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Jan 31, 2012

पल दर पल

- अशोक सिंघई
वास्तव में समय और क्या है
हमारी सदी में
एक फिसलन, एक थिरकन
संभावनाओं को जनमता
एक ठहरा बाँझपन
अशान्त शान्ति और प्रकाशित अँधेरे का
सर्द, गर्म ठण्डापन
स्मृतियों की ऑक्सीजन पर जी रहा है प्यार
जहाँ- तहाँ सिर्फ गुस्सा ही गुस्सा जीता है
सब कुछ तोड़- मरोड़ देना चाहता है
यहाँ तक कि अपने-आप को भी
स्वयं का सामना
सबसे कठिन होता है
इसे कौन नहीं जानता
सब कुछ लगने लगता है व्यर्थ
सब कुछ बचने लगता है अव्यक्त
न कोई कहता है कुछ
और न ही कोई चाहता है सुनना कुछ
दरअसल चल नहीं रही है जिन्दगी
सरक रही है हाथों से
फिसल रही है राहों से
खिसक रही है जिन्दगी
पल दर पल हर साल
टकराता है एक मोड़ जैसा
साल दर साल
एक और नया साल
संपर्क: सिंघई विला, सड़क-20, सेक्टर-५, भिलाई (छत्तीसगढ़) 490 006,
Email: ashoksinghai@ymail.com

हर सवाल में

- डॉ. अजय पाठक
स्वप्न आपके
फलीभूत हों, नये साल में!
देश- द्वार पर समृद्घि सूरज बरसाये
संध्या, सुख- सपनों का मंगल गीत सुनाये
अक्षत- रोली,
दीपक- चंदन लिये थाल में!
कल्पतरू पर नयी कोंपले, उगे निरंतर
सिरजे धरा मनोरथ के फल होकर उर्वर
फूल खिलें हो
तरूवर के हर एक डाल में!
बच्चों के अधरों पर हरदम हो मुस्कानें
नये क्षितिज की ओर निरंतर भरें उड़ाने
उलझे मत सब,
दुर्मतियों के चपल चाल में!
आतंकों से मुक्त धरा हो और गगन हो
नदियां हो परिपूर्ण, प्रदूषण मुक्त पवन हो
समरसता का हल
निहित हो हर सवाल में!
संपर्क: संपादक- नये पाठक, एल- 3, विनोबानगर, बिलासपुर (छ।ग.)
Email: kavi_ajaypathak@yahoo.co.in

May 10, 2011

बाघ-संरक्षण

बाघों की अनोखी शरणस्थली टाइगर टेम्पल
- अशोक सिंघई
5 फरवरी 2011 को साहित्यिक गतिविधि- स्वरूप थाईलैण्ड प्रवास हुआ। यह देश से बाहर जाने का मेरा पहला अवसर था। थाईलैण्ड के विभिन्न शहरों में जाना हुआ, प्रवासी भारतीयों से परिचय हुआ। बैंकाक में राजभवन भी जाना हुआ जहाँ हर बड़े शहर की तरह म्यूजियम भी हम लोगों ने विस्तार से देखा। मुझे लगा कि हथियारों के विकास की भी एक समानान्तर गाथा है। आखिरकार मनुष्य ने साथ- साथ जीने के साथ, साथ- साथ मरने के भी पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं।
पत्थरों को नोंकीला बनाने वाले हाथों ने ही मिसाइल तक बना लिये हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' मुझे झकझोरता रहता है। बैंकाक से लगभग 200 किलोमीटर दूरी पर 'टाइगर टेम्पल' के बारे में थोड़ा बहुत सुन- पढ़ रखा था। थाईलैण्ड के 'कंचनबुरी' प्रदेश के 'साइयोक' जिले में यह अद्भुत जगह है। यह स्थान म्याँमार की सीमा से मात्र 24 किलोमीटर दूर है। 'टाइगर टेम्पल' (वैट फॉ लुआँग ताबुआ) दरअसल एक वन्य प्राणी संरक्षण क्षेत्र है जिसे वहाँ के लोग 'फॉरेस्ट टेम्पल' कहते हैं। अन्य वन्य प्राणियों की अपेक्षा वहाँ टाइगर संरक्षित किये गये हैं इसलिये जनता इसे 'टाइगर टेम्पल' के नाम से जानती है। सन् 1994 में इसकी शुरूआत हुई थी।
मैंने वहाँ के वरिष्ठ बौद्ध लामा से बातें की। उन्होंने कहा कि आप जैन धर्म के हैं और हम बौद्ध धर्मानुआयी हैं। हमारे पुराणों में यह वर्णन आता है कि भिक्षु जंगलों में शेर, चीते आदि हिंसक जानवरों को लकड़ी से वैसे ही हकालते थे जैसे कि बकरियाँ चराई जाती हैं। यह भी जिक्रआता है कि बुद्ध, महावीर आदि को सुनने के लिये जंगल के सभी जीव- जन्तु आते थे, आपके भारत में तो शेर और हिरण के एक ही घाट पर पानी पीने की धार्मिक चर्चायें सुनी- सुनाई जाती हैं। 'टाइगर टेम्पल' आज के अत्याधुनिक समय में इस बात को सिद्ध करने का एक आस्था जन्य प्रयोग है। एक बात और शेर आदि वन्य प्राणियों का अवैध शिकार करने वाले यह नहीं सोचते कि इनके नाजुक और नादान बच्चे भी हो सकते हैं। ऐसे निरीह शिशु- जीवों की प्राणरक्षा भी तो अहिंसा है, मनुष्य की हिंसा के अहिंसक प्रतिकार में यह भी एक कदम है। मैंने टोकते हुये कहा कि मेरे शहर भिलाई में भी एक 'मैत्री बाग' है जिसका चिडिय़ाघर मध्य भारत में मशहूर है। वहाँ हम लोगों को भी 'व्हाइट टाइगर' प्राप्त हुआ था, फिर जोड़ा जुटाया गया और इस अति दुर्लभ प्रजाति के 'व्हाइट टाइगरों' की 'केप्टिविटी' में वंशवृद्धि सम्भव हुई। इस विलुप्तप्राय प्रजाति के सफेद शेर हमारे यहां दर्जन भर हैं जो स्वस्थ व हृष्टपुष्ट भी हैं। उन बौद्ध लामा ने अपना नाम नहीं बताया, पूछने पर वे मुस्कुरा दिये।
स्वामीजी ने बताया कि, 'टाइगर टेम्पल' के लिये 1999 में हमें पहला शावक प्राप्त हुआ था जो कि ग्रामीणों को मिला था। शायद उसकी माँ शिकारियों की शिकार हो गई हो। हम उसे नहीं बचा सके। यह शेरों के संरक्षण की पहल थी। ऐसे शावकों के लिये एक 'शरणस्थल' 'टाइगर टेम्पल' के रूप में चर्चा में आने लगा था। कुछेक ऐसे भी मामले हैं जिसमें लोग शावकों को शौकिया घर में पालते हैं पर उनके बड़े होने पर वे उन्हें बवाल और जी का जंजाल लगने लगते हैं। बच्चों की तरह पाले इन 'पेट्स' को मारा भी तो नहीं जा सकता। ऐसे शावक भी हमें मिलने लगे।
2007 में इनके घर में रखने पर कानूनी पाबंदी लगभग समूचे विश्व में एकसाथ लागू की गई। इस तरह 'टाइगर टेम्पल' भरने लगा। 2007 तक 21 शावक 'केप्टिविटी' में जन्मे। दिसम्बर 2009 तक हमारे पास लगभग 50 टाइगर हो गये थे। बड़े- छोटे सब मिलाकर दिसम्बर 2010 में इनकी संख्या 84 हो चुकी है। डी.एन.ए. परीक्षण के नतीजे जगजाहिर नहीं हैं पर ये टाइगर इंडो-चाइनीज तथा बेंगाल टाइगर ही हैं। ये टाइगर बौद्ध भिक्षुओं के साथ रहते हैं। 'एक्सरसाइज' (अभ्यास) करते हैं, इन्हें प्रेम, दुलार, विश्वास और संरक्षण मिलता है जो इनकी हिंसक प्रवृत्तियों को शान्त रखता है।
यहाँ रोज सैकड़ों- हजारों लोग विश्व के हर कोने से आते हैं, इन्हें छूते हैं, दुलारते हैं, इनके साथ चित्र खिंचवाते हैं। प्रेम की ताकत का मनुष्य को इससे बड़ा और कौन सा सबूत चाहिये। 'हमारी आलोचना भी कम नहीं हो रही है। पर हम तो 'टेम्पल' की विशिष्टता के विश्वासी हैं, होंगे आप माक्र्सवादी, पर यह विश्वास तो आपमें भी होगा ही, यदि आप भारतीय हैं। प्रेम और अहिंसा भारतीयता के सिर- पैर हैं।'
आलोचना के संदर्भ में गौरतलब है कि थाई सरकार ने निरीक्षण के बाद यह पाया कि 'टाइगर टेम्पल' में इनकी समुचित देख रेख हो रही है। अब तो केप्टिविटी में ब्रीडिंग की शासकीय अनुमति भी मिल चुकी है। इन सबसे परे हटकर मुझे लगता है कि जब हम पेड़- पौधों को सींचते हैं तो दरअसल स्वयं को सींचते हैं। जब हम वन्य प्राणियों की चिन्ता में दुबले होते हैं तो वास्तव में हम स्वयं के अस्तित्व की चिन्ता में होते हैं। हमें खबर हो गई है कि समय के साथ इस वसुन्धरा पर हम अकेले स्वीकार नहीं होंगे। प्रकृति का सबसे बड़ा शोषक मनुष्य सबसे जिम्मेदार पोषक होने की मजबूरी में गिरफ्तार हो चुका है।
पता: 7 बी, सड़क 20, सेक्टर 5, भिलाई नगर (छ.ग.)
मोबाइल 09907182061, ईमेल- ashoksinghai@ymail.com

Apr 27, 2009

नदी है भाषा

- अशोक सिंघई
(1)
भाषा को साधना
उतना ही कठिन है
जितना पोटली में
प्रकाश को बांधना
भाषा के तिलिस्म में
कैद हो गई है कविता
या कविता खुद ही तिलिस्म है
भाषा की.
(2)
भाषा मिट्टी है जिसे रौंदकर
गढ़ता है कवि कुछ नया-नया
 रचता नहीं कवि, मूल है मिट्टी
किसी ने नहीं बनाई आज तक
घनानन्द ने कहा है
 कविता ने रचा है उसे
कविता रचने के अहम् से
कविता द्वारा रचे जाने के
विनय तक की यात्रा है
कवित्व की पहली सीढ़ी
और कविता का आधार
होती है भाषा.
(3)
जंगल में पेड़
चाहे हो किसी भी जाति
गुण-धर्म का झाड़ी हो
या हो फूलों की बेल
बालियां हों धान की
या जीवन सी दूब
सबकी जड़ें मिट्टी में होती हैं.
(4)
पानी थमा तो / सड़ा पानी
पथ हुए पग-विहीन तो / खो गए
मिट जाती है वह संस्कृति/सभ्यता और भाषा
जो बदलती नहीं
सीखती नहीं, सदा चलते रहना.
(5)
बने रहने के लिए
अनिवार्य है गत्यात्मकता
कहा है एक महान् चित्रकार ने
ठहर गया धर्म / खो गया ईश्वर
सो गया राज्य / खो गया इंसान
भाषा मिट्टी है / नदी है भाषा
जो रहती है बनती, जो रहती है बहती.
(6)
ईश्वर के समक्ष पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची सृष्टि में अपने श्रेष्ठ होने की.