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Nov 1, 2021

दो बाल कविताएँः

-डॉ. अर्पिता अग्रवाल

1.सवेरा

 

सूरज जागा रथ को हाँका, 

चंदा मामा सोने भागा,

मुर्गों ने फिर बाँग लगाई,

बस्ती ने भी ली अँगड़ाई

झोंका तभी हवा का आया,

चिड़ियों ने मिल गाना गाया,

भोर उजाला लेकर आई

जागो, उठकर दौड़ो भाई।


2 .सूरज की सवारी

 

सूर्य की सवारी आई,

सतरंगी उजास है लाई ।

हरा रंग पौधों से खेला,

नील रंग बिखरा अलबेला।

रंग-बिरंगा बाग़ सजाओ,

खिलो-खिलाओ हँसो हँसाओ।

खुशबू की मटकी भर लाओ

सारी दुनिया को महकाओ ।

Feb 23, 2018

फलों का पेड़ बनने की कला

फलों का पेड़
बनने की कला
- डॉ. अर्पिता अग्रवाल
किसी गाँव में एक गरीब ब्राह्मणी अपनी दो बेटियों के साथ रहती थी। ब्राह्मणी लोगों के घर खाना पकाती थी और जो कुछ मिलता था उससे ही घर का गुजारा चलता था। दोनों बहनों ने सोचा माँ कितनी मेहनत करती है, हमें भी कुछ करना चाहिए। लेकिन हम क्या करें? इसी उधेड़बुन में वह अपने घर के आँगन में बैठी थीं कि आसमान से एक कौआ उड़ता हुआ आया और उनके आँगन के पेड़ पर बैठ गया। उस की चोंच में एक पका हुआ फल था। फल को देखकर बहनों की के मुँह में पानी भर आया। संयोग से कौए की चोंच से फल नीचे गिर गया। दोनों बहनें उसे उठाकर खा गयीं। कैसा मीठा स्वाद और मनमोहक सुगंध थी। अद्भुत! बहनों ने कौए से पूछा, 'ऐसा फल कहाँ मिला?’ कौवे ने उनसे अपने पीछे आने को कहा। कौआ आगे-आगे उड़ चला। बहनें पीछे- पीछे चलती रहीं। गाँव से दूर जंगल के मध्य में एक अनोखा पेड़ खड़ा था, वैसे ही अद्भुत फलों से लदा हुआ। बहनों ने खूब सारे फल तोड़े और घर की ओर चल दी। घर पहुँचकर उन्होंने फलों को एक सुंदर सी टोकरी में सजाया और मंदिर के बाहर बैठ गईं। उस दिन फल बेचकर उन्होंने पैसे कमाए। लोगों ने ऐसे फल कभी नहीं खाए थे अत: उन के फलों की माँग बढऩे लगी। इस तरह प्रतिदिन वह उस पेड़ से फल लातीं और उसे बेचकर पैसे कमातीं। अब उनके घर का गुजारा आराम से चलने लगा। दोनों बहनें अब अधिक प्रसन्न रहने लगी थी।
एक दिन बड़ी बहन ने छोटी बहन से कहा, 'सुनो, मैं पेड़ बनने की कला जानती हूँ। हमें हर रोज जंगल जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मुझे यह मंत्र एक जादूगरनी ने सिखाया था, लेकिन मैं उसे भूल चुकी थी। आज अचानक याद आ गया। कल सुबह अंधेरे में तुम कुएँ से दो घड़े पानी लाना, मैं आंगन में ध्यान लगाकर बैठूँगी। याद रहे घड़े के पानी में तुम्हारी उँगलियाँ ना डूबें। जब मैं मंत्र पढूँ तो तुम एक घड़े का पानी मुझ पर डाल देना। मैं पेड़ बन जाऊँगी। तुम उस पर लगे फल ध्यान से तोडऩा कोई पत्ती न टूटे ना टहनियाँ उखड़ें। जब तुम फल तोड़ लो, तब दूसरे घड़े का पानी मुझ पर डालना, मैं वापस अपने रूप में आ जाऊँगी।‘
अगले दिन सुबह अँधेरे में उसने अपनी छोटी बहन को दो घड़े पानी लाने को कहा। छोटी बहन ने बड़ी बहन के कहे अनुसार किया पहले घड़े का पानी डालने से बड़ी बहन फलों का पेड़ बन गई, छोटी बहन ने सारे फल तोड़ लिये और दूसरे घड़े का पानी डालते ही वह अपने असली रूप में आ गई और अपने बालों से पानी झटककर उठ खड़ी हुई। सुबह दिन निकलने पर दोनों बहनें फलों को बेचने चली गयीं। प्रतिदिन फल बेचने से धीरे-धीरे उनके पास बहुत धन एकत्र हो गया। ब्राह्मणी ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह बहुत धूमधाम से कर दिया। दोनों बेटियाँ खुशी- खुशी अपना जीवन व्यतीत करती रहीं।
(हमारी लोक कथाओं में हमें कोई ना कोई जीवन मूल्य का संदेश मिलता है। घड़े के पानी में उँगलियाँ न डुबोना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक है। लड़की का पेड़ बन जाना दर्शाता है कि पेड़ हमारे बच्चों की तरह महत्त्वपूर्ण होते हैं। फल बेचकर अमीर बनना यानि हमारे पेड़ हमारी आजीविका का साधन हो सकते। बेवजह पत्तियाँ, टहानियाँ न तोडऩे की शिक्षा भी मिलती है। साथ ही यह बात पता चलती है कि पक्षियों द्वारा फलों का बीज इधर- गिराने से ही फलों के पेड़ों का दूर-दूर तक विस्तार होता है। आज अंधाधुंध पेड़ काटने से पक्षियों की जातियाँ लुप्त हो रही है जिसके कारण मानव अनेकों समस्याओं से जूझ रहा है। फलों के पेड़ कम हो रहे हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। जहाँ एक समय बाग हुआ करते थे वहाँ कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें हैं। यदि हम खुशहाल रहना चाहते हैं तो हमें अपने पेड़-पौधों का संरक्षण करना होगा।)
सम्पर्कः 'काकली भवन', 120B/2, साकेत, मेरठ- 250003, मो. 9410029500,
email-fca.arpita.meerut@gmail.com

Oct 24, 2017

बगुला पत्नी

             बगुला पत्नी 

             - डॉ. अर्पिता अग्रवाल
एक गड़रिया  था। सीधा-सीधा, भोला-भाला। प्रतिदिन वह अपनी भेड़-बकरियाँ चराने पहाड़ी पर जाता था।  गड़रिया  अत्यंत मुश्किल से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता था। जीवन कठिनाई से बीत रहा था लेकिन  गड़रिया  खुश रहता था। एक दिन उसे रास्ते में एक घायल बगुला मिला। बगुले को एक तीर लगा हुआ था। दयालु  गड़रिया  उस बगुले को अपने घर ले आया। उसका उपचार किया और धीरे-धीरे बगुला ठीक हो गया।
वह बगुला स्वर्ग की अप्सराओं का था। ठीक हो जाने पर बगुला अपने देश जाने की सोचने लगा लेकिन जाने से पहले वह अपने ऊपर किये गए उपकार का बदला चुकाना चाहता था।
एक दिन जब  गड़रिया  अपनी भेड़ बकरियाँ चरा कर घर लौटा तो उसे घर में एक सुंदर स्त्री मिली। बगुले जैसे उजले रंग वाली स्त्री को देखते ही गडरिये ने पूछा- ‘तुम कौन हो और यहाँ कैसे आयी हो?’ स्त्री ने बताया कि वह बहुत दूर से आयी है। उस स्त्री ने गडरिये से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे गडरिये ने स्वीकार कर लिया और दोनों ने विवाह कर लिया। एक दिन गडरिये की पत्नी ने गडरिये को बताया कि वह बहुत सुंदर रेशम का कपड़ा बना सकती है और उस रेशम को बेच कर बहुत पैसे कमाये जा सकते हैं।
गडरिये ने कहा- ‘क्या तुम सचमुच ऐसा कर सकती हो?’ स्त्री बोली-‘हाँ, लेकिन एक शर्त है कि मैं रात को एक अलग कमरे में कपड़ा बुनूँगी और मुझे रेशम बनाते हुए कोई न देखे। यदि ऐसा हुआ तो मैं वापिस अपने देश चली जाऊँगी।’ गड़रिया  मान गया। उस रात पत्नी ने एक अलग कमरे में रेशम का कपड़ा बुनना आरम्भ किया। सुबह उसने गडरिये को रेशम का अत्यंत सुंदर कपड़ा दिया। वह कपड़ा बाज़ार में ऊंचे दामों पर बिका। गडरिये को बहुत पैसे मिले। इस तरह प्रत्येक दिन गड़रिये की पत्नी गड़रिये को रेशम का कपड़ा देती और  गड़रिया  उसे बाज़ार में बेच आता।
 गड़रिया  धीरे-धीरे बहुत अमीर बन गया। उसने भेड़- बकरी चराने के लिए कई आदमी रख लिए। अब वह एक महलनुमा घर में रहने लगा। एक दिन गड़रिये की इच्छा हुई कि वह देखे कि पत्नी रेशम कैसे बनाती है।
उसने रात को छुपकर कमरे में एक झरोखे से देखा तो दंग रह गया कि एक बगुला अपने परों से धागा निकालकर रेशम बुन रहा था ,लेकिन तभी बगुले ने रेशम बनाना छोड़ दिया और बोला- आज तुमने मुझे देख लिया मैं ही तुम्हारी पत्नी बनकर रह रहा था अब मैं अपने देश चला जाऊँगा। मैंने तुम्हारे उपकार का बदला चुकाने के लिए ही स्त्री का रूप धारण किया था।
गडरिये ने बगुले को बहुत रोकना चाहा ;लेकिन बगुला अपने देश उड़ चला मानो बगुला इस इंतज़ार में ही था कि कब  गड़रिया  गलती करे और कब उसे अपने देश लौटने का मौका मिले।
सम्पर्क: ‘काकली भवन’, 
20-बी/2, साकेत, मेरठ- 250003,
Email- fca.arpita.meerut@gmail.com

Feb 19, 2017

आक्सीजन पार्लर की शुरूआत

   आक्सीजन पार्लर की शुरूआत          - डॉ. अर्पिता अग्रवाल
जब आसमान पर पानी बरसाने वाले बादलों की छटा घिरती है तब धरती रंग-बिरंगी होती है। हरियाली छा जाती है और फूल खिलते हें। बीज अंकुरित होते हैं और पेड़ बनते हैं , जिनसे हमें अगले चक्र के लिए फिर से बीज मिलते हैं। पृथ्वी पर हर चीका  एक दूसरे से जुड़ी है और सभी चीज़ों का चक्र इस पृथ्वी पर चलता रहता है। बड़े वृक्ष अपनी जड़ों में आसमान के पानी को रोक कर पूरे वर्ष हरे- भरे रहते हैं। वृक्ष भूमिगत जल की मात्रा को भी स्थिर करते हैं। ये उपजाऊ मिट्टी को बह जाने से रोकते हैं। वृक्ष हमें भोजन देते हैं, छाया देते हैं और पर्यावरण को गर्म होने से बचाते हैं साथ ही वायु प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण को रोकते हैं। वृक्ष वर्षा लाने में सहायक होते हैं। वृक्षों द्वारा वाष्पीकरण के कारिए पानी आसमान में पहुँचता रहता हैं और बादलों से बारिश के रूप में पुन: पृथ्वी पर आ जाता है, इस तरह बादलों से बरसा पानी हरियाली लाता है और हरे वृक्ष पानी को बादलों में पहुँचाते हैं और पानी का चक्र चलता रहता है।
आज अतीत को याद करना प्रासंगिक इसलिए है; क्योंकि प्रदूषण की मार से मनुष्य का  अंग -प्रत्यंग कराह रहा हैं। प्रकृति जिन पाँच तत्त्वों की बनी है उन्हीं से मानव का  निर्माण हुआ है। प्रकृति इन पाँच तत्त्वों की  निरंतर आपूर्ति करती है। पृथ्वी की हरियाली, आकाश का नीलापन, हवा का जादुई स्पर्श, सूर्य की सतरंगी किरणों का एहसास व पानी की बूँदों की ठंडक सब कुछ मुफ्त में ही उपलब्ध है; लेकिन सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत मानव ने अपने सुखोपभोग की आशा में प्रकृति की स्वास्थ्य प्रदायिनी शक्ति से अपने को वंचित कर रखा है। हवा, मिट्टी, पानी जहाँ दूषित हो गए हैं वहीं सूर्य का प्रकाश और खुला आकाश भी मिलना मुश्किल हो रहा है। बंद एयरकंडीशनर कमरे से बंद एयरकंडीशनर वाहनों और बंद एयरकंडीशनर ऑफिस के बीच ज़िंदगी भागती दौड़ती रहती है। रही सही कसर जंक फूड, फास्टफूड ने पूरी कर दी है। एयरकंडीशनरों से निकली गर्मी, घटती हरियाली, निरंतर बढ़ते वाहनों द्वारा निकले धुएँ तथा ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं के निर्माण- कार्यों ने हवा की गुणवत्ता इतनी खराब कर दी है कि छोटे -छोटे बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आ रही है। प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल व इस्तेमाल के बाद उसे कूड़े में जलाने से हवा ज़हरीली हो रही है। अब अतीत ही लौटेगा लेकिन एक नये रूप में। हमारे बुजुर्ग पेड़ों की छाँव में बैठकर हाथ के पंखों से हवा करते थे और नीम के घने वृक्ष थोड़ी-थोड़ी दूर पर पाए जाते थे। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी से त्रस्त होकर मनुष्य शीघ्र ही गंगा व अन्य पावन नदियों के किनारे बने ऑक्सीजन पार्लरों में पेड़ों के नीचे, प्रकृति के सान्निध्य में आराम से बैठकर हाथ के पंखों से हवा करेगा।
 हर महीने कुछ दिन तन, मन के स्वास्थ्य के लिए इन पार्लरों में उसी प्रकार जाएगा जिस प्रकार आज के लोग शारीरिक श्रम करने के बजाए जिम में पसीना बहाते हैं। थोड़ी दूर तक जाना हो तो बाइक या कार के बिना नहीं चलते जबकि पैदल चलना और साइकिल चलाना भी व्यायाम ही है। एक समय था जब एक घर में एक गाड़ी होना बड़ी बात होती थी आज जितने सदस्य होते हैं उतनी गाडिय़ाँ होती हैं। डीज़ल व पेट्रोल के वाहनों के निरन्तर बढ़ते इस्तेमाल और वाहनों की बढ़ती संख्या द्वारा हवा ज़हरीली हो चुकी है। पानी की कमी व पानी की गुणवत्ता खराब हो जाने के कारण कई शहरों में लोग पीने का पानी खरीदते हैं। प्रतिदिन सुबह पानी के कैम्फ़रों की घरों में सप्लाई की जाती है। वह दिन दूर नहीं जब लोग पानी की तरह ही ऑक्सीजन के सिलेंडर खरीदेंगे और घर से बाहर मास्क लगाकर निकलेंगे। 
आजकल एक नयी चीज़ चल रही है, सडक़ों का चौड़ीकरण। कहाँ तक चौड़ी करेंगे सडक़ें, वाहन बढ़ते ही जा रहे हैं जनसंख्या बढ़ती ही जा रही है, नई बनी चौड़ी सडक़ पुन: कुछ सालों बाद जाम से जूझने लगती है। चौड़ीकरण की आवश्यकता हाइवे पर है लेकिन शहरों के अंदर जहाँ जरूरत नहीं है वहाँ भी करोड़ों रूपये खर्च कर चौड़े-चौड़े डिवाइडर बनाए जा रहे हैं और उन पर पौधों के छोटे-बड़े गमले रखे जा रहे हैं, यह सब सौंदर्यीकरण के लिए हो रहा है। इसका एक बदसूरत पहलू यह है कि सडक़ों के दोनों ओर के कई सौ वृक्ष काट दिए जाते हैं। लोग यह देखकर दु:खी तो होते हैं ; लेकिन काम से फुर्सत मिले, तभी तो इन अधिकारियों से पूछेंगें कि किन बुद्धिमानों ने ये योजनाएँ बनाई हैं।

इन योजनाओं का विरोध होना ही चाहिए या फिर इतना तो कहना ही चाहिए कि आप सौंदर्यीकरण करें, चौड़ीकरण करें ; लेकिन पेड़ नहीं कटेंगें। कम से कम शहर के भीतर तो नहीं। दिन प्रतिदिन पेड़ों की संख्या कम होती जा रही है। गर्मी व प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, एयर कंडीशनरों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनसे निकली गर्मी वातावरण को और अधिक गर्म कर रही है। सुबह से रात तक एयर कंडीशनर में रहने से स्वास्थ्य का नुकसान द्रुतगति से हो रहा है। हम प्राकृतिक एयर कंडीशनर तो नष्ट कर रहे हैं और कृत्रिम एयर कंडीशनर लगवा रहे हैं। वृक्ष न सिर्फ़  प्राकृतिक एयर कंडीशनर है बल्कि ये तो पृथ्वी के फेफड़े हैं। जब ये नष्ट होंगे तो मनुष्य के फेफड़े कैसे ठीक रह सकते हैं। फिर तो ऑक्सीजन पार्लरों में जाने की शुरूआत समझो होने ही वाली है। सारी तेज़ी भूलकर पेड़ों के नीचे खाट पर लेटने की तैयारी.......।
सम्पर्क: 120-बी/2, साकेत, मेरठ- 250003, यू.पी.

Jul 18, 2016

जानकारी

             चम्बल नदी 
                               - डॉ. अर्पिता अग्रवाल

मध्य भारत में चंबल नदी यमुना की प्रमुख सहायिका नदी है। इसकी लम्बाई 960 किलोमीटर है। चंबल मालवा पठार की महत्त्वपूर्ण नदी है। विंध्याचल की श्रेणियों में मध्यप्रदेश के  इंदौर जिले के महू के दक्षिण में 854 मीटर ( लगभग 2800 फ़ीट ) की ऊँचाई से चंबल का उद्गम होता है। अपने उद्गम से उत्तर की ओर आगे बढ़ते  हुए यह मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध जिलों धार, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर से गुजरते हुए राजस्थान में प्रवेश करती है। कोटा शहर से आगे यह उत्तर- पूर्व की ओर मुड़ जाती है। चम्बल करीब 320 किलोमीटर तक मघ्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा बनाती है। उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हुई चंबल मालवा के पठार से निकली काली- सिंध व अन्य सहायिकाओं का जल समेटती हुई मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा बनाती है। उत्तरप्रदेश में प्रवेश कर चंबल नदी पूर्व को मुड़ कर यमुना के समानांतर बहती है। इटावा के पास चंबल यमुना में मिल जाती है। चंबल नदी को अरावली श्रेणी से निकलने वाली बनास नदी अरावली के जल से समृद्ध करती है। चंबल कई प्रसिद्ध जिलों जैसे बूंदी, सवाई माधोपुर, और धौलपुर से भी गुजरती है।

चंबल का असली नाम 'चर्मण्वती’ है। यह वैदिक काल की नदी है। चर्मण्वती पारियात्र पर्वत से निकली भारतवर्ष की एक नदी है, जो पितरों को प्रिय है। प्रसिद्ध राजा रन्तिदेव इसी के किनारे राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा और दानी थे। महाभारत और पुराण उनके यश के गीतों से भरे पड़े हैं। उन्होंने अनेक यज्ञ किए थे। यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती थी। कहा जाता है कि पशुओं के चमड़े सुखाने के लिए नदी के किनारे डाले जाते थे ; इसलिए इसका नाम चर्मण्वती हुआ।
 चम्बल नदी अपनी विस्तृत बीहड़ भूमि और खड्डों के लिए प्रसिद्ध है, जो निचली चम्बल घाटी में नदी द्वारा निर्मित होते हैं। यह बीहड़ डकैतों से ग्रस्त व आशंकित रहते थे। यह डकैतों के पनाहगार थे। चम्बल के डाकू प्रसिद्ध हैं। अब इस क्षेत्र को कृषि, चारागाह तथा सामाजिक- वानिकी के उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है।

चम्बल नदी पर कई बाँध तथा बराज बनाकर सिंचाई और जल विद्युत योजनाओं का विकास किया गया है, जिनमें गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर, तथा कोटा बराज सुप्रसिद्ध हैं। चम्बल के किनारे धौलपुर में राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य है। यहाँ कई तरह के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। यहाँ डॅाल्फि न भी पायी जाती है, इसे गांगेय डॅाल्फ़िन कहते हैं। गंगा नदी में पायी जाने वाली यह डॅाल्फ़िन पानी की गुणवत्ता की सूचक है। प्रदूषित पानी में यह जीवित नहीं रह पाती। यह अभ्यारण्य घड़ियालों की भी शरणस्थली है और पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों की दृश्यस्थली है।

मध्यप्रदेश में मंदसौर जिले में चम्बल नदी पर बनाया गया गाँधी सागर बाँध महात्मा गाँधी जी की स्मृति में बनाया गया था। चम्बल नदी का अपार जल इस बाँध के निर्माण से पहले बिना किसी उपयोग के ही बह जाता था। इसे चम्बल परियोजना के प्रथम बाँध होने का गौरव प्राप्त है। इस बाँध का लाभ मध्यप्रदेश और राजस्थान को मिला है । राजस्थान में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में चम्बल नदी सिंचाई परियोजना द्वारा पानी पहुँचाया जाता है। गाँधी सागर बाँध मछली पालन, मनोरंजन तथा पर्यटन के लिए भी महत्त्वपूर्ण स्थल है।

चम्बल नदी को प्रदूषण मुक्त माना जाता था;लेकिन कुछ स्थानों पर चम्बल नदी के अंदर व किनारों पर लगे ईंट- भट्टों तथा नदी के किनारों पर मिट्टी के अवैध उत्खनन से चम्बल नदी प्रदूषित हो रही है। चम्बल राजस्थान के कोटा शहर से गुजऱती है जहाँ इसमें औद्योगिक अपशिष्ट, बिजली घरों से निकली राख, और कूड़ा -कचरा आदि विभिन्न नालों के माध्यम से गिरा दिया जाता है। कोटा शहर औद्योगिक और शैक्षणिक संस्थाओं का केन्द्र है; जहाँ चम्बल नदी उस शहर को पीने के लिए, घरेलू इस्तेमाल व उद्योगों के और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराती है, वहीं शहर का निरंतर बढ़ता हुआ कचरा इसमें ही डाल दिया जाता है। इस कारण नदी में जीव-जन्तुओं के मरने की घटनाएं भी होती रहती हैं और नदी में प्रदूषण की मात्रा भी निरंतर बढ़ती जा रही है।
प्रकृति ने हमें शस्य -श्यामला धरती दी,नदियाँ दीं, शुद्ध वायु दी । हमने उसके लिए कुछ भी तो खर्च नहीं किया। हमने बदले में प्रकृति को बहुत दु:ख पहुँचाया, उसे नष्ट किया फिर भी प्रकृति हमें दे रही है लेकिन कब तक प्रकृति हमें यूँ ही देती रहेगी? आज हमने जल, थल, वायु सभी को प्रदूषित कर दिया है और अब भी हम नहीं सुधरे तो प्रकृति का दंड भोगने को तैयार रहना होगा।
सम्पर्क: 120 बी/2, साकेत , मेरठ 250003