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Feb 21, 2013

एक खूबसूरत पुष्प : पीताम्बर



एक खूबसूरत पुष्प
 पीताम्बर
- कृष्ण कुमार मिश्र
एक वनस्पति जो अपने सुन्दर पुष्प के अतिरिक्त तमाम व्याधियों के मूलनाश की क्षमता रखती है। हाँ पीताम्बर एक ऐसी प्रजाति जिसका पुष्प पीत वर्ण की अलौकिक आभा का प्रादुर्भाव करता है। हमारे मध्य, मानों साक्षात् गुरुदेव बृहस्पति विराजमान हो इन मुकुट रूपी पुष्पगुच्छों पर और मधुसूदन स्वयं उपस्थित हो इस छटा में; क्योंकि पीताम्बर कृष्ण का भी एक नाम है। इस पुष्प का पीत वर्ण सहज ही मन को शान्ति, विचारों में सात्विकता और मन में क्षमा का भाव स्थापित करता है।
वर्षा ऋतु में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों, सुन्दर कीट पतंगों व तितलियों के जीवन चक्र के महत्त्वपूर्ण हिस्से का आरम्भ होता है प्रजनन। वनपस्तियों में सुन्दर पुष्प खिलते है, तितलियाँ अपने लार्वा के स्वरूप को त्यागकर रंग-बिरंगे पंखों वाली परियों में तब्दील होती हैं, और तमाम कीट-पंतगे प्रकृति के रंगों में रँगकर उन्ही में अपने अस्तित्व को डुबोए हुए नजर आते हैं।
इसी सिलसिले में एक पीले रंग का सुन्दर पुष्प उगा लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी तहसील के एक परगना में; जिसे कस्ता के नाम से जानते हैं, यहाँ से गुजरती एक नहर के किनारों पर यह वनस्पति अपने पुष्पों के कारण एक पीली छटा सी बिखेरती नजर आती है इस बरसाती हरियाली के मध्य, हाँ मैं बात कर रहा हूँ पीताम्बर की, यह वनस्पति भारत भूमि में आई तो इसके औषधीय महत्त्व से भी हमारे लोग परीचित हुए और और इसके त्वचा रोगों पर असरदार तत्त्वों को भी जान पाए, क्योंकि इसकी पत्तियों व फूल का रस बहुत असरदार है। और पेट सम्बन्धी रोगों में भी यह रामबाण औषधि है।
फंगल और बैक्टीरिया जनित बीमारियों के साथ साथ ब्लड शुगर व मूत्र-सम्बन्धी बीमारियों पर असर के कारण तमाम देशों के स्थानीय समुदाय पीताम्बर के औषधीय गुणों से लाभान्वित होते रहे हैं। इस वनस्पति को विदेशी आक्रामक प्रजातियों के अंतर्गत रखा गया, लेकिन जहाँ की धरती इसे अपना ले तो फिर वह विदेशी कैसे हुई, फिर हर प्रजाति अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्षशील है, और यदि प्रकृति में जीवन संघर्ष की दौड़ में कोई प्रजाति कुछ विशेष गुण अर्जित कर ले, तो यह उसका खुद का विकास है। उत्तर भारत की तराई के कस्ता गाँव में कैसे पहुँची यह प्रजाति, इसका अंदाजा भर लगाया जा सकता है कि किसी अन्य प्रादेशिक समुदाय या किसी तीर्थ यात्री द्वारा लाई गई फलियों से पीताम्बर उगाने की कोशिश हुई हो। और इस तरह यह पीताम्बर लखीमपुर खीरी के तराई की धरती का बाशिंदा हो गया अपने पुष्पित बालियों की पीली आभा का दृश्य स्थापित करने के लिए हमारे मध्य।
इस बेलनाकार पुष्प गुच्छ वाली वनस्पति जो अपने आप में तमाम रंग बिरंगे कीट-पतंगों को रिहाइश और भोजन दोनों मुहैया कराता है, साथ ही आप के स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। दुनिया के तमाम देशों में पीताम्बर की पत्तियों और पुष्प के रस को साबुन में मिलाया जाता है, जो त्वचा के रोगों को दूर करता है और साथ ही त्वचा की दमक को बढ़ाता भी है।
इस प्रजाति को वैज्ञानिक भाषा में सेना अलाटा कहते हैं, यह मैक्सिको की स्थानीय प्रजाति है, पीताम्बर फैबेसी परिवार का सदस्य है। यह वनस्पति ट्रापिक्स (उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र )में 1200 मीटर तक के ऊँचें स्थानों में उग सकती है। आस्ट्रेलिया और एशिया में यह इनवेसिव (आक्रामक) प्रजाति के रूप में जानी जाती हैं। धरती के तमाम भूभागों में इसका औषधीय महत्त्व है। मौजूदा वक्त में यह प्रजाति अफ्रीका साउथ-ईस्ट एशिया, पेसिफिक आइलैंड्स और ट्रापिकल अमेरिका में पाई जाती है।
पीताम्बर जंगल के किनारों, परती नम-भूमियों, नदियों व तालाबों के किनारों पर उगने वाली वनस्पति हैं, इसके बीज रोपने के कुछ ही दिनों में अंकुरित हो जाते है, एक बार एक पौधा तैयार हो जाने पर इसकी तमाम फलियाँ जो 50-60 बीजों का भंडार होती हैं पकने के पश्चात जमीन पर गिरती हैं और एक ही वर्ष में यह प्रजाति वहां की जमीन पर अपना प्रभुत्व बना लेती है, सैकड़ों झाडियाँ एक साथ उग आती हैं । इसी कारण इसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है, और विदेशी भी? चूँकि यह उत्तरी-दक्षिण अमेरिका की स्थानीय प्रजाति है और इसने अपने बड़े व सुन्दर पीले पुष्प-गुच्छों वाली बालियों के कारण मानव-समाज को आकर्षित किया और यही वजह रही की यह मनुष्यों द्वारा एक स्थान से दुनिया के दूसरे इलाकों में लाया गया, और साथ में आई इनकी खूबियाँ जिनमें औषधीय गुण प्रमुख है।
पीताम्बर का पुष्प-गुच्छ  6-24 इंच लंबा, इसमें गुथे हुए पुष्पों का आकार 1 इंच  तक का होता है।  इसके ख़ूबसूरत पुष्प-गुच्छ की वजह से इसे दुनिया में कई नामों से जाना जाता है जैसे- इम्प्रेस कैंडल, रोमन कैंडल ट्री, यलो कैंडल, क्रिसमस कैंडल, सेवन गोल्डन कैंडल बुश।  साथ ही औषधीय गुणों के कारण भी लोगों ने इसे कई नाम दिए- रिन्गवार्म बुश आदि। इसके खिलने का वक्त सितम्बर-अक्टूबर है।
पीताम्बर झाड़ी के रूप में उगता है, जिसकी ऊँचाई 4 मीटर तक हो सकती है। पत्तियाँ 50-80 से0मी0 लम्बी होती हैं। पुष्प गुच्छ की शक्ल मोमबत्ती की तरह चमकीले पीले रंग की और इसके बीजों की फलियाँ 25 सेमी लम्बी होती हैं। इसकी यही पंखनुमा फलियाँ पानी के बहाव द्वारा एवं जानवरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं। इस प्रकार यह ख़ूबसूरत प्रजाति अलहदा जगहों में अपना अस्तित्व बनाती है। पीताम्बर की फली पक जाने पर भूरे व काले रंग की हो जाती है, और प्रत्येक फली में 50-60 चपटे त्रिकोणनुमा बीज निकलते हैं।
बालियों में लगे दर्जनों पुष्पों  में काफी तादाद में पराग मौजूद होते हैं, वह तमाम तरह की प्रजातियों को आकर्षित करते हैं, जैसे तितलियाँ, कैटरपिलर, मक्खियों, और चीटियों को इन कीट-पतंगों को पीताम्बर के विशाल पुष्प-गुच्छों से भोजन तो मिलता ही है साथ ही ये इनके निवास का स्थान भी बन जाते हैं। परागण  की ये प्रक्रिया इन्ही कीट-पतंगों द्वारा होती है यह एक तरह का सयुंक्त अभ्यास है, जीवन जीने का वनस्पति और जंतुओं के मध्य। दोनों एक दूसरे से लाभान्वित होते हैं।
पीताम्बर के इस पुष्प का औषधीय इस्तेमाल अस्थमा ब्रोंकाइटिस एवं श्वसन सम्बन्धी बीमारियों में किया जाता है। पत्तियों का रस डायरिया कालरा गैस्ट्राइटिस और सीने की जलन में उपयोग में लाते है। इसके पुष्प, पत्तियाँ तथा जड़ में एन्टी-फंगल, एंटी-ट्यूमर व एंटी-बैक्टीरियल तत्त्व होते हैं, जिस कारण यह मानव व जानवरों के विभिन्न रोगों में इस्तेमाल होता रहा है, दुनिया के तमाम भू-भागों में। ग्राम-पॉजटिव बैक्टीरिया पर इसके रस का प्रभाव जाँचा जा चुका है, यही वजह है कि मनुष्य एवं जानवरों में होने वाली त्वचा सम्बन्धी व्याधियों में इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है।
दुनिया के तमाम हिस्सों के स्थानीय समुदायों में पीताम्बर का अलग-अलग इस्तेमाल किया जाता है जिसमें रेचक (लक्जेटिव) के रूप में तथा त्वचा रोगों में विशेष तौर से इसकी पत्तियों व पुष्प का प्रयोग होता हैं।
 कुछ प्रमुख बीमारियों में पीताम्बर का उपयोग- एनीमिया, कब्ज, लीवर रोग, मासिक धर्म से जुड़ी बीमारियाँ, एक्जीमा, लेप्रोसी, दाद, घाव, सिफलिस गनोरिया, सोरियासिस, खुजली, डायरिया, पेचिश,   मूत्र-वर्धक, एवं त्वचा की सुन्दरता निखारने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
पीताम्बर कृमिहर औषाधि के रूप में तथा जहरीले कीड़ों के काटने पर भी औषधि के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है, विभिन्न स्थानों पर इसका प्रयोग इन्सेक्टीसाइड, लार्वीसाइड के तौर पर भी होता है।
बसंत ऋतु के आखिरी दिनों में पीताम्बर के बीजों की बुआई करना चाहिए।  नम भूमि में व जहां सूर्य की किरणें सीधी आती हों। फिर क्या है आप भी तैयार हो जाइए इस ख़ूबसूरत फूल को अपनी बगिया में उगाने के लिए जो सुन्दरता के साथ-साथ आप और आप के पशुओं की बीमारियों में दवा के काम भी आयेगा।
बात सिर्फ पीताम्बर की नहीं हमारे आसपास तमाम वनस्पतियाँ व जंतु रहते हंै, किन्तु हम उन्हें न तो जानना चाहते हंै और न ही उनकी उपस्थित के महत्त्व को खोजना और इस जिज्ञासा का अनुपस्थित  होना हमारे मानव समाज के लिए ही अहितकर है।  प्रकृति के मध्य सभी के अस्तित्व को स्वीकारना उनकी रक्षा करना और उनके महत्त्व को समझ लें तो फिर हमारी मनोदशाओं में जो सकारात्मकता आएगी वह हमको और बेहतर बनाएगी साथ ही प्रकृति के सरंक्षण का कार्य खुद-ब-खुद हो जाएगा। हमारे इस बोध मात्र से।
संपर्क: 77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी-262701 (उप्र) मो.08795064101, E-mail- dudhwajungles@gmail.com

Jan 29, 2011

टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह

- कृष्ण कुमार मिश्र
टाइगर हैवन के बरामदे में पड़ी अठारहवीं सदी की विक्टोरियन कुर्सी पर बैठे बिली अर्जन सिंह मुझे हमेशा पढ़ते हुए मिले, आस- पास तमाम मेजों पर ढोरों देशी- विदेशी किताबें व पत्रिकाएं। जंगल के मध्य एक बेहद जीवन्त व खूबसूरत बसेरा बाघों एवं मनुष्य दोनों का। यह आदमी और जानवर के मध्य सहजीविता का अद्भुत नमूना था, पर अब न ही वहां विक्टोरियन फर्नीचर है और न किताबें, यदि कुछ बचा हुआ दिखाई देता है तो टाइगर हैवन की दीवारों पर लगी 'काई' जिसे इस बार की आई भीषण बाढ़ अपने साथ वापस ले जाना भूल गयी, या यूं कह लेंं कि सुहेली नदी व जंगल को यह मालूम हो चुका था कि अब उनका रखवाला उनसे अलविदा कहने वाला है! हमेशा के लिए। इसीलिए उस रोज टाइगर हैवन खण्डहर सा बस धराशाही होने को तैयार दिखाई दे रहा था, और सुहेली ठहरी हुई नजर आ रही थी।
बिली जवानी के दिनों में यह जगह कभी नहीं छोड़ते थे, चाहे जितनी बारिश हो, फिर उस वक्त सुहेली में गाद (सिल्ट) भी नहीं थी। पर उम्र बढऩे की साथ- साथ सुहेली में सिल्ट बढ़ती गयी, हर बारिश में दुधवा व टाइगर हैवन दोनों जल-मग्न होने लगे, नतीजतन बिली बरसात के चार महीने जसवीन नगर फार्म पर बिताने लगे और टाइगर हैवन से पानी निकल जाने पर फिर अपने प्रिय स्थान पर वापस लौट आते अपनी किताबों के साथ।
लेकिन इस बार बाढ़ के चले जाने के बाद भी अब बिली कभी नही लौटेगें, यही नियति है इस स्थान की। बिली की उम्र के साथ ही टाइगर हैवन ने भी अपनी जिन्दगी पूरी कर ली। जहां इस इमारत में आजकल आतिश- दान में आग जलती थी, बिली के प्रिय तेन्दुओं व बाघिन तारा और कपूरथला के राज-परिवार की तस्वीरें लगी थीं, कमरों में पुस्तकें समाती नहीं थी, वहां अब सब कुछ वीरान हैं। अगर कुछ है तो बाढ़ के द्वारा छोड़े गये वीभत्स निशान।
गत वर्ष बिली की तबियत खराब होने के बावजूद वो बाढ़ गुजर जाने के बाद दो बार यहां आये, और कहा कि लगता है, मेरे साथ ही टाइगर हैवन भी नष्ट हो जायेगा! ... नियति की मर्जी वह इस वर्ष यहां नहीं लौट पाये... अब यह जगह की अपनी कोई तकदीर नहीं है जिसके हवाले से इसके वजूद को स्वीकारा जा सके।
मेरी कुछ स्मृतियां हैं उस महात्मा के सानिध्य की जिनका जिक्र जरूरी किन्तु भावुक कर देने वाला है। वो हमेशा नींबू पानी पिलाते। दुधवा और उसके बाघों को कैसे सुरक्षित रखा जाय बस यही एक मात्र उनकी चिन्ता होती। दुधवा के वनों की जीवन रेखा सुहेली नदी की बढ़ती सिल्ट को लेकर एक विचार था उनका कि सुहेली कतरनिया घाट वाइल्ड लाइफ सैक्चुरी में बह रही गिरवा नदी से जोड़ दिया जाय। इससे दो फायदे थे, एक कि दुधवा में आती बाढ़ पर नियन्त्रण और दूसरा दुधवा में गैन्जेटिक डाल्फिन एवं घडिय़ाल की आमद हो जाना।
चूंकि अभी तक दुधवा टाइगर रिजर्व में ये दोनों प्रजातियां नहीं हैं जबकि कतरनियां घाट डाल्फिन और घडिय़ाल की वजह से आकर्षण का केन्द्र है। साथ ही इन प्रजातियों के आवास को भी विस्तार मिल सके, यही ख्वाहिश थी बिली की।
बिली अर्जन सिंह से मेरी पहली मुलाकात 1999 में हुई, इसी वक्त मंैने जन्तुविज्ञान में एम.एस.सी करने की बाद वन्य जीवों पर पी.एचडी. करने का निर्णय किया। बिली से मैं अपने परिचय का श्रेय दुधवा के प्रथम निदेशक रामलखन सिंह को दूंगा, क्योंकि इन्हीं की एक आलोचनात्मक पुस्तक 'दुधवा के बाघों में आनुवंशिक प्रदूषण' पढऩे के बाद हुई। पहली मुलाकात में बिली से जब इस पुस्तक की चर्चा की तो उन्होंने कहा क्या तुमने मेरी किताबें नहीं पढ़ी। बाद में स्वयं बरामदे से लाइब्रेरी तक जाते और तमाम पुस्तके लाते और फिर कहते देखो यह पढ़ो। फिर ये सिलसिला अनवरत जारी रहा। मैंने बिली साहब की किताबों से दुधवा के अतीत को देखा सुना, और यहीं से मैंने बिली को अपना आदर्श मान लिया, नतीजा ये हुआ कि मैं एक शोधार्थी से एक्टीविस्ट बन गया, अब वन्य- जीवों के लिए लड़ाई लड़ता हूं।
92 वर्ष की आयु में इस महात्मा ने नववर्ष 2010 के प्रथम दिवस को अपने प्राण त्याग दिये। मगर आज इनके जीवों व जंगलों के प्रति किये गये महान कार्य समाज को सुन्दर संदेश देते रहेंगे एक दिगन्तर की तरह।
बिली के पिता जसवीर सिंह, दादा राजा हरनाम सिंह, परदादा महाराजा रणधीर सिंह थे जिन्होंने 1830 से लेकर 1870 ई. तक कपूरथला पर स्वतंत्र राज्य किया। महाराजा रणधीर सिंह को गदर के दौरान अंग्रेजों की मदद करने के कारण खीरी और बहराइच में तकरीबन 700 मील की जमीन रिवार्ड में मिली थी।
15 अगस्त 1917 को गोरखपुर में जन्में बिली कपूरथला रियासत के राजकुमार थे। इनका बिली नाम इनकी बुआ राजकुमारी अमृत कौर ने रखा था जो महात्मा गांधी की सचिव व नेहरू सरकार में प्रथम महिला स्वास्थ्य मंत्री रहीं, आप की शिक्षा- दीक्षा ब्रिटिश- राज में हुई, राज-परिवार व एक बड़े अफसर के पुत्र होने के कारण आप ने ऊंचे दर्जे का इल्म हासिल किया और ब्रिटिश- भारतीय सेना में भर्ती हो गये, द्वितीय विश्व- युद्ध के बाद इन्होंने खीरी के जंगलों को अपना बसेरा बनाना सुनिश्चित कर लिया। पूर्व में इनकी रियासत की तमाम संपत्तियां खीरी व बहराइच में थी जिन्हें अंग्रेजों ने इनके पुरखों को रिवार्ड के तौर पर दी थी। चूंकि बलरामपुर रियासत में इनके पिता को बरतानिया हुकूमत ने कोर्ट- आफ- वार्ड नियुक्त किया था, सो इनका बचपन बलरामपुर की रियासत में गुजरा। बलरामपुर के जंगलों में इनके शिकार के किस्से मशहूर रहे और 12 वर्ष की आयु में ही इन्होंने बाघ का शिकार किया।
1960 में बिली की जीप के सामने एक तेन्दुआ गुजरा अंधेंरी रात में जीप- लाइट में उसकी सुन्दरता ने बिली का मन मोह लिया, ये प्रकृति की सुन्दरता थी जिसे अर्जन सिंह ने महसूस किया। इसी वक्त उन्होंने शिकार को तिलांजलि दे दी।
1969 में यह जंगल बिली ने खरीद लिया, जिसके दक्षिण- उत्तर में सरिताएं और पश्चिम- पूर्व में घने वन। इसी स्थान पर रह कर इन्होंने दुधवा के जंगलों की अवैतनिक वन्य-जीव प्रतिपालक की तरह सेवा की।
बिली हमेशा कहते रहे कि जो जंगल अंग्रेज हमें दे गये कम से कम उन्हें तो बचा ही लेना चाहिए। क्योंकि आजादी के बाद वनों के और खासतौर से साखू के वनों का रीजनरेशन कराने में हम फिसड्डी रहे हैं। वे कहते रहे की फारेस्ट डिपार्टमेन्ट से वाइल्ड- लाइफ को अलग कर अलग विभाग बनाया जाय, वाइल्ड- लाइफ डिपार्टमेन्ट।
बाघों के लिए अधिक संरक्षित क्षेत्रों की उनकी ख्वाहिश के कारण ही किशनपुर वन्य-जीव विहार का वजूद में आना हुआ उनके निरन्तर प्रयासों से 1977 में दुधवा नेशनल पार्क बना और फिर टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई, और इस प्रोजेक्ट के तहत 1988 में दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर वन्य जीव विहार मिलाकर दुधवा टाइगर रिजर्व की स्थापना कर दी गयी। टाइगर हैवन से सटे सठियाना रेन्ज के जंगलों में बारहसिंहा के आवास हैं जिसे संरक्षित करवाने में बिली का योगदान विस्मरणीय है। जो अब दुधवा टाइगर रिजर्व का एक हिस्सा है।
जंगल को अपनी संपत्ति की तरह स्नेह करने वाले इस व्यक्ति ने अविवाहित रहकर अपना पूरा जीवन इन जंगलों और उनमें रहने वाले जानवरों के लिए समर्पित कर दिया।
टाइगर हैवन की अपनी एक विशेषता थी कि यहां तेन्दुए, कुत्ते और बाघ एक साथ खेलते थे। बिली की एक कुतिया जिसे वह इली के नाम से बुलाते थे, यह कुतिया कुछ मजदूरों के साथ भटक कर टाइगर हैवन की तरफ आ गयी थी, बीमार और विस्मित! बिली ने इसे अपने पास रख लिया, यह कुतिया बिली के तेन्दुओं जूलिएट और हैरियट पर अपना हुक्म चलाती थी और यह जानवर जिसका प्राकृतिक शिकार है कुत्ता इस कुतिया की संरक्षता स्वीकारते थे। और इससे भी अद्भुत बात है, तारा का यहां होना जो बाघिन थी, बाघ जो अपने क्षेत्र में किसी दूसरे बाघ की उपस्थित को बर्दाश्त नहीं कर सकता, तेन्दुए की तो मजाल ही क्या। किन्तु बिली के इस घर में ये तीनों परस्पर विरोधी प्रजातियां जिस समन्वय व प्रेम के साथ रहती थी, उससे प्रकृति के नियम बदलते नजर आ रहे थे।
विश्व प्रकृति निधि की संस्थापक ट्रस्टी व वन्य- जीव विशेषज्ञ श्रीमती एन राइट ने बिली को पहला तेन्दुआ शावक दिया, ये शावक अपनी मां को किसी शिकारी की वजह से खो चुका था, लेकिन श्रीमती राइट ने इसके अनाथ होने की नियति को बदल दिया, बिली को सौंप कर।
भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्म श्री, 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। वैश्विक संस्था विश्व प्रकृति निधि ने उन्हें गोल्ड मैडल से सम्मानित किया। 2003 में सेंचुरी लाइफ- टाइम अवार्ड से नवाजा गया। 2005 में नोबल पुरूस्कार की प्रतिष्ठा वाला पाल गेटी अवार्ड दिया गया जिसकी पुरस्कार राशि एक करोड़ रुपये है। यह पुरस्कार 2005 में दो लोगों को संयुक्त रूप में दिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसी वर्ष 2007 में बिली अर्जन सिंह को यश भारती से सम्मानित किया। इतने पुरस्कारों के मिलने पर जब भी मंैने उन्हें शुभकामनायें दी, तो एक ही जवाब मिला के पुरस्कारों से क्या मेरी उम्र बढ़ जायेगी, कुछ करना है तो दुधवा और उनके बाघों के लिए करें ये लोग।
प्रिन्स, जूलिएट, हैरिएट तीन तेन्दुए थे जिन्हें बिली ने टाइगर हैवन में प्रशिक्षित किया और दुधवा के जंगलों में पुनर्वासित किया। बाघ व तेन्दुओं के शावकों को ट्रेंड कर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगल में सफलता पूर्वक पुनर्वासित करने का जो कार्य बिली अर्जन सिंह ने किया वह अद्वितीय है पूरे संसार में। बाद में इंग्लैड के चिडिय़ाघर से लाई गयी बाघिन तारा भी दुधवा के वनों को अपना बसेरा बनाने में सफल हुई। इसका नतीजा हैं तारा की पीढिय़ां जो दुधवा के वनों में फल- फूल रही हैं। बिली की तेन्दुओं व बाघों के साथ तमाम फिल्में बनाई गयी जिनका प्रसारण डिस्कवरी आदि पर होता रहता है।
कुछ लोगों ने बिली पर तारा के साइबेरियन या अन्य नस्लों का मिला- जुला होना बताकर बदनाम करने की कोशिश की और इसे नाम दिया 'आनुवंशिक प्रदूषण' जबकि आनुवांशिक विज्ञान के मुताबिक भौगोलिक सीमाओं व विभिन्न वातावरणीय क्षेत्रों में रहने वाली जातियों का आपस में संबंध हानिकारक नहीं होता है बल्कि बेहतर होता हैं।
बिली अपने मकसदों में हमेशा कामयाब रहे एक बहादुर योद्धा की तरह और उसी का नतीजा है भारत का दुधवा टाइगर रिजर्व। बाघों और तेन्दुओं के साथ खेलने वाला यह लौह पुरूष अब हमारे बीच नहीं है। पर उनकी यादें है जो हमें प्रेरणा देती रहेंगी।
आज मैं इतना जरूर कहूंगा कि दुधवा टाइगर रिजर्व जो कर्मस्थली थी बिली की उसका नाम बिली अर्जन सिंह टाइगर रिजर्व कर दिया जाय यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी बिली साहब को। क्योंकि जब एक अंग्रेज यानी जिम कार्बेट के नाम पर आजाद भारत में हेली नेशनल पार्क तब्दील होकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क हो सकता है तो बिली अर्जन सिंह के नाम से क्यों नहीं। भारत में वन्य जीव संरक्षण में और खासतौर से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बिली अर्जन सिंह के कद का कोई व्यक्ति न तो कभी हुआ और न ही मौजूदा समय में है।
दो वर्षों से आ रही भयानक बाढ़ ने दुधवा के वनों व टाइगर हैवन को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया है यदि जल्दी कोई हल न निकाला गया तो बिली का यह घर जो अब स्मारक है के साथ- साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक संपदा भी नष्ट हो जायेगी। बिली अर्जन सिंह के संघर्षों का नतीजा है दुधवा टाइगर रिजर्व और टाइगर हैवन, और इन दोनों को सहेजना अब हमारी जिम्मेदारी।का मिला- जुला होना बताकर बदनाम करने की कोशिश की और इसे नाम दिया 'आनुवंशिक प्रदूषण' जबकि आनुवांशिक विज्ञान के मुताबिक भौगोलिक सीमाओं व विभिन्न वातावरणीय क्षेत्रों में रहने वाली जातियों का आपस में संबंध हानिकारक नहीं होता है बल्कि बेहतर होता हैं।
बिली अपने मकसदों में हमेशा कामयाब रहे एक बहादुर योद्धा की तरह और उसी का नतीजा है भारत का दुधवा टाइगर रिजर्व। बाघों और तेन्दुओं के साथ खेलने वाला यह लौह पुरूष अब हमारे बीच नहीं है। पर उनकी यादें है जो हमें प्रेरणा देती रहेंगी।
आज मैं इतना जरूर कहूंगा कि दुधवा टाइगर रिजर्व जो कर्मस्थली थी बिली की उसका नाम बिली अर्जन सिंह टाइगर रिजर्व कर दिया जाय यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी बिली साहब को। क्योंकि जब एक अंग्रेज यानी जिम कार्बेट के नाम पर आजाद भारत में हेली नेशनल पार्क तब्दील होकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क हो सकता है तो बिली अर्जन सिंह के नाम से क्यों नहीं। भारत में वन्य जीव संरक्षण में और खासतौर से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बिली अर्जन सिंह के कद का कोई व्यक्ति न तो कभी हुआ और न ही मौजूदा समय में है।
दो वर्षों से आ रही भयानक बाढ़ ने दुधवा के वनों व टाइगर हैवन को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया है यदि जल्दी कोई हल न निकाला गया तो बिली का यह घर जो अब स्मारक है के साथ- साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक संपदा भी नष्ट हो जायेगी। बिली अर्जन सिंह के संघर्षों का नतीजा है दुधवा टाइगर रिजर्व और टाइगर हैवन, और इन दोनों को सहेजना अब हमारी जिम्मेदारी।
उनकी किताबें
जिम कार्बेट और एफ. डब्ल्यू. चैम्पियन से प्रभावित बिली अर्जन सिंह ने आठ पुस्तकें लिखी जो उत्तर भारत की इस वन-श्रृंखला का बेहतरीन लेखा- जोखा है।
इन जंगलों और इनमें रहने वाली प्रकृति की सुन्दर कृतियों को देखने और जानने का बेहतर तरीका है उनकी किताबें जिनके शब्द उनके अद्भुत व साहसिक कर्मों का प्रतिफल है।
1-तारा- ए टाइग्रेस
2-टाइगर हैवन
3-प्रिन्स आफ कैट्स
4-द लीजेन्ड आफ द मैन-ईटर
5-इली एन्ड बिग कैट्स
6-ए टाइगर स्टोरी
7-वाचिंग इंडियाज वाइल्ड लाइफ
8-टाइगर! टाइगर।
पता: 77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी- 262701 (उ.प्र.)
Email: dudhwalive@live.com, www.dudhwalive.com


Sep 23, 2010

बांस के फूल जो जीवन में सिर्फ एक बार खिलते हैं!


- कृष्ण कुमार मिश्र
गरीबों का टिम्बर कहा जाने वाला बांस जिसका हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। जो बढ़ती मानव आबादी व लगातार दोहन के कारण प्राकृतिक रूप से नष्ट होता जा रहा है। एक वक्त था कि प्रत्येक गांव में कई तरह के बांसों की झाडिय़ां होती थी। बांस के लगभग 1500 उपयोग लिखित रूप से दर्ज हैं। अब इनके सीमित व बुनियादी जरूरतों वाले कुछ मुख्य उपयोग बचे हुए हैं, जैसे ग्रामीण अपना घर बनाने में, कृषि यन्त्र बनाने के अलावा रोजमर्रा की जिन्दगी में न जाने कितने प्रकार से बांस को उपयोग में लाते रहे हैं। बांस के बने हैंडीक्राफ्ट की चीजों का व्यापार कुटीर उद्योग की शक्ल ले चुका था, पर अब धरती के लिये जहर जैसा प्रभाव डालने वाली प्लास्टिक के आ जाने से ये छोटे व पर्यावरण के लिये उत्तम उद्योग चौपट हो चुके हैं।
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में झंकरा बांस की लाठियां तो इतनी लोकप्रिय रही कि आज भी गांव-जेवार में लगने वाले मेलों में आप तेल पिलाई हुई प्राकृतिक रंगों द्वारा विभिन्न तरह के रेखाचित्रों से सुसज्जित लाठियां बिकती हुई देख सकते हैं।
भारत में बांस की स्थिति
बांस के मामले में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य के जंगल पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। भारत में बांस के वन 10 मिलियन हेक्टेयर भूमि को आच्छादित किये हुए हैं, जो हमारे देश के कुल वन क्षेत्रफल का 13 प्रतिशत है, इनमें से 28 प्रतिशत बांस के वन उत्तर-पूर्वी राज्यों में मौजूद हैं। बांस पूरे भारतवर्ष में हर जगह प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, इसकी मुख्य वजह है, कि कम पानी व कम उपजाऊ भूमि में यह आसानी से उग आता है। बांस की पृथ्वी पर पाई जाने वाली कुल 1250 प्रजातियों में से भारत में 145 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन अब भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़कर अन्य जगहों पर बांस की प्रजातियों का विलुप्तीकरण शुरू हो गया है, उत्तर प्रदेश में यह दर सबसे अधिक है! जबकि बांस कृषि क्षेत्र की बड़ी समस्याओं से निपटने में सक्षम हैं, जैसे जानवरों द्वारा अन्य फसलों को नष्ट किया जाना, अत्यधिक रोगों का लगना जो उत्पादन को कम कर देता है, पानी की कमी आदि समस्याओं से बांस की खेती करके छुटकारा पाया जा सकता है। सूखी व परती भूमि पर बांस की खेती की जा सकती है, और बांस की विस्तारित जड़े मृदा अपरदन को भी रोकती हैं, इस प्रकार बांस भूमि सरंक्षण में भी सहायक है। बांस की शूट का उपयोग भोजन के रूप में, व तनें में इकठ्ठा पानी का अचार के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
किसानों, पर्यावरण व भूमि सरंक्षण में मुफीद
बांस की बिना कांटेदार, उन्नत प्रजातियां शोध संस्थानों में मौजूद हैं, जहां से किसान इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। बांस दुनिया की सबसे लम्बी घास हैं, इसकी लम्बाई एक दिन में एक फीट तक बढ़ सकती है और बांस का एक तना 30 दिनों में अपनी पूरी लम्बाई प्राप्त कर लेता है। लेकिन बांस के पूर्ण परिपक्वन में 4 से 5 वर्ष लग जाते हैं। यह ग्रेमिनी कुल से है और इसी कुल में दूब घास व गन्ना, गेहूं जैसी प्रजातियां शामिल हैं, संयुक्त जोड़दार तना इसकी मुख्य पहचान है। किसानों के अतरिक्त सरकार भी ग्राम सभा व अन्य परती भूमियों पर विदेशी व हमारे पर्यावरण के लिये नुकसानदायक प्रजातियों यूकेलिप्टस, पोपलर आदि के बजाए बांस का उत्पादन करा सकती है, जिससे रेवन्यू में बढ़ोत्तरी के अतिरिक्त हमारे पर्यावरण को बहुत फायदा पहुंचेगा।
जीवन में एक बार ही खिलता हैं बांस
बांस में फूल आना अकाल का सूचक माना जाता रहा है, और बांस में पुष्पन अभी भी रहस्य बना हुआ है! क्योंकि बांस में फूल आने की कोई निश्चित समयावधि नहीं होती, पारम्परिक ज्ञान व वैज्ञानिक शोधों से जो तथ्य सामने आये हैं उनमें बांस की विभिन्न प्रजातियों में विभिन्न समयान्तराल में फूल आते हैं और यह समयावधि 40 से लेकर 90 वर्ष तक की हो सकती है।
बांस के बीज में टाइम मशीन
जब बांस फूल देना आरम्भ करता है, तो उसकी पूरी की पूरी समष्टि में एक साथ पुष्पन होता है, फिर चाहे उस बीज से उगाया गया बांस अमेरिका में हो या बांग्लादेश में। लगता है प्रकृति ने इन बीजों में टाइम मशीन लगा दी हो... एक साथ फूल खिलने की!
बांस का खिलना उसके नष्ट होने की निशानी है, तो दुर्भिक्षता की सूचक भी
बांस खिलने के बाद नष्ट होना शुरू हो जाता है और इन फूलों में बने बीज जो बहुत पौष्टिक होते हैं, चूहों के लिये सर्वोत्तम आहार है, नतीजतन चूहों की संख्या में अचानक वृद्धि होती है, बांस के पौष्टिक बीज उनकी प्रजनन क्षमता को बढ़ा देते हैं। जब ये बांस नष्ट हो जाते हैं तो यह चूहों की फौज गांवों की तरफ रूख करती है, नतीजा यह होता है कि किसान की फसलों से लेकर घरों में इकट्ठा अनाज ये चूहे चट करने लगते हैं। साथ ही इन चूहों द्वारा तमाम तरह की बीमारियां भी मानव घरों तक पहुंचती हैं। ऐसे हालात में इन इलाकों में अकाल व दुर्भक्षिता के दिन आ जाते हैं।
बांस मिजों आन्दोलन का कारण बना
सन् 1959-60 में ऐसे हालात मिजो जनपद में पैदा हुए थे। आज का मिजोरम तब आसाम प्रदेश का एक जनपद हुआ करता था। चूंकि मिजोरम बांस का सबसे अधिक उत्पादन वाला क्षेत्र था, इसके अतीत में बांस फूलने से अकाल पड़ जाने की कई घटनायें हुई, इसलिए सन 1958 में जब बांस फूलना शुरू हुआ तो पूर्वानुमान व दुर्भक्षिता से बचने के लिये मिजो लोगों ने असम सरकार से 15 लाख रूपयों की मांग की, लेकिन असम सरकार ने यह कहकर मना कर दिया कि भविष्यवाणी व अवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वे सहायता नहीं दे सकते और संकट में इस उपेक्षा से मिजो जनपद के लोगों ने 'मिजो नेशनल फेमाइन फ्रन्ट' की स्थापना कर जनपद वासियों के लिये सहायता का प्रबन्ध किया, फिर यही राजनैतिक संगठन के तौर पर नये नाम 'मिजो नेशनल फ्रन्ट' के नाम से जाना गया।
यहीं से मिजो में अवमानना व अलगाववाद की भावना भड़क उठी। जिसे बुझने में बीस बरस लग गये। 1 मार्च 1966 को एम.एन.एफ. ने भारत सरकार से सन्धि कर ली और 20 फरवरी 1987 को मिजो जनपद मिजोरम राज्य के रूप में इण्डियन यूनियन का 23वां प्रदेश घोषित हुआ।
2003-04 में खीरी जनपद में खिले बांस में फूल
उत्तर भारत में बांस की इतनी तादाद नहीं है कि बांस खिलने से अकाल की स्थिति आ जाये, किन्तु यहां भी बांस फूलने को अपशगुन माना जाता है। बारिश न होना, सूखा पड़ जानें जैसी भ्रान्तियां प्रचलित हैं। उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में अप्रैल 2003 में पुष्पन हुआ था और यह प्रक्रिया 2004 तक जारी रही। जिससे यहां के सारे बांसों के समूह नष्ट हो गये, जिनमें पुष्पन हुआ था। इसी के साथ बांस की तमाम देशी प्रजातियां नष्ट हो गयी। खीरी में राजा लोने सिंह मार्ग पर बबौना गांव के समीप स्थित 60-70 वर्ष पुराना बांस का झुरूमुट पुष्पित हुआ, वहीं पदमभूषण बिली अर्जन सिंह के फार्म टाइगर हैवेन में लगे नवीन बांस जिसकी लम्बाई चार-पांच सीट तक थी में फूल आ गये थे... ये है बीजों की टाइम मशीन...यह दोनों जगह के बांसों का जेनेटिक रिश्ता है। बांस में फूल आने की इतनी अधिक लम्बी अवधि के कारण, कहा जाता है कि आदमी अपने जीवन काल में एक ही बार बांस का फूलना देख पाता है।
पता: 77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी- 262701 (उ.प्र.) ईमेल- dudhwalive@live.com

May 24, 2010

कहां गई आंगन में फुदकने वाली गौरैया?

- कृष्ण कुमार मिश्र
घरेलू गौरैया अब एक दुर्लभ पक्षी बन गई है और पूरे विश्व से तेजी से विलुप्त होती जा रही है। हमारे घर- आंगन में फुदकते हुए चहलकदमी करने वाली घरेलू गौरैया जो हम सबके जीवन का एक हिस्सा थी अब दिखाई नहीं देती। कई बड़े शहरों से तो गायब ही हो गई हैं, हां छोटे शहरों और गांवों में अभी भी इन्हें देखा जा सकता है। देर से ही सही इसके विलुप्त होने के खतरे की ओर ध्यान तो गया।
कभी सामान्यत: दिखाई देने वाली गौरैया अब शहरों व गांवों से नदारत हो रही है, इस प्रजाति के साथ भी कहीं ऐसा न हो जैसा गिद्धों के साथ हुआ, एक दशक पूर्व गिद्ध सामान्यत: दिखाई देते थे आज वह विलुप्ति के कगार पर हैं।
घर, आंगन, दालान में गौरैया का चहचहाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन घरों में उनके लिए कोई जगह नहीं होने, के कारण आधुनिकीकरण की इस अंधी दौड़ ने इस प्यारे से पक्षी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। मनुष्य की बदलती जीवन- शैली ने गौरैया के आवास, भोजन व घोंसलें, बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया है। यदि जल्दी ही मानव- समाज ने अपने अनियोजित विकास को गति देना बन्द नहीं किया तो यह कालान्तर में एक भयानक विभीषिका होगी मानव समाज के लिये, जिसे वह स्वयं तैयार कर रहा है।
शहरीकरण में एक और भीषण बदलाव आया है, लॉन, बगीचों और गमलों से हमारी देशी प्रजातियों के पेड़- पौधे गायब हो गये और उनकी जगह ले ली विदेशी प्रजातियों ने। नतीजा ये है, कि वे पौधे न तो ऐसे पुष्प देते हैं जिनमें मीठा व रसीला मकरन्द हो और न ही खाने योग्य फल। ऐसी कटीली झाडिय़ों व बिना घनी पत्तियों व डालों वाले पेड़ों से जिनमें न तो छाया है और न ही सुन्दरता, और न ही ऐसी टहनियां हैं जिन पर ये आसमान के बंजारे अपना घोंसला बना सके, या यूं कह लें कि कुछ पल ठहर कर सुस्ता सकें। हालांकि आधुनिकता के इस बदलाव में बेचारे इन जीवों ने भी अपने आप को ढालने की कोशिश तो की जैसे हरी टहनियों के बजाय तारों पर बैठना सीख लिया, घास के छप्पर नहीं मिले तो छतों में टंगे पंखों के ऊपरी हिस्से में घोंसला बना लिया, पर इन्हें वहां भी सुरक्षा नहीं मिली। आखिर अब ये क्या करें। ये एक सवाल है जिसका जबाव हम- आप ही दे सकते हैं और उसी जवाब में छुपा है, इन पक्षियों की बेहतरी का राज।
कभी नहीं हुई गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी आ गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी आ जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें । चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
कभी नहीं हुई गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी आ गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी आ जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें । चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
गौरैया बहुत ही नाजुक चिडिय़ा होती है तथा इसकी जन्म और मृत्यु दर दोनों ज्यादा होती है, लेकिन इसके अंडे को अगर छू लिया जाए तो वह उसकी देख-भाल बंद कर देती है। ऐसे में अंडे में पल रहा उसका बच्चा जन्म नहीं ले पाता और अंदर ही मर जाता है। यदि घरों का बचा अन्न कूड़ेदान में डालने के बजाय उसे खुली जगह पर रखा जाए तो यह गौरैया के खाने के काम आ सकता है। लॉन, बगीचे और गमलों में देशी पौधे लगाए जाने चाहिए, ताकि वह इनमें अपना घोंसला बना सके।
तराई की अनुकरणीय पहल
दुनिया बदली तो प्रकृति के स्वरूप को भी बदल डाला या यूं कहें की गंदा कर डाला, फलस्वरूप सरंक्षण वादियों की एक खेप उत्पन्न हो गयी, किन्तु नतीजा सिफर ही है अब तक, यदि सामुदायिक सरंक्षण के सफल उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गये तमाम भागीरथी प्रयास विफल ही रहे हैं, वसुन्धरा के अंग-प्रत्यंगों की रक्षा में। जब 20 मार्च 2010 को विश्व गौरैया दिवस के रूप में मनाया गया तब निबन्ध प्रतियोगितायें, भाषण-बाजी, पोस्टर-लोगो और तस्वीरों का प्रदर्शन आदि कई आयोजन हुए किन्तु अब शायद ये दिवस मात्र एक औपचारिकता नहीं रहेगा, क्योंकि खीरी जनपद के लोगों ने इसे एक आंदोलन का रूप देने की तैयारी कर ली है, ताकि सदियों से हमारे साथ रहती आई यह प्रजाति (गौरैया) का सरंक्षण व संवर्धन हो सके। इसी प्रयास में पूरे जनपद में जगह- जगह गौरैया के महत्व और गौरैया से हमारे सदियों पुराने रिश्तों का जिक्र किया जाएगा, और इसे एक बार फिर साहित्य, धर्म और विज्ञान के पटल पर सुसज्जित करने की कोशिश।
दुधवा लाइव पर प्रकाशित गौरैया दिवस के संबध में हिन्दुस्तान अखबार में रवीश कुमार नें जब इस सुन्दर पक्षी की उन यादों कों उकेरा जो वक्त की भागम- भाग में कही धूमिल हो चुकी थी, और यही कारण बना उन तमाम लोगों के अन्तर्मन की सोई हुई उन यादों का, जिन्हें उन्होंने अपने बचपन में जिया था, गौरैया के साथ। कभी इसे दाना चुगा कर तो कभी रंगों में रंग कर। आज वे सब इस पक्षी को अपने घरों में फिर से वापस देखना चाहते हैं, अपने बचपन की तरह और शायद अपने बच्चों को वह विरासत भी देना चाहते है, जो कहीं खो गयी थी या खोती जा रही हैं, यानी इस चिडिय़ा का हमारे घरों में आना-जाना, बसना, घोंसला बनाना और हमारी दीवारों पर टंगें आईने में अपनी ही शक्ल देखकर चोंचे लड़ाना।
दुधवा लाइव की इस पहल में खीरी जनपद के सामाजिक कार्यकर्ता रामेन्द्र जनवार ने गौरैया सरंक्षण के लिए एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली है, प्रसिद्ध कथाकार डा. देवेन्द्र जिन्होंने न जाने कितनी बार गौरैया का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है, अब इस खूबसूरत चिडिय़ा के वजूद की लड़ाई लडऩे की तैयारी में हैं, तो महिला संगठन सौजन्या की प्रमुख डा. उमा कटियार अपनी लिखी हुई रचनाओं का जिक्र करती हैं, और गौरैया को दोबारा अपने घरों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनश्चित कर ली है।
मां और गौरैया का रिश्ता
ये चिडिय़ा भी मेरी बेटी से कितनी मिलती- जुलती है, कहीं भी शाख़े- गुल देखे तो झूला डाल देती है।
जब गौरैया दिवस मनाने की बात चली तो लोगों के दिलों से वह सारे जज्बात निकल कर बाहर आ गये, जो इस खूबसूरत चिडिय़ा को लेकर उनके बचपन की यादों में पैबस्त थे! उन्हीं यादों के झरोंखो से कुछ विगत स्मृतियों को आप सब के लिए लाया हूं, क्या पता आप को भी कुछ याद आ जाए।
जब हम परंपराओं की बात करते हैं, तो मां उस परिदृश्य में प्रमुख होती है, क्योंकि परंपराओं का पोषण और उसका अगली पीढ़ी में संस्कार के तौर पर भेजना, मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता, गौरैया भी हमारी परंपरा का हिस्सा रही, और हम सब जब भी इस परिन्दें का जिक्र करते हैं तो मां बरबस सामने होती है।
डा. धीरज जयपुर में रहती हैं, इनकी स्मृतियों में गौरैया की बात करते ही, पूरे परिदृश्य में मां की मौजूदगी होती है। इनकी मां ने इन्हें बचपन से ये बताया कि इनकी नानी को गौरैया बहुत पसन्द थी और वह कहती रहती थी कि मैं मरने के बाद गौरैया बनना चाहूंगी, और यही वजह थी की धीरज के घर में गौरैया को हमेशा दुलार मिलता रहा, खासतौर से एक टूटी टांग वाली गौरैया को, जिसको इनकी मां कहती थी कि बेटा ये तुम्हारी नानी ही हैं। भारत की संस्कृति में जीवों के प्रति प्रेम- अनुराग का यह बेहतरीन उदाहरण है, और उन मान्यताओं का भी जो पुनर्जन्म को परिभाषित करती हैं।
सीतापुर जिले की रहने वाली गिरजेश नन्दिनी ने जब दुधवा लाइव पर रामेन्द्र जनवार की कविताएं पढ़ीं जो गौरैया और मां के संबधों को जाहिर करती हैं, तो उन्हें लगा कि जैसे ये कविता मानों उन पर ही लिखी गयी है। क्योंकि सीतापुर शहर में वो किराये के मकान में जहां- जहां रही गौरैया का एक कुनबा उनके साथ रहा। वह जब भी मकान छोड़ कर नये मकान में जाती यह चिडिय़ां उन्हें खोज लेती हैं। इनकी मां आजकल इस बात से परेशान हैं कि चिडिय़ों के उस कुनबे में एक गौरैया कहीं खो गयी है। और उसकी फिक्र इन्हें हमेशा रहती है।
मेरे बचपन में मेरी मां मुझे जब खाना खिलाती और मैं नहीं खाता तो वो गौरैया से कहती कि चिर्रा आ ये खाना तू खा ले... मां ने अपनी विगत स्मृतियों के पुलिन्दे से गौरैया की यादों को निकालते हुए बताया कि बचपन में वे भाइयों के साथ अपने घर में गौरैयों को पकड़ती और उन्हें रंगों से रंग देती, और जब ये गौरैया इन्हें दिख जाती तो अपने रंग से रंगी हुई गौरैया को देखते ही सब खुश होकर शोर मचाते कि ये मेरी गौरैया है.....मेरी......
मां और गौरैया का रिश्ता सदियों से मानव समाज में पोषित होता आया, इसने हमारे बचपन में रंग भरे। आकाश में उडऩे की तमन्ना की । किन्तु अब ये आकाश के बन्जारे हमारी करतूतों से ही हमारे घरों से गायब और न•ारों से ओझल हो रहे हैं। नतीजतन अब कोई मां अपने बच्चे की यादों में गौरैया के रंग नहीं भर पायेगी।
( कृष्ण कुमार मिश्र के वन्य जीवन से संबंधित अन्य लेख के लिए आप देख सकते हैं www.dudhwalive.com )