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Jul 7, 2024

कहानीः मेरा क्या कसूर है पापा

  - स्नेह गोस्वामी

बाहर की डोरबेल बजी और अधीरता से बजती चली गई । चकले पर रोटी बेलती सुमी के हाथ से घबराहट में पेड़ा नीचे गिर गया । उसने झुककर आटा का वह पेड़ा उठाया ही था कि लुढ़कता हुआ बेलन सीधा उसके पैरों पर आकर गिरा । सुमी की चीख निकल गई । वह अचानक लगी इस चोट से बिलबिला उठी थी । उधर दरवाजे की घंटी लगातार बजे जा रही थी । लँगड़ाते हुए उसने बाहर जाकर दरवाजा खोला ही था कि राजेंद्र सिंह ने खींचकर चपेड़ दे मारी – हरामजादी, किससे बातों में मगन हो रही थी ? कब से दरवाजा खटखटा रहा हूँ और तूने कानों में कड़वा तेल डाल रखा है । सुनाई ही नहीं देता तुझे?

तब तक रसोई में तवे पर डाली रोटी जलने की महक आने लगी थी, तो पापा को वहीं डाँट लगाते छोड़ सुमी एक हाथ से अपना गाल सहलाती हुई पैर घसीटते हुए रसोई की ओर लपकी । तवे पर रोटी जलकर काली हो चुकी थी । उसने फटाफट वह रोटी उतार कर डस्टबिन में डाली । तवे को अच्छी तरह खुरचकर साफ किया । धो-पोंछकर दोबारा तवे पर चढ़ा दिया । तवा मँजने से चमक आया था । उसके मन में एक साध जागी – काश कोई उसे भी इसी तरह धो माँज देता तो बिना किसी कसूर के जन्म- जन्म के लिए माथे पर लगी कालिख उतर जाती । 

उसने एक ठंडा हौंका लिया । दीदी तुम इस तरह घर छोड़ कर क्यों चली गई । सारी जिंदगी के लिए तुम्हारे हिस्से की भी सजा मेरे हिस्से आ गई । 

 आँखों में छलक आए आँसू उसने जबरन वहीं पलक में सोख लिये थे । पापा अब माँ पर गरज रहे थे । माँ चुपचाप अपराधिन की तरह गर्दन झुकाए सुन रही थी ।

 बेटियाँ पैदा कर- करके घर भर लिया । इन्हें सँभालना नहीं आया तुझे । इन्हें कोई अक्ल शऊर भी सिखाया होता । सारा दिन घर में बैठी पता नहीं क्या करती रहती हो । इन पर नजर भी नहीं रख सकती । कहीं मुँह दिखाने लायक  नहीं छोड़ा तुम माँ बेटियों ने ।  

 कितने अच्छे थे वे दिन जब वह इस घर की लाडली बेटी हुआ करती थी । एक बहन बड़ी थी, लगभग पाँच साल बड़ी बहन, सुनीता बहन । उसे वह प्यार से सुनी दीदी कहती । मम्मी सुनीता को चिड़िया कहती और उसे परी । उन दोनों से छोटा एक भाई भी था टीटू यानी की नरेंद्र सिंह, उससे ढाई साल छोटा। कितना हँसता खेलता परिवार था उनका । पूरा दिन घर बच्चों के हँसने खेलने और शरारतों से गुलजार रहता। रसोई में माँ तरह तरह के पकवान बनाती और सब एकसाथ बैठ चाव से मजा ले ले कर खाते । छुट्टी वाले दिन पिकनिक का कार्यक्रम बनता । कभी रोजगार्डन, कभी चिड़ियाघर तो कभी किसी आसपास की रिश्तेदारी में । पापा हरपल उनके साथ बने रहते । दफ्तर से पापा लौटते, तो टीटू  उनके कंधे पर सवार रहता । दीदी का चेहरा फूलों- सा खिला रहता । मम्मी सब को खुश देख निहाल हुई रहती । पापा की सीमित- सी आय थी, पर मम्मी अपनी सुघढ़ता और समझदारी से उसी में गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाए जा रही थी कि कभी किसी चीज का अभाव महसूस ही नहीं हुआ। कपड़े सस्ते और सादा होते जिन्हें मम्मी और दीदी घर पर सिलाई मशीन से सिल लेती । उन पर सुन्दर कढ़ाई करके उन्हें डिजाइनर बना देती । तरह तरह के लैस और पाइपिंग लगा कर फ्राक और स्कर्ट सिले जाते ।  धुले प्रेस किए वह कपड़े पहन कर जब वे भाई- बहन कहीं बाहर जाते, तो खुद को किसी राजकुमार या राजकुमारी से कम न समझते । रिश्तेदार और पड़ोसी बार- बार छूकर देखते और पूछते – कौन से शो रूम से खरीदी है ये ड्रेस । हमें भी बताओ, हम भी अपने बच्चों के लिए लाएँ, तो वे खिलखिला कर भाग खड़े होते । 

पढाई में वे तीनों भाई बहन बहुत होशियार तो नहीं थे कि कक्षा के पहले तीन विद्यार्थियों में स्थान बना पाते;  पर इतना जरूर था कि हर साल अच्छे अंकों से पास हो जाते और उस जमाने में बिना किसी ट्यूशन के अपने बलबूते परीक्षा पास कर जाना किसी चमत्कार से कम न था । सब के साठ प्रतिशत के आसपास अंक आ ही जाते तो राजेंद्र सिंह गर्व से राह चलते पड़ोसियों को रोककर बताते – अजी बहुत होशियार है हमारे टीटू । बासठ प्रतिशत अंक लेकर पास हुए है और छुटकी परी, उसके तो पैंसठ प्रतिशत अंक बने हैं । ये बड़की,  इसकी तो बड़ी क्लास है, बड़ी पढ़ाई फिर भी उनसठ प्रतिशत अंक ले आई । माँ के साथ घर का सारा काम करवाती है, फिर भी पढाई में बहुत बढ़िया हैं । इसे तो मैं प्रोफेसर बनाऊँगा। टीटू बनेगा पुलिस का सबसे बड़ा अफसर और परी बनेगी बड़े अस्पताल की डॉक्टर या नर्स । पर उनके ये सारे सपने उस दिन बिखर गए, जब दीदी सामने चौंक पर खुली मुनियारी की दुकान के नौकर के साथ भाग गई । 

वह दिन रोज जैसा ही दिन था, दीदी तब बारहवीं में थी । बोर्ड की डेटशीट निकल चुकी थी। प्रेक्टिकल हो चुके थे और आजकल प्री बोर्ड परीक्षाएँ चल रही थी । बस एक महीना और फिर दीदी का दाखिला शहर के बड़े कालेज में हो जाना था । वह बी. एस .सी करेगी फिर एम.एस सी और फिर एक दिन प्रोफेसर हो जाएगी । दीदी से ज्यादा हम इस बात को सोच सोचकर उत्तेजित होते रहते । सुमी तब आठवीं कक्षा में थी और टीटू पाँचवी में । दीदी अब देर रात तक जागकर पढ़ती- लिखती रहती। कभी कभी पूरी रात इसी तरह पढ़ते- पढ़ते बिता देती । मम्मी और पापा उन्हें इस तरह मेहनत करते देखते तो खुश हो जाते । 

एक रात परी की नींद खुली, तो वह पानी पीने के लिए उठी । चिड़िया दीदी अभी तक लिखने में व्यस्त थी । परी ने उत्सुकता से उस कागज पर झाँका तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया। दीदी दो पेज लिखने के बाद कागज पर दिल में तीर घुसा रही थी । एकदम उसके मुँह से निकला - लव लेट .. इसके आगे वह बोल पाती, इससे पहले ही सुनीता ने उसके मुँह के आगे अपनी हथेली अड़ा दी थी – प्लीज परी । घर में किसी को मत बताना। वरना घर के लोग मुझे मार डालेंगे।  वह आँखों में विनती भर धीरे से फुसफुसाई थी ।

पर तुम इस तरह आधी रात को किसे लिख रही हो यह सब। 

वो मेरी क्लास में मीरा है न, उसने कहा था मेरे लिए लिख देना, तो उसके लिए लिख रही थी। उसे अपने पड़ोस में रहने वाला रवि पसंद है । तुम कहती हो, तो आज के बाद नहीं लिखूँगी । बस आज भर लिख लेने दो । उसने मुझे मम्मी की कसम दे रखी है ।

ठीक है , बस आज ही । दोबारा लिखोगी, तो मम्मी से बता दूँगी । 

नहीं लिखूँगी मेरी प्यारी बहना । 

उसके बाद से दीदी डरी- डरी से रहने लगी थी । बहुधा अकेले में मेरे हाथ पकड़ लेती – परी तुमने बताया तो नहीं न माँ को । प्लीज मत बताना । तुम्हें विद्या पढ़ाई की कसम । काले नागराज की कसम । वे तरह- तरह की कसमें देकर मुझे बार- बार रोकती । मैं उन्हें विश्वास दिलाती कि किसी से न कहूँगी; पर उन्हें यकीन आता ही न था ।

और इसके चार दिन बाद रोज की तरह दीदी स्कूल के लिए  तैयार हुई, अच्छे से नाश्ता किया । अपना स्कूल बैग पीठ पर लादा। रसोई के कोने में बने मंदिर के सामने खड़े होकर भगवान की मूर्ति को नमस्कार किया और स्कूल जाने के लिए घर से निकली । उसके बाद तीन बजे । चार बजे । पाँच भी बज गए: पर दीदी स्कूल से घर नहीं लौटी । माँ को घबराहट होनी शुरू हुई, तो उन्होंने पापा से कान्टैक्ट किया । पापा अपनी बेटी को लेकर पूरी तरह से विश्वस्त थे– क्यों परेशान होती हो । समझदार बच्ची है, कहीं काम पड़ गया होगा । आती होगी । वे टेनिस खेलने क्लब चले गए । 

पर माँ को चैन कहाँ, उन्होंने जितनी सहेलियों के नम्बर पता थे, उन सबके घर में फोन मिलाए । पर सुनीता दीदी का कहीं भी पता नहीं था । टीटू दो तीन लड़कियों के घर जानता था वह साइकिल पर सवार हो, उनके घर गया और लौटते हुए खबर लाया कि दीदी तो आज स्कूल गई ही नहीं । ऐसा कैसे हो सकता है । सुमी दौड़कर उनकी किताबों के पास पहुँची । किताबें कापियाँ तो सारी की सारी वहीं धरी थी, फिर ये लड़की स्कूल बैग में क्या ले गई । कपड़ों की अलमारी खोली गई । वहाँ से चार पाँच नए सूट नदारद थे । माँ ने अपनी अलमारी देखी । सुनीता की अँगूठियाँ चेन और टाप्स, माँ की चार चूड़ियाँ और उनके  साथ साथ पाँच हजार रुपये ... । माँ तो धम्म से वहीं बैठ गई । दोनों हाथों से सिर थाम लिया था । इस लड़की से ऐसी उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी। 

  पापा रोज की तरह रात आठ बजे क्लब से लौटे थे । लौटते ही खबर मिली कि सुनीता अभी तक स्कूल से नहीं लौटी, तो वे भी घबरा गए । माँ ने डरते- डरते उन्हें अलमारी से कपड़े और जेवर गायब होने की खबर दी, तो उनका गुस्सा माँ पर फूट गया – तुम करती क्या रहती हो सारा दिन । तुम्हे इतना भी पता नहीं चलता कि ये लड़कियाँ सारा दिन क्या गुल खिलाती रहती हैं । माँ कहना तो चाहती थी कि तुम्हें ही कौन सा पता चला, पर वे चुपचाप सुनती रही । पापा ने स्टेशन और बस स्टैंड छान मारे थे पर दीदी को न मिलना था न मिली । पूरा घर तनाव में था । माँ सदमे में थी और पापा अजीब सी मनःस्थिति में । तीन दिन घर में चूल्हा नहीं जला था । चौथे दिन पड़ोस के सूरज प्रकाश अंकल के घर दीदी ने टेलीफोन कर अपनी और जयंत की शादी की खबर दी, तो पापा का गुस्सा फट पड़ा था – ये लड़की अचानक इतनी बड़ी हो गई कि अकेले ही शादी का फैसला कर ले । सिर्फ फैसला ही नहीं शादी भी कर ले और पड़ोसियों को फोन पर अपनी बेशर्मी की खबर दे । पैदा करके पालते- पोसते हम रह गए और वह लड़का सब कुछ हो गया । पड़ोसी ज्यादा सगेवाला हो गया ।

फिर शाम तक यह बात भी पता चल गयी कि यह जयंत तो नाइयों का बेटा है, जो चौक वाली दुकान पर दो- तीन हजार रुपये की नौकरी कर रहा था । उस दिन पापा बेहद हताश और बौखलाए हुए थे । बार बार कहते – इस लड़की के लिए मैंने क्या क्या सपने देखे थे । सब बर्बाद कर दिए । अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है । देखना भुगतेगी । बद्दुआ की तरह कुछ बोल उनके मुँह से अस्फुट फूटते । माँ कुछ तो इस अचानक घटी घटना से कुछ पापा के डर से बिल्कुल सहम गई थी । अगले दिन यह खबर पूरे मौहल्ले की ज्वलंत खबर बन कर चर्चा का विषय हो गई । पापा ने दफ्तर जाना बंद कर दिया था। बात- बात में खीझे रहते । टीटू बाहर खेलने जाता, तो था पर जैसे ही किसी को सुनीता के बारे में बात करते सुनता, घर आकर तोड़- फोड़ करना शुरु कर देता । धीरे धीरे इस बात को पंद्रह दिन बीते फिर बीस फिर धीरे- धीरे घर सामान्य होने की कोशिश करने लगा । पर उस दिन के बाद पापा बेहद शक्की और गुस्सैल हो गए थे । वह पढ़ने बैठती, तो पापा बीसियों बार आकर झाँक जाते कि पढ़ ही रही है न, कहीं कोई प्रेमपत्र तो नहीं लिखा जा रहा । स्कूल छोड़ने खुद जाते । बीच में भी कई बार स्कूल देखने चले जाते कि वह स्कूल में ही है न । वह साल बीतते ही उसका स्कूल छुड़वा दिया गया था । जो पढ़ना है घर में पढ़ लेगी। प्राइवेट परीक्षा देगी । उसका छत पर जाना , बाहर सड़क पर निकलना सब पूरी तरह से प्रतिबंधित हो गया था । कभी माँ कुछ कहना चाहती, तो पापा गरज उठते – जाहिल औरत एक बेटी तो घर से भगा दी, अब दूसरी को भी भगाने का इरादा है । जरा सी भी उल्टी सीधी हरकत नजर आई तो माँ बेटी को काटकर डाल दूँगा । माँ बीमार रहने लगी थी । उनके सिर में भयंकर असहनीय दर्द रहने लगा था । घर का सारा काम सुम्मी के सिर आ पड़ा था।

इसी बीच एक दिन सुनी दीदी अपने पति के साथ शहर लौट आई थी । हमारे घर से दो मौहल्ले छोड़ कर उनकी ससुराल थी। पति आवारा, कम पढा लिखा, निकम्मा लड़का था। जब तक जेब में पैसे रहे , सब ठीक ही था । पैसे खत्म हो गए तो मार- पीट लड़ाई झगड़े शुरु हो गए । कई महीने सहन किया । अंत में किसी तरह मनाकर ससुराल ले आई थी । ससुराल में भी घर से भागी हुई इस लड़की के लिए कोई इज्जत न थी । एक दिन शाम को वे घर की दहलीज पर आ खड़ी हुई । टीटू ने देखा तो चहका – माँ पापा देखो अपनी सुनी आई है । पापा ने वही से गरज कर कहा – मर गई हमारी सुनी । तुझे मुँह दिखाते लाज नहीं आई । जा वहीं, जहाँ से आई है । घर के दरवाजे उनके मुँह पर बंद कर दिए गए । उस दिन उन्हें अपनी अधूरी छूटी पढ़ाई का बहुत अफसोस हुआ होगा । दीदी की सिसकियों की आवाजें देर तक बंद दरवाजे के बाहर सुनती रही । हम दोनों भाई बहन किताबों के पीछे छिपे हुए टुकुर- टुकुर देखते रहे । आखिर सुनीता उठकर चली गई । अब किसी शोरूम में नौकरी करती हैं । चार हजार मिलते हैं ।

पापा ने सुकून महसूस किया होगा कि उनकी दुआ या बद्दुआ सही साबित हो गई । पर सुमी, सुमी पर पहरे बढ़ गए । उसकी एक एक गतिविधि पर तीन जोड़ी आँखें टिकी रहती । घर में रिश्तेदारों का आन- जाना सीमित हो गया था केवल गिने- चुने लोग आते । उसमें भी सुमी सात तालों में बंद रखी जाती । सुमी हिस्टिरिक हो गई। किसी पुरुष की आवाज सुनते ही उसे दौरा पड़ जाता । वह बेहोश हो हो जाती । इसी बीच उसकी मौसी ने सलाह दी कि इसके लिए कोई वर ढूँढकर विदा कर दो । पहले तो पापा भड़क  गए –  इसकी शादी करके क्या करूँगा । ये भी भाग जाएगी किसी दिन किसी के साथ देख लेना । पर बाद में मान गए । एक बैंक में क्लर्क लड़का खोजा गया । लड़के के पिता नहीं थे । माँ थी, दो भाई थे । एक सादे से समारोह में शादी सम्पन्न हुई । सुमी ससुराल गई तो सही पर अपनी सहम , डर को साथ लेकर । पति या देवर जैसे ही उसके सामने आते वह दहशत के मारे बेहोश हो जाती । उसके दाँत जुड़ जाते । जब भी दौरा पड़ता, उसके हाथ पैर बुरी तरह से काँपते और हाथ में पकड़ी वस्तुएँ गिरकर बिखर जातीं, टूट- फूट जातीं, । तंग आकर ससुराल वाले सात महीने बाद ही सुमी को मायके छोड़ गए । बीमारी के चलते तलाक हो गया । अब सुमी पापा के घर में है। हमेशा पथराई नजरों से सबको पूछ रही है – मेरा क्या कसूर था पापा। 

मो. 8054958004


1 comment:

Anonymous said...

मर्मस्पर्शी, शिक्षाप्रद कहानी॥ सुदर्शन रत्नाकर