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Sep 1, 2025

लोक कलाः हमारी सांस्कृतिक धरोहर है ऐपण

 
- ज्योतिर्मयी पन्त  

     सृष्टि में सभी जीव जंतुओं में मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है । उसके पास बुद्धि और विवेक का वरदान है। वह अपनी अनुभूतियों को अनेक माध्यमों से व्यक्त कर सकता है। अपनी भावनाओं को शब्दों और लय में बाँध कर कविता और गीत गाता है । वाद्य यंत्रों की संगत में संगीत के स्वर बनाता  है । प्रसन्नता में थिरकने लगता है, तो नृत्य करता है । लेखन से साहित्य रचता है । कभी गुफाओं की भित्तियों में चित्र अंकित करता है । प्रस्तर और मिट्टी की मूर्तियों का सृजन करता है । कभी रंग और कूची लेकर कागज, वस्त्र और दीवारों पर अपनी कल्पनाओं  को साक्षात रूप देता है । कहने का तात्पर्य है कि आदि काल से ही मनुष्य और विविध कलाओं का अंतरंग सम्बन्ध रहा है ।  

 ये विविध कलाएँ  लोक जीवन का  विशेष अंग बन कर किसी समाज की पहचान बन जाती हैं । कला के इन आयामों में चित्रकला का विशेष स्थान है । कुछ कलाएँ हमारे रोज के कार्यक्रमों और तीज- त्योहारों का अभिन्न अंग बन जाती हैं । इनमें उपयोग आने वाली वस्तुएँ भी घर में ही उपलब्ध  हो जाती हैं ।  

 ऐसी ही एक कला है उत्तराखंड की- ऐपण की कला, अल्पना तथा चित्रकला । पुराने समय से ही यह बहुत प्रचलित रही है परन्तु आधुनिकता के इस दौर में यह विलुप्ति के कगार पर पहुँच रही है । यह कला एक सांस्कृतिक धरोहर है जिसका संरक्षण आवश्यक है, पर पहले इसका परिचय -  

    ऐपण का महत्त्व

   ऐपण का हर घर में बहुत ही महत्त्व है । कोई भी त्यौहार हो सर्वप्रथम घरों में ऐपण दिए जाते हैं । घर की हर देहरी, दहलीज, पूजा स्थान को सबसे पहले गेरू यानी लाल मिट्टी से लीपा जाता है। फिर थोड़ा सूख जाने पर चावल को भीगा कर, पीस कर बनाए गए घोल, जिसे "बिस्वार" कहा जाता है से चित्रांकन किया जाता है । चावल के घोल में उँगलियों को डुबो कर मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठ अँगुलियों की सहायता से अलग - अलग तरह के चित्र बनाए जाते हैं । यों तो घर की देहरी और पूजा स्थान हमेशा ही ऐपण से सजे होते हैं । पर हर त्यौहार पर घर की महिलाओं का पहला काम ऐपण देना होता है ।  

देहरियों या देलियों पर अक्सर फूल बेल - बूटे तथा अन्य चित्र बनाए जाते हैं । परन्तु घर के अन्य भागों या पूजा स्थल पर पर्व विशेष पर आधारित चित्र अंकित किए जाते हैं । इन्हें चौकी कहा जाता है इन्हें ज्यामितीय आकारों, त्रिकोण, षटकोण, स्वस्तिक चिन्ह, ओंकार चिन्ह, सूर्य -चन्द्रमा, शंख -घंट, फल -फूल, अष्ट दल या अधिक दल वाले कमल के फूल से सजाया जाता है । सरस्वती चौकी, लक्ष्मी चौकी, जन्मवार – नामकरण, विवाह के अवसर पर धूल्यर्घ, कन्यादान आदि अवसरों के अनुसार चौकियाँ बनाई जाती हैं, हवन की वेदी के लिए या  घर में मंदिर और मूर्तियों के स्थान पर भी ऐपण अलग तरह के बनते हैं  । बच्चे के नामकरण के अवसर पर सूर्य चौकी बनाई जाती है इस दिन नवजात शिशु को पहली बार सूर्य दर्शन कराया जाता है । देहरी या अन्य ऊँचे स्थान पर  ऊपर से नीचे की ओर  खड़ी  लकीरें अंकित होती हैं, जिन्हें वसोधारा कहते हैं । बिस्वार में उँगलियों  को डुबो कर पाँच  या सात के अंतराल पर ऊपर से बूँदें इस तरह टपकाई जाती हैं  की खड़ी लकीरें सुन्दर और सीधी रहें। गहरे लाल रंग के गेरू से लिपे स्थान पर सफ़ेद चमकते नमूनें  जब उभरते हैं तो उनकी छटा दर्शनीय होती है । दीवाली के अवसर पर सारे घर में लक्ष्मी देवी के पैर, जिन्हें आंचलिक भाषा में `पौ` कहा जाता है , बनाये जाते हैं । इनको बनाने के लिए पहले दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बनाकर बिस्वार में डुबो देवी के पैर बनाये जाते हैं । फिर अनामिका उँगली से पैर की उँगलियाँ  बनाई जाती हैं । दोनों पैरों के बीच में गोल बिंदु सजाये जाते हैं। घर के चारों ओर से घर में देवी का प्रवेश हो, इसलिए देवी के पदचिह्न बनाये जाते हैं बाहर से घर की ओर ।  

 कार्तिक की  बड़ी एकादशी को बूढ़ी दीवाली के नाम से मनाया जाता है । इस दिन सूप में अंदर की ओर लक्ष्मी -गणेश -विष्णु का चित्र बनाया जाता है और बाहर  की तरफ दरिद्र जिसे भुँइयाँ कहते हैं, का चित्र बनाया जाता है जिसे सुबह गन्ने की डंडी से पीट -पीटकर पूरे  घर में घुमाया जाता है बाद में ओखली के पास पूजा होती है की दरिद्र फिर न आये।  

 हर पूजा-पर्व पर तुलसी के स्थान पर भी ऐपण दिए जाते हैं। घर की साफ सफाई और सजावट के लिए कभी भी ऐपण दिए जा सकते हैं पर त्यौहार पर अत्यावश्यक हैं पर किसी दुखद घटना या सूतक के समय नहीं बनाये जाते ।  

  घरों के फर्श दीवारों और देहरी पर ऐपण बहुत सुन्दर लगते हैं । इनके अतिरिक्त अन्य तरह की चित्रकला भी यहाँ बहुत प्रचलित है । जिन्हें  कागज़, वस्त्र या लकड़ी के पट्टों या दीवारों  पर बनाया जाता है । इन्हें `पट्टा` कहा जाता है। इनमें प्रमुख इस प्रकार हैं -

जन्माष्टमी का पट्टा   

  इसे दीवार पर या कागज़ पर बनाया  जाता है । इसमें कृष्ण जन्म से सम्बंधित सभी आख्यान जैसे-  बंदीगृह में कृष्ण जन्म, वसुदेव का उन्हें यमुनापार टोकरी में लेकर जाना , शेषनाग द्वारा सर पर रक्षा करना, नन्द के घर यशोदा के पास रखना, बाल लीलाएँ बकासुर आदि का वध, ऊखल में बंधना, गोपियों के साथ रास लीला, गाएँ चराना अर्थात कृष्ण का पूर्ण जीवन -वृत्त दिखाया जाता है। जन्माष्टमी को इसका पूजन होता है ।  

ज्यूँति का पट्टा 

 इसमें तीन देवियों- महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के साथ दाहिनी ओर श्री गणेश जी का चित्र बनाया जाता हैं । साथ में नीचे की ओर सोलह मातृकाओं का चित्र बनता है । बच्चे के षष्ठी कर्म, नामकरण, जनेऊ, विवाह आदि सभी शुभ कार्यों में इनका पूजन होता है अक्सर बुआ इस पट्टे को बनती हैं या लाती हैं । पूजा के बाद बुआ को उपहार मिलते हैं।  

पहले घर की महिलाएँ इसे बनाती थीं, लकड़ी की पतली डंडी में रूई लपेट कर कूची बनाकर लाल रंग  या स्याही से बनाती थीं । अब तो ये छपे हुए रूप में बाजार में मिल जाते हैं।  

मातृका पट्टा  

विवाह के अवसर पर ये पट्टा अलग से बनता है । इसमें गणेश और गौरा  के अलावा सोलह बिंदु या त्रिकोण षोडश मातृका के प्रतीक स्वरूप बनाये जाते हैं । वधू के गृह प्रवेश के समय द्वार पर इनकी पूजा होती है । वधू उनपर घी की धारा डालकर पूजा और आरती करती है । तब घर के अंदर आती है । विवाह के संस्कार पूर्ण  होने पर बाँस की टोकरी में लाल वस्त्र से ढक कर इसे वधू सर पर रख घर के पास जलाशय पर जाती है । वहाँ भी पूजा के बाद इसे विसर्जित किया जाता है ।

बट सावित्री  पूजा पट्टा 

   जेष्ठ माह में महिलाएँ बट सावित्री का व्रत और पूजन करती हैं । इस अवसर पर सत्यवान - सावित्री  की पूजा करती हैं । निर्जल उपवास किया जाता है इस व्रत का यहाँ उतना ही महत्त्व है जितना अन्यत्र करवा चौथ के व्रत का । यहाँ पट्टे में वट वृक्ष सत्यवान और सावित्री का चित्र  बना कर पूजा की जाती है और अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है ।  

बट सावित्री  पूजा पट्टा 

 गंगा दशहरा पर्व के दिन लोग अपने घरों के दरवाज़ों के ऊपर इन पत्रों को लगते हैं । इसमें गणेश, शिव, हनुमान, आदि देवताओं के या ज्यामितीय चित्र बनाये जाते हैं । मान्यता है इन्हें द्वार पर लगाने से बरसात में बिजली गिरने का भय नहीं रहता ।  

षष्टी की चौकी  

इसे लकड़ी के पाटे पर गोबर से बनाया जाता है। इसमें तीन देवियों को बनाया जाता है। चारों ओर और बीच की खली जगह को आटे, हल्दी, रोली कुमकुम से सजाकर जौ से पूरा जाता है । छठी पूजन के बाद नाम कारण के दिन जलपूजन के बाद विसर्जित किया जाता है।  

सेली 

विभिन्न अवसरों पर आरती के लिए विशेष थाल बनाया जाता है जिसे सेली कहते हैं । आटे के दीये बनाकर थाल  में  किनारों में रखकर बेल बूटियों से  सजाया जाता है रंगों, फूलों की पंखुड़ियों से थाल को सजाते हैं । विवाह के समय दूल्हे का स्वागत इसी आरती से होता है ।  

वर की चौकी 

 विवाह के अवसर पर जहाँ वर का स्वागत करने के लिए धूल्यर्घ की चौकी बनाई जाती है । वहीं दूल्हे औए वर पक्ष के ब्राह्मण की पूजा के  लिए विशेष चौकियाँ बनाई जाती हैं। ये लकड़ी की चौकियों को पीले रंग से रंग कर अन्य रंगों से चित्रित किए जाते हैं जहाँ ब्राह्मण की चौकी को चारों ओर बेल - बूटे बना कर बीच में स्वास्तिक बना दिया जाता है वहीं वर की चौकी पर विशेष नमूना बनाया जाता है । 

इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड की महिलाओं का विशिष्ट परिधान ``रंग्वाली का पिछौड़ा `भी चित्रकला का अनुपम उदाहरण है । पहले कपड़े को पीले या केशरिया रंग में रंगा जाता है फिर लाल रंग से चारों ओर सुन्दर किनारों के नमूने बनाये जाते हैं ,बीच में बड़ा सा स्वास्तिक बनाकर उसके चारों खानों में शंख -घंट - सूर्य -चन्द्र बनाये जाते हैं । विवाह के समय मायके और ससुराल दोनों जगह बनाए जाते हैं । बाद में हर धार्मिक और पारिवारिक सांस्कृतिक अवसरों पर इसे अवश्य पहना जाता है । अब लोग समय की कमी का बहाना कर इसे घरों में नहीं बनाते वरना रंग्वाली का दिन शादी विवाह का एक विशेष दिन होता था। आधुनिक समय में ये बाजार में छपे हुए मिलने लगे हैं । इनसे रंग उतरने या फीके पड़ने का डर नहीं रहता ।  

  इन सभी की विशेषता यह है की इनकी सामग्री घर पर ही उपलब्ध हो जाती है । किसी कुशल कारीगर की आवश्यकता नहीं पड़ती । घर की सभी महिलाएँ मिलजुल कर कार्य संपन्न कर लेती हैं । उन्हें अपनी कलाओं को दिखाने का अवसर मिल जाता है । विषय प्रकृति पर आधारित होते हैं, जिसके सान्निध्य में वे दिन रात रहती हैं, फल- फूल, पेड़ -पौधे, चाँद- सितारे -सूर्य- जल -कलश-शंख घंट,  सभी चित्रों में शामिल होते हैं, स्वस्तिक चिह्न तो प्राचीन समय से ही विभिन्न संस्कृतियों का अंग रहा है । इसे सूर्य का और पवित्रता का प्रतीक भी माना जाता है । मिश्र और यूनान में भी इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं ।  

यह कला यद्यपि अभी तक प्रचलित है, पर बाजारीकरण के इस युग में इसकी मौलिकता को खतरा है अब प्लास्टिक में यह कला उपलब्ध हो रही है । 

कहते हैं हर व्यक्ति के अन्दर एक कलाकार छुपा होता है जो अवसर मिलने पर उजागर होता है  आशा है आज की पीढ़ी  आने वाली पीढ़ी को यह कलात्मक संस्कार भी देगी ताकि हमारी धरोहर सुरक्षित रहे संवर्धित हो सके । इसे  बचाकर रखना हमारा कर्तव्य है कि यह जीवित रह सके । ■

सम्पर्कः गुडगाँव , मो.  09911274074


Jun 1, 2025

कहानीः आशा की दूसरी किरण

  - ज्योतिर्मयी  पन्त 

आज देवयानी का पत्र मिला। अपार ख़ुशी हुई। एक तो इस जमानें में जब पत्रों का आदान -प्रदान लुप्त सा हो रहा है तो कोई पत्र लिख भेजे तो प्रसन्नता का विषय है ही।दूसरा दो साल पहले  देवयानी पर दुखों का जो पहाड़ टूट पड़ा था। उससे शायद अब वह उबरने लगी थी। एक अजीब मनस्थिति में मैंने उसका पत्र खोला। पत्र खोल कर पढ़ने के बीच ही पिछली बातें एक झंझावात की तरह मन डुला गयीं और आँखों में आँसुओं के बादल से घिर आए। आँचल में उन्हें समेट  पत्र पढ़ना आरम्भ किया। 

      औपचारिक कुशल-क्षेम के बाद लिखा था। ‘आज  जो लिख रही हूँ। मुझे स्वयं ही यकीन नहीं आ रहा है कि यह सच है। पर तुमसे कुछ  छिपा भी तो नहीं। तीन बेटियों  के साथ अकेले किस तरह मैंने जीवन बिताया। जब भरी जवानी में ही पति अचानक ईश्वर को प्रिय हो गए। तीनों को माँ -बाप दोनों का प्यार और सहारा देकर बड़ा किया। उन्हें उनकी इच्छानुसार पढ़ा लिखा कर आत्म निर्भर बनाया ।अपनी   इस छोटी सी दुनिया में संतुष्ट हो गई थी ।तभी किसी रिश्तेदार ने बड़ी बेटी आशा का रिश्ता पक्का किया था ।लड़का  अनिकेत अच्छे खानदान का था ।पढ़ा लिखा था। किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रहा था ।दोनों ने मिलकर एक दूसरे को पसंद भी कर लिया था। हर तरह से सुयोग्य जान कर सगाई निश्चित की थी। फिर जो हुआ ....तुम भी साक्षी रही थी ....’ 

    यहाँ से आगे पढ़ने से पूर्व वे सारी  बातें आँखों के सामने एक बार फिर उपस्थित हो गयीं ....हाँ सच ही तो है सगाई का समाचार और आमंत्रण पाकर  वह दो दिन पहले ही पहुँच गई थी। उसकी बचपन की सहेली की बेटी की सगाई थी न। घर में खुशियाँ   छलक रही थीं। देवयानी ने बहुत अच्छी तैयारी कर रखी  थी। बड़े सौभाग्य से यह दिन आया था। शुभ मुहूर्त पर अँगूठियाँ एक दूसरे को पहनाई गई। नाच -गाना, खाना पीना। हँसी खुशी संपन्न  हो गया। लड़के के घरवाले खुश होकर लौटे और शादी की तारीख निश्चित कर शीघ्र ही नए रिश्ते जोड़ने वाले थे। लड़का एक दिन के लिए और रुक गया था। उसे वहीं से अगले दिन चेन्नई जाना था। पूरा दिन दोनों को साथ बिताने,घूमने और खरीदारी करने  का मौका मिल गया था। अनिकेत सभी से मिलकर विदा हुआ ।पर किसी को यह आभास नहीं था कि यह विदाई अंतिम विदाई हो रही है ।सभी देर रात तक जगे बतियाते रहे थे। सुबह उस दिन रौशनी लेकर नहीं घोर अंधकार लेकर आई। टी.वी. पर प्रमुख समाचार ही उस ट्रेन के हादसे का था। सभी हक्के- बक्के से हो गए थे और दोपहर होते- होते तो सारी दुनिया ही  लुट गई थी। ट्रेन की भयानक टक्कर हुई थी सामने आती हुई ट्रेन से और कई लोगों की मृत्यु तो घटनास्थल पर ही हो चुकी थी। देवयानी को भी अनिकेत के घर से दुखद समाचार मिला। वह आशा  को लेकर तुरंत ही चेन्नई को रवाना हो गई घायलों को वहीं के अस्पताल में दाखिल किया गया था। मुझे उसके वापस लौटने तक वहीं रुकना पड़ा ।दोनों बेटियों  और घर की देख-रेख के लिए। जो ख़ुशी दो दिन पहले सारे घर को गुंजायमान किए  थी वहाँ अब मौत का सा सन्नाटा छाया था ।दो दिन के बाद ही अनिकेत सबको रोता बिलखता छोड़ कर चला गया। देवयानी आशा को लेकर लौट तो आई थी; पर लगता था आशा कही खो गई थी। एकदम सुन्न और  पत्थर की मूर्ति सी। जैसे किसी और ही दुनिया में हो।न तो वह खुल कर रो ही सकती थी न अपने मन की बात कह सकती थी। 

  देवयानी ने ही बताया था  ऐसे दुःख के समय क्या बात हो सकती थी ? सभी अवाक् हो गए थे। आँखों में आँसू ...स्वप्न- सा सब कुछ हुआ ...समझ से परे। सभी दुर्भाग्य को कोस रहे थे ।क्या चाहा क्या हो गया? पर अनिकेत की दादी और चाची  ने सारा दोष आशा के माथे मढ़ दिया। ऐसी लड़की जिसने घर में कदम भी न रखे, सिर्फ सम्बन्ध जोड़ने भर से घर का चिराग बुझा दिया। सभी को अंधकार के कुएँ में धकेल दिया। कितनी अपशकुनी ....दुःख की अवस्था में उन्होंने जो कहा वह तो फिर भी सुना जा सकता था। उनकी मानसिक अवस्था विवेक शून्य थी। लेकिन अपने ही सगे, रिश्तेदार, और आस-पास के लोग ...कभी मुखरित हो कर तो कभी इशारों में यही सब दोहराने लगे, तो केवल आशा ही नहीं उसकी दोनों बहनें भी एक अजीब सी स्थिति का सामना करने हो मजबूर सी हो गईं। अब आशा के दुर्भाग्य को लेकर उसकी बहनों के लिए जो रिश्ते आने लगे थे- एक-एक कर गुम से हो गए ।

आशा अब घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहती। वह भी अपने आपको ही दोषी समझने लगी। सगाई की अँगूठी बहुत मुश्किल से ही उतारी थी। देवयानी ने आगे लिखा था ... ‘‘ऐसी स्थिति से गुज़र रही थी मैं की क्या बताऊँ? अपने सारे दुःख भूलकर मैंने इन्हें सम्हाला था …सारी उम्र। तब ये छोटी थी बातें मान जाती पर अब इनको समझाना दिन पर दिन कठिन हो रहा था। हर समय उदासी के बादल घिरे रहते। हँसी- ख़ुशी तो इस घर का रास्ता ही भूल गई।’‘ 

  दो साल से अधिक समय होने को आया पर हमारा समय जैसे वहीं स्थगित हो गया। एक दिन बड़ी हिम्मत से सोच  कि  जो भेंट- उपहार -गहने आशा को मिले थे। उनका क्या करें ? घर में रख कर भी पुरानी यादें जब-तब मन व्यथित कर देती ।वापस देना ठीक होगा कि नहीं? चुपचाप रख लेना भी ठीक नहीं। उनसे कहते भी न बनता था और न  कहना  भी। तब छोटी बिटिया रेनू ने  हिम्मत कर एक दिन अनिकेत की माँ कालिंदी जी से फोन पर बात करने की जिद की। उसने कहा ‘‘नाराज़ ही तो होंगे फिर से भला-बुरा सुनाएँगे ….सुन लेंगे कोई बात नहीं पर कहीं उन्होंने गहने -उपहार हड़प लेने  जैसी बातें मन में सोच रखी होंगी तो उनसे तो हमें छुटकारा मिलेगा …दुविधा में दिल पर बोझ लादने का क्या फायदा? रेनू की बात भी सही लगी। अब मिलजुलकर ही हमें हर हाल का सामना करना था। बहुत असमंजस से घिर कर डरते -घबराते एक दिन फोन कर ही दिया। कालिंदी जी तो रोती  रहीं  पता नहीं उन्होंने बात ठीक ढंग से सुनी भी या नहीं? सबके हाल पूछकर बोली …कुछ दिनों बाद  वे स्वयं  ही आएँगी , आने की सूचना भी पहले दे देंगी। कोई चिंता की बात नहीं। 

 कालिंदी  जी ने निश्चिन्त रहने को कह तो दिया पर उस दिन से चिंताएँ और बढ़ गईं। अब अगर कहती तो सामान हमीं दे आते …खुद ही आ रही हैं …क्या कहेंगी ? कहीं गहने उपहार में कोई कमी तो नहीं निकाल देंगी ।सब कुछ तो वैसे का वैसा ही है खोला ही कहाँ ? हे ईश्वर ! क्या क्या देखना सुनना बाकी है किस्मत में ? 

लगभग एक महीने बाद एक दिन फोन बज ही उठा। कौन उठाकर सुनने की हिम्मत जुटाए? इसी ऊहापोह में कोई न उठा सका …अब और चिंता न उठा पाने से …दुबारा करें या प्रतीक्षा करें ? एक दूसरे से आँखों से ही पूछ रहे थे। सभी की आवाज़ अवरुद्ध सी हो गई थी। तभी फिर घंटी  बज उठी ।मैं ने ही उठाया। आरंभिक औपचारिकता के बाद माफ़ी भी माँग ली। कालिंदी जी ने बताया कि वह अगले दिन ग्यारह बजे पहुँच जाएँगी। सभी लोग घर पर ही मिलें तो ख़ुशी होगी। स्वागत की तैयारी रखें। इस ‘आदेश’ को सुनकर हम सब और घबरा गए। स्वागत तो वैसे भी करते ही ....तो कहने की क्या आवश्यकता थी ? खैर अब जो होगा, धैर्य रख कर निभाना होगा। 

जो भी हो आज सुबह से फिर घर में थोड़ी हलचल होने लगी। सभी जैसे किसी सपने से जागे हों। हर तरह से तैयारी में लग गए। बार-बार नज़रें घड़ी की ओर जाती। शायद सबके मन में पिछली बार की तैयारियों की याद भी ताज़ा हो उठती थी; क्योंकि बीच -बीच में अचानक कुछ बात शुरू सी होती और एकदम ख़त्म भी हो जाती। ग्यारह बजते ही जैसे सबके कान बाहर दरवाज़े पर चिपक गए। थोड़ी ही देर में घंटी बजी। बेटियों को मैंने अन्दर जाने को कहा। दरवाजा खोल कर उनका स्वागत किया। कालिंदी जी गले मिल कर प्रेम से मिली तो मन एकदम हल्का सा हो गया। उनके साथ उनका छोटा बेटा अभिनव था उसने आदर से पैर छुए उसे आशीष दे अन्दर ले आई, बिठाया। रेनू से पानी लेकर आने को कहा। रेनू पानी ले आई। उसने कालिंदी जी के पग छुए और अभिनव को नमस्कार कर जाने ही लगी कि कालिंदी ने उसका हाथ थाम अपने पास बिठा लिया ।

 मैं चाय-नाश्ते के लिए रसोई में जाने ही लगी कि वे बोलीं ....अरे जल्दी क्या है? आराम से पिऊँगी चाय। आशा और तारा कहाँ हैं क्या घर पर नहीं? 

दोनों को  पुकारती हुई मैं चाय लेने चली ही गई। बाद में तारा और आशा  को  चाय नाश्ता लाने को कह मैं वापस आ गई। बैठते ही सोच रही थी  कि बात कहाँ से शुरू हो? फिर पिछली दुर्घटना से ही बात शुरू की। सांत्वना देते हुए भाग्य, होनी, बुरा समय ....था ....असहाय होते हैं सभी ऐसे वक्त में ....और न जाने क्या -क्या उसे खुद भी नहीं मालूम ....थोड़ी देर में दोनों ही गले मिलकर इतना रोईं  कि सभी की आँखों से आँसू बहने लगे। 

       तारा तब तक चाय ले आई थी। कालिंदी जी ने पहले पानी पिया। तारा को भी अपने पास बैठने को कहा। तभी आशा नाश्ता लेकर आ गई। मेज पर ट्रे  रख उसने डरते- डरते कालिंदी के पैर छुए। कालिंदी जी एक झटके में उठ  खड़ी हुई । सभी अचकचा से गए ....अब न जाने क्या हो? उन्होंने आशा को गले लगा लिया। और इतनी जोर-जोर से रोने लगीं। किसी को समझ में नहीं आ रहा था। क्या करें। क्या हुआ? और आशा भी मानों उनका पूरा साथ दे रही थी। वह भी उतनी ही जोर से चीखें मारकर रोने लगी। रो-रोकर जब मन थोड़ा आश्वस्त हुआ तब कालिंदी जी ने उसे अपने पास बिठा लिया। कुछ देर एक चुप्पी सी छा गई। कोई कुछ बोल ही नहीं सका। तभी कालिंदी जी ने कहा ....चाय ठंडी हो गई ....जल्दी पियो ...लो ....कह प्याला उठाने लगीं, सभी उनका अनुसरण- सा करने लगे। चाय पीते हुए उन्होंने सभी के हालचाल पूछे। फिर अचानक ही बड़ी गंभीर- सी हो गई। बोलीं देवयानी जी ! मुझे आपसे बहुत गंभीर बात करनी है ....सुनते ही मेरे पसीने छूटने लगे ....वह कहती जा रही थीं ....पर मेरी बात सभी एक साथ सुनें; इसीलिए मैंने सब को घर पर रहने की बात की थी ....फिर सोच-विचारकर जो भी फैसला हो ....मिलजुलकर आपसी सहमति से हो।

बात ये है कि मेरे साथ ....या कहों कि हमारे साथ जो होना था हो गया ....भरी जवानी में बेटा चल दिया ....इससे बड़ा दुःख और क्या होगा ? आपकी बेटी के सपने चकनाचूर हो गए, पर इसमें किसी  को दोष कैसे दें? पर ये समाज भी हमारा ही है। कहने सुनने वाले भी हमीं हैं। लोगों ने तो कहना था सो कह दिया  इससे भला क्या होगा ? पर बुरा ज़रूर हो जाता है। अब देखिए  जिस लड़की को हमने सब तरह से योग्य और गुणी समझकर अपने घर की लक्ष्मी बनाना चाहा वही आज अपशकुनों का घर समझी जा रही है ।और तो और उसकी बहनों पर भी बिना कारण लांछन लगाए जा रहे हैं। ऐसे में आपकी तकलीफ समझ सकती हूँ। हमारे भाग्य में यह दुःख साझा करना है। अगर सगाई से पहले यह होता तो? क्या तब भी आशा दोषी होती? अब जो मैं चाहती हूँ सुनिए ....सब कुछ पहले सा हो सकता है ....मैंने तो अभिनव को मना लिया है ....अब अगर आशा और आप भी साथ दें तो बात बन सकती है ....इन दोनों के गठ-बंधन से हमारे रिश्ते फिर जुड़ जाएँगे ....सभी मंत्रमुग्ध से सुन रहे थे ....रेनू और  तारा को भी बात ठीक लग रही थी पर आशा ....क्या इस बात पर राज़ी होगी ? असली बात तो अब उसके हाथ में थी क्या वह ये समझौता कर पाएगी ? कालिंदी जी ने कहा ....और कुछ देखना- सुनना तो है ही नहीं ....सब कुछ वैसा ही है सिर्फ  ....अनिकेत की  जगह  ....कहती हुई वे फिर सुबकने लगीं। चाहो तो ये दोनों आपस में बातें कर लें। घर में या कहीं बाहर जाकर ....सभी एक दूसरे को देखने लगे। तभी आशा अपनी जगह से उठ खड़ी हुई, लगा वह अपने कमरे में जाकर फिर रोएगी ....आज पहली बार वह रोई थी ....तभी लगा था उसमें संवेदनाएँ बाकी हैं वर्ना पूरे साल भर से वह एक जिन्दा लाश सी हो गई थी। बस काम से काम। न हँसना न बातें करना। आशा अपने कमरे में चली गई। सभी चुप बैठे रहे। क्या ये विषय गलत समय पर तो उपस्थित नहीं हुआ ? पहले आशा को अकेले में पूछकर उसका मन टटोलना उचित नहीं होता? सभी के मन अलग-अलग प्रश्नों में उलझे हुए थे। बहुत देर की शांति के बाद कालिंदी जी ही कहने लगी ...देवयानी जी  मैंने तो अपनी मन की बात आपसे कह दी। हमारी वजह से आशा का जीवन मुश्किलों से भर गया है। अनिकेत की भी यही इच्छा थी और अंतिम समय में इसी के सपने लेकर गया होगा। जो हुआ उसे हम बदल तो नहीं सकते पर कुछ कोशिश तो कर ही सकते हैं भावी जीवन के लिए। अब सारा जीवन रोकर ही नहीं बिताया जा सकता न? चलो मन की बातें कर जी हल्का तो हुआ आज …मेरे मन में आपसे ये बात करने की इच्छा कई बार हुई थी पर साहस नहीं जुटा पाई। उस दिन जब आपने  सामान लौटाने की बात की तभी मन में ये ख़याल आया  कि सिर्फ सामान ही क्यों  हमारी एक बहुमूल्य अमानत और भी है आपके घर में। …अगर सभी साथ में मिल जाए तो? इसीलिए मैंने यहाँ आने की बात कही थी। टेलीफोन  पर सब बातें नहीं की जा सकती थी। अब आशा जो भी ठीक समझे उसे  अपने जीवन का फैसला स्वयं करना है हम अपनी रुचि, राय …उस पर नहीं थोप सकते, वह अच्छी तरह सोच विचार कर ले …फैसला कर ले। तब आप हमें सूचित कर सकती हैं। अब चलना चाहिए।  तभी तारा ने कहा आंटी। अभी कैसे जा सकती हैं आप ?दोपहर के भोजन का समय है। आपकी ट्रेन तो रात को जाती है। अतः आप थोड़ा आराम करें फिर भोजन। इतनी जल्दी क्यों ? 

   रेनू और तारा को लेकर मैं रसोई में गई। एक बार चाय और हो तो अच्छा  रेनू  चलो ...यह कहकर चल दी। मन में यह भी जानने की उत्कंठा थी कि आशा  क्या कर रही  होगी ? पर अपने को रोक लिया अगर आशा ने कुछ कह दिया तो स्थिति ख़राब हो सकती है। अच्छा तो यही होगा कि इनके जाने के बाद ही बात की जाए। उसे कुछ देर अकेले ही रहने देना बेहतर होगा। चाय और खाना निबट गया तो उन दोनों को  आराम करने को कह दिया। अभिनव ने अपने किसी मित्र से मिलने के लिए जाने की बात की और चला गया । 

   शाम होने से पहले आशा ने रसोई में आकर ही भोजन किया और... ‘‘माँ मुझे कुछ कहना है’ …कहकर उसने मेरे हाथ पकड़ लिये। आँखों में आँसू तैर रहे थे और हाथों में एक स्पंदन जिसे मैं महसूस कर सकती  थी। ‘‘शायद मुझे अभिनव से बात कर लेनी चाहिए  …अगर वह तैयार है तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं। अगर मुझे विवाह करना ही है, तो …रेनू और तारा के लिए भी …तो सोचना है। यही ठीक है। उसे जानती तो हूँ ही। पर जो सबसे बड़ी बात है वह है उनकी सोच …एक बेटा जो माँ की बात को शिरोधार्य करने को तत्पर है। दूसरी वह माँ …जो अपने दुःख को पीछे धकेल हमारे दुखों का  बोझ कम करने आई है। हम उनके बारे में क्या-क्या सोच रहे थे? ऐसी सोच रखने वाली महिला का साथ तो मैं वैसे भी देती। और इनसे तो पहले भी …जीवन भर साथ निभाने का वादा कर चुकी थी ।फिर वह तो मुझे बहू का ही स्थान देकर एक और अवसर दे रहीं हैं। मुझे लगता है मना करने से  उनका अपमान न हो जाए  …जिसकी याद मैंने अपने मन में बसा रखी है …उससे किए वादे  भुलाना भी ठीक नहीं …माँ! बताओ मैं क्या करूँ ? मैंने उसकी बात और विचार सुनकर शाबाशी दी और गले लगाया। रेनू और तारा को भी बुलाकर बात कर ली। शाम को कालिंदी जी और अभिनव से भी सारी बातें तय हो गईं। कालिंदी जी ने अपने घर पर फोन द्वारा यह शुभ सूचना दे दी। अगले पंद्रह  दिन बाद किसी मंदिर में सिर्फ घर के लोगों और शुभचिंतकों के सानिध्य में दोनों का विवाह होना है। ‘‘अगर तुम आओ तो अच्छा लगेगा ।’ 

 देवयानी का  पत्र पढ़कर मुझे जो ख़ुशी मिली उसका वर्णन करना तो कठिन है ही। पर मुझे कालिंदी जी से मिलने का मन हो आया। अपने दुःख को नगण्य समझकर जो दूसरों का हित सोच रही हैं, जिनकी विचार धारा सामान्य समाज की विचारधारा से बिलकुल अलग है। जो और लोगों के बहकावे में न आकर खुद की अलग पहचान रखती हैं। उनसे मिलने का अवसर मुझे नहीं गँवाना चाहिए।

सम्पर्कः ए 45 रीजेंसी पार्क-1, डी. एल.एफ़, फेज़- 4, गुड़गाँव, हरियाणा- 122002

Mar 7, 2024

दोहेः उड़त अबीर गुलाल

 


-  ज्योतिर्मयी पंत

 1

जली होलिका अग्नि में, बचे भक्त प्रह्लाद।

रंगोत्सव के पर्व में, मस्ती संग आह्लाद।।

2

यमुना तट पर गोपियाँ, खेलन आई रास।

कृष्ण प्रेम में रंग गईं, नाचें भर उल्लास।।

3

भर पिचकारी रंग से, भीग रहे सब संग।

ग्वाल बाल की टोलियाँ, मस्ती भरे उमंग।।

4

नभ में रंगी मेघ हैं, उड़त अबीर गुलाल।

सत रंगी धरती हुई, जन जन रंगे भाल।।

5

टेसू सरसों दे रहे , रंगों की सौगात।

बगिया फूलों से सजी, होली की शुरुआत।।

6

ढोल मंजीरे बज रहे, गाएँ फगुआ राग।

घर आँगन रौनक बढ़े, पर्व मिलन अनुराग।।

7

 रंग भरे सब चेहरे, मुश्किल है पहचान।

भेद भाव सब मिट रहे, सब हैं एक समान।।

8

शर्बत ठंडाई मिले, गुजिया संग पकवान।

रंग अबीर गुलाल से, सबका हो सम्मान।।


Feb 23, 2018

बच्चों के प्रति हमारी बढ़ती जिम्मेदारी

बच्चों के प्रति हमारी
 बढ़ती जिम्मेदारी
-ज्योतिर्मयी पंत
जीवन में बचपन ही वह समय होता है जब खेल- कूद, मौज -मस्ती  और निश्चिन्तता  रहती है इसी समय बच्चों का शारीरिक -मानसिक विकास होता है, संस्कारों और आदतों की नींव पड़ती है। परन्तु भौतिक वाद, और बाजारवाद के युग में  सबसे अधिक पर बचपन पर ही पड़ा हैं। यह बचपन छीन ही  चुका है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। बचपन की स्वच्छंद मौज- मस्ती से अनजान से बच्चे अब दो ढाई साल से ही  प्ले -स्कूल और नर्सरी में अनुशासन- बद्ध हो रहे हैं और फिर बस्तों के भारी बोझ तले दबते हुए भावी जीवन यात्रा में शामिल हो रहे हैं।
इतना ही नहीं अब वे निरंतर पढ़ाई, सबसे आगे रहने के तनाव से भी परिचित हो गए हैं और कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
आजकल हर दिन बच्चों की समस्याएँ बढती ही जा रही हैं। अखबारों और मीडिया में अक्सर ख़बरें होती हैं। कहीं किसी बच्चे ने आत्म हत्या कर ली, कहीं बच्चे घर छोड़कर भाग गए या चोरी करते हुए पकड़े गए ,कहीं अपहरण हो रहे हैं। अब तो स्कूलों में तक छोटे बच्चों के साथ यौन शोषण और उनकी हत्याएँ भी होने लगी हैं।
 कुछ समय पूर्व तक इस प्रकार की घटनाओं से कम से कम बच्चे तो दूर थे। आज भले ही माता पिता अपनी संतानों के समुचित पालन पोषण की हर संभव कोशिश करते हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए बड़े नामी स्कूलों में प्रवेश दिलाते हैं। लेकिन जब उनके बच्चे इस तरह बुराइयों में फँस जाते हैं या अपनी जान तक गँवा बैठते हैं तो उनके अभिभावक ही नहीं और लोग भी दुखी और चिंताग्रस्त हो जाते हैं।
 यद्यपि कारण बहुत से हो सकते हैं किन्तु मुख्य कारण की विवेचना की जाए, तो सामने आता है माता -पिता के पास  बच्चों के साथ बिताने के लिए समय की कमी और उनकी बातें  सुनने समझने का अवसर न देना। बच्चे अपनी सारी बातें माता- पिता को बताना चाहते हैं पर बड़े व्यस्त होने के कारण उन्हें खेलने कूदने को कह देते हैं या डांट देते है। तब बच्चे या तो उदासीनता की गिरफ्त में आ जाते हैं या फिर जिद्दी से हो जाते हैं।
 जिन घरों में माता-पिता दोनों कार्य करते हैं और बच्चे या तो अकेले हो जाते हैं या नौकरों के भरोसे पलते हैं जहाँ उन्हें अपनापन मिलता है कई बार यहाँ भी बच्चों के साथ कुछ अनहोनी  ऐसी बातें हो जाती हैं। माता पिता अपना लाड़- प्यार  उनको महँगे उपहार देकर पूरा करते हैं। कहीं वे अपनी आकांक्षाएँ बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। उनकी रुचि का ध्यान न रखकर उनसे उन विषयों को पढऩे को कहा जाता है, जिसमें उनकी रूचि ही नहीं होती।  आगे उनके हिसाब से कार्य क्षेत्र चुनने की जबरदस्ती की जाती है। बच्चों की सभी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति माता- पिता कर देते हैं। उनकी पसंद के उपहार भी देते हैं किन्तु भावनात्मक रूप से दूर होते जाते हैं।
 मोबाइल फोन, नेट और अंतर्जाल की सुविधा जहाँ ज्ञानवर्धक है वहीं बच्चों को दिग्भ्रमित भी करती है। आजकल कुछ खेल भी जानलेवा सिद्ध हो रहे हैं, अत: माता पिता का यह अतिरिक्त कत्र्तव्य बनता  है कि वे इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे इनका दुरुपयोग न करें। उनकी निगरानी अति आवश्यक है।
 उन्हें हर कक्षा में प्रथम आने को कहा जाता है और ऐसा न होने पर उन्हें अक्षम और अयोग्य कह दिया जाता है फिर वे अवसादित होकर कुछ अनचाहा कदम उठा लेते हैं। अब तो हमारी शिक्षा प्रणाली भी इसी तरह की हो गयी है। नब्बे प्रतिशत से ऊपर ही हर बच्चा लाये तो आगे कॉलेज में प्रवेश मिले। माता-पिता के अलावा शिक्षकों के पास भी इतना समय नहीं कि वे प्रत्येक बच्चे का ध्यान रख सकें। समर्थ लोग स्कूल से अधिक ट्यूशन पर भरोसा करने लगे हैं। बच्चे स्कूल, होमवर्क और ट्यूशन में ही सुबह से शाम तक व्यस्त रहते हैं और तनाव ग्रस्त भी। फिर भी सफल न होने पर आत्महत्या करने को उतारू हो जाते हैं। काश! ऐसे में उनके अभिभावक उन्हें सँभाल पाएँ या पहले ही अपने बच्चों की क्षमता पर भरोसा कर सकें तो ऐसी नौबत ही न आये। बाद में आजीवन पछतावा न हो।
अब समय की माँग है कि बच्चों को ऐसी  शिक्षा दी जाये कि वे यौन शोषण के शिकार न हो पाएँ। बाहर ही नहीं घरों में भी बच्चे इस तरह अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा भी सताए जाते हैं और माता पिता से शिकायत करने पर उन्हें चुप रहने की ही सलाह दी जाती है। तब या तो वे लगातार इस तरह के दुष्कर्म में फँस जाते हैं या जीवन भर के लिए मानसिक कष्ट सहते हैं। अभिभावकों का ये कर्तव्य है कि बच्चों की समस्याएँ सुनें और उचित कारवाही करें।
  लड़के-लड़कियों को दूसरों के व्यवहार, अच्छे- बुरे स्पर्श के बारें में स्पष्ट बता दिया जाना चाहिए। अगर कभी इस तरह कोई शिकायत करे तो उनकी बात पर विश्वास करना चाहिए। माता- पिता हर समय हर जगह तो बच्चों के साथ नहीं रह सकते। इसलिए उन्हें भावी ख़तरों से बचाने के लिए शिक्षित करना आवश्यक है।
घर परिवार के बाद स्कूलों का भी उत्तरदायित्व बढ़ गया है। जहाँ पहले बच्चों को शिक्षा और अन्य कार्यक्रम स्कूल में सीखने को मिलते थे और शिक्षकों का कार्य होता था कि बच्चों को शिक्षा देकर, उनकी प्रतिभा निखारकर सफल नागरिक बना सकें। आजकल  शिक्षा भी एक व्यवसाय बन गयी है। पहले जैसा आदर सम्मान बच्चों के साथ स्नेह प्यार देखने को नहीं मिलता। कहीं बच्चों को निर्मम शिक्षकों द्वारा  इतना मारा- पीटा जाता है कि उन्हें स्कूल जाने में भय  लगता है और तो और अब यहाँ भी बच्चों के बलात्कार, यौन-शोषण की घटनाएँ निरंतर बढ़ रही हैं।
बच्चों के आपसी लड़ाई -झगड़े, मारपीट से बढ़कर अब स्कूलों में बच्चे मर्डर भी करने लगे हैं। ऐसे में उनका दायित्व बनता है कि स्कूल प्रबंधन सबकी सुरक्षा का ध्यान रखें। जाँच-पड़ताल , पुलिस -अदालतें बाद में चलती हैं पर जिनके मासूम बच्चे अपनी जान दे बैठे उनका दुख क्या कभी दूर हो सकेगा ?
 बच्चे अपने साथ हथियार लेकर स्कूल में पहुँचकर हत्या करते हैं , तो ऐसे में स्कूलों में इस तरह का प्रबंध हो कि प्रवेश स्थान में और स्कूल परिसर में कैमरा आदि उपकरण लगे हों और उनकी जाँच भी होती रहे कि वे काम कर भी रहे हैं या नहीं? बच्चों के बदले हुए व्यवहार या स्वभाव पर भी शिक्षकों का ध्यान रहे। किसी घटना के बाद जाँच करनेवाले ईमानदारी से अपना फ़र्ज निभाएँ। धन के लोभ में किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा न हो बल्कि सच्चा दोषी पकड़ा जाए। ताकि आगे ऐसी घटना होने की आशंका न  रहे। और न्याय पालिका पर विश्वास बना रहे औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन होने से भी बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ा। परिवार में आपस के प्रेम, भाई-चारे, और मेलजोल की प्रवृत्ति कम हुई। लोग बुजुर्गों को बोझ समझ वृद्धाश्रम में छोड़ रहे हैं। यही सब बच्चे  देख और सीख रहे हैं।
 अब समय रहते समाज के सभी लोगों को सहयोग करना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।  जिससे हमारे  देश के भावी कर्णधार अच्छे नागरिक बन सकें।
सम्पर्क: गुरुग्राम, 09911274074
email- pant.jyotirmai@gmail.com

Jan 27, 2018

आ गया नव वर्ष

आ गया नव वर्ष 
-ज्योतिर्मयी पंत

नाच गायें सभी
जगे नव आस मन
छँटे धुंध कुहरे
पिघले हिम दुखों का
नर्म धूप  बिखरे
मिले सुख संपदा
चाहते हम सभी...

खिलेगा अब चमन
द्वेश  थम कर यहाँ
फैल  जाये अमन
कुटुम्ब बने जहाँ
मिल करें प्रयास
मिले मंजिल तभी...

बिगत से सीख लें
भूल फिर से न हो
एक जुट शपथ लें
देश हित ध्येय हो
आतंक से निपटे
लडें  साथी  सभी...

सम्पर्कः गुरुग्राम, मो.  ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌09911274074

Mar 10, 2017

आयो नवल बसंत सखी...

       आयो नवल बसंत सखी... 
                   - ज्योतिर्मयी पंत
जनमानस को नयी स्फूर्ति, उमंग ऊर्जा से भर देते हैं त्योहार;इसीलिए विश्व में त्योहार मनाने की परंपरा  बनी होगी.हमारे देश में हर क्षेत्र में विविध पर्व और त्योहार मनाये जाते हैं। इनमें होली इकलौता ऐसा पर्व है जिसके नाम से ही मन उमंग और उल्लास से भरने लगता है। यों तो होली पूरे देश में ही मनाई जाती है परन्तु उत्तराखंड की होली अति विशिष्ट है।इसे अन्य स्थानों की तरह कुछ दिन ही नहीं अपितु एक लम्बी अवधि तक मनाने की परम्परा है।
 कुमाऊँ क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही होली का आरम्भ हो जाता है और शिव रात्रि के बाद दिनों दिन उत्साह बढ़ता जाता है और फाल्गुन की एकादशी से तो पूर्ण रूप से होली मनाई जाती है।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी या आमलकी एकादशी के दिन चीर बंधन किया जाता है ।एक वृक्ष विशेष की बड़ी सी शाखा को  काटकर एक सुनिश्चित स्थान पर विधिपूर्वक गाड़ दिया जाता है।मोहल्ले के घरों के सदस्य इसमें लाल और सफ़ेद कपड़े की चीर बाँधते हैं।होली पर्यंत इसकी रक्षा की जाती है ।यहीं पर धूनी सी जलाकर लोग रात भर नाचते गाते हैं।
चीर बाँधते समय भी प्रश्नोत्तर रूप में गीत गाते हैं-
 कैले(किसने ) बाँधी चीर हो रघुनन्दन राजा
गणपति बाँधी चीर हो ...इस तरह सभी देवताओं का नाम लिया जाता है.बाद में परिवार के सभी सदस्यों का नाम की इन इन लोगों ने चीर बाँधी।
ज्योतिषीय गणना के आधार पर भद्रा रहित मुहूर्त में देवी देवताओं पर रंग छिड़का जाता है और सभी सदस्यों के लिए लाए गए सफ़ेद कपड़ों पर भी रंग के छींटें दिए जाते हैं।इसके बाद तो घर घर में होली की बैठकों की धूम मच जाती है।
होली की बैठकों में भी पहले देवताओं -गणेश, शिव शंकर ,विष्णु भवानी  की स्तुति वाले फाग गीत गाये जाते हैं ।
सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन
होली खेलें गिरिजापति  नंदन ।
.............................................
ऊँचे भवन पर्वत पर बस रही
अंत तेरा नहीं पाया मैया
........................................
शिव शंकर आज खेले होरी
.......... फिर राम और कृष्ण के जीवन पर आधारित गीत।

गायन शैली के आधार पर यहाँ दो तरह की होली होती है ।ठाड़ी यानी खड़ी होली;जिसमें पुरुष और  कहीं स्त्रियाँ भी खड़े होकर गोलाकार घूमते हुए नाचते हैं गीत  के बोलों के अनुसार  क़दमों की ताल और गति बदलती जाती है.ढोलक ,मंजीरे ,हुड़का, दमुआ की थाप  पर सभी बच्चे बूढ़े थिरकने लगते हैं।
बैठकी या बैठी होली  अधिकतर शास्त्रीय राग रागिनियों पर आधारित होती है ये महफ़िलें अक्सर शाम से शुरू होती हैं ।हारमोनियम, तबला,ढोलक, बाँसुरी, मंजीरे की संगत के साथ गायन होता हैएक गायक गाता है और सभी मन्त्र मुग्ध होकर सुनते हैंया एक गायक के गीत की पंक्ति पूरी होते ही दूसरे गायक की गायकी शुरू होती है ।कई बार तो एक ही गीत कई घंटों तक चलता रहता है और लोग तल्लीन होकर झूमने लगते हैं। कुछ ही गीतों में रात  बीत जाती है ...
आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो
और  
कौन गली गए श्याम...जैसे गीत तो निरंतर चलते रहते हैं।     
 गीतों  का विषय और क्रम भी नियम से ही होता है .पहले सभी देवी देवताओं की स्तुति वाले होली गीत फिर  धीरे धीरे जोश और उमंग में शृंगार रस पूर्ण....कृष्ण की रासलीला के  गीत और हँसी ठिठोली वाले गीत गाये जाते हैं. जिनमें देवर भाभीजीजा साली और पति पत्नी की नोंक -झोंक प्रदर्शित होती है.विरहिणी नायिकाओं के गीत भी गाए जाते हैं जो पक्षियों के माध्यम से प्रिय को सन्देश भेजती हैं....
ओहो मोहन गिरधारी
ऐसो अनारी  चूनर गयो फारी
हँसी हँसी दे गयो गारी
चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो
और भिगो गयो सारी..
एकाकी नायिका तोते से कहती है की बागों में बोलने से अच्छा ,वह पिया को सन्देश दे ....
हरा पंख मुख लाल सुआ
बोलिय झन बोले बागा में
कौन दिशा में बदल देखे कौन दिशा घनघोर
कहाँ सुखाऊँ पिया की पगारिया कहाँ सजाऊँ सेज.
होली के गीतों में  कुमाऊँनी, ब्रजभाषा और खड़ी बोली के गीत शामिल हैं ।  
 महिलाओं की होली बैठकें अक्सर दिन में होती हैं ।नाच गाना, हँसी- मजाक, स्वांग आदि इसके विशेष अंग होते हैं; जहाँ महिलाएँ निःसंकोच होकर मस्ती भरी बातें कर लेती हैं और रोज की जिंदगी के तनावों  से मुक्त होकर  ऊर्जा पाती हैं।
 होली जहाँ एक और रंगों का त्योहार है, वहीँ दूसरी और विशेष पकवानों का भी। इस अवसर पर गुजिया अवश्य बनाई जाती है। सूजी का हलवाआलू के गुटके (उत्तराखंड का विशेष व्यंजन ) पकौड़े व मिठाइयाँ, चाय, पान-सुपारी आदि से सभी मेहमानों का स्वागत होता है। मस्ती के आलम में ठंडाई, शरबत, पकौड़ों और मिठाइयों  में भाँग भी मिला दी जाती है, जिसे खाकर लोगों की हरकतें और हँसने- हँसाने का माध्यम  बन जाते हैं।
 फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका -दहन होता है। पहले दिन जो चीर बाँधी गई थीउसीका दहन होता है।वहाँ भी हलवा आदि व्यंजन बनते हैं और हर घर में प्रसाद के तौर पर बाँटा जाता है। अगले दिन छरडीमनाई जाती है। होलियारों की टोलियाँ ढोल-मंजीरों के साथ नाचती-गाती घर-घर में जाती है,जहाँ रंगों से होली खेली जाती है,.खूब भीगा- भिगोया जाता है। परम्परानुसार सबको जलपान कराया जाता है।
  फिर आशीर्वचन किया जाता है, जिसमें सभी देवी देवताओं, ग्राम देवताओं, इष्ट देवताओं का स्मरण कर घर के प्रत्येक  सदस्य का नाम लेकर उसकी सुख समृद्धि, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ  दी जाती हैं यथा ....
हो हो होलक रे
बरस दिवाली बरसे  फाग .हो  हो
जो नर जीवे खेले फाग  हो हो
आज का बसंत के का घरौ
फिर घर के सदस्य का नाम लेते हुए ....
आज का बसंत (अमुक)का घरौ..
सब परिवार जी वे  लाखे बरी (बरस= वर्ष )
फिर प्रत्येक घर के लोगों को उनके अनुसार पास होने, नौकरी पाने, शादी व्याह या वंश वृद्धि के आशीष दिए जाते हैं और सभी घरों की ओर टोलियाँ जाती हैं। अपरिचित लोगों से भी जान पहचान इस दिन हो जाती है। जिनसे किसी कारण अनबन हो गई हो, उन्हें भी रंग लगा कर गले लगाया जाता है भूल-चूक माफ़ होली मुबारक कहते हुए सभी से बिना भेद भाव  मिलजुल कर लोग दोपहर बाद ही अपने घर पहुँचते हैं  और स्नान के बाद भोजन होता है।
 इस तरह सारी बीती बाते भूल नयी ऊर्जा से लोग फिर अपने काम में लग जाते हैं। बदलते समय का असर हमारे त्योहारों पर भी पड़ा हैजहाँ एक ओर हम अपनी परंपरा से दूर हो रहे हैं ,नए पाश्चात्य त्योहारों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।होली ऋतु आधारित उत्सव है। सर्दी में जहाँ लोग घर में रहना पसंद करते हैं. बर्फ और शीत लहरों का मुकाबला करना पड़ता है.बसंत आगमन के साथ प्रकृति का भी रूप निखर उठता है। धूप गुनगुनी हो आती है, वृक्ष नव पल्लव धारण करते हैं। सरसों, पलाश अन्य पुष्प  भी रंगों की छटा बिखेर देते हैं पक्षी कलरव करते हैं भँवरे गुंजन तितलियाँ नाचती हैं, तो ऐसे में मानव मन शांत कैसे रह सकता है ? प्रकृति के उपहारों संग पर्व की खुशियाँ मिलकर मनाएँ.
 होली का रंग और उमंग भरा त्योहार सभी को मुबारक.

Mar 23, 2012

फागुनी हवा


- ज्योतिर्मयी पंत
1
साँझ सिन्दूरी
रंग फैला,रवि भी
खेले होरी री।

2
पुहुप रंग
ओस की पिचकारी
धरा सजाए।

3
ये मधुमास
करे टोना प्रकृति
बेसुध सभी।

4
आए फागुन
अलि पिक गायन
तितली नाचे।

5
बिरवा झूमें
टेसू सरसों झूलें
फागुन छूले।

6
होली आई री
सजी टोलियाँ आली
आ खेलें होली।

7
स्नेह सिक्त हो
भाँग शराब बिन
ख़ुशी मनाएँ।

8
गीत संगीत
ढोल मँजीरे डफ
आनंद होली।

9
फागुनी हवा
थिरके धड़कन
बहके जिया।

10
बैर भुला दे
रंग पाटे खाइयाँ
लग जा गले।

संपर्क- ए-45, रिजेन्सी पार्क -1 , डी-एल -एफ़, फेज़ -4 गुड़गाँव-112002, मोबाइल-9911274074