य नजारा... पलकें जैसे झपकना ही भूल गईं थीं...!

सम्पर्कः 207 द्वितीय तल, भाई परमानन्द कालोनी, दिल्ली 110009, फोन 9582404164

Dec 1, 2021

लघुकथाः रेलगाड़ी की खिड़की

-अंजू खरबंदा 

आज राकेश बहुत खुश था, होशियारपुर से शादी का बुलावा जो आया था । जिन्दगी की आपा-धापी के बीच अरसे बाद सभी से मिलना होगा । शान-ए-पंजाब से जाना तय हुआ । सर्दी हल्की हल्की दस्तक देने लगी थी, इसलिये टिकट बुक करवाते हुए उसने सोचा चलो इस बार ए.सी. की बजाय जनरल कोच से सफ़र का आनन्द लिया जाए । 

पहले बीवी बच्चे जनरल से जाने पर कुछ नाराज हुए पर फिर थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान गए । दिल्ली से लगभग आठ घंटे का सफ़र । सीट बुक थी तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई । बच्चों ने झट खिड़की वाली सीट झपट ली । सारा सामान सेट कर पति-पत्नी बातों में मशगूल हो गए ।

दीदी! जम्मू की शॉल ले लो! बहुत बढ़िया है !

रंग-बिरंगी शॉलों का भारी गट्ठर उठाए एक साँवली-सलोनी कजरारी आँखों वाली युवती पत्नी को इसरार करने लगी ।

कितने की है?’

अढाई सौ की!

इत्ती महँगी !

ज्यादा पीस लोगी तो कम कर दूँगी!

मैंने दुकान खोलनी है क्या?’

ले लो न! दोनों दीदियों के लिये और अपनी भाभियों के लिए!

राकेश ने पत्नी को इशारा किया तो उसने आँखें तरेर कर चुप रहने का संकेत दिया ।

अच्छा 5 पीस लूँ तो कितने के दोगी?’

दो सौ रुपए पर पीस ले लेना दीदी!

न! सौ रुपए पर पीस!

दीदी! सौ तो बहुत कम है!’ 

कहते हुए उसका गला रुँध गया और उसकी कजरारी आँखें भर आई ।

चल न तेरी न मेरी डेढ़ सौ पर पीस!

अच्छा दीदी ! ठीक है ! लो रंग पसंद कर लो !

कुछ सोचते हुए उसने कहा और गट्ठर पत्नी के सामने सरका दिया । 

पत्नी ने पाँच शॉलें अलग कर ली और पति की ओर देख रुपए देने का इशारा किया ।

राकेश ने झट 750 रुपये निकाल कर दे दिये । 

उसके जाने के बाद रास्ते भर पत्नी की सुई इसी बात पर अटकी रही  

वो एक बार में ही डेढ़ सौ में मान गई, गलती की थोड़ा तोल मोल और करना था!

और राकेश की सुई... अतीत में जा अटकी थी । 

बेटी को गोद में बिठा रेलगाड़ी की खिड़की से झाँकता वह सोच रहा था -

मेरे पिता भी रेलगाड़ी में सामान बेच जब थके-हारे घर आते तो उनकी आँखों में भी वही नमी होती थी जो आज उस लड़की की आँखों में थी। 

Aug 1, 2021

कविता- दूर ब्याही बेटियाँ

-अंजू खरबंदा  

तरस जाती हैं 

देखने को एक झलक

पिता के चेहरे की मुस्कुराहट को

माँ की आँखों की चमक को

बहन संग हाल-हवाल बाँटने को

भाई को राखी बाँधने को

भाभियोंसंग हँसी ठिठोली करने को

भतीजे भतीजियों की शैतानियाँ देखने को

सखी।-सहेलियों-संग झूला झूलने को

बचपन की यादें ताजा करने को!

मायके की सोंधीसोंधी रोटी खाने को

अपनी मर्ज़ी से 

सोने -उठने खानेपीने की आज़ादी पाने को !

निश्चिंत हो पर्स झुलाती 

बाजार के सौ-सौ चक्कर लगाने को

नए सूट से मैचिंग ज्वैलरी 

और नई जूत्ती पहन इतराने को!

दूर ब्याही बेटियाँ 

अनजाने ही खो देती हैं 

अपने हिस्से का बहुत सारा लाड़प्यार 

बहुत से किस्से कहानियाँ 

रिश्तेदारो की रुनकझुनक

परिवार की शादी की सैकड़ो तैयारियाँ

दूर बैठी बेटियाँ 

सदा कुछ न कुछ सोचती हैं 

कभीकभी किस्मत को भी कोसती हैं 

कभी भर-भर आती आँखें 

कभी मुस्कुराकर खुद को ही पोसती है!

देती है दिलासा स्वयं को

करती हैं बेकरारी से इंतज़ार

मायके की खुशियों का

जब उन्हें भी मिलेगा अवसर

पंख लगा पीहर की ओर उड़ जाने का

भागम-भाग की जिन्दगी से राहत पा

कुछ पल अपने लिये जिए जाने का!