ढक्का गाँव की एक गली से
गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी
पार्क की एक बेंच पर बैठी
दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…
मग्न थीं वे
अपने सुख-दुःख बाँटने में,
जैसे समय ठहर गया हो
उनकी बातों के आसपास!
उम्र के इस पड़ाव तक
आते-आते
कितने विषय होंगे उनके पास,
कितनी कहानियाँ,
कितनी उपलब्धियाँ!
जो किसी किताब में दर्ज नहीं!
उनके चेहरे की झुर्रियों ने
सहे होंगे जीवन के
अनगिनत थपेड़े,
हर लकीर एक किस्सा
कहती होगी,
इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते
एक लंबा इतिहास
बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
तजुर्बा भी गहराता गया,
कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर
जीवन को गति देती रहीं
वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

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