पीत पाग जब पहनके, आए संत बसंत ।
धरा कहे कर जोड़के, आओ रति के कंत ।।
सौरभ की गगरी उठा, भर आँचल में फूल।
मधु-ऋतु जब पैदल चली, उड़ी बसंती धूल।।
मधुबन में है आ खड़ी, मधुर बसंत-बहार।
घूँघट के पट खोलके, कलियाँ रहीं निहार।।
बारिश और बसंत का, बड़ा अनोखा मेल।
बगिया के हर फूल से, खेले बरखा खेल।।
वासंती ऋतु ने किया, आज अनोखा काम।
सारा गुलशन लिख दिया, अलि तितली के नाम।।
आते ही ऋतुराज के, धरा बदलती रूप।
बरसाते रविराज भी, चटक बसंती धूप।।
पर्णहीन हर पेड़ पे, उगती मीठी आस।
हरित पात लाकर खड़ा, फिर से यह मधुमास ।।
आते ही ऋतुराज के, हुलस उठे सब बाग।
कोयल बुलबुल गा रहीं, मधुर मिलन के राग।।
वसन वसंती धारके, आए जब ऋतु-भूप।
धरती ने धारण किया, नूतन एक स्वरूप।।
आते ही मधुमास के, खुले भाव के बंध।
कलमकार लिखने लगे, कविता और निबंध।।
मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।
जब भारत के पटल ने, लिखा 'निराला' नाम।।
पाँचवीं तिथि बसंत की, मौसम था खुशहाल ।
'महा निराला' रूप में, मिला धरा को लाल ।।
थाती मधुर बसंत की, बचपन वाला गाँव।
हरे चने के खेत सब, अमलतास की छाँव।।
माँ रंगती थी चुन्नियाँ, घोल बसंती रंग।
बढ़ जाती थी चौगुनी, जी की मदिर उमंग।
माँ के चौके में पका, सर्वोत्तम पकवान।
पीले चावल गुड़- पगे, ऋतु बसंत की शान।
कली-कली इतरा रही, छूकर मुखर बयार।
ओढ़ बसंती ओढ़नी, इठलाए ज्यों नार।।
धरती-अंबर में घुला, शोख बसंती रंग।
मधुराज यहाँ रँग रहे, खुद को इनके संग।।
सरसों के खलिहान में, आया धीर बसंत ।
पीले चोले पहनके, घूम रहे ज्यों संत ।।
अभिनंदन मधुमास का, करें रेशमी पेड़।
छू फूलों की डालियाँ, हवा रही है छेड़।।
रंग-गगरिया थामके, आ पहुँचे ऋतुराज ।
कलियाँ सज़दे कर रहीं, हवा छेड़ती साज।।

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