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Apr 1, 2026

व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर

 - गिरीश पंकज

मूर्ख दिवस के दिन सर्वाधिक खुशी होती है नेता छदामीराम को और अपनेराम को यानी मुझको। सुबह से ही हम दोनों प्रसन्न होकर सब को चित करने में लगे रहते हैं । एक तो पहली अप्रैल और उस पर अपना जन्मदिन । लोग भी खूब मजा लेते हैं । उन्हें फोन - पर - फोन करते हैं।  वाट्सएप के जरिए संदेश देते हैं । लगभग सब यही लिखते हैं, "बधाई हो, आज आपका जन्मदिन है।"

लोगों को अनजाने में ही एक ऐसा दिन मिल गया, जिस दिन वह अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। "आज आपका दिन है", कहकर लोग यही व्यक्त करना चाहते हैं कि बनाए जाओ हमको उल्लू । हम तो मूरख है ही जनम के। आज आपका ही दिन है।

छदामीराम रोज की तरह एक अप्रैल को भी बहुत खुश रहते हैं । वह अपने भाग्य को सराहते हैं कि  धुप्पल में ही वह मनुष्य योनि में आ गए। थैंक्स गॉड!! अगर लोमड़ी का शरीर मिलता, तो जंगल में ही भटकते रहते । बचे-खुचे मांस को खाकर गुजारा करना पड़ता ; लेकिन मनुष्य-योनि में क्या आए, अब तो आनंद - ही - आनंद है। परमानन्द कहना सही होगा।

छदामीराम ने सीधे-साधे लोगों को ठगने की जो कला बाप-दादाओं से सीखी, वह निरंतर काम आ रही है । हर बार चुनाव में खड़े होते हैं और जीत जाते हैं। हाथ जोड़ना,  लोगों के पैर छूना,  पैसे बाँटना, दारू बँटवाना आदि-आदि सुकर्मों  के सहारे वह हमेशा चुनाव जीते हैं। विनम्र भाव कुछ ऐसा दिखाते हैं कि ससुरी विनम्रता भी लाज के मारे जल-जल हो जाती है। वैसे छदामीराम की विनम्रता मतदान के दिन तक ही रहती है।  उसके बाद तो वे गधे के सिर से सींग की तरह,  भ्रष्ट अफसर के जीवन से नैतिकता की तरह, गरीब के घर से खुशहाली की तरह, भुखमरे के चेहरे से लाली की तरह गायब हो जाते हैं। उसके बाद लोग बस एक ही विज्ञापन दोहराते हैं: छदामीराम को …। ढूँढते ही रह जाओगे।

मोबाइल जब भी लगाओ, वह नहीं उठाते । उनका पीए उठाएगा और अक्सर दो - तीन बातें कहेगा। जैसे, "साहब बाथरूम में है । निकलते ही बात कराता हूँ ।" या फिर कहेगा,  "कार्यक्रम में बैठे हैं। लौटके आएँगे तो बात कराता हूँ ।" कभी कहेगा,  "वो तो आराम फरमा रहे हैं ।" … कभी कहेगा, "साहब बीमार  पड़े हुए हैं।"

जब भी फोन करो, छदामीराम से बात नहीं होती।  कोई न कोई बहाना हाजिर।  जिन लोगों के नंबर फीड है, और जिनसे उनकी लेन-देन की  सेटिंग है,  उनसे तो वे लपककर बात करते हैं। घंटी बजी और जैसे ही नाम दिखा, उपायीराम, तो फौरन बात शुरू कर देते हैं,

"और सुनाओ उपायीराम, जयश्रीराम!

कैसा चल रहा है तुम्हारा काम ?

बहुत दिन से रात को

हमने  नहीं टकराया आपसे में जाम।

कब आ रहे हो प्यारे,

तुम हमारे द्वारे?"

मोबाइल में जिनके नाम सेव हैं, अकसर उनसे बढ़िया बात करते हैं;  लेकिन जिनके नाम सेव नहीं है, उनसे बात करते हुए  महोदय लगभग गुर्राते हैं । पहले तो पीए ही गुर्राता है; लेकिन जब सामने वाला अधिक गुर्राने लगता है, तो पीए मोबाइल छदामीराम को दे देता है । फिर छदमीराम गुर्राते हैं; लेकिन मूर्ख दिवस के दिन छदामीराम गुर्राना भूलकर मिमियाना शुरू कर देते हैं। जितने भी फोन आते हैं, उन सबसे बात करके 'थैंक यू …थैंक यू'  कहते हैं; क्योंकि इनकी अंतरात्मा कहती है- "बेटे, चुनाव के समय और जन्मदिन के दिन तो मनुष्य जैसा बन जाना ठीक रहता है।"

छदामीराम अपनी आत्मा का कहना अकसर मान लेते हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ काम करवाने के एवज में उनको रिश्वत की रकम भेंट करता है, तब भी छदामीराम सीधे अपनी आत्मा से ही बातचीत करते हैं।  सामने से मिल रही राशि के बारे में आत्मा  से पूछते हैं कि फलाना इतने लाख दे रहा है । क्या इस काम के एवज में इतनी रकम उचित है?

जब आत्मा कह देती है, "हाँ रे, ठीक है । ले ले", तो छदामीराम रिश्वत को बड़े ही श्रद्धा- भाव के साथ ग्रहण करते हैं।  लेकिन जब कभी अगर आत्मा ने कहा, "नहीं, यह रकम तुम्हारे स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है", तो छदामीराम साफ इनकार कर देते हैं। जब तक उन्हें मनमाफिक रकम नहीं मिल जाती, वे रिश्वत ग्रहण ही नहीं करते। पर्याप्त दहेज न मिलने के कारण उन्होंने तो पाणिग्रहण से भी इंकार कर दिया था। जीवन  में कुछ सिद्धांत तो होने ही चाहिए साहेब।  तो ऐसे हैं हमारे  छदामीराम।

मूर्ख दिवस पर उनको लख-लख बधाइयाँ।

आप तो  दे ही चुके होंगे न। उस दिन अपने पर ही एक कुण्डलिया लिख मारी। देखें,

मूर्खों के सिरमौर हम, है इसमें  ही सन्न।

लगा रहे सब चून ही, हो कर के परसन्न।

हो कर के परसन्न, समझते हम चालाकी।

कैसे निबटे कोय,  निकालें सबकी झाँकी।

कह पंकज कविराय, करना है खुद पे गौर।

कब तक आखिर हम रहें, मूर्खों के सिरमौर।

Jan 1, 2026

व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए


 - गिरीश पंकज

पिछले साल भी उनके दर्शन हुए थे। इस बार फिर हो गए। मुझे देखते ही वह यादों में खो गए। मुस्कुराते हुए बोले, "हम पिछली बार मिले थे भोले और हमने कहा था, ये करेंगे, वो करेंगे। दुनिया से हम नहीं डरेंगे, तो इस बार भी हम दुनिया से नहीं डरेंगे और जबरदस्त काम करेंगे।"

हम खुश हुए कि नाकारा लोगों की जमात के कुख्यात  सदस्य लालबुझक्कड़ जी इस वर्ष कुछ-न-कुछ तो गुल ज़रूर खिलाएँगे।

हमने पूछ लिया, "क्या करेंगे, इसका खुलासा तो करो!"

वह बोले, "हम प्यार में पड़ गए हैं इस वर्ष। तो बस यही करेंगे।"

मैंने चौंकते हुए कहा, "अरे, यह अचानक लवेरिया कैसे हो गया?। पिछले दिनों तुमको मलेरिया हुआ था। उससे उबरे तो लवेरिया हो गया?"

वह बोले, "मलेरिया के कारण ही लवेरिया हुआ है। बीमार पड़े थे और फेसबुक पर नज़रें गड़ाए हुए थे। तभी एक बुजुर्ग टाइप की जवान महिला ने मेरे इनबॉक्स में आकर कह दिया –‘आई लव यू’, तो हमने भी कह दिया- ‘आई लव यू’…और बस, प्रेम की गाड़ी चल पड़ी।"

मैंने पूछा, "वह रहती कहाँ है ", तो लालबुझक्कड़ जी ने कहा, " झुमरी तलैया में रहती है। उससे मिलने भी अब जाना है। मुझको बुला रही है।"

मैंने हँसते हुए कहा, " बंधु! यह फेसबुक वाली लव स्टोरी अकसर बड़ी फर्जी निकल जाती है, इसीलिए होशियार रहो…सावधान रहो…सतर्क रहो, वरना बेड़ा गर्क हो जाएगा। लाखों रुपये का चूना लगेगा और जीवन नरक हो जाएगा। आजकल बहुत से शातिर पुरुष स्त्री बनकर सोशल मीडिया के जरिए ठगी का कारोबार करते रहते हैं। कहीं यह भी कोई ठग न हो। सावधान रहना।"

मेरी बात सुनकर लालबुझक्कड़ भड़क गए और कहने लगे, "लगता है, आप मेरी लव स्टोरी से जल रहे हैं। आप तो सूखे बरगद हैं; लेकिन हम तो अभी तक हरे-भरे पेड़ हैं। इसमें मोहब्बत के फल लगेंगे-ही-लगेंगे। उसके चक्कर में जब-जब बोलती है, कुछ पैसे भेजते जाता हूँ।"

मैंने कहा, "लेकिन पिछले साल तुम्हारा किसी रामकली से चक्कर चल रहा था, मगर इस बार झुमरीतलैया की कथकली के साथ चक्कर चला रहे हो। यह कौन-सा गुल खिला रहे हो? असलियत तो पता कर लो कि वो लड़की है या लड़का। फर्जी आईडी बनाकर लोग साइबर क्राइम भी कर रहे हैं। बचके रहना रे बाबा, बचके रहना!"

लालबुझकक्ड कुछ सोचने लगे और बोले, "आपने तो  मुझे कन्फुजिया दिया। मुझे संकट में डाल दिया। मैं सोच रहा था कि इस साल एक नया रिश्ता परवान चढ़ेगा। मौजाँ-ही- मौजाँ- होग:, लेकिन अब तो लगता है, इस परवान से सावधान रहना होगा।"

मैंने कहा, "कभी झुमरीतलैया वाली से फोन पर बात हुई क्या?"

लालबुझक्कड़ बोले, "बात तो नहीं हुई, बस संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है।"

मैंने हँसकर कहा, "एक बार फोन से बात करके तो देखो। आवाज लड़की की निकल रही है या लड़के की। तब स्पष्ट हो जाएगा।"

लालबुझक्कड़ ने मुंडी हिलाई और चैट बॉक्स से ही फोन कर दिया। घंटी जाती रही। किसी ने फोन नहीं उठाया।  लालबुझकक्ड को शक होने लगा कि मामला फर्जी है। जिसे अति उत्साह में अपनी प्रेयसी समझ रहे थे, वह तो कोई बड़ा वाला ठग है।

 लालबुझक्कड़ ने मैसेज किया कि रूपसी, अपनी तस्वीर तो भेजो। लेकिन रूपसी (या रूपसा…?) ने अपनी तस्वीर नहीं भेजी। अब तो लाल बुझक्कड़ को कंफर्म हो गया इन बॉक्स में टपकने वाला कोई फर्जी आदमी है। जो अब तक उसे जम कर चूना लगाता रहा।

उसकी असलियत जानकर लालबुझक्कड़ तनाव में आ गए और कहने लगे, "मेरी लव स्टोरी का तो द ऐंड हो गया है। अब यह साल कैसे बीतेगा? मेरी राशि में तो नए साल में सुंदर-सुंदर घटनाओं का योग लिखा था।"

  मैंने उसे सांत्वना देते हुए कहा – ‘‘बच्चू, पिछले साल भी तुमने कुछ खास नहीं किया; लेकिन इस साल तो  कुछ ऐसा करके दिखाओ कि तुम्हारे घर वाले तुम पर गर्व करें। लवेरिया का चक्कर छोड़ो, वरना चूना लगता रहेगा। इसलिए बेहतर है कि बेरोजगार संघ के पदाधिकारी बने रहने के बजाय छोटा-मोटा कोई काम कर लो। हमारे प्रधानमंत्री की सीख मान लो और पकौड़ा बेचने का काम ही करने लग जाओ। साथ में चाय-ठेला लगा लो। जब से चाय वाला प्रधानमंत्री बना है, चाय वाले अपने आप को किसी प्रधानमंत्री से कम नहीं समझते।"

लालबुझक्कड ने कहा, "यह आपने बिल्कुल सही फरमाया। अब हम किसी से चोंच लड़ाने के पहले उससे मोबाइल में  गोठिया लेंगे। उसका चेहरा भी देख लेंगे। कहीं कोई बुढ़िया, जवान होने का नाटक करके हमको गेम तो नहीं दे रही।"

"मतलब यह कि तुम सुधरोगे नहीं।" हम भी हँसकर बोले, "अब तू नहीं और सही और नहीं और सही का फार्मूला अपना रहे हो? लगे रहो मुन्ना भाई! तुम होगे कामयाब एक दिन! लेकिन कुछ काम तो करो!"

लाल बुझक्कड़ ने कान खुजाते हुए कहा, "कुछ सोच तो रहा हूँ कि कुछ करूँ; लेकिन क्या करूँ, कैसे करूँ, यह समझ नहीं आ रहा है।"

इतना बोलकर वह  खुद ही जोर-से हँसे। हम समझ गए कि ये महोदय इस साल में कुछऊ ना करेंगे। हमने लाल बुझक्कड़ को नमस्ते किया और अपनी राह चल पड़े।

Sep 1, 2025

व्यंग्यः हर व्यक्ति अब महाज्ञानी !..

  - गिरीश पंकज

सुबह- सुबह जैसे ही लिखने का मूड बनाया, तभी पांडुरंगम का फोन आ गया - "मैंने एक वीडियो व्हाट्सएप किया है।  कुछ ही देर का है, उसको जरूर देखें, बहुत अच्छा लगेगा।" 

मैंने मन-ही-मन में चिढ़ते हुए कहा, ''जरूर। इसी काम के लिए तो हम इस धरा पर अवतरित हुए हैं।"

लेकिन प्रकट में कहा, ''भेज दीजिए ! मेरे पास तो फालतू समय है।"

 उन्होंने मेरे व्यंग्य-बाण की अनदेखी करते हुए धन्यवाद कहा और फोन रख दिया। मैंने सोचा, चलो, अब लेख पूरा कर लूँ, फिर पांडुरंग का वीडियो देख लूँगा। मगर लैपटॉप खोला ही था कि रंगास्वामी का फोन आ गया ;

" बंधुवर !! अभी मैंने विश्व की एक बड़ी समस्या पर बहुत बड़ा लेख लिखा है। अपने ब्लॉग में डाला है। उसे समय निकालकर पढ़ें, तो आनंद आ जाएगा। देर न करें ।फौरन पढ़ें।"

रंगास्वामी पुराने मित्र थे।

मैंने कहा, "जरूर देख लूँगा। कुछ समय दो।"

लेकिन मैं चक्कर में पड़ गया। पहले पांडुरंगम का फोन, अब रंगास्वामी का । देखना और पढ़ना ही पड़ेगा, वरना फिर इनका फोन आ जाएगा।  मैंने पहले पांडुरंगम का वीडियो देखा। पन्द्रह-बीस मिनट उसमें निकल गए, तो रंगास्वामी का फोन आ गया। "बंधु !आपने अब तक नहीं पढ़ा क्या?.. यह तो गलत बात है !"

मैंने कहा," पढ़ते ही वाला हूँ। अभी पांडुरंगम का वीडियो देख रहा था।"

रंगास्वामी ने चिढ़ते हुए कहा, "अरे,पांडुरंगम कुछ भी बनाता है। उसे देखना बेकार है। मैं दमदार लिखता हूँ। मेरा लेख पढ़ो और बताओ कैसा लिखा है। फोन करना। मैं इंतजार करूँगा।"

हद हो गई! अब तो पढ़ना ही पड़ेगा। मैंने उसका लेख पढ़ना शुरू किया। इतना लंबा लेख कि पढ़ते-पढ़ते ऊब गया। बीस मिनट लग गए। खोपड़िया ही घूम गई । समझ में नहीं आया कि बंदा लेख में कहना क्या चाहता है। तनाव से मुक्ति के लिए मैंने पानी का गिलास उठाया और गटागट पी गया। तभी रंगास्वामी का दुबारा फोन आ गया।

ज़नाब हँसते हुए पूछ रहे थे, "आपने मेरा लेख पढ़ लिया न? मैं व्हाट्सएप में आपका स्टेटस देख रहा था.. मुझे समझ में आ रहा था कि आप मेरा लेख पढ़ रहे हैं.. हाँ... हाँ... हाँ... कैसा लगा लेख?"

मन तो हुआ कह दूँ कि बेहद घटिया था; लेकिन पुराने संबंधों का लिहाज करते हुए कहा, ‘‘कमाल कर दिया। आपने जो मुद्दे अपने उठाए हैं, उन मुद्दों पर मैंने गंभीरतापूर्वक विचार किया है।"

यह अच्छा हुआ कि रंगास्वामी ने यह पूछा नहीं कि मैंने कौन-से मुद्दे उठाए हैं। अगर वह पूछ लेते तो मैं ठीक से बता नहीं पाता। पकड़ा जाता। मेरी बात सुनकर रंगास्वामी बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे, "आप बहुत अच्छे आदमी हैं। कल भी आपको एक लेख भेजूँगा। परसों भी भेजूँगा।"

मैंने कहा, "स्वागत है, आपका !" 

मन-ही-मन कहा, प्राण ले लो हमारे! फिर सोच लिया कि अब इस बंदे को ब्लॉक करना पड़ेगा।  इस वार्तालाप से मुक्त हुआ ही था कि  घुसपैठ कुमार का फोन आ गया, "भाई साहब ! आपको मैंने व्हाट्सएप किया है। बड़ा ही धाँसू लेख मिला है। आपको फॉरवर्ड किया है। आप इसे पढ़िए और कुछ सोचिए। हम ईंट-से-ईंट बजा देंगे।"

मैंने कहा, " ज़रूर। ईंट-से-ईंट बजा लेंगे, लेकिन पहले पढ़ तो लूँ। फिर वहीं टिप्पणी करता हूँ।"

घुसपैठ कुमार ने कहा, ''टिप्पणी से काम नहीं चलेगा। इस पर अपन चर्चा करेंगे कि हम आगे क्या कर सकते हैं। देश को हम कहाँ ले जा सकते हैं।"

मैंने सिर पीट लिया। सोचने लगा, पढ़ो भी और इनसे चर्चा भी करो। खैर,  मैंने उनका लेख पढ़ा और कुछ टिप्पणी भी कर दी, तो मुक्ति का एहसास हुआ। अब मैं विचार करने लगा कि मुझे किस विषय पर लेख लिखना था।  कुछ समझ ही नहीं आया। जो लिखना चाहता था, वह विषय आउट ऑफ माइंड हो गया।  कुछ देर सोचने के बाद अचानक विषय कौंधा : अरे हाँ, मैं तो समय पकाऊ लोगों पर लिखने वाला था। ऐसे लोगों पर जो आपका समय खा जाते हैं। मैंने अपनी डायरी में लिख लिया, 'समयखोरों से त्रस्त लेखक'।  फिर लिखना शुरू ही  किया था, तभी लपेटोराम का फोन आ गया। मैं जानता था कि यह बंदा भी बहुत बड़ा वाला पकाऊ है। फिर भी दुनिया में हम आए हैं, तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा, यही सोच कर फोन उठाना पड़ा। उन्होंने हैलो भी नहीं कहा और शुरू हो गए:

"बंधुवर! एक भयंकर धाँसू लेख आपको व्हाट्सएप किया है। बहुत बड़ा नहीं है। दो-तीन घंटा नहीं लगेगा। आधे घंटे में पढ़ लेंगे। आधे घंटे बाद में आपको फोन करूँगा।"

मेरा दिमाग भन्ना रहा था। कड़े शब्दों में बोल तो सकता था; लेकिन सिधवा मनुष्य की जो छवि बनी हुई है, उसे तोड़ना नहीं चाहता था; इसलिए विनम्र-भाव से कहा, "ज़रूर.. ज़रूर! स्वागत है।" फिर मैंने उनका लेख पढ़ना शुरू किया। उनका अपना नहीं था। आज से पचास साल पहले किसी लेखक ने कुछ भविष्यवाणी की थी। पढ़ते-पढ़ते एक घंटा हो गया। लेख खत्म नहीं हुआ, तो मैंने पढ़ना बंद कर दिया। पूरे एक डेढ़ घंटे बाद पकाऊराम जी का फोन आ गया।

"अरे, लेख पढ़ा ?.. कैसा लगा?.. मजा आ गया न?.. देखो, क्या भविष्यवाणी की थी अगले ने.. बिल्कुल सही उतर रही है.. ऐसे ग्रेट लोग हो चुके हैं दुनिया में..  कमाल है,धन्य है.. इसे कुछ और लोगों को फॉरवर्ड कर देना भाई। मज़ा आ जाएगा।"

अपनी ओर से वे नॉन स्टॉप बोलते रहे।  मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया। अंत में उन्होंने कहा,"अच्छा, फोन रखता हूँ।"

और सचमुच उन्होंने फोन रख भी दिया। वरना उनकी पुरानी आदत है; रखता हूँ, तो कहते हैं मगर फिर लगातार बात करते रहते हैं।  मैं समझ गया कि आज मैं कुछ लिख-पढ़ नहीं पाऊँगा। आज सिर्फ मुझे पढ़ना है और देखना है। लिखना स्थगित! और मैंने यह आजमाया भी। गुस्से में सोच लिया कि आज कुछ लिखना ही नहीं है। आज सिर्फ व्हाट्सएप से ही नज़रें चार करनी हैं। और एक-एक का व्हाट्सएप स्टेटस देखना शुरू। देखते-ही-देखते दोपहर के एक बज गए। भोजन किया और लौट करके आने के बाद फिर व्हाट्सएप देखने लगा। रामलाल का, श्यामलाल का, लल्लू का, कल्लू का। बस, शाम हो गई। चाय-नाश्ता करने के बाद फिर बचे हुए व्हाट्सएप संदेशों को देखना शुरू किया। आज हर व्यक्ति मुझे ज्ञानी लगा। ज्ञान के भंडार से भरपूर। रात को नौ बजे के बाद भूख लगी तो भोजन कर लिया। तभी पकाऊ राम का फिर फोन आ गया :

" भाई साहब! फिर एक लेख मैंने भेजा है। जरूर पढ़ना। आपके ज्ञान-चक्षु खुल जाएँगे।"

मेरा दिमाग बुरी तरह से भन्ना गया था। मन तो हुआ कि मैं उनसे कहूँ कि पहले आप अपने ज्ञान-चक्षु खोलिए। किसी को इतना भी परेशान मत कीजिए कि वह तनाव में आ जाए; लेकिन शिष्टाचार के मारे कुछ कहा नहीं। फिर मन में आया कि व्हाट्सएप ही स्थायी रूप से बंद कर दूँ। चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद यह जो मनुष्य योनि मिली है, उसे सुख-चैन से जी लूँ, यही बहुत है। व्हाट्सएप के कारण जीना कठिन हो रहा है। पहले सोचा कि व्हाट्सएप बंद ही कर दूँ। फिर विचार किया कि मुझे भी तो अपना लेख लिखना है। अब तो मैं भी बदले की कार्रवाई करूँगा और जो-जो लोग मुझे अपना-अपना ज्ञान व्हाट्सएप करते हैं, उन सबको अपने ज्ञान का भी ओवरडोज जरूर दूँगा। हाँ नहीं तो!! इतना सोच कर मैं मुस्कुराया। अब मेरा तनाव धीरे-धीरे दूर होने लगा। फिर यूट्यूब में देशभक्ति वाले पुराने गाने सुनने लगा। फिर कुछ देर बाद तनावमुक्त हुआ तो नींद आने लगी और मैं निंदिया रानी की गोद में चैन से सो गया। ■

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2 , घर नंबर- 2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल : 9425212720,  ई मेल - girishpankaj1@gmail।com


Mar 1, 2025

व्यंग्यः पियक्कड़ों की देशसेवा

  - गिरीश पंकज

किसी ने प्रश्न किया : क्या लड़खड़ाते कदमों से भी देश की सेवा हो सकती है?

उत्तर मिला : क्यों नहीं हो सकती। इस तथ्य को जो नहीं समझते, वे बंदे नादान हैं। लड़खड़ाते कदमों से चलने वालों को कमअक्ल लोग शराबी कह कर अपमानित करते हैं। वे इस तथ्य से नावाकिफ है कि लड़खड़ाते कदमों का भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा योगदान है।

उस दिन हमने देखा, एक पियक्कड़ बंदे के कदम दिन में ही लड़खड़ा रहे थे।  मैं तो उस दिव्य आत्मा को देखकर बड़ा गद्गद हुआ। काहे कि देश की अर्थव्यवस्था के निरन्तर उत्थान में इस जैसे अनेक महापुरुषों का अप्रतिम योगदान है। इन सब का तो सार्वजनिक अभिनंदन होना चाहिए। सरकार को एक विशेष योजना चलानी चाहिए, जिस के तहत जिस किसी के भी कदम दिन-दहाड़े या रात-बिरात लड़खड़ाते दिखें, उनकी अलग से सुरक्षा-व्यवस्था करनी चाहिए; ताकि वे नाली-वाली में न गिर जाएँ। आज उस व्यक्ति के कदम भले ही लड़खड़ा रहे हैं; लेकिन उसके कारण देश आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ रहा है, यह नहीं भूलना चाहिए। हम विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में पियक्कड़ों का अपना बड़ा योगदान है।

आज देश के अनेक राज्यों की अर्थव्यवस्था शराब की अद्भुत धुरी पर टिकी हुई है। शराबबंदी हो जाए, तो कुछ राज्य बेचारे शायद दिवालिया ही घोषित कर दिए जाएँ। यह तो बेचारी इकलौती शराब ही है, जिसके कारण सरकारों के चेहरों पर शबाब नज़र आता है । बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। नादान हैं वे लोग, जो बोलते हैं कि शराब बड़ी खराब है। और अब तो सामने होली है। होली की खुशी में लोग छककर शराब पीते हैं। कुछ लोग तो सुबह से ही टुन्न रहते हैं । यह और बात है कि शाम होते-होते वे अकसर दिमागी तौर पर सुन्न भी हो जाते हैं। लेकिन ये महान लोग देश को मजबूत कर रहे हैं। अर्थशास्त्री बताते हैं कि लोग जितनी अधिक शराब पिएँगे, जितने ज्यादा लोगों के कदम लड़खड़ाएँगे, उतनी ही देश में समृद्धि आएगी। और हम देख भी रहे हैं कि कोई भी अति समझदार सरकार शराबबंदी नहीं लागू करना चाहती। पहले सरकारें मूर्ख हुआ करती थीं। वे जनता को अधिक-से-अधिक सब्सिडी देकर लाभ पहुँचाने की कोशिश किया करती थीं ; लेकिन अब इक्कीसवीं सदी में राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, सभी में होशियारी नहीं डेढ़-होशियारी आ गई है। विश्व बाजार में पेट्रोल की कीमत कम होती है ; लेकिन हमारे यहाँ एक बार जो कीमत चढ़ गई तो वह चढ़ी रहती है। जैसे किसी शराबी के दिमाग में नशा चढ़ा रहता है, उस तरह पेट्रोल की कीमत भी चढ़ी रहती है। शराब से दुखी लोग माँग करते रहते हैं कि शराबबंदी की जाए और सरकार कहती भी है कि हम जल्द करेंगे;  लेकिन यह जल्द कभी जल्द ही नहीं आता। मदिरा अपने हुस्न पर इठलाती हुई अपनी जगह जमी रहती है। पीछे के दरवाजे से सरकार को भी धन्यवाद भी देती है कि तुम्हारे कारण मेरे हुस्न का जलवा जमा हुआ है। सरकार भी एक आँख दबाते हुए कहती है- ''ऐ हुस्न की मलिका! तुम तो अपना काम करो। हमारे जीने-खाने की व्यवस्था तुम्हारे ही भरोसे तो है। अगर हम तुमको ही बंद कर देंगे, तो हमारा क्या होगा।''

तो सरकार और शराब दोनों मिल-जुलकर इस देश को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण योगदान हर उस आदमी का भी है, जो शराब पीकर लड़खड़ा रहा है । आप कह सकते हैं- " देखिए, वह शराबी है। लड़खड़ा कर चल रहा है।'' लेकिन आप भूल जाते हैं कि उसके लड़खड़ाते कदम देश की अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाने नहीं देते।

पिछले दिनों ऐसे ही एक टुन्न सज्जन  सो भेंट हो गई। देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान है;  इसलिए मैंने उन्हें दूर से नमस्ते किया। फिर पास आकर कहा, ''तुम बहुत शराब पीते हो?"

वह उत्साहित होकर बोला, "हाँ,पीता हूँ।  आइए न, आप भी बैठ जाइए। एक से भले दो।"

मैंने हाथ जोड़ कर ज़वाब दिया,  ''बंधु, मैं तुम्हारी तरह महान नहीं हूँ।  मैं राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं कर पा रहा हूँ;  क्योंकि मैं दूध से काम चला लेता हूँ। कहाँ शराब और कहाँ दूध।"

शराबी ने मुझे हिकारतभरी नज़रों से देखते हुए कहा, "इतने बड़े हो गए हो और अभी तक दूध पीते बच्चे हो? शर्म नहीं आती । हमको देखो, हमने दूध पीना कब का छोड़ दिया है, शराफत की तरह। अब तो सुबह और शाम भर लेते हैं जाम, और सबको देते हैं यही पैगाम कि शराब पीकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें। मुझे अपने आप पर गर्व है कि रोज एक -दो बोतल खरीदकर सरकार के खजाने को समृद्ध करता हूँ। आप भी देश को मजबूत करें न! एक से भले दो!"

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और पैग  बनाने लगा। बड़ी मुश्किल से उसकी चंगुल से छूटकर निकल भागा। वैसे बंदे की बात में दम तो है। भले ही पियक्कड़ों के कदम लड़खड़ाते हों, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को वे मजबूती के साथ सँभाल रहे हैं, इसमें दो राय नहीं।

Nov 1, 2024

व्यंग्यः देखने का नया उपकरण

  - गिरीश पंकज
सुना है, इन दिनों उन्होंने लोगों को देखने के अपने उपकरण बदल लिए हैं । पहले तो वे अपनी दोनों आँखों से ही देखा करते थे । बिल्कुल समदृष्टि के साथ, जब वे कुछ भी नहीं  थे। मगर  जब से पदासीन हुए हैं, मदासीन भी हो गए हैं। अब वे आँखों से नहीं, कानों से देखने लगे हैं। अगर मुँहलगे विश्वसनीय चमचे कुछ कहते हैं तो उनको फौरन यकीन हो जाता है कि ये सही कह रहे होंगे। आप समझ गए न कि मैं छदामीराम की बात कर रहा हूँ । बड़े नेता हैं। अरे, इनको तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं ! आपके ही आसपास तो कहीं रहते हैं । जब से उनको बड़ीवाली कुरसी मिली है, तब से वे भाव-विभोर होकर आँखें बंद ही रखते हैं। कोई खास महानुभाव  दिखे तो बिछ-बिछ जाते हैं, मगर आम लोगों को ठीक से देखते ही नहीं। कभी-कभार देखा भी तो घूर कर। सामने वाला डर जाता है। उनसे लाभ पाने की लालसा में लोग उनके आगे-पीछे दाएँ-बाएँ ठीक उसी तरह मँडराते रहते हैं, जैसे मक्खियाँ।  उनके कानों में आकर जिसने भी किसी के बारे में कुछ कह दिया, तो वे उसको ही सच मान लेते हैं। इस तरह वे कान से सुनते भी हैं और देखते भी हैं।

छदामीराम के बारे में जब यह अफवाह मैंने सुनी तो मैं प्रत्यक्ष अनुभव के लिए उनके पास चला गया। मैंने देखा, वे अपनी कुरसी पर विराजमान होकर मोबाइल को लगातार देखे जा रहे हैं। उनके अगल-बगल खड़े लोग उनके दाएँ और बाएँ कान में कुछ-न-कुछ फुसफुसाते और वे सहमति में अपनी एक अदद मुंडी हिला देते। अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी । कंधे पर खादी का झोला लटका हुआ था, हाथ में कलम थी, तो वे समझ गए कि यह कोई पत्रकार टाइप का जीव है। मुझे धन्य करने के भाव से वे फौरन मुस्कराए और पास बुलाकर बैठने का संकेत किया।  पूछा- “किस अखबार से हैं”, तो  मैंने ईमानदारी से बता दिया कि ' दैनिक खण्डन टाइम्स ' से हूँ, जो सप्ताह में एक बार छपता-ही-छपता है । लेकिन अखबार को लोग खोज-खोज कर पढ़ते हैं।  पिछले दिनों एक मंत्री के घोटाले की खबर हमने छापी थी, जिसे हजारों लोगों ने पढ़ा था।”

मेरी बात सुनकर वे विचलित हो गए और कहने लगे, “अरे, आप लोग घोटाले की भी खबर छापते ही क्यों हैं? ऐसा मत किया करें बंधु, हम जैसे नेताओं की तारीफ करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको विज्ञापन मिलेंगे। किसी का ट्रांसफर-प्रमोशन करवाना हो, तो मदद ले सकेंगे। ऐसा करने से आपके घर लक्ष्मी का प्रवेश होता रहेगा ।”

उनकी बात सुनकर मैंने कहा, “बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप । अब से ऐसा बिल्कुल नहीं होगा । आपने मेरे ज्ञान के कपाट अचानक खोल दिए। बताइए, और क्या चल रहा है ?”

वे कहने लगे, “सब ठीक-ठाक है, बंधु; लेकिन मैं इन दोनों शत्रुओं से घिरा हुआ हूँ। हमारे  खास समर्थक बता रहे थे कि कुछ लोग मुझे कुरसी से हटाने की कोशिश में लगे हुए हैं ।”

मैंने कहा- “आप सुनी-सुनाई बातों पर यकीन कर लेते हैं, यह ठीक बात नहीं। पहले पता तो कीजिए कि जिन लोगों के बारे में कहा जा रहा है, उसमें कितनी सच्चाई है।”

मेरी बात सुनकर वे बोले, “अरे! इतना समय कहाँ है कि जाकर सच्चाई पता करें और जिन्होंने मेरे खिलाफ कुछ कहा है, उनसे जाकर पूछूँ कि क्या तुमने मेरे बारे में ऐसा-वैसा कुछ कहा है। मैंने तो अपने कुछ खास रत्न पाल रखे हैं । बड़े विश्वसनीय। वे जो कहते हैं, उसे मैं आँख मूँदकर मान लेता हूँ। उनके भरोसे रहता हूँ।  अब आँखों से नहीं, कानों से देखता भी हूँ और सुनता भी हूँ।”

उनकी बात सुनकर मैंने कहा, “यहीं तो मार खा जाता है इंडिया। आपको किसी की बातों में नहीं आना चाहिए। आप बड़े नेता हैं। आपको बड़प्पन भी रखना चाहिए । ' 'कौवा कान ले गया' कहने पर कौवे के पीछे भागना ठीक नहीं। अगर आपको लंबे समय तक टिके रहना है तो कान से सुनने की बजाय आँखों से देखकर निर्णय लेना चाहिए वरना जैसा कि इतिहास है, सुनी-सुनाई बातों पर निर्णय लेने वाले बहुत जल्दी इतिहास बन जाते हैं।”

मेरी बात सुनकर वे भयंकर गंभीर हो गए और कहने लगे, “आपकी बात में दम है। इस पर मैं विचार करूँगा।”

बातचीत चली रही थी कि तभी एक बंदे ने उनके कान में कुछ फसफुसाया। फुसफुसाहट मेरे कानों तक भी पहुँच गई। वह कह रहा था, “भैयाजी! इस लेखक-पत्रकार से बचकर रहना। बहुत खतरनाक है। अंट-शंट लिखता है।”

इतना सुनना था कि छदमीराम के तेवर बदल गए। वे फौरन खड़े हुए और  रूखे स्वर में बोले, “नमस्ते। मुझे कहीं और निकलना है। फिर मिलेंगे।”

मैंने भी मुस्कराते हुए हाथ जोड़ लिया।

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2/ 2 ,  दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल : 87709 69574

Jun 1, 2023

व्यंग्यः कमाल का आदमी

  - गिरीश पंकज 

वन्स अपॉन ए टाइम, किसी प्रदेश की किसी राजधानी में एक मज़ेदार आदमी रहता था। लोग उसे कहते थे कि वो कमाल का आदमी है।

वैसे आदमी तो वो ‘कमला’ का था  लेकिन अकसर कमाल करता रहता था इसलिए लोग कहते थे ‘कमाल का आदमी है’। यानी रामलुभाया। 

उनकी सुबह किसी मंत्री की चौखट से शुरू होती और शाम किसी अफसर की चौखट पर दम तोड़ती। 

अपने देश के  हर शहर में अनेक रामलुभाया मिल जाते है। जो दिन भर मिठाई के डब्बे और बुके या गिफ्ट देने के पुनीत-कार्य में युद्धस्तर पर लगे रहते हैं। ये लोग किसी को बुके थमा देंगे, किसी को काजू कतली वाला डब्बा भेंट करके आ जाएँगे।

 लोग भी सोचते है कि आखिर ये करता क्या है? किस तरह का ‘आइटम सांग’ है? राइट है या राँग है?  जिस मंत्री- अफसर को ये सज्जन काजू कतली या काजू- किशमिश के डब्बे भेंट करते हैं, वे भी यकबयक समझ नहीं पाते कि सामने वाले के मन में क्या चल रहा है। इसकी ‘पॉलीट्रिक्स’ क्या है, ये बिंदास बंदा चाहता क्या है? इस दुनिया में लोग बिना किसी स्वार्थ के कटे पर भी  लघु- शंका नहीं करते और ये पट्ठा दो- तीन सौ रुपये का बुके ले कर आ रहा है, साथ में पाँच सौ रुपये वाली मिठाई गिफ्ट कर रहा है। 

चक्कर क्या है,....?

लफड़ा क्या है..... ?

इसके दिल में किस काम को सुलटाने की पृष्ठभूमि तैयार हो कर बैठी है... ? 

रामलुभाया उस दिन एक मंत्री जी के घर बुके ले कर पधारे। 

मंत्री जी पहले भी इनसे बुके लेते रहे हैं इसलिए रामलुभाया को देख कर फौरन हाथ आगे बढ़ा कर बुके स्वीकार किया, फिर मिठाई का डब्बा भी ले लिया। और बत्तीसी दिखने लगे। कुछ देर तक घूरने के बाद रामलुभाया को बैठने के लिए कहा और फोन उठा कर अपने सेवक को आदेश दिया, ‘नाश्ता तो लगा दो।’ 

सेवक थोड़ी देर बाद चना- मुर्रा और मिर्ची-प्याज के साथ हाजिर हो गया। मंत्री जी का प्रिय नाश्ता।

 यह देख कर मंत्री जी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘अरे रामू, ये अपने गाँव के मतदाता-मेहमान नहीं है, जो तुम चना-मुर्रा में निबटा रहे हो? कमाल करते हो भाई। अरे, ये शहरी सेठ लोग हैं। काजू- किशमिश खाते है। जाओ बढ़िया नाश्ता ले आओ। और हाँ, मिठाई के इस डब्बे का भी पूरा उपयोग कर लेना।’ 

रामू ने बाद सेठीय- नाश्ता परोस दिया, रामलुभाया धन्य हो गए मंत्री जी ने पूछा- ‘और सब ठीक है?’

 रामलुभाया अपने शरीर को विनम्रता के साथ हिलाते हुए कहा, ‘ सब आपकी कृपा है।’ 

‘बाल -बच्चे राजी-खुशी से हैं?’ मंत्री ने फिर पूछा तो रामलुभाया ने फिर वही दुहराया, ‘सब आपकी कृपा है?’ 

राम लुभाया अपने काम की बात बोल ही नहीं रहे थे। मंत्री जी भी जान रहे थे कि ये पट्ठा अभी कुछ नहीं बोलेगा. जब जाने लगेगा, तब धीरे -से अपनी बात रखेगा। ये बुके-मिठाई और गिफ्ट देने वाले बड़े कलाकार होते हैं, सीधे- सीधे मुद्दे पर नहीं आते। सीधे-सीधे तो मूरख किस्म का आम आदमी आता है. न ससुरा बुके देता है, और न मिठाई, और कहता है मेरा ये काम है, हो जाना चाहिए।’ ऐसे लोगों का काम- काम ही रह जाता है और खास लोगो का काम दन्न से हो जाता है। 

तो रामलुभाया कुछ बोल ही नहीं रहे थे, और मंत्री जी मन -ही -मन मज़े ले रहे थे।

 मंत्री जी बोले, ‘मौसम कैसे पल-पल रंग बदल रहा है।’ 

रामलुभाया  ने स्वर से स्वर मिलाया, ‘जी, पल-पल बदल रहा है। क्या कीजिएगा.’  

मंत्री ने फिर रामलुभाया को पलटी मारने के लिए मज़बूर किया, ‘वैसे इस बार मौसम का रुख पहले से तो बेहतर है, क्यों?’ 

रामलुभाया ने छूटते ही कहा, ‘सही फरमा रहे हैं आप, पहले से काफी बेहतर हो गया है।’ 


रामलुभाया की बातें सुनकर मंत्री जी हँस पड़े ‘बड़े ही मजेदार आदमी हैं? और ये बुके कहाँ से बनवाते है आप? देख कर तबीयत खुश हो जाती है। हमारी पत्नी निहारती रहती है इसको, और मिठाई तो बहुतई लाज़वाब होती है।  हमारा टॉमी लपककर खाता है। माँ क़सम, उसे बड़ी प्रिय लगती  हैं।’ 

रामलुभाया को कुछ समय तक समझ नहीं आया कि टॉमी कौन? कुत्ता या इनका नौकर? वैसे अक्सर कुत्ते को ही टॉमी कहते हैं, मगर मंत्री के यहाँ पता नहीं किसको कहते हैं। 

रामलुभाया को बाद में जैसे ही समझ में आया कि उन्हें निबटाने में लगे हैं, तो जेब से एक लिफाफा निकाला और बोले, ‘इसे देख लीजिएगा . अब चलता हूँ। कुछ और लोगों से मिलना है।’

मंत्री जी मुस्कराते रहे और कमला के कमाल- पति ने फिर पलटकर नहीं देखा।

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2/ 2 ,  दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल : 87709 69574

Dec 2, 2022

व्यंग्यः भोजन के लिए हेल्पलाइन नम्बर

 - गिरीश पंकज

उसे भूख लगी थी, जैसे सबको लगती है। पर उसके पास भोजन नहीं था। जैसे बहुतों के पास नहीं होता। वह परेशान होकर भोजन की तलाश में था, जैसे कोई पराजित नेता विजय की तलाश में रहता है। लेकिन विजयश्री उसकी हरकतों के कारण किसी दूसरे का वरण कर लेती है। खैर, तो वह भूखा बन्दा रोटी की तलाश में था। तभी किसी ने उसे पिछले दिनों शुरू की गई हेल्पलाइन-420 के बारे में बताया। इस नंबर पर डायल करो और अपनी भूख मिटा लो। सरकार की एकदम नई लेटेस्ट पहल है। आजकल सरकार अनेक तरह के हेल्प नंबर जारी कर रही है, जिसकी मदद से-ऐसा कहा जाता है कि-लोगों को हेल्प मिल जाती है। मिलती है या नहीं मिलती, यह शोध का विषय है। लेकिन हेल्पलाइन नंबर तो मौजूद रहता है। लोगबाग हेल्पलाइन नंबर डायल करके अकसर ख़ुद को हेल्पलेस ही महसूस करते हैं;  क्योंकि कोई ख़ास हेल्प तो मिलती नहीं। बस, नम्बर पर नम्बर डायल करते रहिए।

उस दिन एक गरीब बंदा भी इस चक्कर में फँस गया। वह गरीब तो था;  लेकिन समय के साथ चल रहा था, इसलिए उसके पास बहुत सस्ता मोबाइल फ़ोन था। (अब तो कुछ भिखारी तक मोबाइलधारी हो गए हैं। भीख माँग-माँगकर जब वे बोर हो जाते हैं, तो पता चला वीडियो गेम खेलते हैं। मगर यह सब छुप-छुपकर करते हैं। खुले आम तो उनके हाथ में कटोरा ही नज़र आता है;  लेकिन जब कभी वीडियो गेम खेलने का मूड होता है, तो चालाक भिखारी किसी दीवार की आड़ ले लेते हैं) । यह नया-नया गरीब था। उतना चालाक नहीं था। साधारण मोबाइल से काम चला रहा था। जब उसे पता चला कि हेल्पलाइन नंबर 420 पर फ़ोन करके मनचाहा खाना बुलाया जा सकता है और भूख मिटाई जा सकती है, तो उसने हेल्पलाइन का नंबर मिलाया। वहाँ से किसी कन्या की सुमधुर आवाज़ आई, "हेल्पलाइन नम्बर-420 में आपका स्वागत है। अँग्रेज़ी में बात करने के लिए एक दबाइए। हिन्दी में बात करने के लिए दो दबाएँ और अगर हमारी केवल परीक्षा लेने के लिए आए हैं, तो कुछ मत दबाइए।"

भूखे ने दो नंबर दबाया।

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "रोटी खाने के लिए एक नंबर दबाइए। पराठा खाने के लिए दो नंबर दबाइए।"

भूखे ने एक नंबर दबाया। उसे उत्तर मिला, "सूखी रोटी खाने के लिए एक नंबर दबाइए, घी चुपड़ी रोटी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ। पूड़ी खाने का मन है, तो तीन नंबर दबाइए और अगर हमारा सर खाने का मन है, तो जीरो दबाइए।"

बंदे को लगा, कोई बेवजह फिरकी ले रहा है; इसलिए अंट-शंट निर्देश दे रहा है। उसे तो रोटी खानी थी, किसी का सर क्यों खाता। उसे तो सूखी रोटी खाने का अभ्यास था;  इसलिए उसने एक नंबर ही दबाया।

उधर से सुमधुर उत्तर मिला, "कड़क रोटी के लिए एक नंबर दबाइए, सामान्य रोटी के लिए दो नंबर दबाएँ।"

भूखे ने दो नंबर दबा दिया।

फिर वहाँ से वही सुमधुर आवाज़ आई, "दो रोटी पाने के लिए एक नंबर दबाइए। चार रोटी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ।" बन्दे को जमकर भूख लगी थी। उसने दो नंबर दबा दिया।

फिर आवाज़ आई, "पंचतारा होटल वाली रोटी पाने के लिए एक दबाएँ, साधारण होटल की रोटी के लिए दो दबाएँ और ढाबे की तंदूरी रोटी के लिए तीन दबाएँ।"

भूखे ने सोचा पंचतारा होटल का बड़ा नाम सुना है; इसलिए उसने एक नम्बर दबा दिया।

उधर से आवाज़ आई, "अब अपना आधार नंबर यहाँ दर्ज करें।"

भूखे के पास आधार कार्ड तो था; लेकिन नंबर भरने में वह हड़बड़ा गया और एक अंक कम भर दिया। उधर से मैसेज आया, सॉरी आपका आधार नंबर ग़लत है। फिर से ट्राई करें।"

इतना बोलने के बाद कॉल डिस्कनेक्ट हो गई। भूखा परेशान। उसने एक बार फिर हेल्पलाइन नंबर को रिंग किया। काफ़ी देर बाद फिर वही रिकॉर्डेड आवाज़ आई, "हेल्पलाइन नंबर 420 में आपका स्वागत है। अँग्रेज़ी में बात करने के लिए एक नंबर दबाइए। हिन्दी में बात करने के लिए दो नंबर और केवल मनोरंजन करना हो तीन दबाएँ। भक्ति संगीत सुनना है तो चार दबाएँ। मौसम का हाल जानना हो तो पाँच दबाएँ।"

भूखे ने दो नंबर दबाया। उधर से आवाज़ आई "सब्जी पाने के लिए एक नंबर दबाइए, रोटी पाने के लिए दो नंबर। हलुआ और पूरी खाना हो, तो तीन नम्बर दबाएँ।"

भूखे की तो गोया लॉटरी निकल गई। उस ने सोचा, पता नहीं हलुआ पूरी मिले-न-मिले। रोटी का भी भरोसा नहीं। चलो, अब सब्जी ही बुलवा लेते हैं, इसलिए उसने एक नंबर दबा दिया। उधर से आवाज़ आई, "आलू की सब्जी पाने के लिए एक नंबर दिखाइए। बैंगन की सब्जी पाने के लिए दो नंबर दबाइए। भिंडी की सब्जी पाने के लिए तीन नंबर दबाइए और करेले की सब्जी पाने के लिए चार नंबर दबाइए। मिक्स वेजिटेबल के लिए पाँच दबाएँ।

भूखा सोचने लगा, करेले की सब्जी कड़वी होती है। वह ठीक नहीं रहेगी। भिंडी उसे पसंद नहीं है और बैंगन से भी उसे एलर्जी है, तो आलू की सब्जी ही ठीक रहेगी। मिक्स वेजिटेबल में अकसर बची-खुची सब्जी मिला दी जाती है इसलिए उसे बुलाना ठीक नहीं; इसलिए उसने एक नंबर दबा दिया। सदाबहार आलू की सब्जी। नम्बर दबाते ही फिर उधर से आवाज़ आई, "आलू की रसेदार सब्जी पाने के लिए एक नंबर दिखाइए। भुजिया सब्जी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ।"

युवक परेशान हो गया सोचने लगा, नंबर पर नंबर दबाए जा रहा हूँ। पता नहीं सब्जी कब आएगी। सामने वाले ने मेरा पता तो पूछा ही नहीं। शायद अंत में पूछे। उस ने आलू की सब्जी के लिए दो नंबर दबा दिया।

उधर से आवाज़ आई "बिना मिर्च की सब्जी खाने के लिए एक नंबर दबाइए। मिर्च और प्याज वाली सब्जी के लिए दो नंबर दबाइए। युवक ने मुस्कराते हुए दो नम्बर दबा दिया। फिर उधर से सुमधुर आवाज़ आई," धन्यवाद, हम आपको आपकी मनचाही सब्जी भेजेंगे। कृपा अपना आधार नंबर डालिए और पता टाइप करें। "

युवक ने आधार नंबर सावधानी के साथ डाला। फिर वहाँ से आवाज़ आई, "अपना आधार नंबर ठीक से डालिए।"

भूखे ने एक बार फिर आधार नंबर चेक किया और ध्यान से डाला। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "कुछ तो गड़बड़ है। फिर ट्राई करें।"

भूखे ने फिर ट्राई किया तो इस बार आवाज़ आई, "धन्यवाद, हम आपके पते पर आलू की सब्जी भेज रहे हैं।"

भूखे ने सोचा, सब्जी तो आ रही है। चलो, एक बार फिर रोटी के लिए ट्राई करते हैं। उसने फिर हेल्पलाइन का नंबर डायल किया। इस बार कोई रिस्पांस नहीं आया। टूं... टूं ...टूं की आवाज़ आती रही। बार-बार वह नंबर डायल करता रहा, मगर उसे कोई रिस्पांस नहीं मिला। भूखे ने सोचा, चलो कोई बात नहीं, सब्जी खाकर ही भूख मिटा लेंगे, या इस बीच कहीं से रोटी का जुगाड़ भी कर लेंगे।

भूखा अब तक सब्जी का इंतज़ार कर रहा है। पता नहीं वह कब आएगी। न सब्जी आई और न दोबारा हेल्पलाइन का नंबर ही लगा। अब वह हेल्प लाइन नम्बर-420 दबाने से डरता है। भूख मिटाने के लिए कुछ भी आता-जाता नहीं, बस बातें बड़ी स्वादिष्ट होती हैं। भूखा बन्दा सोच रहा है, काश! मीठी-मीठी बातों से ही अपन का पेट भर जाता, तो क्या बात है।

 सम्पर्कः संपादक, सद्भावना दर्पण (मासिक ), जी-३१,  नया पंचशील नगर,, रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001, मोबाइल : 09425212720

Aug 1, 2022

आजादी का अमृत महोत्सवः यह आत्ममंथन की भी बेला

-गिरीश पंकज

आजादी का यह अमृत महोत्सव है। मगर उत्सव मनाने के साथ यह आत्ममंथन का भी समय है कि पिछले पचहत्तर वर्षों में हमारे लोकतंत्र ने क्या खोया, क्या पाया।  क्या हमने आजादी का सकारात्मक इस्तेमाल किया अथवा आजादी को हमने स्वच्छंदता या अराजकता में बदलने की भी कोशिश की? सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद मिली स्वतंत्रता के बाद जिस महान राष्ट्र की कल्पना तमाम शहीदों ने की थी, क्या वह राष्ट्र सही मायने में हम विकसित कर सके? इस पर भी विचार करने की जरूरत है।

आत्ममंथन के लिए सबसे पहले हमें यह सोचना और देखना चाहिए कि आजाद भारत के बाद भी हमारे अपने कानून क्यों नहीं लागू हैं? क्यों आज भी हम अंग्रेजों के समय के बनाए गए  कुछ काले कानूनों को जस-का-तस लागू किए हुए हैं।  चाहे वह भारतीय दंड संहिता हो या वन कानून अथवा तरह-तरह की कर प्रणालियाँ । यानी आयकर, विक्रय कर आदि । आजादी के पहले तक 20-25 टैक्स ही इस देश की जनता पर थोपे गए थे, लेकिन अब तो इसकी संख्या लगभग सत्तर हो चुकी है।  तो हमें विचार करना होगा कि  यह लोकतंत्र है या टैक्स-तंत्र? आजादी के पहले  कामकाज की भाषा अँग्रेज़ी थी, जो अब तक कायम है। यह तो हिन्दी भाषा का सौभाग्य है कि दबाव के चलते  अंततः उसे राजभाषा का दर्जा देना पड़ गया लेकिन आज भी उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी का ही राज है । तो कैसे मान लें कि हम पूरी तरह से स्वतंत्र हो चुके हैं । अंग्रेजों के समय की ही पुलिस वर्दी, उसी समय के पुलिसिया कानून और उसी तरह की दमन की नीतियाँ।  गुलाम भारत में स्वतंत्रता सेनानी सरकार के विरुद्ध कुछ न बोल सकें;  इसलिए राजद्रोह के मुकदमे उन पर ठोक दिए जाते थे। दुर्भाग्य की बात है कि आजाद भारत में भी उसी तरह राजद्रोह के मामले समय-समय पर दर्ज होते रहते हैं । किसी भी सरकार के शीर्ष व्यक्ति पर अगर कोई आरोप लगा देता है,  तो फौरन उस पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हो जाता है। लोकतंत्र में यह अपने आप में बहुत बड़ा अन्याय है। राष्ट्रद्रोह कानून तो होना ही चाहिए। अगर कोई देश के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करता है, तो उस पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए । जैसे ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह’ कहने वालों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा जायज है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ या केंद्र अथवा राज्य सरकार में बैठे शीर्ष व्यक्ति के विरुद्ध कोई निंदनीय बात करता है, तो उस पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा कायम नहीं होना चाहिए।  उसे हम अवमानना की श्रेणी में रख सकते हैं और उस तरह की धारा लगाई जा सकती है;  लेकिन सरकार की निंदा को राजद्रोह कहना लोकतंत्र का अपमान है। इस कानून को खत्म करने की आवश्यकता है। 

हमारी न्याय व्यवस्था काफी लचर है और अंग्रेजी सिस्टम के अनुसार ही अब तक संचालित हो रही है।  मामले मुकदमों की हालत यह है कि आज देशभर में करोड़ों मामले न्यायालय में लंबित पड़े हैं। और ज्यादातर न्यायालयों में संवाद की भाषा अंग्रेजी हो गई है, जो आम लोगों को पल्ले नहीं पड़ती।

अंग्रेज़ों के समय का सिस्टम...

हम जब देखते हैं कि 1947 के बाद भी अंग्रेजों के जमाने के कानून कायम हैं, तो किसी भी देशभक्त व्यक्ति को पीड़ा हो सकती है । अंग्रेजों के आने के पहले तक यहाँ पुलिस व्यवस्था नहीं थी । उनके आने के बाद ऐसी पुलिस व्यवस्था यहाँ संचालित हुई, जिसके द्वारा गुलाम भारतीयों पर दमन के हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं । स्वतंत्रता सेनानियों का दमन करने के लिए पुलिस की लाठी- गोली निरंतर चलती रही है । धारा 144 इसीलिए लागू की गई कि  स्वतन्त्रता सेनानी आपस में मिल न सकें। कोई धरना प्रदर्शन सरकार के खिलाफ न किया जा सके। हम देखते हैं कि यह धारा और अन्य धाराएँ भी, अब तक लागू हैं और आजाद भारत के नागरिकों के दमन का एक बड़ा माध्यम बन चुकी हैं। मैं तो इस बात को देखकर हैरत में भर जाता हूँ कि अगर किसी को धरना-प्रदर्शन करना है,तो उसे पुलिस की इजाजत लेनी पड़ती है।  यह अंग्रेजों के समय तक के लिए तो ठीक था; लेकिन आजाद देश में नागरिक अपनी माँगों को लेकर अगर प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें  पुलिस की अनुमति क्यों लेनी चाहिए?  वहाँ सिर्फ सूचना दी जानी चाहिए, ताकि पुलिस से स्थल पर पहुँचकर स्थिति को नियंत्रित में रख सके।

इसी तरह इंडियन सिविल सर्विस एक्ट स्थापित करने के बाद पूरे देश में कलेक्टर थोपे गए। इनका काम था राजस्व वसूली करना, लेकिन आजादी के बाद वही कलेक्ट्री व्यवस्था जस की तस लागू है। और उल्टे अब तो पहले से ज्यादा अधिकार कलेक्टर को दे दिए गए हैं। उसे हमने जिला दंडाधिकारी तक बना दिया है। इस कारण हर जिले में कलेक्टर अपनी मनमानी करते हैं। आईएएस के साथ आईपीएस की भी बेहद मजबूत व्यवस्था कर दी गई है, जो लोकतंत्र के लिए घातक साबित हुई है।  हालत यह है कि ये लोग निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की बातें भी नहीं सुनते। उनका अपमान करते हैं।  हालत यह है कि इन अफसरों को बर्खास्त करने का अधिकार राज्यों के पास नहीं है।  इस कारण के नौकरशाह निरंकुश होकर राज कर रहे हैं । अपवाद स्वरूप कभी-कभी किसी गंभीर मामले का संज्ञान लेकर केंद्र की अनुशंसा पर उन्हें बर्खास्त किया जाता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं। ज्यादातर मामले में यह नौकरशाह जन-प्रतिनिधियों पर भारी है। मैं इसे लोकतंत्र की विफलता मानता हूँ। इनको पॉवरफुल बनाने के कारण यह न केवल केंद्र या राज्य वरन स्थानीय निकायों तक में पॉवरफुल बने हुए हैं। कहने को हमारे यहाँ पंचायती राज व्यवस्था लागू हो गई है;  लेकिन आज भी निर्णायक भूमिका अफसरों के हाथों में ही है।

काले कानून खत्म हों-

काले कानूनों में सबसे महत्त्वपूर्ण कानून वन कानून है, जिसकी सहायता से आज भी लाखों आदिवासियों और ग्रामीणों को उनके हक से बेदखल कर दिया जाता है । वे गाँव छोड़ने पर मजबूर होते हैं।  अंग्रेजों से आने के पहले जंगल में रहने वाले लोग अपनी जरूरतों की लकड़ी काट लिया करते थे और उससे गुजर-बसर करते थे । वक्त आने पर वे पेड़ भी लगाया करते थे । तब  पूरे देश में सघन जंगल हुआ करते थे लेकिन अंग्रेज आए और उन्होंने वन कानून लागू (1872) करके लोगों को जड़ों से दूर कर दिया। जंगल बचाने के नाम पर आदिवासियों को गाँव से दूर खदेड़ दिया और जब जंगल में आदिवासी वहाँ नहीं रहे , तो अंग्रेजों ने मनमाने तरीके से पेड़ों को काटना शुरू किया। विकास के नाम पर पेड़ काटे जाते रहे और आज इस देश में वनों की क्या हालत है, यह किसी से छिपी नहीं है । तथाकथित विकास के नाम पर आज भी लोकतांत्रिक सरकारें भूमि अधिगृहीत करके जितना चाहे उतना पेड़ काट लेती है और फोरलेन, सिक्स लेन सड़कें बनाकर वाहवाही लूट रही हैं।  तो यह नए किस्म का लोकतंत्र है ।  आजादी के अमृत महोत्सव के बहाने इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है ? क्यों जंगल में रहने वाला आदिवासी ग्रामीण अपने ही जड़ों से काट दिया गया है? उसे उसके जंगल फिर वापस मिलेंगे। जंगल उसकी आत्मा थी। जंगल उसका घर था।  जहाँ पशु भी रहते थे और मनुष्य भी रहा करते थे। दोनों अपनी-अपनी भोजन व्यवस्था और सुरक्षा कर लिया करते थे।

इसी तरह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) ने इस देश में आजादी के पहले ऐसा दमन चक्र लागू किया  था, जो दुर्भाग्यवश आजादी के बाद से अब तक जारी है।  हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं और इस अमृत महोत्सव के दौरान भी अगर वही अंग्रेजों के दंड व्यवस्था लागू है, तो यह हमारे लोकतंत्र की विफलता है । हम अपना मौलिक ढाँचा विकसित नहीं कर सके कि हमें किस तरह देश की व्यवस्था संचालित करनी चाहिए । कानून व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था मैकाले जैसे शातिर दिमाग लोगों ने चौपट कर दी। मैकाले ने इस देश के सारे गुरुकुलों को नष्ट करके विश्वविद्यालयों की एक नई संस्कृति विकसित कर दी । डलहौजी जैसे लोगों ने जो हड़प नीति लागू की थी, वह बाद में स्वतंत्र भारत में भू-अधिग्रहण नियम में तब्दील हो गई।  आज भी सरकारें जब चाहे विकास के नाम पर किसी भी व्यक्ति को उसके घर से, जमीन से या गाँव से बेदखल कर सकती है। क्या इसे हम लोकतांत्रिक व्यवस्था कहेंगे? 

आश्चर्य होता है कि हमारी अदालत है फरमान जारी कर के आदिवासियों को उनके गाँव से बेदखल कर देती है। मेरे पास प्रामाणिक आँकड़े तो नहीं है;  लेकिन यह अतिरंजित नहीं है कि आज इस देश में लाखों आदिवासी अपने-अपने इलाके छोड़ने पर मजबूर हुए हैं;  क्योंकि वहाँ सरकारों को विकास करना है। भले ही हमारा आदिवासी ग्रामीण अपनी मुख्यधारा से कट जाए। आज भी फर्जी ग्राम सभाएँ होती हैं और भोले-भाले ग्रामीणों को थककर उनकी जमीनें अधिगृहीत कर ली जाती हैं और उन्हें मुआवजे के नाम पर थोड़ी बहुत राशि टिका दी जाती है । वादे किए जाते हैं कि आपके बच्चों को हम नौकरी देंगे, रोजगार मुहैया करवाएँगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। और सीधे सादे ग्रामीण वर्षों तक आंदोलन करते रह जाते हैं।

अफसरशाही को नियंत्रित करना होगा-

यह ऐसे कुछ मुद्दे हैं, जिन पर एक नागरिक होने के नाते में अक्सर अपने विचार रखता हूँ, तब मुझे निराशा हाथ लगती है।  आजादी के इन 75 वर्षों में भी हमने लोकतंत्र को सही मायने में मजबूत करने का काम नहीं किया। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सब चुने हुए जन-प्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण हुआ। जब हमारे राजनीतिज्ञ विपक्ष में होते हैं, तब वे लोकतंत्र की खूब बात करते हैं;  लेकिन जैसे ही वे सत्ता में आते हैं, लोकतंत्र के वस्त्र को तानाशाही-खूँटी पर लटका देते हैं।  और उसके बाद वे भी बिल्कुल दमनकारी नीति अपनाते हुए अपने विरोधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश करते हैं।  अगर ईमानदारी के साथ इस देश में लोकतंत्र लागू करना है, तो  निष्कर्ष रूप में कहूँ, तो सबसे पहले इस देश की अफसरशाही की बेहिसाब ताकत को खत्म करना होगा।  जनप्रतिनिधियों को और पॉवरफुल बनाना होगा । हर हाल में अफसरशाही जन-प्रतिनिधियों के द्वारा ही नियंत्रित रहे । हर अफसर में समस्त जन-प्रतिनिधियों का डर होना चाहिए । उनकी एक अनुशंसा पर अफसरों का निलंबन और उनकी बर्खास्तगी होनी चाहिए।  अगर हमने इतना भी कर लिया, तो लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम होगा। आजादी का अमृत महोत्सव हमें धूमधाम से मनाना है;  लेकिन लोकतंत्र की आत्मा कभी आहत न हो, इस दृष्टि से जितने भी सुधार संभव हो करने चाहिए। इसलिए इस अमृत महोत्सव को मैं आत्ममंथन की बेला भी कहता हूँ। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों का सहारा लेकर  अंत में कहना चाहता हूँ -

हम कौन थे क्या हो गए, और क्या होंगे अभी।

आओ विचारे आज मिलकर, ये समस्याएँ  सभी।

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सम्पर्कः संपादक सद्भावना दर्पण, सेक्टर -3, एचआईजी 2/2, दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर 492010, मो.- 87709 69 574


Jan 1, 2022

गीतः नए वर्ष का वंदन है!

 -गिरीश पंकज

बीत गया जो बीत गया बस,उसको हमें भुलाना है।

नई आस्था, नए स्वप्न को,फिर से चलो सजाना है।

पीछे मुड़कर देखेंगे तो, बस क्रंदन-ही-क्रंदन है ।

नए वर्ष का वंदन है।।

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कुछ तो बिछड़ गए उन सबका, दर्द हमेशा बना रहेगा

जो आया है, वह जाएगा, सत्य मगर यह तना रहेगा।

जिसने समझी सच्चाई, उस ज्ञानवान का वंदन है

नए वर्ष का वंदन है।।

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हर दिन हमें सबक मिलता है, कुछ हम बेहतर काम करें ।

भूल सुधारें अपनी बढ़कर, व्यर्थ न हम आराम करें।

नये पंथ पर नई आस ले, जीवन का स्पंदन है ।।

नये वर्ष का वंदन है।।

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कोरोना ने हमें रुलाया, बहुत डराया दुनिया को ।

लेकिन सच है यह भी कड़वा, सबक सिखाया दुनिया को।

जो जीने की कला जान ले, वही महकता चंदन है ।।

नये वर्ष का वंदन है।।

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साथ साथ जीना मरना है, साथ-साथ ही चलना है

क्षणभंगुर है जीवन अपना, यह काया तो छलना है।

जब तक जिएँ नया करें कुछ, क्या इसमे कुछ बन्धन है।

नये वर्ष का वंदन है।।

Nov 1, 2021

व्यंग्यः लक्ष्मी नहीं आई, आ गई महँगाई !

- गिरीश पंकज

दिवाली निकट थी, पर स्थिति बड़ी विकट थी। कारण यह कि हमारे जीवन का दिवाला पिटा हुआ था और हम दीवाल से सिर सटाकर यही सोच रहे थे कि इस (कमरतोड़ नहीं) हृदयतोड़ महँगाई के बीच खुशियों के दीप जलें तो जलें कैसे! तभी किसी ने द्वार खटखटाया। रात का समय था । हम अतिरिक्त उत्साह से भर गए, क्योंकि सुन रखा था कि दिवाली के आसपास लक्ष्मी  मैया कभी भी दरवाजा खटखटाके घर के भीतर प्रवेश कर सकती है । हमने एक विज्ञापन भी सुना था जिसमें लॉटरी बेचने वाला बार-बार यही कहता था, ‘लक्ष्मी आपके घर का दरवाजा खटखटा रही है।  हमने कोई लॉटरी तो नहीं खरीदी थी;  लेकिन यह सोचकर दरवाजा खोलने के लिए उठ खड़े हुए कि हो सकता है आज लॉटरी लग जाए,  यानी लक्ष्मी मैया आकर कहे - बेटे! बता, तेरे घर की तिजोरी कहाँ है, मैं उसमें समाना चाहती हूँ।’  लेकिन जैसे ही दरवाजा खुला, मैंने देखा, वहाँ कोई नहीं था।  तब मुझे किसी कवि की रचना याद आ गई, जिसमें कवि ने कहा है-  न कोई आया था, न कोई आया होगा/ तुम्हारा दरवाजा हवाओं ने खटखटाया होगा।हालाँकि बाहर ऐसी कोई हवा नहीं चल रही थी कि दरवाजा अपने आप खटकने लगे । थोड़ी देर बाद फिर खटखट की आवाज हुई तो मैंने फिर अति उत्साह के साथ दरवाजा खोला, तो देखा, बाहर एक कूपसीखड़ी है। ( रूपसी का विलोम कूपसी)

मुझे देखकर कूपसी मुस्काई; लेकिन उसकी मुस्कान मुझे रत्ती भर नहीं भाई, क्योंकि उसका चेहरा सामान्य नारियों जैसा बिल्कुल नहीं था। मुझे रामायण काल की शूर्पणखा की याद हो आई। बिल्कुल उसकी तरह ही कूपसी का चेहरा नज़र आ रहा था। उसे देख कर मैं मन-ही-मन घबरा रहा था:  हे भगवान! भला, यह कौन-सी बला टपक पड़ी है। मैंने उसकी मुस्कान का ज़वाब मुस्कान से देते हुए खानदानी शिष्टाचार निभाया और हाथ जोड़कर फरमाया, ‘बताइए देवी!  मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’
कूपसी  कुछ कुछ कविता पढ़ने के अंदाज़ में बोली-

 क्या तुमने मुझे नहीं पहचाना?
अरे भाई, मैं महँगाई हूँ।
तुम्हारा हालचाल

जानने के लिए आई हूँ।
कैसी कट रही है
मेरे राज में?
कुछ स्वाद आ रहा है
आलू और प्याज में?
या फिर जिंदगी जीने के लिए
हमेशा की तरह
पैसे उठा रहे हो ब्याज में?’
मैंने कहा, ‘तुम तो इस देश के मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय लोगों का हाल-चाल जानती ही हो। तुम्हारे कारण हम सबकी जो दुर्गति हो रही है, उसे देख कर यही लगने लगा है कि बहुत जल्दी हम 'सद्गति' को प्राप्त हो जाएँगे।
मेरी बात सुनकर कूपसी हँसी और बोली, ‘हम तुम्हें जीने नहीं देंगे और सरकार तुम्हें मरने नहीं देगी। वह ऐसे-ऐसे लोक लुभावन वादे करेगी कि उसी प्रत्याशा में तुम लोग जिंदा रहोगे। इतने साल से तुम सब सरकार के वादों पर ही तो जिंदा हो। हालाँकि तुम सब बार-बार यह गाना भी गाते हो कि वादे पे तेरे मारा गया अब बंदा ये सीधा-सादा, वादा तेरा वादा । लेकिन एक बात तो है कि सरकारी वादे इस देश के आम आदमी को उत्साह से भर देते हैं और वह मगन होकर सोचने लगता है कि अब आएँगे अच्छे दिन। अब दूर होगी गरीबी; लेकिन ऐसा होता नहीं है।  वैसे सच्चाई यह है कि जो लोग गरीबी हटाओ का नारा देते हैं, सबसे पहले उनकी गरीबी दूर हो जाती है। जो लोग कहते हैं, अच्छे दिन आएँगे, सत्ता में आने के बाद उनके अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं । तो एक तरह से वे गलत भी नहीं कहते । उनकी गरीबी तो हट गई न! उनके अच्छे दिन आ गए न!! आखिर वे भी तो इस देश के नागरिक हैं । उन्हें भी जीने-खाने का हक है । चलो करोड़ों के अच्छे दिन नहीं आए तो क्या हुआ, मुट्ठी भर लोगों के तो आ गए।
मैंने कहा, ‘ओ रूपसी की डुप्लीकेट बहन कूपसी! यह सब तुम्हारी कृपा के कारण हो रहा है। देशभर में तुम्हारा जलवा है। तुम जिस चीज पर हाथ रख दो, उसकी कीमत बढ़ जाती है। विपक्ष को तुम्हारी आड़ लेकर सरकार की खिंचाई करने का मौका मिल जाता है।  जो दल सरकार में रहता है, उसे विपक्ष वाले बस इसी बात पर कोसते हैं कि हाय- हाय! देखो, इस नालायक सरकार के कारण देश में महँगाई बढ़ गई है।.. लोगों का जीना दूभर हो गया है । मगर जैसे ही विपक्ष सत्ता के घोड़े पर सवार होता है, वह भी तुमसे (यानी महँगाई से) इश्क लड़ाने लगता है।  और शुरू हो जाता है खुला खेल फर्रुखाबादी । हे डायनश्री,  तुम्हारे साथ सरकार का ऐसा गठबंधन होता है कि मत पूछो। तुम्हारे हुस्न के जलवे ऐसे  बिखरते हैं कि लोग बस आहें भर के रह जाते हैं।  तब तुम यही गाना गाती हो, आहें न भर ठंडी-ठंडी खतरे की है यह घंटी, गरम-गरम चाय पी ले।
महँगाई बाई हँसी और  आश्चर्यचकित होकर कहने लगी, ‘अच्छा ! तो लोग इस महँगाई के ज़माने में चाय भी पी लेते हैं? क्या शक्कर सस्ती हो गई है? मैंने तो हर तरफ अपना शिकंजा फैला कर रखा है। पेट्रोल की कीमतें आकाश छू रही हैं। डीजल उसके पीछे-पीछे भागा चला जा रहा है । घरेलू गैस भी सबसे आगे निकल चुकी है। सब्जी, अनाज हर कहीं मेरा जलवा नज़र आता है । आम आदमी कुछ खरीदने के पहले सौ बार सोचता है। अपनी जेब देखता है, तब आगे बढ़ता है । कई बार तो बेचारा सामान के दूर-दर्शन करके ही घर लौट जाता है। ऐसा भयंकर आतंक मैंने फैला कर रखा है।
मैंने महँगाई को प्रणाम करते हुए कहा, ‘हे कु-देवी!  तुम इस देश से जाने का क्या लोगी? तुम्हारे कारण हम लोग ठीक से त्यौहार भी नहीं मना सकते । अब देखो न, दिवाली पर दिवाला पिटने जैसी स्थिति है।  मिठाई खरीद नहीं सकते। वह इतनी महंगी हो गई है। ले- दे कर एकाध पाव खरीद लिया, तो बड़ी बात। और उस पर भी डर लगता है कि कहीं उसमें मिलावट  न हो।  एक तो महँगी मिठाई और उस पर मिलावटी! मतलब हम पर दोहरी मार । उधर पटाखे भी इतने महंगे कि कीमत  सुनकर ही आदमी बमहम हो जाता है । कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे कारण  दिवाली केवल धनवालों का त्योहार होकर रह गई है। लेकिन ऐसा नहीं है कि
केवल धन वाले ही
दिवाली मनाते हैं
हम जैसे दिलवाले भी
दिवाली मना लेते हैं ।
और दो-चार मिट्टी के दीयों में
अपने आँसू भर कर
उन्हें जला देते हैं।
मेरी पीड़ा सुनकर महँगाई एक बार फिर हँसी और बोली, ‘तुम लोगों के हिम्मत की दाद देती हूँ। जानलेवा महँगाई के दौर में भी तुम लोग मुस्कुरा लेते हो ? खुश रहने की कोशिश करते हो ! मिठाई का एकाध टुकड़ा खाकर ही जीवन को स्वादिष्ट बना लेते हो । पेट्रोल खर्च न हो इसलिए लंबी-लंबी पदयात्रा भी कर लेते हो!  तुम लोगों की बात निराली है । यह और बात है कि भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था के कारण ही तुम लोग की किस्मत काली है।  यही कारण है कि सिस्टम को याद करके तुम सब के होठों पर गाली-ही-गाली है।  लेकिन चिंता मत करो । बहुत जल्दी तुम्हारे अच्छे दिन आने वाले हैं।
महँगाई की बात सुनकर मैंने कहा,  अच्छे दिन की याद मत दिलाओ।  यह जुमला बड़ा खतरनाक है । जब सरकार कहती है, अच्छे दिन आएँगे, तो इसका मतलब यह है कि जनता के बुरे दिन शुरू होने वाले हैं । बहुत पहले जब सरकार ने कहा था, गरीबी हटाओ तो लगा था,

सचमुच गरीबी हटेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं । गरीब ही मिटते चले गए और सभी जगह अमीर-ही-अमीर बढ़ते चले गए।  तो, हे देवी ! कृपा करके अच्छे दिन का वास्ता मत दो।  बस, तुम से करबद्ध प्रार्थना है कि अपना सुरसा जैसा आकार बढ़ाना बंद कर दो, तो हम सब के अच्छे दिन शुरू हो जाएँगे।
मेरी बात सुनकर कूपसी बोली, ‘मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा।  यह सरकार पूँजीपतियों के साथ जिस तरह से नैन-मटक्का या रोमांस कर रही है, उसे देखते हुए लगता है कि उसी ने सब कुछ छूट देख दे रखी है कि देश को जितना चाहो, उतना लूटो । हम तुम को अभय दान देते हैं । बस, तुम अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा हमारी जेबों को समर्पित करते रहो, फिर चाहे नंगा नाच करो। हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। रही जनता की बाततो उसे हम हर बार की तरह झाँसा देकर बहला- फुसला लेंगे और सत्ता पर काबिज रहेंगे।
महँगाई की दो टूक बात सुनकर मैं सोचने लगा कि आखिर इस बाई ने मेरा दरवाजा क्यों खटखटाया। क्या यह मुझे और कंगाल बनाना चाहती है? या फिर खुद से यानी महँगाई से निपटने का कोई खास फार्मूला देना चाहती है ? इसलिए मैंने पूछ लिया, ‘अच्छा, यह तो बताओ कि तुम इस दिवाली के मौके पर मेरे घर किसलिए तशरीफ लाई?’
मेरी बात सुनकर महँगाई  पहले मुस्कुराई फिर थोड़ा-सा सकुचाई, शरमाई और उसके बाद उसने फरमाया, ‘दरअसल मैं यही देखने आई हूँ कि तुम लोगों के जीवन में दिक्कत में कोई कमी तो नहीं है। अगर तुम्हारी दिक्कत कुछ कम हो रही हो, तो मैं उसे कैसे बढ़ा सकती हूँ। इसका सर्वे करने निकली हूँ। मैं सरकार की खास प्रवक्ता हूँ। सरकार की मंशा भी यही है कि जनता को अधिक-से-अधिक तकलीफ में रखा जाए। शायद इसके पीछे उसकी मंशा यही हो कि लोग भक्ति-भाव में डूबे रहें। किसी कवि ने कहा है न- ‘दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय’, तो सरकार चाहती है कि लोग भगवान का नाम लेते रहें। इसलिए देश की जनता को वह महँगाई के बोझ तले दबाए रखना चाहती है । एक तरह से सरकार बड़ा काम कर रही है कि वह सबके हृदय में भक्ति की गंगा प्रवाहित कर रही है।
महँगाई कि बात सुनकर मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा, ‘देवी ! तुमको और इस सरकार को बारंबार प्रणाम है, जिसने हमें दुख सहने का आदी और दुख सहते हुए भगवान का भक्त भी बना दिया है। अब तुम आगे बढ़ जाओ ताकि मैं दीपक जलाकर अपने जीवन में उजाला कर लूँ।
महँगाई चौंक कर बोली, ‘तो तुम्हारे घर में तेल भी है?आश्चर्य!!
मैंने कहा, ‘हम गरीब लोग तेल से नहीं, आँसुओं से दीपक जलाते हैं और पटाखे फोड़ कर नहीं, उसकी आवाज सुनकर दिवाली मनाते हैं ।
मेरा उत्तर सुनकर महँगाई का चेहरा उतर गया और वह आगे बढ़ गई। फिर हमने दरवाजा बंद कर दिया और इंतजार करने लगे कि शायद भूले-भटके ही सही, लक्ष्मीदेवी आकर मेरा दरवाजा ज़रूर खटखटाएगी।

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2/ 2 , दीनदयाल उपाध्याय नगररायपुर- 492010, मोबाइल :  87709 69574