जिस तरह से जीवन के साथ मृत्यु का संबंध है। ठीक उसी तरह जीवन में टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरने का भी संबंध है। इंसान सदैव जीवन से मृत्यु की ओर खिसकता रहता है, वैसे ही उसके जीवन में बार-बार टूटने की स्थिति आती है, जब इंसान टूटेगा तो निश्चित तौर पर बिखरेगा भी, बिखरने के बाद उसे समेटना भी जरूरी है। जब यह तीनों क्रियाएँ हो जाती है, उसके बाद जो कुछ भी होता है, वह संवरता है।
आप अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखें, हालात बद से बदतर होते रहे। आप कई बार टूटे, फिर बिखरे, फिर स्वयं को समेटा और आखिर स्तर पर पहुँचते-पहुँचते आप एक बार फिर सँवरने लगे।
हर किसी के जीवन में ये चार चक्र आते ही हैं। टूटने से शुरू होकर यह क्रिया सँवरने तक चलती है। ऐसा भी नहीं है कि एक बार टूट गए, तो फिर यह क्रम समाप्त हो जाएगा। वास्तव में हम जीवन में जब भी टूटे हैं, तभी एक नया जीवन ही शुरू होता है। टूटने का आशय अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। इंसान जब भी टूटा है, समझो फिर से संवरने के लिए ही टूटा है। इसलिए टूटने की इस क्रिया को कभी गलत मत समझना। सँवरने की पहली सीढ़ी ही है टूटना। टूटना यानी जुड़ने के लिए होने वाला पहला उपक्रम। जो टूटा है, वह जुड़ेगा ही, यह तय है। जुड़ता वही है, जो टूटता है।
इंसान जिंदगीभर जीने का ही उपक्रम करता रहता है। जीना यानी पल-पल साँस लेने की प्रक्रिया से गुजरते हुए जीवन संगीत में रम जाना। यही रमने में क्रिया ही जब सघन हो जाती है, तो इसे डूबना कहते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में डूबने को सही माना गया है। डूबने से आशय अपने मनचाहे काम को पूरी तल्लीनता से करना। हर किसी के लिए डूबना अलग-अलग हो सकता है। संगीत वाले जब डूबकर गाते या बजाते हैं, तो हर किसी के मुँह से वाह-वाह निकल ही आता है।
संगीत हो या कोई अन्य क्षेत्र, डूबना तभी सार्थक होता है, जब वह टूटता है। सभी कहते हैं कि टूटे हुए साज की आवाज को हर कोई नहीं समझ सकता। इसी तरह टूटे हुए दिल की बात भी हर कोई समझ नहीं पाता है। इसे वही समझ सकता है, जो कभी टूटा हो। टूटने को कभी नकारात्मक भाव से न लें, यह आगे बढ़ने की पहली प्रक्रिया है। जीवन का ककहरा इसी टूटने से ही शुरू होता है। बाइबल में जीसस ने कहा है-माँगोगे, तभी पाओगे। पाने के लिए माँगना ही पड़ता है। आप यदि स्वाभिमान की बात करते हुए यह कहेंगे कि हम हाथ नहीं फैलाएँगे, चाहे कुछ भी हो जाए। यहाँ हाथ फैलाने की बात नहीं हो रही है, यहाँ बात हो रही है, दिल में कुछ पाने की चाहत हो, तो वह चीज मिल ही जाती है।
हमें यदि अनायास कोई चीज मिल जाए, तो हम उसकी कद्र नहीं करते। जिसे प्राप्त करने के लिए हम बार-बार टूटते हैं या कह लें मरते हैं, वही जब मिल जाती है, तो हमें सुकून की वह दौलत मिल जाती है, जिसके लिए अच्छे-अच्छे तरस जाते हैं। पर यह मंजिल नहीं होती। जीवन में टूटने का यह क्रम बार-बार आता है। पर इसी में छिपा है, बिखरना। बिखरने में होता यह है कि हमारे आसपास पूरी तरह से अंधेरा छा जाता है। हाथ को हाथ नहीं सूझता, अंधेरा इतना गहन होता है कि जिसे हम अपना कहते नहीं थकते, वह भी हमारा हाथ छोड़कर चल देता है। इस अंधेरे का लाभ हर कोई उठाता है। एक-एक करके सभी निकल जाते हैं। जब थोड़ी-सी उजास को हम अपने करीब पाते हैं, तब समझ में आता है कि जिसे हमने अपना सबसे बड़ा संबल माना था, वही हमसे दूर चला गया है। तब कोई नहीं होता। यही होता है बिखरना। आपके अपने आपके गहन विश्वास का एक-एक टुकड़ा लेकर आप से दूर हो जाते हैं। आप उस वक्त अकेले होते हैं। इतने अकेले की आपकी छाया भी नहीं होती। अंधेरे में भला छाया किसके साथ होती है। यही होता है बिखरना। आपको समझ में आ जाता है कि किस-किस ने आपका साथ दिया। ऐसे लोग गिनती के ही होंगे। बहुत की कम लोग। यही लोग अपने होते हैं। इन्हें हम अपना कह सकते हैं।अब यही चंद लोग आपको समेटने के काम में आएँगे। कुछ इधर से कुछ उधर से लोग आएँगे, आपको सांत्वना देंगे, आपको समझने की कोशिश करेंगे। बिखरे हुए सच को सामने लाएँगे। आप मान सकते हैं कि यह क्रिया समेटने की है। यह प्रक्रिया बहुत ही धीमे होती है। बरसों लग जाते हैं सब कुछ समेटने में। जब सब कुछ समेट लिया जाता है, तब लगता है, हम बहुत ही कठिन रास्तों से गुजरकर खुली हवा में सांस ले रहे हैं। यह पल बहुत ही आल्हादित करने वाला होता है। हमने खुद को समेट लिया। परीक्षा की एक घड़ी को पार कर लिया। अपनों को पहचान लिया।
अब शुरू होती है संवरने की प्रक्रिया। संवरना यानी सब कुछ धीरे-धीरे व्यवस्थित होना। जिंदगी को यह लगे कि अब आराम के पल हमारे साथ हैं, तो यहीं से शुरू होता संवरना। इन पलों में हमारे साथ सब कुछ अच्छा ही होने लगता है। हमारा परिवार हमारे साथ होता है, हम अपनों के साथ होते हैं। हम खुशी से भर उठते हैं। खुशियाँ हमारा इंतजार करती होती हैं। चारों ओर से शुभ समाचार मिलने लगते हैं। सच मानो, जिंदगी ठहर जाती है। इस ठहरी हुई जिंदगी को गहरी सांस लेकर जी लो। क्योंकि अगले ही पल फिर शुरू होगी टूटने की प्रक्रिया....। क्या आप इसके लिए तैयार है?


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