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May 1, 2026

यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा

 -  मांडवी सिंह

भारत की संस्कृति अपने दामन में  अनेक किस्से - कहानियों को समेटे, इतिहास और भूगोल के महीन रेशों की बुनावट पर कई युगों के दर्शन का बेलबूटा टाँके,सँजोती रहती है समय को, सँभालती रहती है नई पौध के एक - एक पल को।

इस बार की यात्रा में मुझे एक ऐसे स्थान पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो संस्कृति के उपर्युक्त सभी अलंकारों से सुशोभित है। भोपाल से कामायनी एक्सप्रेस से यात्रा शुरू हुई जो बनारस होते हुए बलिया तक जाती है। पहले यह ट्रेन सिर्फ बनारस तक जाती थी। प्रसंग था सहेली के पुत्र का विवाहोत्सव । इतिहास में बलिया का नाम बहुत मशहूर है। सबसे पहले तो मेरे मन में आया कि आखिर इस नाम का अर्थ क्या होता है? कुछ गूगल गुरु और कुछ स्थानीय लोगों से विचार- विमर्श के बाद जो निष्कर्ष निकला उसके आधार पर कहानी यह है कि पौराणिक काल में महर्षि भृगु ऋषि के आश्रम में ( आज भी इसे भृगु क्षेत्र कहा जाता है) उनके पुत्र शुक्राचार्य द्वारा दानवराज दानवीर राजा बलि का यज्ञ संपन्न कराया गया था। संस्कृत में यज्ञ को याग कहा जाता है। जिसके आधार पर इसका नाम 'बलियाग' पड़ा ,जो कालांतर में बलिया हो गया।

यह राजा बलि की राजधानी थी। यहाँ से लगभग 20 किलोमीटर दूर 'चितबड़ागाँव' है वहीं जाना था। सहेली के परिवार का बेटा अतुल मुझे लेने स्टेशन आया था। उसी के साथ बातचीत शुरू हुई। मैंने मजाक के लहजे में कहा कि इस गाँव का नाम चितबड़ा क्यों है, क्या यहाँ के लोग बड़े दिलवाले होते हैं? मुझे उम्मीद नहीं थी कि मजाक में कही गई बात का जवाब इतना दिलचस्प हो सकता है। अतुल ने बताया कि पुराने समय की बात है यहाँ के स्टेशन से खिलौनों से भरी ट्रेन गुजर रही थी। एक गरीब परिवार का बच्चा उस खिलौने के लिए मचल गया। गाँव वाले एकत्रित हो गए और ट्रेन रुकवा दी और एक खिलौना लेकर उस बच्चे को दे दिया। तभी से इस गाँव का नाम चितबड़ा गाँव पड़ गया, अर्थात् बड़े दिलवाले लोगों का गाँव। इस किवदंती  को सुनाना मेरा मूल उद्देश्य नहीं है बल्कि इस गाँव के पास जो अद्भुत स्थल है, जिसका प्रचार - प्रसार नहीं होने के कारण वह पर्यटकों से आज भी वंचित है उसका वृतांत सुनाना है।

इसी गाँव से एक रास्ता जाता है कामेश्वर धाम के लिए जिसे आज कारों धाम कहा जाता है। पूर्व में इसका नाम कामकारू, कामशीला था, जो अपभ्रंश होकर कारों हो गया।

इसकी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था। अतीत के झरोखे से झाँकते , सुलझे अनसुलझे अनेक किस्से ,कहानियों को समेटे इस स्थली को देखने की उत्कंठा बलवती होती जा रही थी, लेकिन विवाहोत्सव के पश्चात ही दर्शन संभव था।

सौभाग्य से वह समय भी आ गया। चितबडा गाँव से हमलोग कार से मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। हरे - भरे खेतों, बाग - बगीचों के नयनाभिराम दृश्यों ने मन के सारे दरवाजे खोल दिए। जहाँ तक निगाह जाए बस हरियाली ही हरियाली। बीच बीच में ईंट - भट्ठे का कारोबार था जो स्थानीय निवासी अतुल के परिवार का ही था। चितबड़ा गाँव मुख्य मार्ग से मंदिर तक पहुँचने के लिए ऑटो, टैक्सी चलते हैं। अब हमलोग मंदिर के करीब थे। मंदिर के पीछे वाले हिस्से में कुछ खर - पतवार और दलदल दिखा। अतुल ने बताया कि किसी समय मंदिर के चारों ओर 84 एकड़ में फैला तालाब था, जो अब अतिक्रमण का शिकार हो गया है। अब हम मंदिर के अंदर थे। बाहर ताजे फूलों की माला, बेलपत्र और प्रसाद की कुछ दुकानें थीं , जहाँ से हमलेगों ने फूल प्रसाद खरीदा। शिव एवं शक्ति की आराधना की। अन्य मंदिरों की अपेक्षा भीड़ कम होने के कारण पूजा - अर्चना निर्विघ्न सम्पन्न हुई।

 मंदिर के बहुत स्वच्छ और सुंदर प्रांगण में शिव मंदिर स्थापित है। सामने एक आधा जला हुआ आम का हरा भरा वृक्ष। रामजी के चरणपादुका के साथ राम, लक्ष्मण जी का मंदिर। कल- कल स्वच्छ जल से भरा हुआ सुंदर रानी पोखरा। हरितिमा की चादर ओढ़े पूरा परिवेश। यह स्थान साधकों की तपोभूमि भी रही है। यहाँ के प्रसिद्ध पुजारी बालक बाबा  के साथ एक और साधक पुजारी बाबा की मूर्ति भी स्थापित है। बालक बाबा ने काशी, मथुरा, हरिद्वार जैसे तीर्थस्थानों पर यात्रियों के ठहरने के लिए कई धर्मशालाओं का  निर्माण कराया था। दर्शन पूजन के बाद अतुल ने वर्तमान पुजारी जी, जिन्हें स्थानीय लोग साधु जी कहते हैं उनके पास ले गये। साधु जी उस समय विश्राम में थे अतः मेरे जिज्ञासु प्रश्नों के उत्तर के साथ अन्य कई रोचक जानकारी देने के लिए वे उपस्थित नहीं हो पाए। 

शिवलिंग के ठीक सामने आधा जला आम्र वृक्ष किसी को भी कौतुक में डाल देता है; क्योंकि उसका लगभग 70% तना जला हुआ है और बाकी पेड़ हरा भरा। आम का मौसम होने से उस पेड़ पर आम  लटक रहे थे। कहा जाता है कि इसी पेड़ की ओट से कामदेव ने समाधि में लीन भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था, और शिवाग्नि में जलकर भस्म हो गया था।

दूसरा प्रसंग है ऋषि विश्वामित्र के साथ दोनों अवधेश कुमारों के ठहरने का । तारकासुर के उत्पात से उद्धार हेतु दोनों राजकुमारों को लेकर जब ऋषि विश्वामित्र बक्सर जा रहे थे तब मार्ग में यह स्थल आया। जहाँ गंगा और सरयू का संगम है। स्नान, पूजा - अर्चन के बाद दोनों राजकुमारों ने अनेक उग्रतपा ऋषियों के आश्रम देखे जहाँ वे कठोर तपस्या में लीन थे। राजकुमारों ने कौतूहलवश उस स्थान के बारे में ऋषि विश्वामित्र जी से पूछा। विश्वामित्र जी ने बताया कि यह वही तपोभूमि है जहाँ कंदर्प ने भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था।

पौराणिक ग्रंथों और वाल्मीकि रामायण में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है। यह ऋषि दुर्वासा की तपोभूमि रही है।

अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं हुई थी।

यहाँ दो और प्राचीन शिवलिंग स्थापित है-

1. श्री कामेश्वर नाथ शिवालय जो रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम्र वृक्ष के नीचे स्थित है। यह शिवलिंग खुदाई के समय प्राप्त हुआ था।

2. बालेश्वर नाथ शिवालय। बालेश्वरनाथ शिवलिंग चमत्कारी शिवलिंग हैं। कहा जाता है कि सन् 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था, तब बालेश्वरनाथ शिवलिंग से निकले हजारों काले भौरों ने जवाबी हमला कर उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया था। 

आठवीं सदी में  मंदिर का निर्माण अयोध्या के राजा कवलेश्वरनाथ द्वारा करवाया गया था। पहले यह क्षेत्र अवध प्रांत का हिस्सा था। किंवदंती है कि अवध के राजा कवलेश्वरनाथ को कुष्ठ रोग हो गया था। वह अपनी रानी और कुछ सेवकों के साथ अवध छोड़कर तपस्या हेतु जंगल की ओर निकल गए। रास्ते में यहाँ विश्राम किया। यहाँ के वातावरण में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि राजा विश्राम के लिए कुछ समय तक यहीं ठहर गए। उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। राजा ने भव्य मंदिर, तालाब (रानी पोखरा और मंदिर के चारों ओर फैले पोखरा) का निर्माण करवाया। इसी रानी पोखरे में अवध की महारानी स्नान करती थीं।


वर्तमान में स्थानीय निवासियों के द्वारा समय - समय पर यज्ञ,अखंड पाठ इत्यादि धार्मिक एवम् सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करवाया जाता है। मंदिर का जीर्णोद्धार भी स्थानीय लोगों के सहयोग से किया गया है। लम्बे समय से प्रत्येक श्रावण मास में बक्सर उजियार घाट से काँवरिया जल लेकर पैदल, वाहन द्वारा अपनी श्रद्धा के अनुसार कारों धाम आकार शिव का जलाभिषेक करते हैं।

साधु जी द्वारा अन्य रोचक किस्से अभी सुनने बाकी थे लेकिन मेरी वापसी के लिए ट्रेन का समय करीब आ रहा था अतः न चाहते हुए भी वहाँ से निकलना पड़ा। साधु जी ने ढेर सारा ड्राइ फ्रूट का प्रसाद दिया । पुनः आने का आमंत्रण एवं आशीर्वाद देकर हम लोगों को विदा किया।

ऐसी पौराणिक और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण कारों धाम को पर्यटन विभाग की निगरानी की आवश्यकता है ताकि 84 कोस के पोखरे का जीर्णोद्धार  हो सके। साथ ही साथ स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सके। तो आप भी आइए कारों धाम।

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