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Mar 7, 2024

उदंती.com, मार्च - 2024

वर्ष - 16, अंक - 8

प्रेम

विपदाएँ आते ही,

 खुलकर तन जाता है

हटते ही, 

चुपचाप सिमट ढीला होता है;

वर्षा से बचकर,

 कोने में कहीं टिका दो,

प्यार एक छाता है, 

आश्रय देता है, गीला होता है।

                  - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना     

इस अंक में

अनकहीः रंगों और उमंगों की बौछार - डॉ. रत्ना वर्मा

विकासः असुरक्षित बाँधों को हटाना आवश्यक है - हिमांशु ठक्कर

जीवन दर्शनः महाभारत: मैं से मुक्ति - विजय जोशी

पर्व - संस्कृतिः छत्तीसगढ़ में होली- चली फगुनाहट बौरे आम... - डॉ. परदेशीराम वर्मा

बाल कविताः होली की धूम - डॉ. कमलेंद्र कुमार

महिला दिवसः स्त्री - पुरुष असमानता और हमारा समाज - डॉ. सुरंगमा यादव

कविताः  कितना कुछ कर जाती है औरत  - विजय जोशी

पर्व- संस्कृतिः शिव मंदिरों का एक सीधी रेखा में बने होने का रहस्य - प्रमोद भार्गव

कविताः  परवाज़ - प्रणति ठाकुर

फिल्मः भारतीय सिनेमा की आवाज़ को 93 वर्ष पूरे - डॉ. दीपेंद्र कमथान

कविताः ठोकरों की राह पर - लिली मित्रा

लघुकथाः क्वालिटी टाइम - अर्चना राय

बांग्ला कहानीः वह पेड़ - ऋत्विक घटक , अनुवाद - मीता दास

लघुकथाः अथ विकास कथा - सुकेश साहनी

व्यंग्यः अर्थों का दिवंगत होना - डॉ . गिरिराजशरण अग्रवाल

किताबेंः अनुवाद  मूल रचनात्मकता से बड़ा काम होता है - सुभाष नीरव

दोहेः उड़त अबीर गुलाल -  ज्योतिर्मयी पंत

रपटः वार्षिक उत्सव- रोजगारमूलक शिक्षा मुख्य उद्देश्य - उदंती फीचर्स

विशेष लेखः छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण के लिए बड़ा कदम - डॉ. दानेश्वरी संभाकर

आलेखः महतारी वंदन योजना- महिलाओं को मिली खुशियों की गारंटी - श्रीमती रीनू ठाकुर

शोधः वृद्धावस्था थामने की कोशिश

अनकहीः रंगों और उमंगों की बौछार

 - डॉ. रत्ना वर्मा

इस बार फागुन में रंगों के बौछार तो होगी ही, साथ ही एक और भारी बौछार होने वाली है और वह है चुनावी बौछार। होली का त्योहार तो दो दिन की रंगों भरी मस्ती धमाल के बाद समाप्त हो जाएगा और रंग भी दो दिन में फीका पड़ जाएगा, परंतु चुनावी बौछार दो दिन की नहीं होती। चुनाव की तारीख की घोषणा होने के साथ ही मतदान के दिन तक  चुनावी वादों, इरादों और लुभावने भाषणों की बौछार लगातार चलती ही रहेगी। यह तभी रुकती है, जब  तक नतीजे सामने नहीं आ जाते। 

 इन दिनों के चुनाव रंग और फागुनी रंग में एक और समानता देखने को मिल रही है और वह है – होली में विशेषकर ब्रज की होली में  हास- परिहास के साथ गारी गीत गाने की परंपरा है, जिसका लोग बुरा नहीं मानते। उन्हें  होली गीतों की गाली गाली नहीं लगती वह प्रेम के रंगों में पगा कटाक्ष होता है, जो माधुर्यरस से भरा होता है। कुछ इसी तर्ज पर चुनावी भाषणों और राजनेताओं के वक्तव्यों में देखने को मिलता है; पर यहाँ  दोनों में भारी अंतर है। चुनावी गालियों ने तो सारी सीमाएँ लाँघ दी हैं। लोग एक दूसरी पार्टियों की और व्यक्तियों की ऐसी छीछालेदर करते हैं कि यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या हम उसी देश के नागरिक हैं, जो अपनी संयमित भाषा, भव्य सांस्कृतिक विरासत और एकता के लिए पहचाने जाते हैं। जबकि यह हम सब जानते हैं- भाषा में संयम रखना हमारी सांस्कृतिक समृद्धि के लिए बहुत आवश्यक है।  किसी संप्रदाय को राष्ट्र के ऊपर बताना, वर्ग विशेष को आहत करने के लिए टिप्पणी करना, ये सब देश को कमजोर करने वाले वक्तव्य हैं, ऐसी बातों से जनता का विश्वास आहत होता है।  

जिस प्रकार आज के समय में होली सिर्फ हुड़दंग मचाने, पार्टी करने और खाने- पीने के अलावा रेन डांस जैसे हंगामों में लाखों गैलन पानी बहाने तक ही सिमटकर रह गई है, उसी तरह चुनावी रंग भी बदरंग हो गए हैं। यद्यपि चुनावी रंग और होली के  इस रंग में भी जमीन- आसमान का अंतर है, चुनावी रंग में जनता अपने मत और विचार व्यक्त करती है तथा देश के भविष्य का रंग- रूप  सब मिलकर तय करते हैं,  जबकि फागुन के त्योहार होली में लोग आपसी भाईचारे के साथ एक दूसरे के जीवन में प्रेम और उमंग का रंग भरते हैं। हाँ इतना अवश्य कह सकते हैं कि चुनाव और होली दोनों में ही एकता और विविधता का महत्त्व होता है। तो क्यों न इसी महत्त्व को देखते हुए हम भारतीय संस्कृति के अपने मूल स्वरूप, जिसमें कभी होता था गीत- संगीत, नाच- गान, उमंग- उत्साह जो सामाजिक एकता को बढ़ावा देने में प्रमुख भूमिका निभाता था,  उसे एक बार फिर से जगाएँ, ताकि इस त्योहार को प्रेम और सौहार्द के साथ मनाते हुए अपने परिवार और समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर रंग बिरंगी खुशियों का आनंद ले सकें।  

तो फागुनी माहौल तो बनने लगा है  फिर वह रंग चाहे चुनावी हो या फागुनी, क्यों न इसे अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए गुम हो चुकी कुछ परम्पराओं को पुनर्जीवित करते हुए एक स्वस्थ माहौल का निर्माण करें और इसे एक सामाजिक और राष्ट्रीय अनुष्ठान के रूप में मनाकर समृद्धि और सहयोग के मूल सिद्धांतों से जोड़ दें। जैसे - सामूहिक रूप से वृक्षारोपण करके, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करके, पानी बचाओ अभियान चलाकर, जनसंख्या नियंत्रण के लिए पहल करके और शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे रचनात्मक काम करके इन दोनों ही उत्सव को रंगारंग बना सकते हैं।  सोने में सुगन्ध तो तब हो जाएगी, जब  परंपरागत गीतों, कथाओं, और पौराणिक किस्सों को नई पीढ़ी के साथ साझा करते हुए अपने मौलिक सिद्धांतों को भी बचाए रखें। 

इन सबके लिए अलग से कोई विशेष प्रयास करने की जरूरत भी नहीं होगी। आप होली के लिए पकवान बनाते ही हैं, रंग गुलाल का आयोजन भी करते हैं, दोस्तों के घर जाते हैं या थीम पार्टी करते हैं, बस इन्ही के बीच किसी एक विषय को केन्द्र में रखकर उत्सव का कलेवर बदल दें।  यही बात चुनावी उत्सव में भी लागू की जा सकती है। अपनी अपनी पार्टी का एजेंडा लेकर नेता चुनावी सभाएँ करते हैं, गाँव - गाँव में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, तो इन्हीं सबके बीच जनता से मात्र वादे न करके उनकी समस्यओं को गंभीरता से सुनें और निराकरण करने की पहल तुरंत शुरू कर दें न कि वोट के बदले सहायता का अश्वासन दें। इसके लिए  आपको जनता में विश्वास पैदा करना होगा और यह तभी संभव है जब आप अपने प्रति इमानदारी बरतेंगे। 

पैसे और ताकत के बल पर आप चुनाव तो जीत सकते हैं, पर जनता का दिल तभी जीतेंगे, जब उनसे जुड़कर काम करेंगे अन्यथा पाँच साल बाद आप फिर उनके सामने होंगे तब जनता आपको वोट न देकर बता देती है कि आपने कहाँ गलती की है। इसके लिए भी प्रत्येक भारतीय को एक जागरूक नागरिक होने का कर्त्तव्य निभाना होगा। यह तभी संभव होगा जब आपको राजनैतिक पार्टियों के किए हुए कार्यों की, अपने संविधान की, नियम- कानून की, आपके लिए किए जा रहे कार्य योजनाओं की सही जानकारी होगी। 

तो आइए, इन दोनों त्योहारों का स्वागत रंग और उल्लास के साथ करें तथा प्रेम और सौहार्द के साथ रंग खेलेते हुए देश की प्रगति और विकास के लिए अपने बहुमूल्य वोट का इस्तेमाल करें। वैसे ‘आदर्श बाराबंकवी’ के शब्दों में ये बात भी सही है कि- 

कर रहा हूँ फिर सभी सौहार्द की बातें वही,

और ये भी जानता हूँ मानेगा कोई नहीं।

 सुधी पाठकों को चुनावी और फागुनी होली दोनों के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। 


विकासः असुरक्षित बाँधों को हटाना आवश्यक है


  - हिमांशु ठक्कर

जल शक्ति मंत्रालय की संसदीय समिति ने मार्च 2023 की 20वीं रिपोर्ट में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग से भारत में बाँधों और सम्बंधित परियोजनाओं के व्यावहारिक जीवनकाल और प्रदर्शन का आकलन करने की व्यवस्था को लेकर सवाल किया था। वास्तव में इस सवाल का बाँधों को हटाने के विचार पर सीधा असर पड़ता; लेकिन विभाग ने जवाब दिया था- “बाँधों के व्यावहारिक जीवनकाल और प्रदर्शन का आकलन करने के लिए कोई तंत्र नहीं और, बाँध मालिकों की ओर से किसी भी बाँध को हटाने के लिए कोई जानकारी/सिफारिश प्रस्तुत नहीं की गई है।”

इस समिति ने यह भी बताया था कि केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा संकलित बड़े बाँधों के राष्ट्रीय रजिस्टर के 2019 संस्करण के अनुसार भारत में 100 साल से अधिक पुराने 234 बाँध हैं; कुछ , तो 300 साल से अधिक पुराने हैं।

भारत में 100 साल से पुराने हटाए जा चुके बाँधों की संख्या पर विभाग ने बताया था कि सीडब्ल्यूसी में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत में ऐसा कोई बाँध हटाया नहीं गया है।

गौरतलब है कि बाँधों को बनाए रखने के लिए भारी खर्च की आवश्यकता होती है; लेकिन भारत के संदर्भ में रखरखाव को लेकर स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसी स्थिति में बाँध और भी अधिक असुरक्षित और हटाए जाने के लिए योग्य बन जाते हैं। लिहाज़ा, हमें बाँधों को हटाने के लिए एक नीति और कार्यक्रम की तत्काल आवश्यकता है।

इस मामले में संसदीय समिति की सिफारिश है - “भविष्य को ध्यान में रखते हुए, समिति विभाग को बाँधों के जीवन और संचालन का आकलन करने के लिए एक कामकाजी तंत्र विकसित करने के उपयुक्त उपाय करने की सिफारिश करती है और राज्यों से उन बाँधों को हटाने का आग्रह करती है जो अपना जीवनकाल पूरा कर चुके हैं और किसी भी विकट स्थिति में जीवन और बुनियादी अधोसंरचना के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। समिति इस रिपोर्ट की प्रस्तुति से तीन महीने के भीतर विभाग द्वारा इस सम्बंध में उठाए गए कदमों की जानकारी चाहती है।” यदि इस मामले में सम्बंधित मंत्रालय या विभाग द्वारा कोई कार्रवाई की गई है, , तो उसकी जानकारी, कम से कम, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

2021 में बाँधों का वैश्विक अध्ययन करने वाले राष्ट्र संघ विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ताओं के अनुसार भारत को अपने पुराने बाँधों का लागत-लाभ विश्लेषण करना चाहिए और उनकी परिचालन तथा पारिस्थितिक सुरक्षा के साथ-साथ निचले इलाकों (डाउनस्ट्रीम) में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समय पर सुरक्षा समीक्षा भी करनी चाहिए। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि भले ही बाँधों को हटाने का काम हाल ही में शुरू हुआ है; लेकिन यूएसए और यूरोप में यह काफी गति पकड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है: “जीर्ण व हटाए जा चुके बड़े बाँधों के कुछ अध्ययनों से उस जटिल व लंबी प्रक्रिया का अंदाज़ा मिलता है, जो बाँधों को सुरक्षित रूप से हटाने के लिए ज़रूरी होती है। यहाँ तक कि एक छोटे बाँध को हटाने के लिए भी कई वर्षों (अक्सर दशकों) तक विशेषज्ञों और सार्वजनिक भागीदारी के साथ लंबी नियामक समीक्षा की आवश्यकता होती है। बाँधों की उम्र बढ़ने के साथ प्रोटोकॉल का एक ऐसा ढाँचा विकसित करना ज़रूरी हो जाता है, जो बाँध हटाने की प्रक्रिया का मार्गदर्शन कर सके और उसको गति दे सके।”

भारत में हटाने योग्य बाँध

केरल की पेरियार नदी पर निर्मित मुलापेरियार बाँध अब 130 साल से अधिक पुराना हो चुका है। केरल सरकार , तो इस बाँध को हटाने की वकालत कर रही है, जबकि तमिलनाडु सरकार इससे असहमत है, जबकि वह बाँध का संचालन करती है और इससे होने वाले लाभ को , तो प्राप्त करती है, लेकिन आपदा की स्थिति में हो सकने वाले जोखिम में साझेदार नहीं है। केरल सरकार द्वारा 2006 और 2011 के बीच की गई हाइड्रोलॉजिकल समीक्षा का निष्कर्ष था कि मुलापेरियार बाँध अधिकतम संभावित बाढ़ के लिहाज़ से असुरक्षित है। वर्ष 2015 में नए मुलापेरियार बाँध के चरण 1 हेतु पर्यावरणीय मंज़ूरी के लिए केरल सरकार द्वारा पर्यावरण और वन मंत्रालय को भेजे गए प्रस्ताव में नए बाँध के निर्माण के बाद, पुराने बाँध को तोड़ने का एक अनुच्छेद भी शामिल था; लेकिन अंतरराज्यीय पहलुओं को देखते हुए प्रस्ताव को मंज़ूरी नहीं मिली।

इसी तरह, बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से बार-बार पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बने फरक्का बाँध को हटाने की वकालत की है। उनके अनुसार गाद-भराव, जल निकासी में अवरोध, नदियों की वहन क्षमता में कमी और बिहार में बाढ़ की संवेदनशीलता में वृद्धि के कारण इस बाँध को हटाना आवश्यक है। त्रिपुरा में किए गए अनेक शोध अध्ययन और पर्यावरण समूह त्रिपुरा स्थित डंबुर (या गुमटी) बाँध को भी हटाए जाने के पक्ष में हैं। वास्तव में, त्रिपुरा में डंबुर बाँध पर स्थापित क्षमता (15 मेगावाट) की तुलना में बिजली उत्पादन इतना कम है कि उत्तर-पूर्व पर विश्व बैंक के रणनीति पत्र (28 जून, 2006) में भी बाँध को हटाने की सिफारिश की गई थी।

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी पर महेश्वर बाँध भी एक अच्छा उम्मीदवार है जो कोई लाभ नहीं दे रहा है, बल्कि इसके कई प्रतिकूल प्रभाव और जोखिम हैं।

अलबत्ता, भारत में पुराने, असुरक्षित और आर्थिक रूप से घाटे में चल रहे बाँधों को हटाने की कोई नीति या कार्यक्रम नहीं है। पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (प्रोफेसर माधव गाडगिल की अध्यक्षता में) की रिपोर्ट में की गई महत्वपूर्ण सिफारिशों में से एक बाँधों को हटाने की भी है। इस रिपोर्ट के बाद मंत्रालय द्वारा इस सम्बंध में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

वैसे, प्रकृति ने स्वयं कुछ बाँधों को हटाने का काम शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2023 की शुरुआत में, सिक्किम में तीस्ता नदी पर हिमनद झील के फटने से 1200 मेगावाट का 60 मीटर ऊंचा तीस्ता-3 बाँध बह गया। फरवरी 2021 में एक बाढ़ ने उत्तराखंड के चमोली जिले में तपोवन विष्णुगाड बाँध और ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना बाँध को नष्ट कर दिया था। इसी तरह जून 2013 की बाढ़ में उत्तराखंड में बड़ी संख्या में बाँधों को नुकसान और तबाही का सामना करना पड़ा था। हरियाणा में यमुना नदी पर बने ताजेवाला बैराज, उसके एवज में बनाए गए हथनीकुंड बैराज के चालू होने के बाद बाढ़ में बह गया था। अक्टूबर 2023 में, महाराष्ट्र-तेलंगाना सीमा पर गोदावरी नदी पर निर्मित मेडीगड्डा बैराज के छह खंभे डूब जाने से बाँध को काफी नुकसान हुआ था। केंद्र द्वारा भेजी गई बाँध सुरक्षा टीम ने बैराज के पूर्ण पुनर्वास की अनुशंसा भी की है। यदि हम असुरक्षित, अवांछित बाँधों को हटाते नहीं हैं , तो हमें ऐसी घटनाओं में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है, जिससे समाज और अर्थव्यवस्था को बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

बदलती जलवायु और बाँध से बढ़ता जोखिम 

जलवायु परिवर्तन के कारण तीव्र वर्षा पैटर्न बाँधों को और अधिक जोखिम भरा बना सकते हैं। ऐसे में इन्हें हटाना सबसे उचित विकल्प है। तीव्र वर्षा पैटर्न से अधिकतम वर्षा और बाढ़ की संभावना में वृद्धि हो सकती है; लेकिन बाँधों और उनकी स्पिलवे क्षमता को इतनी अधिक बाढ़ के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। इसके लिए बाँधों की स्पिलवे क्षमता को बढ़ाने के लिए उपचारात्मक उपायों की आवश्यकता होती है जो काफी महँगा होता है, जैसा कि ओडिशा में महानदी पर हीराकुड बाँध पर किया जा रहा है। वास्तव में हीराकुड बाँध स्वतंत्र भारत के बाद बने सबसे पुराने मिट्टी के बाँधों में से एक है, जिसकी सुरक्षा का तत्काल मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। यही स्थिति  दामोदर नदी के बाँधों की भी है।

वास्तव में, सभी बड़े बाँधों के लिए परिवर्तित डिज़ाइन की आवश्यकता है, जिसमें बाढ़ का आकलन, बदले हुए वर्षा पैटर्न, बाँधों की कम भंडारण क्षमता, लाइव स्टोरेज क्षमता में गाद संचय और डाउनस्ट्रीम में नदियों की कम वहन क्षमता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके साथ ही बाँध की सुरक्षा का आकलन करने के लिए इसकी तुलना स्पिलवे क्षमता से की जानी चाहिए। इसके बाद स्पिलवे क्षमता बढ़ाने की व्यवहार्यता और वास्तविकता के बारे में निर्णय लेने की आवश्यकता है। इसके बावजूद जहाँ यह संभव नहीं है वहाँ बाँधों हटाने के लिए आकलन किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि बाँध कोई प्राकृतिक समाधान नहीं हैं। जलवायु वैज्ञानिक हमें प्रकृति आधारित विकास और समाधान खोजने का सुझाव देते हैं। भारत समेत पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, अन्याय, नदी, प्रकृति और जैव विविधता के नुकसान तथा बढ़ती आपदाओं जैसे कई परस्पर सम्बंधित संकटों का सामना कर रहा है। नदियाँ इन चुनौतियों से होकर बहती हैं, और इनकी बहाली एक शक्तिशाली प्रकृति आधारित समाधान हो सकता है। पारंपरिक आवश्यकताओं, आजीविका और सामान्य जीवन के लिए मुक्त बहने वाली नदियों की भी आवश्यकता है।

लिहाज़ा, भारत में पुराने, असुरक्षित और अवांछित बाँधों के बढ़ते जखीरे से हमारे सामने आने वाले बढ़ते जोखिमों को देखते हुए तत्काल बाँधों को हटाने के लिए एक नीति, योजना और कार्यक्रम की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन इस ज़रूरत को और भी अर्जेंट बना रहा है। (स्रोत फीचर्स) ■


जीवन दर्शनः महाभारत: मैं से मुक्ति

  - विजय जोशी

( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

पौराणिक प्रसंग किसी भी धर्म ग्रंथ में समाहित हों, उनकी प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध हैं। इनमें एक ओर जहाँ सरल भाषा में अपनी बात आम जन तक पहुँचाने का भाव होता है, वहीं दूसरी ओर मंतव्य भी। इस दौर में कहें , तो शाब्दिक प्रसंग हार्डवेयर तथा संदेश सॉफ्टवेयर। सो एक मित्र से प्राप्त अद्भुत विचार।

  महाभारत ग्रंथ से सभी परिचित हैं। यह मात्र दो परिवार या दो विरोधी संस्कृतियों के टकराव में सत्य की विजय का मंत्र ही नहीं, अपितु अंतस के युद्ध का सफ़रनामा भी है।  आइए इसे पात्रों के माध्यम से समझा जाए : 

1- धृतराष्ट्र: यह है हमारा मस्तिष्क जो सारी सूचनाओं को संगृहीत कर सोच को कार्यरूप में परिवर्तित करता है। निर्भर हम पर करता है कि अपने विवेक से सही निर्णय लेते हैं या स्वार्थनिहित फैसला।

2- संजय: हमारे वे मित्र या शुभचिंतक जो ठकुर सुहाती से ऊपर उठकर न केवल हमें सच्चाई से अवगत कराते हैं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।

3- कौरव: ये हैं अंतस् में उभरने वाली मोह माया रूपी वे भावनाँ जो हमें पथभ्रष्ट करने का पूरा प्रयास करती हैं। तुच्छ स्वार्थ या बाहरी आकर्षण की परत हमारी बुद्धि के कुमार्ग से कदमताल का प्रयोजन बनती हैं।

4- शकुनि: वे अवसरवादी मित्र जो हमें कुमार्ग की ओर ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

5- पांडव: ये हैं हमारी पाँच इंद्रियाँ  नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा यानी दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श, जो हमारी सहायता करती हैं नीर क्षीर उर्फ़ दूध और पानी को अलग कर निर्णय पर पहुँचने में। ईश्वर का अद्भुत उपहार बशर्ते हम इनका सदुपयोग कर सकें।

6- द्रौपदी: हमारी नैसर्गिक प्रतिभा, इच्छा, चाह या जुनून, जो हमारी 5 इंद्रियों वाली क्षमता को एक सूत्र में बाँधकर उद्देश्य प्राप्ति के साथ ही जीवन में आनंद का प्रयोजन भी बनती है। एक बात और कि यह कौरवी माया जाल से लड़ने हेतु हमारे संकल्प का सूत्र भी बनती है।  

7- कृष्ण:  तो फिर कृष्ण क्या हैं। यह है हमारी आंतरिक चेतना जो आजीवन हमारी सारथी बनकर साथ निभाती है। इसकी आवाज सुन कार्य करना हमारा नैतिक दायित्व और सफलता की कुंजी है।

8- कर्ण: परिवार के अग्रज होने के बावजूद राज्याश्रय के लोभ में कुमार्ग पथिक बन काल कवलित हो गए। यही है हमारा अहंकार जो पद, प्रतिष्ठा, पैसे की चमक मिलते ही सिर चढ़कर बोलने लगता है। कुपथ की ओर धकेल देता है। 

 अहंकार हमारे सारे गुण निगल जाता है। ईश्वर से विमुख कर देता है। कहा ही गया है EGO यानी Edging God Out। हृदय में कोई एक ही रह सकता है। अहंकार आते ही ईश्वर बाहर। यदि आपने इसे समाप्त नहीं किया , तो यह आपको समाप्त कर देगा।

 कुल मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में महाभारत के माध्यम से उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का एक अद्भुत संदेश दिया है। यह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध एक जंग है, जो हमारे चेतन और अवचेतन मन दोनों के सार्थक जीवन जीने का प्रयोजन है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम कौन सा मार्ग अंगीकार करें। 

अहंकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश

 ना मानो , तो देख लो रावण, कौरव, कंस

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सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,

 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com


पर्व - संस्कृतिः छत्तीसगढ़ में होली- चली फगुनाहट बौरे आम..

 - डॉ. परदेशीराम वर्मा

हमारा सर्व समाज उत्सवधर्मी और देश उल्लास उमंग प्रेमी है। हमारे रचनाकारों ने त्योहारों पर खूब लिखा है। विशेषकर फागुन के महीने और इसी माह पड़ने वाले दुनिया के अनोखे त्योहार होली के बारे में। ‘चली फगुनहट बौरे आम’ विवेकीराय के लोक स्वर के आलेखों की किताब का शीर्षक है।

उत्तर भारत में लोक उक्ति प्रचलित है- फागुन में बुढ़वा देवर लागे। धर्मवीर भारती ने फागुन के मौसम के नीम पेड़ पर असर के बहाने क्‍या खूब लिखा है-

झरने लगे नीम के पत्ते, 

बढ़ने लगी उदासी मन की।

होली का त्योहार उन्मुक्त होकर जीवन के महत्त्व को समझने का अवसर देता है। इस त्योहार को साहित्य संस्कृति लोक मंच से जुड़े लोगों ने भी भरपूर महत्त्व देकर इसे सतत सरस बताने में अपना योगदान दिया है। इलाहाबाद में बुढ़वा मंगल का साहित्यकारों का विशेष आयोजन इसी का हिस्सा था। गीत और उल्लास से भरे होली के त्योहार में भड़ौनी जैसे गीत भी खूब प्रचलित हैं।

ब्रज की होली में ठेंगमार होली के सम्बन्ध में तो सभी जानते हैं। एक गीत ऐसा भी प्रचलित है, जिसकी पहली पंक्ति है- लल्‍ला जायो यार को, नाम खसम का होय।

छत्तीसगढ़ में होली का त्योहार अपने विशिष्ट रंग के साथ आता है। इसमें डंडा नाच विशेष है। गाँवों में माह भर डंडा नाच की प्रेक्टिस की जाती है। आठ तरह से डंडा नाचने वाले लोग आज भी होली के अवसर पर गाँवों में मिल जाते हैं। छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी से फाग गीतों की स्वर -लहरी छत्तीसगढ़ के गावों में गूँजने लगती है। आम्र मंजरियों से सुवासित गाँव के खेत-खार, गली मोहल्ले, चना, गेहूँ से भरे खेत और बासंती वातावरण। धीरे-धीरे चढ़ता है होली का रंग।

छत्तीसगढ़ के बहुंत लोकप्रिय जन कवि ने सिर पर लाल फूलों का चँदोवा उठाए पलास और बौराए आम पर अनोखा गीत लिखा ॥ लक्ष्मण मस्तूरिया ने इस गीत में छत्तीसगढ़ के दमकते चेहरे को शब्द बद्ध किया है-

राजा बरोबर लगे मऊरे आमा,

रानी साही परसा फूलवा।

मन लागे रे मांग फागुनवा।

इस मौसम को अन्य कवियों लोक गायकों ने खूब महत्त्व देकर रचनाओं का संसार रचा।

पिंवरी पहिर सरसों झूमें, 

ढोलक सजावय ठेंमना चना।

राहेर हलावय धुनधुनात, 

गढ़ूँ घलो धुंके हरमुनिया।

धरसा के परसा म सुलगत हे आगी,

 लाली सेम्हरा ला फबे हरियर पागी।

संत पवन दीवान ने भी इस मौसम को खूब महत्त्व देते हुए चर्चित कविता का लेखन किया-

महर महर मऊहा महके, जंगल दहके।

छत्तीसगढ़ में होलिका दहन के लिए स्थल पर अरंडी गड़ाकर पूजन का विधान है। अरंडी गड़ जाने के बाद बच्चा, जवान गाँव से लकड़ी लाकर यहीं इकट्ठा करते हैं ताकि पहाड़- सी लकड़ियों को होली के दिन जलाकर आनंद ले सकें। इधर लकड़ी एकत्र करने वाली टोली निकली उधर गाँव के चौरे में नगाड़ा बजना शुरू हो गया। होली के गीतों को गाने का अभ्यास इसी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी किया जाता है। होली के कुछ बहुत दुर्लभ गीतों में सर्वाधिक प्रचलित गीत के बोल हैं-

दे दे बुलौवा राधे ला नगर में, दे दे बुलौवा राधे ल।

कुंजन बीच होरी होय, दे दे बुलौवा राधे ला

श्री कृष्ण और राधा से जुड़े गीतों की भरमार तो होती ही है अन्य देव भी गीतों के माध्यम से याद किए जाते हैं। अरे बाजे नगारा दस जोड़ी, राधा-किसन खेलय होरी।

पहली नगारा अवध म बाजे, राम-सीता के हे जोड़ी।

राकेश तिवारी कुछ विशेष गीत गाते हैं- यथा

चलो हाँ गजानन, करंव तुम्हार मैं बंदना,

 शिव गौरी के प्यारे लाल गजानन करव तुंहर में बंदना।

इसके अतिरिक्त रावण पर भी एक प्रचलित गीत है-

चलो हा रे रावन, तोर बारी म बेंदरा आए।

फुलवा के करे उजार रावन तोर बारी म॒ बेंदर आए।

ये गीत भी होली में अब गाए जाते हैं, जो भवानी माता की वंदना के गीत है। दानेश्वर शर्मा का यह गीत प्रचलित है- 

माँ आसीस देना वो

तोर सरन मा आऐन माँ असीस देना ओ।

तहीं भवानी तहीं कालिका तहीं हवस जगदंबा।

तोर परतापे टोरिन बेंदरा भालू मन गढ़ लंका।

इस तरह के गीत भी अब लोक में प्रचलित है। छत्तीसगढ़ में साहित्य लेखन की मूल शक्ति गीत मिट्‌टी से जुड़ी है। लोक से रंग लेकर यहाँ रचनाकार धीरे-धीरे आकृति ग्रहण करते हैं।

होली से जुड़ा प्रहलाद उसकी बुआ होलिका और पिता हिरणकश्यप की कथाएँ भी गीतों में आती है। प्रहलाद की विष्णुपद पर अनुरक्ति से कुपित पिता ने उसे जलाने के लिए अपनी बहन होलिका को गोद में बिठाकर होली दहकाया किन्तु प्रहलाद बच गये, होलिका ही जल मरी। यह कथा आस्था की जीत और विक्रम अनास्था की हार की कथा है जो गीतों में कही जाती है। होली जलाने के लिए कुंवारी अग्नि लाने का प्रचलन भी छत्तीसगढ़ में है। इसे चकमक पत्थर और रूई से दहकाया जाता है। मनुष्य इसी तरह अपने पुरखों के सतत विकास की कथाओं और आगे बढ़ने की ऐतिहासिक सचाइयों को दहकाते हुए आज यहाँ तक पहुँचा है। होली में खटमल से मुक्ति के लिए भी टोठके की परंपरा है। खटमल को भी जलाते हैं ताकि खटमल तंग न करे। गीत भी है-

कहाँ लुकाए रे ठेकना, 

कहाँ लुकाए खटिया म।

होलिका संग करो रे बिनास, 

ढेकना कहाँ लुकाए खटिया म।

हमारे छत्तीसगढ़ में होली गीतों में आजादी के लिए संघर्ष की कथा भी मिलती है-

अरे हाँ गांधी बबा फहरा दिए तिरंगा भारत में,

भारत में, भारत में, भारत में।

गांधी बबा फहरा दिए...

सर्वाधिक प्रचलित होली गीतों में एक ऐसा भी गीत है जिसमें आल्हा और उदल की वीरता का वर्णन है-

उदल बांधे हथियार, एक रानी सोनवा के करन म।

इसके अतिरिक्त किसन कन्हैया पर पूरी शृंखला है होली गीतों की-

काली दाह जाय, काली दाह जाय, 

छोटे से श्याम कन्हैया।

छोटे मोटे रूखवा कदंब के डाया लहसे जाय, 

डारा लहसे जाय,

छोटे से श्याम कन्हैया।

देश में हर प्रदेश का अपना विशेष अंदाज त्योहारों में भी देखने को मिलता है। हमारे बचपन के दिनों में होली जलाते समय कुछ भद्दी गालियों और देह संबंधों से जुड़ी हास्यास्पद उक्तियों को भी उछाला जाता था। लेकिन धीरे-धीरे इस परंपरा को पीछे धकेलकर नई पीढ़ी ने त्योहार के उल्लास को नया अभिनव आयाम दिया है। एक ही चिंताजनक समस्या धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ की जवानी को लीलती आगे बढ़ रही है वह है नशा पानी का। होली त्योहार को पीने पिलाने की परंपरा से जुड़ा बताकर रंग में भंग किया जाता है। समय के साथ शायद यह विकृति भी दम तोड़े। आशा तो की ही जा सकती है। 

                    ■

सम्पर्कः एल.आईजी.-18

आमदी नगर, भिलाई 490009 छ.ग.

मो.नं-9827993494


बाल कविताः होली की धूम








 - डॉ. कमलेंद्र कुमार

हरी गुलाबी नीली पीली,

और लाल पिचकारी।

लिए खड़े हैं राजा बाबू,

रामू ,राज बिहारी।

दिव्या नव्या और भारती,

लिए खड़ी गुब्बारे ।

ताक  रहे सब गली सड़क को,

कोई इधर पधारे।

आहट पा गुब्बारे फेकें,

औ' मारी पिचकारी ।

रंग- बिरंगे हुए सभी जन ,

आईं दादी प्यारी ।

साथ लिये वे लड्डू पेड़ा ,

और इमरती सारी।

खुरमी  मटरी  और पापड़ी, 

और सेव नमकीन ।

गरी चिरौंजी वाली गुजिया ,

खा गई पूरी टीम ।

सम्पर्कः रावगंज, कालपी , जालौन, उत्तरप्रदेश – 285204, मो. 9451318138


महिला दिवसः स्त्री - पुरुष असमानता और हमारा समाज

 - डॉ. सुरंगमा यादव

हम सभी जानते हैं संसार में प्राकृतिक रूप से दो प्रकार के प्राणी या जीवधारी होते हैं- नर और मादा, जिसे व्याकरणिक शब्दों में स्त्रीलिंग- पुलिंग कहा जाता  है। प्रकृति ने नर और मादा की शारीरिक संरचना में कुछ भिन्नता रखी है। यह भिन्नता प्राणियों के जीवन चक्र को बनाए रखने के लिए तथा इस सृष्टि को गतिमान रखने के लिए ईश्वरीय उपहार के समान है। इस प्रकार स्त्रीलिंग तथा पुल्लिंग एक जैविक या प्राकृतिक तथ्य है।  जब इसके साथ किसी प्रकार की असमानता को जोड़ दिया  जाता है अर्थात् एक की अपेक्षा दूसरे को अधिक महत्त्व मिलने लगता है तब यह  एक सामाजिक तथ्य बन जाता है जिसे हम लैंगिक असमानता कहते हैं। नर व मादा इन दोनों वर्गों के स्वभाव, कार्यक्षमता,लक्षण तथा आवश्यकताओं आदि में कुछ समानताएँ  और कुछ भिन्नताएँ होती हैं। ये भिन्नताएँ अन्य प्राणियों की तरह स्त्री और पुरुषों में भी होती हैं। दोनों का अपना- अपना महत्त्व है, इसलिए दोनों को समान अवसर, समान अधिकार और सामान रूप से सम्मान मिलना चाहिए; लेकिन ऐसा नहीं होता, हमारे समाज में पुरुषों को श्रेष्ठ मान लिया गया और महिलाओं को उनसे कमतर समझा गया। महिलाओं के अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। उन्हें एक संकुचित भूमिका से बाँध दिया गया। हमारे समाज में सारे विधान- नियम- ग्रंथ पुरुषों ने रचे और अपने लिए सारे अधिकार सुरक्षित करके स्त्रियों के लिये आदर्श, उत्तरदायित्व, त्याग, समर्पण जैसी चीजों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर दी। मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है-

नरकृत शास्त्रों के सब बंधन, हैं नारी को ही लेकर

 अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले  ही कर बैठा है नर।

     सिमोन द बबुआर ने लिखा है – ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है।’

    मैं कहूँगी कि स्त्री व पुरुष दोनों को बनाया जाता है। बचपन से ही दोनों के आगे ऐसे उदाहरण पेश किए जाते हैं, ऐसी चीजों को बार -बार दोहराया जाता है जिससे समाज द्वारा निर्धारित गुण चाहें वे अच्छे हों या न हों उनमें भर जाएँ, जैसे लड़कियों से बार- बार कहा जाता है कि धीरे बोलो, धीरे हँसो, धीरे चलो, तुम्हें पराये घर जाना है तुम क्या करोगी  ज्यादा पढ़कर आदि आदि। दूसरी ओर लड़के का उत्साह बढ़ाया जाता है- डरा नहीं करते, क्या लड़कियों की तरह डर रहे हो, लड़के रोया नहीं करते, मर्द को दर्द नहीं होता, क्या चूड़ियाँ पहन रखी हैं इत्यादि। इस तरह की बहुत- सी बातें हैं जो बचपन से लड़के और लड़की का व्यक्तित्व गढ़ती हैं और उनमें असमानता की खाई पैदा करती हैं।  लैंगिक असमानता हमारे समाज में सदियों से चली आ रही है यह असमानता की प्रवृत्ति समाज का व्यवहार बन गयी है, इसकी जड़ें हमारी सोच में गहरे बहुत गहरे तक जम गई हैं और हमने कई चीजों में यह मान लिया है कि ऐसा , तो होता ही रहता है। हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था रही है।   पितृसत्ता  यानी पिता का शासन,जिस व्यवस्था में पिता का शासन चलता है उसे पित्तृसत्तात्मक व्यवस्था कहते हैं ऐसी व्यवस्था में सभी प्रमुख अधिकार व निर्णय पुरुषों के होते हैं। स्त्रियों की भूमिका संकुचित होती है। बच्चों की पहचान पिता के नाम से होती है, विवाह के बाद महिलाओं का उपनाम भी बदल जाता है। स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होती थीं इसलिए भी उन्हें मुख्य भूमिका से पृथक रखा जाता था। यद्यपि अब काफी परिवर्तन हुआ है। दस्तावेजों में माता- पिता दोनों का नाम लिखा जाने लगा है। सरनेम भी बदलना आवश्यक नहीं है; लेकिन फिर भी यदि बदलना होगा,  तो स्त्री ही सरनेम बदलती है, पुरुष नहीं बदलता। 

हमारी बहुत-सी प्राचीन मान्यताएँ भी लैंगिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं। स्त्री को  सदैव ही पराधीन माना जाता रहा है और पराधीनता किसी के लिए भी सुखकर नहीं होती-कत बिधि रची नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं। इस चौपाई से भी स्त्री जाति की स्थिति को समझा जा सकता है, जिसमें पार्वती जी की विदाई के समय उनकी माँ मैना कहती हैं कि विधाता ने स्त्री जाति को क्यों पैदा किया। पराधीन को सपने में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती।  मनुस्मृति में भी ऐसा ही कहा गया है- 

पिता रक्षित कौमारे भर्ता रक्षति यौवने

 रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा: न स्त्री स्वतंत्र्यम् अर्हति ।।

 मनु स्मृति के इस श्लोक को स्त्री स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से हथियार के रूप में प्रयोग व प्रचारित किया गया। यदि इस श्लोक को सही मायने में देखें , , तो यह पुरुषों को उनके कर्तव्य का बोध कराने वाला भी है। हमारे समाज में ये भी प्रचलित है कि वंश बढ़ाने के लिए पुत्र होना आवश्यक है, पुत्र बुढ़ापे का सहारा होता है। माता -पिता का अंतिम संस्कार भी पुत्र द्वारा ही होना चाहिए तभी मोक्ष प्राप्त होता है। लड़की पराया धन होती है उसे ससुराल जाना होता है। कन्यादान जैसी प्रथा के द्वारा ये मान लिया जाता है कि विवाह के बाद लड़की पर मायके वालों का कोई हक नहीं है। प्राचीन काल से ही स्त्रियों को वस्तु के रूप में समझा गया जिसे इच्छानुसार और अवसरानुसार प्रयोग किया जा सकता है। क्रय-विक्रय, बलात् हरण, उपहार में देना, जैसे कार्य साधारण समझे जाते रहे हैं। देवदासी प्रथा के बहाने भी स्त्रियों का शोषण होता रहा।

 हमारी मानसिकता का विकास धीरे- धीरे होता है और कई चीजों पर निर्भर करता है। ग्रामीण परिवेश में पले- बढ़े और शहरी परिवेश में पले बढ़े पुरुष की मानसिकता में भी अंतर रहता है, जो दोनों स्थानों की स्त्रियों की स्थिति देखकर साफ पता चलता है । बचपन से पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों ने भी लैंगिक असमानता दिखाई देती है जैसे- माताजी रसोई घर में खाना पका रही है। पिताजी अखबार पढ़ रहे हैं। गीता बहुत अच्छा गाती है। रामू तेज दौड़ता है। इस तरह के उदाहरण बाल -मन में अनजाने ही घर कर जाते हैं कि अमुक काम किसका है?  परंतु यह अच्छी बात है कि इस तरह के उदाहरण पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाने की माँग की गई, और ये हटाए भी  गए । 

कई क्षेत्रों में विशेषकर गाँव में स्त्रियों के मन में प्रारंभ से ही यह बात बिठा दी जाती है कि पुरुष महिलाओं से अधिक श्रेष्ठ है इसीलिए उसके खान- पान और रहन-सहन के स्तर में भी अंतर होता है।  पुरुष के बिना स्त्रियों का कोई अस्तित्व नहीं है तथा उनसे ही उसकी पहचान है। उनकी आज्ञा का पालन करना स्त्री का धर्म है। राम चरित मानस में सीता जी के मुख से तुलसीदास जी ने ये बात कहलवाई है-

 जिय बिन देह, नदी बिनु वारि

 तैसेइ नाथ, पुरुष बिनु नारी।

पुरुष की श्रेष्ठता स्त्री मन पर हावी होने का ही ये परिणाम है कि वह स्वयं स्त्री होकर भी बालिका के जन्म तथा उसके विकास का विरोध करती रही हैं। स्त्री को स्त्री का विरोधी भी कहा जाता है, तुलसीदास जी भी लिखते हैं-

 नारी न मोहे नारी के रूपा

आज भी बहुत से ऐसे परिवार हैं जहाँ कन्या का जन्म देने वाली बहू की उपेक्षा की जाती है और पुत्र को जन्म देने पर महत्ता बढ़ जाती है । महिलाएँ स्वयं भी पुत्र को जन्म देने में गौरव का अनुभव करती हैं। कन्या के जन्म के साथ ही शुरू हुआ असमानता का सिलसिला जीवन पर्यंत चलता रहता है, आज भी कई घरों में पुत्र का जन्मदिन मनाया जाता है; लेकिन पुत्री का जन्मदिन नहीं मनाया जाता। 

समाज में विधवा और विधुर स्त्री-पुरुष की स्थिति में भी जमीन- आसमान का अंतर है। पुरुष यदि विधुर है , तो उस पर कोई वर्जना नहीं होती, परन्तु स्त्री को उपेक्षित और बेचारी बना दिया जाता है। शुभ कार्यों में वह सहभागी नहीं हो सकती, जाने कितनी ही बार समाज के रीति- रिवाज उसे मुँह चिढ़ाते हैं, जैसे वह कोई अपराधिनी है। जीवन पर्यंत वह यह दंश झेलती है, यहाँ तक कि उसकी निर्जीव देह भी भेदभाव का शिकार बनती है।

 ऐसे  अनेकानेक उदाहरण हैं,जो लैंगिक असमानता को दर्शाते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिये सबसे पहले हमें अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा और इसकी शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी होगी। बेटे और बेटी में फ़र्क करना बंद करना होगा। हमने अपनी बेटियों को बेटों की तरह शिक्षा देना, उनका पालन- पोषण करना शुरू भी कर दिया है, परन्तु बेटों को बेटियों की तरह पालना नहीं शुरू किया है। बेटियों की तरह पालने से मेरा अभिप्राय है कि हम उनके अंदर भी संवेदनशीलता का संचार करें। घरेलू कामकाज में हाथ बँटाना सिखाएँ, वे कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं, इसकी जानकारी रखें तथा उनके मन में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को जाग्रत करें।  बचपन से ही उन्हें ये न सिखाएँ कि वे लड़के हैं , , तो  उनके लिए सब ठीक है,चलता है।

 समाज में परिवर्तन लाने के लिए जागरूकता की आवश्यकता है, बेटियों के लिए सुरक्षात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है,  बालिकाओं को अच्छी शिक्षा और आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है, ये तभी संभव है जब हम घर व बाहर दोनों ही जगह अपनी सोच का परिष्कार करेंगे। ■


कविताः कितना कुछ कर जाती है औरत

 

 - विजय जोशी

धरती पर ईश्वर की छाया

सुंदरता की कोमल माया

अनगिन सुंदर सपन सुहाने

रच जाती है औरत


सचमुच में कितना कुछ

कर जाती है औरत.

 

सूरज से तपते ऊसर में

ठंडक बनकर के जीवन में

सावन की पहली बरखा सी

छा जाती है औरत

             सचमुच में ...

 

रिसते अंतस के दर्दों पर

जीवन के जलते जख्मों पर

हमदर्दी का कोमल फाया

रख जाती है औरत

           सचमुच में ...

 

जब समय कठिन हो

पल मुश्किल हों

, तो हसकर अभाव भी

सह जाती है औरत

             सचमुच में ...

 

या जब मन उदास हो

कोई न पास हो

ऐसे क्षण में दुखते मन को

सहलाती है औरत

             सचमुच में ...

 

खामोशी की भाषा में

बिना किसी भी आशा में

बिना कहे ही जाने क्या क्या

कह जाती है औरत

           सचमुच में ...

पर्व-संस्कृतिः शिव मंदिरों का एक सीधी रेखा में बने होने का रहस्य

  - प्रमोद भार्गव

 
तकनीक
के आविष्कार के साथ भारत की स्थापत्य कला की विज्ञान सम्मत तार्किकता सामने आने लगी है। अब भारत समेत पूरी दुनिया आश्चर्य में है कि जब अक्षांश और देशांश को जानने के उपकरण नहीं थे, तब भारत में हजारों साल पहले एक सीधी रेखा में दो ज्योतिर्लिंगों के बीच कैसे सात शिव मंदिर निर्मित कर दिए गए। ये सातों मंदिर केदारनाथ से रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग के बीच स्थित हैं। ये मंदिर पंचतत्त्वों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। सभी मंदिर देशांतर रेखा पर लगभग 79 डिग्री पर निर्मित हैं। उत्तराखंड के केदारनाथ, तमिलनाडु के अरुणाचलेश्वर, थिल्लई नटराज, जम्बूकेश्वर, एकाम्बेश्वरनाथ, आंध्रप्रदेश के श्रीकालाहस्ती और रामेश्वरम् मंदिरों को एक सीधी रेखा में स्थापित किया गया है। इस रेखा को शिव-शाक्ति अक्ष रेखा भी कहा जाता है। इन मंदिरों में कालाहस्ती जल, एकाम्बेश्वरनाथ अग्नि, अरुणाचलेश्वर वायु, जम्बूकेश्वर पृथ्वी और थिल्लई नटराज मंदिर आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन मंदिरों की उम्र 4000 वर्ष की मानी गई हैं। इनके बीच की दूरी 2383 किमी है।

    इन सभी मंदिरों के बीच भारत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग उज्जैन में स्थापित है। यह पश्चिमी देशों से बहुत पहले से समय की गणना की अवधारणा से जुड़ा है। उज्जैन जो भारत की हृदयस्थली है, इसकी भौगोलिक स्थिति विलक्षण हैं। यहां कर्क और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को काटती हैं, इसलिए इसे पृथ्वी का केंद्र बिंदु माना जाता है। यह भी धारणा है कि उज्जैन पृथ्वी और आकाश के मध्य स्थित है। भूतभावन महाकाल को कालजयी मानकर ही उन्हें काल यानी समय का देवता माना गया है। कालगणना के लिए मध्यव्रती स्थल होने के कारण इस नागरी का प्राकृतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और खगोलीय महत्व रेखांकित किया जाता रहा है। उज्जैन में महाकाल की स्थापना का रहस्य मध्यबिंदु होने के साथ मंगलगृह की उत्पत्ति का स्थल भी माना गया है। यहां पर ऐतिहासिक नवग्रह मंदिर और वैदशाला की स्थापना से कालगणना का मध्यबिंदु होने के प्रमाण मिले है।

  प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार जो भौगोलिक गणनाएं प्राचीन ऋृषियों ने की हैं, उन्होंने उज्जैन को ‘शून्य रेखांश पर माना है। कर्क रेखा भी यहीं से होकर गुजरती है। यहीं से भू-मध्य रेखा इसे काटती है। भू-मध्य और कर्क रेखा का मिलन स्थल होने के कारण इसे पृथ्वी का नाभि स्थल भी माना गया है। इसी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण प्राचीन आचार्यों के प्रतिपादित सिद्धांतों में समय गणना, पंचांग निर्माण आदि के लिए उज्जैन यानी प्राचीन अवंतिका को केंद्र बिंदू के रूप में स्वीकार किया गया। ज्योतिष के सबसे प्राचीनतम एवं सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत‘ में भूमध्य रेखा के सिलसिले में उल्लेख है कि

        राक्षसांलयदेवौकः शैलयोर्मध्यसूत्रगाः।

        रोहितकमवन्ती च यथा सन्निहितं सरः।।

  अर्थात, लंका और सुमेरू पर्वत के मध्य जो सूत्र होगा, उसके बीच के नगर रेखापुर कहलाते हैं। जैसे रोहतक, अवंति और कुरूक्षेत्र ऐसे स्थान हैं, जो इस रेखा पर स्थित है।

 प्रसिद्ध खगोलविद् भास्कराचार्य ने पृथ्वी की मध्य रेखा का वर्णन इस प्रकार किया है-

 यललोको उज्जयिनी पुरोपरि कुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत्।

  सूत्रं-मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः।।

  अर्थात, जो रेखा लंका और उज्जयिनी से होकर कुरुक्षेत्रादि देशों का स्पर्श करती हुई सुमेरू से जाकर मिलती है, उसे भूमि की मध्यरेखा कहते है। इस प्रकार भूमध्य रेखा लंका से सुमेरू तक जाते हुए उज्जयिनी सहित अन्य नगरों को छूती हुई गुजरती है, किंतु वह कर्क रेखा को एक ही स्थान उज्जैन में मिलती है। इसलिए इस स्थान को काल गणना के लिए उपयुक्त माना गया है। अतएव वर्तमान में विश्व की समय गणना के लिए जो महत्व ग्रीन विच को प्राप्त है, वहीं महत्व पुरातन काल से उज्जयिनी को प्राप्त है।

  उज्जैन में प्रतिवर्ष 21 जून को दोपहर मनुष्य की परछाई कुछ पलों के लिए साथ छोड़ देती है। जबकि परछाई हर समय मनुष्य के साथ रहती है। दरअसल 21 जून साल का सबसे बड़ा दिन होता है। इसी दिन दोपहर में सूरज सबसे ऊपर होता है, तब परछाई विशेष खगोलीय स्थिति में आ जाने के कारण लुप्त हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कर्क और मध्यरेखा का मिलन बिंदु उज्जैन है। अब यहां की प्राचीन वेधशाला में इस अनोखी खगोलीय घटना को देखने के लिए यंत्र की व्यवस्था भी कर दी गई है। चूंकि 21 जून का दिन सबसे लंबा दिन होता है, इसलिए सूरज उत्तरी गोलार्ध से होता हुआ ठीक कर्क रेखा के ऊपर आ जाता है। इस दिन, दिन सबसे बड़ा होता है, लेकिन रात छोटी होती है। इस दिन की लंबाई 13 घंटे 34 मिनट तक की रिकॉर्ड की गई है। इसीलिए उज्जैन को ‘शून्य (0) रेखांश पर माना गया है। अर्थात जब हमारे ऋषि कर्क, भूमध्य रेखा और ‘शून्य रेखांश को जानते थे, तब अक्षांश और देशांतर भी जानते थे। इसीलिए केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच स्थित सात शिव मंदिर एक सीधी रेखा में बनाया जाना संभव हुआ।

   उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ मंदिर 79.0669 डिग्री देशांतर पर स्थित है, इसे अद्र्ध ज्योतिर्लिंग कहते हैं। नेपाल के पशुपतिनाथ शिव मंदिर को मिलाकर यह पूर्ण हो जाता है। इस मंदिर को महाभारत काल में पांडवो ने बनवाया था और फिर आदि ‘शंकराचार्य ने इसकी पूनस्र्थापना की थी। आंध्रप्रदेश के चित्तूर में श्री कालीहस्ती मंदिर को पंचतत्वों में जल का प्रतिनिधि माना जाता है। यह मंदिर 79.6983 डिग्री देशांतर पर स्थित है। एकाम्बेश्वर मंदिर 79.42,00 डिग्री देशांतर पर स्थित है। इस शिव मंदिर को पृथ्वी तत्व की मान्यता प्राप्त है। इस विशाल शिव मंदिर को पल्लव राजाओं ने बनवाया था। बाद में चोल वंश और विजयनगर के राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कर इसमें कई सुधार किए। अरुणाचलेश्वर मंदिर भी चोल राजाओं ने बनवाया था। यह मंदिर 79.0677 डिग्री देशांतर पर स्थित है। जम्बूकेश्वर मंदिर करीब 1800 साल पुराना है। इसके गर्भग्रह में जल की धारा निरंतर बहती रहती है। यह मंदिर 79.0677 डिग्री देशांतर पर स्थित है। केरल में स्थित थिल्लई नटराज मंदिर 79.6935 डिग्री देशांतर पर स्थित है। इसका निर्माण आकाश तत्व के लिए किया गया है। यह मंदिर महान नर्तक शिव के नटराज रूप को समर्पित हैं। चिदंरबरम में स्थित इस मंदिर की दीवारों पर नृत्य की 108 मुद्राओं का सबसे प्राचीन चित्रण हैं। रामेश्वरत ज्योतिर्लिंग तमिनलाडू में स्थित है। यह मंदिर 79.3174 डिग्री देशांतर पर स्थित है। भागवान श्रीराम ने रावण की लंका पर चढ़ाई करने से पहले इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण यौगिक गणना के आधार पर एक सीधी रेखा में इनके निर्माण के कालखंड में संभव हो पाया था। यह भी एक धारणा है कि इन मंदिरों का निर्माण कैलाश मानसरोवर को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

  उज्जैन के महाकाल से ज्योतिर्लिगों की दूरी भी अत्यंत सोच-समझकर तीन अंकों की दूरी पर निर्धारित की गई है। उज्जैन से सोमनाथ की दूरी 777 किमी, ओंकारेश्वी की 111, भीमाशंकर 666, काशी विश्वनाथ 999, मल्लिकार्जुन 999, केदारनाथ 888, त्रयंबकेश्वर 555, बैजनाथ धाम 999, रामेश्वरम 1999 और घृष्णेश्वर 555 किमी की दूरी पर स्थित हैं। उज्जैन देश के मानचित्र पर 23.9 अंश उत्तर अक्षांश एवं 74.75 अंश पूर्व रेखांश पर समुद्र तट से लगभग 1658 फीट की ऊंचाईं पर बसा प्राचीन नगर है। हमारे पूर्वजों की यह ऐसी अद्वितीय प्रोद्यौगिकी थी, जिसे आधुनिक उपकरणों एवं संचार उपग्रहों से जुड़ा विज्ञान भी नहीं जान पाया है।   

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सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224, 09981061100


  

  

        


कविताः परवाज़

  - प्रणति ठाकुर






खोल अपने पंख कि परवाज़ है तू ।


खोल अपने पंख कि नभ मापना है,

धरा के विस्तार को भी आँकना  है,

इस तिमिर में भोर का आगाज़ है तू

खोल अपने पंख कि परवाज़ है तू ।

 

भूलकर बैठा है तू अपने हुनर को ,

पर क्यों तू भूला कठिन जीवन - समर को।

थकके अब मत बैठ कि जाँबाज़ है तू

खोल अपने पंख कि परवाज़ है तू ।

 

उठ धरा की धमनियों से ओस की बूँदें‌ निचोड़ें,

अनगिनत तारे गगन में चल ज़रा हम भी , तोड़ें,

गिर पड़े इन सरफिरों की जीत का अंदाज़ है तू ।

खोल अपने पंख कि परवाज़ है तू ।

 

चल तुम्हारे पाँव में आकाश भर दूँ,

मन के अंध प्रकोष्ठ में अमित प्रकाश भर दूँ

भेद दे हर लक्ष्य जो इक ऐसा तीरंदाज़ है तू ।

खोल अपने पंख कि परवाज़ है तू ।


फिल्मः भारतीय सिनेमा की आवाज़ को 93 वर्ष पूरे

फिल्म के एक सीन में विट्ठल और जुबैदा
- डॉ. दीपेंद्र कमथान
- गूँगी फिल्म उद्योग को जुबान – ‘आलमआरा’,
 प्रदर्शन - 14 मार्च 1931, मैजिस्ट्रिक सिनेमा,  गिरगाँव मुम्बई, 
- डब्ल्यू. एम. खान एवं जुबैदा - पहले गायक/ गायिका, 
- दे दे खुदा के नाम पे प्यारे... हिंदी फिल्म के पहले गाने के रूप में पहचाना गया।

आदमी ने अपनी जैसी परछाइयों का अविष्कार एक सदी पूर्व किया था, वह चाहता था कि परछाइयाँ उसकी तरह चलें बोलें बात करें हँसें  रोएँ । उसकी मात्र ‘परछाइयों’ वाली परिकल्पना सन् 1913 को भारतीय फिल्मी इतिहास की पहली कथा फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के रूप में अवतरित हुई । यह परछाइयाँ मात्र मूक परछाइयाँ ही थीं । इन परछाईयों को ‘जुबान’ देने की आधारशिला रखने वाले महान व्यक्तियों में आर्देशिर मारवान ईरानी का नाम प्रमुख है । 05.12.1886 को पूना में जन्में ईरानी ने यूरोपीय देशों में फिल्मों को आवाज़ मिलने के बाद स्वयं यूरोप में रहकर ‘ध्वनि’ की तकनीक को समझा एवं सारे जरूरी उपकरण क्रय कर भारत लौटे और सन् 1926 को स्थापित अपनी इम्पीरियल फिल्म कं. के बैनर तले फिल्म ‘आलमआरा’ का निर्माण शुरू किया । खुद की पटकथा पर भारत की पहले हिन्दी-उर्दू भाषा में निर्मित बोलती फिल्म एक कास्ट्यूम ड्रामा फिल्म थी, जिसके प्रमुख कलाकार मास्टर विठ्ठल, जुबैदा, जिल्लो, पृथ्वीराज कपूर
मैजेस्टिक सिनेमा में
आलम आरा का  पोस्टर

(फिल्म में खलनायक का चरित्र निभाया), डब्ल्यू.एम. खान जगदीश सेठी (हिन्दी सिनेमा के पहले स्नातक), सुशीला, एलिज़र थे । संवाद जोज़फ डेविड, फोटोग्राफी आदिल ईरानी एवं संगीत फिरोजशाह मिस्त्री एवं बेहराम ईरानी का था ।

दे दे खुदा के नाम पे प्यारे,  बदला दिलवायेगा यार अब तू सितमगारों से, रूठा है आसमान, तेरी कटीली निगाहों ने मारा, दे दिल को आराम ऐ साकी गुलफाम, भर भर के जाम पिला जा और दरस बिन मोरे हैं तरसे नयना प्यारे, जब यह मूल रूप से रिलीज़ हुआ, , तो मुहम्मद वज़ीर खान के गीत ‘दे दे खुदा के नाम पे प्यारे’ ने लोकप्रियता हासिल की और इसे हिंदी फिल्म के पहले गाने के रूप में पहचाना गया। शेष गीत अधिकतर ज़ुबैदा द्वारा गाए गए थे; लेकिन फ़िल्म के क्रेडिट में, न तो संगीत निर्देशक और न ही गीतकार का उल्लेख किया गया था।

आर्देशिर ईरानी
श्री केरसी मिस्त्री के अनुसार फिल्म के सभी गीतों की धुन उनके पिताजी स्व. फिरोजशाह मिस्त्री ने बनाई थी । फिल्म की कुल लम्बाई 10 हजार 500 फुट थी, 4 माह में बनी इस फिल्म की लागत 40,000/- आई थी, (सेठ बद्रीप्रसाद दुबे एक बिजनेस मुगल ने आलम आरा के लिए फंडिंग प्रदान की) फिल्म की अवधि 124 मिनट एवं इसका सेंसर सर्टिफिकेट नं0 10043 था । (दिन के शोर शराबे खास तौर से लोकल ट्रेन के शोर से बचने के लिए फिल्म की शूटिंग रात में की जाती थी ।) फिल्म के कुल 7 गीतों में भारतीय इतिहास का पहला गीत - ‘दे दे खुदा के नाम पर प्यारे ताकत हो गर देने की, कुछ चाहे अग, तो माँग ले मुझसे, हिम्मत हो गर लेने की’ गाकर वजीर मोहम्मद खान (डब्ल्यू.एम. खान) पहले गायक बने ;परन्तु मलाल यह कि इसका ग्रामोफोन रिकार्ड नहीं बना एवं इस फिल्म के निगेटिव भी नष्ट हो चुके हैं। फिल्म में नायिका जुबैदा के भाई का रोल महबूब ने किया था, जो आगे चलकर फिल्म मदर इंडिया के निर्माता-निर्देशक बने । सन् 1931 में 1000/- रुपया मासिक वेतन पाने वाले नायक मा. विठ्ठल का इस पहली संवाद फिल्म में एक भी संवाद नहीं  था । फिल्म की सफलता का आलम यह था कि चार आने के टिकट 5 रुपये. तक ब्लैक में बिके ।  14 मार्च 1931 को गिरगाँव, मुम्बई के मैजिस्टीक सिनेमा में प्रदर्शित कर इस महान व्यक्ति आर्देशिर ईरानी का निधन 14.10.1969 को हो गया। ■

सम्पर्कः 35 / जे .10,  रामपुर गार्डन, बरेली. 243001


कविताः ठोकरों की राह पर

 


 - लिली मित्रा

ठोकरों की राह पर

और चलने दो मुझे

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे 

 

फ़र्क क्या पड़ता है चोट,

लगी फूल या शूल से

रो पड़ी है या नदी 

लिपट अपने कूल से

घाव सारे भूलकर 

नई चाह बुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा 

दर्द मिलने दो मुझे... 

 

खटखटाता द्वार विगत के

क्यों रहे मन हर समय

घट गया जो, घटा गया है

कालसंचित कुछ अनय

पाट नूतन खोलकर

नई राह चुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे.. 

 

कौन जाने क्या छिपा है

आगतों की ओट में?

निर्माण की अट्टालिका

फिर धूसरित विस्फोट में

अवसाद सारे घोलकर

नई आह सुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे..


लघुकथाः क्वालिटी टाइम

  - अर्चना राय

अरसे बाद दोनों घर में अकेले थे। मौसम भी सुहाना हो रहा था। घने बादल, ठंडी हवा के साथ रिमझिम बारिश की फुहारें कुछ अलग ही समाँ बाँध रही थी। पति हमेशा की तरह कमरे में  ऑॅफिस की फाइलों में व्यस्त थे।

"यह लीजिए, चाय के साथ आपके पसंद के प्याज के पकोड़े।"- पत्नी ने पकौड़ा उनके मुँह में डाल कर, मुस्कुराते हुए कहा।

 कितने समय बाद आज वह पत्नी को भर नजर देख रहे थे। अचानक उनके मशीनी शरीर में इंसानी स्पंदन महसूस होने लगा। आज पत्नी कुछ ज्यादा ही सुंदर लग रही थी या वे ही थोड़ा रूमानी हो रहे थे, कहना मुश्किल था।

"तुम भी, तो मेरे पास आकर बैठो।"- पत्नी का हाथ प्यार से पकड़ते हुए कहा।

"अरे!...आप खाइए, मुझे रसोई में काम है।" - पत्नी ने बनावटी  आवाज में कहा।

 "बैठो न! आज हम कितने दिनों बाद, घर में अकेले हैं, वर्ना सारा दिन घर और बच्चों में व्यस्त होती हो।"

"आपके पास भी कहाँ टाइम रहता है। दिन भर आफिस, और घर पर भी फाइलों में ही डूबे रहते हैं।"

"क्या करूँ? इस बार मुझे प्रमोशन चाहिए ही है। तीन साल हो गए एड़ी चोटी का जोर लगाते, अब, तो मेरे जूनियर भी मुझ से आगे निकल गए हैं।"

"चिंता न कीजिए, इस बार आपको जरूर तरक्की मिलेगी। मैंने भगवान से प्रार्थना की है।" 

"अच्छा यह सब छोड़ो, आओ कुछ अपनी बातें करते हैं।"- पति ने शरारत से आँखें चमकाते हुए कहा।

 ठंडी हवा के झोंके के साथ, सौंधी खुशबू ने आकर कमरे को भर दिया।

"हटिए न! आप भी।" -पत्नी के गाल शर्म से गुलाबी हो गए।

"सुनो न!मुझे तुमसे कुछ कहना है।"- पति ने प्यार से  कहा।

"अरे हाँ! याद आया मुझे भी आपसे कुछ बताना है।"- अचानक से पत्नी के चेहरे का गुलाबी रंग उड़ गया।

"कहो? "

 "बिट्टू के स्कूल से फीस भरने का नोटिस आया है। पूरे पाँच हजार भरने हैं।"- पत्नी ने चिंतित होते हुए कहा।

  कमरे  में फैली खुशबू कुछ कम सी होने लगी। पति के चेहरे पर भी चिंता की लहर दौड़ गई।

"सब इंतजाम हो जाएगा।"- अपने आप को संभाल कर पुनः पत्नी को बैठाते हुए बोला।

 "और हाँ...गाँव से भी माँ जी का फोन आया है, इस बार फसल खराब हो गई है। , तो साल भर का अनाज नहीं भेज पाएँगी, उसका इंतजार हमें ही करना पड़ेगा।"

"अच्छा!" पति का चेहरा अब  तनाव ग्रस्त हो गया।

"कल मकान मालिक भी धमका रहा था। पिछले महीने, चाचा की बेटी की शादी ने घर का सारा बजट ही बिगाड़ दिया है।"-पत्नि अपनी धुन में कहे जा रही थी।

 "हाँ..हाँ देखता हूँ। "-अचानक से पति ने पत्नी का हाथ छोडकर, फाइल उठा ली और पन्ने पलटने लगा।

"अरे! आप भी , तो कुछ कह रहे थे न? " - पत्नी ने कुछ सोचते हुए कहा।

"ऊँ... हां कल से ऑफिस के डब्बे में दो रोटियाँ और ज्यादा रख देना। सोचता हूँ ओवरटाइम  कर लूँ।"

अब कमरे से खुशबू पूरी तरह उड़ चुकी थी। और धीरे -धीरे उसका इंसानी शरीर मशीन में तब्दील होने लगा। 

                               ■

सम्पर्कः भेड़ाघाट जबलपुर म. प्र.


बांग्ला कहानीः वह पेड़

   - ऋत्विक घटक , अनुवाद - मीता दास

   गाँव - से कुछ दूरी पर एक छोटी नदी के तट पर ठोकर खा कर गिरा हुआ सा एक बरगद का पेड़ था। कहें , , तो  पेड़ों की तुलना में वह कोई बहुत बड़ा पेड़ नहीं था ।

    बहुत ही पुराना पेड़ था वह, जड़ों को कीड़ों ने खा लिया था, पेड़ की डालियाँ भी सड़ गईं थीं।  विस्मृत हुई, सुदूर गुज़रे ज़माने में यही पेड़ तरोताजा था, किन्तु आज वैसा नहीं है। वैसे किसी काम का नहीं था वह पेड़। सिर्फ गाँव आने के रास्ते पर लोगों के लिए यह पेड़ एक पहचान के तौर माना जाता था, लोग जानते थे कि इसके बाद है, हारू लोहार का कारखाना, और उसके बाद असली गाँव...।

     वर्ष में सिर्फ एक बार इस पेड़ की अहमियत  बढ़ जाती। चड़क पूजा के समय उस पेड़ की कुछ जड़ों की शाखाओं को कुछ अनजान व्यक्ति तेल और सिंदूर लगाकर अत्यंत सुशोभित कर देते, दूर- दूर के कई गाँवों से लोग भी आते थे। गाँव का मैदान एक मेले में तब्दील हो जाता। तब उस पेड़ की छटा अचानक देखने लायक बन जाती। किन्तु उसके बाद वह पेड़ पूरे वर्ष भर वैसा ही पड़ा रहता।आसपास पड़ी हुई जमीन पर गाएँ चरा करतीं, कभी कभी सुदूर गाँव से आया पथिक उसकी शीतल छाया में बैठ जाता और पोटली खोलकर चिवड़ा - मुर्रा खाकर नदी का पानी पीकर फिर रवाना होता ।

 ...चाँदनी रात में वह पेड़ विशाल मैदान के तट पर अकेला अपने आँगन में अपूर्व आलौकिक सृष्टि उत्पन्न कर मस्त होकर परिवर्तनशील नदी के जल में ना जाने किसी रहस्यमय सपनों में खो जाता...

     साल की छह ऋतुयें अनवरत रूप से उस पेड़ के सर के उपर से गुजर जाती। नदी से जाती हुई नौकाएँ  पेड़ की छाँव के झरोखों के छोटे -छोटे मुँहख़ानों से अजीब कौतूहल दृष्टि से उस पेड़ की  ओर देखती थीं ।

      उस पेड़ की तलहटी छोटे बच्चों के लिए मौज मस्ती की जगह थी। पुष्ट पेड़ की शाखाओं में बच्चे खेला करते, पेड़ की डालियों में चढ़कर छलांग लगाते, स्कूल से भागकर आ बैठते थे ।

     गाँव के लोग बचपन से ही उस पेड़ के पास आते थे। गर्मी की दोपहरी में, कोई कोई व्यक्ति उस पेड़ के नीचे, जहाँ पेड़ की जटाएँ आपस में एकत्र हो, एक सुंदर बैठने की जगह बनाकर, उस पर बैठकर नदी की विस्मय भरी कल- कल ध्वनि का आनंद लेते थे ।

     वहाँ के मछुआरे जानते थे कि उस पेड़ के किनारों की जड़ों के फाँक- फाँक में मछलियाँ पायी जाती हैं ...कई प्रकार की छोटी बड़ी मछलियाँ। इसलिए उनके बच्चे जब कभी नहाने आते, , तो गमछों को फेंककर मछलियाँ पकड़ते। कभी - कभी जाल फेंककर भी मछलियाँ पकड़ी जातीं ।

     गाँव के बड़े बूढ़े भी उस पेड़ को जानते थे। वे लोग पेड़ के तने पर टेक लगाकर बैठे बैठे देखते - बच्चों का खेल, बच्चों का मछलियाँ पकड़ना, और मन ही मन अपना सर हिलाते। शायद अपने शैशव काल में खो जाते ।

    किन्तु यह गाँव वाले यही नहीं जान पाए कि इस बूढ़े बरगद के पेड़ की कितनी बड़ी जगह है उनके दिलों में। वो बस इतना ही सोचते थे कि यह , तो सिर्फ बूढ़ा  शिव-बरगद है। यह सदियों से यहाँ था और यहीं रहेगा। बस यही  कहावत चरितार्थ थी... " हारू लुहार के मोड़ पार , बूढ़ा शिव बरगद का झाड़"।

    एवं जहाँ तक संभव हो वह यहीं रहता और कई सदियों तक, अनवरत जाने वाले पथिकों को आश्रय देता:  किन्तु अचानक एक दिन बिना किसी सूचना के सरकार की एक नई विचारधारा उपस्थित हुई। वर्तमान सरकार की व्यवस्था की  नई विचारधारा के तहत नदी को बढ़ाकर चौड़ा किया जाएगा। अतएव एक दिन जबरदस्त आपत्तियों के  साथ बड़ा शोर करता हुआ वह बूढ़ा शिव बरगद जमीन पर गिर पड़ा। और नदी के दोनों किनारों को समान रूप से काटकर उस प्राचीन नदी को नई नदी के रुप में परिणत किया गया।...

   किन्तु उनकी यह आपत्ति बड़बड़ाने के बीच ही दबकर सीमाबद्ध होकर रह गई। आखिर वह पेड़ गिर ही गया ।... उसके बाद गाँव के लोग धीरे- धीरे उस बरगद के पेड़ को भूलने लगे। नए चेहरे, नए मकान, नए घर द्वार ...सब कुछ नया- नया। केवल, जब कभी गाँव के वयोवृद्ध उस जगह से गुजरते, तब नदी का वह किनारा बड़ा नग्न सा लगता था उनकी आँखों में। इसलिए वे लोग हाथ पैर हिला हिलाकर इस कहानी को नए लोगों को सुनाते थे। यही है उनके नव  जागरण की कथा...

       किन्तु वह भी कितने दिनों तक !

    बरगद का वह पेड़, इतने दिनों तक लोगों को आश्रय देते- देते आज लोगों के दिलों से भी निःशब्द होकर  विलुप्त हो गया ।  ■

सम्पर्कः  63/4, नेहरूनगर वेस्ट, भिलाई, छत्तीसगढ़ 490020 , मो- 9329509050 

email- mita.dasroy@gmail.com


लघुकथाः अथ विकास कथा

 - सुकेश साहनी

बड़े साहब के चेम्बर में बड़े बाबू विकास सम्बंधी कार्यों के बिल पारित करवा रहे थे। ब्रीफिंग के लिए छोटे साहब भी वहाँ मौजूद थे।

"यह बिल किस काम का है?" बीस लाख के एक बिल पर हस्ताक्षर करने से पहले बड़े साहब ने जानना चाहा।

"सर, यह बिल उस पीरियड से सम्बंधित कार्यों का है, जब माननीय मंत्री जी क्षेत्रीय निरीक्षण पर आए थे।"

"ग्राम मेवली में कुछ ज़्यादा ही ख़र्च नहीं हो गया?" अगले बिल को देखते हुए बड़े साहब ने पूछा।

"नहीं सर! दीवाली पर प्रमुख सचिव महोदय से आपकी जो वार्ता हुई थी, उसी के अनुसार बिल तैयार कराए गए हैं।"

" ये छोटे-छोटे कई बिल......?

"ये सभी बिल चीफ साहब से सम्बंधित है, जब नैनीताल से लौटते हुए उन्होंने तीन दिन हमारे क्षेत्र में आकस्मिक निरीक्षण हेतु हाल्ट किया था।"

"हमारी बेटी की शादी भी करीब आ गई है।" बड़े साहब ने अर्थपूर्ण ढंग से छोटे साहब की ओर देखा।

"पूरी तैयारी है, सर!" छोटे साहब ने उत्साह से बताया और बड़े बाबू ने तत्काल एक बिल बड़े साहब के सामने हस्ताक्षर हेतु रख दिया।

"इन बिलों को शामिल करते हुए क्षेत्र के विकास के लिए प्राप्त कुल धनराशि के विरूद्ध खर्चे की क्या स्थिति है?"

"शत प्रतिशत!" छोटे साहब ने चहकते हुए बताया।

"एक्सीलेंट जॉब!" बड़े साहब ने शाबाशी दी।

                                  ■


व्यंग्यः अर्थों का दिवंगत होना

 

  - डॉ . गिरिराजशरण अग्रवाल

बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब, तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने जानबूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि चंडीप्रसाद स्वयं भी प्रचलित शब्दों और मुहावरों के कट्टर विरोधी थे। फिर चंडीप्रसाद जैसे माई के लाल पर 'रज़ाई का लाल' मुहावरा ही फिट बैठता है, 'गुदड़ी का लाल' नहीं। इस बात को आप जानते ही हैं कि रज़ाई यदि अपने-आपमें मध्यम वर्ग की द्योतक है, तो गुदड़ी निम्न वर्ग की। साथ ही यह बात भी आप भली-भाँति जानते हैं कि गुदड़ीवाला निम्नवर्ग राजनीतिक खिला़ड़ियों की खेल-प्रतियोगिता में फुटबाल का काम करता है। एक पक्ष के खिलाडि़यों द्वारा किक मारी गई, तो इधर, दूसरे खिलाडि़यों के द्वारा ठोकर मारी गई, तो उधर। भारी गुत्थम-गुत्था के बाद अगर कोई पक्ष गोल दागने में सफल हो जाए, तो सफल पक्ष सत्ताधारी, असफल रह जाने वाली टीम विपक्ष की मारा-मारी। रह गई फुटबाल, तो अगली प्रतियोगिता तक उसका कोई काम, कोई महत्त्व नहीं। वह या, तो क्रीड़ा-सामग्री के भंडार में चुपचाप पड़ी रहेगी अथवा समय-समय पर फूँक भरने के काम आएगी। फुटबाल और जनता फूँक भरने के लिए और खेल-प्रतियोगिता के दौरान किक मारने के लिए ही होती है।

क्षमा कीजिए, हमने जनता बनाम फुटबाल की यह व्याख्या अपनी बुद्धि से नहीं की है। चंडीप्रसाद जी की बुद्धि सक्रिय रही है इस कार्य में। चंडीप्रसाद बेचारे अपने अंतिम दिनों में एक नया शब्दकोश संकलित कर रहे थे कि समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो गए। आपको यह बात भी याद दिलाना अच्छा रहेगा कि ऐसे ‘रज़ाई के लाल’, जिन्हें समाज दिखावे के लिए भी प्यार नहीं करता, समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। यह बात अलग है कि प्यार , तो उन्हें भगवान् भी नहीं करता, पर वे वन-वे वाला इश्क़ करते हुए भगवान् की झोली या उसकी खोली में पहुँच ही जाते हैं।

अब आपको यह जानकर दुख या आश्चर्य नहीं होगा कि चंडीप्रसाद जी ने शब्दकोश लिखते-लिखते अचानक आत्महत्या कर ली और धींगामुस्ती करके ज़बरन भगवान को प्यारे हो गए।

   जब तक चंडीप्रसाद जीते रहे, ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते रहे; लेकिन हमें अंत तक यह आश्चर्य रहा कि चंडीप्रसाद जी को ट्यूशन मिल कैसे जाते थे? यह आश्चर्य उस वक़्त भी है, जब चंडीप्रसाद धाँधली से भगवान् को प्यारे हो चुके हैं। यह भी अजीब बात है कि आदमी लोक से परलोक चला जाता है; लेकिन आश्चर्य छोड़ जाता है। बाबू चंडीप्रसाद भी विरासत में दो चीज़ें छोड़ गए। एक, तो आश्चर्यचकित कर देनेवाला अपना अधूरा शब्दकोश और दूसरा हाफ़ कोट यानी बंडी। चंडीप्रसाद जब तक जीवित रहे, बंडी जुड़वाँ बच्चों की तरह उनके साथ चिपकी रही। सच कहें,  तो चंडी और बंडी एक-दूसरे के पूरक थे, बंडी के बग़ैर चंडीप्रसाद चंडीप्रसाद नहीं लगते थे। ऐसा लगता था जैसे वह चंडीप्रसाद होकर भी चंडीप्रसाद होने का ढोंग कर रहे हों। यही कारण था कि लोग चंडीप्रसाद की जगह उन्हें बंडीप्रसाद कहने लगे थे; लेकिन सामने नहीं, पीछे-पीछे, क्योंकि हमारे यहाँ सच्ची बात सिर्फ़ पीठ-पीछे कही जाती है, सामने सच्ची बात कहने वाले या तो पागल होते हैं या मूर्ख अथवा दोनों का मिश्रण।

  चंडीप्रसाद जी पागल थे या मूर्ख या दोनों का मिश्रण, यह , तो हम नहीं कह सकते, पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि और बहुतों की तरह चूँकि वह भी मुँह-दर-मुँह होकर सच नहीं बोल सकते थे, इसलिए लिखकर सच बोलते थे। इस सच बोलने में चंडीप्रसाद की बंडी हमेशा उनकी सहायक बनी रही। बंडी की बगली ज़ेबों से काग़ज़ों का जो पुलिंदा प्राप्त हुआ, वह दो बातें सिद्ध करता है, एक, तो यह कि घाघ टाइप के लोग सच को बगल में दबाकर रखते हैं और उनके मरने पर सच का जो पुलिंदा सामने आता है, वह भयंकर विस्फोट करने के लिए काफी होता है।

उदाहरण के लिए चंडीप्रसाद जी ने अपने अपूर्ण शब्दकोश की भूमिका बाँधते हुए लिखा था कि अब समय आ गया है कि हिंदी का पूरा शब्दकोश संशोधित करके दोबारा लिखा जाए। संशोधित करने की बात को सिद्ध करते हुए चंडीप्रसाद ने लिखा कि जब भारत का संविधान एक बार नहीं दर्जनों बार संशोधित किया जा सकता है , तो शब्दकोश में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं हो सकते? चंडीप्रसाद जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि मातृभूमि के अतिरिक्त कभी कोई और भूमि मेरे पास नहीं रही, इसलिए सदा भूमिकाओं पर ही सं, तोष करना पड़ा। चंडीप्रसाद जी ने लिखा है कि मैंने जीवन-भर कभी कोई किताब पूरी तरह नहीं पढ़ी, किताबों की भूमिकाएँ पढक़र ही अपनी भूमिहीनता की संतुष्टि करता रहा। पर जीवन के अंतिम चरण में मैंने इस रहस्य को समझा कि भूमि अपनी हो, तो जैसी भी हो, जोतनेवाले को फसल मिल ही जाती है, किंतु यह जो भूमि का पॉकिट एडीशन भूमिका है, इससे तो भ्रम और भटकाव के अतिरिक्त कोई और फसल मिलती ही नहीं। हमारा विचार है कि चंडीप्रसाद को भूमिकाएँ पढ़ते-पढ़ते ही एक नया शब्दकोश लिखने का विचार आया था; लेकिन उन्हें इस ख़तरे का भी पूरी तरह अनुमान था कि उनके द्वारा लिखे जा रहे शब्दकोश को देश के धनकोश वाले महापुरुष स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि प्रचलित अर्थों वाले शब्दों से उनके स्वार्थ जुड़े हैं।

चंडीप्रसाद ने अपनी भूमिका में यह भी लिखा है कि प्रचलित शब्दों की नई व्याख्या इसलिए भी ज़रूरी हो गई है कि शब्द अब सच को छिपाने अथवा सुननेवालों को भ्रमित करने अथवा धोखा देने के लिए प्रयुक्त होने लगे हैं। उनके अनुसार यह त्रासदी गुदड़ीवाले यानी जनसाधारण अधिक झेल रहे हैं। वे अपनी अज्ञानता और अज्ञानता से भी अधिक सरलता के कारण शब्दों के आज भी ठीक वही अर्थ लेते हैं, जो पुराने शब्दकोशों में लिखे हैं। इसलिए पछताते हैं और उस समय पछतावे से कुछ होता नहीं, जब चिड़ियाँ खेत चुगकर चली जाती हैं। चंडीप्रसाद ने चिड़ियों का खुलासा नहीं किया। चिड़ियों से शायद उनका अभिप्राय बिना पंख के उड़नेवाले उन जंतुओं से है, जो उड़ते,  तो हैं, किंतु उड़ते हुए दिखाई नहीं देते।

लंबी भूमिका के अतिरिक्त चंडीप्रसाद जी की जेब से जो एक छोटा-सा पुर्जा बरामद हुआ, उसमें पुराने शब्दों की नई लेकिन विस्तृत व्याख्या की गई है। उदाहरण के रूप में कुछ शब्दों के सच्चे-सही अर्थ आप भी देखिए-

 प्रेम : व्यक्तिगत स्वार्थ का एक अटपटा शब्द, जिसमें दोनों ही अपना- अपना सुख लाभ एक-दूसरे के जीवन में खोजने और प्राप्त करने के लिए सदैव एक-दूसरे को भ्रमित करते रहते हैं। ब्रैकिट में चंडीप्रसाद ने लिखा है, मानव-जाति के पास इससे ज़्यादा दिखावटी और बनावटी शब्द और कोई नहीं है।

 धर्म : विधि-विधान की एक ऐसी व्यवस्था, जिसे अपने सामयिक हितों के लिए मन-मरज़ी के अनुसार , तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हो। यह धर्मात्माओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं के हाथ की लाठी भी है, जिसके द्वारा वे हम सबको हाँकने का सफल प्रयास करते हैं। यह मानव-प्रेम के नाम से दानव-प्रेम की ओर ले जाता है ; लेकिन इसके प्रेमी-प्रेमिकाएँ समझते यही हैं कि वे धर्म- प्रेम का प्रचार कर रहे हैं। इसे सरल भाषा में हाथी के दाँत भी कहा जा सकता है, जो खाने के और होते हैं, दिखाने के और।

राजनीति : नीति शब्द इसमें केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए जोड़ दिया गया है। जैसे अँगूठी में लाल-नीला नग जोड़ दिया जाता है। वैसे यह राज+काज ही है, नीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि नीति क्षण-क्षण बदलती रहती है, जबकि राज स्थायी रूप से सदा चलता रहता है। इसलिए नीतिविहीन राज का अर्थ होता है-निराज। कुल मिलाकर राजनीति को संशोधित कर निराजनीति कर दिया जाना चाहिए। यह अति आवश्यक है।

देशप्रेम: निर्वस्त्र होकर देश को नंगा करना। वैसे भी प्रेम की वासना अपने अंतिम चरण में एक-दूसरे को निर्वस्त्र करने पर उतारू हो जाती है, इसी अनिवार्यता पर चलते हुए अधिकतर देशप्रेमी देश के कपड़े उतारकर अंत में स्वयं भी निर्वस्त्र होकर नृत्य करते दिखाई देते हैं।

 लोकतंत्र: आधुनिक दुनिया का सबसे लोकपि्रय खिलौना, जो कई देशों को ख़ून की भेंट देकर प्राप्त हुआ। यह बच्चों को दिए जाने वाले झुनझुने से अलग प्रकार का एक झुनझुना है। टीन से बने झुनझुने से बच्चे तथा शब्दों से बने इस झुनझुने से सभी प्रौढ़ पुरुष-नारियाँ एवं वृद्ध लोग खेलते हैं और मदारी के इशारे पर जमूरों की तरह नाचते हैं। इसमें समस्याएँ उत्पन्न की जाती हैं, हल नहीं की जातीं। सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र वह होता है, जिसमें लोगों को गाली देने और गोली खाने की आज़ादी है। फिर भी लोग झुनझुना बजाते रहें और खेलकर दिल बहलाते रहें।

मानव-अधिकार: अधिकारहीन लोगों द्वारा खड़ा किया गया ऐसा बखेड़ा, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। पिछले लंबे समय से इस शब्द को नया अर्थ देने का प्रयास किया जा रहा है; लेकिन यह अर्थ को ग्रहण नहीं कर पा रहा है। इसलिए मानव-अधिकार का मतलब है-चीख़-पुकार, शोर-शराबा, हाहाकार।

 मंत्रिमंडल: राजा-महाराजाओं का संग्रह। सामंतशाही में राजा एक होता था, लोकशाही में अनेक राजा होते हैं। पहले एक अकेला राजा खाता था, अब कई मिल-बैठकर खाते हैं। खाने की क्रिया एक-जैसी है। बस खानेवालों की संख्या बढ़ गई है।

 विपक्ष: सिर्फ़  ग़लत को ही ग़लत नहीं, सही को भी ग़लत सिद्ध करके अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाला महा अनुभवियों का वह गिरोह, जिसका अपना कोई चूल्हा नहीं होता। वह हमेशा दूसरों के चूल्हों पर अपनी रोटियाँ सेंकता है। अगर देश में कहीं कोई और बढि़या चूल्हा उपलब्ध न हो, तो वह सीता मैया की रसोई में भी घुसने से नहीं चूकता।

  स्पष्टवादिता: चापलूसी की एक अद्भुत प्रणाली। कहा जाता है कि एक सज्जन किसी बहुत बड़े धन्नासेठ के पास कोई आवश्यक काम लेकर पहुँचे। वह जानते थे कि सेठ जी बहुत कट्टर सिद्धांतवादी आदमी हैं, मक्खनबाज़ी से चिढ़ते हैं और दुत्कारकर निकाल देते हैं। यह सज्जन ठहरे एक काइयाँ आदमी, आए और अभिवादन के उपरांत तुरंत बोले-'सेठ जी, ये गुण , तो लाख टके का है आपमें कि आप ख़ुशामदियों को पास नहीं फटकने देते। आप दूर से ही उन्हें फटकार देते हैं।' सेठ जी ने अपनी प्रशंसा सुनी , तो गद्गद् हो उठे और आगंतुक का कार्य चुटकी बजाते कर दिया। स्पष्टवादिता की यह प्रणाली लाभदायक भी है और सम्मानजनक भी।

नमूने के इन शब्दों और उनके नवीनतम अर्थों को देखते हुए अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि बाबू चंडीप्रसाद ने अपने शब्दकोश की चर्चा करते हुए यह भी लिखा था कि मानवजाति के उपयोग में आनेवाले सारे ही शब्द पिछली एक शताब्दी से झूठ की लंबी खूँटी पर उलटे लटके हुए थे, जैसे आपने देखा होगा कि पुराने घरों में चिमगादड़ें उलटी लटकी रहती हैं। मैंने और कुछ नहीं किया, बस शब्दों के अर्थों को उनकी खूँटियों पर सीधा लटका दिया है। चंडीप्रसाद ने यह भी लिखा है कि झूठ को एकदम सच की तरह बोलने की प्रयोगात्मक कला, जो वर्तमान आदमी की अद्भुत विशेषता बन गई है, गहरे शोध और अनुसंधान का विषय है। अगर यह अनुसंधान न किया गया , तो शब्दों के असली अर्थ इसी तरह दिवंगत हो जाएँगे, जिस तरह मृत आदमी की आत्मा दिवंगत हो जाती है।  

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