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Feb 1, 2026

दोहेः ऋतु वासंती

  - कमल कपूर

पीत पाग जब पहनके, आए संत बसंत ।

धरा कहे कर जोड़के, आओ रति के कंत ।।

 

सौरभ की गगरी उठा, भर आँचल में फूल।

मधु-ऋतु जब पैदल चली, उड़ी बसंती धूल।।

 

मधुबन में है आ खड़ी, मधुर बसंत-बहार।

घूँघट के पट खोलके, कलियाँ रहीं निहार।।

 

बारिश और बसंत का, बड़ा अनोखा मेल।

बगिया के हर फूल से, खेले बरखा खेल।।

 

वासंती ऋतु ने किया, आज अनोखा काम।

सारा गुलशन लिख दिया, अलि तितली के नाम।।

 

आते ही ऋतुराज के, धरा बदलती रूप।

बरसाते रविराज भी, चटक बसंती धूप।।

 

पर्णहीन हर पेड़ पे, उगती मीठी आस।

हरित पात लाकर खड़ा, फिर से यह मधुमास ।। 

 

आते ही ऋतुराज के, हुलस उठे सब बाग।

कोयल बुलबुल गा रहीं, मधुर मिलन के राग।।

 

वसन वसंती धारके, आए जब ऋतु-भूप।

धरती ने धारण किया, नूतन एक स्वरूप।।

 

आते ही मधुमास के, खुले भाव के बंध।

कलमकार लिखने लगे, कविता और निबंध।।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।

जब भारत के पटल ने, लिखा 'निराला' नाम।।

 

पाँचवीं तिथि बसंत की, मौसम था खुशहाल ।

'महा निराला' रूप में, मिला धरा को लाल ।।

 

थाती मधुर बसंत की, बचपन वाला गाँव।

हरे चने के खेत सब, अमलतास की छाँव।।

 

माँ रंगती थी चुन्नियाँ, घोल बसंती रंग।

बढ़ जाती थी चौगुनी, जी की मदिर उमंग।

 

माँ के चौके में पका, सर्वोत्तम पकवान।

पीले चावल गुड़- पगे, ऋतु बसंत की शान।

 

कली-कली इतरा रही, छूकर मुखर बयार।

ओढ़ बसंती ओढ़नी, इठलाए ज्यों नार।।

 

धरती-अंबर में घुला, शोख बसंती रंग।

मधुराज यहाँ रँग रहे, खुद को इनके संग।।

 

सरसों के खलिहान में, आया धीर बसंत ।

पीले चोले पहनके, घूम रहे ज्यों संत ।।

 

अभिनंदन मधुमास का, करें रेशमी पेड़।

छू फूलों की डालियाँ, हवा रही है छेड़।।

 

रंग-गगरिया थामके, आ पहुँचे ऋतुराज ।

कलियाँ सज़दे कर रहीं, हवा छेड़ती साज।।


May 15, 2020

सपनों के गुलमोहर

सपनों के गुलमोहर
-कमल कपूर
अमेरिका से तीन माह बाद लौटी रश्मि, पति रवि के साथ कदमताल करते हुए एयरपोर्ट से निकल कर ‘पार्किंग-लॉट’ में पहुँची तो रवि को एक नई चमचमाती उजली ‘इनोवा’ का दरवाजा खोलते देख चौंकी लेकिन प्रफुल्लित नहीं हुई, अपितु मुर्झा गई ।
‘‘तो इनोवा ले ली? मतलब मेरे गुलमोहर कटवा दिये?’’ बुझे स्वर में पूछा उसने।
‘‘ये बातें बाद में…. अभी तो इस महारानी की सवारी का लुत्फ़ उठाओ। पता है सड़कों पर यूँ फिसलती है ज्यों मानसरोवर में राजहंस तैरता है । ‘हाय री मेरे सपनों की गाड़ी’ मुस्कुराते हुए कहा उसने और रश्मि को उसकी मुस्कान जहर-सी लगी ।’’
‘‘और मेरे सपनों की फसल का क्या?’’ एक ठंडी लंबी साँस लेते हुए रश्मि ने कहा और पलकें मूँदकर दर्द पीने की कोशिश करती हुई अतीत में खोने लगी….
…. बरसों पहले बड़े अरमान से घर के पिछले आँगन में उसने दो शिशु-गुलमोहर रोपे थे, यह सोच कर कि कम से कम एक को तो मिट्टी अपना ही लेगी पर उदार मिट्टी ने दोनों को अपना लिया और दोनों साथ-साथ ही बड़े होकर, एक दिन सुर्ख गुलाल से फूलों से लद गए । उसकी ललछौंही छाँव में बैठ कर कितने ही काम निपटाती थी वह। बच्चों के अनुराग से बरसते थे वो रेशमी, नर्म, फूल उस पर। उसके सुख की निरंतरता में बाधा पड़ी…. अभी कुछ महीने पहले रवि ने रट लगा ली थी कि पुरानी गाड़ी बेच कर वह नई ‘इनोवा’ लेंगे पर उससे पहले गुलमोहर कटवाकर गैरेज़ बनवाएँगे, ताकि उनसे झरने वाले फूल-पत्ते और पक्षियों की बीट गाड़ी को खराब न कर सकें। रश्मि जमकर विरोध करती रही , पर उसे बड़ी बिटिया पुरवा के पास तीन महीने के लिए अमेरिका जाना पड़ा और पीछे से रवि ने मनमानी कर ही ली ।
गाड़ी घर के सामने रुकी और वह झटके से बाहर निकली तो छोटी बिटिया प्राची आ कर माधवी-लता-सी उसके गले से लिपट गई, ‘‘मम्मा! आपके लिए सरप्राइज़ है ।’’
‘‘जानती हूँ…. उसी पर सवार हो कर तो आई हूँ,’’ कसैले स्वर में कह वह उसे परे करते हुए पिछले आँगन में पहुँची…. यह क्या? अबीरी-फूलों की आभा बिखेरते उसके दोनों गुलमोहर सिर जोड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे और उनके आसपास एक संगमरमरी चबूतरा भी बनवा दिया था । चार हाथ की दूरी पर सफ़ेद नीली पॉली-शीट का बना एक सुंदर कार-शेड भी जैसे उसका स्वागत कर रहा था…. उसी पल प्राची और रवि भी सामने आ कर खड़े हो गए और उसने एक साथ दोनों को बाहों में भर लिया ।