कभी-कभी सोच कर देखिए - यह हिंदी साहित्य की ताक़त है या कमजोरी कि किसी लेखक की किताब 500 या ज़्यादा से ज़्यादा 1000 प्रतियों में छपती है (अब तो इसमें भी कलाकारी दिखाने की तकनीक मौजूद है), और उसी के बाद उसे समूची हिंदी का प्रतिनिधि लेखक घोषित कर दिया जाता है। रातों रात !
500 प्रतियों का यह संसार, किसी छोटे कमरे की तरह है - जहाँ दरवाज़ा खुलता है, पर हवा बाहर नहीं जाती।
किताबें छपती हैं, पर पाठकों तक नहीं पहुँचतीं।
कई बार तो यह किताबें अपने शहर से भी बाहर नहीं निकल पातीं।
प्रकाशक कुछ प्रतियाँ आलोचकों को भेजता है, कुछ लेखकों को, कुछ अपने परिचितों को - और शेष कुछ दिनों में गोदाम की धूल में सो जाती हैं। फिर भी उन्हीं किताबों पर संगोष्ठियाँ होती हैं, पुरस्कारों के लिए अनुशंसाएँ जाती हैं, और वही नाम रातों रात 'समकालीन हिंदी का महत्त्वपूर्ण स्वर' बन जाता है।
अजीब है कि यह सब एक ऐसे देश में होता है, जहाँ करोड़ों लोग हिंदी बोलते हैं, सुनते हैं, गाते हैं - पर शायद पढ़ते नहीं।
शायद उन्हें कोई नहीं बताता कि वे भी इस साहित्य के हिस्सेदार हैं या शायद साहित्य ने ही उन्हें अपने घेरे से बाहर रख दिया है।
फिर भी, यह तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; क्योंकि यही हिंदी की ज़िद भी है कि इतने छोटे दायरे में भी वह जीवित रहती है।
कभी किसी स्कूल के बच्चे के निबंध में, किसी मज़दूर की बोली में, किसी माँ के लोकगीत में। वहाँ कोई आलोचक नहीं होता, कोई समीक्षक नहीं; पर भाषा जीवित रहती है।
शायद यही हिंदी की सबसे बड़ी ताक़त है कि वह अपने औपचारिक साहित्य से ज़्यादा, अपने असंगठित जीवन में साँस लेती है।
500 प्रतियों की किताबें मर जाती हैं, पर वह एक माँ के मुँह से निकला शब्द, किसी अनाम कवि की पंक्ति बनकर सदियों तक चलता रहता है।

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