ढक्का गाँव की एक गली से
गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी
पार्क की एक बेंच पर बैठी
दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…
मग्न थीं वे
अपने सुख-दुःख बाँटने में,
जैसे समय ठहर गया हो
उनकी बातों के आसपास!
उम्र के इस पड़ाव तक
आते-आते
कितने विषय होंगे उनके पास,
कितनी कहानियाँ,
कितनी उपलब्धियाँ!
जो किसी किताब में दर्ज नहीं!
उनके चेहरे की झुर्रियों ने
सहे होंगे जीवन के
अनगिनत थपेड़े,
हर लकीर एक किस्सा
कहती होगी,
इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते
एक लंबा इतिहास
बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
तजुर्बा भी गहराता गया,
कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर
जीवन को गति देती रहीं
वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

बहुत सुंदर कविता।
ReplyDeleteस्नेहिल आभार 🌹🌹
Deleteजीवन का सत्य। बहुत सुंदर रचना।बधाई। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteसुंदर कविता - जय प्रकाश मानस
ReplyDeleteबढ़िया
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना है . जीवन सा सार होगा निश्चय ही उन प्रौढ़ स्त्रियों की बातों में . शुभकामनाएं .
ReplyDeleteनिर्देश निधि
ReplyDeleteयथार्थ का चित्रण करती सुंदर कविता।
ReplyDeleteहँसती मुस्कुराती स्त्रियाँ!!संवेदनशील रचना |
ReplyDeleteसुंदर कविता
ReplyDeleteसुंदर कविता, पूनम चंद्रलेखा
ReplyDeleteसार्थक सृजन
ReplyDeleteसुंदर कविता!
ReplyDelete~सादर
अनिता ललित
बहुत सुंदर कविता सुंदर भाव
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविता 👌
ReplyDeleteWow bahut sunder
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना, बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteबहुत सुंदर।
ReplyDeleteसुंदर रचना
ReplyDeleteएक सच को हर दिल में बसा रहता है बस कोई
साथी हो जो दिन सके, समझ सके उस कथा की व्यथा
देवी नागरानी